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Kon sa language me likhu batao aap sab jispar 5 vote aa jayega uspar likhunga

  • Hindi

    Votes: 22 37.3%
  • Hinglish

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  • Khanai pasand aa raha hai ki nahi

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Abhishek Kumar98

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♣️ Update 9 ♣️

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उस दिन वह हार गई जब सिमर ने उसे बेड पर लंबा किया, हल्की सी टेढ़ी करके उसकी एक टांग उठाकर कंधे पर रख ली, दूसरी टांग नीचे ही थी और उसके पैरों पर बैठकर लंड उसकी चूत में पूरी तरह घुसेड़ दिया।

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कितने सालों से चूत मरवा रही थी, पर आज जैसा कभी नहीं हुआ था। कुलवंत हँसते हुए सिमर के गाल पर हल्का-सा थप्पड़ मारकर बोली,
"कंजर कहीं का, ये क्या कर रहा है? सीधे-सीधे नहीं कर सकता क्या? ये नए-नए तरीके कहाँ से सीखता रहता है तू?"
सिमर हँसते हुए बोला,
"हाहा, तू मजे ले मेरी सरदारनी, मेरे रॉकेट के!"
कुलवंत ने उसके माथे से अपनी पैंटी से पसीना पोंछते हुए कहा,
"मारजाने कुत्ते, देख कैसे लगा रहा है... अह्ह्ह... आवीईई..."
जैसे ही सिमर ने पूरा लंड बाहर खींचकर जोरदार धक्का मारा, कुलवंत उछल पड़ी।
"हाय... बस कर अब, कोई और ढंग से कर, मेरी गांड दुखने लगी ऐसे..."
सिमर बोला,
"चल फिर, घोड़ी बन जा।"
और अपना लंड बाहर निकाल लिया।
कुलवंत थक चुकी थी, फिर भी फटाफट घोड़ी बन गई। उसने हथेली पर थूककर अपनी चूत पर मालिश कर ली। सिमर ने भी अपने लंड पर थूक लगाकर चिकना किया और माँ की कमर पकड़कर एक झटके में पूरा अंदर डाल दिया।
कुलवंत को पता था कि सिमर का काम इतनी जल्दी खत्म नहीं होता, पर वो उसकी माँ थी—बेटे की हर कमजोरी उसे मालूम थी। उसने पीछे हाथ करके अपने चूतड़ खोल दिए और बेटे को और जोश दिलाने लगी। सिमर भी तब पूरी तरह जोश में आ जाता था, जब माँ खुद ऐसे साथ देती थी।
वो ऐसे ही जोर-जोर से पेल रहा था कि अचानक दरवाजा झटके से खुल गया। सामने सज्जन सिंह—उसके पिता—खड़े थे। भले ही पिता को सब पता था, पर कभी अपनी पत्नी पर बेटे को चढ़े देखा नहीं था। सिमर थोड़ा धीमा पड़ गया।
कुलवंत, जो बिस्तर पर घोड़ी बनी तकिए में मुँह छुपाए पड़ी थी, बेटे के धीमे होने को महसूस कर ऊपर देखने लगी। सामने पति खड़े थे।
उसे जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा। वो पीछे मुड़कर बेटे से बोली,
"क्या हुआ तुझे? लगा रह ना, डरता क्यों है? वैसे ही मार जैसे पहले मार रहा था।"
फिर पति की तरफ प्यार से देखकर बोली,
"की गल हो गई जी? इतने जरूरी काम पर गए थे कि अंदर आना पड़ गया? आवाज़ तो बाहर से सुन ही ली होगी कि हम लगे हुए हैं... हायyyy... अह्ह... अह्ह... सीईई... उफ्फ..."
सज्जन सिंह बोले,
"मुझे पता था तुम दोनों जुगाड़ लगा रहे हो। पर तू जल्दी ऐसे पानी निकलवा ले, बाहर हैप्पी और उसकी घरवाली दोनों डिब्बा लेकर आए हैं।"
सज्जन सिंह भी उत्तेजित हो गए थे। बेटा अपनी पत्नी को नंगा करके ऐसे पेल रहा था—ऐसा दृश्य उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। कुलवंत का शरीर उनसे ज्यादा था, पर सिमर का मोटा-तगड़ा लंड अपनी पत्नी की चूत में अंदर-बाहर हो रहा था—वैसा उन्होंने कभी नहीं किया। उनका तो जल्दी ही निकल जाता था।
कुलवंत बोली,
"वे अभी-अभी आए हैं। तुम यहीं रुक जाओ 2-4 मिनट, नहीं तो पूछने लगेंगे कि मैं कहाँ हूँ। अह्ह... बेटा, जल्दी कर..."
सिमर को पिता के सामने माँ को गालियाँ देते सुनकर और जोश चढ़ गया। उसका लंड और फूल गया। अगले दो मिनट में ही उसने पिता के सामने माँ को चोदकर सारा पानी उसकी चूत में उड़ेल दिया। कुलवंत का भी उसी पल पानी निकल आया। सिमर बिस्तर पर साइड में गिर पड़ा, कुलवंत भी उसके साथ।
पर सज्जन सिंह अभी खाली थे। उन्होंने बिना देर किए नीचे गिरी पत्नी की पैंटी उठाई, उसके पैरों में डाली और हाथ पकड़कर उसे खड़ा कर दिया। कुलवंत ने भी जल्दी से बाकी कपड़े पहन लिए। शुक्र था कि वो आजकल टाइट पैंटी पहनती थी—गाँव की औरतों जैसी ढीली कच्छी नहीं। टाइट पैंटी ने बेटे का सारा माल अंदर ही समेट लिया।
सज्जन सिंह उसकी हालत देखकर हँस पड़े। कुलवंत ने बाल ठीक किए और बाहर निकल आई।
"माफ करना, मेरा सिरदर्द हो रहा था। गोली खाकर सो गई थी।"
हैप्पी बोला,
"कोई गल नहीं चाची, आ जा बैठ।"
कुलवंत:
"नहीं, मैं चाय बना देती हूँ। तुम बैठो।"
हैप्पी की घरवाली बोली,
"नहीं चाची, हम लेट हो जाएँगे। चाय रहने दो।"
पर कुलवंत फिर भी कोक लेकर आई।
हैप्पी बोला,
"चाची, हम दिलप्रीत के शादी का कार्ड और डिब्बा देने आए थे। मम्मी-डैडी भी बाहर गए हुए हैं, इसी चक्कर में।"
कुलवंत:
"मुबारक हो, बहुत खुशी की बात है। क्या करता है लड़का? बाहर है या यहीं जॉब करता है?"
हैप्पी की घरवाली:
"चाची, वो मेरी मौसी का लड़का है। पुलिस में लगा हुआ है। उसे हमारी दिलप्रीत बहुत पसंद आई थी। मेरे साथ लड़कर रिश्ता माँगा।"
कुलवंत हँसते हुए बोली,
"बहुत बढ़िया बात है।" फिर हैप्पी को चिढ़ाते हुए,
"अब आएगा बेटा तू, काबू मेरी नूहँ से। तेरी बहन सादी मंजीत के भाई के पास, उसकी बहन तेरे पास। अब बारी बराबर हो गई।"
मंजीत जोर से हँसी,
"हीहीही... हाँ चाची, बिल्कुल सही कहा तुमने।"
काफी देर गपशप चलती रही। कुलवंत थोड़ी अंदर से परेशान भी थी कि सिमर कैसे रिएक्ट करेगा। कुछ देर बाद मंजीत और हैप्पी चले गए।
शाम को तीनों चाय पी रहे थे। सज्जन सिंह चाय पीकर खेतों में चले गए थे। इतने में कोमल अपने छोटे भाई को मिठाई देती हुई बोली,
"ये ले मुबारक, तेरी जान-ए-मान दिलप्रीत की शादी पक्की हो गई।"
सिमर थोड़ा हैरान होकर कोमल की तरफ देखता है, फिर चुपचाप चाय पीने लगा।
कोमल:
"कुछ बोलेगा नहीं? सदमा लग गया क्या?"
सिमर:
"अरे दीदी, तू भी हद करती है। तुझे मम्मी को, डैडी को, हैप्पी को और उसकी बीवी मंजीत को भी पता है कि दिलप्रीत का पहला कांड मैंने किया था। तो टेंशन किस बात की? मैं तो शादी करवाना ही चाहता था उसके साथ।"
कोमल:
"वाह, मेरा भाई इतना समझदार हो गया। मम्मी तो डर रही थीं कि कहीं तू देवदास न बन जाए।"
सिमर:
"चल, तू अंदर जा, अपना काम निपटा ले।"
कोमल के जाने के बाद सिमर कुलवंत के पास गया।
"मैं ठीक हूँ मम्मी, कोई चक्कर नहीं। थोड़ी सी सोच में था बस।"
कुलवंत:
"पक्की बात है ना?"
सिमर:
"हाँ जी, 100% पक्की। शादी में तो मजा आएगा। आखिर जिस टाइम का इंतजार था, वो भी आ गया। हैप्पी की बड़ी बहन भी तो आएगी अब अपनी फैमिली के साथ।"
कुलवंत:
"हाँ, सही कहा तूने। उस दिन धक्के से मेरे पर चढ़ा था, अब उसे भी पता लगना चाहिए कि उसकी लड़की अंदर चुद रही है।"
सिमर:
"तुम परवाह मत करो। जो आई थी डिब्बा देने, वो भी तो लगभग मान चुकी है। उसे पता है कि हैप्पी ने दिलप्रीत को मेरे से चुदवाया था।"
फिर सिमर ने पूरी बात बताई कि मंजीत तो उसके काबू में आनी ही थी। वो हमेशा हैप्पी की बात मानती थी। घर में लाड़ली, शरीफ और सिंपल लड़की। जहाँ परिवार ने कभी हाथ नहीं लगाया, वहाँ हैप्पी किसी न किसी बात पर थप्पड़ मार देता था। अब मौका आया तो वो पूरा फायदा उठाना चाहती थी।
कुछ दिन पहले जब उसने दिलप्रीत को मोटर पर बुलाया था, उसकी चूत तो पहले ही ढीली कर चुका था। दोपहरभर दिलप्रीत की टाइट गांड का मजा लिया। तीन बार गांड मारने के बाद दोनों बेहाल हो गए। कपड़े पहनकर बाहर आए तो मंजीत पक्की जगह पर बैठी थी।
दिलप्रीत बोल पड़ी,
"भाभी को मैंने ही बुलाया था। तू मेरी चल बिगाड़ देनी थी, सबको पता लग जाना था गाँव में।"
मंजीत:
"अब तेरे पर कोई शक भी नहीं रहा सिमर। ऐसी चीखें सुनकर ही पता चलता है कि तुझमें पूरा दम है।"
सिमर हँसते हुए:
"भाभी जी, बाकी शक हो तो हैप्पी पाजी से पूछ लो। उन्हें ज्यादा पता है तुम्हारे से। उस दिन देखकर ही गए थे जब मैं उनकी बहन पर पहली बार चढ़ा था।"
मंजीत ने आगे बढ़कर उसका लंड पकड़ लिया और कान में फुसफुसाई,
"बस यही जिगरा रखी लड़कियों की, तो मैं लाइन लगा दूँ।"
इतना कहकर वो दिलप्रीत को स्कूटी पर बिठाकर चली गई।
कुलवंत सारी बात सुनकर बहुत खुश हो गई। बिना बताए ही सिमर ने इतना बड़ा काम कर दिया था। वो भावुक होकर सिमर को गले लगा लिया।

दिलप्रीत की शादी से पहले ही, जैसा सिमर को पता था, हैप्पी की बड़ी बहन जसप्रीत कौर अपनी पूरी फैमिली के साथ आ पहुँची थी। उसके सिर्फ दो बच्चे थे—बड़ी बेटी तनवीर कौर, 25 साल की, और बेटा उससे चार साल छोटा, जो अभी कॉलेज जाता था। जसप्रीत कौर अपने जमाने में सिरे की माल मानी जाती थी। लंबी कद-काठी वाली, शादी से पहले सूखी-पतली थी, लेकिन दो बच्चों के बाद पूरी तरह भर गई थी। उसकी सील उसके पति ने ही पहली रात तोड़ी थी और उसकी चीखें पूरे घर ने सुनी थीं।
गाँव के स्कूल से सिर्फ 10वीं तक पढ़ी थी, उसके बाद घर संभालने में लग गई। पति मिला ऐसा, जिसे हर वक्त चूत चाहिए होती थी। शादी के कुछ दिनों बाद ही उसका टाइम शुरू हो गया। जब भी टाइम आता, पति उसे नंगा कर लेता। दोपहर में रोटी खाने के बाद दो बार, रात में दो-तीन बार—जसप्रीत की चूत में पानी पड़ ही जाता। हैप्पी आज भी अपनी बड़ी बहन और माँ की उन बातों को याद करके मुठ मारता रहता है। एक बार जब जसप्रीत पहली बार दिवाली पर पीके आई थी, तब हैप्पी ने माँ और बहन की बातें सुनी थीं—
जसप्रीत: "मम्मी, कुछ हल दस ना... तूने तो मुझे फँसा दिया।"
मम्मी: "क्यों, क्या हुआ? अच्छा-भला परिवार है, सास-ससुर भी ठीक हैं। क्या गल हुई?"
जसप्रीत: "इतने दिन हो गए शादी को, ये तो हटते ही नहीं। जब देखो कपड़े उतारवा लेता है। न दिन देखता, न रात। दिन में भी वही, रात में भी वही।"
माँ हँस पड़ी, माथे पर हाथ मारते हुए: "हट कमली, किस थाँ की तू? डरा ही दिया था मुझे। मैं सोच रही थी पता नहीं क्या हो गया।"
जसप्रीत खीजकर: "क्या मम्मी, तुम ऐसे बोल रही हो जैसे ये नॉर्मल हो।"
माँ ने उसे पास बिठाकर समझाया: "पुत्त, ये सब नॉर्मल है। हर औरत को नंगी होना पड़ता है जब घरवाला कहे। सुख नाल तेरी शादी हुई है, अभी ताज़ा-ताज़ा है, मजे कर तू भी। और सुन, अब तो तेरा विवाह हो गया, मैं तेरी सहेली भी बन गई। तेरा बापू तो आज भी हर हफ्ते मुझे 5-7 बार नंगा कर लेता है।"
जसप्रीत हैरान होकर मुँह पर हाथ रख: "हाय मम्मी, सच्ची?"
समय बीता, जसप्रीत में सेक्स की भूख बढ़ती गई, लेकिन पति एक ही चूत से बोर हो गया। अब हफ्ते में सिर्फ 1-2 बार टाँगें उठाता। जसप्रीत तेज-तर्रार थी—इतने सालों में किसी को पता नहीं चला कि वो देवर के नीचे लंबी पड़ती है। देवर-भाभी मौका पाकर पूरा मजा लेते।
इसी बीच सिमर अपनी मोटर पर बैठा था। काफी दिन हो गए थे दिलप्रीत से मिले नहीं, तो उसने फोन किया।
दिलप्रीत ने जल्दी उठाया: "हाँ जी, आज किस सूरज के चढ़ने से याद आई?"
सिमर: "सॉरी मेरी जान, थोड़ा बिजी था। आ जा, आ सकती है? मैं मोटर पर बैठा हूँ।"
दिलप्रीत: "तुझे पता है अब घर से नहीं निकलना। पहले जैसा नहीं। मेरा विवाह पक्का हो गया।"
सिमर: "हम्म, पता है। थानेदारनी बनने वाली है तू।"
दिलप्रीत: "हाँ जी, मौका मिलेगा तो दस देऊँगी। तू आ जाना। हाँ, ज्यादा दिल करे पिया तो भाभी को फोन कर ले। शायद वो मान जाए।"
सिमर: "इतनी फिकर मेरी? तुझे बुरा नहीं लगता? जलन नहीं होती?"
दिलप्रीत: "जलन क्यों होगी? मेरा विवाह होने वाला है। मैं तो चली जाऊँगी। कभी-कभी मिलना होगा। भाभी मेरी तो तेरे पास रहेंगी।"
सिमर ने फिर मंजीत को फोन किया। नॉर्मल हेलो-हाय के बाद सीधे मुद्दे पर:
"भाभी, किधर हो? मुझे तो भूल ही गईं।"
मंजीत: "भूली नहीं तेरी। पता है विवाह की तैयारियाँ चल रही हैं, बिजी हो गई।"
सिमर: "आ जा ना। आज बड़ा दिल कर रहा पिया। दिलप्रीत भी नहीं आ रही। तू कोई बहाना मार के आ जा।"
मंजीत: "तू जरूर कोई पंगा पवा देगा।"
सिमर: "डरती क्यों? आ जा। कहना घरवालों को, वो छोड़ आएँ।"
मंजीत: "हाय मेरा शेर... तेरी ऐसी गल्ल मेरी जान काढ़ लेती है। चल, वेट कर, मैं आई।"
मंजीत ने हाँ तो कर दी, लेकिन घर से निकलना आसान नहीं था। उसने दिमाग लगाया और बड़ी ननद जसप्रीत को बुलाया। दोनों में अच्छी बनती थी, हर बात शेयर करती थीं। मंजीत ने जसप्रीत को सिमर के बारे में A से Z तक बता रखा था—कैसे हैप्पी और उसके घरवालों ने जबरदस्ती कुलवंत के साथ किया, और सिमर ने दिलप्रीत को हैप्पी के सामने चोदा।
मंजीत: "दीदी, एक छोटा-सा काम प्लीज।"
जसप्रीत: "हाँ, क्या काम?"
मंजीत: "सिमर का फोन आया। पीछे पिया हुआ मोटर पर बुला रहा है। इन दिनों बिजी था, एक बार भी नहीं गया उसके पास।"
जसप्रीत: "हम्म, ठीक है। चल, अभी चलते हैं।"
जसप्रीत को भी गुस्सा था कि उसके घरवाले ने किसी औरत के साथ जबरदस्ती की। वो भी मजा चखना चाहती थी। नया लंड किसे बुरा लगता? सोचते ही उसकी चूत गीली होने लगी।
दोनों ने मुँह-हाथ धोया, सबको बताया कि शाम तक आ जाएँगी, और एक्टिवा पर सिमर की मोटर वाली चल पड़ीं। जसप्रीत साथ थी तो किसी ने नहीं पूछा कहाँ जा रही हैं।
10 मिनट में दोनों पहुँच गईं। सिमर एक पल चक्कर में पड़ गया—जसप्रीत साथ क्यों? फिर सोचा, जो आई है, करने आई है। दोनों को अंदर ले आया और मेन गेट बंद कर दिया।
अंदर आते ही जसप्रीत: "वैसे तेरी मोटर बड़ी टिकाऊ है। कोई आया-गया पता नहीं लगता।"
सिमर: "हाँ जी, ये गल्ल तो है। आओ बैठो। पता नहीं था तुम आओगी, तो चाय-ठंडा ले आता।"
जसप्रीत: "चल कोई नहीं, चाय बाद में पी लेंगे। जो काम के लिए बुलाया, वो निपटा ले। इसे अंदर ले जा, मैं बाहर बैठती हूँ।"
सिमर हँसते हुए: "बाहर क्यों? तुम भी आ जाओ अंदर।"
जसप्रीत: "अच्छा बच्चे, मेरे साथ मस्ती? पहले इसे संभाल, फिर देखती हूँ।"
दोनों अंदर चले गए।
सिमर: "इसे क्यों साथ ले आईं भाभी?"
मंजीत सलवार का नाड़ा खोलते हुए: "कोई गल्ल नहीं, डरता क्यों? ये मेरी पक्की सहेली है। सब पता है। और इसे काबू कर ले तो तेरा फायदा। चल चढ़, अपना जलवा दिखा।"
सिमर ने मंजीत का कमीज़ उतार दिया। अब सिर्फ ब्लैक ब्रा-पैंटी में थी। ब्रा खोलते ही मम्मे ऐसे आजाद हुए जैसे पिंजरे से कबूतर निकल आए। गोरी नहीं, साँवली थी मंजीत, पर शरीर किसी से कम नहीं। सिमर ने मम्मे चूसे, मसले। मंजीत ने सिमर की पैंट खोली। दोनों खड़े-खड़े कपड़े उतार दिए।
मंजीत सिमर के लंड की मोटाई-लंबाई देख हैरान। हैप्पी का ठीक था, पर सिमर उससे कहीं आगे। पहली बार बेगाने के साथ जकड़ी, लंड हाथ में लेकर मजे ले रही थी।
सिमर ने मंजीत को कुर्सी पर बिठाकर चूत चाटना शुरू किया। मंजीत से बर्दाश्त नहीं हो रहा—सिर पकड़कर पट्ट में दबाती। इतना मजा पहले कभी नहीं आया।
काफी देर चूत चटवाने के बाद सिमर ने लंड मुँह में डाला। मंजीत बड़े प्यार से चूसने लगी।
"हाय मेरे रब्बा, किन्ना मोटा लंड है तेरा!"
सिमर: "चलो, प्यार तो करो जितना पसंद आया।"
मंजीत ने टोपे पर किस की, कुल्फी जैसी चूसी, टट्टियों को सहलाया। सिमर कंट्रोल खोकर दीवार से सटाकर मुँह में पूरा धक्का दे दिया। मंजीत खाँसी, पर रुकी नहीं।
10 मिनट चूसवाने के बाद सिमर ने उसे दीवार से झुकाया, टाँगें चौड़ी कीं। मंजीत ने थूक लगाकर चूत गीली की। अगले ही पल लंड अंदर। फड़-फड़ कर रहा था। मंजीत गहरी साँसें ले रही थी। दर्द और मजा मिलकर चीखें निकल रही थीं।
बाहर जसप्रीत चीखें सुन खुश थी। सिमर का शरीर देख उसकी चूत भी लीक हो रही थी।
15 मिनट बाद सिमर कुर्सी पर बैठा, मंजीत गोदी में। अब पूरा लंड अंदर। मंजीत ऊपर-नीचे होकर मजा ले रही थी। अचानक फोन की बेल। हैप्पी का फोन।
मंजीत ने उठाया, लंड पर बैठी ही। हैप्पी पूछ रहा था दोनों किधर हैं।
मंजीत ने शरारत में सिमर का हाथ अपनी गांड पर रखा, थप्पड़ मारने का इशारा किया। सिमर ने जोरदार थप्पड़ मारा। आवाज़ बाहर तक गई।
मंजीत: "उएएई... अह्ह... सॉरी जी, सुई चुभ गई।"
हैप्पी समझ गया। बोला: "पागल नहीं मैं। किसके साथ गुल खिला रही है? दीदी किधर है? शर्म कर ले। बदनामी मत करवा।"
मंजीत: "हेहे... सिमर का लंड पर बैठी हूँ। हाय... फाड़ के रख दिया। इतना मोटा... चूत में खिंच पै रही है। पता नहीं तुम्हारी बहन कैसे लेती थी।"
हैप्पी का दिमाग सुन्न। पहली बार घरवाली बेगाने से चुद रही थी और वो सुन रहा था।
मंजीत: "तुम्हारा तो 5 मिनट में निकल जाता। ये 25 मिनट हो गए, मेरी चूत तीन बार चढ़ चुकी।"
हैप्पी ने फोन काट दिया।
मंजीत: "कोई और ढंग लगा। और नहीं टिक पा रही तेरे लंड पर।"
सिमर: "घोड़ी बन जा।"
लंड बाहर निकाला तो मंजीत की चूत खुली पड़ी थी। सिमर ने 10 मिनट घोड़ी बनाकर ठोका। मंजीत रोने लगी: "हाय... दीदी बचा लो... मार दिया... पेट दुख रहा... फट गई..."
सिमर आखिरी स्टेज पर—पानी गांड पर डाल दिया। मंजीत ढेर हो गई।
सिमर: "मजा आया भाभी?"
मंजीत: "कुतिया जान काढ़ दी... देख कितनी लाल हो गई गांड।"
सिमर बाहर गया। जसप्रीत बोली: "मन गए तुझे। विवाही रंडी की चीखें कढ़वा दीं।"
सिमर: "फिर कभी मौका देओगी?"
जसप्रीत: "अच्छा पुत्त... मेरी कुड़ी भी फँसा ली और मेरे साथ गत्ती?"
सिमर: "कैसे पता?"
जसप्रीत: "काफी टाइम से पता। तनवीर ने खुद बताया।"
सिमर ने पानी की बोतल दी: "भाभी को दे दो।"
जसप्रीत अंदर गई तो मंजीत टाँगें फैलाए लंबी पड़ी थी। बोब्स पर निशान।
जसप्रीत: "पानी पी, कपड़े पहन। घर चलें।"
मंजीत: "हाय... जान नहीं बची। इतनी बुरी हालत पहले कभी नहीं हुई।"
पेशाब करते वक्त जलन से हिल गई। गांड देख जसप्रीत के मुँह पर हाथ: पूरी लाल, उँगलियों के निशान।
जसप्रीत: "मुंडा राना का शिकारी है। विवाही जनानी की तसल्ली आसान नहीं।"
दोनों कपड़े पहनकर बाहर। जसप्रीत ने सिमर के सिर पर हाथ फेरा: "किसे अच्छी रंड का चंदा होया तू। इतनी छोटी उम्र में जनानी की तसल्ली करना सीख लिया।"
घर जाते वक्त मंजीत को बैठना मुश्किल।
मंजीत: "दीदी तेज चलो... बैठ नहीं पा रही। कुत्ते ने चितड़ लाल कर दिए।"
जसप्रीत: "मजा नहीं आया?"
मंजीत: "हाय... तारे नजर आए।"
घर पहुँचकर दोनों अपने कमरे में। मंजीत बिस्तर पर पेट के बल लेट गई। जसप्रीत गीली चूत लेकर काम में लग गई। दिमाग में सिमर था—वो फैसला कर चुकी थी, बिना उसके नीचे पड़े नहीं जाएगी। सोच रही थी—पहले कुड़ी तनवीर को या बाद में?
उधर मंजीत कमरे में लेटी थी। हैप्पी आया, चाय लेकर। आज जसप्रीत ने बनाई थी।
जसप्रीत: "हैप्पी, गल्ल सुन।"
हैप्पी: "हाँ दीदी।"
जसप्रीत: "चाय ले जा। तेरी वोह्टी थक गई है।"
हैप्पी: "दीदी, किसी को मत दसना ये गल्ल।"
जसप्रीत हँसी: "हाँ कमला मुंडा। तेरी घरवाली है, तू जिधर मर्जी नीचे लंबी डाल। अब तो तू सिरे का कमीना हो गया—छोटी बहन तेरे सामने चुदवाई, आज घरवाली का नाड़ा खुलवाया।"
हैप्पी: "दीदी, सब अपनी मर्जी। गाँव की कितनी जनानियाँ ठोकीं। मजा तब आया जब सिमर ने दिलप्रीत को चोदा। आज फोन पर सुनकर भी मजा आया।"
जसप्रीत: "बढ़िया लगा तेरे खुले विचार। सोचा था तू पंगा खड़ा करेगा।"
हैप्पी: "पंगा होता तो पहले दिन कर देता। सेक्स में सोखीन हूँ। अब बोरिंग हो रहा था। सिमर ने जोश वापस ला दिया।"
मंजीत को चाय दी।
मंजीत: "तुमने बनाई?"
हैप्पी: "नहीं, दीदी ने। थक गई थी तू।"
मंजीत: "टाँगें काँप रही हैं।"
हैप्पी ने बुल्ल चूसे, फिर बोला: "बाकी रात को। सिमर ने अच्छी वजा दी होगी।"
मंजीत: "मैं अभी शावर नहीं लिया। सिमर से आई हूँ। तुम्हें पता है।"
हैप्पी: "तो ही सोचता था साल्टी स्वाद क्यों। कोई परवाह नहीं। मजे करके आई है।"
मंजीत: "एक और गल्ल मानोगे?"
हैप्पी: "हुकम करो।"
मंजीत: "आज मिंटू पाजी को 2 पैग लगा दो। होश में रहें।"
हैप्पी: "ठीक। गल्ल क्या?"
मंजीत: "आज तनवीर की सील खुलवानी है। रात को जनानियाँ गीत गुनेंगी। सिमर आ जाएगा।"
हैप्पी: "ओह... ओके। तनु को सेट किया सिमर ने। आज पिता अपनी बेटी की सील टूटते देखेगा।"
मंजीत: "पाजी पंगा नहीं करेंगे। मैं और जसप्रीत संभाल लेंगे।"
रात 9 बजे। जनानियाँ गीत गा रही थीं। हैप्पी ने जीजा को पैग पिलाए। मिंटू 4 पैग पर था। मंजीत ने सिमर को फोन किया—तनु को ऊपरी मंजिल के कमरे में ले जा।
सिमर ने तनु को बुलाया। तनु गर्म थी। माँ-मामी साथ थीं।
कमरे में तनु ने जकड़ लिया: "कमीने, आज तुझे कच्चा खा जाऊँगी।"
सिमर: "देखते हैं कौन किसे। जो कहा था, किया?"
तनु: "हाँ, पेनकिलर खा ली।"
तनु ने ब्लैक पजामी सूट पहना था। बाल साफ किए, मेहंदी लगाई।
सिमर ने कमीज़ उतारी, चूमा। ब्रा खोली—मम्मे आजाद। गोरी-चिट्टी तनु। सिमर ने मम्मे चूसे। तनु पागल हो गई।
तनु ने पजामी उतारी। सिमर ने 69 में डाला। दोनों मजे ले रहे थे।
नीचे हैप्पी शराबी बनकर ढेर। मंजीत आई: "पाजी, इसे कमरे में डाल आएँ।"
मिंटू ने मंजीत को छेड़ा। दोनों हैप्पी को कमरे में ले गए। मिंटू: "ऊपर चलें, हवा लें।"
अंदर सिमर ने तनु को बेहाल किया। तनु सिमर के मुँह पर बैठी।
फिर तनु लेटी। सिमर ने लंड पर थूक लगाया। तनु ने चूत गीली की।
सिमर ने पहले घिसा, फिर एक झटके में 3 इंच अंदर। तनु चीखी, मुँह दबाया।
बाहर मंजीत और मिंटू देख रहे थे। मिंटू: "ये कौन? मेरी कुड़ी?"
मंजीत: "धक्का नहीं। खुद मरवा रही है।"
मिंटू गुस्से में। पीछे कुलवंत और जसप्रीत।
जसप्रीत: "अब चुप। नीचे लोग हैं।"
मिंटू: "तुझे पता था? रोका क्यों नहीं?"
जसप्रीत: "तू सारी उम्र बाहर मुँह मारता रहा। तुझे पता ही नहीं। देवर से सोती हूँ मैं।"
जसप्रीत सबको नीचे ले गई।
अंदर सिमर ने तनु को घोड़ी बनाया, ठोका। आखिर पानी चूत में डाला।
सिमर: "पूरी हो गई इच्छा?"
तनु: "हाय... चूत दुख रही। पर दर्द खुशी का है। मिलते रहना।"
तनु ने पैंटी पहनी—सिमर का माल रिस रहा था। नीचे गई। सबने देखा वो लँगड़ाकर चल रही थी।
जसप्रीत: "आ जा, दूध पी।"
तनु: "सॉरी, फ्रेंड्स नहीं छोड़ रहे थे।"
मिंटू: "हाँ पुत्त... आज पता लगा तू बच्ची नहीं रही।"
Dono mami bhanji ki chut faad di ab maa ki baari hai
 

Abhishek Kumar98

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♣️ Update 10 ♣️

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तनु: "हाय... चूत दुख रही। पर दर्द खुशी का है। मिलते रहना।"
तनु ने पैंटी पहनी—सिमर का माल रिस रहा था। नीचे गई। सबने देखा वो लँगड़ाकर चल रही थी।
जसप्रीत: "आ जा, दूध पी।"
तनु: "सॉरी, फ्रेंड्स नहीं छोड़ रहे थे।"
मिंटू: "हाँ पुत्त... आज पता लगा तू बच्ची नहीं रही

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ऐसे ही थोड़ी देर बाद मनजीत उठकर अपने कमरे में चली गई, जहाँ हैप्पी पहले ही लेटा इंतजार कर रहा था। गर्म दूध पीकर तनु को भी काफी अच्छा महसूस हुआ। ऐसा लगा जैसे उसके शरीर में नई जान आ गई हो। फिर भी अभी तक पैर में दर्द था, यह वह महसूस कर सकती थी। इसलिए अपनी मम्मी से हाथ जोड़ते हुए बोली, "मम्मी, प्लीज मुझे कमरे तक छोड़ दो। मेरी नस खिंच गई है, बहुत दर्द हो रहा है।"
जसप्रीत: "हाँ पुत्री, क्यों नहीं।" और अपने पति से मुंह बनाते हुए, "तुम भी जाओ, मैं आ रही हूँ। क्या सोच रहे हो यहाँ खड़े-खड़े?"
मिंटू: "कुछ नहीं सोचता, तू जल्दी आ जाना..."
जसप्रीत: "हाँ आ रही हूँ। तनु की टांग को जरा तिल के तेल से मालिश कर दूँगी, ठीक हो जाएगी। नहीं तो यह ऐसे ही टांगें फैलाए लेटी रहेगी तो लोग गलत सोचेंगे इस लड़की के बारे में। हेहेहे..."
तनु: "क्या मम्मी, तुम भी ना, जरा सोच-समझकर बोलती हो या नहीं..."
जसप्रीत: "ले, उसी की शर्मीली जाति। इतनी बड़ी हो गई है बाप के..."
मिंटू भी अपनी पत्नी की इतनी खुली बातें सुनकर शर्मिंदा हो गया था। कोई भी पिता हो जाता, जब उसकी पत्नी उसके सामने ही जवान 25 साल की बेटी की टांगों को तेल लगाने की बात करती।
तनु: "मम्मी जी, मैं तुम्हें सब बताती थी तो फिर आज यह क्या था...?"
जसप्रीत: "क्या मतलब पुत्री, मैं तेरी बात नहीं समझी?"
तनु: "नहीं, मुझे ऐसा लगा जैसे तुम डैडी जी को जानबूझकर तंग कर रही थीं। इशारों-इशारों में ताने मार रही थीं। देखो, मैं तुमसे आज तक कोई बात नहीं छुपाई... मैं तो तुम्हें यह भी बताती थी कि मैं सिमर से प्यार करती हूँ, उसके साथ ही सब करना चाहती हूँ और आज करना था। यह भी बताया था। अब तुम भी बताओ, क्या है तुम्हारे और डैडी के बीच? सब ठीक तो है ना..."
फिर जसप्रीत भी अपनी बेटी से कुछ नहीं छुपाती और सब कुछ सच बता देती है। सारा नंगा सच, जिसे सुनकर उसकी बेटी भी स्तब्ध हो जाती है।
तनु: "ऐसा मतलब... आज जब मैं सिमर के साथ कमरे में थी, उधर डैडी बाहर देख रहे थे..."
जसप्रीत: "हेहेहे अरे हाँ, जब तू दर्द से तड़प रही थी, वे भी बाहर परेशान हो रहे थे..."
तनु: "और क्या करती जरा, हाथ-पैर न मारती, तड़पती न? ऐसे बड़ी मेरी चूत जैसी में फंसा दिया। ऊपर से चु भी नहीं निकलने दिया, बल्क में बल्क डालकर... अभी भी कितना दर्द हो रहा है। मैं तो सोचती थी 19 साल का है, अभी खैर, इतनी अक्ल होनी चाहिए मुझे बतानी पड़ती सब। पर उसने तो मेरी चूत बंद कर दी..."
जसप्रीत: "तुझे तो फिर भी उसने प्यार से किया। दोपहर तेरी मनजीत मामी की जबरदस्त चीखें सुनीं उसने अपनी मोटर पर..."
तनु: "ओह, ऐसा मतलब थोड़ा नाड़ा भी खोल दिया सिमर ने?"
जसप्रीत: "नहीं-नहीं, मेरा नहीं। सिर्फ तेरी मनजीत मामी का। चल, मैं चलती हूँ। बाद में बात करेंगी। घर जाओ, तेरा पिता इंतजार कर रहा होगा मुझे..."
तनु: "हेहेहे जाओ, आज थोड़ा खैर नहीं... सुबह सबको पूछना थोड़ा माँ-बेटी की चाल क्यों बदल गई है..."
जसप्रीत तनवीर के गाल पर थप्पड़ मारते हुए चली गई। उस रात जसप्रीत और मिंटू के कमरे में काफी बहस हुई, लेकिन जब जसप्रीत अपने कपड़े उतारकर मिंटू की छाती पर बैठ गई, तो मिंटू चुप हो गया।
मिंटू: "नीचे उतर साली मोटी..."
जसप्रीत: "अच्छा, मैं मोटी हूँ? चल, फिर आज ऐसे मजा कर।" इतना कहकर वह उसके मुँह पर अपनी गांड रखकर बैठ गई...
जहाँ पहले मिंटू काफी गुस्से में था, अब वह अपनी पत्नी की ये हरकतों से उत्तेजित हो गया था। जब से अपनी बेटी को नंगी उस लड़के के नीचे देखकर आया था, उधर से उसका दिमाग सुन्न हो गया था। जैसे उसकी बेटी नंगी लंड पर उछल रही हो, जैसे वह लड़का उसकी बेटी की टांगें कंधों पर रखकर फिर घोड़ी बनाकर उसे चोद रहा हो। उसे अपनी बेटी की चिंता हो रही थी कि उसे दर्द तो नहीं हो रहा होगा। बाद में वापस आने पर उसकी बदली चाल देखकर उसे तरस आ रहा था तनु पर।
10 मिनट ऐसे ही चुसवाकर जसप्रीत नीचे उतर गई।
जसप्रीत: "अब बताओ, क्या कह रहे थे तुम..."
मिंटू: "कुछ नहीं मेरी माँ, तू जीती, मैं हार गया... तनु कहीं इतनी जल्दी आ गई? तू थोड़ा रुक जाती उसके पास मालिश लेने..."
जसप्रीत: "ओह हो, तुम तो ऐसे ही टेंशन लेते रहते हो। वह ठीक है, सिर्फ एक बार ही करवाकर आई हूँ। नाल की सील टूटी है, थोड़ा दर्द तो जरूरी है..."
मिंटू: "हाँ ठीक है, बस उसे समझा देना बाहर किसी को पता न लगे। जो भी करना, चुपचाप करे।"
उधर हैप्पी भी बड़ी खुश हुआ सारी स्टोरी सुनकर।
ऐसे ही विवाह भी लंगड़ा गया। विवाह के बीच कई कुँवारी-शादीशुदा लड़कियाँ बेगाने लड़कों से चुद गईं। क्योंकि विवाह का तो मौका होता ही ऐसे कामों के लिए।
सिमर ने तो मौका देखकर डॉली जान से पहले दिलप्रीत को एक बार फिर चोद दिया था। वह चाहता था कि डॉली जान से पहले एक बार दिलप्रीत को चोदे। जब होटल में ही सब खा-पी रहे थे, भांगड़ा डाल रहे थे, तो मौका देखकर उसने उधर ही बाथरूम में बुलाकर दिलप्रीत का विवाह वाला लहंगा ऊपर चढ़ाकर दिलप्रीत की चूत मार ली। उसने तो दिलप्रीत को चूत भी साफ नहीं करने दी। दिलप्रीत ने भी उसकी बात मान ली और वापस जाकर स्टेज पर अपने पति के साथ जाकर बैठ गई, माल से भरी चूत लेकर। इधर तक कि जब वह रात को दिलप्रीत अपने पति के साथ नंगी हुई, तो उधर भी चूत साफ नहीं की थी। पानी से बस टिश्यू पेपर से बाहर एक बार साफ कर दिया था। उसके पति को बिल्कुल भी पता नहीं चला कि वह अपनी पत्नी की चूत से किसी बेगाने लड़के का माल चाट रहा है।
कुलवंत बड़ी खुश थी। विवाह में उसने काफी बार तनु को चोदा था। सिमर का जब दिल करता, तनु को बुला लेता। मिंटू ने कई बार अपनी बेटी की टांगें सिमर के कंधों पर देखीं। दो बार तो तनु सिमर के कंधों पर टांगें रखकर मजे कर रही थी कि उसकी मम्मी-पापा आ गए, लेकिन दोनों को मजे करते देख चुपचाप वापस चले गए। तनु अपनी मम्मी का पिता पर नया कंट्रोल देखकर हैरान भी थी और खुश भी थी।
ऐसे ही एक दिन कुलवंत और सिमर बैठे हुए थे कि उसकी माँ का फोन बार-बार बज रहा था। उसकी माँ नंबर देखकर फोन काट देती, लेकिन फोन अगले ही पल फिर बजने लग जाता।
सिमर: "मम्मी, क्या हुआ? फोन क्यों काट रही हो? बात कर लो। कहते हो तो मैं बाहर चला जाऊँ।"
कुलवंत: "नहीं पुत्र, तुझे बाहर जाने की जरूरत नहीं। अब तू मेरे ऊपर पूरा हक रखता है। अब तो तू मेरा सरदार है। तू ही है जो मुझे अपने कंट्रोल में रख सकता है। तू वो हक रखता है जो शायद तेरा पिता कभी नहीं ले सका। जो हुकुम तेरा पिता कभी नहीं चला पाया मेरे ऊपर। यह मेरा पुराना यार है, हमारे साथ ही टीचर है। जगदीप नाम है। शायद तुझे पता हो उसके बारे में। यह रात को अक्सर आता रहता है मुझे मिलने। मुझे ब्लैकमेल करता रहता है कि मैं उसे मिलूँ नहीं तो मेरी कुछ फोटोज हैं जो इसने धोखे से खींची थीं नंगी वाली, वे वायरल कर देगा व्हाट्सएप पर।"
सिमर: "ओह ओके, हाँ जगदीप कंप्यूटर वाला टीचर थोड़ा है। मैं जानता हूँ इसे, भला हीरो बंदा है। यह ज्यादा उड़ान भर रहा है हवा में। लगता है ऐसे इलाज भी करना पड़ेगा। कोई ना, बुला लो इसे रात को।"
सिमर के कहने पर कुलवंत ने जगदीप सर को अपने घर बुला लिया। जगदीप का आजकल दिमाग और टाइम दोनों खराब चल रहे थे। उसकी पक्की सहेली, जिसे वह बड़ा प्यार करता था और वह भी जगदीप को बहुत प्यार करती थी, उसे जगदीप की करतूतों का पता चल गया था कि कुलवंत से हटकर उसके और भी कई टीचर्स के साथ रिलेशन थे। वह लड़की भी नाल दे स्कूल में टीचर थी। वह यह सब बर्दाश्त न कर सकी और गुस्से में आकर अपने माँ-पिता की पसंद के लड़के से विवाह करवा लिया।
जैसे आम होता है, प्यार जितना भी गहरा हो, विवाह के बाद सब बदल ही जाता है। जब विवाह के बाद 1 साल तक पति अपनी नई पत्नी को नंगी करके धुन तक लंड डालता है, तो पत्नी प्यार वगैरह सब भूल जाती है। जगदीप के साथ भी वैसा ही हुआ। वह तो अब उसे बुलाने की भी हिम्मत नहीं थी। 3 महीने हो चुके थे विवाह को। रोज उसे देखता, बुलाने की कोशिश करता, लेकिन वह उसे इग्नोर कर देती।
दिन-ब-दिन अपनी माशूक का बदलता शरीर जगदीप की जान ले लेता। जगदीप ने भी उसे ठोका था, लेकिन ज्यादा नहीं। पर अब तो उसे रोज नंगी होना पड़ता था। ऐसा कोई दिन नहीं था जब वह बिना चूत मरवाई सोती हो। कई बार वह सारा दिन स्कूल में ज्यादा काम से थक जाती, तो अपने पति को कहती कि आज रहने दो, लेकिन वह जिधर उसे रोज 4 बार चूत मारता, उधर 2 बार मारकर सोने दे देता। ऐसे नतीजा यह था कि अब उसका शरीर पहले से भरने लगा था। ब्रा उसकी साइज 32 से 34 हो गई थी। जगदीप यह देखकर बहुत जलन महसूस करता था।
आज वह अपनी जलन कुलवंत पर उतारना चाहता था। थोड़े दिन पहले ही उसने कुछ स्टूडेंट लड़कों को बिना बात के पीट दिया था, जिसके कारण प्रिंसिपल साब से वार्निंग मिल गई थी।
कोई 10 बजे ही जगदीप ने गाड़ी उनके घर से थोड़ी दूर पार्क करके खड़ी कर दी और दरवाजा खोलकर अंदर आ गया। सीधा कुलवंत के कमरे में चला गया। जहाँ कुलवंत नंगी उसके इंतजार में पड़ी थी, जैसे उसे उसके बेटे सिमर ने समझाया था।
जगदीप स्कूल की आदत के मुताबिक कुलवंत को मैडम जी कहकर बुलाता हुआ, "तुम ना मना कर रही थीं, अब क्या हो गया? अब मुझे देखो थोड़े फूहड़ में खैर आग लग गई जो मेरे आने से पहले ही नंगी बैठी हो।"
कुलवंत: "नहीं आग तो नहीं लगी। बस जिधर तेरी आग लगी थी, वह ठंडी करनी थी। तेरा दिमाग ठिकाने पर लाना था।"
जगदीप: "क्या बकवास कर रही हो? अपनी औकात न भूल जाओ। ज्यादा बोलीं तो तेरी होटल वाली फोटोज और वीडियोज मैं वायरल कर दूँगा सारे स्कूल में।"
इतने में सिमर, जो बाहर ही खड़ा था, अंदर आ गया। "पंगा लेने आया? मम्मी ने इतने साल तुम्हें मजे करवाए, अब भूल जाओ वे वीडियोज और पिक्चर्स। डिलीट करो और इधर से टर हो जाओ।"
जगदीप: "तू साला इधर क्या करने आया बेशर्म? तू भी दलाल ही लगता घस्ती माँ का पुत्र। साला तुझे तो पता ही है, तेरी घस्ती माँ का यह लंड लिए बिना नहीं रह सकती।"
अभी जगदीप और बोलना चाहता था कि सिमर ने पहले एक लात जगदीप के टेस्टिकल्स पर मार दी। जगदीप इससे पहले संभल पाता, दूसरा मुक्का उसके जबड़े पर ठा ठोंका सिमर ने मार दिया। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि जगदीप को संभलने का मौका ही नहीं मिला। वह उधर ही ढेर हो गया।
सिमर: "साला तुझे प्यार से समझा रहा था, तू ऐसे फालतू बोलता जाता। आज तेरा मोर मैं बनाऊँगा। चल, कपड़े उतार और जो कहूँ चुपचाप कर। नहीं तो मैं चिल्ला दूँगा कि हमारे घर चोर आ गया, लूटने आया था। हमारे घर मेरी माँ के साथ रेप करने लगा था। नाले उसके साथ कुटमार कर रहा था। बाकी तू खुद सोच ले, मेरी माँ की गाँव में इज्जत कितनी है। गाँव वाले तुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे। ज बच भी गया गाँव वालों से, पुलिस ने जिधर तेरी गांड पर पट्टा फेरना, वह वखरा।"
जगदीप जो हो रहा था, समझ ही नहीं पाया। सिमर की बात सही थी। गाँव वाले उसकी बात नहीं सुनते। हो सकता था गाँव वाले कुट-कुट मार दें। जान से मार दें।
जगदीप: "देख, मेरे से गलती हो गई। यह ले मेरा फोन, तो रख लो। तसल्ली कर लो। मैं सारा कुछ डिलीट कर देता हूँ। प्लीज मुझे जाने दो। इधर से मैं वापस कभी नहीं आऊँगा। तेरी माँ के रास्ते में नौकरी भी छोड़ दूँगा।"
कुलवंत: "पुत्र, जाने दो इसे। छोड़ दो। हम कोई पंगे में नहीं पड़ना। तू बस इसके फोन से पिक्स और वीडियोज डिलीट करके भेज दो इसे।"
सिमर: "तुम टेंशन न लो। बस मजे करो। बाकी मैं देख लूँगा।"
और फिर जगदीप वाली देखते हुए, "तू साला अभी तक नंगा नहीं हुआ? पहले तो बड़ा जल्दी में था मेरी माँ चोदने को। यह देख, नंगी खड़ी है। बन शेर लगा हाथ।"
जगदीप ने चुपचाप अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। जब कुलवंत की पीठ उसके सामने हुई थी, तो कुलवंत के लाल चिट्टड़ को वह देख चुका था। जो आज दोपहर उसके पुत्र ने किए थे।
क्योंकि इतने दिन हो गए थे, कुलवंत ने चूत नहीं मरवाई थी। अपने बदले की आग में वह सब भूल गई थी। और दूसरा, अपने पुत्र को ऐसे सेक्स में तेज देखकर वह बड़ी खुश थी। पर इतने साल की आदत थी टांगें फैलाने की। इतनी जल्दी कैसे छूट जाती। यह सलाह उसकी बेटी कोमल ने ही दी थी। बात-बात करते जब शाम की चाय पी रहे थे, वह।
कोमल: "मम्मी, क्या हो गया? बड़े परेशान लग रही हो। इतना पसीना आ रहा है। क्या हुआ? सब ठीक तो है ना? गोली ले लो, अगर बुखार हो तो।"
कुलवंत: "तुझे सारा पता क्यों? तंग करती है। मैं अब वह सब बंद करना चाहती हूँ। पर यह बुरी आदत इतनी जल्दी नहीं छूटती। और एक तेरा खासी पिता है, कुछ करता ही नहीं।"
कोमल: "हम्म, बुरी आदत। हेहेहे, वह तो बहुत आसान है। वह तो जल्दी छूट जाएगी। आदत जितनी भी गंदी और पुरानी हो..."
कुलवंत: "ओह, कैसे? बता मुझे। बड़ी तंग हूँ मैं। सिमर भी तुझे पता, बिजी है अब। उसे तो आप खेंच लगी कि आ जा, मेरे ऊपर चढ़ जा।"
कोमल: "हाँ, यह तो उसे आप चिढ़ाकर सादी सेक्सी माँ को कंट्रोल में रखे। नहीं तो यह फिर बाहर जाओगी मरवाने। फिलहाल तरीका तो थोड़ा वैसा ही है, जिधर तुम हमें सजा देती हो और हम वह गलती दोबारा नहीं करते। क्या कहती हो? वही हिम्मत, जिधर सजा हमें देती हो, अपने ऊपर ट्राई करने की।"
कुलवंत: "हाँ, यह तरीका ठीक रहेगा। इससे ध्यान भटक जाएगा। जा, सिमर को मेरे कमरे में भेज दे। इस बार सिमर को करने दे। अगली बार तुझे मौका दूँगी कुटने का। मैं जाकर कपड़े चेंज कर लेती हूँ इतनी देर। फिर आज रात को किसी को बुलाना है।"
कोमल: "गुड लक। नाले यह ना टेंशन लो कि ज रो पड़े तो हम क्या सोचेंगे थोड़े के बारे में। बाकी सादा छोटा शेर बड़ा तेज है। इतने काम में आप संभाल लेना।"
कुलवंत: "हेहेहे, मुझे ना सिखा। तुझे पता सारा कुछ।"
कोमल: "तुम भूल गई लगती हो। आज तक हम दोनों बहन-भाई और शायद डैडी जी भी थोड़ी गोदी में पड़ते थे। तुम मारती थीं। आज थोड़ी बारी।"
इतना कहकर हँसते हुए कोमल सिमर को बुलाने उसके कमरे में चली गई।
कोमल: "सिमर, गेम बंद कर। मम्मी बुला रही हैं अपने रूम में तुझे..."
सिमर: "क्यों, क्या हुआ? मैं तो कुछ नहीं किया..."
कोमल: "अपनी फिक्र तुझे पहले पड़ जाती। हेहेहे। तेरी बारी नहीं है। मम्मी को थोड़ी मदद चाहिए तेरी।"
सिमर गेम बंद करके जाने लगा था, तो कोमल पीछे से आवाज मारती है, "एक मिनट रुक। अपनी बेल्ट साथ लेता जा। तुझे जरूरत पड़ेगी।"
सिमर ने उस समय शॉर्ट पहन रखी थी। वह वापस आकर अपनी किली पर टंगी पैंट से बेल्ट निकालकर साथ ले गया। डर तो अभी भी था कि कहीं इसके से ही आज पड़नी हो उसे।
कमरे में जब पहुँचा, तो उसकी माँ पूरी नंगी बेड पर कोने पर बैठी हुई थी। उसके हाथ में बेल्ट देखकर उसकी माँ ने अपना नीचे वाला बल्क दांतों में दबा लिया। वह पास जाकर बेड पर बैठ गया। उसकी माँ चुपचाप उठी, उसके पैरों पर बैठ गई और पहले एक जबरदस्त किस उसके बल्क पर किया। फिर सारी बात एक्सप्लेन करने लगी कि कैसे अभी भी उसका दिल बाहर टांगें फैलाने का करता है, लेकिन अब वह यह सब बंद करना चाहती है।
सिमर उसकी बात समझ गया और कुलवंत कौर उठकर अपने पुत्र पर पैर ऊपर करके लेट गई। सिमर पहले अपनी माँ के गोरे-चिट्टे गोल चिट्टड़ को देखता रहा। एक भी दाग नहीं था उसकी माँ की गांड पर। उसे झुककर अपनी माँ के चिट्टड़ को चूम लिया।
कुलवंत: "पुत्र, यह सब बाद में भी कर सकता तू। पहले जिधर मेरा काम है वह कर ले। इससे पहले मेरा इरादा बदल जाए।"
सिमर ने बिना कुछ बोले अपना हाथ कंधों तक उठाया और अपनी माँ के चिट्टड़ पर ठा मार दिया। इतने साल खुद अपनी माँ की गोदी में मार खाकर वह भी एक्सपर्ट बन गया था। उसे पता था कि हाथ के खरे हिस्से से सजा ज्यादा लगती है। बस वही तरीका अपनाते हुए साए खबे दोनों चिट्टड़ पर सटाक-सटाक करते थप्पड़ लगने लगे। पहले 1-1 दोनों तरफ मारता रहा। फिर जब देखा कि उसकी माँ के चिट्टड़ ने रंग बदलना शुरू कर दिया, तो वह एक ही साइड पर 5-7 मारकर साइड बदल लेता।
कुलवंत तो सिमर के हाथ से मार खाकर ही रोने लग पड़ी थी। उसकी गांड से पसीना निकलने लगा था। जब उसके पैर का पिछला हिस्सा भी लाल हो गया, तो सिमर के कहने पर कुलवंत कौर बेड पर लेट गई और अपने पेट के नीचे 2 तकिए रख लिए, जिससे उसकी गांड ऊँची हो गई।
सिमर को आज यकीन हुआ था कि जब उसकी मम्मी कहती होती थी, "पुत्र, ऐसे गलतियाँ ना करो। नहीं तो मुझे तुम्हें अपने रूम में बुलाकर ऐसा करना पड़ता। मुझे यह सब करना अच्छा नहीं लगता, लेकिन ज आज तुम्हें छोड़ दूँ तो तुम यह गलती दोबारा करोगे।" उधर सिमर सोचता होता था कि मम्मी को हमें दोनों बहन-भाई को कुटना अच्छा लगता है। लेकिन आज वह खुद मम्मी वाली जगह पर था। उसे भी अच्छा नहीं लग रहा था अपनी मम्मी की गांड को कुटना।
अपनी माँ के ऊपर हुए लाल चिट्टड़ पर एक के बाद एक सिमर ने लगातार बेल्ट से 12 बार किए। जब भी बेल्ट कुलवंत की गांड पर बजती, तो वह उछल पड़ती, लेकिन उसने सिमर को बिल्कुल भी रोकने की कोशिश न की।
सिमर ने बाद में अपनी माँ के चिट्टड़ पर कोल्ड क्रीम लगा दी। चिट्टड़ सिर्फ लाल हुए थे, कोई सजा नहीं लगी थी उसके ऊपर। बस अब अगले 4 दिन बैठने में दर्द होना था।
इतने लाल चिट्टड़ देख जगदीप भी समझ गया था कि ज उसने सिमर की बात न मानी तो बहुत बुरा होगा उसके साथ।
इसलिए चुपचाप जगदीप अपने कपड़े उतारकर नंगा हो गया। और सिमर वाली देखा, जो साइड पर कुर्सी पर पैर पर पैर रख बैठा हुआ था। सिमर ने सिर हिलाकर उसे परमिशन दे दी, तो जगदीप आगे होकर कुलवंत को गले लगा लिया और होंठों पर किस करता चूमने लगा। साथ ही कुलवंत मैडम के लाल सुर्ख चिट्टड़ से खेलने लगा। जब जगदीप के हाथ उसकी गांड पर लगे, तो कुलवंत कौर सिसक पड़ी दर्द और मजे से। दर्द काफी था अभी भी।
जगदीप फुसफुसाते हुए, "ओह शिट, सॉरी कुलवंत मैडम। मैं भूल गया। पर तुम ऐसे करने क्यों दिया अपने बेटे को।"
कुलवंत: "क्योंकि मेरी आदतें खराब रही हैं शुरू से। मेरा पति तो खासी है, तुझे पता। पर मेरे बेटे को औरत कंट्रोल में रखना आता है। चल, अब तू बातें घटाकर और काम ज्यादा कर।"
उसने कुलवंत के बल्क चूसने चाहे, तो कुलवंत ने मना कर दिया। जगदीप फिर उसके स्तन चूसने लगा। ऐसे ही कभी स्तन, कभी उसकी चूत पर पैर को चूमता-चूसता कुलवंत को खुश करने में लगा रहा। जब उसने देखा कि कुलवंत गर्म हो गई है, तो वह उसके पैरों में आ गया। उसके ऊपर लेटकर जगदीप को अपना लंड धीरे-धीरे चूत में डाल घिसे मारने शुरू कर दिए।
पहले तो 5 मिनट वह सिमर वाली देखता रहा कि कहीं वह कुछ बोले ना, लेकिन बाद में वह बेफिक्र हो घिसे मारने लगा। जगदीप भी सेक्स का पक्का था, उसका काम भी जल्दी नहीं होता था। ऐसे ही अपनी मस्ती में वह घिसे मारने लगा हुआ था कि उसे अपनी पीठ पर कुछ गीला-गीला महसूस हुआ। जब उसने पीछे मुड़कर देखा, तो कुलवंत मैडम का बेटा सिमर पूरा नंगा होकर खड़ा था। जिसे देख वह डर गया। डरने वाली बात भी थी। लंड उसका अपने लंड से बड़ा भी था, मोटाई तो काफी ज्यादा थी।
उसने अपने लंड पर सरसों के तेल से पूरा मल लिया था। जब सिमर ने उसकी गांड पर तेल सूटका, तो जगदीप समझ गया कि आज खैर नहीं। चूत मारने आया था, आज गांड मरवानी पड़ेगी।
जगदीप: "प्लीज भाई, छोड़ दे। माफ कर दे... आगे से कभी नहीं करूँगा ऐसा।"
सिमर: "हाँ जी, तुम यह गलती नहीं करोगे। बस वही पक्का करने दो। नाले रुको ना, घिसे मारते रहो।"
जगदीप ने कुलवंत वाली देखा, "प्लीज मैडम, बचाओ। प्लीज, थोड़े पैर फाड़ता।"
कुलवंत: "पैर तो तुम्हें इतने साल हो गए फाड़ते। नंगी करके मेरे पैर ही तो फाड़ते थे, फिर अपने मोड़ पर रख लेते थे।"
कुलवंत फिर जगदीप को अपनी बाहों में लेते हुए, "मुझे फाड़ लो। जो दिल करता, कर लो। मैं नहीं रोकूँगी। तुम मेरे बल्क का रस चूसना चाहते थे? आओ।" इतना कह कुलवंत ने जगदीप के बल्क में बल्क डाल लिए। जगदीप को पता था, और कोई रास्ता नहीं। वह बल्क चूसने लगा। कुलवंत को पता था आगे क्या करना है। उसने अपने ऊपर पड़े जगदीप की गांड दोनों हाथों से फैला दी।
सिमर ने कुछ देर जगदीप को रोका और अपना लंड उसकी गांड पर सेट करके जोर लगा दिया। अभी टोपा ही अंदर गया था कि जगदीप दर्द के मारे छूटने की कोशिश करने लगा, लेकिन कुलवंत के जोर के आगे हार गया। पर उसके पीछे खड़ा सिमर नहीं रुका। अपना 8 इंच से ज्यादा लंड पूरा अंदर धक्का करके कुछ पल रुका और जगदीप को चेतावनी दी।
सिमर: "ले सर जी, ऐसे दर्दे थे। सारा लंड निगल गए तुम तो। मम्मी, थोड़ा यार तो बड़ा अट्ट है।"
जगदीप: "साला मेरी गांड फाड़ दी तू बहनचोद। मेरे पीछे मिर्च लग दिया। हायyyy, मैं मर गया। प्लीज निकाल ले बाहर यार।"
कुलवंत यह सुन हँसते हुए जगदीप का फेस अपनी चुन्नी से साफ करती हुई, "कोई बात नहीं सर जी। अभी ठीक हो जाओ। दर्द फिर तुम भी अपनी गांड हिलाओगे मजे से मेरे बेटे के लंड पर। जिधर मैं हिलाती होती थी थोड़े के लंड पर।"
बड़ी शानदार गेम चल पड़ी थी। सिमर पूरे जोर से घिसे मारता, तो उसके जोर से जगदीप का लंड भी कुलवंत की चूत में बजता। ऐसे ही लगे रहे। जगदीप का काम भी जल्दी नहीं हो रहा था। कुलवंत की चूत की गर्मी उसके लंड को ढीला नहीं पड़ने दे रही थी और उसकी गांड में गया लंड उसका पानी नहीं निकलने दे रहा था। ऐसे ही कुलवंत की चूत में घिसे मारते-मारते और गांड मरवाते जगदीप का काम हो गया। वह ऐसे ही कुलवंत पर ढेर होकर गिर पड़ा, लेकिन उसके पीछे लगा सिमर नहीं रुका। कोई 10 मिनट और धक्के मारकर उसकी गांड चोदने के बाद उसने अपना सारा पानी वहीं उंडेल दिया।
जब रेस्ट करने के बाद अपनी गांड धोने जगदीप बाथरूम जा रहा था, उसके पैर चल ही नहीं रहे थे। इंग्लिश टॉयलेट सीट पर जब बैठा, तो उधर भी उसे काफी दर्द हुआ। सिमर की मलाई अपनी गांड में देखकर उसे बड़ी शर्म आई और वह वापस कमरे में आ गया।
कुलवंत: "क्यों सर जी, आज थोड़ी अपनी चाल बदल गई है? किधर का लग रहा? आज तक कई लड़कियों की चाल बदल दी थी तुम तो।"
जगदीप: "बस मैडम, आग निकल रही है पीछे से। प्लीज किसी को ना बताना।"
सिमर और कुलवंत हँसने लग पड़े और बोले, "नहीं बताते सर जी। क्यों डरते हो? मजे करो। तुम अकड़ बहुत रही थी। अब थोड़ी अकड़ और सील दोनों टूट गए।" यह देखो। इतना कह सिमर ने अपना फोन बेड कोने से गिलास से छुपाकर लिया, जिधर उसने गिलास में सेट किया था।
"यह देखो, किधर टपड़े पड़े थे। तुम अपनी क्लिप देख।" जगदीप कुछ नहीं बोला। उसे पता था ज सिमर किसी बात से खिज गया तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा। इसलिए आप ही हँसता बोला, "साला जो करने आया था, सब उल्टा हो गया।"
जगदीप तो वापस घर जाना चाहता था। सिमर ने यह कहकर रोक लिया, "सर जी, हर बार सुबह तक रुकते हो। सो आज भी सुबह तक ही रुकोगे।"
जगदीप की सारी रात गांड मरवाते और चूत मारते निकली। जब वह कुलवंत को घोड़ी बनाता, तो सिमर आकर पीछे से उसकी गांड में लंड धक्का दे देता। सिमर ने अपनी आदत के मुताबिक कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जब जगदीप उसके लंड पर बैठकर उछल रहा था, कुलवंत उनकी पिक्चर्स ले रही थीं। सारी रात 3 बार चूत मारने और 4 बार गांड मरवाने के बाद जगदीप सुबह 4 बजे उधर से निकल गया। बड़ी मुश्किल से वह घर पहुँचा, क्योंकि बैठ तो हो ही नहीं रहा था दर्द के मारे। इतनी खोल दी थी गांड उसकी सिमर ने। उसे शर्म भी आ रही थी, क्योंकि आखिरी के 2 राउंड में उसे भी बड़ा मजा आया था। कुलवंत मैडम की बात सही थी कि "सर जी, तुम भी अपनी गांड हिलाओगे मेरे बेटे के लंड पर।" हुआ भी वैसा ही। उसे खुद नहीं पता चला था जब वह घोड़ी बने पीछे वाली जोर लगाने लगा था, और दूसरा जब लंड पर बैठकर उछल रहा था, उसे स्वाद आ रहा था। यही सब सोचते उसे नींद आ गई।
दूसरी तरफ जब सिमर अपने कमरे में पहुँचा, तो कोमल भी जाग रही थी।
सिमर: "दीदी, तुम अभी तक जाग रही हो? क्या हुआ?"
कोमल: "तुम सोने देते हो माँ-बेटे? सारी रात जगदीप सर की चीखें ने सोने नहीं दिया। बेचारे की गांड फाड़कर रख दी तूने।" इतना कहकर उसने सिमर के हल्के से मुक्का मार दिया।
सिमर: "हाहाहा, तुम देख लिया... हाँ, वह ज्यादा हवा में था। नीचे तो उतारना ही था।"
कोमल: "चल, अब शरारतें न मार। लाइट बंद कर दे। अब तो सो जाओ।"
सिमर ने "हाँ जी दीदी" कहकर लाइट बंद कर दी और अपने कपड़े उतारकर सिर्फ कच्छे में, जैसा कि वह हर रोज सोता था, चादर के नीचे आ गया। जब वह चादर खींचकर अपने ऊपर डाली, तो कोमल के पैर उसके पैरों से टच हुए। तो उसे महसूस हुआ कि उसकी दीदी भी नंगी है चादर के नीचे।
सिमर: "दीदी, तुम कपड़े क्यों उतार दिए?"
कोमल: "इसमें बड़ी बात है? इतनी बार तो तू मुझे नंगी देख चुका है..."
सिमर: "हाँ जी दीदी, देखा है। पर नॉर्मली तुम ऐसे नहीं सोतीं, तो पूछा।"
कोमल: "हम्म, तुझे सारा पता मेरे बारे में सिमर।"
इतना कहकर उसने सिमर को गले लगा लिया। भले सिमर ने कच्छा पहन रखा था, पर...
Acha sabak sikhaya master ko aur lagta hai Komal darling ke sath bhi kuch Masti ho sakti hai
 

Abhishek Kumar98

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सिमर: "दीदी, तुम कपड़े क्यों उतार दिए?"
कोमल: "इसमें बड़ी बात है? इतनी बार तो तू मुझे नंगी देख चुका है..."
सिमर: "हाँ जी दीदी, देखा है। पर नॉर्मली तुम ऐसे नहीं सोतीं, तो पूछा।"
कोमल: "हम्म, तुझे सारा पता मेरे बारे में सिमर।"
इतना कहकर उसने सिमर को गले लगा लिया। भले सिमर ने कच्छा पहन रखा था, पर...

Ab next

एड़ा बहुत खुश था। घरवाली मनजीत ने भी अपना वादा पूरा कर दिया था। उसने जसप्रीत और हैप्पी को एक दिन मिलवा दिया। जसप्रीत पहले तो मना कर रही थी, लेकिन मनजीत की एक न मानी तो मान गई। आखिर मनजीत को वह किसी बात से मना नहीं कर पाती थी।
हैप्पी बहुत खुश था। इतने सालों से वह अपनी बड़ी बहन जसप्रीत को चोदने का सपना देखता था, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हुई। आज अपनी घरवाली की वजह से उसका सपना पूरा हो गया। उसे इस बात का भी कोई अफसोस नहीं था कि अब उसे मनजीत के कंट्रोल में रहना पड़ेगा। मनजीत दिन-ब-दिन हैप्पी के साथ नए-नए खेल खेलती। कभी रात को कमरे में नंगा करके मुर्गा बनाकर बिठा देती, कभी बैठकों में बैठने को कहती। और जब बाद में हैप्पी उसे चोदता, तो दोनों को बहुत मजा आता।
हैप्पी ने भी अपना वादा निभाया। एक दिन जब घर में कोई नहीं था, उसने सिमर को बुला लिया। सिमर वैसे ही कंधा टेकते हुए आया, जैसे पहले हैप्पी उसके घर जाकर उसकी माँ कुलवंत को चोदने जाता था। लेकिन अब रोल बदल चुका था। जैसे ही सिमर आया, उसका मूड बन गया और उसने हैप्पी से कहा—“अपनी घरवाली को नंगा करो।”
अपनी बीवी को किसी और के सामने नंगा करते हुए हैप्पी को भी अजीब-सा सुख मिल रहा था। मनजीत यह देखकर हँस रही थी, लेकिन हैप्पी चुप रहा। उसने धीरे-धीरे मनजीत के सारे कपड़े खुद उतारे—पहले कमीज, फिर ब्रा, फिर सलवार और आखिर में कच्छी भी टांगों से उतारकर अलग रख दी।
सिमर को कोई जल्दी नहीं थी। वह पूरा मजा लेना चाहता था। उसने घर जाकर अपनी माँ और कोमल को पहले ही बता दिया था कि वह हैप्पी की बीवी को चोदने जा रहा है। तीनों काफी देर आराम से टीवी देखते रहे। हैप्पी चुपचाप एक तरफ बैठा रहा। सिमर कभी मनजीत को गोद में बिठा लेता, कभी उसे चूमने को कहता।
हैप्पी सोच रहा था कि यह लड़का इतनी जल्दी कितना तेज़ हो गया। पहले वह उसे बच्चा समझता था, लेकिन अब इसने उसकी दोनों बहनों, उसकी बीवी और उसकी बड़ी बहन की बेटी को भी चोद लिया था।
करीब एक घंटे फोरप्ले के बाद जब सिमर ने मनजीत को बेड के किनारे लिटाकर उसकी चूत पर लंड सेट किया, तो मनजीत ने उसे रोक लिया।
सिमर: क्या हुआ अब?
मनजीत: कुछ नहीं मेरी जान, रुक जा। फिर हैप्पी की तरफ मुड़कर बोली—अभी थोड़ी देर है, तुमने जो वादा किया था वो भी पूरा करो।
सिमर: अब हैप्पी वीर को हमारे बीच क्या करना है?
मनजीत: बस देखता जा…
हैप्पी कुर्सी से उठा और मनजीत की चूत चाटने लगा। अच्छे 5 मिनट चाटकर उसे पूरी तरह गीला कर दिया। फिर जब हैप्पी तेल की बोतल उठाने लगा, तो मनजीत ने मना कर दिया—“तेल अगले राउंड में मेरी गांड पर लगा देना।”
हैप्पी कुर्सी की तरफ जा ही रहा था कि मनजीत ने फिर पुकारा—“सिमर का लंड तुम्हारे से ज्यादा बड़ा और मोटा है। उसे थोड़ा और गीला कर दो, मुझे बहुत मजा आएगा। प्लीज जी, मेरे लिए…” वह बच्चे की तरह जिद करने लगी।
हैप्पी मुस्कुराया और सिमर की टांगों के बीच बैठ गया। मनजीत ने सोचा था कि वह हाथ से गीला करेगा, लेकिन हैप्पी ने सिमर का लंड मुंह में डाल लिया। 2-3 मिनट अच्छे से चूसने के बाद हाथ से पकड़कर मनजीत की चूत पर सेट कर दिया। सिमर ने तुरंत अपनी रफ्तार से घुसना शुरू कर दिया।
मनजीत ने हैप्पी को अपने पास लिटा लिया। सिमर घुसता रहा और मनजीत हैप्पी के साथ लेटकर मजा लेती रही। कभी गाल में गाल डालती, कभी मस्ती में अपना स्तन उसके मुंह में ठूंस देती। हैप्पी ने भी धीरे-धीरे अपने कपड़े उतार दिए। पहली बार वह अपनी बीवी को किसी और से चुदवाते देखकर मजा ले रहा था।
जब लगा कि सिमर झड़ने वाला है, तो मनजीत ने उसे रोका। खुद हैप्पी के ऊपर चढ़कर लेट गई—उसकी चूत हैप्पी के मुंह की तरफ। सिमर हंसते हुए मनजीत की तारीफ करता रहा। मनजीत ने हैप्पी को पूरी तरह अपने कंट्रोल में कर रखा था। पहले उसने हैप्पी से अपनी चूत चटवाई जिसमें अभी सिमर का लंड घुसा था। फिर सिमर हैप्पी के सिर वाले साइड आकर उसी पोजीशन में घुसने लगा। हैप्पी बस जीभ निकालकर अपनी बीवी की चूत और उसमें अंदर-बाहर हो रहे लंड को चाटता रहा। इसी पोज में सिमर ने मनजीत की चूत में सारा माल गिरा दिया, जिसे हैप्पी ने बिना कहे चाटकर साफ कर दिया। बदले में मनजीत ने हैप्पी का माल चूसकर निकाल दिया।
तीनों थककर लेट गए। सिमर हैप्पी में आए इस बदलाव को देखकर हैरान था।
सिमर: हैप्पी पाजी, ये सब क्या? मेरे पास शब्द ही नहीं हैं।
हैप्पी: हाहा, क्या हुआ? मजा नहीं आया?
सिमर: मजा तो बहुत आया, लेकिन आपको बुरा नहीं लगा? बहनचोद, आज तो तुमने मेरे चूचे भी खुद पकड़कर मारे… भाभी ने क्या कर दिया तुझे?
हैप्पी: नहीं, इसने कुछ नहीं किया। वैसे बुरा लगना तो तब बंद हो गया था जब तूने मेरी छोटी बहन चोदी थी। अब तो तू मेरी माँ चढ़के सारी औरतें चोद चुका है। अब नाराज नहीं हूँ।
सिमर: हाहा, थैंक्यू पाजी।
पूरी रात तीनों मजा करते रहे। अगले राउंड में हैप्पी ने खुद मनजीत की गांड पर तेल लगाया और सिमर के लंड पर भी। मनजीत पूरी रात हैप्पी के साथ चुदती रही। घर लौटकर जब उसने कुलवंत को सारी बात बताई, तो कुलवंत हैरान भी हुई और खुश भी।
इन दिनों में सिमर और गोपी के बीच भी सब सामान्य हो गया था। पहले सिमर गोपी के सामने थोड़ा शरमाता था, लेकिन अब दोनों नॉर्मल हो गए थे। गोपी अपनी बड़ी बहन संदीप के घर आता-जाता रहता। उसका फूला हुआ पेट देखकर उसे जलन होती, लेकिन वह खुद को समझाता कि यह सब बहन के भले के लिए है। संदीप उसे चुप करवा देती—“तू इसमें मत बोल, ये हमारी आपस की बात है। सिमर को जीजा जितना सम्मान दे। मेरा घर बसाया है, मुझे खुशियाँ दे रहा है तेरा यार।”
कोमल का बर्थडे नवंबर में आने वाला था। उसने काफी सोच-विचार के बाद फैसला किया कि बर्थडे वाले दिन ही वह अपने छोटे भाई सिमर से अपनी सील तुड़वाएगी। उंगली से थक चुकी थी। घर का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। सिमर अब घर का मालिक था। पहले कुलवंत का ऑर्डर चलता था, अब सिमर की बात चलती थी। वह खुलकर मम्मी, डैडी और कोमल को डांट भी देता था। अपने पिता सज्जन सिंह की जुआ और शराब की आदत से बहुत नाराज था।
गाँव में लोग कहते थे कि सज्जन सिंह कुछ बोलता-करता नहीं, बस बीवी के नीचे रहता है। एक दिन रोटी खाते वक्त सज्जन किसी बात पर गुस्सा होकर कुलवंत को बुरा-भला कहने लगा। कोमल ने रोका तो वह कोमल को भी मारने दौड़ा। सिमर भड़क गया।
सिमर ने माँ से कहा—“इसे अंदर ले जाओ। मुझे बताने की जरूरत नहीं क्या करना है। रोटी बाद में खाएंगे, पहले माहौल ठीक करो।”
कुलवंत: हाँ पुत्तर, सही कहा। इसने कभी अच्छा काम नहीं किया। बस गलत रास्ते पर चलता है और गलत बोलता है।
सज्जन चुपचाप कमरे में चला गया। कुलवंत पीछे-पीछे गई। अंदर जाते ही कुलवंत ने कहा—“चप्पल निकालो बेड के नीचे से।” सज्जन खुद कपड़े उतारने लगा। उसे बीवी के गुस्से का अंदाजा था।
कुलवंत बेड पर बैठ गई। सज्जन चुपचाप उसकी गोद में लेट गया। कुलवंत ने उसकी गांड पर तबला बजाना शुरू कर दिया। बाहर डाइनिंग टेबल पर सिमर और कोमल हँस रहे थे।
कोमल: तूने तो बेचारे डैडी को कुटवा ही दिया।
सिमर: ले दीदी, ये बंदा ही ऐसा है। बिना बात गर्म हो जाता है। अब खाने दो।
दोनों कमरे के पास जाकर दरवाजे पर खड़े हो गए। सिमर ने कोमल को पीछे से गले लगाकर अंदर का नजारा देखा। कुलवंत अब जूती उठा चुकी थी और जोर-जोर से मार रही थी। सज्जन को बहुत शर्म आ रही थी कि बच्चे देख रहे हैं, लेकिन जूती ने सोचने-बोलने का मौका नहीं दिया।
10 मिनट जूती मारने के बाद कुलवंत ने जूती फेंक दी। सज्जन कोने में जाकर गांड मलने लगा। कुलवंत पानी पीने बाहर गई। कोमल ने दो तकिए बेड के बीच रख दिए।
कोमल: डैडी जी, आ जाओ लेट जाओ। जल्दी फिनिश करो, भूख बहुत लगी है।
सज्जन: सॉरी बेटा, बस बेल्ट रह गई। फिर रोटी खाते हैं।
कुलवंत वापस आई और बेल्ट फोल्ड करके जल्दी से काम खत्म किया। अब यह घर में आम बात हो गई थी। कई बार कुलवंत धमकाती—“बंदा बन जा, वरना अगली बार कोमल से कुटवाऊँगी।”
17 नवंबर आ गया—कोमल का बर्थडे। सिमर ने प्लान किया था, लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा था। आखिर उसने कोमल से ही पूछ लिया। रात को दोनों लेटे हुए थे। सिमर ने कोमल को पीछे से गले लगाया हुआ था। उसकी एक टांग कोमल के ऊपर थी।
कोमल: छोड़ ना, गर्मी लग रही है। चिपक गया है तू।
सिमर: सॉरी… मैं तेरे बर्थडे के बारे में सोच रहा था। इस बार क्या करें?
कोमल: इसमें सोचने वाली क्या है? मार्केट से समोसे, पकोड़े, ड्रिंक्स और केक ले आना। घर पर सबके साथ खाएंगे। गिफ्ट वाली फॉर्मेलिटी मुझे पसंद नहीं। जो मुझे चाहिए, वो मैं तेरी धोन पर टांग रखके ले लेती हूँ।
सिमर: हम्म… ठीक है। लास्ट ईयर से काफी चेंज आया है हममें। ये कहते हुए उसने अपना खड़ा लंड कोमल के चूतड़ों में फंसा दिया।
कोमल: हम्म… ये तो ठीक है, लेकिन ये डंग मेरी गांड में काट देगा।
सिमर: सॉरी… ये कहकर थोड़ा पीछे हटा।
कोमल: हेहे, तू मुझसे इतना डर क्यों जाता है? कॉलेज में सब तुझसे डरते हैं, और तू मुझे देखकर पिज्जी बिल्ली बन जाता है।
सिमर: पता नहीं… जब तू गुस्से से देखती है तो दिल जोर से धड़कने लगता है। दूसरा, तू छोटे से मेरा बहुत ख्याल रखती थी—मम्मी से भी ज्यादा।
कोमल: अच्छा-अच्छा, ज्यादा सेंटिमेंटल मत बन। सच्ची बता, मेरी उम्र 25 हो गई है। इस साल या अगले साल मम्मी-डैडी रिश्ता कर देंगे। मैं चाहती हूँ कि कल तू मेरी सील तोड़े।
सिमर आँखें फाड़कर: सच्ची? तुम मेरे साथ करना चाहती हो?
कोमल: हाँ… मेरा किसी से अफेयर नहीं है। हर लड़की चाहती है कि उसका पहला बार उसके प्यार वाला, उसका आशिक़ तोड़े। मेरा प्यार, मेरा आशिक़ तो तू है। इसलिए तेरे से बड़ा हकदार कौन?
सिमर: ले, शादी की बात कहाँ से आ गई? तू सील की बात कर रही है… जाओ, मैं कुछ नहीं करूँगा।
कोमल: हाँ पागल, कोई और लड़का तुझे घर बैठाई रखेगा सारी उम्र?
सिमर: सॉरी… फिर बता, कहाँ करना है? होटल में या घर में?
कोमल: बाहर चलते हैं होटल में। यहाँ सब मेरी चीखें सुन लेंगे।
सिमर: नहीं, तुझे चीखने नहीं दूँगा।
कोमल: मुझे पता है, इतना बड़ा लंड टांगों के बीच लटकाए फिरता है, क्या-क्या करेगा। चल, आज सो लेने दे। कल पूरी रात सोने नहीं देगा तू।
अगले दिन दोपहर 12 बजे सिमर कुलवंत के पास बैठा। माँ की गांड और पैरों से छेड़खानी करते हुए बोला—“डैडी कहाँ गए?”
कुलवंत: कुछ नहीं, स्कूल छुट्टी थी। बाहर गया होगा।
सिमर: मुझे कुछ पैसे चाहिए थे।
कुलवंत: अंदर पर्स से ले ले। ज्यादा चाहिए तो एटीएम कार्ड ले जाना। क्या बात है?
सिमर: कल दीदी का बर्थडे है। उन्हें बाहर लेके जाना है।
कुलवंत: ओह हाँ… सॉरी, भूल गई थी।
सिमर: वैसे एक बात और थी।
कुलवंत: बोल ना…
सिमर: मैं और दीदी होटल जा रहे हैं रूम में… मतलब तुम समझ गई ना?
कुलवंत: हाँ समझ गई। ये आइडिया किसका?
सिमर: दीदी का… मैंने कुछ नहीं कहा।
कुलवंत: ठीक है। लेकिन ध्यान रखना—तेरा लंड बहुत बड़ा और मोटा है। प्यार से करना। भले उम्र में बड़ी है, लेकिन सेक्स में कुछ नहीं किया उसने।
सिमर माँ के गाल चूमते हुए: हाहा, समझ गया। टेंशन मत लो।
शाम 8 बजे सिमर और कोमल कार लेकर होशियारपुर निकल गए। दोपहर में ही अच्छे होटल में रूम बुक कर लिया था।
सज्जन कुलवंत से पूछ रहा था—“ये दोनों कहाँ गए? कोमल बहुत तैयार होकर गई थी?”
कुलवंत हँसते हुए: तैयार तो होना था… थोड़ी लड़की ने पहली बार टाँगे खोलनी थीं। घबराओ मत, सिमर ही करेगा उसका उद्घाटन।
कोमल आज पूरी तरह आग बनकर तैयार थी। दोपहर में पार्लर जाकर वैक्सिंग करवा आई थी। शरीर पर एक भी बाल नहीं। ब्लू सलवार-सूट, मेहंदी, चूड़ियाँ—रास्ते में लड़के मुड़-मुड़कर देख रहे थे।
रूम में आते ही दोनों ने जूस ऑर्डर किया। कोमल को भूख लगी थी, लेकिन कुलवंत ने मना किया था—“थोड़ा खा, जब सिमर एक राउंड कर लेगा तब खा-पी लेना।”
दोनों आराम से टीवी देखने लगे। सिमर को कोई जल्दी नहीं थी। कोमल सिमर की छाती पर सिर रखकर लेटी थी। सिमर के हाथ उसके शरीर पर घूम रहे थे।
धीरे-धीरे उसने कोमल की कमीज उतारी और चूमने लगा। गाल चूमते हुए कोमल को अपने ऊपर लिटा लिया। कोमल बिना डरे अपना रस सिमर को पिला रही थी।
चूमते-चूसते दोनों को होश नहीं रहा। कोमल इतनी गर्म हो गई कि खुद पीछे हाथ करके ब्रा उतार दी। उसके स्तन परफेक्ट शेप में थे—कभी किसी ने छुआ नहीं था। पतली पैंटी सिमर से चिपकी हुई थी। सिमर ने स्तनों को मुंह में लेकर चूसना शुरू किया तो कोमल ने उसे जोर से गले लगा लिया।
सिमर नीचे जाता गया। निप्पल्स दाँत से खींचता, पेट पर जीभ फेरता। दाँत से सलवार का नाड़ा खींच दिया। कोमल से सब्र नहीं हो रहा था। वह गांड ऊपर करके सिमर के मुंह की तरफ कर रही थी। एक झटके में सिमर ने सलवार उतार फेंकी।
कोमल अब सिर्फ रेड पैंटी में थी। टाँगें आपस में घिस रही थीं। पैंटी पूरी गीली हो चुकी थी। सिमर हर अंग को पागलों की तरह चूम रहा था। कभी निप्पल्स चूसता, कभी गाल में गाल डालता।
फिर उसने कोमल के पैर उठाकर तलवे चाटे, उंगलियाँ मुंह में डालीं। कोमल ने पैर पीछे खींचा, लेकिन सिमर ने नहीं छोड़ा। ऐसे ही पैंटी भी उतार दी। पैंटी उठाकर चेहरे पर रखकर हँसा।
कोमल: क्या कर रहा है पागल? और खुद मम्मे मसल रहा है।
सिमर ने सारे कपड़े उतारे और बोला—“आजा दीदी, अब तू भी मेरे मुंह में डाल। मैं तेरी चूसता हूँ।” उसने 69 पोजीशन सेट की। कोमल ने सिमर का लंड हाथ में लिया—छोटे हाथों में मुश्किल से आ रहा था। पहले किस की, फिर चूसने लगी। सिमर उसकी गांड से जीभ फेरते हुए चूत तक जाता तो कोमल पागल हो जाती।
ठीक 12 बजने वाले थे। सिमर ने पोजीशन सेट की। कोमल की गांड के नीचे तकिया रखा, फुद्दी ऊपर की। बगलों से हाथ डालकर मोड़ा तो पकड़ लिया। कोमल ने सिमर का लंड पकड़कर अपनी चूत पर टिका दिया।
जैसे ही 12 बजे, सिमर ने जोरदार झटका मारा। लंड ने फाड़ते हुए आधा अंदर घुस गया। कोमल की जोरदार चीख गूँजी—“हायyyyyyyy ओउउउ हाय प्लीज सिमर बाहर निकाल! मेरी फट गई! हाय मेरी फुद्दी में बहुत दर्द हो रहा है! हाय मम्मी प्लीज पुत्तर!”
लेकिन लंड अपना काम पूरा किए बिना बाहर नहीं आता। सिमर रुका रहा। कोमल को शांत होने दिया। उसके चेहरे को पोंछता रहा। थोड़ी देर बाद कोमल की चूत से पानी निकला। सिमर उसी के साथ धीरे-धीरे झटके मारने लगा। जब कोमल मजा लेने लगी तो अगले 2-4 झटकों में पूरा लंड अंदर ठूंस दिया।
कोमल दर्द से बेहाल थी। एक बार तो आँखों के आगे अंधेरा आ गया, लेकिन सिमर के झटकों ने उसे फिर होश में ला दिया। मम्मी की बात याद आई—“पुत्तर, हौसला मत छोड़। पहली बार दर्द होता है, बाद में सब ठीक हो जाता है।”
अगले 30 मिनट सिमर ने पोज बदल-बदलकर कोमल की अच्छी खासी रेल बना दी। कोमल ने ऐसे पोज फिल्मों में भी नहीं देखे थे।
सबसे मुश्किल घोड़ी बनने पर हुआ। सिमर इतने तेज झटके मार रहा था कि कोमल की कमर दर्द करने लगी। लंड की सात चूत में पड़ती तो पूरे शरीर में दर्द की लहर दौड़ जाती।
आखिरी पोज में सिमर ने कोमल की टाँगें कंधों पर रखीं और सारा माल चूत में ही गिरा दिया। गर्म माल महसूस होते ही कोमल को सुकून मिला।
सिमर साइड में गिर पड़ा। कोमल का सिर छाती पर रख लिया। थोड़ी देर ऐसे लेटे रहे। सिमर बाथरूम गया, साफ किया। गर्म पानी से टॉवल गीला करके कोमल की टाँगों पर रखा और चेहरा साफ किया—रोते-रोते मेकअप फैल गया था।
कोमल: अब पाखंड करता है… पहले पता नहीं था इतना मोटा है। जब मेरी छोटी सी में फंसा दिया।
सिमर: हाहाहा… अब इतना दर्द तो होना ही था। गर्म पानी की सिकाई से सब ठीक हो जाएगा।
कुछ देर बाद कोमल को अच्छा लगा तो वह बाथरूम गई। पेशाब करते वक्त जलन हुई। चाल में लंगड़ापन था, टाँगें फैलाकर चल रही थी।
अगले दिन चेकआउट से पहले सिमर ने 4 बार और चोदा। कोमल के लिए यह पूरा सुहागरात जैसा था। होटल से निकलते वक्त उसकी बदली चाल देखकर वेटर और रिसेप्शन की लड़की मुस्कुराई।
घर आकर किसी ने कुछ नहीं कहा—न कुलवंत ने, न सज्जन ने। अब सिमर की मौज थी। जब मन करता कोमल को नंगा कर लेता, जब मन करता मम्मी-डैडी के कमरे में जाकर माँ को पिता के सामने नंगा कर लेता।
Chalo acha hai Apni behen Komal ki bhi chut pehli baar hero ne hi maari hai aur ab mauj hi mauj hai hero ki
 

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घर आकर किसी ने कुछ नहीं कहा—न कुलवंत ने, न सज्जन ने। अब सिमर की मौज थी। जब मन करता कोमल को नंगा कर लेता, जब मन करता मम्मी-डैडी के कमरे में जाकर माँ को पिता के सामने नंगा कर लेता।

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अगले एक साल तक सिमर ने अपनी बहन कोमल को पूरी राज़ी-खुशी से चोदा। कोमल का शरीर अब पूरी तरह बदल चुका था। सिमर उसे अपनी बीवी की तरह रखता था और रोकने वाला घर में कोई नहीं था। कोमल को भी कोई एतराज़ नहीं था। वह अपने छोटे भाई से इतना प्यार करती थी कि जो सिमर कहता, वही करती। वह अब सिमर के साथ ठीक वैसी रहती जैसे कोई घरवाली रहती है। मम्मी-डैडी भी दोनों को कुछ नहीं कहते थे। दोपहर की रोटी खाने के बाद बेटी के कमरे से आने वाली आवाज़ें अब सज्जन सिंह को परेशान नहीं करती थीं।
यहाँ तक कि जब सिमर ने पहली बार कोमल की गांड में लंड डाला था, तो दर्द इतना हुआ था कि उसकी पॉटी निकल गई थी, लेकिन फिर भी सेक्स के मामले में कोमल ने कभी सिमर को मना नहीं किया। लेकिन एक बात और थी—अब कोमल का सिमर पर कंट्रोल पहले से कहीं ज्यादा हो गया था।
पहले सिमर कॉलेज में लड़ाई-झगड़ों में टॉप पर रहता था और पढ़ाई में डिपार्टमेंट में 33वें नंबर पर था। अब पढ़ाई में उसका नंबर 50-60 तक पहुँच गया था। यह सब कोमल के हाथ और उसकी जूती का कमाल था। कुलवंत कौर भी हैरान थी कि सिमर की पढ़ाई में इतनी प्रोग्रेस कैसे आई, क्योंकि उसे पता नहीं था कि कोमल अब सिमर के साथ उससे भी ज्यादा सख्त हो गई है। कोई भी गलती होने पर सिमर अपनी बहन की नंगी टांगों पर पीठ लिटाकर लेट जाता था।
एक दिन की बात है। सिमर जब घर आया तो पता चला कि आज फिर किसी से लड़ाई हुई है। कपड़े फटे हुए थे और मुँह लाल हो रहा था।
कुलवंत कौर ने जैसे हमेशा गुस्से में पूछा, लेकिन कोमल ने बीच में टोक दिया और सिमर की तरफ मुड़कर बोली:
“तू कमरे में जा के वेट कर। मेरी बेहतर है तेरे लिए। चल, तित्तर हो जा यहाँ से।”
सिमर को पता था इसका मतलब क्या है। मुँह लटकाकर बोला:
“प्लीज रहने दो ना आज… आगे से नहीं करूँगा, प्रॉमिस करता हूँ पक्का।”
कोमल गुस्से में: “जो कहा सुनता नहीं? तुझे पता है ना मेरा?”
कुलवंत: “क्या हुआ? इसका रंग क्यों उड़ गया कमरे में जाने का नाम सुनके?”
कोमल ने चुटकी मारते हुए सिमर को कमरे की तरफ इशारा किया। सिमर चुपचाप चल पड़ा। वह अपनी बहन को मना भी नहीं कर सकता था। एक-दो बार कोशिश की थी, रिजल्ट ये निकला कि कोमल उसे हाथ भी नहीं लगाने देती थी—सेक्स तो दूर की बात। बातचीत भी बंद कर देती थी। सिमर बेचारा कोमल के इस इमोशनल ब्लैकमेल में फँस गया था।
कोमल ने माँ से कहा:
“रंग तो उड़ाया सिमर का। तुम जब से इसके साथ फिजिकल रिलेशनशिप में हो, तुम कुछ कहती नहीं। इसकी ऐसी लड़ाइयाँ दिन-ब-दिन बढ़ गई थीं। ऊपर से फेल होने लगा था तो तुम्हारी जिम्मेदारी मैंने संभाल ली…”
कुलवंत: “सच्ची…? हम्म, अब समझी इसमें इतनी इम्प्रूवमेंट कैसे आई। लेकिन ये मान कैसे गया?”
कोमल: “बस मना लिया। चलो, मैं चलती हूँ। वो मेरा वेट कर रहा होगा। रोटी बना लीजियो, मुझे टाइम लग जाएगा।” (आँख मारते हुए)
कुलवंत: “कर लूँगी। जा तू…”
कमरे में जैसे ही कोमल आई, सिमर हर बार की तरह नंगा कोने में कान पकड़कर खड़ा था। कोमल के पैरों की आवाज़ सुनते ही पता चल गया था। फिर कोमल के कपड़े उतारने की आवाज़ आई—क्योंकि जब भी कोमल सजा देती, तो खुद भी नंगी हो जाती थी।
कोमल: “सिमर, आ जा…”
सिमर मुड़ा तो अपनी प्यारी बहन को नंगी देखकर मुँह में पानी आ गया। लंड तो पहले से ही खड़ा था।
सिमर: “दीदी, रहने दो ना प्लीज… आगे से नहीं करूँगा गलती।” (कान अभी भी पकड़े हुए)
कोमल: “ओके, रहने देती हूँ। नहीं मारती। लेकिन सच-सच मेरी बात का जवाब दे। गलती तेरी थी लड़ाई में? तू जानबूझकर पंगा लिया था उनसे?”
“खुद बता दे सच मुझे। अगर तू झूठ भी बोलेगा तो मैं खेत चेक करने जाऊँगी वहाँ? तुझे क्या लगता है, मुझे मजा आता है तुझे मारके? खुद सोच—तेरे किए से अगर लड़ाई में कुछ हो गया तो…”
सिमर चुपचाप खड़ा रहा। उसके पास जवाब नहीं था। भले सेक्स में वह बहुत एक्सपीरियंस्ड हो गया था, लेकिन हाँ तो अभी भी 19 साल का बच्चा ही था।
कोमल: “अब बोलता नहीं? दे जवाब तो। चला जा बाहर और जब मूड हो तब आना मजे करने, मेरे छोटे वीर।” (शैतानी अंदाज़ में)
सिमर बिना कुछ बोले अपनी बहन की गोद में लेट गया। लंड पूरा खड़ा था, जिसे कोमल ने अपनी टांगों में ले लिया। अब सिमर की पीठ पूरी तरह टारगेट पर थी।
कोमल ने धीरे-धीरे हल्के थप्पड़ों से शुरुआत की। अब उसके हाथ काफी हार्ड हो चुके थे—क्योंकि सिमर अपनी सजा का बदला बहन से घर में एक्सरसाइज करवाकर लेता था। खुद जिम जाता और कोमल से घर में डंड-बैठक मरवाता।
करीब 5 मिनट मारने के बाद कोमल ने नीचे देखा तो गलत जूती पहनी थी—वह जूती जिससे वह सिमर को नहीं मारती थी।
कोमल: “औच, सॉरी सिमर… मैं जूती लाना भूल गई। वो मम्मी ले गई थी डैडी पर यूज़ करने के लिए लास्ट वीक। मैं वापस लेना भूल गई। प्लीज ले आ मम्मी से।”
सिमर पीठ मलता हुआ उठा और बाहर आ गया। पीठ से सेंक निकल रही थी।
मम्मी अपने कमरे में टीवी देख रही थी। सिमर को नंगा, एक हाथ आँखों पर और दूसरे से पीठ मलता देखकर बोली:
“आ गया तू बड़ी जल्दी। फ्री करता है तेरे को। कोमल ने… मैं होती तो तेरी चंगी खबर लेती। लेकिन पता नहीं क्यों, तेरे से फुद्दी मरवा के बाद अब तेरे को सजा देने का दिल नहीं करता।”
सिमर आगे होकर माँ को हग कर लिया और गाल पर किस करते हुए बोला:
“आज कहाँ चढ़े हो तुम? सजा वाली जूती ले आए थे, वो लेने आया मैं।”
कुलवंत: “ओह हाँ, सच। तेरे डैडी के लिए लेके आई थी। देख, मेरे ब्रा-पैंटी वाले ड्रॉअर में पड़ी होगी।”
वह स्पेशल जूती थी—पैरों के तलवे और पीठ पर ज्यादा असर करती थी। कुलवंत को अपने पुत्तर के लिए बुरा लग रहा था, लेकिन पता था यह सब उसके भले के लिए है। अगर सख्त न हुईं तो बाकी लड़कों की तरह यह भी बिगड़ जाएगा।
कमरे में वापस जाकर सिमर ने लेदर वाली जूती कोमल को दी और फिर से बहन के नंगे पट्टे पर लेट गया। कोमल ने फिर 5-7 थप्पड़ मारे, फिर जूती से गांड रेडी करके अगले 15 मिनट पूरी जान से बेदर्दी दिखाते हुए लगातार कुटाई की। सिमर खुलकर रोने लगा—दर्द से भी और शर्म से भी। पहले कोमल सिर्फ बहन थी, अब वाइफ जैसी भी थी जिसके साथ वह सोता था।
जब कोमल ने खत्म किया तो वह खुद भी रोने लगी थी। सिमर की पीठ पर उसके आँसू गिरने लगे थे, लेकिन वह नहीं रुकी। रुकने के बाद सिमर को महसूस हुआ कि बहन भी रो रही है।
सिमर उठा और हँसाने के लिए बंदर की तरह गांड मलता हुआ कमरे में कूदने लगा। कोमल हँसने लगी तो सिमर ने उसे खड़ा करके हग कर लिया।
सिमर: “ले दीदी, तुम भी हद करते हो। कुटते हो मुझे, फिर खुद रोने लग जाते हो। ये क्या बात हुई?”
कोमल: “फिर क्यों ऐसे काम करता है कि मुझे ये सब करना पड़े… चल छोड़ अब। सजा के बाद फिर वही टॉपिक छेड़ के क्या फायदा।”
यह कहकर कोमल सिमर की टांगों में बैठ गई और उसके ढीले पड़े लंड को मुँह में डाल लिया। पहले लंड खड़ा था, लेकिन मार पड़ने के बाद ढीला हो गया था।
कोमल की गर्म-गर्म जीभ से कुछ ही पलों में लंड फिर खड़ा हो गया। कोमल एक हाथ से टट्टों पर पोले-पोले हाथ फेरती हुई तेज़ी से मुँह आगे-पीछे करने लगी। सिमर से कंट्रोल नहीं हुआ और उसने सारा माल कोमल के मुँह में ही गिरा दिया।
कोमल सारा माल गटककर बोली: “चल अब थोड़ी देर पढ़ ले।” यह कहकर नंगी ही गांड मटकाती बाथरूम में चली गई।
अपनी बहन के हिलते चूतड़ देख सिमर का दिल जोर से धड़का, लेकिन फिर भी उसने तकिया कुर्सी पर रखकर पढ़ना शुरू कर दिया।
कोमल और सिमर के प्यार का असर कोमल के शरीर पर भी दिखने लगा था। ब्रा 32 से 34 हो गई थी, चूतड़ फैल गए थे, पट्टे गोल-मटोल और मोटे हो गए थे। सिमर ने अपनी पतली बहन का शरीर भर दिया था। ऐसा कोई दिन नहीं होता था कि सिमर उसे चोदे बिना सोता। हर रात उसकी टाँगें भाई के कंधों पर हिलती रहतीं। भले सिमर मम्मी को भी चोदता था, लेकिन कोमल का पूरा ख्याल रखता था।
कुलवंत कई बार सिमर से कह चुकी थी कि कोमल के साथ कम कर दे, क्योंकि पड़ोस की औरतें गॉसिप करती थीं कि कोमल का शरीर वैसी औरतों जैसा हो रहा है। अब कुलवंत को बेटी की फिक्र होने लगी थी। वह जल्दी से अच्छा लड़का देखकर कोमल का विवाह करवाना चाहती थी।
एक अच्छा लड़का खेत में जल्दी मिल जाता। कोमल सुंदर-सुशील थी और अब पहले जैसी मारियल भी नहीं रही थी। एक साल में सिमर ने और निखार दिया था—शरीर सही जगह पर भरा हुआ था।
जब भी कोमल के विवाह की बात होती, सिमर का मुँह उतर जाता, लेकिन कोमल समझाने पर मान जाता। कोमल हमेशा कहती: “तेरा हक कोई नहीं ले सकता। मैं दूर नहीं करवाऊँगी विवाह। लगे ही करवाऊँगी ताकि तू घेड़ा मारता रहे घर।”
उधर दिलप्रीत भी गाँव वापस आई थी। उसका घरवाला किसी काम से बाहर गया था, तो वह गाँव आ गई। उसी शाम सिमर ने हैप्पी को फोन करके दिलप्रीत को मिलने बुला लिया।
सिमर ने काफी दिनों बाद दिलप्रीत को देखा। एक बार तो पहचान ही नहीं पाया। शरीर गुदवा हो गया था। सिमर को यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही लड़की है जिसकी उसने सील तोड़ी थी।
सिमर: “बाले मेरी जान, तू तो बिल्कुल बदल गई। कितनी निखर गई है तू। शरीर भी सही जगह से भरा हुआ अब तो।”
दिलप्रीत: “हेहे… बस ऐसे ही है। ये बात तुझे पता होनी चाहिए थी बुद्धू। राम के विवाह के बाद लड़की का शरीर बदल जाता है। हिप्स भरे हो जाते हैं, फैल जाते हैं। ब्रा का साइज भी बदल जाता है। पट्टे और गुदवे हो जाते हैं मेरे भोले मदारी।”
सिमर: “हाहाहा… ये तो मुझे पता है कि लड़की बदल जाती है, लेकिन तू तो कितनी निखर गई है। साली, तुझे गालियाँ आती भूल गई? तेरी सील मैंने ही तोड़ी थी।”
दिलप्रीत: “क्यों गुस्सा करता है? मैं कुछ नहीं भूली। जो भूली होती तो तेरे को मिलने क्यों आती? दूसरी बात—तेरे पास मेरा नंबर भी तो होगा। तू सीधा मुझे फोन क्यों नहीं किया? हैप्पी वीर जी को क्यों फोन किया?”
यह कहकर दिलप्रीत ने सलवार का नाड़ा खोला, कच्छी सलवार के साथ उतारकर साइड रख दी। कमीज और ब्रा तो सिमर ने आते ही उतार दी थी। दोनों टाँगें सिमर के आसपास करके गोद में बैठ गई।
सिमर: “ओह बस उसका ही किया था—तेरे भाई को तंग करने के लिए। दूसरा कोई शक मत कर, पंगा पाएगी।”
दिलप्रीत: “हाँ, बात तो तेरी सही है। वैसे भी हैप्पी पाजी से क्यों डरना? भाभी बताती थी कि तू हैप्पी के सामने ही चोदता है उसे और पाजी से चूपे भी मारवाए।”
सिमर मजे से उसके मम्मे मसलता, गाल का रस पीने लगा। निप्पल्स मसलता, नंगे शरीर से खेलने लगा।
काफी देर मम्मे चूसने के बाद सिमर ने दिलप्रीत को लिटाया और गोरे पट्टों को चूमने लगा। चूमते-चूमते उसकी फुद्दी गौर से देखने लगा।
सिमर: “तेरे नीचे वाले गाल कितने फैल गए हैं। बाहर निकल गए हैं जैसे गुलाब के फूल की पंखुड़ियाँ।”
दिलप्रीत: “हाँ, ये तो होना ही था। मेरा घरवाला पुलिस वाला है। तुझे पता है पुलिस वाले ऐसे ही होते हैं। रोज़ तो नहीं करता मुझे नंगी, क्योंकि पता नहीं कब ड्यूटी पर बड़े साहब के साथ बाहर जाना पड़े। लेकिन जब घर होता है, न खुद सोता है न मुझे सोने देता।”
सिमर: “हाहाहा… ठीक है। फिर तो अच्छी बात है—लंड की कमी नहीं। वैसे तेरी ढीली फुद्दी और गांड देखकर पता नहीं लगा उसे कि तू पहले मरवा चुकी है?”
दिलप्रीत: “तेरा घोड़े जैसा लंड है, पता तो लगना ही था। लेकिन मैंने पहले ही बता दिया था—विवाह से 10 दिन पहले। साफ बोल दिया कि मैं अपने बॉयफ्रेंड के साथ सब कर चुकी हूँ। कोई भूल्का न रखे दिल-दिमाग में। वो बोला—कोई बात नहीं, मुझे कोई एतराज़ नहीं।”
सिमर: “हाँ, फिर तो बंदा ठीक है तेरा।”
दिलप्रीत: “चल, उसकी तरफदारी बंद कर। साथ मार। कितनी देर ऐसे नंगी रखेगा? मेरी फुद्दी से पानी निकल-निकल पट्टे गीले हो गए हैं।”
सिमर ने टाँगें कंधों पर रखीं और एक झटके में लंड फुद्दी में डाल दिया। दिलप्रीत की फुद्दी पहले से खुली लगी, लेकिन फिर भी मजेदार थी। कुछ देर ऐसे मारने के बाद सिमर ने उसे घोड़ी बनाया और झटका मारा—निशाना फुद्दी नहीं, गांड था।
दिलप्रीत: “हायyyy मैं मर गई मम्मी! अह्ह्ह्ह सी… क्या करता है? बता तो देता गांड में डालने से पहले! हाय ओउउउईईई।”
सिमर हँसता हुआ गांड पर थप्पड़ मारकर भवा पीछे कर, फाड़कर जोर-जोर से चोदने लगा। कभी फुद्दी, कभी गांड—मारते-मारते सारा माल फुद्दी में ही गिरा दिया।
थोड़ी देर रेस्ट के बाद दिलप्रीत ने कपड़े पहने और सिमर के ऊपर लेटकर बोली:
“एक बात करनी थी तेरे से। गुस्सा न करना।”
सिमर: “हाहा… बोल। तेरी बात पर कभी गुस्सा किया?”
दिलप्रीत: “मुझे पता लगा तुम कोमल दीदी का रिश्ता ढूँढ रहे हो?”
सिमर: “हाँ, ढूँढ रहे हैं। लेकिन कोई अच्छा लड़का मिल नहीं रहा अभी।”
दिलप्रीत: “जो कहे तो तेरी बहन का रिश्ता मैं मनजीत दीदी के लड़के यानी अमन के साथ करवा सकती हूँ। वो तो तेरी बहन पर लट्टू हुआ फिरता है। घर में कलेश डाला था कि मेरा विवाह की बात करो तुम्हारे घर…”
सिमर दिलप्रीत को खड़ा करते हुए: “तेरा दिमाग सेट है? वो अभी 21-22 साल का है। नाले अभी वैहला है—ना कोई काम, ना कार…”
दिलप्रीत: “नहीं-नहीं, ऐसे की बात नहीं। वो अब काम करता है। जमीन-वाड़ों की। डेयरी फार्म खोला हुआ है। बड़े अच्छे पैसे बना लेता है…”
सिमर: “यार, तुझे तो पता है मैं उसकी बहन तनवीर की भी सील तोड़ी थी। ये बात तेरे जीजा और दीदी दोनों को पता है। अब मेरी बहन का रिश्ता उसके साथ अच्छा लगेगा…?”
दिलप्रीत: “ऐसे फालतू न सोचा कर। जो तू उसकी बहन चोद चुका है, अब वो तेरी चोद लेगा तो क्या हुआ? सियाना बन। देख, तेरे को भी फायदा—हमारे घर में एंट्री मिल जाएगी। बहन घर तो तू जाता ही करता है। भाभी, मैं, तनवीर और मनजीत दीदी—चारों औरतें तेरे नीचे लेटी पड़ी करेंगी। तू अपनी बहन नहीं चुदवा सकता अमन से? वो भी विवाह करवा के। इतना भोला मत बन—मुझे पता है तेरा बहन के साथ भी टांका फिट है।”
सिमर: “तेरे को कैसे पता?”
दिलप्रीत: “इस बार आई तो लगा। कोमल बाहर तो जाती नहीं कहीं। शरीर देखा—मेरे से भी दो कदम आगे। मतलब तूने खोल दिया अपनी बहन का।”
सिमर: “चल ठीक है। मैं मम्मी को बता दूँगा। लेकिन तेरे घरवाले की बहन भी मैं चोदनी है।”
दिलप्रीत सिमर को बाहों में लेते हुए: “हरामजादे कुत्ते… कितना बड़ा कमीना है मेरे तबार की। इतनी चोद ली, अभी भी आँख है तेरी…”
यह कहकर दोनों अपने-अपने घर चले गए। सिमर खुश था—क्योंकि मिंटू, मनजीत और तनु तीनों पर उसका कंट्रोल था। दिलप्रीत भी अपने यार से मिलकर खुश थी, भले यार ने सूखी गांड मारकर उसकी चाल बिगाड़ दी थी और वह फिर से हल्की लंगड़ाती चल रही थी।
Chalo acha hai hero ki bhi nayi chut mil jayegi aur uski behen bhi shadi ke baad paas me hi rahegi
 

Abhishek Kumar98

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♣️ Update 13 ♣️

घर आकर सिमर काफी देर तक सोचता रहा। फिर अपनी बहन की खुशी के लिए वह तैयार भी हो गया। लेकिन समस्या यह थी कि लड़के की उम्र अभी 22 साल चल रही थी और कोमल की 26वीं चल रही थी। वैसे तो 3-4 साल का फर्क ज्यादा नहीं माना जाता, लेकिन यह लड़के के लिए होता है ज्यादातर। लड़की हमेशा लड़के से छोटी होती है। आखिरकार उसने अपनी मम्मी से सीधी बात करना ही बेहतर समझा...

कुलवंत कौर और सज्जन सिंह भी जल्दी ही मान गए कि हाँ, परिवार ठीक है, विवाह करने में कोई समस्या नहीं। कोमल भी यह सब दरवाजे के पास खड़ी सुन रही थी।

कोमल और सिमर ऐसे ही लेटे पड़े थे रात में तो कोमल बोली—

“तू तो बड़ा खुश होना चाहिए अब।”

सिमर: “क्यों? क्या गल हो गई...”

कोमल: “तू मेरी होने वाली ननद को मेरे ससुर के सामने चोद चुका है, मेरी सास भी तेरे तले लेटने को फिरती है और मुझे तो तूने चोद-चोदकर देख क्या बना दिया—सूखी-सी थी साल भर में इतना शरीर भर गया जैसे पता नहीं कितनी बार चुद गई हो...”

सिमर: “ले दीदी, तू खुश नहीं वै? ”

कोमल: “हा हा मैं भी खुश हाँ। अच्छी फैमिली है। लड़के को भी मैंने देखा है—स्मार्ट है, देखने में। बाकी जो तुझे सबको पसंद है तो मुझे क्या एतराज़ हो सकता है। क्योंकि खासम तो तू ही रहेगा मेरा। दुनिया की नजर में बस वो होगा। तू जब चाहे मेरे ऊपर चढ़ सकता है...”

सिमर ने अपनी बहन के नाले को खींचते हुए कहा—

“चल ना, मैं तुझे आज भी नहीं छोड़ता। चलो, आज थोड़ी एक्सरसाइज करवाता हूँ।”

यह कहकर सिमर ने अपना लंड बाहर निकाल लिया...

कोमल एक्सरसाइज के नाम से ही घबरा जाती थी... आगे भी सिमर आप तो आराम से तले लेट जाता और कोमल को लंड ऊपर तपाने के लिए बोल देता। लंड पर तपते-तपते कोमल के पट्टे फूल जाते, बहुत थक जाती वह...

हर रात की तरह आज भी कोमल सुबह 3 बजे सोई। अब तो आदत पड़ गई थी उसकी इस सब की... पहले दिनों की तरह अब सारी रात चुदाई के बाद उसकी टाँगें नहीं काँपती थीं। नहीं तो पहले तो सुबह सारी रात चुदाई के बाद उसकी टाँगें भर नहीं झलकती थीं...

दूसरी तरफ अमन भी बहुत खुश था। जब दिलप्रीत ने फोन करके उन्हें बताया कि सिमर और उनके घर वाले विवाह के लिए मान गए हैं, उन्हें कोई एतराज़ नहीं और जल्दी ही घर बात करने आएंगे।

लेकिन जसप्रीत (उसकी माँ) के मन में अभी भी थोड़ा डर था क्योंकि सिमर को ऐसे उनके घर आने की कुल मिल जाएगी... और उसे सिमर का पता था कि वो लड़का सेक्स के मामले में कितना पागल है। तनु को जितना वो ठोकता था, उसे पता था कि एक बार उसके लड़के का विवाह सिमर की बहन से हो गया तो वो दोनों माँ-बेटी को नहीं छोड़ेगा...

यही बातें दोनों माँ-बेटी कर रही थीं...

जसप्रीत: “क्या करूँ इस लड़के का? एक लड़की पीछे पागल फिरता है। इसे पता ही नहीं कि इसका होने वाला साला क्या चीज है...”

तनु: “ले जी, पता होता तो वो मुसीबत की बहन को अपनी घरवाली बनाने का न सोचता। हे हे... उसकी बहन हमारे अमन तले और हम दोनों माँ-बेटी हे हे हे... समझ गई...

वैसे एक बात कहूँ मम्मी, गुस्सा न करना...”

जसप्रीत: “तेरी किस बात का गुस्सा...”

तनु: “दिलप्रीत का फोन आया था। उसने मेरे साथ बात शेयर की थी। कहती आगे न करूँ लेकिन तुम्हारे साथ तो कोई बात नहीं। इसलिए बता रही हूँ। दिलप्रीत कह रही थी—सिमर ने पिछले 1-2 साल से अपनी बहन कोमल को भी टिक्का रखा हुआ है...”

जसप्रीत: “हााँ सच्ची...? वैसे इसमें बड़ी बात भी नहीं क्योंकि वो लड़का मैंने देखा है—पूरा पागल है सेक्स पीछे...”

तनु: “हाँ, बता रही थी दिलप्रीत। कह रही थी कोमल को तो पूरी तरह बदलकर रख दिया उसने...”

जसप्रीत: “हे हे हे... वो तो बदलनी ही थी। जब इतना बड़ा किल्ला जैसा लंड रोज़ फिरता...

चल कोई नहीं। कर लेंगे। उनके घर जाकर हमारे लिए अच्छा रहेगा। जब मर्जी आए कर आया करो बहन के घर।”

यह कहकर आँख मार दी। जसप्रीत भी हँस पड़ी।

तनु: “हे हे हे... तुम्हारा भी दिल करता होगा उसके तले लेटने का...”

जसप्रीत: “पहले नहीं करता था क्योंकि तेरा पापा ही हफ्ते में 3-4 बार मेरे खेत में पानी लगा जाता था। लेकिन पता नहीं क्यों अब नया करने को दिल करता है। उस दिन जब तेरे ऊपर और मनजीत ऊपर सिमर चढ़ा था, मेरा भी दिल आ गया...”

तनु ने अपनी माँ को जकड़ते हुए: “तो कर लाओ। तुम्हें क्या डर है? किसी ने कुछ कहना? डैडी तो आजकल वैसे भी तुम्हारी टाँगों तले हैं...”

जसप्रीत: “हाँ, जिस दिन अमन के रिश्ते की बात करने जाएँगे, उस दिन मैं वहीं रुक जाऊँगी... अगर तुझे भी रुकना हो तो तू भी रुक जाना। इकट्ठे कर लिया...”

तनु: “नहीं, पहले तुम 1-2 बार अकेले मजा लो। अपना रास्ता तो चोरा करवाओ। वैसे पता है न उसका कितना मोटा है। इसलिए एडजस्ट होने में टाइम लगेगा तुम्हें...”

ऐसे ही दोनों की बातें चलती रहीं और बाद में दोनों अपने-अपने काम-काज में लग गईं...

दूसरी तरफ दिलप्रीत अपने ससुराल वापस चली गई थी। रात की रोटी खाकर दोनों लेटे पड़े थे...

परदीप (दिलप्रीत का घरवाला): “किधर हो गई पिंडो मिल आई यारों को...”

दिलप्रीत हँसते हुए: “हाँ मिल आई अपने यारों को। क्यों, तुम भी मिलना...”

परदीप: “हाँ साली बेशर्म, कैसे बोलती है? देखी सच्ची तो नहीं कर आई कोई कांड...”

दिलप्रीत ने अपनी पजामा और पैंटी उतार साइड रख दी और टाँगें खोलते हुए: “पहले इधर आओ अपनी ड्यूटी पर, फिर बताती हूँ...”

परदीप: “सच्ची दे आई पिंड अपने उसी मिस्टिरियस यार को?”

दिलप्रीत ने अपने घरवाले का सिर टाँगों में घुसेड़ते हुए: “आहो... उसके साथ कोई जरूरी बात करनी थी इसलिए मिलने गई थी। ये तो तुम्हें पता ही है—यार को मिलने गई हो तो कोई लड़की बिना वजह तो अगले को जान नहीं देती। नंगी तो करनी ही है...”

परदीप ने सिर पर हाथ मारते हुए: “हाय रब्बा... घस्ती पाले पे गई मेरे। कैसे अपनी यार की तारीफ अपने घरवाले के आगे कर रही है...”

यह कहकर वह एक बार अपनी घरवाली की फुद्दी को गौर से देखता हुआ फिर चाटने लगा...

दोनों ऐसे ही खुलकर बात करते थे क्योंकि कभी भी दोनों ने एक-दूसरे से कुछ नहीं छुपाया था... परदीप भी आजकल के मॉडर्न ख्यालों वाला लड़का था इसलिए कोई गुस्सा नहीं करता था क्योंकि वह खुद भी अब तक काफी लड़कियों को चोद चुका था।

दिलप्रीत: “अच्छा मैं घस्ती हूँ? लगता है तुम्हें घस्ती बनकर दिखाना पड़ेगा...”

परदीप: “ओ नहीं-नहीं मेरी माँ... क्यों गुस्सा करती हो? मैं तो मजाक कर रहा था।”

यह कहकर उसने दिलप्रीत के गोरे पट्टे को चूम लिया...

दिलप्रीत: “आज मेरा मूड ठीक नहीं है। पता ही है मेरा तुम्हें...”

परदीप: “थैंक्यू मैडम जी। इतना तो वादे साब आ जाने नहीं देते। मैं जितना तेरा डर है मुझे हँसते-हँसते भी बंड फाड़ देनी है। हमारे पुलिस वाले से ज्यादा तो तू कुटती है मुझे। कहाँ से सीखा ये सब? कितनी बार पूछा तुझे, तू बताती नहीं...”

दिलप्रीत: “उसी ने सिखाया था जिसने आगे-पीछे का उद्घाटन किया था...”

परदीप: “बड़ा खतरनाक बंदा वैसे तो फिर... बीसी उस दिन एस.एच.ओ साब भी पूछ बैठे—क्या हुआ तुझे? कुर्सी पर क्यों हिली जा रही है इधर-उधर... अब मैं क्या बताऊँ कि दारू पीकर घर गया था तो कुट पड़ी...”

दिलप्रीत: “हे हे हे... खीने कहा था दफन नू हा मान लिया कि थोड़ी बहुत पी ली है। थोड़ा टुन होकर घर आ जाओ फिर घर के खरोद पाओ।”

परदीप: “तेनू वैसे एक बात का पता?”

दिलप्रीत: “कौन सी बात का?”

परदीप: “भले मैंने तुझे विवाह से पहले ही सब सच-सच बता दिया था, लेकिन फिर भी मुझे यकीन नहीं था। सोचा—चलो बॉयफ्रेंड था, 2-4 बार कर लिया तो क्या हुआ। मैं तो सारा तेल लेकर आया था रूम में। लेकिन जब पहली रात तुझे नंगी किया, तले देखा—बहनचोद तुझे तो चोद-चोदकर खिला दिया पूरी उसने...”

दिलप्रीत: “चलो बस करो अब। क्यों सोचते हो? तुम्हारी किस्मत में थी मैं तुम्हें मिल गई। और मैंने तुम्हें कभी रोका दूसरी औरतों के साथ करने से... चलो अब आ जाओ। और कितनी देर चूसनी है मेरी... तुम जो अपना लॉलीपॉप चुसवाना तो बता दो। नहीं तो आओ मारो सात...”

परदीप: “नहीं तेरी गल्लां नाल अलरेडी मेरा लंड फटान ते आया। तेरे मुँह की गर्मी ने इसे पिघला देना एक मिनट में...

चलो जिदा तेरा दिल करदा।”

यह कहकर दिलप्रीत ने अपनी टाँगें अपने घरवाले के कंधों पर रख लीं। अगले ही पल उसकी फुद्दी में मजेदार लहर भर गई जब लंड एक घसे में पूरा अंदर चला गया... भले लंड सिमर जितना मोटा नहीं था लेकिन फिर भी बुरा नहीं था। दोनों काफी देर लगे रहे। पोज बदल-बदलकर परदीप अपनी पूरी ड्यूटी निभा रहा था और आखिर में उसने अपना सारा पानी दिलप्रीत की फुद्दी में ही छोड़ दिया और साइड में गिर पड़ा।

परदीप ने दिलप्रीत की फुद्दी को टिशू पेपर से साफ करके उसे अपने ऊपर लेटाते हुए: “जो मर्जी हो जाए लेकिन तू मजा बहुत देती है। शर्म-वेगरा वाला काम बेडरूम के बाहर अच्छा लगता है, हसबैंड-वाइफ में नहीं...”

दिलप्रीत ने माथे से पसीना साफ करते हुए: “हे हे हे... थैंक्यू हसबैंड। आगे तो फुद्दी में आग लगी हुई थी। पता नहीं क्या-क्या बोल जाती थी। मैं तुम्हें गुस्सा तो नहीं लगा मेरी गल्लों का?”

परदीप: “नहीं-नहीं गुस्सा नहीं। हाँ जलन तो होती है कि ये सोचकर मेरी जनानी पर कोई बेगाना पुट भी चढ़ता है। लेकिन हाँ गुस्सा नहीं आता। ये बात पक्की है... कई बार दिल में आता है कि तुझे और तेरे यार को मजा करते देखूँ क्योंकि इतना टाइम हो गया विवाह को, इतना तुझे चोदा आगे-पीछे। तूने कभी मना नहीं किया भले दिन हो या रात... फिर सोचा तू गुस्सा न कर जाए...”

दिलप्रीत: “अच्छा जी फिर तो ठीक है। अगर गुस्सा नहीं करते तो अब जो तुम सादी बेशर्म वाली कैटेगरी में आ ही गए हो तो तुम्हें राज की बात दस ही देनी है। तुम्हारी बड़ी बहन भी मेरे यार तले पड़ती है...”

परदीप: “क्या? कौन सी बड़ी बहन? मतलब मनजीत दीदी? नहीं-नहीं यार वो तो कितनी सिंपल है। मॉडर्न नहीं, शरीफ है, डीसेंट है... कितनी...”

दिलप्रीत: “हे हे हे... अपनी बहन सबको शरीफ ही लगती है। मेरी भाभी है। मेरे से ज्यादा नहीं जानते तुम...”

परदीप: “नहीं ऐसी बात नहीं। लेकिन यार वो कैसे इस चक्कर में फँस गई? कितनी शरीफ होती थी पहले...”

दिलप्रीत: “वो तो बड़ी लंबी स्टोरी है। बाकी तुम्हारी बहन ने मेरे पति को कंट्रोल करके रखा हुआ है। मेरे पति बेचारे को आप फाड़ के पूना पड़ता है। तुम्हारी बहन की फुद्दी में लंड मेरे ही यार का...”

परदीप: “ओ रब्ब दा वास्ता बस कर। मैं सुबह ड्यूटी पर जाना है। तेरी गल्लां फिर मूड बनाई जाती...”

दिलप्रीत: “अच्छा जी गल्ल क्यों बदल रहे हो? सीधा कहो न कि बहन पर चढ़ने का दिल करता है...”

परदीप: “तू भी न हद कर देती है। बहन पर कैसे चढ़ सकता है कोई...”

दिलप्रीत: “सब कुछ हो सकता है। बस तुम मैं जो करूँ रोकना मत करना। ओके... किसी को पता नहीं लगना चाहिए।”

परदीप: “तेनू आगे कभी रोका? जो अब रोका जाएगा...”

यह कहकर उसने दिलप्रीत को जकड़ लिया और लेट गया।

इधर गोपी की बहन संदीप फिर से पंगे में थी क्योंकि संदीप का लड़का अब साल का हो गया था। जैसा आम औरतों में होता है कि जोड़ी रला लो। संदीप की सास भी उन दोनों के पीछे पड़ी हुई थी।

संदीप: “प्लीज यार, मम्मी को समझाओ न कि एक ही बच्चा काफी है...”

संदीप का घरवाला: “हाँ यार, मानता हूँ। मैं तेरी बात मम्मी को कहा भी था लेकिन तुझे पता है माता जी कहाँ मानती हैं। कोई नहीं, हम फिर ट्राई करते हैं। जट्ट पूरा कायम है...”

संदीप मन ही मन में: “हाँ कुत्ते पाले रख, ये भुलक्कड़ अपने मन में...”

अगर तू कायम होता तो मुझे अपनी टाँगें अपने भाई के यार के आगे न खोलनी पड़ती...

संदीप: “हाँ जी हाँ जी, जिदा तुम्हें ठीक लगे।”

यह कहकर उसने अपना सूट और ब्रा मम्मों से ऊपर चढ़ा लिया और सलवार व पैंटी उतार साइड रख दी। क्योंकि संदीप को पता था कि ये अच्छी तरह चूसेगा बस घसे मारकर साइड में गिर जाएगा...

संदीप: “वैसे मैं 20-22 दिन के लिए पिंड हो आऊँ? कितने चिर हो गया, गई ही नहीं...”

घरवाला: “हाँ हाँ चली जा, कोई गल नहीं। वैसे भी तू बच्चे के बाद पिंड गई ही नहीं। जितना चिर दिल करदा रह, पैसे मेरे पर्स से ले लेना जितने दिल करदा।”

यह कहकर वह अपने नॉर्मल ढंग से संदीप की टाँगों में आ गया। कोई 2-3 मिनट उसने संदीप के मम्मे चूसे और साथ ही अपना लंड फुद्दी में धक दिया। थोड़ी ही देर बाद वह साइड में गिर पड़ा था अपना काम खत्म करके।

संदीप का पानी निकला या नहीं, इससे उसे कोई मतलब नहीं था। संदीप माथे पर हाथ रखे सोच रही थी कि गोपी से कैसे बात करेगी कि तुझे अपने यार को दोबारा बुलाना पड़ेगा ताकि वो फिर मेरी टाँगें चुक सके।

Hinglish

Ghar aa ke Simar kaafi der sochta raha. Fir apni behan ki khushi ke liye woh ready bhi ho gaya. Par problem yeh thi ki munde ki age abhi 22 saal hi thi aur Komal ka 26th chal raha tha. Waise to 3-4 saal ka gap zyada nahi maana jaata, par yeh mostly ladke ke liye hota hai. Ladki hamesha ladke se chhoti hoti hai. Aakhir usne apni mummy se seedhi baat karna hi better samjha...
Kulwant Kaur aur Sajjan Singh bhi jaldi hi maan gaye ki haan family theek hai, viaah karne mein koi problem nahi. Komal yeh sab darwaze ke paas khadi sun rahi thi.
Komal aur Simar aise hi late pade hue the raat ko. Tab Komal boli – “Tu to bada khush hona ab”
Simar: “Kyun ki baat ho gayi...”
Komal: “Tu meri hone wali nanad ke saamne chodega, meri saas bhi tere neeche leti phirti hai aur mujhe to tu chhod-chhod ke dekh – saal bhar mein kitna body bhar gaya jaise pata nahi kitni baar chud gayi hoon...”
Simar: “Le didi, tu khush nahi ho rahi toh...”
Komal: “Haha main bhi khush hoon yaar. Badhiya family hai, ladke ko bhi maine dekha hai – smart hai, dekhne mein bhi acha. Baaki jo tujhe sabko pasand hai toh mujhe kya etraaz ho sakta hai. Kyunki khasam to tu hi rahega mera. Duniya ki nazar bas woh hoga, tu jab chahe mere upar chadh sakta hai ve...”
Simar apni behan ke naakhun khinchta hua bola – “Aaj to nahi chadhna. Chal aaj thodi exercise karwata hoon.” Yeh keh ke Simar ne apna lund bahar nikaal liya...
Komal exercise ke naam se ghabra jaati thi... Pehle bhi Simar aaram se neeche let jaata aur Komal ko lund upar tapkaane ke liye bol deta. Lund pe tapakte-tapakte Komal ke patte full jaate, badi thak jaati thi woh...
Har raat ki tarah aaj bhi Komal subah 3 baje soyi. Ab to aadat pad gayi thi usko is sabki... Pehle dinon ki tarah ab saari raat chudai ke baad uski taangein nahi kaamp ti thi. Nahi to pehle to subah saari raat chudai ke baad uski taangein bhar nahi uth paati thi...
Doosre side Aman bhi bada khush tha jab Dilpreet ne phone kar ke bataya ki Simar aur uske ghar waale viaah ke liye maan gaye hain, unko koi etraaz nahi aur jaldi hi ghar baat karne aa jayenge.
Par Jaspreet (Aman ki maa) ke man mein abhi bhi thoda dar tha kyunki Simar ko unke ghar aane ki full entry mil jaayegi... Aur usko Simar ka pata tha – woh ladka sex ke maamle mein kitna pagal hai. Tanu ko jis tarah woh thokta tha, usko pata tha ki ek baar uske bete ka viaah Simar ki behan se ho gaya to woh dono maa-beti ko nahi chhodega...
Yeh baatein dono maa-beti kar rahi thi...
Jaspreet: “Kya karein is munde ka? Ek ladki ke peeche pagal ho raha phirta hai. Isko yeh nahi pata ki aisa hone wala saala kya cheez hai...”
Tanu: “Le agar pata hota to woh musibat ki behan ko apni biwi banane ka sochta hi nahi. Hehe, uski behan hamare Aman ke neeche aur hum dono maa-beti... Hehehe samajh gayi... Waise ek baat kahu mummy, gussa na karna...”
Jaspreet: “Teri kis baat ka gussa...”
Tanu: “Dilpreet ka phone aaya tha. Usne mere saath share kiya tha. Keh rahi thi aage na karna par thodi si baat to banta hai. Isliye bata rahi hoon – Dilpreet keh rahi thi Simar ne last 1-2 saal se apni behan Komal ko bhi tikka rakha hai...”
Jaspreet: “Haaaa sachi...? Waise isme badi baat bhi nahi kyunki woh ladka maine dekha hai – pura pagal hai sex ke peeche...”
Tanu: “Haan bata rahi thi Dilpreet. Keh rahi thi Komal ko to pura badal ke rakh diya usne...”
Jaspreet: “Hehehe... Woh to badalni hi thi jab itna bada killa jaisa lund roz phirna...”
Chal koi na. Unke ghar jaake hamare liye achha rahega. Jab marzi aaya karo behan ke ghar. Yeh keh ke aankh maarti Jaspreet bhi has padi.
Tanu: “Hehehe... Tera bhi dil karta hoga uske neeche letne ka...”
Jaspreet: “Pehle nahi karta tha kyunki tera pita hi hafte mein 3-4 baar mere khet mein paani laga jaata tha. Par pata nahi kyun ab naya karne ka dil karta hai. Us din jab tere upar aur Manjeet upar Simar chadh gaya tha, mera bhi dil aa gaya...”
Tanu apni maa ko jhappi maarte hue – “To kar lo na. Tujhe koi kuch nahi bolega. Daddy to aajkal waise bhi teri taangon ke neeche hain.”
Jaspreet: “Haan jis din Aman ke rishte ki baat karne jaungi, us din main wahan ruk jaungi... Agar tu bhi rukna chahe to tu bhi ruk jaana. Saath kar lenge...”
Tanu: “Nahi pehle tu 1-2 baar akeli maja le. Apna rasta to clear karwa le. Waise bhi pata to chalega uska kitna mota hai, adjust hone mein time lagega tujhe...”
Aise hi dono ki baatein chalti rahi aur baad mein dono apne-apne kaam mein lag gaye...
Doosre taraf Dilpreet apne sasural wapas chali gayi thi. Raat ki roti kha ke dono log late pade hue the...
Pardeep (Dilpreet ka pati): “Kaisi ho gayi? Pind mil aayi yaaron apne ko...”
Dilpreet hasdi hui: “Haan mil aayi apne yaar ko... Kyun tu bhi milna chahta hai?”
Pardeep: “Haan saali besharm kya bolti hai. Sach bata, koi kand to nahi kiya?”
Dilpreet pajama aur panty utaar side mein rakh ke taangein khol deti hui – “Pehle idhar aa ja apni duty pe, fir bataungi.”
Pardeep: “Sach bata, pind mein usi mysterious yaar se mili thi?”
Dilpreet apne pati ka sir taangon mein ghusaate hue – “Haan uske saath zaroori baat karni thi isliye milne gayi thi. Yeh to tujhe pata hi hai yaar ke paas gayi hoon to nangi to karni hi padti hai...”
Pardeep sir pe haath maarte hue – “Hayee o rabba... Ghasti ban gayi meri. Apne yaar ki tareef apne husband ke saamne kar rahi hai...” Yeh keh ke woh ek baar apni biwi ki choot ko gaur se dekhta hua fir se chaatne laga...
Dono aise hi openly baat karte the kyunki kabhi ek doosre se kuch nahi chhupaya tha... Pardeep bhi modern soch wala ladka tha isliye gussa nahi karta tha kyunki woh khud bhi ab tak kaafi ladkiyan chhod chuka tha.
Dilpreet: “Achha main ghasti hoon? Lagta hai tujhe ghasti ban ke dikhana padega...”
Pardeep: “O nahi nahi meri jaan, gussa kyun karti hai. Main to mazak kar raha tha.” Yeh keh ke usne Dilpreet ke gore patte ko chum liya...
Dilpreet: “Aaj mera mood theek nahi hai to pata hi hai tujhe...”
Pardeep: “Thanku madam ji. Itna bada sahab aa jaata hai nahi darta main jiska tera dar hai mujhe. Haste-haste bhi bund phaad deti hai. Police wale se zyada to tu kutti hai mujhe. Kahan se sikhaaya yeh sab? Kitni baar poocha tujhe, tu batati nahi...”
Dilpreet: “Usne hi sikhaaya tha jisne pehle aage peeche ka udghaatan kiya tha...”
“Bada khatarnak banda waise to fir woh... BC us din SHO saab bhi pooch baithe the ki kya hua tujhe? Kursi pe kyun hil rahi hai idhar-udhar... Main kya bataun – daaru pi ke ghar gaya tha to kut padi...”
Dilpreet: “Hehehe... Kehne ko daffan ko haan maana ki thodi bhut pi li. Thoda tun ho ke ghar aa jao fir ghar ke kharod pao.”
Pardeep: “Tujhe waise ek baat ka pata?”
Dilpreet: “Kis baat ka?”
Pardeep: “Bhave tune viaah se pehle hi sab sach bata diya tha, par fir bhi mujhe yakeen nahi tha. Socha chalo boyfriend tha, 2-4 baar kar liya to kya hua. Main to saara tel leke aaya tha room mein. Par jab pehli raat tujhe nangi kiya neeche dekha – behenchod tujhe to chhod-chhod ke khila diya poora usne...”
Dilpreet: “Chalo bas karo. Kyun soch rahe ho... Thodi kismat mein thi main tujhe mil gayi. Aur maine tujhe kabhi roka dusri ladkiyon ke saath karne se... Chalo ab aa ja. Aur kitni der choosni hai meri... Tu apna lollypop chuswana to bata de, nahi to aa maar saat...”
Pardeep: “Nahi teri baaton se already mera lund phatne ko aa raha hai. Tere muh ki garmi ne ise pigla dena ek minute mein...”
“Chalo jidha tera dil kare.” Yeh keh ke Dilpreet ne apni taangein apne husband ke kandhon pe rakh li. Agle hi pal uski choot mein maza ki lahar bhar gayi jab lund ek jhatke mein poora andar chala gaya... Bhave lund Simar jaisa mota nahi tha par bura bhi nahi tha. Dono kaafi der lage rahe. Pose badal-badal ke Pardeep apni poori duty nibha raha tha aur akhir mein usne saara paani Dilpreet ki choot mein hi chhod diya aur side mein dig padi.
Pardeep Dilpreet ki choot ko tissue se saaf karke usko apne upar lete hue – “Jo marzi ho jaaye par tu maza bahut deti hai. Sharam wagarah bedroom ke bahar achha lagta hai husband-wife mein nahi...”
Dilpreet apne maathe ka pasina saaf karte hue – “Hehehe thank you husband... Pehle to choot mein aag lagi hui thi. Pata nahi kya kya bol rahi thi main tujhe. Gussa to nahi laga meri baaton ka?”
Pardeep: “Nahi nahi gussa nahi. Haan jealousy to hoti hai ki yeh soch ke – meri jaan par koi begana ladka bhi chadh raha. Par haan gussa nahi aata yeh pakki baat hai... Kai baar dil mein aata hai ki tujhe aur tere yaar ko maza karte dekhoon kyunki itna time ho gaya viaah ko. Itna tujhe choda aage peeche, tu kabhi mana nahi kiya din ho ya raat... Fir socha tu gussa na kar jaaye...”
Dilpreet: “Achha gaye to theek hai. Gussa nahi karte. Ab tu hamari besharam category mein aa hi gaya toh tujhe raj ki baat bata hi deti hoon. Thodi badi behan bhi mere yaar ke neeche leti hai...”
Pardeep: “Kaunsi badi behan? Matlab Manjeet didi? Nahi nahi yaar woh to kitni simple hai. Modern nahi, shareef hai, decent hai kitni...”
Dilpreet: “Hehehe... Apni behan sabko shareef hi lagti hai. Meri bhabhi hai. Mujhse zyada nahi jaante tu...”
Pardeep: “Nahi aisi baat nahi. Par yaar woh kaise is chakkar mein phas gayi. Kitni shareef hoti thi pehle...”
Dilpreet: “Woh to lambi story hai. Baaki teri behan ne mere bhai ko control kar ke rakha hai. Mere bhai bechare ko aap faad ke puna padta hai teri behan ki choot mein lund mere hi yaar ka...”
Pardeep: “O rabba da wasta bas kar. Main subah duty pe jaana. Teri baatein mood bana deti hain...”
Dilpreet: “Achha gaye baat kyun badal rahe ho. Seedha kaho na ki behan pe chadhne ka dil karta hai...”
Pardeep: “Tu bhi hadd kar deti hai. Behan pe kaise chadh sakta koi...”
Dilpreet: “Sab kuch ho sakta hai. Bas tu jo main kar rahi hoon usko roka mat karna ok... Kisi ko pata nahi lagna chahiye.”
Pardeep: “Tujhe kabhi roka? Ab bhi nahi rokunga...”
Yeh keh ke usne Dilpreet ko jhappi maari aur late gaya.
Idhar Gopy ki behan Sandeep dobara pange mein thi kyunki Sandeep ka beta ab saal ka ho gaya tha jiska matlab common auraton ko lagta hai ab doosra bacha kar lo. Sandeep ki saas bhi un dono ke peeche padi hui thi.
Sandeep: “Please yaar mummy ko samjhao na ki ek hi bacha bahut hai...”
Sandeep ka pati: “Haan yaar maanta hoon teri baat. Mummy ko bhi kaha tha par tu jaanti hai mata ji kahan maanti hain. Koi na, hum fir try karte hain. Jatt poora kaim hai...”
Sandeep man hi man mein – “Haan kutte paali rakh. Yeh bhoolkha apne man mein...” Agar tu kaim hota to mujhe apni taangein apne bhai ke yaar ke saamne na kholni padti...
Sandeep: “Haanji haanji jaisa tujhe theek lage.” Yeh keh ke usne apna suit aur bra upar chadha liya aur salwar-panty utaar side mein rakh di. Kyunki Sandeep ko pata tha – isko achhi tarah choosni hai, bas ghase maar ke side mein dig padna... Sandeep – “Waise main 20-22 din ke liye pind jaungi. Kitne din ho gaye gayi hi nahi...”
“Haan ha chali ja. Koi gal nahi. Waise bhi tu bache ke baad pind nahi gayi. Jitna dil kare reh ja. Paise mere purse se le lena jitna dil kare.” Yeh keh ke woh apne normal style mein Sandeep ki taangon mein aa gaya. Koi 2-3 minute usne Sandeep ke mumme chuuse aur saath hi lund choot mein daal diya. Thodi der baad woh side mein dig pada tha. Kaam khatam hone ke baad.
Sandeep ka paani nikla ya nahi, usko koi farak nahi padta tha. Sandeep apne maathe pe haath rakhe soch rahi thi ki Gopy se kaise baat karegi – “Tujhe apne yaar ko dobara bulaana padega taaki woh fir meri taangein utha sake.”
Sandeep se dusra bacha loading
 

tera hero

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Bahut jabardast start hai bhai bas ab hero form me aa jaye aur sabki faad ke rakh de
Ab lagta hai Simar Happy aur uski family ki chut faadne wala hai but ye Komal baher muh na marle kahi
Bahut badhiya ab hero ka lund pehle se bhi bada aur majbut ho gaya hai aur ab aadhi training bhi ho gayi bas final exam baki hai
Bahut badhiya ache se badla le liya hero aur uski maa ne Happy se aur use ek kuwari chut bhi mil gayi aur but abhi jeeja baki hai
Lagta hai ek aur chut fatne wali hai
Ek aur chut hero ne apni gulam bana li aur Happy aur uski maa ki bhi pyas bhuj gayi isi bahaane
Chalo acha hai Sandeep maa banne wali hai aur baki sab bhi thik chal raha hai but ye Happy ki biwi kab chudegi
Thanks bro ♥️🥰
 

tera hero

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Dono mami bhanji ki chut faad di ab maa ki baari hai
Acha sabak sikhaya master ko aur lagta hai Komal darling ke sath bhi kuch Masti ho sakti hai
Chalo acha hai Apni behen Komal ki bhi chut pehli baar hero ne hi maari hai aur ab mauj hi mauj hai hero ki

Chalo acha hai hero ki bhi nayi chut mil jayegi aur uski behen bhi shadi ke baad paas me hi rahegi
Sandeep se dusra bacha loading
Thanks bro ♥️🥰
 

tera hero

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Update 33



Ek Pind (Ek Gaon)​


Saara din college mein aise hi beet gaya, kabhi class mein toh kabhi free time mein. Kareeb 3 baje jab chutti hui, toh Sunny ne Simar ko phir yaad dilaya ki aaj uske saath chalna hai.


Sunny: Bhai, tu ne saath chalna hai mere...


Gopy: Kya hua, kidhar ki taiyari hai dono ki...


Simar: Kuch nahi yaar, woh thoda kaam tha didi se milwana hai...


Gopy apne motorcycle pe apne ghar ki taraf chala gaya. Aur Simar aur Sunny dono saath chal diye.


Simar: Tu ne bataya nahi ki Kiran didi kya keh rahi thi...


Sunny (haste hue): Tu itni tension kyun leta hai, koi baat hogi toh mil kar kar lenge...


Kareeb aadhe ghante mein ghar pahunche toh Kiran bhi ghar pe hi thi. Kiran abhi bhi apni police wali dress mein thi. Kiran ne dono ko juice ka glass diya. Jab Kiran ne dekha ki dono ne juice pee liya hai, toh usne Sunny ko yeh keh kar apne kamre mein bhej diya ki "Mujhe kaam ki baat karni hai, tu apne kamre mein ja..."


Sunny ke jaate hi Kiran ne darwaza band kar diya aur Simar ke saamne aa kar baith gayi aur uski taraf dekhne lagi.


Simar: Didi kya hua, aise kyun dekh rahi ho? Aur aisa kaun sa zaroori kaam tha? Mujhe subah se tension ho rahi hai...


Kiran: Kaam toh bahut zaroori hai... aur dekh main yeh rahi hoon ki tu mera yeh kaam kar sakta hai ki nahi...


Simar: Haan, agar karne layak hua toh zaroor karunga, isme kya hai...


Kiran: Toh phir dhyan se sun... Yeh toh mujhe pata hai ki teri pahunch kaafi hai ladkon mein. Acche-bure dono tarah ke mundon tak teri jaan-pehchaan hai...


Kiran abhi bol hi rahi thi ki Simar ne beech mein hi tok diya, "Woh toh bas didi shauk ke taur par pehchaan hai, baaki main ab ladayi-jhagda karta nahi. Pehle bahut kiye maine... Baaki agar aap kehti ho toh main aapke bhai se nahi milunga." Itna keh kar woh sofe se uth khada hua.


Kiran: Haye mere Rabba! Tujhe hamesha galat-femi hi rehti hai. Main baat kuch aur kar rahi hoon aur tu baat kidhar le gaya. Bandar! Agar mujhe tujhe apne bhai se door karna hota, toh woh chhoti si baat thi, do sipahi bhej deti main... Sub-inspector hoon main...


Simar apne baalon mein haath pherte hue bola, "Sorry, maine beech mein hi tok diya... Okay, aap batao phir kya kaam hai."


Kiran: Kaam yeh hai ki main tere connections use karna chahti hoon. Tujhe pata hi hoga, nahi bhi pata hoga toh tu pata kar lega... Pata yeh karna hai ki apne ilake mein 'Chitta' aur baki nashe kahan-kahan milte hain. Main ek hi jhatke mein sabko pakadna chahti hoon. Upar se support mujhe poori hai...


Simar "Oh, accha" keh kar kuch der ke liye chup ho gaya.


Kiran: Isme tera bhi fayda hoga, main teri pehchaan apne bade saab se bhi karwaungi.


Simar abhi bhi soch mein duba hua tha aur uska dhyan Kiran ki taangon ke beech uski yoni (fuddi) par tha, jiski shape Kiran ki police wali tight pant mein se nazar aa rahi thi.


Kiran: Abhi bhi soch raha hai? Tujhe woh bhi mil sakta hai jidhar tu itni gaur se dekh raha hai.


Yeh sunkar Simar ki aankhein phati ki phati reh gayi. Woh ek-takt uski taraf dekhne laga aur bola, "Kya kaha aapne didi?"


Kiran: Sahi suna tune. Bata, mera kaam kar sakta hai ki nahi...


Kiran ne apna kaam nikalwane ke liye apna shareer pehle bhi use kiya tha aur ab bhi kar rahi thi. Doosri baat, Simar use waise bhi pasand tha; uska shareer itna tagda tha ki use dekh kar woh apne thighs bheench leti thi. Usne Simar ke background ke baare mein pata karwaya tha ki kaise usne 10th class se hi ladayi-jhagde shuru kar diye the. Apni ladayi na bhi ho, toh woh sulah karwane jata tha. Rallies mein bheed ikkathi karna, aise kaafi kaam kiye the usne. Par phir achanak usne yeh kaam kam kar diye. Kyun kam kiye, uska reason Kiran ko nahi pata tha... par woh reason 'Komal' thi—Simar ki badi behen aur uski jutti. Jab bhi Simar lad kar aata, woh use jam kar peetti thi.


Simar: Chalo theek hai, agar aapne mere dil ki baat samajh li hai, toh main bhi aapka yeh kaam kar dunga. Main zyada se zyada logon ka pata lagata hoon. Haan, sabko nahi, kyunki beech mein kuch log sirf afeem bechte hain, unhe aap chhod dena kyunki unse hamare buzurg aur shaukheen log le jaate hain... kabhi-kabhi honeymoon se pehle. Haan, medical nashe aur chitta bechne walon ka address toh main aapko do din mein pata karwa dunga.


Honeymoon wali baat sunkar Kiran hanste hue boli, "Accha beta! Shaadi ke bina honeymoon? Tere kaan khinchne wale ho gaye hain. Chal tu bhi pata kar, main bhi apne logon se pata karwati hoon. Is baar sambhalne nahi dena, ek hi jhatke mein kaam khatam karna hai."


Simar phir Sunny ko ek baar mil kar apne ghar aa gaya. Kaafi kuch toh use pehle hi pata tha aur baaki ka usne Gopy se agle do din mein pata kar liya. Uska target woh log the jo ladayi-jhagda bhi karte the aur nasha bechte bhi the.


Kiran ne Simar ko DSP aur baki police walon se bhi milwa diya tha. Kuch toh Simar ko pehle hi jaante the kyunki kai baar thane mein sulah ke liye Simar aaya hua tha. Simar ne jitni information ho sakti thi, pata kar li. 7-8 logon ka Simar ne pata lagaya aur 10 ka Kiran ne khud kiya. Taiyari ke saath, apne saare staff ki madad se Kiran ne ek hi din mein saare bande utha liye. Agle din akhbaar mein DSP saab aur Kiran ka naam badi headlines mein tha. TV channels par bhi yeh khabar aa rahi thi ki police ne badi karwayi karte hue nashe ke saudagaron ko kaabu kiya. Mamla itna highlight hua ki jis team ne yeh operation chalaya tha, uske char officers ko promotion aur baakiyon ko bhi inaam mila.


Promotion milne walon mein Kiran bhi thi. Simar ko jab is baat ka pata chala toh woh bhi khush tha. Bhale hi use pata tha ki Kiran koi kunwari nahi hai, par pata nahi kyun woh Kiran ke peeche pagal tha. Woh Kiran ki jaanghon mein ghusne ke liye betaab tha. Ab uski umeed aur badh gayi thi kyunki Kiran ki tarakki mein uska bhi haath tha.


Udar, aaj Gurpreet ghar mein akeli thi. Mummy-papa aur bhabhi kisi rishtedar ke ghar dharmik paath ke bhog par gaye the. Unhe raat ko der se hi aana tha. Ricky bhi taiyar ho kar apni dukan par chala gaya tha. Dopahar 1 baje tak uske paas kuch kaam tha—cameray aur computer theek hone aaye the. Ricky ne sabko kaam par laga diya tha kyunki uski mummy keh gayi thi ki jaldi ghar aane ki koshish karna. Kyunki woh Gurpreet ko akela nahi chhode the, ek toh woh jawan ladki thi aur doosra, ek-do baar woh bathroom mein gir chuki thi aur chot lagwa chuki thi.


Gurpreet aaj ghar mein akeli thi. Use pata tha ki Ricky ghar aa jayega, par jab 2 baje tak woh nahi aaya, toh woh beparwah ho gayi. Baki ladkiyon ki tarah usne masti toh nahi ki thi, par uska mann toh karta hi tha. Isliye jab Ricky nahi aaya, toh usne apne kamre ka darwaza band kiya aur dheere-dheere apne saare kapde utaar diye. Bina kapdon ke ghar mein nangi ghumna use bahut accha lag raha tha. Usne khud ko dekha toh laga ki kya haal bana liya hai. Bhale hi shareer par zyada baal nahi the, phir bhi thighs aur private parts pe baal dikh rahe the. Woh apni arms aksar saaf kar leti thi kyunki mummy danti thi.


Par aaj uske mann mein pata nahi kya aaya ki woh apni wheelchair se uthi aur baishakhiyon (crutches) ke sahare apne kamre se nangi hi bathroom ki taraf chal di. Bathroom kamron se thoda bahar ki taraf tha. Aise nanga ghumna use bahut sukoon de raha tha. Woh soch rahi thi ki use mard toh milna nahi hai, par aise khulla-khulla rehna kitna accha lagta hai. In khayalon mein woh apna tauliya (towel) lana bhi bhool gayi thi. Kareeb aadha ghanta laga kar usne electric razor se apne shareer ke saare baal saaf kar liye. Kaafi din baad apne angon ko bina baalon ke dekh kar usse raha nahi gaya aur woh wahan baithi-baithi apni fuddi mein ungli karne lagi. Jab uska kaam hua, toh use aaj baki dinon se zyada maza aaya. Jab usne apne sir ke baal bhi dho liye aur naha liya, tab usne dekha ki woh toh nangi hi aayi thi aur towel bhi nahi layi thi.


Gurpreet phir befikar ho gayi kyunki use laga ghar mein kaun hai. Par woh is baat se anjaan thi ki Ricky ghar aa gaya hai. Main gate khulne ki awaaz Gurpreet ne suni hi nahi thi. Ricky ko pata tha ki Gurpreet didi bathroom mein naha rahi hain, isliye usne tab tak chai bana li thi. Dukan se ghar aate hue woh chai ke saath khane ke liye samose aur tikki le aaya tha. Use pata tha ki mummy ghar nahi hain, jo khana mummy bana kar gayi hongi, woh raat ko kha lenge.


Ricky maze se table laga kar, chai daal kar samose plate mein rakh kar apni behen ke bahar aane ka intezar kar raha tha. Udar Gurpreet ne ek baar apne poore shareer se paani ponchh liya taaki bahar farsh geela na ho. Uska kamra kareeb 50-60 kadam ki doori par tha. Gurpreet apni baishakhiyon ke sahare chalti hui bahar abhi 20-25 kadam hi aayi thi ki saamne uska chota bhai baitha tha.


Lakdi ki baishakhiyon ki awaaz sunkar Ricky ne upar dekha, toh uski aankhein phati reh gayi. Uski behen uske saamne poori nangi khadi thi, baal khule hue the. Ek-do pal ke liye toh Gurpreet statue ban kar khadi rahi. Sharm ke maare phir usne apna munh ghuma liya aur uski peeth (bund) uske bhai ki taraf ho gayi. Par woh nangi thi, is hadbadahat mein woh ladkhada bhi gayi; woh bhaag kar apne kamre mein jaana chahti thi.


Yeh dekh kar Ricky khud hi bol pada, "Didi andar chale jao, kahin gir na jaana, main andar chala jaata hoon."


Gurpreet kuch nahi boli, bas chup-chap andar chali gayi. Ricky bhi ek baar apni behen ka roop jee bhar kar dekh chuka tha—itni kareeb se apni behen ke mumme aur uski badi bund bhi, jo shayad taangon ke kharab hone ki wajah se normal se zyada badi ho gayi thi. Gurpreet bhi andar aa kar soch rahi thi ki yeh kya ho gaya. Aaj tak kabhi aisa nahi hua tha. Bhale hi use apne kamre mein lage cameron ka pata tha, par is tarah bhai ke saamne poori nangi haalat mein pehli baar aayi thi. Woh abhi soch hi rahi thi ki bahar se Ricky ki awaaz aayi, "Didi aa jao, samose aur chai thandi ho jayegi."


Gurpreet ne jaldi se kapde pehne aur apni wheelchair par baith kar bahar aa gayi. Apne bhai ke saamne baithne mein use sharm toh aa rahi thi, par Ricky ne koi baat nahi ki toh woh bhi thodi relax ho kar maze se khane lagi. Chatpata khana ladkiyon ka favorite hota hai, Gurpreet ko bhi aisa food bahut pasand tha.


Khair, aise hi raat ho gayi. Raat ko kuch khaas nahi hua. Idhar toh kuch nahi hua, par udhar Komal ka sasur aaj akela hi apna ling hila raha tha, apni bahu aur bete ke sex ki awaazein sunkar. Kareeb 12 baj chuke the par Aman aur Komal sone ka naam nahi le rahe the. Roz ki tarah aaj bhi Komal 'ghodi' bani hui thi aur Simar peeche se uski komal fuddi mein dhakke maar raha tha. Shareer se shareer takrane ki awaaz poore ghar mein goonj rahi rahi thi. Doosre kamre mein Aman ki behen Tanu bhi apni fuddi mein ungli kar ke so gayi thi, par Mintu (Komal ka sasur) nahi so pa raha tha. Ek toh uski gharwali Jaspreet Kaur uske chote bhai ko fuddi dene unke ghar gayi hui thi, kyunki uske bhai ki biwi apne pind gayi hui hai. Aaj shaam hi uske bhai Parminder ne phone kar diya tha ki "Bhabhi raat ko aa jaana." Jaspreet bhi 9 baje chup-chap chhat ki deewar faand kar udhar chali gayi thi.


Mintu se control na hua, toh woh peshab karne aur paani peene ke liye bahar aaya. Peshab karne ke baad paani pee kar woh apne kamre mein ja raha tha ki na chahte hue bhi woh khud-ba-khud apne bete ke kamre ke bahar ja kar andar jhaankne laga chori-chori. Andar zero-watt ka bulb jal raha tha. Use zyada kuch toh nahi dikha, bas apni bahu Komal ki taangen uske bete ke kandhon par rakhi hui hilti nazar aa rahi thi. Baaki ka woh dekh nahi pa raha tha. Par uski bahu ki nangi taangen hi uske andar aag laga rahi thi.


Kareeb 5 minute ho chuke the use dekhte hue ki achanak uske kaan khinche. Usne mud kar dekha toh saamne Jaspreet Kaur khadi thi. Dekhne se hi pata lag raha tha ki woh abhi chud kar aayi hai; chehre par thappadon ke nishaan the aur baal bikhre hue the. Jaspreet kaan pakad kar Mintu ko kamre mein le gayi. Andar jaate hi Jaspreet kutto ki tarah Mintu par toot padi.


Jaspreet: Haramkhor, kutte! Tujhe kaha tha na ki agar dobara galti ki meri bahu ke kamre ki taraf jaane ki ya use gandi nazar se dekhne ki, toh main tera juloos nikal dungi. Kapde utaar jaldi, haraamzade kutte!


Jaspreet ki awaaz na chahte hue bhi oonchi hoti ja rahi thi. Par Mintu ko aaj pata nahi kya hua, woh Jaspreet ki baat maanne ki jagah let gaya. Jaspreet yeh dekh kar aur gusse mein aa gayi aur Mintu ki taraf dekh kar boli, "Accha yeh baat hai? Chal phir main bhi dekhti hoon ki kitni der tu sher banta hai. Pehle toh tu mujhse maar kha kar bach jata tha, ab tera juloos hum sab nikalenge."


Itna keh kar Jaspreet ne jutti pehni aur apni beti Tanu ke kamre mein ja kar uske paas let gayi. Tanu is waqt nangi hi leti thi. Fuddi mein ungli karne ke baad woh nangi hi so gayi thi. Jaspreet Kaur bhi seedhi aa kar Tanu ke saath let gayi kyunki kamre mein poora andhera tha. Jab Jaspreet ne karwat li, toh nangi Tanu ko dante hue boli, "Yeh kya besharmi hai? Nangi kyun leti hai? Ruk ja, thode hi din bache hain teri shaadi ko bhi."


Tanu apni maa ki daant sun kar uth baithi kyunki woh gehri neend mein thi.


Tanu: Sorry mummy ji, aage se nahi karungi yeh galti.


Itna keh kar woh uth kar kapde pehen-ne hi wali thi ki Jaspreet ne use rok diya, "Mujhe maaf kar de, maine apna gussa tujh par nikal diya. Rehne de, aise hi so ja jaise tera dil karta hai."


Tanu phir let gayi aur boli, "Aapko aadhi raat ko gussa kis baat par aa gaya?"


Jaspreet: Ek toh tera baap galti karta hai, upar se mujhse akad raha hai. Isliye main tere paas aa gayi.


Tanu apni maa ko gale lagate hue boli, "Shant ho jao 'Mother India', itna gussa accha nahi aadhi raat ko... Chalo ek kaam karo, aap bhi meri tarah kapde utaar do, phir dekhna aise khulle-khulle sone ka kitna maza aata hai. Main darwaza band kar deti hoon taaki koi aur na aa jaye."


Itna keh kar Tanu ne uth kar darwaza band kar diya. Jaspreet bhi aadhi raat ko ab nayi behas mein nahi padna chahti thi, isliye usne chup-chap apni salwar-kameez aur kacchi utaar di. Bra toh woh pehen kar hi nahi gayi thi jab apne devar ke paas gayi thi. Kapde utaar kar woh Tanu ke saath let gayi. Tanu kuch der gale lag kar apni nangi maa ke shareer ke saath khelti rahi. Apni maa ki badi bund par haath pher kar use maza aa raha tha. Haath pherte-pherte hi kab dono ko neend aa gayi, pata hi nahi chala.


हिंदी


एक गाँव​


पूरा दिन कॉलेज में ऐसे ही बीत गया, कभी क्लास में तो कभी खाली समय में। करीब 3 बजे जब छुट्टी हुई, तो सनी ने सिमर को फिर याद दिलाया कि आज उसके साथ चलना है।


सनी: भाई, तूने मेरे साथ चलना है...


गोपी: क्या हुआ, तुम दोनों किधर जाने की तैयारी में हो?


सिमर: कुछ नहीं यार, थोड़ा काम था, दीदी से मिलवाना है...


गोपी अपने मोटरसाइकिल पर अपने घर की ओर चला गया और सिमर और सनी दोनों साथ चल दिए।


सिमर: तूने बताया नहीं कि किरण दीदी क्या कह रही थीं...


सनी (हँसते हुए): तू इतनी चिंता क्यों कर रहा है, कोई बात होगी तो मिलकर कर लेंगे।


करीब आधे घंटे में जब वे घर पहुँचे, तो किरण भी घर पर ही थी। किरण अभी भी अपनी पुलिस की वर्दी में थी। उसने दोनों को जूस का गिलास दिया। जब किरण ने देखा कि दोनों ने जूस पी लिया है, तो उसने सनी को यह कहकर अपने कमरे में भेज दिया कि मुझे काम की बात करनी है, तू अपने कमरे में जा।


सनी के जाते ही किरण ने दरवाजा बंद कर दिया और सिमर के सामने आकर बैठ गई और उसकी तरफ देखने लगी।


सिमर: दीदी क्या हुआ, ऐसे क्यों देख रही हो? और ऐसा कौन सा जरूरी काम था? मुझे सुबह से चिंता हो रही है।


किरण: काम तो बहुत जरूरी है... और देख मैं यह रही हूँ कि तू मेरा यह काम कर सकता है या नहीं।


सिमर: हाँ, अगर करने लायक हुआ तो जरूर करूँगा, इसमें क्या है।


किरण: तो फिर ध्यान से सुन... यह तो मुझे पता है कि युवाओं में तेरी पहुँच काफी है। अच्छे-बुरे दोनों तरह के लड़कों तक तेरी पहचान है।


किरण अभी बोल ही रही थी कि सिमर ने बीच में ही टोक दिया, "वह तो बस दीदी शौक के तौर पर पहचान है, बाकी मैं अब लड़ाई-झगड़ा नहीं करता। पहले बहुत किए मैंने... बाकी अगर आप कहती हो तो मैं आपके भाई से नहीं मिलूँगा।" इतना कहकर वह सोफे से उठ खड़ा हुआ।


किरण: हाय मेरे रब्बा! तुझे हमेशा गलतफहमी ही रहती है। मैं बात कुछ और कर रही हूँ और तू बात किधर ले गया। बंदर! अगर मुझे तुझे अपने भाई से दूर करना होता, तो वह छोटी सी बात थी, दो सिपाही भेज देती मैं... सब-इंस्पेक्टर हूँ मैं।


सिमर अपने बालों में हाथ फेरते हुए बोला, "माफ करना, मैंने बीच में ही टोक दिया... ठीक है, आप बताओ फिर क्या काम है।"


किरण: काम यह है कि मैं तेरे संपर्कों का इस्तेमाल करना चाहती हूँ। तुझे पता ही होगा, नहीं भी पता होगा तो तू पता कर लेगा... पता यह करना है कि अपने इलाके में 'चिट्टा' और अन्य नशे कहाँ-कहाँ मिलते हैं। मैं एक ही झटके में सबको पकड़ना चाहती हूँ। ऊपर से मुझे पूरा समर्थन है।


सिमर "ओह, अच्छा" कहकर कुछ देर के लिए चुप हो गया।


किरण: इसमें तेरा भी फायदा होगा, मैं तेरी पहचान अपने बड़े साहब से भी करवाऊँगी।


सिमर अभी भी सोच में डूबा हुआ था और उसका ध्यान किरण की टांगों के बीच उसकी योनि पर था, जिसका आकार किरण की पुलिस वाली चुस्त पैंट में से साफ नजर आ रहा था।


किरण: अभी भी सोच रहा है? तुझे वह भी मिल सकता है जहाँ तू इतनी गौर से देख रहा है।


यह सुनकर सिमर की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह एकटक उसकी तरफ देखने लगा और बोला, "क्या कहा आपने दीदी?"


किरण: सही सुना तूने। बता, मेरा काम कर सकता है या नहीं।


किरण ने अपना काम निकलवाने के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल पहले भी किया था और अब भी कर रही थी। दूसरी बात, सिमर उसे वैसे भी पसंद था; सिमर का शरीर इतना गठीला था कि उसे देख वह अपनी जांघें भींच लेती थी। दूसरी बात, उसने सिमर के अतीत के बारे में पता करवाया था कि कैसे उसने दसवीं कक्षा से ही लड़ाई-झगड़े शुरू कर दिए थे और कितनी जान-पहचान बना ली थी। अपनी लड़ाई न भी हो, तो वह समझौता करवाने जाता था। रैलियों में भीड़ इकट्ठी करना, ऐसे कई काम किए थे उसने। पर फिर अचानक उसने यह काम कम कर दिए। क्यों कम किए, इसका कारण किरण को नहीं पता था... पर वह कारण 'कोमल' थी—सिमर की बड़ी बहन और उसकी जूती। जब भी सिमर लड़कर आता, वह उसे जमकर पीटती थी।


सिमर: चलो ठीक है, अगर आपने मेरे दिल की बात समझ ली है, तो मैं भी आपका यह काम कर दूँगा। मैं ज्यादा से ज्यादा बंदों का पता लगाता हूँ। हाँ, सबको नहीं, क्योंकि बीच में कुछ लोग सिर्फ अफीम बेचते हैं, उन्हें आप छोड़ देना, क्योंकि उनसे हमारे बुजुर्ग और शौकीन लोग ले जाते हैं... कभी-कभी सुहागरात से पहले। हाँ, मेडिकल नशे और चिट्टा बेचने वालों का पता मैं आपको दो दिन में दे दूँगा।


सुहागरात वाली बात सुनकर किरण हँसते हुए बोली, "अच्छा बेटे! शादी से बिना सुहागरात? तेरे कान खींचने वाले हो गए हैं। चल तू भी पता कर, मैं भी अपने लोगों से पता करवाती हूँ। इस बार संभलने नहीं देना, एक ही झटके में काम खत्म करना है।"


सिमर फिर सनी को एक बार मिलकर अपने घर आ गया। काफी कुछ तो उसे पहले ही पता था और बाकी का उसने गोपी से अगले दो दिनों में पता कर लिया। उसका निशाना वे थे जो लड़ाई-झगड़ा भी करते थे और नशा बेचते भी थे।


किरण ने सिमर को डीएसपी और अन्य पुलिस वालों से भी मिलवा दिया था। कुछ तो सिमर को पहले ही जानते थे क्योंकि कई बार थाने में समझौते के लिए सिमर आया हुआ था। सिमर ने जितनी जानकारी हो सकती थी, जुटा ली। 7-8 लोगों का सिमर ने पता लगाया और 10 का किरण ने खुद किया। तय किए हुए दिन, अपने पूरे कर्मचारियों की मदद से किरण ने एक ही दिन में सारे बंदे उठा लिए। अगले दिन अखबार में डीएसपी साहब और किरण का नाम बड़ी सुर्खियों में था। टीवी चैनलों पर भी यह खबर आ रही थी कि पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए नशे के सौदागरों को काबू किया। मामला इतना चर्चा में आया कि जिस टीम ने यह अभियान चलाया था, उसके चार अधिकारियों को पदोन्नति (प्रमोशन) और बाकियों को भी काफी पुरस्कार मिला।


पदोन्नति पाने वालों में किरण भी थी। सिमर को जब इस बात का पता चला तो वह भी खुश था। भले ही उसे पता था कि किरण कोई कुंवारी नहीं है, पर पता नहीं क्यों वह किरण के पीछे पागल था। वह किरण की जांघों के बीच पहुँचने के लिए उतावला था। अब उसकी उम्मीद और बढ़ गई थी क्योंकि किरण की तरक्की में उसका भी हाथ था।


उधर, आज गुरप्रीत घर में अकेली थी। मम्मी-पापा और भाभी किसी रिश्तेदार के घर धार्मिक पाठ के भोग पर गए थे। उन्हें रात को देर से ही आना था। रिकी भी तैयार होकर अपनी दुकान पर चला गया था। दोपहर 1 बजे तक उसके पास कुछ काम था—कैमरे और कंप्यूटर ठीक होने आए थे। रिकी ने सबको काम पर लगा दिया था और कारीगरों को समझा दिया था, क्योंकि उसकी मम्मी कह गई थी कि जल्दी घर आने की कोशिश करना। क्योंकि वे गुरप्रीत को अकेला नहीं छोड़ते थे, एक तो वह जवान लड़की थी और दूसरा, एक-दो बार वह बाथरूम में गिर चुकी थी और माथे पर चोट लगवा चुकी थी।


गुरप्रीत आज घर में अकेली थी। उसे पता था कि रिकी घर आ जाएगा, पर जब 2 बजे तक वह नहीं आया, तो वह बेपरवाह हो गई। बाकी लड़कियों की तरह उसने मस्ती तो नहीं की थी, पर उसका मन तो करता ही था। इसलिए जब रिकी नहीं आया, तो उसने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और धीरे-धीरे अपने सारे कपड़े उतार दिए। बिना कपड़ों के घर में ऐसे घूमना उसे बहुत अच्छा लग रहा था। उसने खुद को देखा तो लगा कि क्या हाल बना लिया है। भले ही उसके शरीर पर ज्यादा बाल नहीं थे, फिर भी टांगों और निजी अंगों के बाल दिख रहे थे। वह अपनी बाहें अक्सर साफ कर लेती थी क्योंकि मम्मी डाँटने लगती थीं।


पर आज उसके मन में पता नहीं क्या आया कि वह अपनी व्हीलचेयर से उठी और बैसाखियों के सहारे अपने कमरे से नग्न अवस्था में ही बाथरूम की ओर चल दी। बाथरूम कमरों से थोड़ा बाहर की तरफ था। इस तरह नंगा घूमना उसे बहुत आनंद दे रहा था। वह सोच रही थी कि उसे मर्द तो मिलना नहीं है, पर ऐसे खुला-खुला रहना कितना अच्छा लगता है। इन खयालों में वह अपना तौलिया लाना भी भूल गई थी। करीब आधा घंटा लगाकर उसने इलेक्ट्रिक रेजर से अपने शरीर के सारे बाल साफ कर लिए। काफी दिनों बाद अपने अंगों को बिना बालों के देख उससे रहा नहीं गया और वह वहीं बैठी-बैठी अपनी योनि में उंगली करने लगी। जब वह फारिग हुई, तो उसे आज बाकी दिनों से ज्यादा मजा आया। जब उसने अपने सिर के बाल भी धो लिए और नहा लिया, तब उसने देखा कि वह तो नंगी ही आई थी और तौलिया भी नहीं लाई थी।


गुरप्रीत फिर बेफिक्र हो गई क्योंकि उसे लगा कि घर में कौन है। पर वह इस बात से अनजान थी कि रिकी घर आ गया है। मुख्य गेट खुलने की आवाज गुरप्रीत ने सुनी ही नहीं थी। रिकी को पता था कि गुरप्रीत दीदी बाथरूम में नहा रही हैं, इसलिए उसने तब तक चाय बना ली थी। दुकान से घर आते हुए वह चाय के साथ खाने के लिए समोसे-छोले और टिक्की ले आया था। उसे पता था कि मम्मी घर नहीं हैं, जो खाना मम्मी बनाकर गई होंगी, वह रात को खा लेंगे।


रिकी मजे से मेज लगाकर, चाय डालकर और समोसे प्लेट में रखकर अपनी बहन के बाहर आने का इंतजार कर रहा था। उधर गुरप्रीत ने एक बार अपने पूरे शरीर से पानी पोंछ लिया ताकि बाहर फर्श गीला न हो। उसका कमरा करीब 50-60 कदम की दूरी पर था। गुरप्रीत अपनी बैसाखियों के सहारे चलते हुए बाहर अभी 20-25 कदम ही आई थी कि सामने उसका छोटा भाई बैठा था।


लकड़ी की बैसाखियों की आवाज सुनकर रिकी ने ऊपर देखा, तो उसकी आँखें फटी रह गईं। उसकी बहन उसके सामने पूरी तरह नग्न खड़ी थी, बाल खुले हुए थे। एक-दो पल के लिए तो गुरप्रीत पत्थर बनकर खड़ी रही। शर्म के मारे फिर उसने अपना मुँह घुमा लिया और उसकी पीठ उसके भाई की तरफ हो गई। पर वह नंगी थी, इस हड़बड़ाहट में वह लड़खड़ा भी गई; वह भागकर अपने कमरे में जाना चाहती थी।


यह देखकर रिकी खुद ही बोल पड़ा, "दीदी अंदर चली जाओ, कहीं गिर न जाना, मैं अंदर चला जाता हूँ।"


गुरप्रीत कुछ नहीं बोली, बस चुपचाप अंदर चली गई। रिकी भी एक बार अपनी बहन का रूप जी भर कर देख चुका था—इतनी करीब से अपनी बहन के स्तन और उसके कूल्हे भी, जो शायद टांगों के खराब होने के कारण सामान्य से ज्यादा बड़े हो गए थे। गुरप्रीत भी अंदर आकर सोच रही थी कि यह क्या हो गया। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ था। भले ही उसे अपने कमरे में लगे कैमरों का पता था, पर इस तरह भाई के सामने पूरी नग्न हालत में पहली बार आई थी। वह अभी सोच ही रही थी कि बाहर से रिकी की आवाज आई, "दीदी आ जाओ, समोसे और चाय ठंडी हो जाएगी।"


गुरप्रीत ने जल्दी से कपड़े पहने और अपनी व्हीलचेयर पर बैठकर बाहर आ गई। अपने भाई के सामने बैठने में उसे शर्म तो आ रही थी, पर रिकी ने कोई बात नहीं की तो वह भी थोड़ी सहज होकर मजे से खाने लगी। चटपटा खाना लड़कियों का पसंदीदा होता है, गुरप्रीत को भी ऐसा खाना बहुत पसंद था।


खैर, इसी तरह रात हो गई। रात को कुछ खास नहीं हुआ। इधर तो कुछ नहीं हुआ, पर उधर कोमल का ससुर आज अकेला ही अपना लिंग हिला रहा था, अपनी बहू और बेटे के संभोग की आवाजें सुनकर। करीब 12 बज चुके थे पर अमन और कोमल सोने का नाम नहीं ले रहे थे। रोज की तरह आज भी कोमल 'घोड़ी' बनी हुई थी और सिमर पीछे से उसकी कोमल योनि में धक्के मार रहा था। शरीर से शरीर टकराने की आवाज पूरे घर में गूँज रही थी। दूसरे कमरे में अमन की बहन तनू भी अपनी योनि में उंगली करके सो गई थी, पर मिंटू (कोमल का ससुर) नहीं सो पा रहा था। एक तो उसकी पत्नी जसप्रीत कौर उसके छोटे भाई को सुख देने उनके घर गई हुई थी, क्योंकि उसके भाई की पत्नी अपनी छोटी बेटी के साथ अपने मायके गई हुई थी। आज शाम ही उसके भाई परमिंदर ने फोन कर दिया था कि भाभी रात को आ जाना। जसप्रीत भी 9 बजे चुपचाप छत की दीवार फाँदकर उधर चली गई थी।


मिंटू से नियंत्रण नहीं हुआ, तो वह पेशाब करने और पानी पीने के लिए बाहर आया। पेशाब करने के बाद पानी पीकर वह अपने कमरे में जा रहा था कि न चाहते हुए भी वह खुद-ब-खुद अपने बेटे के कमरे के बाहर जाकर अंदर झाँकने लगा। अंदर 'जीरो वाट' का बल्ब जल रहा था। उसे ज्यादा कुछ तो नहीं दिखा, बस अपनी बहू कोमल की टांगें उसके बेटे के कंधों पर रखी हुई हिलती नजर आ रही थीं। बाकी वह देख नहीं पा रहा था। पर उसकी बहू की नंगी टांगें ही उसके अंदर आग लगा रही थीं।


करीब 5 मिनट हो चुके थे उसे देखते हुए कि अचानक उसके कान खिंचे। उसने मुड़कर देखा तो सामने जसप्रीत कौर खड़ी थी। देखने से ही पता लग रहा था कि वह अभी संभोग करके आई है; चेहरे पर थप्पड़ों के निशान थे और बाल बिखरे हुए थे। जसप्रीत कान पकड़कर मिंटू को कमरे में ले गई। अंदर जाते ही जसप्रीत कुत्तों की तरह मिंटू पर टूट पड़ी।


जसप्रीत: हरामखोर, कुत्ते! तुझे कहा था ना कि अगर दोबारा गलती की मेरी बहू के कमरे की तरफ जाने की या उसे गंदी नजर से देखने की, तो मैं तेरा जुलूस निकाल दूँगी। कपड़े उतार जल्दी, हरामजादे कुत्ते!


जसप्रीत की आवाज न चाहते हुए भी ऊँची होती जा रही थी। पर मिंटू को आज पता नहीं क्या हुआ, वह जसप्रीत की बात मानने के बजाय लेट गया। जसप्रीत यह देखकर और गुस्से में आ गई और मिंटू की तरफ देखकर बोली, "अच्छा यह बात है? चल फिर मैं भी देखती हूँ कि कितनी देर तू शेर बनता है। पहले तो तू मुझसे मार खाकर बच जाता था, अब तेरा जुलूस हम सब मिलकर निकालेंगी।"


इतना कहकर जसप्रीत ने जूती पहनी और अपनी बेटी तनू के कमरे में जाकर उसके पास लेट गई। तनू इस वक्त नंगी ही लेटी थी। अपनी योनि से खेलने के बाद वह नंगी ही सो गई थी। जसप्रीत कौर भी सीधे आकर तनू के साथ लेट गई क्योंकि कमरे में पूरा अंधेरा था। जब जसप्रीत ने करवट ली, तो नंगी तनू को डाँटते हुए बोली, "यह क्या बेशर्मी है? नंगी क्यों लेटी है? रुक जा, थोड़े ही दिन बचे हैं तेरी शादी को भी।"


तनू अपनी माँ की डाँट सुनकर उठ बैठी क्योंकि वह गहरी नींद में थी।


तनू: माफ करना मम्मी जी, आगे से यह गलती नहीं करूँगी।


इतना कहकर वह उठकर कपड़े पहनने ही वाली थी कि जसप्रीत ने उसे रोक दिया, "मुझे माफ कर दे, मैंने अपना गुस्सा तुझ पर निकाल दिया। रहने दे, ऐसे ही सो जा जैसे तेरा मन करता है।"


तनू फिर लेट गई और बोली, "आपको आधी रात को गुस्सा किस बात पर आ गया?"


जसप्रीत: एक तो तेरा बाप गलती करता है, ऊपर से मुझसे अकड़ रहा है। इसलिए मैं तेरे पास आ गई।


तनू अपनी माँ को गले लगाते हुए बोली, "शांत हो जाओ 'मदर इंडिया', इतना गुस्सा अच्छा नहीं आधी रात को... चलो एक काम करो, आप भी मेरी तरह कपड़े उतार दो, फिर देखना ऐसे खुले-खुले सोने का कितना मजा आता है। मैं दरवाजा बंद कर देती हूँ ताकि कोई और न आ जाए।"


इतना कहकर तनू ने उठकर दरवाजा बंद कर दिया। जसप्रीत भी आधी रात को अब नई बहस में नहीं पड़ना चाहती थी, इसलिए उसने चुपचाप अपनी सलवार-कमीज और अंतःवस्त्र उतार दिए। ब्रा तो वह पहनकर ही नहीं गई थी जब अपने देवर के पास गई थी। कपड़े उतारकर वह तनू के साथ लेट गई। तनू कुछ देर गले लगकर अपनी नंगी माँ के शरीर के साथ खेलती रही। अपनी माँ के बड़े कूल्हों पर हाथ फेरकर उसे मजा आ रहा था। हाथ फेरते-फेरते ही कब दोनों को नींद आ गई, पता ही नहीं चला।
 

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