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Incest PAAP PUNYA (Pariwarik Kamuk Upnayas)

decentpoet

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Dosto mein kuch ek saal se likh nahi raha tha kyunki kuch log is kahani ko interfaith bata rahey they aur chahtey they main isse likhna band kr du, yeh kahani kewal kalpnao ka sangreh hai. Aaj ke internet ke daur mein jo bhi chal raha hai aur issi ke sath sath aam pariwarik mahaul mein jo jajwaat lakho karodo logo ke dillon dimaag mein dabbey reh jaatey hai yeh upnayas unhi jajwaato ko kalpnik jubaan deta hai. Kisi dharm jaati vishesh se is upnayas ka koi lena dena nahi yeh kewal ek kalpanik upnayas hai. 18 warsh ki aayu se kam waykti iss upnayas se door rahey.


Dhanyawaad
 

decentpoet

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सुनीता के मन में उस गधे के खड़े लिंग ने एक अजीब-सी कसक जगा दी थी, पर वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने जल्दी से उस गधे के पास से चले जाने का फैसला किया। और वह फिर से उस विश्राम स्थल के भीतर आ गई और वह गधा फिर से बगीचे में जाकर चरने लगा।

सुनीता को अपने आप से घृणा हो रही थी कि कैसे वह एक जानवर की इस प्रकार की क्रिया से उत्तेजित महसूस कर सकती थी।

पता नहीं, कुछ तो अद्भुत था इस एकांत और प्रकृति की गोद में। यहाँ पर तीनों—माँ, बेटा और बेटी—मानो दुनिया की भीड़-भाड़ और समाज के ताने-बाने को भूलकर अपने मन, दिल, दिमाग और सबसे मौलिक, अपने शरीर की मूल प्रवृत्तियों की आवाज़ सुन रहे थे।

सुनीता अपनी अंतरात्मा के साथ तर्क करते हुए स्वयं से ही सवाल-जवाब कर रही थी कि क्या उस गधे के गुप्त अंग को देखकर उसका उत्तेजित होना स्वाभाविक था या नहीं, पाप था या पुण्य।

अक्सर हमारी ज़िंदगी में भी ऐसा ही हो जाता है। पुण्य के चक्कर में लोग पाप कर बैठते हैं, और या यूँ कहिए कि कुछ चीज़ों को लोग पाप समझते हैं, कुछ को पुण्य। क्या ऐसा नहीं है कि जो कार्य किसी के लिए पुण्य हो, किसी दूसरे के लिए वह पाप हो सकता है?

असल में, सारे मानव इतिहास में यही द्वंद्व रहा है कि यह तय कौन करेगा कि क्या पुण्य है और क्या पाप। और इसी शीर्षक पर यह उपन्यास आधारित है।

संगीता देवी जैसी स्त्री, जो पति को परमेश्वर मानकर पूजा करती है, अगर सब कुछ एक बेजान मूर्ति की तरह सहती रहे तो पतिव्रता और पुण्य करने वाली स्त्री, और अगर आकाश को कुछ पलों के लिए भोग ले तो पाप की भागीदार।

क्या आकाश ने बचपन में उसके स्तनों को चूस-चूस कर दूध नहीं पिया था, और क्या वह उसी की योनि से इस धरती पर नहीं आया था? तो क्या वह पाप नहीं था? पर समाज और संस्कृति के बनाए गए नियमों से कौन लड़ाई लड़े। इसी लिए आकाश को सबकी नाक के नीचे यह सब करना पड़ रहा था।

जहाँ सुनीता इस पाप-पुण्य के विषय में अपने आप से बातें कर रही थी, वहीं आकाश की माँ संगीता देवी भी कहीं न कहीं इसी खींचातानी में उलझी हुई थी।

आकाश का बेबाक रवैया उसे कुछ पलों के लिए आज़ाद तो करता, पर इतने वर्षों की पूर्वाग्रहपूर्ण मानसिकता से छुटकारा पाना मुश्किल काम था, जिसमें संगीता देवी किसी हद तक सफलता पा चुकी थी। उसने इस अधेड़ उम्र में आकर पहली बार अपने शरीर की सुनी थी, न कि समाज और नैतिक मूल्यों की।

“माँ! मैं बहुत खुश हूँ कि मैंने आपको पूरी तरह से हासिल कर लिया है, पर जब हम घर लौट जाएँगे तो उस खड़ूस! (राजनीश राठौड़) के साथ मेरा आपको देखना बहुत मुश्किल होगा।” — आकाश ने कुटिया में बैठी संगीता देवी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, जो कि आचार्य जी द्वारा उस गधे की मदद से भेजे गए सामान से उन वस्त्रों को अलग कर रही थी जिन्हें वह पहन सकती थी, क्योंकि तीनों माँ, बेटा और बेटी के पास पहनने के लिए इक्का-दुक्का वस्त्र ही थे।

“आकाश, तेरी ज़िद, शैतानी और खुशी के लिए बेटा! मैंने अपने आप को भी दाँव पर लगा दिया, पर तेरे पिता जी की जगह तुम भी जानते हो कोई नहीं ले सकता। हमारे रिश्ते का आधार केवल और केवल कामवासना है। इसको गुप्त रखने में ही सबकी भलाई है, वरना अनर्थ हो जाएगा बेटा!” — संगीता देवी

“माँ! मैं आपसे प्यार करता हूँ और आप भी मुझसे स्नेह रखती हैं! हमारे इस गुप्त रिश्ते का ज़रूरी पहलू कामवासना हो सकती है, पर पूरा का पूरा आधार कामवासना कैसे हो सकता है माँ?” — आकाश ने बड़ी चतुराई से संगीता देवी के सामने शब्दों का जाल बुनते हुए तर्क दिया। हालाँकि उसे भी पता था कि बात तो उसकी माँ संगीता देवी ठीक कह रही थी।

पर आकाश संगीता देवी को केवल संभोग तक ही सीमित नहीं रखना चाहता था। वह उसे अपने शब्दों के मायाजाल में फँसाकर वह सब करवाना चाहता था जिसकी उसने कामना की थी।

“क्या आपको मेरी आँखों में अपने लिए प्रेम नज़र नहीं आता?” — आकाश ने संगीता देवी के कंधे से हाथ सरका कर ऊपर गर्दन के पिछले हिस्से पर कर दिया।

“बेटा! प्यार और स्नेह तो है, पर जो तुझे चाहिए था वह तो सब तुम्हें मिल गया है, अब इससे ज़्यादा मैं क्या कर सकती हूँ।” — संगीता देवी ने आकाश की तरफ पलटते हुए कहा।

“माँ! बचपन में पिता जी ने मुझे बोर्डिंग स्कूल भेजकर जो छीना था, उसकी भरपाई होने में अभी बहुत समय लगेगा।” — आकाश की आँखों में मानो राजनीश राठौड़ के प्रति एक

संगीता देवी को अब यह एहसास हो रहा था कि कामवासना में आकाश से संभोग करते समय वह क्या-क्या बोल गई थी। पर अब क्या किया जा सकता था, जो होना था वह हो चुका था।

आकाश ने उठकर अपने आप को ठीक किया और कुटिया से बाहर आ गया। बारिश अब भी उतनी ही गति से हो रही थी और घड़ी शाम के 4 बजा रही थी। आकाश को तेज़ भूख लगी हुई थी और संगीता देवी के पेट में भी चूहे कूद रहे थे। खैर, संगीता देवी घर का कामकाज संभालने में माहिर औरत थी, तो उसने आचार्य जी द्वारा भेजी गई सामग्री से भोजन तैयार किया और दोनों माँ-बेटे ने शाम के लगभग 6 बजे भोजन ग्रहण किया। सुनीता का अभी जागना नामुमकिन था; वह तो बेचारी अब भी बेसुध होकर दवा के असर में सोई हुई थी।

आकाश को यह बात भली-भाँति पता थी कि यह जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बनी दवा कोई नींद की दवा नहीं बल्कि एक प्रकार की आयुर्वेदिक बेहोशी (एनेस्थीसिया) की दवा का काम करती थी। पर उसने यह बात संगीता देवी को बताना ज़रूरी नहीं समझा था, क्योंकि नींद की गोली का असर कितना भी हो, हिलाने पर नींद टूट ही जाती है, पर बेहोशी की दवा नींद की दवा से कई गुना ज़्यादा असरदार होती है।

बारिश और जंगल होने की वजह से इस समय तक वहाँ अँधेरा छा गया था, पर लाइट की कोई चिंता नहीं थी। अभी तो वहाँ मौजूद इमरजेंसी लाइट्स पूरी तरह से इस्तेमाल भी नहीं हुई थीं कि आचार्य जी ने कुछ और लाइट्स पहुँचा दी थीं।

आकाश ने खाना खाने के बाद अपने पावर बैंक से फोन चार्ज किया और फोन पर कुछ इधर-उधर के वीडियो देखने लगा।

आकाश भी पूरी तरह से नग्न था और जब से सुनीता को वह दवा पिलाई गई थी, तब से संगीता देवी को भी कोई वस्त्र पहनने नहीं दिया था। दोनों माँ-बेटे इस एकांत में बिल्कुल दो शरीर एक जान हो गए थे। आकाश अपनी माँ संगीता देवी के साथ उसी सिंगल बेड पर बैठा था।

“बेटा! अब कपड़े पहन लेते हैं, कहीं सुनीता उठ न जाए।” — संगीता देवी ने चिंता जताते हुए कहा।

“अरे माँ! चिंता मत करो, तूने ही तो आधा चम्मच और डाल दिया था। अब भूल जाओ, यह सुबह तक नहीं उठने वाली।” — इतना कहते हुए आकाश ने करवट लेकर लेटी हुई सुनीता के बाएँ नितंब को ज़ोर से पकड़कर हिलाना शुरू कर दिया।

संगीता देवी तो डर के मारे सहम गई थी कि अबकी बार तो सुनीता जाग ही जाएगी, क्योंकि उसे वह चाय पिए हुए 3 घंटे से ज़्यादा हो गए थे, क्योंकि इस समय घड़ी में साढ़े 6 बजे का समय था।

पर आकाश के तेज़ हिलाने पर भी सुनीता की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

“देखा माँ!” — आकाश ने हँसते हुए कहा।

“अच्छा माँ! कभी पोर्न मूवी देखी है? कभी दिखाई पिता जी ने?” — आकाश ने संगीता देवी के बगल में बैठे हुए कहा।

“कौन-सी मूवी! पो....र्न?” — संगीता देवी ने उत्सुकता से पूछा।

“यह होती है पोर्न मूवी, देख!” — इतना कहते हुए आकाश ने अपने फोन की गैलरी के फ़ोल्डर में से एक वीडियो चला दिया, जिसमें एक काला आदमी बड़ी नितंबों वाली महिला के साथ संभोग कर रहा था।

“श्श्श.... यह देखता है!” — संगीता देवी ने झूठी शर्म दिखाते हुए कहा।

“माँ! तू भी थोड़ी देर पहले मेरे साथ यही तो कर रही थी।” — आकाश ने संगीता देवी की जाँघ पर हाथ रखते हुए कहा।

“हे भगवान! कितना बड़ा है इस आदमी का। बेचारी देख, कैसे दर्द के मारे चिल्ला रही है।” — संगीता देवी जहाँ इस वीडियो की झूठी निंदा कर रही थी, वहीं इस वीडियो को पूरी उत्सुकता से देख भी रही थी।

“अरे मेरी भोली माँ! इसे चिल्लाना नहीं, मोनिंग कहते हैं। मज़ा ले रही है।” — आकाश का हाथ अब संगीता देवी की उससे सटी हुई जाँघ पर घूम रहा था।

“देख, अब यह इसके पीछे डालेगा, देख।” — आकाश

यह सब संगीता देवी पहली बार देख रही थी और उसकी उत्सुकता को देखकर आकाश भी चकित था।

“माँ! तेरे लिए तो ऐसे 2-3 आदमी भी कम पड़ जाएँगे।” — आकाश ने हँसते हुए कहा।

“हट! बदमाश कहीं का।” — संगीता देवी ने हँसते हुए आकाश से फोन छीन लिया और अपनी आँखों के नज़दीक करके वह वीडियो देखने लगी।

संगीता देवी यह वीडियो बड़े ही चाव और उत्सुकता से देख रही थी। वह देख रही थी कि जीवन के इस पहलू से तो वह आज तक अनजान ही रही थी।

“अच्छा ला माँ! कुछ और दिखाता हूँ!” — इतना कहकर आकाश ने संगीता देवी के हाथ से फोन छीन लिया और लॉक करके एक तरफ़ रख दिया।

“आकाश, अब देखने तो दे पूरा बेटा!” — संगीता देवी ने नाराज़ होते हुए कहा।

संगीता देवी को अब यह एहसास हो रहा था कि कामवासना में आकाश से संभोग करते समय वह क्या-क्या बोल गई थी। पर अब क्या किया जा सकता था, जो होना था वह हो चुका था।

आकाश ने उठकर अपने आप को ठीक किया और कुटिया (हट) से बाहर आ

संगीता देवी को अब यह एहसास हो रहा था कि कामवासना में आकाश से संभोग करते समय वह क्या-क्या बोल गई थी। पर अब क्या किया जा सकता था, जो होना था वह हो चुका था।

आकाश ने उठकर अपने आप को ठीक किया और कुटिया से बाहर आ गया। बारिश अब भी उतनी ही गति से हो रही थी और घड़ी शाम के 4 बजा रही थी। आकाश को तेज भूख लगी हुई थी
[23/06, 9:47 pm] khushi12210: संगीता देवी को अब यह एहसास हो रहा था कि कामवासना में आकाश से संभोग करते समय वह क्या-क्या बोल गई थी। पर अब क्या किया जा सकता था, जो होना था वह हो चुका था।

आकाश ने उठकर अपने आप को ठीक किया और कुटिया से बाहर आ गया। बारिश अब भी उतनी ही गति से हो रही थी और घड़ी शाम के 4 बजा रही थी। आकाश को तेज भूख लगी हुई थी और संगीता देवी के पेट में भी चूहे कूद रहे थे। खैर, संगीता देवी घर का कामकाज संभालने में माहिर औरत थी, तो उसने आचार्य जी द्वारा भेजी गई सामग्री से भोजन तैयार किया और दोनों माँ-बेटे ने शाम के लगभग 6 बजे भोजन ग्रहण किया। सुनीता का अभी जागना नामुमकिन था; वह तो बेचारी अब भी बेसुध होकर दवा के असर में सोई हुई थी।

आकाश को यह बात भली-भांति पता थी कि यह जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बनी दवा कोई नींद की दवा नहीं बल्कि एक प्रकार की आयुर्वेदिक बेहोशी (एनेस्थीसिया) की दवा का काम करती थी। पर उसने यह बात संगीता देवी को बताना ज़रूरी नहीं समझा था। क्योंकि नींद की गोली का असर कितना भी हो, हिलाने पर नींद टूट ही जाती है, पर बेहोशी की दवा नींद की दवा से कई गुना ज़्यादा असरदार होती है।

बारिश और जंगल होने की वजह से इस समय तक वहाँ अंधेरा छा गया था, पर लाइट की कोई चिंता नहीं थी। अभी तो वहाँ मौजूद इमरजेंसी लाइट्स पूरी तरह इस्तेमाल भी नहीं हुई थीं कि आचार्य जी ने कुछ और लाइट्स भिजवा दी थीं।

आकाश ने खाना खाने के बाद अपने पावर बैंक से फोन चार्ज किया और फोन पर कुछ इधर-उधर के वीडियो देखने लगा।

आकाश अब भी पूर्ण रूप से नग्न था और जब से सुनीता को वह दवा पिलाई गई थी तब से संगीता देवी को भी कोई वस्त्र पहनने नहीं दिया था। दोनों माँ-बेटे इस एकांत में बिलकुल दो शरीर एक जान हो गए थे। आकाश अपनी माँ संगीता देवी के साथ उसी सिंगल बेड पर बैठा था।

"बेटा! अब कपड़े पहन लेते हैं, कहीं सुनीता उठ न जाए" — संगीता देवी ने चिंता जताते हुए कहा।

"अरे! माँ! चिंता मत करो, तूने ही तो आधा चम्मच और डाल दिया। अब भूल जाओ, यह सुबह तक नहीं उठने वाली" — इतना कहते हुए आकाश ने करवट लेकर लेटी हुई सुनीता के बाएँ नितंब को ज़ोर से पकड़कर हिलाना शुरू कर दिया।

संगीता देवी तो डर के मारे सहम गई थी कि अबकी बार तो सुनीता जाग ही जाएगी क्योंकि उसे वह चाय पिए हुए 3 घंटे से ज़्यादा हो गए थे, क्योंकि इस समय घड़ी में साढ़े 6 बज रहे थे।

पर आकाश के तेज हिलाने पर भी सुनीता की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

"देखा माँ!" — आकाश ने हँसते हुए कहा।

"अच्छा माँ! कभी पोर्न मूवी देखी है? कभी दिखाई पिता जी ने?" — आकाश ने संगीता देवी के बगल में बैठे हुए कहा।

"कौन सी मूवी! पो.....र्न?" — संगीता देवी ने उत्सुकता से पूछा।

"यह होती है पोर्न मूवी, देख!" — इतना कहते हुए आकाश ने अपने फोन की गैलरी के फोल्डर में से एक वीडियो चला दिया, जिसमें एक काला आदमी, बड़ी गांड वाली महिला के साथ संभोग कर रहा था।

"श्श्श..... यह देखता है?" — संगीता देवी ने झूठी शर्म दिखाते हुए कहा।

"माँ! तू भी थोड़ी देर पहले डांडिया थोड़ा खेल रही थी मेरे साथ, यही तो कर रही थी" — आकाश ने संगीता देवी की जाँघ पर हाथ रखते हुए कहा।

"हे भगवान! कितना बड़ा है इस हफ़्शी का, बेचारी देख कैसे दर्द के मारे चिल्ला रही है" — संगीता देवी जहाँ इस वीडियो की झूठी निंदा कर रही थी, वहीं पर इस वीडियो को पूरी उत्सुकता से देख भी रही थी।

"अरे मेरी भोली माँ! इसे चिल्लाना नहीं, मोअनिंग कहते हैं। मज़ा ले रही है साली" — आकाश का हाथ अब संगीता देवी की उससे सटी हुई जाँघ पर घूम रहा था।

"देख अब यह इसके पीछे डालेगा, देख" — आकाश

यह सब संगीता देवी पहली बार देख रही थी और उसकी उत्सुकता को देखकर आकाश भी चकित था।

"माँ! तेरे लिए तो ऐसे 2-3 हफ़्शी भी कम पड़ जाएँगे" — आकाश ने हँसते हुए कहा।

"हट! बदमाश कहीं का" — संगीता देवी ने हँसते हुए आकाश से फोन छीन लिया और अपनी आँखों के नज़दीक करके वह वीडियो देखने लगी।

संगीता देवी यह वीडियो बड़े ही चाव और उत्सुकता से देख रही थी। वह देख रही थी कि जीवन के इस पहलू से तो वह आज तक अनजान ही रही थी।

"अच्छा ला माँ! कुछ और दिखाता हूँ!" — इतना कहकर आकाश ने संगीता देवी के हाथ से फोन छीन लिया और लॉक करके एक तरफ रख दिया।

"आकाश, अब देखने तो दे पूरा बेटा!" — संगीता देवी ने नाराज़ होते हुए कहा।

आकाश को हैरानी हो रही थी कि क्या वह वही संस्कारी, पतिव्रता और धार्मिक नारी थी या कोई और। क्योंकि अगर किसी चीज़ को पहली बार देखा, सुना या महसूस किया जाए तो वह अनुभव कुछ ख़ास ही होता है।

"माँ! दिखा तो दूँ, पर हर एक चीज़ की एक कीमत होती है। बोल, दे पाएगी कीमत?" — आकाश ने नटखट स्वर में पूछा।

"बेटा! अब सब कुछ तो तुझे दे दिया, सब कुछ तेरे लिए दाँव पर लगा दिया और क्या कीमत चाहिए अब?" — संगीता देवी ने आकाश को जवाब देते हुए कहा।

"अभी भी काफ़ी कुछ बचा हुआ है माँ, बोलो लगाओगी दाँव पर? देख लो, यह वीडियो तो एक था, ऐसे ढेरों वीडियो देखने को मिलेंगे" — आकाश ने संगीता देवी से पूछा।

"अच्छा फिर मेरी भी एक शर्त है। पहले वह वीडियो पूरा देखने दो, तब मैं अपना फैसला सुनाऊँगी" — संगीता देवी ने खुलकर बात करते हुए कहा।

"ठीक है माँ, तू भी क्या याद रखेगी, ले देख" — इतना कहते हुए आकाश ने वह वीडियो फिर से संगीता देवी को लगा कर दे दिया।

इस समय संगीता देवी वह वीडियो देख रही थी जिसमें वह काला हफ़्शी बहुत ही बुरे तरीके से उस औरत के साथ संभोग कर रहा था और उधर आकाश संगीता देवी के पाँव से लेकर जाँघों तक के हिस्से को कामुक होकर सहला रहा था।

कुछ 10 मिनट चले उस वीडियो में उस काले हफ़्शी ने पूरा दबाकर उस औरत को पेला था और संगीता देवी को यह देखकर अजीब आनंद और सुख मिला था और इसके साथ ही वह यह भी समझ गई थी कि ऐसी हरकतें आकाश ने कहाँ से सीखी थीं।

इस समय तक संगीता देवी एक बार फिर से कामातुर हो चुकी थी, वह वीडियो ही कुछ ऐसा था और आकाश के हाथों का कमाल भी तो इसके साथ जुड़ गया था।

आकाश ने फिर से एक बार फोन संगीता देवी से छीनकर एक तरफ रख दिया।

"बोलो! माँ क्या फैसला किया?" — आकाश ने फिर से नटखट कामुक स्वर में पूछा।

"अच्छा! बोल क्या कीमत चाहिए तुझे" — संगीता देवी

"माँ, मैं तुम्हें सुनीता के बिस्तर में उसकी बगल में लिटाकर संभोग करना चाहता हूँ" — आकाश ने यह कहते हुए संगीता देवी को बेड से हाथ पकड़कर जबरदस्ती सुनीता की बगल में लिटा दिया।

"आकाश! यहाँ नहीं बेटा! सुनीता जाग जाएगी" — संगीता देवी ने तर्क देते हुए कहा, जो उसे भी पता था कि निरर्थक था क्योंकि अभी आकाश ने सुनीता को अच्छे से हिलाकर संगीता देवी को विश्वास दिलवाया था कि सुनीता अब भी बेसुध थी।

अब स्थिति ऐसी थी कि सुनीता करवट लेकर जिस तरफ मुँह किए सो रही थी, उसी तरफ आकाश ने संगीता देवी को सीधा पीठ के बल लिटा दिया था और हाथ-पैर मारती हुई संगीता देवी के ऊपर आकाश लेटा हुआ था।

सुनीता का मुँह संगीता देवी के मुँह के बिल्कुल सामने था। सुनीता ने संगीता देवी की तरफ करवट ली हुई थी और संगीता देवी सीधी नग्न अवस्था में अपनी बेटी से लगभग सटी हुई पड़ी थी।

आकाश ने संगीता देवी की एक न सुनते हुए एक बार फिर से उसकी कमजोरी यानी उसकी योनि को नीचे होकर मुँह में भर लिया था, क्योंकि आकाश एक मँझा हुआ शिकारी था जिसे पता था कि इस घरेलू घोड़ी को कैसे-कैसे लगाम डालनी थी। आकाश ने इतनी कुशलता से अपनी जीभ संगीता देवी की योनि में चलाई कि वह कुछ मिनटों में बिलकुल शांत होकर सुनीता की बगल में लेटी फिर से आहें और सिसकियाँ भरने लगी।

आकाश ने तकरीबन 10 से 15 मिनट में संगीता देवी की योनि को चूस-चूस कर पूर्ण रूप से मदहोश कर दिया था।

आकाश ने अब सीधी लेटी संगीता देवी की दोनों टाँगों को फैलाया और एक बार फिर से उसकी गहरी योनि में अपना लंड उतार दिया।

"आह्ह.... बेटा! मर्र.... गई... धीरे... आह्ह्ह" — संगीता देवी मानो आकाश का लंड लेकर पागल सी हो उठी थी।

आकाश अब संगीता देवी के ठीक ऊपर लेटा, उसकी दोनों टाँगों को फैलाए, उनके बीच अपनी कमर हिला-हिलाकर बड़ी ही कुशलता से धक्के लगा रहा था। और साथ में पड़ी सुनीता इतनी पास लेटी हुई थी कि उसकी साँसें संगीता देवी और आकाश के मुँह तक महसूस हो रही थीं।

आकाश का हर एक धक्का संगीता देवी को और ज़्यादा कामातुर कर रहा था।

"माँ! अपनी लाडली की तरफ देखो, कैसे आराम से सो रही है" — इतना कहकर आकाश ने संगीता देवी के दोनों गालों को अपनी हथेली में लेकर सुनीता की तरफ संगीता देवी का चेहरा कर दिया।

"देखो माँ! कितनी शांति से सो रही है" — आकाश ने यह कहते हुए अपने दाएँ हाथ के अंगूठे से सुनीता के होंठों को मसल दिया और ज़ोर से एक धक्का मारा।

"नहीं! बेटा! इसे शांति से सोने दो.. वरन…आ…. " — संगीता देवी आगे भी कुछ बोलना चाहती थी पर आकाश ने अपने धक्कों की गति और बढ़ा दी थी।

कुछ पाँच मिनट तक यही प्रक्रिया दोहराने के बाद जब आकाश को पक्का हो गया कि संगीता देवी अब पूरे रूप से कामातुर थी, तो उसने अपने धक्कों की गति को धीमा कर दिया और अपनी आगे की रणनीति पर काम करने के लिए तैयार हो गया।

"माँ! एक बार चूम लूँ इस घोड़ी को" — आकाश ने ज़ोरदार धक्का मारते हुए कहा।

"नहीं बेटा! यह अनर्थ मत कर" — संगीता देवी इस कामवासना की चरम सीमा में भी सुनीता को बचाना चाहती थी। अभी भी उसके अंदर की माँ अपनी बेटी के बचाव के लिए लड़ रही थी।

"ठीक है फिर, रंडी तू चूम इसे साली रखैल" — इतना कहते हुए आकाश ने एक ज़ोरदार झटका देते हुए संगीता देवी के होंठों को सुनीता के होंठों से जोड़ दिया।

"पहले तो संगीता देवी ने थोड़ा विरोध किया पर आकाश के ज़बरदस्ती और ज़ोर लगाने पर किसी आश्चर्यजनक ढंग से संगीता देवी ने सारा विरोध छोड़कर सुनीता के कोमल रसीले होंठों को चूमना शुरू कर दिया।

क्योंकि आकाश ने जानबूझकर इतनी देर तक उसकी योनि को चूसा और चाटा था पर इस दौरान एक बार भी उसके होंठों को नहीं चूमा था और संगीता देवी अपनी योनि में लगी आग को शांत करने के लिए किसी को चूमना और सच मानो तो काटना चाहती थी।

"यह हुई न बात साली रांड, चूस इसके रसीले होंठ" — आकाश ने रुक-रुक कर एक के बाद एक ज़ोरदार धक्के लगाते हुए कहा।

"इसी गर्भ से निकली है न यह छोटी घोड़ी माँ!"

"इसी योनि में रही है न यह रंडी 9 महीने, बोल रांड!" — आकाश के शब्दों ने मानो संगीता देवी पर जादू कर दिया था और वह पागलों की तरह सुनीता के होंठों को चूस रही थी। आखिरकार इसमें हरजा ही क्या था, वह उसका अपना ही खून थी।

जिस दौरान संगीता देवी सुनीता के होंठों को बेसुध होकर चूस रही थी, आकाश एक हाथ से सुनीता की लेगिंग को घुटनों से नीचे उतार चुका था। अब स्थिति यह थी कि सुनीता कमर से नीचे बिल्कुल नग्न थी।

"माँ! अगर तू मुझसे प्यार करती है! तो मुझे आज यह अनुमति दे कि मैं इस कली को फूल बना दूँ" — आकाश ने एक ज़ोरदार धक्का देते हुए कहा।

"नहीं बेटा! यह अनर्थ मत कर! आह्ह्ह! बेटा! यह गल…त है.. आह्ह!" — संगीता देवी की आँखों में कामवासना के साथ-साथ आँसू भी थे और उसका शरीर तो इतना कामातुर हो गया था कि वह सिसकियाँ ले रही थी।

“माँ! आगे नहीं तो कम से कम पीछे करने की तो अनुमति दे दो" — संगीता देवी कामातुर होकर इतनी बेबस थी कि इस बार उसने कोई उत्तर नहीं दिया, आँखें झुकाकर बंद कर ली थीं, जिसका मतलब साफ था कि इस घड़ी में वह हथियार डाल चुकी थी और सब कुछ भाग्य और आकाश के हाथ में छोड़ चुकी थी।

यही बात का इंतज़ार तो आकाश कर रहा था। आकाश ने लपक कर शेल्फ से वह तेल की कटोरी उठाई और पुनः सुनीता की बगल में आकर बैठ गया।

“माँ! अब इसके कुर्ते और ब्लाउज़ का क्या काम" — इतना कहकर आकाश ने सुनीता के सारे वस्त्र निकाल उसे नग्न कर दिया।

संगीता देवी पास लेटी यह सब लाचारी से देख रही थी।
Aapka vishesh dhanyawaad aap ne is is upnayas ka chota sa ansh devnagrik lipi mein type jo kiya hai.

Dhanyawaad !
 

gauravvv

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Dosto mein kuch ek saal se likh nahi raha tha kyunki kuch log is kahani ko interfaith bata rahey they aur chahtey they main isse likhna band kr du, yeh kahani kewal kalpnao ka sangreh hai. Aaj ke internet ke daur mein jo bhi chal raha hai aur issi ke sath sath aam pariwarik mahaul mein jo jajwaat lakho karodo logo ke dillon dimaag mein dabbey reh jaatey hai yeh upnayas unhi jajwaato ko kalpnik jubaan deta hai. Kisi dharm jaati vishesh se is upnayas ka koi lena dena nahi yeh kewal ek kalpanik upnayas hai. 18 warsh ki aayu se kam waykti iss upnayas se door rahey.


Dhanyawaad
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Premkumar65

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सुनीता के मन में उस गधे के खड़े लिंग ने एक अजीब-सी कसक जगा दी थी, पर वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने जल्दी से उस गधे के पास से चले जाने का फैसला किया। और वह फिर से उस विश्राम स्थल के भीतर आ गई और वह गधा फिर से बगीचे में जाकर चरने लगा।

सुनीता को अपने आप से घृणा हो रही थी कि कैसे वह एक जानवर की इस प्रकार की क्रिया से उत्तेजित महसूस कर सकती थी।

पता नहीं, कुछ तो अद्भुत था इस एकांत और प्रकृति की गोद में। यहाँ पर तीनों—माँ, बेटा और बेटी—मानो दुनिया की भीड़-भाड़ और समाज के ताने-बाने को भूलकर अपने मन, दिल, दिमाग और सबसे मौलिक, अपने शरीर की मूल प्रवृत्तियों की आवाज़ सुन रहे थे।

सुनीता अपनी अंतरात्मा के साथ तर्क करते हुए स्वयं से ही सवाल-जवाब कर रही थी कि क्या उस गधे के गुप्त अंग को देखकर उसका उत्तेजित होना स्वाभाविक था या नहीं, पाप था या पुण्य।

अक्सर हमारी ज़िंदगी में भी ऐसा ही हो जाता है। पुण्य के चक्कर में लोग पाप कर बैठते हैं, और या यूँ कहिए कि कुछ चीज़ों को लोग पाप समझते हैं, कुछ को पुण्य। क्या ऐसा नहीं है कि जो कार्य किसी के लिए पुण्य हो, किसी दूसरे के लिए वह पाप हो सकता है?

असल में, सारे मानव इतिहास में यही द्वंद्व रहा है कि यह तय कौन करेगा कि क्या पुण्य है और क्या पाप। और इसी शीर्षक पर यह उपन्यास आधारित है।

संगीता देवी जैसी स्त्री, जो पति को परमेश्वर मानकर पूजा करती है, अगर सब कुछ एक बेजान मूर्ति की तरह सहती रहे तो पतिव्रता और पुण्य करने वाली स्त्री, और अगर आकाश को कुछ पलों के लिए भोग ले तो पाप की भागीदार।

क्या आकाश ने बचपन में उसके स्तनों को चूस-चूस कर दूध नहीं पिया था, और क्या वह उसी की योनि से इस धरती पर नहीं आया था? तो क्या वह पाप नहीं था? पर समाज और संस्कृति के बनाए गए नियमों से कौन लड़ाई लड़े। इसी लिए आकाश को सबकी नाक के नीचे यह सब करना पड़ रहा था।

जहाँ सुनीता इस पाप-पुण्य के विषय में अपने आप से बातें कर रही थी, वहीं आकाश की माँ संगीता देवी भी कहीं न कहीं इसी खींचातानी में उलझी हुई थी।

आकाश का बेबाक रवैया उसे कुछ पलों के लिए आज़ाद तो करता, पर इतने वर्षों की पूर्वाग्रहपूर्ण मानसिकता से छुटकारा पाना मुश्किल काम था, जिसमें संगीता देवी किसी हद तक सफलता पा चुकी थी। उसने इस अधेड़ उम्र में आकर पहली बार अपने शरीर की सुनी थी, न कि समाज और नैतिक मूल्यों की।

“माँ! मैं बहुत खुश हूँ कि मैंने आपको पूरी तरह से हासिल कर लिया है, पर जब हम घर लौट जाएँगे तो उस खड़ूस! (राजनीश राठौड़) के साथ मेरा आपको देखना बहुत मुश्किल होगा।” — आकाश ने कुटिया में बैठी संगीता देवी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, जो कि आचार्य जी द्वारा उस गधे की मदद से भेजे गए सामान से उन वस्त्रों को अलग कर रही थी जिन्हें वह पहन सकती थी, क्योंकि तीनों माँ, बेटा और बेटी के पास पहनने के लिए इक्का-दुक्का वस्त्र ही थे।

“आकाश, तेरी ज़िद, शैतानी और खुशी के लिए बेटा! मैंने अपने आप को भी दाँव पर लगा दिया, पर तेरे पिता जी की जगह तुम भी जानते हो कोई नहीं ले सकता। हमारे रिश्ते का आधार केवल और केवल कामवासना है। इसको गुप्त रखने में ही सबकी भलाई है, वरना अनर्थ हो जाएगा बेटा!” — संगीता देवी

“माँ! मैं आपसे प्यार करता हूँ और आप भी मुझसे स्नेह रखती हैं! हमारे इस गुप्त रिश्ते का ज़रूरी पहलू कामवासना हो सकती है, पर पूरा का पूरा आधार कामवासना कैसे हो सकता है माँ?” — आकाश ने बड़ी चतुराई से संगीता देवी के सामने शब्दों का जाल बुनते हुए तर्क दिया। हालाँकि उसे भी पता था कि बात तो उसकी माँ संगीता देवी ठीक कह रही थी।

पर आकाश संगीता देवी को केवल संभोग तक ही सीमित नहीं रखना चाहता था। वह उसे अपने शब्दों के मायाजाल में फँसाकर वह सब करवाना चाहता था जिसकी उसने कामना की थी।

“क्या आपको मेरी आँखों में अपने लिए प्रेम नज़र नहीं आता?” — आकाश ने संगीता देवी के कंधे से हाथ सरका कर ऊपर गर्दन के पिछले हिस्से पर कर दिया।

“बेटा! प्यार और स्नेह तो है, पर जो तुझे चाहिए था वह तो सब तुम्हें मिल गया है, अब इससे ज़्यादा मैं क्या कर सकती हूँ।” — संगीता देवी ने आकाश की तरफ पलटते हुए कहा।

“माँ! बचपन में पिता जी ने मुझे बोर्डिंग स्कूल भेजकर जो छीना था, उसकी भरपाई होने में अभी बहुत समय लगेगा।” — आकाश की आँखों में मानो राजनीश राठौड़ के प्रति एक

संगीता देवी को अब यह एहसास हो रहा था कि कामवासना में आकाश से संभोग करते समय वह क्या-क्या बोल गई थी। पर अब क्या किया जा सकता था, जो होना था वह हो चुका था।

आकाश ने उठकर अपने आप को ठीक किया और कुटिया से बाहर आ गया। बारिश अब भी उतनी ही गति से हो रही थी और घड़ी शाम के 4 बजा रही थी। आकाश को तेज़ भूख लगी हुई थी और संगीता देवी के पेट में भी चूहे कूद रहे थे। खैर, संगीता देवी घर का कामकाज संभालने में माहिर औरत थी, तो उसने आचार्य जी द्वारा भेजी गई सामग्री से भोजन तैयार किया और दोनों माँ-बेटे ने शाम के लगभग 6 बजे भोजन ग्रहण किया। सुनीता का अभी जागना नामुमकिन था; वह तो बेचारी अब भी बेसुध होकर दवा के असर में सोई हुई थी।

आकाश को यह बात भली-भाँति पता थी कि यह जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बनी दवा कोई नींद की दवा नहीं बल्कि एक प्रकार की आयुर्वेदिक बेहोशी (एनेस्थीसिया) की दवा का काम करती थी। पर उसने यह बात संगीता देवी को बताना ज़रूरी नहीं समझा था, क्योंकि नींद की गोली का असर कितना भी हो, हिलाने पर नींद टूट ही जाती है, पर बेहोशी की दवा नींद की दवा से कई गुना ज़्यादा असरदार होती है।

बारिश और जंगल होने की वजह से इस समय तक वहाँ अँधेरा छा गया था, पर लाइट की कोई चिंता नहीं थी। अभी तो वहाँ मौजूद इमरजेंसी लाइट्स पूरी तरह से इस्तेमाल भी नहीं हुई थीं कि आचार्य जी ने कुछ और लाइट्स पहुँचा दी थीं।

आकाश ने खाना खाने के बाद अपने पावर बैंक से फोन चार्ज किया और फोन पर कुछ इधर-उधर के वीडियो देखने लगा।

आकाश भी पूरी तरह से नग्न था और जब से सुनीता को वह दवा पिलाई गई थी, तब से संगीता देवी को भी कोई वस्त्र पहनने नहीं दिया था। दोनों माँ-बेटे इस एकांत में बिल्कुल दो शरीर एक जान हो गए थे। आकाश अपनी माँ संगीता देवी के साथ उसी सिंगल बेड पर बैठा था।

“बेटा! अब कपड़े पहन लेते हैं, कहीं सुनीता उठ न जाए।” — संगीता देवी ने चिंता जताते हुए कहा।

“अरे माँ! चिंता मत करो, तूने ही तो आधा चम्मच और डाल दिया था। अब भूल जाओ, यह सुबह तक नहीं उठने वाली।” — इतना कहते हुए आकाश ने करवट लेकर लेटी हुई सुनीता के बाएँ नितंब को ज़ोर से पकड़कर हिलाना शुरू कर दिया।

संगीता देवी तो डर के मारे सहम गई थी कि अबकी बार तो सुनीता जाग ही जाएगी, क्योंकि उसे वह चाय पिए हुए 3 घंटे से ज़्यादा हो गए थे, क्योंकि इस समय घड़ी में साढ़े 6 बजे का समय था।

पर आकाश के तेज़ हिलाने पर भी सुनीता की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

“देखा माँ!” — आकाश ने हँसते हुए कहा।

“अच्छा माँ! कभी पोर्न मूवी देखी है? कभी दिखाई पिता जी ने?” — आकाश ने संगीता देवी के बगल में बैठे हुए कहा।

“कौन-सी मूवी! पो....र्न?” — संगीता देवी ने उत्सुकता से पूछा।

“यह होती है पोर्न मूवी, देख!” — इतना कहते हुए आकाश ने अपने फोन की गैलरी के फ़ोल्डर में से एक वीडियो चला दिया, जिसमें एक काला आदमी बड़ी नितंबों वाली महिला के साथ संभोग कर रहा था।

“श्श्श.... यह देखता है!” — संगीता देवी ने झूठी शर्म दिखाते हुए कहा।

“माँ! तू भी थोड़ी देर पहले मेरे साथ यही तो कर रही थी।” — आकाश ने संगीता देवी की जाँघ पर हाथ रखते हुए कहा।

“हे भगवान! कितना बड़ा है इस आदमी का। बेचारी देख, कैसे दर्द के मारे चिल्ला रही है।” — संगीता देवी जहाँ इस वीडियो की झूठी निंदा कर रही थी, वहीं इस वीडियो को पूरी उत्सुकता से देख भी रही थी।

“अरे मेरी भोली माँ! इसे चिल्लाना नहीं, मोनिंग कहते हैं। मज़ा ले रही है।” — आकाश का हाथ अब संगीता देवी की उससे सटी हुई जाँघ पर घूम रहा था।

“देख, अब यह इसके पीछे डालेगा, देख।” — आकाश

यह सब संगीता देवी पहली बार देख रही थी और उसकी उत्सुकता को देखकर आकाश भी चकित था।

“माँ! तेरे लिए तो ऐसे 2-3 आदमी भी कम पड़ जाएँगे।” — आकाश ने हँसते हुए कहा।

“हट! बदमाश कहीं का।” — संगीता देवी ने हँसते हुए आकाश से फोन छीन लिया और अपनी आँखों के नज़दीक करके वह वीडियो देखने लगी।

संगीता देवी यह वीडियो बड़े ही चाव और उत्सुकता से देख रही थी। वह देख रही थी कि जीवन के इस पहलू से तो वह आज तक अनजान ही रही थी।

“अच्छा ला माँ! कुछ और दिखाता हूँ!” — इतना कहकर आकाश ने संगीता देवी के हाथ से फोन छीन लिया और लॉक करके एक तरफ़ रख दिया।

“आकाश, अब देखने तो दे पूरा बेटा!” — संगीता देवी ने नाराज़ होते हुए कहा।

संगीता देवी को अब यह एहसास हो रहा था कि कामवासना में आकाश से संभोग करते समय वह क्या-क्या बोल गई थी। पर अब क्या किया जा सकता था, जो होना था वह हो चुका था।

आकाश ने उठकर अपने आप को ठीक किया और कुटिया (हट) से बाहर आ

संगीता देवी को अब यह एहसास हो रहा था कि कामवासना में आकाश से संभोग करते समय वह क्या-क्या बोल गई थी। पर अब क्या किया जा सकता था, जो होना था वह हो चुका था।

आकाश ने उठकर अपने आप को ठीक किया और कुटिया से बाहर आ गया। बारिश अब भी उतनी ही गति से हो रही थी और घड़ी शाम के 4 बजा रही थी। आकाश को तेज भूख लगी हुई थी
[23/06, 9:47 pm] khushi12210: संगीता देवी को अब यह एहसास हो रहा था कि कामवासना में आकाश से संभोग करते समय वह क्या-क्या बोल गई थी। पर अब क्या किया जा सकता था, जो होना था वह हो चुका था।

आकाश ने उठकर अपने आप को ठीक किया और कुटिया से बाहर आ गया। बारिश अब भी उतनी ही गति से हो रही थी और घड़ी शाम के 4 बजा रही थी। आकाश को तेज भूख लगी हुई थी और संगीता देवी के पेट में भी चूहे कूद रहे थे। खैर, संगीता देवी घर का कामकाज संभालने में माहिर औरत थी, तो उसने आचार्य जी द्वारा भेजी गई सामग्री से भोजन तैयार किया और दोनों माँ-बेटे ने शाम के लगभग 6 बजे भोजन ग्रहण किया। सुनीता का अभी जागना नामुमकिन था; वह तो बेचारी अब भी बेसुध होकर दवा के असर में सोई हुई थी।

आकाश को यह बात भली-भांति पता थी कि यह जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बनी दवा कोई नींद की दवा नहीं बल्कि एक प्रकार की आयुर्वेदिक बेहोशी (एनेस्थीसिया) की दवा का काम करती थी। पर उसने यह बात संगीता देवी को बताना ज़रूरी नहीं समझा था। क्योंकि नींद की गोली का असर कितना भी हो, हिलाने पर नींद टूट ही जाती है, पर बेहोशी की दवा नींद की दवा से कई गुना ज़्यादा असरदार होती है।

बारिश और जंगल होने की वजह से इस समय तक वहाँ अंधेरा छा गया था, पर लाइट की कोई चिंता नहीं थी। अभी तो वहाँ मौजूद इमरजेंसी लाइट्स पूरी तरह इस्तेमाल भी नहीं हुई थीं कि आचार्य जी ने कुछ और लाइट्स भिजवा दी थीं।

आकाश ने खाना खाने के बाद अपने पावर बैंक से फोन चार्ज किया और फोन पर कुछ इधर-उधर के वीडियो देखने लगा।

आकाश अब भी पूर्ण रूप से नग्न था और जब से सुनीता को वह दवा पिलाई गई थी तब से संगीता देवी को भी कोई वस्त्र पहनने नहीं दिया था। दोनों माँ-बेटे इस एकांत में बिलकुल दो शरीर एक जान हो गए थे। आकाश अपनी माँ संगीता देवी के साथ उसी सिंगल बेड पर बैठा था।

"बेटा! अब कपड़े पहन लेते हैं, कहीं सुनीता उठ न जाए" — संगीता देवी ने चिंता जताते हुए कहा।

"अरे! माँ! चिंता मत करो, तूने ही तो आधा चम्मच और डाल दिया। अब भूल जाओ, यह सुबह तक नहीं उठने वाली" — इतना कहते हुए आकाश ने करवट लेकर लेटी हुई सुनीता के बाएँ नितंब को ज़ोर से पकड़कर हिलाना शुरू कर दिया।

संगीता देवी तो डर के मारे सहम गई थी कि अबकी बार तो सुनीता जाग ही जाएगी क्योंकि उसे वह चाय पिए हुए 3 घंटे से ज़्यादा हो गए थे, क्योंकि इस समय घड़ी में साढ़े 6 बज रहे थे।

पर आकाश के तेज हिलाने पर भी सुनीता की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

"देखा माँ!" — आकाश ने हँसते हुए कहा।

"अच्छा माँ! कभी पोर्न मूवी देखी है? कभी दिखाई पिता जी ने?" — आकाश ने संगीता देवी के बगल में बैठे हुए कहा।

"कौन सी मूवी! पो.....र्न?" — संगीता देवी ने उत्सुकता से पूछा।

"यह होती है पोर्न मूवी, देख!" — इतना कहते हुए आकाश ने अपने फोन की गैलरी के फोल्डर में से एक वीडियो चला दिया, जिसमें एक काला आदमी, बड़ी गांड वाली महिला के साथ संभोग कर रहा था।

"श्श्श..... यह देखता है?" — संगीता देवी ने झूठी शर्म दिखाते हुए कहा।

"माँ! तू भी थोड़ी देर पहले डांडिया थोड़ा खेल रही थी मेरे साथ, यही तो कर रही थी" — आकाश ने संगीता देवी की जाँघ पर हाथ रखते हुए कहा।

"हे भगवान! कितना बड़ा है इस हफ़्शी का, बेचारी देख कैसे दर्द के मारे चिल्ला रही है" — संगीता देवी जहाँ इस वीडियो की झूठी निंदा कर रही थी, वहीं पर इस वीडियो को पूरी उत्सुकता से देख भी रही थी।

"अरे मेरी भोली माँ! इसे चिल्लाना नहीं, मोअनिंग कहते हैं। मज़ा ले रही है साली" — आकाश का हाथ अब संगीता देवी की उससे सटी हुई जाँघ पर घूम रहा था।

"देख अब यह इसके पीछे डालेगा, देख" — आकाश

यह सब संगीता देवी पहली बार देख रही थी और उसकी उत्सुकता को देखकर आकाश भी चकित था।

"माँ! तेरे लिए तो ऐसे 2-3 हफ़्शी भी कम पड़ जाएँगे" — आकाश ने हँसते हुए कहा।

"हट! बदमाश कहीं का" — संगीता देवी ने हँसते हुए आकाश से फोन छीन लिया और अपनी आँखों के नज़दीक करके वह वीडियो देखने लगी।

संगीता देवी यह वीडियो बड़े ही चाव और उत्सुकता से देख रही थी। वह देख रही थी कि जीवन के इस पहलू से तो वह आज तक अनजान ही रही थी।

"अच्छा ला माँ! कुछ और दिखाता हूँ!" — इतना कहकर आकाश ने संगीता देवी के हाथ से फोन छीन लिया और लॉक करके एक तरफ रख दिया।

"आकाश, अब देखने तो दे पूरा बेटा!" — संगीता देवी ने नाराज़ होते हुए कहा।

आकाश को हैरानी हो रही थी कि क्या वह वही संस्कारी, पतिव्रता और धार्मिक नारी थी या कोई और। क्योंकि अगर किसी चीज़ को पहली बार देखा, सुना या महसूस किया जाए तो वह अनुभव कुछ ख़ास ही होता है।

"माँ! दिखा तो दूँ, पर हर एक चीज़ की एक कीमत होती है। बोल, दे पाएगी कीमत?" — आकाश ने नटखट स्वर में पूछा।

"बेटा! अब सब कुछ तो तुझे दे दिया, सब कुछ तेरे लिए दाँव पर लगा दिया और क्या कीमत चाहिए अब?" — संगीता देवी ने आकाश को जवाब देते हुए कहा।

"अभी भी काफ़ी कुछ बचा हुआ है माँ, बोलो लगाओगी दाँव पर? देख लो, यह वीडियो तो एक था, ऐसे ढेरों वीडियो देखने को मिलेंगे" — आकाश ने संगीता देवी से पूछा।

"अच्छा फिर मेरी भी एक शर्त है। पहले वह वीडियो पूरा देखने दो, तब मैं अपना फैसला सुनाऊँगी" — संगीता देवी ने खुलकर बात करते हुए कहा।

"ठीक है माँ, तू भी क्या याद रखेगी, ले देख" — इतना कहते हुए आकाश ने वह वीडियो फिर से संगीता देवी को लगा कर दे दिया।

इस समय संगीता देवी वह वीडियो देख रही थी जिसमें वह काला हफ़्शी बहुत ही बुरे तरीके से उस औरत के साथ संभोग कर रहा था और उधर आकाश संगीता देवी के पाँव से लेकर जाँघों तक के हिस्से को कामुक होकर सहला रहा था।

कुछ 10 मिनट चले उस वीडियो में उस काले हफ़्शी ने पूरा दबाकर उस औरत को पेला था और संगीता देवी को यह देखकर अजीब आनंद और सुख मिला था और इसके साथ ही वह यह भी समझ गई थी कि ऐसी हरकतें आकाश ने कहाँ से सीखी थीं।

इस समय तक संगीता देवी एक बार फिर से कामातुर हो चुकी थी, वह वीडियो ही कुछ ऐसा था और आकाश के हाथों का कमाल भी तो इसके साथ जुड़ गया था।

आकाश ने फिर से एक बार फोन संगीता देवी से छीनकर एक तरफ रख दिया।

"बोलो! माँ क्या फैसला किया?" — आकाश ने फिर से नटखट कामुक स्वर में पूछा।

"अच्छा! बोल क्या कीमत चाहिए तुझे" — संगीता देवी

"माँ, मैं तुम्हें सुनीता के बिस्तर में उसकी बगल में लिटाकर संभोग करना चाहता हूँ" — आकाश ने यह कहते हुए संगीता देवी को बेड से हाथ पकड़कर जबरदस्ती सुनीता की बगल में लिटा दिया।

"आकाश! यहाँ नहीं बेटा! सुनीता जाग जाएगी" — संगीता देवी ने तर्क देते हुए कहा, जो उसे भी पता था कि निरर्थक था क्योंकि अभी आकाश ने सुनीता को अच्छे से हिलाकर संगीता देवी को विश्वास दिलवाया था कि सुनीता अब भी बेसुध थी।

अब स्थिति ऐसी थी कि सुनीता करवट लेकर जिस तरफ मुँह किए सो रही थी, उसी तरफ आकाश ने संगीता देवी को सीधा पीठ के बल लिटा दिया था और हाथ-पैर मारती हुई संगीता देवी के ऊपर आकाश लेटा हुआ था।

सुनीता का मुँह संगीता देवी के मुँह के बिल्कुल सामने था। सुनीता ने संगीता देवी की तरफ करवट ली हुई थी और संगीता देवी सीधी नग्न अवस्था में अपनी बेटी से लगभग सटी हुई पड़ी थी।

आकाश ने संगीता देवी की एक न सुनते हुए एक बार फिर से उसकी कमजोरी यानी उसकी योनि को नीचे होकर मुँह में भर लिया था, क्योंकि आकाश एक मँझा हुआ शिकारी था जिसे पता था कि इस घरेलू घोड़ी को कैसे-कैसे लगाम डालनी थी। आकाश ने इतनी कुशलता से अपनी जीभ संगीता देवी की योनि में चलाई कि वह कुछ मिनटों में बिलकुल शांत होकर सुनीता की बगल में लेटी फिर से आहें और सिसकियाँ भरने लगी।

आकाश ने तकरीबन 10 से 15 मिनट में संगीता देवी की योनि को चूस-चूस कर पूर्ण रूप से मदहोश कर दिया था।

आकाश ने अब सीधी लेटी संगीता देवी की दोनों टाँगों को फैलाया और एक बार फिर से उसकी गहरी योनि में अपना लंड उतार दिया।

"आह्ह.... बेटा! मर्र.... गई... धीरे... आह्ह्ह" — संगीता देवी मानो आकाश का लंड लेकर पागल सी हो उठी थी।

आकाश अब संगीता देवी के ठीक ऊपर लेटा, उसकी दोनों टाँगों को फैलाए, उनके बीच अपनी कमर हिला-हिलाकर बड़ी ही कुशलता से धक्के लगा रहा था। और साथ में पड़ी सुनीता इतनी पास लेटी हुई थी कि उसकी साँसें संगीता देवी और आकाश के मुँह तक महसूस हो रही थीं।

आकाश का हर एक धक्का संगीता देवी को और ज़्यादा कामातुर कर रहा था।

"माँ! अपनी लाडली की तरफ देखो, कैसे आराम से सो रही है" — इतना कहकर आकाश ने संगीता देवी के दोनों गालों को अपनी हथेली में लेकर सुनीता की तरफ संगीता देवी का चेहरा कर दिया।

"देखो माँ! कितनी शांति से सो रही है" — आकाश ने यह कहते हुए अपने दाएँ हाथ के अंगूठे से सुनीता के होंठों को मसल दिया और ज़ोर से एक धक्का मारा।

"नहीं! बेटा! इसे शांति से सोने दो.. वरन…आ…. " — संगीता देवी आगे भी कुछ बोलना चाहती थी पर आकाश ने अपने धक्कों की गति और बढ़ा दी थी।

कुछ पाँच मिनट तक यही प्रक्रिया दोहराने के बाद जब आकाश को पक्का हो गया कि संगीता देवी अब पूरे रूप से कामातुर थी, तो उसने अपने धक्कों की गति को धीमा कर दिया और अपनी आगे की रणनीति पर काम करने के लिए तैयार हो गया।

"माँ! एक बार चूम लूँ इस घोड़ी को" — आकाश ने ज़ोरदार धक्का मारते हुए कहा।

"नहीं बेटा! यह अनर्थ मत कर" — संगीता देवी इस कामवासना की चरम सीमा में भी सुनीता को बचाना चाहती थी। अभी भी उसके अंदर की माँ अपनी बेटी के बचाव के लिए लड़ रही थी।

"ठीक है फिर, रंडी तू चूम इसे साली रखैल" — इतना कहते हुए आकाश ने एक ज़ोरदार झटका देते हुए संगीता देवी के होंठों को सुनीता के होंठों से जोड़ दिया।

"पहले तो संगीता देवी ने थोड़ा विरोध किया पर आकाश के ज़बरदस्ती और ज़ोर लगाने पर किसी आश्चर्यजनक ढंग से संगीता देवी ने सारा विरोध छोड़कर सुनीता के कोमल रसीले होंठों को चूमना शुरू कर दिया।

क्योंकि आकाश ने जानबूझकर इतनी देर तक उसकी योनि को चूसा और चाटा था पर इस दौरान एक बार भी उसके होंठों को नहीं चूमा था और संगीता देवी अपनी योनि में लगी आग को शांत करने के लिए किसी को चूमना और सच मानो तो काटना चाहती थी।

"यह हुई न बात साली रांड, चूस इसके रसीले होंठ" — आकाश ने रुक-रुक कर एक के बाद एक ज़ोरदार धक्के लगाते हुए कहा।

"इसी गर्भ से निकली है न यह छोटी घोड़ी माँ!"

"इसी योनि में रही है न यह रंडी 9 महीने, बोल रांड!" — आकाश के शब्दों ने मानो संगीता देवी पर जादू कर दिया था और वह पागलों की तरह सुनीता के होंठों को चूस रही थी। आखिरकार इसमें हरजा ही क्या था, वह उसका अपना ही खून थी।

जिस दौरान संगीता देवी सुनीता के होंठों को बेसुध होकर चूस रही थी, आकाश एक हाथ से सुनीता की लेगिंग को घुटनों से नीचे उतार चुका था। अब स्थिति यह थी कि सुनीता कमर से नीचे बिल्कुल नग्न थी।

"माँ! अगर तू मुझसे प्यार करती है! तो मुझे आज यह अनुमति दे कि मैं इस कली को फूल बना दूँ" — आकाश ने एक ज़ोरदार धक्का देते हुए कहा।

"नहीं बेटा! यह अनर्थ मत कर! आह्ह्ह! बेटा! यह गल…त है.. आह्ह!" — संगीता देवी की आँखों में कामवासना के साथ-साथ आँसू भी थे और उसका शरीर तो इतना कामातुर हो गया था कि वह सिसकियाँ ले रही थी।

“माँ! आगे नहीं तो कम से कम पीछे करने की तो अनुमति दे दो" — संगीता देवी कामातुर होकर इतनी बेबस थी कि इस बार उसने कोई उत्तर नहीं दिया, आँखें झुकाकर बंद कर ली थीं, जिसका मतलब साफ था कि इस घड़ी में वह हथियार डाल चुकी थी और सब कुछ भाग्य और आकाश के हाथ में छोड़ चुकी थी।

यही बात का इंतज़ार तो आकाश कर रहा था। आकाश ने लपक कर शेल्फ से वह तेल की कटोरी उठाई और पुनः सुनीता की बगल में आकर बैठ गया।

“माँ! अब इसके कुर्ते और ब्लाउज़ का क्या काम" — इतना कहकर आकाश ने सुनीता के सारे वस्त्र निकाल उसे नग्न कर दिया।

संगीता देवी पास लेटी यह सब लाचारी से देख रही थी।
Woww ab sunita ki gaand mari jayegi.
 

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Disclaimer

Dosto mein kuch ek saal se likh nahi raha tha kyunki kuch log is kahani ko interfaith bata rahey they aur chahtey they main isse likhna band kr du, yeh kahani kewal kalpnao ka sangreh hai. Aaj ke internet ke daur mein jo bhi chal raha hai aur issi ke sath sath aam pariwarik mahaul mein jo jajwaat lakho karodo logo ke dillon dimaag mein dabbey reh jaatey hai yeh upnayas unhi jajwaato ko kalpnik jubaan deta hai. Kisi dharm jaati vishesh se is upnayas ka koi lena dena nahi yeh kewal ek kalpanik upnayas hai. 18 warsh ki aayu se kam waykti iss upnayas se door rahey.


Dhanyawaad
Bhai mene 2024 end se bola ki tum isko pls pura Krna kyuki tumne bahut sari real hidden cheezon ko discuss Kiya h and ye ek story se jyda vastav me ek kamuk aur erotic novel h, thodi dark bhi pr usi se isme maja h... Plz start this story again full throttle and aag lga do
 
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Bhai mene 2024 end se bola ki tum isko pls pura Krna kyuki tumne bahut sari real hidden cheezon ko discuss Kiya h and ye ek story se jyda vastav me ek kamuk aur erotic novel h, thodi dark bhi pr usi se isme maja h... Plz start this story again full throttle and aag lga do
Bilkul sahi kaha ap. Ye novel sref decentpoet sey hote hey others koi bhi isi tara ni likh satte. Mein bhi usko jane ke baad sey waiting. Itni saal bad aye to mein umeed rakhungi more from decentpoet
 
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