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Thriller 100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)

nain11ster

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अध्याय 11 भाग:- 8 (जिंगदी का पहला लंबा सफर)





नकुल, संगीता के ओर देखकर मानो जैसे धन्यवाद कह रहा हो. संगीता अपनी बात आगे बढ़ती हुई कहने लगी... "माफ करना मै पूरे हफ्ते समय नहीं दे पाई, लेकिन अब वक्त है एक ब्रेक का.. सो कल से हम अगले 8-10 दिन बंगलौर से केरल के रोड ट्रिप पर होंगे...


नकुल:- हम मतलब कौन कौन संगीता दीदी...


संगीता:- मै, ऋतु, तुम, और मेनका..


लगभग एक हफ्ते बोर होने के बाद ये पहला अवसर खुशी का था. सुबह 5 बजे हमे निकालना था, इसलिए मै अपने और नकुल की पैकिंग करने चल दी. वो दोनो भी अपनी-अपनी पैकिंग कर रही थी. चूंकि नकुल खाली बैठा हुआ था, इसलिए संगीता ने उसे सामान की कुछ लिस्ट दे दी और वो लाने चला गया...


कुछ ही देर में पैकिंग करके मै किचेन में थी और पीछे से संगीता और ऋतु भी पहुंच गई. मैं पीछे मुड़कर दोनो को एक बार देखी और आगे सब्जी काटती हुई... "मुझे लगा हमारे साथ मिथलेश भी होगा"..


संगीता:- धत्त पागल, मै अपने भाई के साथ हूं, वहां अपना बॉयफ्रेंड ले जाऊं..


मै:- मुझे कोई इश्यू नहीं है. वैसे जब आप नकुल को गर्लफ्रेंड के साथ यहां आने के लिए कह सकती है, तो अपने बॉयफ्रेंड के साथ ट्रिप पर नहीं जा सकती, बात कुछ हजम नहीं हुई..


संगीता:- छोड़ो भी, जाने भी दो, इसपर बात नहीं करते..


ऋतु:- अब इतना भी क्या फॉर्मल होना संगीता.. दरअसल बात ये है कि मिथलेश आज कल अपनी ही दुनिया में रहता है.. ना जाने कौन से सदमे मे है, बस एक ही बात कहता है…… कुछ दिन रुक जाओ, जब दिल को सुकून मिल जाएगा फिर वापस पहले जैसा हो जाऊंगा..


ऋतु की बात सुनकर मै संगीता को देखने लगी. वो मुझसे ऐसे नजर चुरा रही थी मानो कह रही हो, इस बात को यहीं खत्म कर दो. मै संगीता की हालात समझ सकती थी, इसलिए मै कहने लगी… "शायद ये ट्रिप मिथलेश के लिए भी जरूरी हो, क्योंकि ये वक्त है उसे हिम्मत और हौसला देने का. कुछ वक्त साथ अकेले में बीताने से बहुत सी तस्वीरें साफ हो जाती है"..


इतना कहकर मै अपना काम करने लगी और संगीता किसी गहरी सोच मे डूब गई. कुछ समय बीतने के बाद संगीता मुझसे कहने लगी... "शायद तुम ठीक कहती हो, मिथलेश को एक हॉलिडे की जरूरत है..


मै:- ये हुई ना बात... वैसे ऋतु आपका ब्वॉयफ्रेंड तो नहीं आने वाला ना..


ऋतु:- नह फिलहाल मेरा कोइ ब्वॉयफ्रेंड नहीं. ताज़ा-ताज़ा ब्रेकअप हुआ है..


मै:- क्या बात कर रही है.. मेरे बेचारे नकुल का भी ताज़ा-ताज़ा ब्रेकअप हुआ है..


संगीता:- क्या बात कर रही हो.. वो उस नीतू के साथ ब्रेकअप कर लिया क्या?


मै:- नहीं उस नीतू ने नकुल से ब्रेकअप करके, नीलेश के साथ पैचअप कर ली...


संगीता:- कुत्ता साला वो... एक रात मै उस नीलेश के साथ थी.. जब भी उस वाक्ए को याद करती हूं, खुद से ही घृणा हो जाती है...


मै:- खुशी के मौके पर ऐसे बेकार लोगों को याद नहीं करते.. नकुल दर्द नहीं बताएगा पर नीलेश और नीतू ने मिलकर उसे बहुत दर्द दिए है..


ऋतु:- देखो ऐसा है कि तुम दोनो का भाई दर्द मे है और मै ब्रेकअप झेल रही, अगर तुम दोनो को ऐतराज नहीं तो इस ट्रिप के लिए मै नकुल को अपना बॉयफ्रेंड बाना लेती हूं..


"क्या, क्या, क्या क्या क्या क्या".. ये "क्या" ना जाने कितनी देर तक मेरे दिमाग मे घूमता रहा... फिर मै हैरानी से ऋतु के ओर देखती... "किसी को तुरंत भाई बनाते तो देखी थी, लेकिन ये बॉयफ्रेंड बनाते.. बॉयफ्रेंड अब ऐसे बनाते है क्या. किसी लड़के की दुख भरी कहानी सुनी और तुरंत रिजर्व कर लिया"…


संगीता:- तू कुछ बड़ी नहीं लगेगी उसके लिए...


ऋतु:- तो कौन सा सामने खड़े होकर मैच लगाना है और घर वालों से जाकर बात करनी है कि शादी करवाओ… 8-10 दिन का बॉयफ्रेंड ही तो बना रही..


8-10 दिन का नाम सुनकर एक बार फिर मेरा दिमाग घूम गया. ये लड़कियां यहां कर क्या रही है. मेरा तो दिमाग कुछ भी समझने की स्तिथि में नहीं था. अंत में संगीता मुझसे पूछने लगी... "तुम्हे इस बात से कोई परेशानी तो नहीं मेनका"..


मै खुद से कहती... "मुझे उस फ्रौड नीतू से जब कोई परेशानी नहीं थी, फिर इससे क्यों होगी.. उसे तो बस पार्टनर चाहिए. वैसे भी ऋतु के दिमाग में तो हर बात बिल्कुल क्लियर है"… मै सोच ही रही थी कि एक बार फिर संगीता मुझसे पूछी और मैंने भी कह दिया, इस मामले में मै बीच में नहीं पड़ती... ये नकुल और ऋतु के बीच का मामला है...


अगली सुबह ही एक शानदार बस हमारे फ्लैट के दरवाजे पर रुकी.. उसे देखकर मै हैरानी से पूछने लगी... "कितने लोग जा रहे है"


संगीता:- अंदर जाओ समझ जाओगी..


मै जैसे ही अंदर जाकर वहां का नजारा देखि तो दंग रह गई. वो बस ना होकर जैसे कोई शानदार फ्लैट लेकर घूम रहा हो. 2 बेडरूम केबिन, हॉल एरिया जहां सोफे और लक्जरी चेयर लगे हुए थे. किचेन बाथरूम सब.


हम सब अपने-अपने सामान लेकर अंदर पहुंचे. संगीता जैसे ही बस में चढ़ी मै जीगयसावश पूछने लगी, ये आपने कहां से अरेंज की. इसमें तो ज्यादा खर्च लग जाएगा. तब ऋतु ने बताया कि ये कंपनी की लक्जरी बस है, हमे मिनिमम कीमत पर मील जाती है..


मै:- कितनी मिनिमम कीमत..


संगीता:- ये 10000 रोज के हिसाब से... फ्यूल अलग..


ऋतु:- एक बात मै पहले बता दूं.. यहां अमेरिकन सिस्टम है, जो भी खर्च होगा सबमें बराबर बंट जाएगा...


मै:- कोई नहीं इसके रोजाना का किराया मै और नकुल देख लेंगे, बाकी का रोड ट्रिप आप लोगो का..


संगीता:- पागल हो क्या? नकुल को पहले सब पता है.. तुम दोनो को मै लेकर जा रही हूं, इसलिए अपने पैसे अपने पास रखो, बाकी सब मै देख लूंगी...


उनकी बात सुनकर मै कुछ नहीं बोली. बस अपने रास्ते चल चुकी थी. रास्ते से ही फिर मिथलेश को लेते हुए हम सब निकल चुके थे बंगलौर से केरला के रोड ट्रिप पर. जिंदगी में पहली बार मै किसी रोड ट्रीप पर थी. बस अपने पूरे रफ्तार मे थी और हम सब कुछ देर अपना सामान जमाने के बाद हॉल में बैठ गए.


थोड़े नास्ता पानी के बाद मै पुरा टूर प्लान पूछने लगी. संगीता और ऋतु काफी एक्साइटेड होती हुई रोड ट्रीप के बारे में बताने लगी. लगभग 8 से 10 दिन का टूर था, जिसमे पहला डेस्टिनेशन मैसूर था. मैसूर घूमने के बाद हम रात में वहां से केरल के लिए निकलते, जिसका पहला डेस्टिनेशन गुरुवायूर, केरला मे होता.


केरल की जानकारी और वहां की हरियाली को जानकार मै और नकुल काफी उत्साहित थे. पता नहीं क्यों लेकिन हमे शुरू से ही नेचर से बहुत प्रेम रहा है. 8 बजे के करीब हम मैसूर में थे.


मैसूर के लिए सारी प्लांनिंग ऋतु ने कि थी. यहां के कुछ डेस्टिनेशन शाम से लेकर रात तक देखने वाले थे, इसलिए सुबह की पहली शुरवात हमने मंदिर से कि. सहर से लगभग 15 किलोमीटर मीटर दूर चामुंडी हिल्स पर श्री चामुंडेश्वरी मंदिर से.


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सुबह 8 बजे ही हम मंदिर के रास्ते पर थे. श्री चामुंडेश्वरी मंदिर इतनी ऊंचाई पर स्थित थी की हम दूर से उसे देख सकते थे. और जब हमने पास से देखा तो और भी ज्यादा दिल खुश हो गया. मंदिर में प्रवेश करते ही सबको घूमने के लिए 10 बजे तक का समय मिला हुआ था.


सब अलग-अलग घूमने निकले हुए थे. मैं अलग होते ही अपने पूरे खानदान को एक तरफ से कनेक्ट किया. जो लोग उपलब्ध थे, उन्होंने वीडियो कॉल अटेंड कर लिया. मेरे दोनो भाई जैसे स्क्रीन से निकलकर नकुल का गला दबोच ले, मुझे अकेला देख वैसी ही प्रतिक्रिया दे रहे थे.


मै उन्हे समझाती हुई कहने लगी.…. "यहां मंदिर में आने के बाद मैंने ही नकुल से कहा था कि तू अपना घूम और मै भी अपने हिसाब से मंदिर घूमती हूं." फिर मैंने उन्हें कहा कि.… "उसके साथ होती तो उसके साथ घूमती, उसे अकेला इसलिए छोड़ा, क्योंकि मै आप सबके साथ घूमना चाहती थी"…


कुछ देर घर के लोगों को मंदिर दिखाने के बाद मैंने कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया और फिर खुद मंदिर घूमने लगी. काफी बड़ी और आकर्षक जगह थी. मुझे घूमते हुए सबसे ज्यादा देर हो गई. तकरीबन 10.30 बजे, मै बस के अंदर पहुंच गई, जहां सब लोग पहले से मेरा इंतजार कर रहे थे. और क्या बात थी ऋतु की, वो नकुल के किनारे से ऐसे चिपक कर बैठी थी, मानो रजिस्टर ही कर लिया हो. उन्हे देखकर मै अंदर से खुश होती हुई कहने लगी… "चलो इसी बहाने तू नीतू के दर्द से निजाद पा लेगा"…


बस से हम सहर के आउटर रोड तक पहुंचे और वहीं बस को छोड़कर हम कॉल टैक्सी में चल दिए. एक टैक्सी मै, ऋतु और नकुल थे. दूसरे टैक्सी मे संगीता और मिथलेश. सेकंड डेस्टिनेशन जीआरएस वाटर फैंटेसी पार्क.. लगभग सुबह के 11 बजे.



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ऐसा लग रहा था मै सपनो के सफर पर निकली थी. वाटर पार्क किसी नदी स्नान जैसा ही था, बस यहां स्नान करने की व्यवस्था काफी रोमांचक थी. किसी भी तरह के परिधान पहन कर इस वाटर पार्क को एन्जॉय किया जा सकता था. इसलिए मै अपने सलवार सूट मे ही ज्यादा कंफर्टेबल थी. वहीं ऋतु और संगीता स्विमिंग कॉस्ट्यूम मे आ चुकी थी, और नकुल मात्र एक बरमूडा में था.


संगीता:- तुमने चेंज नहीं किया मेनका..


मै:- हां सोच तो मै भी रही थी संगीता, कपड़े कहां मिलते है..


ऋतु:- हद है यहीं पास खड़े होकर पूछ रही हो कहां मिलते है कपड़े. तुम्हारे सामने ही तो हमने कपड़े लिए है...


मैंने उन्हे आगे बढ़ने कही और काउंटर से जाकर एक फूल बॉडी टॉवेल उठा लाई. मै नहीं चाहती थी कि भींगे बदन होने के बाद कोई भी मेरे सीने को घुरे. हालांकि इस जगह पर तो लोग खुद को डिसेंट ही दिखा रहे थे, लेकिन यहां मौजूद लगभग सभी मर्द चोरी छिपे तार ही रहे थे. जैसे कि मेरा स्वीटो नकुल, बार बार चोरी छिपे ऋतु की छाती और गोरे जांघ को चोरी छिपे तार रहा था...


तौलिया को मै शॉल की तरह ओढ़कर उनके पास पहुंच गई. मुझे देखकर संगीता और ऋतु मुझे ऐसे देखी, मानो अजूबा देख लिया हो.. "अब सब लोग ऐसे क्या देख रहे हो, चलो चलो नदी स्नान को"… मै भी बिना उनके प्रतिक्रिया की परवाह किए अपनी बात कह दी...


मेरी बात सुनकर ऋतु हमे लीड करने लगी और हमारा सबसे पहला अनुभव था, ड्रैगन डेन. उफ्फ बनाने वाले ने इसे क्या सोचकर बनाया था, वहां तो सच मे आग उगलने वाले ड्रैगन थे. डर और रोमांच के बीच का ये राइड मेरे लिए सदा यादगार रहेगा. यह इतना रोमांचित करने वाला था कि हम लगातार दूसरी बार भी ड्रैगन डेन मे गए.


हमारी दूसरी राइड तो पूरी तरह से रोमांच के साथ साथ जानलेवा थी. नहीं जान जाने का कोई खतरा नहीं था, बस जिस ऊंचाई से स्लाइड करते नीचे जा रहे थे, वो नीचे जाने का अनुभव ही अपने आप में जानलेवा था. हमलोग एक्वा रेसर मे पहुंच गए थे. ऊंचाई जानलेवा, घुमावदार टनल और ओपन स्लाइड. ऊंचाई देखकर ही मेरी छाती ऊपर नीचे होने लगी.


बाकियों का भी वही हाल था, केवल नकुल को छोड़कर. वो तो नीचे जाने के लिए कुछ ज्यादा ही उत्साहित था. हालांकि बाकी के लोग पहले भी यहां आ चुके थे, लेकिन ऐक्वा रेसर मे कभी नहीं आए थे. किसी तरह हिम्मत जुटा कर मै स्लाइड के लिए बैठी, और 3 के गिनती के साथ ही हम चिल्लाते हुए नीचे जा रहे थे.


पहले तो केवल ऊंचाई ही एकमात्र डर था, लेकिन यहां से नीचे स्लाइड करना तो जैसे पुरा जानलेवा था, यदि वो घुमावदार गोल-गोल मोड़ ना हो, फिर तो किसी की स्पीड कंट्रोल ही ना हो और सिधा जाकर पानी में घुस जाए.


मेरी तो दोबारा हिम्मत नहीं हुई, लेकिन बाकी के लोगों ने बस इतना ही कहा, देखने में खतरनाक है लेकिन उतना खतरनाक भी नहीं है... पहले तो मुझे आश्चर्य लगा की ऐसा क्यों कह रहे है, लेकिन ज्यों ही हम अगले राइड, यानी पेंडुलम राइड के लिए पहुंचे, वहां इनकी बात समझ में आ गई.


पेंडुलम राइड 35 फिट की ऊंचाई से शुरू होती है, जिसका स्लोप सीधा नीचे तक जाता है, बीच में बिना कोई घुमावदार मोड़ के. गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध 35 फिट से नीचे जाना वो भी बिना कोई ब्रेक लगाए, अंदाज़ा लगा सकते है...


ऊपर के लोगों ने पहले ही हमे चेता दिया कि आप कुछ देर तक पानी के अंदर ही घुसे रह जाएंगे.. मै तो नहीं जा रही थी, लेकिन संगीता ने मुझे खींचकर अपने साथ एक गोल रबर के बने थोड़े बड़े टब जैसे दिखने वाले वस्तु मे बिठा लिया और हम दोनों 35 फिट के स्लोप से बिल्कुल तेजी के साथ नीचे आए. चिल्लाती हुई मैं पानी में इतना तेज घुसी की मुंह नाक सबमें पानी घुस गया. लेकिन साथ में संगीता थी और उसे इस राइड का कुछ ज्यादा ही अनुभव था, इसलिए उन्होंने मुझे पानी के अंदर ढूंढकर, ऊपर किया.


मै अपना टॉवेल संभालती खांसती हुई ऊपर हुई. संगीता मेरे पास आकर पूछने लगी कि तुम ठीक तो हो.. मै अपनी श्वांस सामान्य करती हुई कही... "ऐसा लगा जैसे मै मर गई. लेकिन अच्छा था, एक बार और ट्राय करे क्या"..


संगीता हंसते हुए मुझे आंख मार दी और हमलोग सेकंड राइड के लिए तैयार थे. हम तैयारी कर रहे थे तभी मेरी नजर नीचे गई जहां पानी मे ऋतु, नकुल को तंग कर रही थी. अचानक ही ऋतु नकुल का गला दबोच कर उसके ऊपर आ गई और दोनो का बैलेंस बिगड़ने से दोनो पानी के अंदर घुस. लेकिन मुझे ऐसा क्यों लगा कि पानी के अंदर जिस वक्त दोनो जा रहे थे, ऋतु ने अपने होंठ नकुल के होंठ के ऊपर रखी हुई थी.. शायद बैलेंस बिगड़ने से ऐसा हो गया हो या जान बूझकर, कौन जाने.. लेकिन अंदर से मुझे बहुत ही अजीब फीलिंग आयी....
 

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अध्याय 11 भाग:- 9 (जिंगदी का पहला लंबा सफर)







"अब जाने भी दो. दोनो अपनी मर्जी से थोड़ा एन्जॉय कर रहे है, करने दो.".. संगीता ने मुझसे कहा. मै भी आंख मारती हुई कहने लगी... "नकुल को उसकी गर्लफ्रेंड के साथ देखकर मुझे कोई असहजता महसूस नहीं होती क्योंकि, वो मेरा दोस्त भी है."…


मेरी बात पर हम दोनों ही हसने लगे और अगले ही पल हमारी चींख निकल गई. दोबारा से वहीं अनुभव करना अपने आप में ही रोमांचित करने वाला था. थोड़ी देर बाद ऋतु ने खुद सबको वाटर पार्क से चलने के लिए कह दिया, क्योंकि वाटर पार्क अपने आप में एक पूरे दिन का इवेंट था, इसलिए उसने बाकी का फिर कभी आकर एन्जॉय करने बोल दिया.


हम सब चेंज करके जीआरएस वाटर पार्क से निकल आए. मै और संगीता तो नकुल को ही देख रहे थे, कैसे वो ऋतु के प्रति आकर्षित हुआ जा रहा था. वो भी कुछ कम नहीं थी. एक तो वो हमेशा इतने चुस्त आउटफिट पहनती की उसकी पूरी गोलाई उभर कर बाहर दिखती, ऊपर से नकुल के किनारे से ऐसे चिपक कर बैठती या चलती थी कि उसके एक साइड का स्तन, नकुल के दाएं या बाएं जिस भी किनारे से चिपक रहा हो, पुरा चिपका ही रहता.. एक तो नकुल की कच्ची उम्र ऊपर से ऐसे प्रलोभन, इंसान ही है वो...


लगभग 3.30 बजे दोपहर हमे हम लोग पहुंचे ऐसी जगह, जो मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था. सुका वाना, तोते के लिए ऐसी संरक्षित जगह जहां का मनमोहक दृश्य देखकर हर पंछी प्रेमी को इस जगह से प्यार हो जाए..


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यहां का दृश्य प्रेरणा योग्य था, क्योंकि पहले के मुकाबले अब आकाश में उड़ते पंछियों को संख्या बिल्कुल खत्म होती जा रही है. वहीं एक ही जगह मे तोतों की इतनी ज्यादा प्रजाति देखकर मै तो रोमांचित हो गई. हाय कितना प्यारा वो पल था, जब 2-3 तोते मेरे ऊपर आकर बैठ गए. मै भी इसका और ज्यादा लुफ्त उठाने के लिए, अपने दोनो हाथ फैलाकर स्थिर खड़ी हो गई, और पंछी कभी मेरे सर पर तो कभी मेरे हाथों पर बैठ जाते थे.. अपने हाथों जब मैंने उन्हे खाना खिलाया, दिल में एक अलग ही एहसास था.


हल्का शाम का माहौल हो रहा था. थोड़े से अल्पाहार के बाद हम सब सहर से दूर एक और मनमोहक जगह पर निकले, जिसका नाम वृंदावन गार्डन था. शाम के बाद उसकी सुन्दरता देखने का एक अलग ही आनंद था. इतनी मनमोहक जगह की इसकी खूबसूरती को देखकर आप खुद को इस जगह पर खोने से रोक नहीं पाएंगे.


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चूंकि हल्का अंधेरा हो गया था इसलिए हम सब साथ घूम रहे थे. तभी अचानक संगीता मुझे और मिथलेश को लेकर गार्डन के दूसरी ओर चल दी, इधर नकुल और ऋतु दूसरी ओर. पहले तो लगा संगीता अपनी और मेरी मौजूदगी नकुल के ऊपर से हटा रही है, ताकि वो खुल सके.


जब ये ख्याल आया तो साथ में गुस्सा आना भी लाजमी ही था. ठीक है नकुल को बॉयफ्रेंड समझ कर ऋतु यें ट्रिप एन्जॉय करेगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हे 8-10 दिन इतनी ना प्राइवेसी दे दो की नकुल का दिल ही उसपर आ जाए. बेचारे का दिल आ गया तो ये लड़का तो ब्रेकअप किंग बन जाएगा, एक में बाद एक लगातार ब्रेकअप... मै इन्हीं सब बातो को सोचती पहले गुस्सा हुई तो फिर बाद में हंसी भी निकल आयी. इससे पहले कि संगीता से मै कुछ पूछती, इतने में संगीता और मिथलेश ठीक मेरे सामने खड़े थे...


मिथलेश:- कुछ बातें सबकी मौजूदगी में नहीं की जा सकती थी, इसलिए अलग लेकर आना परा...


संगीता, वही किनारे लगे बेंच पर सबको बैठने का इशारा करती हुई... "आओ आराम से बात करते है. मेनका कुछ पता चला क्या तुम्हे..."


"ओह ये मिथलेश का मैटर था. मै खा-म-खा नकुल का समझ बैठी"… नकुल के ख्यालों को विराम देते हुए मै मिथलेश से कैहने लगी... "आप ठीक तो है ना."


मिथलेश:- नकुल कहीं गायब हो जाए और क्या हुआ ये तक पता ना हो, तो तुम कैसी रहोगी..


मै:- हम्मम ! माफ कीजिएगा मै शायद गलत सवाल कर गई. ये कुछ सामान है, इनमे से किसी सामान को आप पहचान सकते है क्या?

मै जानती थी कि ऐसा वक्त जरूर आएगा जब ये सवाल उठेगा की मैंने मिथलेश के काम को कहां तक पहुंचाया. मैंने मिथलेश के मामले को लेकर जितनी छानबीन करवाई थी, उसमे मुझे कुछ छोटी-छोटी चीजें हाथ लगी थी, जिसे मै अपने हैंड बैग में ही लिए घूम रही थी. मिथलेश उन सामान मे से एक टूटी हुई लेडी घड़ी को अपने हाथ में उठाकर मुझे हैरानी से देखने लगा... "ये मेरी बहन अर्पिता की है.. कहां से तुम्हे मिली, मेनका बताओ ना. कहां से ये मिली है"..


मै:- कहां से मिली है वो तो बताउंगी ही लेकिन..


मिथलेश:- लेकिन क्या?


मै:- लेकिन अब वो इस दुनिया मे नहीं रही...


मै बता नहीं सकती वहां कैसा माहौल हो गया. मिथलेश की आखें नम थी और कई सारे सवाल. अंदर से वो पुरा टूटा हुआ था और अपनी बहन अर्पिता के साथ हुआ क्या, उसे जानने के लिए पागल बना हुआ था.


मै:- संगीता, ये जब पूरे होश में आ जाए तो मुझे बता दीजिएगा, मै सारी बात बता दूंगी.. अभी मिथलेश जी थोड़े गम मे है..


मेरी बात सुनकर मिथलेश पूरे गुस्से में, लगभग चिल्लाते हुए कहने लगा.… "मुझे पूरी बात बताओ मेनका. जिसकी बहन महीनों सर लापता है उसका दर्द तुम क्या जानो"..


मै:- दर्द जानने के लिए क्या मै अपने भाई को गायब करवा दुं, या अपनी किसी बहन को... दर्द आपको है तो उसके लिए लोगों को क्यों कहते है कि तुम क्या जानो मेरा दर्द... हम दर्द जाने या दर्द की दवा का पता लगाए, और दर्द से आपको उबरे? क्या चाहते हो, आपकी तरह दुनिया भर के लोगों के बहन-भाई भी गायब हो जाए, ताकि वो आपका दर्द समझ सके.. जानती हूं आपने अपने किसी बहुत ही करीबी को खोया है, काफी सदमे मै है. तो क्या है हर किसी के साथ वैसा ही होता रहे और वो आपका दर्द जानता रहे...


संगीता:- सॉरी मेनका, मिथलेश के कहने का वो मतलब नहीं था, तुम बुरा मत मानो...


मै:- "मैंने बुरा माना होता तो मै यहां से जा चुकी होती. इसलिए मै पहले कही थी कि जब होश में हो तब बात करने. क्योंकि मिथलेश जी अपना जोश अपने सहर मे पहले भी दिखा चुके थे, कुछ और ज्यादा जोश दिखाते तो ये भी गायब हो जाते. और जब ये गायब हो जाते, फिर इनके माता पिता का क्या होता... फिर वो लोग आगे की जिंदगी इस सवाल के साथ गुजारते की उसके बच्चो के साथ क्या हुआ होगा? जिंदा है या मर गए? किस हाल में होंगे? और विश्वास मानिए मरने से ज्यादा तकलीफ इन परिस्थितियों में होती है, क्योंकि जिंदा होने की आस और लौटकर एक दिन आएगा, ऐसी उम्मीद उम्र भर तड़पाती है..."

"मै इनकी तरह जोश दिखाकर, इनके काम कर रहे लोगो को उंगली करने लगी, तो वो लोग भी सामने वालों की नजर में आ जाएंगे, और शायद वो भी ना कहीं गायब हो जाए.. तब क्या होगा? मै भी उनकी नजर में आऊंगी और जो कुछ भी अब तक आप दोनो ने मिलकर किया है, फिर सब भुल जाइए की उसके आधार पर आप उनका कुछ भी बिगड़ सकते है, क्योंकि ये लोग खुद को बचाने के लिए एक के बाद एक सबको ऐसे गायब करेंगे, कि सबके घर के लोगों का हाल मिथलेश जी जैसा हो जाएगा. गायब तो है लेकिन पता नहीं लग पाएगा की हुआ क्या था और हर कोई उम्र भर सस्पेंस मे ही मरता रहेगा..."

"जोश जिस जगह दिखाना है वहां जोश दिखाइए ना.. अपने दोस्तो से मिलने मे जोश दिखाइए. अपनी तरक्की मे जोश दिखाइए.. अपने घर परिवार को खुश रखने में जोश दिखाइए..."

"दुश्मनी धीमी आंच पर पकती है वहां जोश नहीं दिखाना चाहिए, वरना एक छोटी सी गलती, सबकुछ सत्यानाश कर देती है. जब मामला कमजोर और ताकतवर के बीच का हो, तो कमजोर को अपनी बारी आने तक बिल्कुल शांत रहना चाहिए. होश में रहना चाहिए. मै जा रही हूं, मिथलेश जी से तभी बात होगी जब मुझे लगेगा की ये पूरी तरह से होश में है और आगे भी होश में रहने वाले है.."


मै अपनी बात कहकर वहां से उठकर चली आयी. हां थोड़ा गुस्सा जरूर आ रहा था, की एक तो इसके लिए इतना रिस्की काम करवा रही थी, ऊपर से मुझे ही दर्द की कहानी समझा रहा था. खैर मै वहां से उठकर चली तो आयी, लेकिन संगीता से महज 10 कदम की दूरी पर ही थी..


अब क्या बता दूं क्यों 10 कदम की दूरी पर थी. वृंदावन गार्डेन का नजारा तो सुहाना था, लेकिन मुझे रात में अकेले घूमने से ही डर लगता था. पता नहीं मेरी हार्ट बीट अपने आप ही बढ़ जाती थी. उधर संगीता और मिथलेश के बीच आपस की बातें चल रही थी और मै इतने खूबसूरत नज़ारे को छोड़कर उन्हे ही देख रही थी.


तभी मेरे कानो मे वो खिल खिलाती हंसी की आवाज सुनाई देने लगी.... "वाह भाई तुम तो मेरे आस पास हो.. सॉरी नकुल बेटा तेरे रंग में भंग डालने के लिए"... मैंने नकुल के आवाज के पीछे चल दी, ऑफ़ ओ क्या नजारा था, यहां लड़का फास्ट था या लड़की, मेरे समझ में नहीं आ रहा था."


मै जैसे ही आगे जाकर बाएं मुड़ी, वहीं थोड़ी दूरी पर, एक एक पेड़ के किनारे ऋतु और नकुल खड़े थे. मेरे देखते ही देखते नकुल ने ऋतु का हाथ खींचकर अपनी बाहों में ले लिया... "अरे सबाश लड़के, तू तो वृंदावन में वाकई रास लीला रचने लगा"… मै सोच ही रही थी कि इतने में होंठ से होंठ जुड़ गए..


मै हंसती हुई अपना मुंह फेर ली. कितना भी दोस्त मान लू, लेकिन इतनी भी मॉडर्न नहीं हुई की नकुल की रास लीला अपने आखों से देख सकूं. मै अपने ही सर पर हाथ मारती हुई अपना फोन निकाली और झूठा ही इतनी जोर से बात करने लगी कि नकुल के कानो तक बात चली जाए.


लगभग 2 मिनट तक मै मुंह दूसरी ओर किए बात करती रही, लेकिन अब तक नकुल मेरे पास नहीं पहुंचा. मै दबी मे, धीरे से उस ओर मुड़ी जिस ओर नकुल था. "हा हा हा हा हा हा.. लड़का वहां से अपनी लड़की लेकर गायब हो गया था.. और मै पागल, सोच रही थी, उसके कानो मे आवाज जाएगी तो मेरे पास पहुंचेगा. वाह रे दुनिया"..


अगले ही पल मैंने चारो ओर का अवलोकन किया. अब तो नजर के सामने ना तो नकुल था और ना ही संगीता. मै तुरंत नकुल को कॉल लगा दी और उसे मैंने कह दिया, फोन पर बात करते करते मै गुम गई हूं, जल्दी आ मुझे डर लग रहा. मै जबतक फोन अपने बैग में रखती, तब तक नकुल मुझे नजर आने लगा था.


मै झटक कर नकुल के ओर चल दी. कम ड्रामेबाज वो भी नहीं था. जैसे ही वो मेरे पास आया, मुझ पर नाराजगी दिखाते हुए कहने... "दीदी मुझे अपना फोन दे दो, ये क्या बात हो गई की आप नाच-नाच कर बात करने के चक्कर में अपने ग्रुप से ही अलग हो जाओगे"..


"साले हरामी, मेरे प्यार का तू अच्छा फायदा उठा रहा है. और ये ऋतु भी तुझे लिफ्ट देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही. उसके सीने के पास कपड़ों की सिलवटें सारी बातों की गवाही दे रही है, कि तू मेरी आवाज सुनकर क्यों भागा था.. रास लीला से रुक नहीं सका और मुझे ज्ञान देने चला है.. रुक मै अभी ग्रहण बनती हूं तेरे अरमान पर"…


मै अंतर्मन मे सोच ही रही थी कि तभी ऋतु... "मेनका चलो भी साथ घूमने, अब नकुल के बात पर इतनी भी क्या नाराजगी."


मै:- सॉरी, गलती मेरी ही है भाई... अब से ये मेरा फोन तेरे पास.. कम से कम मेरा फोन तेरे पास रहेगा तो तू मेरी बात भी करवा दिया करेगा और मेरे फोन पर बात करने के क्रम में मेरे साथ-साथ तू भी नाच भी लेगा"..


उफ्फ, लड़के की शक्ल देखने लायक थी. दबी सी हंसी ऋतु की भी निकल गई, क्योंकि शायद उसकी नजरें भी भांप चुकी थी कि मेरी नजरों ने उसके सीने पर क्या नोटिस किया था. नकुल आगे-आगे चल रहा था, ऋतु मेरा हाथ पकड़कर 5-6 कदम पीछे कर दी और खुस्फुसती हुई कहने लगी... "क्यों हम दोनों के मज़े के बीच ग्रहण बन रही हो"…


मै:- जब नकुल ने मेरी आवाज सुनी तो उसे मेरे पास आना चाहिए था ना, उसे पता है की सुनसान जगह पर मुझे दिन में डर लग जाता है, फिर तो यहां का माहौल अनजान, सुनसान और हल्के अंधेरे वाला है...


ऋतु:- ओह तो तुमने मुंह फेर कर फोन पर इसलिए बात शुरू की ताकि नकुल का ध्यान खींच सको, मुझे लगा तुम्हे अच्छा नहीं लगा इसलिए तुम हमे वहां से जाने के लिए जान बूझकर फोन के बहाने से सुना रही हो कि तुम भी यहां हो..


"वाह !! वाह !! वाह !! सुना इसलिए रही हूं कि कहीं और जाकर अपनी रास लीला रचाओ. जी तो कर रहा है चार चप्पल मारूं. पति पत्नी भी हो तो क्या पब्लिक मे अपनी बहन के सामने रास लीला करेंगे, देखने में अजीब और खराब नहीं लगेगा क्या पागल.. जानता तो हर कोई है कि गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड के बीच क्या-क्या हो सकता है, इसका ये मतलब की सबको दिखाकर करोगे.. क्या यही सब देखने मै इस ट्रिप पर आयी हूं जाहिल लड़की. कामिनी तेरे चक्कर में मै ढंग से वृंदावन नहीं देख पाई. एक ही दिन में तूने उस बैल को इतना खुला निमंत्रण दे दी है कि वो अब पगलाए घूम रहा है, और अब ऐसा लग रहा है कि मै पूरे ट्रिप गिल्ट मे घूमती रहूंगी. ठीक से घुमुंगी भी या नहीं वो भी नहीं पता. बेशर्मी का इतना नंगा नाच नाचने के लिए मेरा ही नकुल मिला था, कोई और नहीं मिला"…


ऋतु की बात पर मै अद्भुत ख्यालों मे थी और अंदर ही अंदर पूरी तरह से गुस्सा. वो मुझे खुद को घूरते देख समझ गई की मेरे दिमाग में बहुत सी बातें चल रही है. वो मुझे हिलाकर लगभग जागती हुई कहने लगी... "हमे किस्स करते देख तुम्हे अच्छा नहीं लगा ना.. सॉरी"..


मै:- "हद पागल हो. ये तुम्हारा जो सोचना है कि उसकी किसिंग देखकर मुझे अच्छा लगा या बुरा, तुम्हारा ऐसा सोचना ही पागलपन है. तुम्हारा भाई तुम्हारे सामने अपनी गर्लफ्रेंड को किस्स और स्मूच करे तो तुम क्या आखें फाड़कर देखोगी.... मुझे बहुत ही ज्यादा अजीब और खराब लग रहा था.. अंदर से अब तक गिल्ट फील हो रहा है कि मै ये सब देखी..."

"मैटर ये भी नहीं है की बंद कमरे की किसिंग को देख ली हूं, जो मज़ाक में छेड़ती हुई कह दूं, कम से कम घर में पर्दे का ख्याल करो और मेरी बात सुनकर किस्स करने वाले कपल पूरे दिन शर्माए शर्माए घूम रहे हो.. यहां तो सब कुछ खुल्लम खुला चल रहा है.. तुम्ही बताओ क्या रिएक्शन दूं.. हम उम्र है, दोस्त है, तुमने कहा 10 दिन के लिए बॉयफ्रेंड, तो चलो वो भी मान ली. लेकिन इतना खतरनाक इसका असर होगा, सब कुछ मेरी आंखों के सामने..



ऋतु:- मतलब तुम्हे मेरा उसके साथ होना से कोई परेशानी नहीं..


मै:- नहीं बिल्कुल नहीं, बस ये सब कुछ अजीब लग रहा है, जिसे मै एक्सप्लेन नहीं कर सकती..


ऋतु:- सो सॉरी, शायद मुझे ये बात तुम्हे नहीं बतानी चाहिए थी कि नकुल को मै ट्रिप पर अपना बॉयफ्रेंड बाना लेती हूं. मुझे लगा दोनो बस रिलेटिव हो लेकिन अब लग रहा है कि दोनो जुड़वा भाई बहन हो. ऐसी बातें तो अजीब लगेगी ही.. मै पूरी कोशिश करूंगी कि तुम्हे कुछ भी अजीब ना लगे..


ऋतु की बात सुनकर मै तो जोड़ से हंसी ही, वो भी जोर-जोर हसने लगी. इसकी तो ये ना की झूठा ही कह दे, अब हमारे बीच कुछ नहीं होगा, और सब कुछ रात के अंधेरे में बिना किसी की जानकारी के करे. दिन भर जितने नैन मट्टका करने है करे ना. लेकिन नहीं शादी से पहले पूरे मजे करने है, और मै तो मज़े करूंगी ऐसा भी बताना है. मुझसे तो देखा नहीं जाएगा... मैसूर से बंगलौर ज्यादा दूर भी नहीं क्यों ना इन सबको एन्जॉय करने दू, और मै ही यहां से चली जाऊं, फिर सब ठीक हो जाएगा...
 

nain11ster

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पहला अध्याय रक्षा बंधन पर आधारित था । मेनका की ममेरी बहन रूपाली और उसके भाइयों के साथ ।
दुसरा अध्याय मेनका की सुरक्षा के लिए था जिसे राजवीर सिंह ने किया था । और रूपाली एवं उसके मंगेतर नितेश पर भी था जहां रूपाली को मेनका के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ती है ।
मेनका का बड़े पापा के साथ कन्वर्सेशन भी हुआ था..... ये इमोशनल था ।
तीसरा अध्याय फेजान के फैलाए हुए रायते पर था । पंचायत बुलाई गई जहां महादेव मिश्रा और राजवीर की ही तुती चलती है । महादेव मिश्रा काफी ताकतवर शख्स हैं ।
चौथा अध्याय.......
मेनका के साथ बदतमीजी की कीमत विधायक को अपने तीन बेटों की बलि चढ़ा कर देनी पड़ी । सहजाद, अमजद और फेजान.... तीनों को मार दिया गया ।
मैंने गैंगपुर आफ वासेपुर नहीं देखा है लेकिन यदि ऐसा हुआ होगा तो भी मुझे हजम नहीं हो रहा है ।
कैसा बाप है ? कैसा भाई है ? पोलिटिकल फायदे के लिए अपनों को ही यदि बलि चढ़ाना है तो इससे वाहियात काम और क्या होगा । एक नहीं बल्कि अपने तीन तीन बच्चों को कौन मरवाता है ?
वैसे पृथ्वीराज चौहान के बाद जो भी शासन आया , वहां हमने ऐसे कारनामे कई बार पढ़े हैं .... एक विशेष कौम में ।
लेकिन आज के जमाने में ये प्रासंगिक नहीं लगता है ।

सभी अपडेट बेहतरीन थे नैन भाई ।

Gang of Wasseypur me bhai bhai ke khilaf thodi si sjais hai uska udharahan kewal maar kaat ke liye liya gaya tha...

Baharhaal ... Aap kuch chhoti chhoti baton ko bhul gaye hain..

1) Bhai bhai ke mamle me aaj bhi.. daulat aur sampati ki lalach me ek bhai dusre bhai ke liye katl ki sajis karta hai.. aise kayi mamle aapko akhbar ke panno se mil jayenge... Ye aaj bhi utna hi bada satya hai...

2) mamla jab political ho to baap bete ka bhi katl karwa sakta hai kyonki ek ke wajah se sabki jaan halakh me rahti hai... Iska best example hai mere pas kisi taza ghatna ka jiski chapet me 41+ aham log natkiya tarike se maare gaye jisme ek baap ne Apne Bete Ko bhi maara tha.. afsos yahan detail nahi kar sakta..

3) liyakat kabhi Rajveer ki najron me hero nahi ban sakta kyonki 3 logon ka support liyakat ko uske kaam ke liye mila tha... Rajvir, liyakat ke baap aur pushpa aur amruta ka husband ka support, jiske bute par wo puri list saaf kar gaya.. aur ye list mahadev mishra ki thi ..

Aur finally .. aapko is kahani me aage aur bhi kayi aise mauke milne wale hai jise dekhkar aapko pahle lagega ki ye prasangik nahi hai..

Journey ke sath chalte rahiye.. anth tak sab prasangik ho jayega.. jiska best example hai roopa bhabhi ke bhai ka case...
 

nain11ster

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विधायक का सबसे संस्कारी लड़का लियाकत ही निकला ।
कितना बढ़िया काम किया उसने.... अपने पोलिटिकल फायदे के लिए अपने तीन सगे भाइयों को मरवा दिया । बहुत बढ़िया ।
एक और भी अच्छा काम किया उसने..... मेनका को कार के साथ डेढ़ करोड़ रुपए भी गिफ्ट किए ।
लेकिन दुःख इस बात का है कि मेनका ने वो गिफ्ट स्विकार कर लिए । सैकड़ों लोगों के लाशों बहाकर लियाकत हीरो बन गया ।
शायद महादेव मिश्रा , राजवीर के साथ साथ पुरा गांव लियाकत का फैन हो जाए । क्योंकि उसने मेनका की मदद की ।
लेकिन............. वो विलेन ही रहेगा ।

मेनका और उसके फादर में बहुत बढ़िया कन्वर्सेशन हुआ ।
मेनका को कुछेक दिनों के लिए गांव से बाहर चले जाना चाहिए ।

बहुत बढ़िया अपडेट नैन भाई ।

Haan main sikayten samjh raha hun.. lekin aap kewal kahani ka wo bhag dekh rahe hain jo main aapko dikha raha.. kahani puri ho jane dijiye fir aap wo bhi apne aap samjh jayenge jo main yahan nahi dikhana chahta..

Bahut mehnat se isse plot kiya hai wo bhi bina kisi hint ke isliye puri baat ko samjhne ke liye ant tak to aapko jhelna hi hoga.. smile please..

Ya fir aap chhote chhote kadi ko jodkar bahut kuch niskarsh par pahunch sakte hain .. kyonki sab kuch yahin samne likha hai bus dhyan se ek baar samjhne ki jaroorat hai.. agar us chhoti si chij ko aap samjh gaye to puri kahani ka najariya bhi badal jayega aur sab kuch apni jagah bilkul sahi hai wo bhi samjh jayenge..

Best of luck .. isse jyada bata na sakunga ..
 
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aman rathore

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अध्याय 11 भाग:- 5 (जिंगदी का पहला लंबा सफर)






इस बात पर जैसे ही कोई प्रतिक्रिया आता, उससे पहले ही मासी चली आयी और बाजार चलने के लिए कहने लगी. बारिश लगभग समाप्त हो चुकी थी. हम सब तैयार होकर बाजार निकले. बेचारी गौरी, वो चाहती नहीं थी नकुल के साथ जाए लेकिन हमारी जिद के वजह से वो साथ मे बैठ गई.


गौरी को देखकर मै और अनु दीदी अंदर ही अंदर हंसे जा रहे थे और बस तमाशा शुरू होने का इंतजार ही कर रहे थे. नकुल ड्राइविंग सीट पर बैठ था. मै मासी को लेकर पीछे बैठ गई और अनुराधा दीदी जल्दी से पीछे घुस गई. बेचारी गौरी कुछ देर तक कार के बाहर ही खड़ी रही.


मासी की एक फटकार और वो चुपचाप कार के अंदर. जैसे ही नकुल ने कार स्टार्ट किया... "तो गौरी कौन से पिछड़ों के उत्थान करने में लगी हो"..


गौरी:- मम्मी इससे कह दो मै इससे बात नहीं करना चाहती..


मासी:- मुझे उसके सवाल मे कुछ भी बुराई तो नहीं दिख रही. ऊपर से तुम्हारे इंट्रेस्ट का विषय है फिर तो तुम्हे परेशानी नहीं होनी चाहिए ना..


नकुल:- छोड़ो मासी, समोसे मे लाल चटनी खाने से शायद गौरी इरिटेट हो गई होगी, अभी बाजार से हरी चटनी के साथ समोसा खिला देंगे, तो सब सही हो जाएगा...


अब हो गया शुरू, मै और अनुराधा दीदी तो फिर भी हसी दबा लिए, लेकिन मासी की हंसी छूट गई और गौरी चिल्लाती हुई मासी से कहने लगी... "अब भी ये मेरा विषय है क्या?"


मासी:- गौरी चिल्लाते नहीं.. उसे कहा हरी पुदीने की चटनी से तुम्हारा दिमाग ठंडा रहेगा..


नकुल:- मासी लेकिन मै तो हरी मिर्च की चटनी की बात कर रहा था..


गौरी:- बोलते रहो मुझे क्या? वैसे भी मै क्यों इरिटेट हो जाऊं.. मैंने तो बस उस बाबा को एक बार ट्राय किया था..


नकुल:- फायदा मिला था गौरी, तभी तो हर एक्जाम के पहले ट्राय की थी ना..


मै:- नकुल बस बहुत हुआ, उतना ही इरिटेट करो जितना अच्छा लगे.. अब तुम पहले चटनी से शुरू करोगे.. फिर उसके फेवरेट लव चार्जर बाबा पर पहुंच जाओगे... इंसान वाली इंसानियत सिखाओगे.. ये सब गलत है हां..


(विश्वास करने वालों लोगों की भावनाओ को मै ठेस नहीं पहुंचाना और ना ही मै उनका मज़ाक उड़ा रहा हूं.. यह मात्र करेक्टर के बीच विश्वास करने और ना करने पर मज़ाक चल रहा है. फिर भी यदि बुरा लगा हो तो क्षमा कीजिएगा)


मासी:- बस बहुत हुआ, अब और नहीं. नकुल और मेनका बस..


मासी ने जैसे ही हम दोनों को चुप रहने कही, गौरी की मुस्कुराहट मै पीछे से मेहसूस कर सकती थी. बात को मै भी बदलती हुई कहने लगी... "मासी मुझे भाई से मिलना है, चलो ना उसे भी साथ ले लेते है"..


अनुराधा:- मां कुछ घंटे की स्टडी वो मेनका के लिए ड्रॉप कर ही सकता है..


हम तीनो बात कर ही रहे थे कि तभी कार किनारे करके नकुल ने रोक दिया और मुझे ड्राइव करने के लिए कहने लगा. उसकी बात सुनकर तो मासी और बाकी दोनो बहने चौंककर आश्चर्य से कहने लगे, कि मै कैसे कार ड्राइव कर सकती हूं. किसी को तबतक यकीन नहीं हुआ जबतक मै ड्राइव करके दिखा नहीं दी.


मै ड्राइव करती हुई मासी से पूछने लगी कि मैक्स अभी कहां है, कार वहीं ले लेते हैं. इधर जबतक नकुल मोबाइल मे लगातार घुसा हुआ था. मासी मुझे रास्ता बताती गई और मै उसके ग्रुप स्टडी करने की जगह पर कार ले ली. मासी ने मुझे एक घर के पास कार रोकने के लिए कहा और खुद नीचे उतरकर देखने गई. लेकिन बाहर ही मुख्य द्वार पर ताला लटका था. पता चला हम उसे यहां ढूंढ रहे है और वो घर चला गया...


हम वापस शॉपिंग पर चल दिए और मासी उसे घर से शॉप पर ही बुला ली. कुछ ही देर में हम शॉप पर थे. हमे देखकर मौसा जी पहले तो खुश हो गए, लेकिन बाद में उनके माथे से पसीना आने लगा, उतने मे ही सामने से अनुराधा दीदी के पति मनोज जीजू भी कहते हुए चले आ रहे थे... "पापा आप उठकर क्यों.. क्यों.. चले आए. मम्मी जी आप कब आयी"… इतना कहते-कहते उनके माथे से भी पसीने आने लगे..


अब मुझे इस पसीने की कहानी के पीछे नहीं जाना था, मै तो जीजू से मिलने चल दी. तभी मासी मुझे रोकती हुई कहने लगी… मेनका कल हम चूड़ियां लेंगे, अभी चलो कहीं और चलना है"…


मौसा और जीजू का चेहरा देखने लायक था, वो दोनो अनुराधा दीदी से कुछ बात करने लगे और अनुराधा दीदी उनकी हालत पर हंस रही थी. मौसी आगे बाहर निकली पीछे से अनु दीदी और मै निकले. मै सवालिया नजरो से उन्हे देखती हुई पूछने लगी अभी यहां हुआ क्या..


अनु दीदी ने मुझे फुसफुसाते हुए बताया कि ससुर जमाई बैठक में थे, उन्हे मम्मी के आने की उम्मीद नहीं थी और वो यहां पहुंच गई. मै फिर उन्हे सवालिया नज़रों से देखते... "साथ बैठक मतलब पीने वाली बैठक ही ना"..


दीदी हां मे अपना सर हिला दी और मेरी हंसी छूट गई. मौसी ने मैक्स को भी आने से मना कर दिया और कुछ देर बाजार घूमकर हम सब वापस घर पहुंच गए. मै आते ही सीधा मैक्स के कमरे में घुस गई जहां वो बैठकर स्टडी कर रहा था. मेरे पीछे-पीछे हड़बड़ी मे नकुल भी घुसा... "ओय आराम से आ ना ऐसे धक्का मुक्की करके क्यों जा रहा है"…


मैक्स:- दीदी मै बाद में मिलूं क्या, अभी थोड़ी देर स्टडी कर लूं.


मै बेमन से उसे ठीक है भाई कहती हुई वहां से निकल गई, लेकिन मेरे साथ नकुल बाहर नहीं निकला. मै अभी दरवाजे के पर्दे से बाहर निकली ही थी कि मुझे कुछ अंदर खुसुर फुसुर सुनाई दी. मुझे दाल मे कुछ काला होने का अंदेशा मिलने लगा.


"मैक्स ने मुझे बाहर कर दिया लेकिन नकुल से बात कर रहा है, कमाल है ये भी".. मै सोच ही रही थी कि तभी अनु दीदी वहां पहुंच गई और मै उनके साथ निकल गई. फिर हम तीनो बहन का मस्ती मज़ाक चलता रहा. लेकिन अभी के परिवेश में असली मज़ा तो रात के वक्त आना था, जब मौसा जी और मनोज जीजू घर पहुंचते...


जैसे ही दोनो घर पहुंचे, मासी का गुस्सा सातवे आसमान पर और दोनो की जो ही क्लास लगाई, बेचारे बस अपना सर झुकाए खड़े थे. मासी के डांटने का कोटा पूरा होने और हम सब के खाने के बाद, मै मनोज जीजू को लेकर अनु दीदी के कमरे में चली आयी.. मनोज जीजू मुझे देखकर आज कुछ ज्यादा ही मज़ाक के मूड से थे..


मासी के नज़रों से ओझल होते ही वो मेरी ओर देखकर कुटिल मुस्कान हंसते.. "लॉलीपॉप लागेलू"..


मै:- छी जीजाजी, ये कैसा कॉम्प्लीमेंट दे रहे है..


जीजू:- इतनी हॉट साली को देखकर ऐसे ही कॉम्प्लीमेंट निकालता है..


मै:- क्या छिछोड़ी लाइन मार रहे हो जीजू..


जीजू:- तो डिसेंट शब्द तुम ही बता दो, जिससे पट जाओ..


मै अपने दोनो हाथ हिलाती... "जीजाजी पटाना और आप... खुद से तो आप किसी को पटा नहीं पाओगे. अच्छा है जो ये ख्याल आपको शादी के वक्त नहीं आया, और आप अनु दीदी को पटाने का नहीं सोचे. वरना सारी उम्र चक्कर काट काटकर घनचक्कर बन जाते. वो तो शुक्र मनाइए की रिश्ता आया था, और शादी तय हो गई..


जीजू:- ये तो बेइज्जती करना हुआ साली साहिबा..


मै:- जीजू अब जिसकी खूबसूरत साली होगी उसे थोड़ा तो सहना ही पड़ेगा...


जीजू:- तुम हो तो लगता भी है कि मेरी कोई साली है वरना एक गौरी है.. पता नहीं उसके दिमाग में क्या चलता है, मुझसे बात ही नहीं करती, क्या मै इतना बुरा हूं...


मै:- जीजू आप भी ना कितना सोचते है. 10th मे वो बेचारी अभी पढ़ रही है समझदारी ही कितनी होगी. वैसे भी मै बात करूं या वो, समझिए हम दोनों एक ही है. अब मूड ठीक कीजिए..


जीजू हंसते हुए... "तुम बहनों का प्यार देखता हूं तो कभी-कभी सोचता हूं कि मै इकलौता क्यों पैदा लिया. मेरे भी भाई बहन होते तो मै भी उनसे इतना ही लगाव रखता. मै तो कल ही तुम्हारे गांव आ रहा था, लेकिन पापा (मौसा जी) ने मना कर दिया. कहने लगे वहां से फोन आया था किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है."


मै:- हां पापा ने बताया था आप और मौसा जी 18 गाड़ियों के साथ आने की प्लांनिंग मे जुटे थे...


जीजू:- अब बात मेरी प्यारी साली कि हो रही हो तो 18 क्या 1800 गाडियां लेकर पहुंच जाते. कोई बड़ी बात है क्या... और सुनाओ कल की क्या प्लांनिंग है मेरे साथ..


मै, थोड़ी नाराजगी दिखाते... "आप के चक्कर में आज मेरी चूड़ियां रह गई, आप तो कल के बारे में मत ही पूछो.."


जीजू:- बस इतनी सी बात, सुबह ही चूड़ियां लेते है, उसके बाद का बताओ..


मै:- जी नहीं, मेरी मासी ने मेरे लिए चूड़ियां देखी है और मै उन्ही के साथ जाऊंगी..


जीजू:- मेनका मम्मी जी का एक क्लासिकल डांस का प्रोग्राम बनाओ ना..


मै:- आप ही कह दो, क्यों मुझे फंसा रहे हो..


जीजू:- वो तुम्हे थोड़े ना डांट सकती है, इसलिए कह रहा.. बाकी हम सब को तो वो कब लपेट ले पता ही नहीं चलता...


मै:- आपको भी क्या जरूरत हो जाती है यहां आकर पीने की. मासी को कितना दुख होता है आपको पता भी है.. उनकी खुशी के लिए 2-4 दिन शराब से दूर ही हो गए तो क्या चला जाएगा...


"क्या बात हो रही है जीजा साली मे"… अनु दीदी हमे ज्वाइन करती हुई पूछने लगी..


जीजू:- मेनका मुझसे कह रही है, 2-4 दिन यहां शराब से दूर क्यों नहीं रहते..


अनुराधा:- हीहिहिही.. ये तो कभी कभार वाले है मेनका, पापा ही जबरदस्ती कसम देकर बिठा लेते है...


मै:- अब इसपर क्या कह सकते है.. बेचारे मेरे मौसा जी..


मेरी बात सुनकर सभी जोर-जोर से हसने लगे. काफी दिनों बाद सब इकट्ठा हुए थे बात करते-करते कब रात के 12 बज गए पता ही नहीं चला. काफी देर तक बातें चलती रही. 12 बजते ही मासी भी पहुंच गई, और सभा को भंग करती सबको सोने जाने के लिए कहने लगी...


अनु दीदी पूरी प्लांनिंग को बदलती जीजू को उसी कमरे में छोड़ दिया और हम दोनों बहन गौरी के कमरे में आ गए. वैसे तो वो सो चुकी थी और मासी भी हमे वहां जाने से मना कर रही थी, लेकिन जब हम दोनों साथ में हो तो मासी को भी सर झुकना ही परता है.


जबरदस्ती रूम खुलवाकर, रात के 3 बजे तक हमने गौरी को जगाए रखा. मेरे लिए तो एक लंबा दिन था जो रात के तकरीबन 3 बजे खत्म हुई. मासी के यहां इतने ड्रामे चलते है कि दिन बीतने में वक्त ही नहीं लगता..


शाम को हम सब चूड़ी की शॉपिंग करने शॉप पहुंचे.. मासी पहले से ही हमारे लिए तनिष्क की शानदार चूड़ियां देख रखी थी. मै और अनु दीदी तो चूड़ियां देखकर ही "हाय कितनी प्यारी है" कहने लगे. उत्सुकता मे हम वहीं पहनकर अपने हाथ देख रहे थे.


रूबी और डायमंड की कंबो वाली चूड़ियां थी, जिसे देखकर ही हम दोनों का दिल उन चूड़ियों पर आ गया. फिर तो मै और अनु दीदी मासी को बीच में लेकर अपना अपना प्यार जाहिर करने लगे... मनोज जीजू उस दिन हमारे साथ घूमने के बाद अपने सहर निकल गए.


अगले 8-9 कैसे बीते वहां, पता ही नहीं चला. फिर पहुंच गया मेरा पूरा परिवार. पापा गांव का काम पूरा समेटकर पहुंच गए. हां पापा के आने के बाद एक बात जो मौसा जी के साथ अच्छी होती, वो ये कि वो खुलकर पीते थे और घर में पीते थे. पापा के सामने मासी फिर कुछ बोल नहीं पाती थी.


पुरा परिवार 2-3 दिन रुककर वहीं से वाराणसी के लिए निकल गए. पापा अपने साथ अपनी झिझक भी लेकर वाराणसी निकल रहे थे. वो बस यही सोच रहे थे कि इतने सालों के बाद अपने बड़े भाई का सामना कैसे करेंगे. अजित भैया हमारे जेनरेशन के सबसे बड़े लड़के थे, और पापा उसके छोटे चाचा. आप सोच ही सकते है उनके साथ मेरे पापा का कितना लगाव रहा होगा..


पापा की असहजता केवल मै ही नहीं, बल्कि पुरा परिवार मेहसूस कर रहा था. वहीं दूसरी ओर जब मैंने बड़े पापा को सबके वाराणसी आने की सूचना दी, 2 मिनट तक उन्होंने कुछ जवाब ही नहीं दिया. फिर विलाप मे डूबे स्वर के साथ उन्होंने इतना ही कहा, पहुंचकर फोन करना..


पापा और बड़े पापा कर बीच की सारी घटनाएं मेरे जन्म के वक्त की थी, इसलिए मुझे जो भी जानकारी मिली थी, वो मां से ही मिली थी और बड़े पापा का फोन नंबर मैंने पापा के मोबाइल से चुराया था..


बड़े पापा और अजित भैया दोनो ही हमे लेने स्टेशन पहुंचे थे. हर कोई उन्हे देखकर मुस्कुरा रहा था, लेकिन पापा और बड़े पापा एक दूसरे को देखकर ठहर गए थे. पापा ने जैसे ही अपना एक कदम आगे बढ़ाया, वो लड़खड़ा गए. महेश भैया ने उन्हे हड़बड़ा कर थामा और बड़े पापा दौड़कर अपने छोटे भाई यानी मेरे पापा के पास पहुंच गए..


वास्तविकता तो ये थी कि मेरे पापा अपने अहम के कारन अपने अंदर इतना आत्मग्लानि मेहसूस कर रहे थे, कि वो बड़े पापा के लगभग पाऊं मे आकर माफी मांगने लगे. जब बड़े पापा के घर में हम रात के माहौल में थे, तब हमे भी अपनी भाभियों का दर्द पता चला.. जिस दिन से उनका गांव छूटा था, तब से लेकर आज तक एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब वो दोनो इस बात को सोचकर अफ़सोस ना की हो... कि उनकी वजह से उनका मायका से लेकर ससुराल और सारे रिश्तेदार छूट गए. पापा से ज्यादा आत्मग्लानि तो मेरे बड़े पापा की दोनो बहुओं को था."


खैर माहौल कुछ घंटों तक इमोशनल ही रहा, फिर पूर्ण पारिवारिक माहौल ऐसा जमा की वहां हंसी और ठहाको कि आवाज गूंज रही थी. हां वो बात अलग थी कि एक दिन के बाद फिर तो मेरे दोनो चचेरे भाई और भाभी इतना बिज़ी हो गए की उनसे बात कर पाना संभव ही नहीं था..


बड़े पापा और बड़ी मां थी, वो हमे लेकर फिर यूपी के कई सारे जगहों पर गए. उनके साथ हम काशी से लेकर हरिद्वार तक गए. मथुरा, वृंदावन और संगम स्नान किया. सबसे मनमोहक तो हरिद्वार और वाराणसी की शाम की आरती थी, जिसे देख मन इतना प्रसन्न हो जाता, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता. हम लोग लगभग 5 दिन वाराणसी सहर मे रहे होंगे और पांचो दिन गंगा घाट की आरती देखी.


लगभग 15 दिन पापा अपने पूरे परिवार के साथ अपने बड़े भाई और भाभी के घर बिताया. आखरी दिन सुबह से ही लंबा डिस्कशन चल रहा था, एक ओर मेरे पापा थे, जो मुझे नकुल के साथ बंगलौर भेज रहे थे, तो दूसरे ओर मेरे दोनो भाई थे, जो यह कह रहे थे कि अभी इनकी उम्र नहीं अकेले कहीं जाने की.


लंबी चर्चा हुई, फिर नकुल ने संगीता दीदी को कॉल लगा दिया. संगीता दीदी ने उन्हे आश्वस्त किया कि वहां आप लोग एयरपोर्ट पर छोड़ दीजिए, यहां मै पिक कर लूंगी. लौटते वक्त पटना से गांव तक मेनका, नकुल के साथ तो जा ही सकती है. यदि वहां भी कोई समस्या हो तो आप मे से कोई पहुंच जाइयेगा पटना, उन्हे लेने..


संगीता दीदी कि बात सुनकर मनीष और महेश भैया दोनो कहने लगे.…. बात केवल आने जाने की नहीं है, उतना बड़ा सहर और महीने दिन तक मेनका का वहां होना.… पापा ने दोनो भाई की बात कटते हुए कहने लगे... "संगीता तो वहां अकेली जॉब करती है, वहीं से उसने पढ़ाई भी की थी. फिक्र होना चाहिए लेकिन फिक्र मे अंधे ना हो जाओ"..


थोड़ी देर तक बाप बेटों में बहस का दौर चलता रहा. अंत में होते-होते फाइनल हुआ की मै नकुल के साथ जाऊंगी. वैसे मुझे साथ ले जाने की नकुल को उतनी खुशी नहीं थी, जितना टेंशन उसने मुझे ले जाकर मोल लिया था. सक्त हिदायत उसे मिली थी, कि वो एक पल के लिए भी मुझे अकेला ना छोड़े.


इसी करार के साथ पहले मै और नकुल ने अपनी हवाई उड़ान भरी और बाद में हर कोई घर के लिए रवाना हुआ. मेरे और नकुल की ये पहली फ्लाइट जर्नी थी, इससे पहले हम कभी फ्लाइट से नहीं गए थे. हम दोनों काफी एक्साइटेड फील कर रहे थे.. एयरपोर्ट के बाहर ही संगीता मेरा इंतजार कर रही थी, हमे देखकर वो मुस्कुराती हुई कहने लगी, वेलकम टू बंगलौर.
:superb: :good: :perfect: awesome update hai nain bhai,
Behad hi shandaar aur lajawab update hai bhai,
menka ne varshon baad dono bichhade bhaiyon ko mila diya hai,
Aur ab vo nakul ke saath apni pahli hawai yatra par nikal gayi hai,
Ab dekhte hain ki aage kya hota hai
 
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अध्याय 11 भाग:- 6 (जिंगदी का पहला लंबा सफर)






संगीता ने एयरपोर्ट पर गर्मजोशी के साथ हमारा स्वागत किया. वाकई नकुल और मेरे आने का वो दिल से खुशी जाहिर कर रही थी. हम तीनो ही संगीता के साथ उनके फ्लैट के ओर चल दी. रास्ते भर हम वहां के चारो ओर का नजारा लेने लगे. ऊंची-ऊंची बिल्डिंग और सड़क पर भागती जिंदगी.. हां वो अलग बात थी कि यहां की बिल्डिंग जितनी ऊंची थी उनके अंदर के मकान उतने ही छोटे...


संगीता अपने रूम पार्टनर ऋतु के साथ 2 बीएचके फ्लैट में रहती थी. संगीता कुछ दिनों के लिए अपने रूम पार्टनर के रूम मे शिफ्ट हो गई. उन्होंने अपना कमरा मुझे दे दिया और नकुल हॉल में एडजस्ट हो गया.


बाकी सब तो ठीक था लेकिन 2 दिन बाद ही मुझे और नकुल को मेहसूस हुआ कि इस जगह मे कुछ ज्यादा ही बोरियत है. दिन भर हम दोनों फ्लैट मे पड़े रहते, ना तो कोई पड़ोसी हमे जानने वाला और ना ही घूमने के लिए ऐसी जगह जहां जाया जा सके.


शाम को हम संगीता के साथ कभी इस मॉल तो कभी उस मॉल मे घूमने जाया करते थे. इसके अलावा और कुछ भी करने को नहीं था. अब लोग शॉपिंग ही करेंगे तो कितना कर सकते है. हां किन्तु कुछ गजेट हमे अच्छी क्वालिटी के वहां सस्ते रेट में मिल गए.


बंगलौर में हमारा ये सातवा दिन था जब नकुल का दोस्त शशांक हमारे यहां फ्लैट पर आया. पिछले 4 दिन से वो यहां आता और दोनो फिर शाम तक घूमने निकल जाते. रोज की तरह वो दोनो बिल्कुल गर्मजोशी के साथ मिले. शशांक से महज औपचारिक बातें करके मै कमरे में चली गई और लैपटॉप ऑन करके बैठ गई. थोड़ी देर बाद नकुल कमरे में आया और पूछने लगा क्या वो शशांक के साथ बाहर जाए. मै मुस्कुराते हुए उसके बाल बिखेर दी और कहने लगी आराम से पुरा घूमकर आना..


कुछ घंटे ही सही, लेकिन मै वहां पूरी अकेले थी. जिंदगी का ये मेरा पहला अनुभव था. थोड़ा असहज और थोड़ा खो जाने वाले पल होते थे. "इस वक्त का भी अपना ही मजा है" … खुद से कहती हुई मै मुस्कुराई और अपने स्टडी मटेरियल को देखने लगी...


किसी ने सच ही कहा है किताब आपका सच्चा साथी होता है. मै एक बार जब अपने किताब मै डूबती, फिर कहां होश था. मुझे तो होश नहीं था लेकिन आज पहली बार ऐसा हुआ था कि नकुल की भी बेहोश होने की खबर आयी थी.


उस वक्त मै और संगीता बैठकर बातें कर रहे थे, जब शशांक ने मेरे नंबर पर कॉल किया और बताया कि नकुल घर जाने के लायक नहीं है. उसकी बात सुनकर मै बता नहीं सकती कितनी परेशान हो गई. फोन मैंने संगीता को दिया और उसके बताए पते पर हम दोनों पहुंचे...


वहां पहुंची तो पता चला वो थ्री स्तर होटल की एक बार थी, जहां नकुल जमीन पर बैठा था, 2 वेटर उसे घेरे हुए थे और उसके पास शशांक नहीं था. हम दोनों भागकर उसके पास पहुंचे. बार के मैनेजर ने हमे पूरी बात बताई. नकुल, शशांक और उसके दोस्तों ने मिलकर 40 हजार का शराब पी गए थे...


मै घुरकर् उस बार मैनेजर को देखी और पूछने लगी... "जब सबने मिलकर पिया था, फिर मेरे भाई को चोर की तरह पकड़ कर क्यों रखे हो"..


बार मैनेजर:- बाकी सब कहां गए हमे नही पता, एक यही बचा हुआ था इसलिए हमने इसे बिठा लिया..


संगीता:- छोड़ ना पेमेंट करते हैं और चलते है.


मै:- पेमेंट तो 40 हजार के बदले मै 4 लाख का कर दूं, लेकिन इनकी हिम्मत कैसे हुए नकुल को ऐसे बिठाने की... ओय क्या मेरे भाई ने दारू ऑर्डर किया था.. बोलते क्यों नहीं..


बार मैनेजर:- देखिए मिस आप चिल्लाए नहीं, हमारे दूसरे कस्टमर डीस्ट्रब हो रहे हैं..


मै:- कुछ देर में तुम्हारा पुरा बार डीस्ट्रब हो जाएगा...


बार मैनेजर:- तुम जैसों को पीने की औकाद नहीं रहती तो ऐसे ही करते हो. लेकिन हमे भी तुम्हे सीधा करने आता है.. मै अभी पुलिस बुलाता हूं..


संगीता:- मेनका बहुत हुआ, चलो. नकुल की हालात भी ठीक नहीं लग रही...


मै:- आप 2 मिनट चुप रहिए. इसने समझ क्या रखा है.. तुम जैसे अपनी तुची हरकत को ढकने के लिए ऐसे पुलिस का नाम लेते हो. डराते किसे हो पुलिस के नाम से.. बुलाओ तुम पुलिस और मै मीडिया बुलाती हूं.. तुम जानते भी हो तुमने 11th के एक स्टूडेंट को दारू पिलाई है.. तुम्हारे पूरे बार का लाइसेंस नहीं कैंसल करवाया तो मेरा नाम मेनका नहीं..


जैसे ही मैंने नकुल की डिटेल और लॉ की बात की, उस मैनेजर को पसीने आने लगे. मै तो पूरे गुस्से में थी इसलिए उन लोगों ने संगीता से ही बात करने में समझादरी समझी..


मैनेजर लगभग मिन्नत करते संगीता से मेरे विषय में कहने लगा.. प्लीज उस लड़की को समझाए कि ऐसा करने से हमारी नौकरी चली जाएगी.. यहां हंगामा नहीं करने... संगीता मेरी ओर लगभग रिक्वेस्ट भरी नजरो से देखती हुई कहने लगी.. "अब तो जो होना था वो हो गया, तुम क्या चाहती हो"..


मै:- ये लोग यहां माईक पर अनाउंस कर सबके सामने माफी मांगे, और कहे कि गलती से उन्होंने नकुल को यहां बिठा दिया, पूरे प्रकरण में उसका दोष नही है. और इज्जत के साथ नकुल को कार में बिठाए, तब जाकर मुझे सुकून मिलेगा.. हिम्मत कैसे हो गई नकुल को चोरों की तरह बिठाने की..


जैसा मैंने कहा ठीक वैसा ही हुआ. वो अनाउंस करके सबके सामने माफी मांगे और नकुल को कार तक छोड़ने आए. संगीता जबतक उसे कार में बिठा रही थी, मैंने उसका पूरा बिल पेमेंट कर दिया. पेमेंट करके मै जैसे ही मुड़ी, सामने शशांक और उसके 2 दोस्त खड़े थे.. "मेनका तुमने क्यों पेमेंट किया, हम तो आ ही गए थे पेमेंट करने.. मैने तो बस नकुल को ले जाने के लिए कह रहा था".


उसकी बातें सुनकर मै गुस्से से और पागल हो गई. खींचकर उसे एक तमाचा मारते... "मैनेजर साहब आपने सुना ना ये पुरा पेमेंट करेगा, मेरे पैसा वापस कीजिए और इनसे पेमेंट ले लीजिए. साथ मे मेरा नंबर भी नोट कर लीजिए. यदि ये पेमेंट ना दे पाए तो कल सुबह मुझे कॉल कीजिए. साथ मे पेमेंट ना देने की स्तिथि में आप लोगों ने इसके साथ क्या किया, उसकी डिटेल हिस्ट्री भी बता दीजिएगा. यदि इनकी रात भर की हिस्ट्री अच्छी लगी तो 40 की जगह 60 हजार पेमेंट करूंगी"..


जितना मैंने बेइज्जत किया था उस मैनेजर को, शायद वो पुरा याद किया. उसने 40 हजार पुरा वापस करते हुए कहा.. "आप जाइए मिस, आप पर पूरा यकीन है कि मेरे पैसे कहीं नहीं जाएंगे.. बाकी इनका क्या करना है वो मै देख लेता हूं.


मै उसके बैच से उसका नाम पढ़ती.. "ठीक है सुरेश कार्तिक भैया, गुस्से में कहा सुना माफ कीजिएगा. हम कभी ऐसे माहौल में नहीं जिए जहां पैसों के लिए कोई हमे ऐसे चोरों की तरह बिठा दे. अंदर से खून खौल जाता है


मैनेजर:- सुरेश कर्तिकेन है पुरा नाम. वैसे मुझे भी आप माफ कर दीजिएगा. क्या करूं ये बार है ना इसलिए पैसे ना देने वालों से जब हम प्यार से मांगकर थक जाते हैं तो मजबूरन हमे कड़ा रुख इख्तियार करना पड़ता है. वो औकाद वाली बात पर मै भी शर्मिंदा हूं. आप जाइए, बाकी मै देखता हूं...


मै, मैनेजर से अपना झगड़ा निपटाकर, वहां से तुरंत कार मे आ गई. नकुल की हालत एक अलग ही चिंता का विषय था. संगीता ड्राइव कर रही थी और मै नकुल को देखकर आंसू बहा रही थी... "संगीता ये पहले से पीता है, फिर इसकी हालत इतनी खराब क्यों लग रही है. बिल्कुल होश में ही नहीं है"..


संगीता:- तुम्हे कैसे पता की ये पीता है..


मै:- बचपन से उसके साथ रहती हूं संगीता, मै नहीं जानुगी तो कौन जानेगा.. कितना भी पी ले, मुझे देखकर होश में ही रहेगा.. उन कुत्तों ने जरूर कुछ मिलाकर पिलाया है..


संगीता:- एक काम करते है फिर, इसे हॉस्पिटल लेकर चलते है. रिस्क नहीं ले सकते..


मै:- हां मै भी वही सोच रही थी..


हम दोनों फ्लैट के थोड़ी दूर पर स्थित एक हॉस्पिटल गए. नाईट डॉक्टर ने उसका चेक उप किया और कुछ ब्लड टेस्ट करने भेज दिया... तकरीबन आधे घंटे बाद आकर कहने लगा... "ड्रग ओवर डोज के कारन हुआ है, एक रात एडमिट करना होगा"..


संगीता:- डॉक्टर कैसा ड्रग ओवरडोज..


डॉक्टर:- इसने पहले मेडिकल नशा किया फिर काफी ज्यादा अल्कोहल लिया है, इसलिए इसकी हालत ऐसी है. इसे कॉडीन फॉस्फेट का ओवर डोज मिला है..


डॉक्टर की बात सुनकर मै रोने लगी. संगीता मुझे कंधे का सहारा देकर मेरी आंसू पोछती हुई शांत की. एक टेबल पर बैठकर हम दोनों ही कॉफी की चुस्की लेने लगे... संगीता मुझे देखती हुई पूछने लगी, तुम्हें कब से पता है कि वो पीता है"..


मै:- इस बार होली का त्योहार से. होली मे ये नकुल मनीष भैया के साथ चाचू चाचू करते जा चिपका था.. बहुत सुनाया था मैंने तो दोनो को..


संगीत:- तुमने फिर छोड़ने के लिए नहीं कहा..


मै:- ज्यादा नहीं कह पाती, हम दोनों हम उम्र भी तो है, इसलिए हम एक दूसरे को लगभग दोस्त की तरह ही ट्रीट करते है. हां लेकिन मेरे टोकने के कारन, मेरे डर से कम से कम लिमिट मे तो रहता है, ज्यादा टोकी तो वो जो एक बीच की छोटी सी दीवार है, वो भी ना चला जाए कहीं. कहीं वो सोचने ना लगे, जब सबको सब कुछ पता ही है तो अब क्या छिपाना.. क्या करूं कुछ बातो में हार जाती हूं.. फिर घर में कौन ऐसा नहीं जो पीता ना हो.. सीखा तो उसने घर से ही है...


संगीता:- चलो कम से कम नकुल मे सेंस ऑफ़ रिस्पांसिबिलिटी तो है. नकुल मे बिल्कुल तुम्हारी छवि है मेनका, उसमे भी तुम्हारी तरह केयरिंग नेचर है..


मै, थोड़ा मुस्कुराती हुई... "सब यही कहते है कि नकुल मे मेरी छवि दिखती है, जबकि सच तो ये है कि मुझमें नकुल की छवि है. वो जितना केयरिंग पूरे खानदान के लिए है और खासकर मेरे लिए रहता है, उसी की वजह से मै भी सबकी केयर करना सीख गई.

आपको पता नहीं है वो कई ऐसे मामले तो बाहर निपटा देता है, जो किसी को पता नहीं चलता. इसलिए लोगों को नकुल के किए का पता नहीं लगता. मै तो कई ऐसे मामले उंगली पर गिनवा सकती हूं...


संगीता:- चलो इस बात से बात समाप्त करते है, कि तुम दोनो कमाल के हो.


मै:- ये हुई ना बात...


सुबह 10 बजे उसे डिस्चार्ज मिला. हालांकि नकुल को होश तो 6 बजे ही आ गया था, लेकिन सीनियर डॉक्टर के सुपरविजन और डिस्चार्ज के बाद ही उसे जाने दिया जाता. मैंने संगीता को जबरदस्ती ऑफिस भेज दिया और नकुल को लेकर फ्लैट चल दी..


वो अपने आप में अफ़सोस कर रहा था, साथ ही साथ मै अपनी नाराज़गी पहले ही दिखा चुकी थी, इसलिए वो हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था मुझसे बात करने की. पूरे रास्ते दोनो के बीच लगभग खामोशी ही बनी रही. जब वो फ्लैट पहुंचा तब सीधा वो अपने कमरे में जाने लगा.. कड़क आवाज में उसे बस खाने के लिए कहने लगी और वहीं हॉल में बैठ गई...


वो 1 ही प्लेट मे हम दोनों के लिए नाश्ता निकालकर ले आया, और खाने के लिए कहने लगा.. मै थोड़ी सी नाराजगी दिखती हुई उसे अकेले खाने के लिए बोल दी. कुछ ज्यादा ही जब वो जिद करने लगा, तो मैने साफ कह दिया मै यहां से चली जाऊंगी.… मेरी बात सुनकर वो खाने लगा और खाकर सोने चला गया.


उसे डांटने का मुझे अफ़सोस भी हो रहा था, लेकिन उसकी हरकत ही कुछ ऐसी थी कि गुस्सा आना लाजमी था. दिन का खाना बनाकर मै 11 बजे के करीब खाकर वहीं हॉल में ही सो गई.. रात भर की जागी थी बहुत गहरी नींद में थी.


बहुत तेज आहट हो रही थी, मेरी नींद खुल गई. आखों के सामने जो नजारा था वो देखकर तो मै दंग रह गई. हॉल के कई सामान बिखरे परे थे और फर्श पर पेट पकड़े शशांक और उसके साथ वही उसके 2 दोस्त थे, जिसे कल मै बार मे देखी थी..


"नकुल तू ये क्या कर रहा है. इन्हे पिट क्यों रहा है. नकुल तू सुन भी रहा है कि नहीं"… मै नकुल का कंधा खींचकर कहने लगी. बड़ी-बड़ी लाल-लाल आंखे मुझे दिखाते हुए कहने लगा.. "बिल्कुल चुप और जाकर बैठ जाओ"..


उसकी बात सुनकर मै उसे खींचकर एक थप्पड़ मारती... "कुछ पूछ रही हूं, मुझे बताएगा"


नकुल लगभग मुझ पर चिल्लाते... "एक बार से समझती नहीं क्या, अभी तुम्हे किनारे रहना है. समझी या नहीं"..


मै हां मे सर हिलाकर पीछे हटती हुई कहने लगी... "खून का एक कतरा फर्श पर नहीं गिरना चाहिए".. और इतना कहकर मै आकर चेयर पर बैठ गई. नकुल काफी गुस्से में दिख रहा था. गुस्से में उसने फिर से तीनो के पेट पर लात जमा दिया... जाकर किचेन से चाकू और बिस्तर से चादर उठाकर ले आया. बड़ी तेजी के साथ चादर को काटकर उसने रस्सी बनाई और एक-एक चेयर पर तीनो को बांध दिया.
:superb: :good: amazing update hai nain bhai,
Behad hi shandaar aur lajawab update hai bhai,
is shashank ke bachche ne to nakul ko drugs bhi sharab ke saath saath pila diya hai,
aur menka ne jis andaaz mein bar manager se deal ki hai :whistle: ,
Ab dekhte hain ki aage kya hota hai
 

aman rathore

Enigma ke pankhe
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अध्याय 11 भाग:- 7 (जिंगदी का पहला लंबा सफर)







इतने में ही संगीता और उसकी रूममेट ऋतु चली आयी. दोनो अपने हॉल का हुलिया देखी, फिर सामने 2 लड़के कुर्सी से बंधे हुए थे और तीसरा लड़का बांधा जा रहा था.. "यहां हो क्या रहा है"… नकुल के कानो मे जैसे ही आवाज गई, वो मेरी ओर देखा... मै संगीता और उसकी फ्रेंड ऋतु का हाथ पकड़कर अंदर ले आयी और हाथ जोड़कर बस चुपचाप बैठने के लिए कहने लगी...


इतने में कर्रहती आवाज में शशांक कहने लगा... "भाई गलती हो गई माफ कर दे"..


नकुल ने खींचकर उसे इतने जोर का थप्पड़ मारा की उसका गाल पर पंजे के निशान छप गए... नकुल उन दोनों से पूछते... "क्यों बे तुम दोनो का बाप क्या करता है"…


पहला लड़का... मेरे पापा बैंक मैनेजर है.


दूसरा लड़का... मेरे पापा बिहार पुलिस मे एसआई है..


नकुल:- और इस शशांक का बाप एक जमींदार है, जो अपने बेटे को एसी मे पाला है.. जानते हो मेरे पापा एक किसान है और उसने मेरी परवरिश किसान की तरह की है.. जब ट्रैक्टर खराब हो जाता है तो बीघा खेत बैल से भी जोत लेता हूं.. घंटो बैठकर खेत में फसल के साथ उगे घास को बैठकर हाथो से उखाड़ता हूं, ताकि फसल अच्छी हो.. साले पोटैसियम पर उगे फसल और सब्जी खाने वाले, पिज़्ज़ा बर्गर लवर्स.. केवल 3 लड़के लेकर आए थे हमे सबक सिखाने..


नकुल बोलता जा रहा था, थप्पड़ उसके चलते जा रहे थे. वाकई मे नकुल अंदर से इतना मजबूत था की इन जैसे 10 लड़को की मार वो घंटो झेल सकता था, लेकिन नकुल के हर थप्पड़ के साथ जैसे उनकी आंखे और चेहरे की बनावट हो रही थी, वो बता रही थी कि तीनो असहनीय पिरा से गुजर रहे है..


उनको इस प्रकार मारते देख ऋतु पूछने लगी... "ये तीनो तुम लोगों के साथ मार पिट आए थे क्या?"


संगीता:- हां मेनका बताओ ना यहां क्या हुआ था?..


ऋतु:- यार ये नकुल तो बिल्कुल किसी फिल्मी हीरो की तरह एक्शन कर रहा है. मैटर बाद में पता करेंगे, एक्शन विथ डायलॉग मज़ेदार है..


संगीता:- मै भी एन्जॉय कर रही हूं..


मै अपने सर पर हाथ रखते... "पागलों ये फिल्म ना है.. मार पीट से मामला बढ़ता है.. अब इन एक्शन लवर्स को कौन समझाए"..


इधर जबतक नकुल, शशांक को घूरते... कुत्ते के पिल्ले 2 साल पहले भी तुझे समझाया था ना, दोस्ती अपनी जगह है लेकिन घर के लोग अपनी जगह, समझाया था कि नहीं...


चटाक से फिर एक थप्पड़.. और शशांक के आंखो से आंसू और मुंह से दर्द भरी चींख निकल गई. नकुल लगभग 20 से 25 थप्पड़ सबको चिपका चुका था. मै बता नहीं सकती की तीनो के शक्ल को, नकुल ने सिर्फ गाल पर मारकर कैसा बिगाड़ दिया था... उसकी बात मै मान चुकी थी, अब नकुल की बारी थी... "नकुल मै तेरे कहने पर यहां आकर बैठ गई थी, अब तू भी इनको छोड़ दे."


नकुल मेरी बात सुनकर फिर से तीनो को 4-5 थप्पड़ घूमाकर देते... "दीदी ने कहा है इसलिए छोड़ रहा हूं. बंगलौर हो या गांव अभी 5-6 साल तू मुझे अपनी शक्ल मत दिखना, वरना तुझे देखकर तेरी बात याद आ जाएगी और जहां दिखेगा वहां मारूंगा, फिर वो कोर्ट हो या पुलिस स्टेशन या किसी मिलिट्री कैंप मे ही क्यों ना बैठा हो"..


नकुल ने तीनो के हाथ खोल दिए, और तीनो को एक-एक लात मारकर दरवाजे से बाहर कर दिया. नकुल बाथरूम के ओर जाते.. "दीदी मेरे कपड़े निकाल दो, मै जरा नहाकर आता हूं"..


मै, उन दोनों को देखती... "सॉरी वो आपके हॉल के समान कुछ टूट गए, मै थोड़ी देर से साफ किए देती हूं"..


ऋतु:- सफाई की चिंता क्यों, अभी सफाई करने वाली आएगी वो सब कर लेगी. और कल भी एक्शन करते वक्त कुछ तोड़ना हो तो तोड़ देना. बस नकुल से कहना अगली बार हाथ-पाऊं खोलकर सामने वालों से बचाव करते हुए मारने..


मै:- ऋतु जी आप कहां की रहने वाली है..


ऋतु:- जबलपुर..


मै:- तो क्या जबलपुर मे ऐसे लड़को की लड़ाई नहीं होती..


ऋतु:- होती क्यों नहीं, वहां भी बहुत मस्त एक्शन होते है, लेकिन ऐसा एक्शन कम ही देखने को मिलता है जहां अकेला 3 पर भारी पर जाए..


मै:- आप धन्य है मिस, मै जरा नकुल के कपड़े निकाल कर आयी..


मैंने नकुल के कपड़े निकालकर रूम मे रख दी थी. वो नहाकर टॉवेल मे ही हॉल से होते हुए कमरे में गया. जब वो जा रहा था ऋतु उसके गठीले बदन को देखकर कहने लगी... "बिना जिम के ही उसने तो इतना गठीला बदन बाना लिया है"..


मै:- गठीला के साथ साथ फुर्तीला भी है. वैसे भी उसकी जो क्षमता है वो किसी जिम से कभी नहीं आ सकती.. हुमारे यहां के एक-एक लेबर की स्टेमिना ऐसी होती है कि उसके सामने जिम जाकर बैल की तरह बॉडी फुलाए लोग 2 घंटे ना टिक पाए. वो तो उन लेबर को काम के अनुसार डाइट नहीं मिलता, लेकिन फिर भी अपना खून जलाते है और काम करने की ऐसी आदत बना लेते है कि थकते नहीं...


इतने में नकुल अपने कपड़े पहनकर बाहर आ गया. मै उसे अपने पास बिठाकर…"यहां अभी क्या चल रहा था"..


नकुल:- जानती हो मेरी मां कहती थी कि ये शशांक मुझे अच्छा नहीं लगता. उसके साथ क्यों रहता है, मै समझ नहीं पाता कभी मां ऐसा क्यों कहती है. मुझे लगता था कि तुम शशांक को बाहरी लड़का समझती हो, इसलिए ज्यादा बात नहीं करती. लेकिन ये तो कुत्ता था, कुत्ता साला. और मै इसके लिए मरा जा रहा था बंगलौर आने के लिए..


संगीता:- मतलब तू मेरी वजह से बंगलौर नहीं आया..


मै:- नाना आपके वजह से ही आया है. शशांक भी एक कारन था जो नकुल को मजबूर कर रहा था बंगलौर आने.. क्यों नकुल..


नकुल:- हां बिल्कुल..


मै:- वैसे तू उसे कल रात के लिए मार रहा था क्या?


नकुल:- थी कुछ बात, जाने दो. मार खाने वाला चाल करेगा, तो मार खायेगा ही..


मै:- और ये कोर्ट में घुसकर मारना, मिलिट्री और पुलिस स्टेशन ये सब क्या था..


नकुल:- ज्यादा हो गया क्या दीदी...


मै:- ज्यादा नहीं बहुत ज्यादा, लेकिन कोई ना फ्लो मे इतना चलता है. वैसे तूने उसे मारा किसलिए वो तो बता..


नकुल:- जाने दो ना मै नहीं बता पाऊंगा.. मै तो सरिया पीछे डालने वाला था लेकिन यहां आप सब हो करके सिर्फ थप्पड़ मारकर छोड़ दिया..


ऋतु:- मुझे कोई समस्या नहीं होती, और हमारे घर में रॉड भी है..


संगीता:- हां सही कही ऋतु..


मै:- ओय तू इन एक्शन लवर्स की मत सुन और मुझे पूरी बात बता.. कल से लेकर अभी तक जो कुछ भी हुआ.....


नकुल:- बोला ना तुम्हे नहीं बात सकता फिर बच्चो जैसे क्यों जिद पकड़कर बैठ गई हो..


मै:- अच्छा मै संगीता, कमरे में जाती हूं, तू ऋतु को बता दे..


नकुल:- तुम्हारे पूरे खानदान की आदत है, सुई एक ही सवाल पर अटक जाती है..


उसकी बात सुनकर मै उसे जैसे ही घुरी, वो हाथ जोड़ते हुए मुझे और संगीता को कमरे में जाने के किए कहा, और ऋतु से उसने पुरा मामला ऊपर-ऊपर बता दिया...


दरअसल कल नकुल के दारू मे पानी मिक्स करने की जगह मेडिकल नशे का सामान मिक्स करके पिला दिया इन लोगों ने.. इनका पुरा मटेरियल एक सोड के बॉटल मे रखा था, इसलिए नकुल को शक भी नहीं हुआ. उसके दोस्तों के साथ नकुल 20-25 मिनट तक पेग लिया है, ये याद था उसे. उसके बाद शशांक ने मुझे (मेनका) लेकर कुछ बात नकुल से कहीं. जिसे सुनने के बाद नकुल, शशांक को समझाते हुए कहा कि देख भाई, वो मेरी बुआ है और इस दूर के रिश्ते को जाने दो तो वो मेरी बड़ी बहन है, जबकि मै उससे लगभग साल भर का बड़ा हूं. इसलिए उनके बारे में कुछ नहीं"..


लेकिन वहां नकुल कुछ करने के लिए होश में नहीं था, और वो लोग लगातार मेरे बारे में बोलते रहे. नकुल जब होश में आया तब वो हॉस्पिटल में मेरे गुस्से का सामना कर रहा था और शशांक की बात याद करके अंदर ही अंदर जल रहा था..


तकरीबन 4.30 बजे शाम मे उसकी नींद खुली. वो मुझे हॉल में सोया देखा और मेरे सर के पास बैठ गया. इतने में ही शशांक और उसके दोस्त पहुंच गए, शराब और शोडा बॉटल लेकर. नकुल ने फिर भी घर आए लोगों से कहा, देखो कल रात जो तुमने नशे की हालात में उल्टा सीधा कहा था वो मुझे सब याद है. कल के बाद से मै तुम्हारा शक्ल नहीं देखना चाहता, बेहतर होगा चले जाओ..


नकुल के समझाने के बाद भी उसे बात समझ में नहीं आयी. उसे लगा वो 3 है और नकुल अकेला तो यहां उसे पिलाकर या मार पीटकर सुलाकर कुछ भी कर सकता है. क्योंकि कल रात को जो मैंने उसे थप्पड़ मारा और 40 हजार के लिए जो उसे घर फोन करने पर मजबूर करवा दिया, उसी का बदला लेने आया था.


नकुल ने दोबारा उसे समझाया कि देखो मेरी दीदी सो रही है और उन्हें मेरा मार पीट करना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता. खैर उन्हे क्या हमारे घर में सब यही समझाते है कि जहां तक हो सके लफ्डों से दूर रहो, इसलिए कहता हूं बात आगे ना बढ़ाओ और अच्छे इंसान की तरह यहां से चले जाओ..


लेकिन कुत्ते की वो दुम शशांक नहीं माना और कहने लगा की जो अरमान लेकर आए है, पुरा करके ही जाएंगे. उस मेनका से तो थप्पड़ का बदला लेकर रहेंगे.. ऐसा नकुल ने ऋतु को बताया, बाकी उस वक्त जो भी हुआ हो. नहीं माने वो लोग और नकुल का हाथ, शशांक के 2 दोस्तो ने पकड़ लिया और शशांक ने नकुल के मुंह पर एक घुसा जमा दिया.


नकुल ने जवाब मे शशांक को एक लात उसके पेट में जमा दिया और बाकी उसके दोनो दोस्त को भी अपने पाऊं के घुटने से, एक घुटना उनके पेट पर भी जमा दिया. इसी वक्त मेरी नींद खुल गई थी और तीनो नीचे गिरे कर्राह रहे थे.


नकुल ने जो भी ऋतु को बताया, हां मुझे नकुल के बातो पर यकीन था, वरना वो लड़ाई से अंत-अंत तक परहेज करता है. इसका सबसे बड़ा एग्जाम्पल तो नीलेश का ही केस था, जिसमे मुखिया बख्तियार के आदमी ने नकुल को कई बार मारा था. नकुल पुरा सक्षम था जवाबी हमलें के लिए, लेकिन नकुल जानता था जवाबी हमला मतलब अंत तक लड़ने के किए तैयार रहो, जो कि मौजूदा वक्त को देखते ये संभव नहीं था. इसलिए वो झगड़ा को टालने में ही ज्यादा विश्वास किया...


मै अपने संदर्व मे तो ज्यादा बता नहीं सकती थी, क्योंकि आज तक मैंने शशांक से लगभग दूरियां ही बना कर रखी थी. गांव में भी औपचारिक बातो के अलावा उससे बहुत ज्यादा बातें नहीं हुई थी, लेकिन आशा भाभी (नकुल की मां) ने मुझे शक्त हिदायत दी थी कि मै शशांक से दूर ही रहूं. आज मुझे भी उनकी बातो का मतलब समझ में आ रहा था.


खैर किसके दिल में क्या है वो कौन जान सकता है. नकुल थोड़ा अपसेट था और उसका ध्यान भटकाने के लिए मै उसकी क्लास लेती हुई कहने लगी... "मै गांव में नहीं हूं नकुल, भैया ने मुझे तुम्हारे भरोसे भेजा है"…


किन्तु इससे पहले कि मै नकुल की और भी ज्यादा क्लास ले पाती, बीच में ही संगीता कूद पड़ी और कहने लगी... "जो हो गया उसपर क्या रोना. अब जो होनेवाला है उसपर सोचना है"..


नकुल संगीता के ओर देखकर मानो जैसे धन्यवाद कह रहा हो. संगीता अपनी बात आगे बढ़ती हुई कहने लगी... "माफ करना मै पूरे हफ्ते समय नहीं दे पाई, लेकिन अब वक्त है एक ब्रेक का.. सो कल से हम अगले 8-10 दिन बंगलौर से केरल के रोड ट्रिप पर होंगे...
:superb: :good: amazing update hai nain bhai,
Behad hi shandaar aur lajawab update hai bhai,
aaj to nakul ne achchhe se shashank aur uske doston ki khatir dari kar di hai,
aur ab ek naye safar par menka nikal rahi hai,
Ab dekhte hain ki aage kya hota hai,
Waiting for next update
 

aman rathore

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अध्याय 11 भाग:- 8 (जिंगदी का पहला लंबा सफर)





नकुल, संगीता के ओर देखकर मानो जैसे धन्यवाद कह रहा हो. संगीता अपनी बात आगे बढ़ती हुई कहने लगी... "माफ करना मै पूरे हफ्ते समय नहीं दे पाई, लेकिन अब वक्त है एक ब्रेक का.. सो कल से हम अगले 8-10 दिन बंगलौर से केरल के रोड ट्रिप पर होंगे...


नकुल:- हम मतलब कौन कौन संगीता दीदी...


संगीता:- मै, ऋतु, तुम, और मेनका..


लगभग एक हफ्ते बोर होने के बाद ये पहला अवसर खुशी का था. सुबह 5 बजे हमे निकालना था, इसलिए मै अपने और नकुल की पैकिंग करने चल दी. वो दोनो भी अपनी-अपनी पैकिंग कर रही थी. चूंकि नकुल खाली बैठा हुआ था, इसलिए संगीता ने उसे सामान की कुछ लिस्ट दे दी और वो लाने चला गया...


कुछ ही देर में पैकिंग करके मै किचेन में थी और पीछे से संगीता और ऋतु भी पहुंच गई. मैं पीछे मुड़कर दोनो को एक बार देखी और आगे सब्जी काटती हुई... "मुझे लगा हमारे साथ मिथलेश भी होगा"..


संगीता:- धत्त पागल, मै अपने भाई के साथ हूं, वहां अपना बॉयफ्रेंड ले जाऊं..


मै:- मुझे कोई इश्यू नहीं है. वैसे जब आप नकुल को गर्लफ्रेंड के साथ यहां आने के लिए कह सकती है, तो अपने बॉयफ्रेंड के साथ ट्रिप पर नहीं जा सकती, बात कुछ हजम नहीं हुई..


संगीता:- छोड़ो भी, जाने भी दो, इसपर बात नहीं करते..


ऋतु:- अब इतना भी क्या फॉर्मल होना संगीता.. दरअसल बात ये है कि मिथलेश आज कल अपनी ही दुनिया में रहता है.. ना जाने कौन से सदमे मे है, बस एक ही बात कहता है…… कुछ दिन रुक जाओ, जब दिल को सुकून मिल जाएगा फिर वापस पहले जैसा हो जाऊंगा..


ऋतु की बात सुनकर मै संगीता को देखने लगी. वो मुझसे ऐसे नजर चुरा रही थी मानो कह रही हो, इस बात को यहीं खत्म कर दो. मै संगीता की हालात समझ सकती थी, इसलिए मै कहने लगी… "शायद ये ट्रिप मिथलेश के लिए भी जरूरी हो, क्योंकि ये वक्त है उसे हिम्मत और हौसला देने का. कुछ वक्त साथ अकेले में बीताने से बहुत सी तस्वीरें साफ हो जाती है"..


इतना कहकर मै अपना काम करने लगी और संगीता किसी गहरी सोच मे डूब गई. कुछ समय बीतने के बाद संगीता मुझसे कहने लगी... "शायद तुम ठीक कहती हो, मिथलेश को एक हॉलिडे की जरूरत है..


मै:- ये हुई ना बात... वैसे ऋतु आपका ब्वॉयफ्रेंड तो नहीं आने वाला ना..


ऋतु:- नह फिलहाल मेरा कोइ ब्वॉयफ्रेंड नहीं. ताज़ा-ताज़ा ब्रेकअप हुआ है..


मै:- क्या बात कर रही है.. मेरे बेचारे नकुल का भी ताज़ा-ताज़ा ब्रेकअप हुआ है..


संगीता:- क्या बात कर रही हो.. वो उस नीतू के साथ ब्रेकअप कर लिया क्या?


मै:- नहीं उस नीतू ने नकुल से ब्रेकअप करके, नीलेश के साथ पैचअप कर ली...


संगीता:- कुत्ता साला वो... एक रात मै उस नीलेश के साथ थी.. जब भी उस वाक्ए को याद करती हूं, खुद से ही घृणा हो जाती है...


मै:- खुशी के मौके पर ऐसे बेकार लोगों को याद नहीं करते.. नकुल दर्द नहीं बताएगा पर नीलेश और नीतू ने मिलकर उसे बहुत दर्द दिए है..


ऋतु:- देखो ऐसा है कि तुम दोनो का भाई दर्द मे है और मै ब्रेकअप झेल रही, अगर तुम दोनो को ऐतराज नहीं तो इस ट्रिप के लिए मै नकुल को अपना बॉयफ्रेंड बाना लेती हूं..


"क्या, क्या, क्या क्या क्या क्या".. ये "क्या" ना जाने कितनी देर तक मेरे दिमाग मे घूमता रहा... फिर मै हैरानी से ऋतु के ओर देखती... "किसी को तुरंत भाई बनाते तो देखी थी, लेकिन ये बॉयफ्रेंड बनाते.. बॉयफ्रेंड अब ऐसे बनाते है क्या. किसी लड़के की दुख भरी कहानी सुनी और तुरंत रिजर्व कर लिया"…


संगीता:- तू कुछ बड़ी नहीं लगेगी उसके लिए...


ऋतु:- तो कौन सा सामने खड़े होकर मैच लगाना है और घर वालों से जाकर बात करनी है कि शादी करवाओ… 8-10 दिन का बॉयफ्रेंड ही तो बना रही..


8-10 दिन का नाम सुनकर एक बार फिर मेरा दिमाग घूम गया. ये लड़कियां यहां कर क्या रही है. मेरा तो दिमाग कुछ भी समझने की स्तिथि में नहीं था. अंत में संगीता मुझसे पूछने लगी... "तुम्हे इस बात से कोई परेशानी तो नहीं मेनका"..


मै खुद से कहती... "मुझे उस फ्रौड नीतू से जब कोई परेशानी नहीं थी, फिर इससे क्यों होगी.. उसे तो बस पार्टनर चाहिए. वैसे भी ऋतु के दिमाग में तो हर बात बिल्कुल क्लियर है"… मै सोच ही रही थी कि एक बार फिर संगीता मुझसे पूछी और मैंने भी कह दिया, इस मामले में मै बीच में नहीं पड़ती... ये नकुल और ऋतु के बीच का मामला है...


अगली सुबह ही एक शानदार बस हमारे फ्लैट के दरवाजे पर रुकी.. उसे देखकर मै हैरानी से पूछने लगी... "कितने लोग जा रहे है"


संगीता:- अंदर जाओ समझ जाओगी..


मै जैसे ही अंदर जाकर वहां का नजारा देखि तो दंग रह गई. वो बस ना होकर जैसे कोई शानदार फ्लैट लेकर घूम रहा हो. 2 बेडरूम केबिन, हॉल एरिया जहां सोफे और लक्जरी चेयर लगे हुए थे. किचेन बाथरूम सब.


हम सब अपने-अपने सामान लेकर अंदर पहुंचे. संगीता जैसे ही बस में चढ़ी मै जीगयसावश पूछने लगी, ये आपने कहां से अरेंज की. इसमें तो ज्यादा खर्च लग जाएगा. तब ऋतु ने बताया कि ये कंपनी की लक्जरी बस है, हमे मिनिमम कीमत पर मील जाती है..


मै:- कितनी मिनिमम कीमत..


संगीता:- ये 10000 रोज के हिसाब से... फ्यूल अलग..


ऋतु:- एक बात मै पहले बता दूं.. यहां अमेरिकन सिस्टम है, जो भी खर्च होगा सबमें बराबर बंट जाएगा...


मै:- कोई नहीं इसके रोजाना का किराया मै और नकुल देख लेंगे, बाकी का रोड ट्रिप आप लोगो का..


संगीता:- पागल हो क्या? नकुल को पहले सब पता है.. तुम दोनो को मै लेकर जा रही हूं, इसलिए अपने पैसे अपने पास रखो, बाकी सब मै देख लूंगी...


उनकी बात सुनकर मै कुछ नहीं बोली. बस अपने रास्ते चल चुकी थी. रास्ते से ही फिर मिथलेश को लेते हुए हम सब निकल चुके थे बंगलौर से केरला के रोड ट्रिप पर. जिंदगी में पहली बार मै किसी रोड ट्रीप पर थी. बस अपने पूरे रफ्तार मे थी और हम सब कुछ देर अपना सामान जमाने के बाद हॉल में बैठ गए.


थोड़े नास्ता पानी के बाद मै पुरा टूर प्लान पूछने लगी. संगीता और ऋतु काफी एक्साइटेड होती हुई रोड ट्रीप के बारे में बताने लगी. लगभग 8 से 10 दिन का टूर था, जिसमे पहला डेस्टिनेशन मैसूर था. मैसूर घूमने के बाद हम रात में वहां से केरल के लिए निकलते, जिसका पहला डेस्टिनेशन गुरुवायूर, केरला मे होता.


केरल की जानकारी और वहां की हरियाली को जानकार मै और नकुल काफी उत्साहित थे. पता नहीं क्यों लेकिन हमे शुरू से ही नेचर से बहुत प्रेम रहा है. 8 बजे के करीब हम मैसूर में थे.


मैसूर के लिए सारी प्लांनिंग ऋतु ने कि थी. यहां के कुछ डेस्टिनेशन शाम से लेकर रात तक देखने वाले थे, इसलिए सुबह की पहली शुरवात हमने मंदिर से कि. सहर से लगभग 15 किलोमीटर मीटर दूर चामुंडी हिल्स पर श्री चामुंडेश्वरी मंदिर से.



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सुबह 8 बजे ही हम मंदिर के रास्ते पर थे. श्री चामुंडेश्वरी मंदिर इतनी ऊंचाई पर स्थित थी की हम दूर से उसे देख सकते थे. और जब हमने पास से देखा तो और भी ज्यादा दिल खुश हो गया. मंदिर में प्रवेश करते ही सबको घूमने के लिए 10 बजे तक का समय मिला हुआ था.


सब अलग-अलग घूमने निकले हुए थे. मैं अलग होते ही अपने पूरे खानदान को एक तरफ से कनेक्ट किया. जो लोग उपलब्ध थे, उन्होंने वीडियो कॉल अटेंड कर लिया. मेरे दोनो भाई जैसे स्क्रीन से निकलकर नकुल का गला दबोच ले, मुझे अकेला देख वैसी ही प्रतिक्रिया दे रहे थे.


मै उन्हे समझाती हुई कहने लगी.…. "यहां मंदिर में आने के बाद मैंने ही नकुल से कहा था कि तू अपना घूम और मै भी अपने हिसाब से मंदिर घूमती हूं." फिर मैंने उन्हें कहा कि.… "उसके साथ होती तो उसके साथ घूमती, उसे अकेला इसलिए छोड़ा, क्योंकि मै आप सबके साथ घूमना चाहती थी"…


कुछ देर घर के लोगों को मंदिर दिखाने के बाद मैंने कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया और फिर खुद मंदिर घूमने लगी. काफी बड़ी और आकर्षक जगह थी. मुझे घूमते हुए सबसे ज्यादा देर हो गई. तकरीबन 10.30 बजे, मै बस के अंदर पहुंच गई, जहां सब लोग पहले से मेरा इंतजार कर रहे थे. और क्या बात थी ऋतु की, वो नकुल के किनारे से ऐसे चिपक कर बैठी थी, मानो रजिस्टर ही कर लिया हो. उन्हे देखकर मै अंदर से खुश होती हुई कहने लगी… "चलो इसी बहाने तू नीतू के दर्द से निजाद पा लेगा"…


बस से हम सहर के आउटर रोड तक पहुंचे और वहीं बस को छोड़कर हम कॉल टैक्सी में चल दिए. एक टैक्सी मै, ऋतु और नकुल थे. दूसरे टैक्सी मे संगीता और मिथलेश. सेकंड डेस्टिनेशन जीआरएस वाटर फैंटेसी पार्क.. लगभग सुबह के 11 बजे.




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ऐसा लग रहा था मै सपनो के सफर पर निकली थी. वाटर पार्क किसी नदी स्नान जैसा ही था, बस यहां स्नान करने की व्यवस्था काफी रोमांचक थी. किसी भी तरह के परिधान पहन कर इस वाटर पार्क को एन्जॉय किया जा सकता था. इसलिए मै अपने सलवार सूट मे ही ज्यादा कंफर्टेबल थी. वहीं ऋतु और संगीता स्विमिंग कॉस्ट्यूम मे आ चुकी थी, और नकुल मात्र एक बरमूडा में था.


संगीता:- तुमने चेंज नहीं किया मेनका..


मै:- हां सोच तो मै भी रही थी संगीता, कपड़े कहां मिलते है..


ऋतु:- हद है यहीं पास खड़े होकर पूछ रही हो कहां मिलते है कपड़े. तुम्हारे सामने ही तो हमने कपड़े लिए है...


मैंने उन्हे आगे बढ़ने कही और काउंटर से जाकर एक फूल बॉडी टॉवेल उठा लाई. मै नहीं चाहती थी कि भींगे बदन होने के बाद कोई भी मेरे सीने को घुरे. हालांकि इस जगह पर तो लोग खुद को डिसेंट ही दिखा रहे थे, लेकिन यहां मौजूद लगभग सभी मर्द चोरी छिपे तार ही रहे थे. जैसे कि मेरा स्वीटो नकुल, बार बार चोरी छिपे ऋतु की छाती और गोरे जांघ को चोरी छिपे तार रहा था...


तौलिया को मै शॉल की तरह ओढ़कर उनके पास पहुंच गई. मुझे देखकर संगीता और ऋतु मुझे ऐसे देखी, मानो अजूबा देख लिया हो.. "अब सब लोग ऐसे क्या देख रहे हो, चलो चलो नदी स्नान को"… मै भी बिना उनके प्रतिक्रिया की परवाह किए अपनी बात कह दी...


मेरी बात सुनकर ऋतु हमे लीड करने लगी और हमारा सबसे पहला अनुभव था, ड्रैगन डेन. उफ्फ बनाने वाले ने इसे क्या सोचकर बनाया था, वहां तो सच मे आग उगलने वाले ड्रैगन थे. डर और रोमांच के बीच का ये राइड मेरे लिए सदा यादगार रहेगा. यह इतना रोमांचित करने वाला था कि हम लगातार दूसरी बार भी ड्रैगन डेन मे गए.


हमारी दूसरी राइड तो पूरी तरह से रोमांच के साथ साथ जानलेवा थी. नहीं जान जाने का कोई खतरा नहीं था, बस जिस ऊंचाई से स्लाइड करते नीचे जा रहे थे, वो नीचे जाने का अनुभव ही अपने आप में जानलेवा था. हमलोग एक्वा रेसर मे पहुंच गए थे. ऊंचाई जानलेवा, घुमावदार टनल और ओपन स्लाइड. ऊंचाई देखकर ही मेरी छाती ऊपर नीचे होने लगी.


बाकियों का भी वही हाल था, केवल नकुल को छोड़कर. वो तो नीचे जाने के लिए कुछ ज्यादा ही उत्साहित था. हालांकि बाकी के लोग पहले भी यहां आ चुके थे, लेकिन ऐक्वा रेसर मे कभी नहीं आए थे. किसी तरह हिम्मत जुटा कर मै स्लाइड के लिए बैठी, और 3 के गिनती के साथ ही हम चिल्लाते हुए नीचे जा रहे थे.


पहले तो केवल ऊंचाई ही एकमात्र डर था, लेकिन यहां से नीचे स्लाइड करना तो जैसे पुरा जानलेवा था, यदि वो घुमावदार गोल-गोल मोड़ ना हो, फिर तो किसी की स्पीड कंट्रोल ही ना हो और सिधा जाकर पानी में घुस जाए.


मेरी तो दोबारा हिम्मत नहीं हुई, लेकिन बाकी के लोगों ने बस इतना ही कहा, देखने में खतरनाक है लेकिन उतना खतरनाक भी नहीं है... पहले तो मुझे आश्चर्य लगा की ऐसा क्यों कह रहे है, लेकिन ज्यों ही हम अगले राइड, यानी पेंडुलम राइड के लिए पहुंचे, वहां इनकी बात समझ में आ गई.


पेंडुलम राइड 35 फिट की ऊंचाई से शुरू होती है, जिसका स्लोप सीधा नीचे तक जाता है, बीच में बिना कोई घुमावदार मोड़ के. गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध 35 फिट से नीचे जाना वो भी बिना कोई ब्रेक लगाए, अंदाज़ा लगा सकते है...


ऊपर के लोगों ने पहले ही हमे चेता दिया कि आप कुछ देर तक पानी के अंदर ही घुसे रह जाएंगे.. मै तो नहीं जा रही थी, लेकिन संगीता ने मुझे खींचकर अपने साथ एक गोल रबर के बने थोड़े बड़े टब जैसे दिखने वाले वस्तु मे बिठा लिया और हम दोनों 35 फिट के स्लोप से बिल्कुल तेजी के साथ नीचे आए. चिल्लाती हुई मैं पानी में इतना तेज घुसी की मुंह नाक सबमें पानी घुस गया. लेकिन साथ में संगीता थी और उसे इस राइड का कुछ ज्यादा ही अनुभव था, इसलिए उन्होंने मुझे पानी के अंदर ढूंढकर, ऊपर किया.


मै अपना टॉवेल संभालती खांसती हुई ऊपर हुई. संगीता मेरे पास आकर पूछने लगी कि तुम ठीक तो हो.. मै अपनी श्वांस सामान्य करती हुई कही... "ऐसा लगा जैसे मै मर गई. लेकिन अच्छा था, एक बार और ट्राय करे क्या"..


संगीता हंसते हुए मुझे आंख मार दी और हमलोग सेकंड राइड के लिए तैयार थे. हम तैयारी कर रहे थे तभी मेरी नजर नीचे गई जहां पानी मे ऋतु, नकुल को तंग कर रही थी. अचानक ही ऋतु नकुल का गला दबोच कर उसके ऊपर आ गई और दोनो का बैलेंस बिगड़ने से दोनो पानी के अंदर घुस. लेकिन मुझे ऐसा क्यों लगा कि पानी के अंदर जिस वक्त दोनो जा रहे थे, ऋतु ने अपने होंठ नकुल के होंठ के ऊपर रखी हुई थी.. शायद बैलेंस बिगड़ने से ऐसा हो गया हो या जान बूझकर, कौन जाने.. लेकिन अंदर से मुझे बहुत ही अजीब फीलिंग आयी....
:superb: :good: amazing update hai nain bhai,
Behad hi shandaar aur lajawab update hai bhai,
Iss trip par sabse jyada to nakul ke hi maje hai baithe bithaye readymade girlfriend mil gayi :D,
Ab dekhte hain ki aage kya hota hai
 

aman rathore

Enigma ke pankhe
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अध्याय 11 भाग:- 9 (जिंगदी का पहला लंबा सफर)







"अब जाने भी दो. दोनो अपनी मर्जी से थोड़ा एन्जॉय कर रहे है, करने दो.".. संगीता ने मुझसे कहा. मै भी आंख मारती हुई कहने लगी... "नकुल को उसकी गर्लफ्रेंड के साथ देखकर मुझे कोई असहजता महसूस नहीं होती क्योंकि, वो मेरा दोस्त भी है."…


मेरी बात पर हम दोनों ही हसने लगे और अगले ही पल हमारी चींख निकल गई. दोबारा से वहीं अनुभव करना अपने आप में ही रोमांचित करने वाला था. थोड़ी देर बाद ऋतु ने खुद सबको वाटर पार्क से चलने के लिए कह दिया, क्योंकि वाटर पार्क अपने आप में एक पूरे दिन का इवेंट था, इसलिए उसने बाकी का फिर कभी आकर एन्जॉय करने बोल दिया.


हम सब चेंज करके जीआरएस वाटर पार्क से निकल आए. मै और संगीता तो नकुल को ही देख रहे थे, कैसे वो ऋतु के प्रति आकर्षित हुआ जा रहा था. वो भी कुछ कम नहीं थी. एक तो वो हमेशा इतने चुस्त आउटफिट पहनती की उसकी पूरी गोलाई उभर कर बाहर दिखती, ऊपर से नकुल के किनारे से ऐसे चिपक कर बैठती या चलती थी कि उसके एक साइड का स्तन, नकुल के दाएं या बाएं जिस भी किनारे से चिपक रहा हो, पुरा चिपका ही रहता.. एक तो नकुल की कच्ची उम्र ऊपर से ऐसे प्रलोभन, इंसान ही है वो...


लगभग 3.30 बजे दोपहर हमे हम लोग पहुंचे ऐसी जगह, जो मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था. सुका वाना, तोते के लिए ऐसी संरक्षित जगह जहां का मनमोहक दृश्य देखकर हर पंछी प्रेमी को इस जगह से प्यार हो जाए..



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यहां का दृश्य प्रेरणा योग्य था, क्योंकि पहले के मुकाबले अब आकाश में उड़ते पंछियों को संख्या बिल्कुल खत्म होती जा रही है. वहीं एक ही जगह मे तोतों की इतनी ज्यादा प्रजाति देखकर मै तो रोमांचित हो गई. हाय कितना प्यारा वो पल था, जब 2-3 तोते मेरे ऊपर आकर बैठ गए. मै भी इसका और ज्यादा लुफ्त उठाने के लिए, अपने दोनो हाथ फैलाकर स्थिर खड़ी हो गई, और पंछी कभी मेरे सर पर तो कभी मेरे हाथों पर बैठ जाते थे.. अपने हाथों जब मैंने उन्हे खाना खिलाया, दिल में एक अलग ही एहसास था.


हल्का शाम का माहौल हो रहा था. थोड़े से अल्पाहार के बाद हम सब सहर से दूर एक और मनमोहक जगह पर निकले, जिसका नाम वृंदावन गार्डन था. शाम के बाद उसकी सुन्दरता देखने का एक अलग ही आनंद था. इतनी मनमोहक जगह की इसकी खूबसूरती को देखकर आप खुद को इस जगह पर खोने से रोक नहीं पाएंगे.



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चूंकि हल्का अंधेरा हो गया था इसलिए हम सब साथ घूम रहे थे. तभी अचानक संगीता मुझे और मिथलेश को लेकर गार्डन के दूसरी ओर चल दी, इधर नकुल और ऋतु दूसरी ओर. पहले तो लगा संगीता अपनी और मेरी मौजूदगी नकुल के ऊपर से हटा रही है, ताकि वो खुल सके.


जब ये ख्याल आया तो साथ में गुस्सा आना भी लाजमी ही था. ठीक है नकुल को बॉयफ्रेंड समझ कर ऋतु यें ट्रिप एन्जॉय करेगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हे 8-10 दिन इतनी ना प्राइवेसी दे दो की नकुल का दिल ही उसपर आ जाए. बेचारे का दिल आ गया तो ये लड़का तो ब्रेकअप किंग बन जाएगा, एक में बाद एक लगातार ब्रेकअप... मै इन्हीं सब बातो को सोचती पहले गुस्सा हुई तो फिर बाद में हंसी भी निकल आयी. इससे पहले कि संगीता से मै कुछ पूछती, इतने में संगीता और मिथलेश ठीक मेरे सामने खड़े थे...


मिथलेश:- कुछ बातें सबकी मौजूदगी में नहीं की जा सकती थी, इसलिए अलग लेकर आना परा...


संगीता, वही किनारे लगे बेंच पर सबको बैठने का इशारा करती हुई... "आओ आराम से बात करते है. मेनका कुछ पता चला क्या तुम्हे..."


"ओह ये मिथलेश का मैटर था. मै खा-म-खा नकुल का समझ बैठी"… नकुल के ख्यालों को विराम देते हुए मै मिथलेश से कैहने लगी... "आप ठीक तो है ना."


मिथलेश:- नकुल कहीं गायब हो जाए और क्या हुआ ये तक पता ना हो, तो तुम कैसी रहोगी..


मै:- हम्मम ! माफ कीजिएगा मै शायद गलत सवाल कर गई. ये कुछ सामान है, इनमे से किसी सामान को आप पहचान सकते है क्या?

मै जानती थी कि ऐसा वक्त जरूर आएगा जब ये सवाल उठेगा की मैंने मिथलेश के काम को कहां तक पहुंचाया. मैंने मिथलेश के मामले को लेकर जितनी छानबीन करवाई थी, उसमे मुझे कुछ छोटी-छोटी चीजें हाथ लगी थी, जिसे मै अपने हैंड बैग में ही लिए घूम रही थी. मिथलेश उन सामान मे से एक टूटी हुई लेडी घड़ी को अपने हाथ में उठाकर मुझे हैरानी से देखने लगा... "ये मेरी बहन अर्पिता की है.. कहां से तुम्हे मिली, मेनका बताओ ना. कहां से ये मिली है"..


मै:- कहां से मिली है वो तो बताउंगी ही लेकिन..


मिथलेश:- लेकिन क्या?


मै:- लेकिन अब वो इस दुनिया मे नहीं रही...


मै बता नहीं सकती वहां कैसा माहौल हो गया. मिथलेश की आखें नम थी और कई सारे सवाल. अंदर से वो पुरा टूटा हुआ था और अपनी बहन अर्पिता के साथ हुआ क्या, उसे जानने के लिए पागल बना हुआ था.


मै:- संगीता, ये जब पूरे होश में आ जाए तो मुझे बता दीजिएगा, मै सारी बात बता दूंगी.. अभी मिथलेश जी थोड़े गम मे है..


मेरी बात सुनकर मिथलेश पूरे गुस्से में, लगभग चिल्लाते हुए कहने लगा.… "मुझे पूरी बात बताओ मेनका. जिसकी बहन महीनों सर लापता है उसका दर्द तुम क्या जानो"..


मै:- दर्द जानने के लिए क्या मै अपने भाई को गायब करवा दुं, या अपनी किसी बहन को... दर्द आपको है तो उसके लिए लोगों को क्यों कहते है कि तुम क्या जानो मेरा दर्द... हम दर्द जाने या दर्द की दवा का पता लगाए, और दर्द से आपको उबरे? क्या चाहते हो, आपकी तरह दुनिया भर के लोगों के बहन-भाई भी गायब हो जाए, ताकि वो आपका दर्द समझ सके.. जानती हूं आपने अपने किसी बहुत ही करीबी को खोया है, काफी सदमे मै है. तो क्या है हर किसी के साथ वैसा ही होता रहे और वो आपका दर्द जानता रहे...


संगीता:- सॉरी मेनका, मिथलेश के कहने का वो मतलब नहीं था, तुम बुरा मत मानो...


मै:- "मैंने बुरा माना होता तो मै यहां से जा चुकी होती. इसलिए मै पहले कही थी कि जब होश में हो तब बात करने. क्योंकि मिथलेश जी अपना जोश अपने सहर मे पहले भी दिखा चुके थे, कुछ और ज्यादा जोश दिखाते तो ये भी गायब हो जाते. और जब ये गायब हो जाते, फिर इनके माता पिता का क्या होता... फिर वो लोग आगे की जिंदगी इस सवाल के साथ गुजारते की उसके बच्चो के साथ क्या हुआ होगा? जिंदा है या मर गए? किस हाल में होंगे? और विश्वास मानिए मरने से ज्यादा तकलीफ इन परिस्थितियों में होती है, क्योंकि जिंदा होने की आस और लौटकर एक दिन आएगा, ऐसी उम्मीद उम्र भर तड़पाती है..."

"मै इनकी तरह जोश दिखाकर, इनके काम कर रहे लोगो को उंगली करने लगी, तो वो लोग भी सामने वालों की नजर में आ जाएंगे, और शायद वो भी ना कहीं गायब हो जाए.. तब क्या होगा? मै भी उनकी नजर में आऊंगी और जो कुछ भी अब तक आप दोनो ने मिलकर किया है, फिर सब भुल जाइए की उसके आधार पर आप उनका कुछ भी बिगड़ सकते है, क्योंकि ये लोग खुद को बचाने के लिए एक के बाद एक सबको ऐसे गायब करेंगे, कि सबके घर के लोगों का हाल मिथलेश जी जैसा हो जाएगा. गायब तो है लेकिन पता नहीं लग पाएगा की हुआ क्या था और हर कोई उम्र भर सस्पेंस मे ही मरता रहेगा..."

"जोश जिस जगह दिखाना है वहां जोश दिखाइए ना.. अपने दोस्तो से मिलने मे जोश दिखाइए. अपनी तरक्की मे जोश दिखाइए.. अपने घर परिवार को खुश रखने में जोश दिखाइए..."

"दुश्मनी धीमी आंच पर पकती है वहां जोश नहीं दिखाना चाहिए, वरना एक छोटी सी गलती, सबकुछ सत्यानाश कर देती है. जब मामला कमजोर और ताकतवर के बीच का हो, तो कमजोर को अपनी बारी आने तक बिल्कुल शांत रहना चाहिए. होश में रहना चाहिए. मै जा रही हूं, मिथलेश जी से तभी बात होगी जब मुझे लगेगा की ये पूरी तरह से होश में है और आगे भी होश में रहने वाले है.."


मै अपनी बात कहकर वहां से उठकर चली आयी. हां थोड़ा गुस्सा जरूर आ रहा था, की एक तो इसके लिए इतना रिस्की काम करवा रही थी, ऊपर से मुझे ही दर्द की कहानी समझा रहा था. खैर मै वहां से उठकर चली तो आयी, लेकिन संगीता से महज 10 कदम की दूरी पर ही थी..


अब क्या बता दूं क्यों 10 कदम की दूरी पर थी. वृंदावन गार्डेन का नजारा तो सुहाना था, लेकिन मुझे रात में अकेले घूमने से ही डर लगता था. पता नहीं मेरी हार्ट बीट अपने आप ही बढ़ जाती थी. उधर संगीता और मिथलेश के बीच आपस की बातें चल रही थी और मै इतने खूबसूरत नज़ारे को छोड़कर उन्हे ही देख रही थी.


तभी मेरे कानो मे वो खिल खिलाती हंसी की आवाज सुनाई देने लगी.... "वाह भाई तुम तो मेरे आस पास हो.. सॉरी नकुल बेटा तेरे रंग में भंग डालने के लिए"... मैंने नकुल के आवाज के पीछे चल दी, ऑफ़ ओ क्या नजारा था, यहां लड़का फास्ट था या लड़की, मेरे समझ में नहीं आ रहा था."


मै जैसे ही आगे जाकर बाएं मुड़ी, वहीं थोड़ी दूरी पर, एक एक पेड़ के किनारे ऋतु और नकुल खड़े थे. मेरे देखते ही देखते नकुल ने ऋतु का हाथ खींचकर अपनी बाहों में ले लिया... "अरे सबाश लड़के, तू तो वृंदावन में वाकई रास लीला रचने लगा"… मै सोच ही रही थी कि इतने में होंठ से होंठ जुड़ गए..


मै हंसती हुई अपना मुंह फेर ली. कितना भी दोस्त मान लू, लेकिन इतनी भी मॉडर्न नहीं हुई की नकुल की रास लीला अपने आखों से देख सकूं. मै अपने ही सर पर हाथ मारती हुई अपना फोन निकाली और झूठा ही इतनी जोर से बात करने लगी कि नकुल के कानो तक बात चली जाए.


लगभग 2 मिनट तक मै मुंह दूसरी ओर किए बात करती रही, लेकिन अब तक नकुल मेरे पास नहीं पहुंचा. मै दबी मे, धीरे से उस ओर मुड़ी जिस ओर नकुल था. "हा हा हा हा हा हा.. लड़का वहां से अपनी लड़की लेकर गायब हो गया था.. और मै पागल, सोच रही थी, उसके कानो मे आवाज जाएगी तो मेरे पास पहुंचेगा. वाह रे दुनिया"..


अगले ही पल मैंने चारो ओर का अवलोकन किया. अब तो नजर के सामने ना तो नकुल था और ना ही संगीता. मै तुरंत नकुल को कॉल लगा दी और उसे मैंने कह दिया, फोन पर बात करते करते मै गुम गई हूं, जल्दी आ मुझे डर लग रहा. मै जबतक फोन अपने बैग में रखती, तब तक नकुल मुझे नजर आने लगा था.


मै झटक कर नकुल के ओर चल दी. कम ड्रामेबाज वो भी नहीं था. जैसे ही वो मेरे पास आया, मुझ पर नाराजगी दिखाते हुए कहने... "दीदी मुझे अपना फोन दे दो, ये क्या बात हो गई की आप नाच-नाच कर बात करने के चक्कर में अपने ग्रुप से ही अलग हो जाओगे"..


"साले हरामी, मेरे प्यार का तू अच्छा फायदा उठा रहा है. और ये ऋतु भी तुझे लिफ्ट देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही. उसके सीने के पास कपड़ों की सिलवटें सारी बातों की गवाही दे रही है, कि तू मेरी आवाज सुनकर क्यों भागा था.. रास लीला से रुक नहीं सका और मुझे ज्ञान देने चला है.. रुक मै अभी ग्रहण बनती हूं तेरे अरमान पर"…


मै अंतर्मन मे सोच ही रही थी कि तभी ऋतु... "मेनका चलो भी साथ घूमने, अब नकुल के बात पर इतनी भी क्या नाराजगी."


मै:- सॉरी, गलती मेरी ही है भाई... अब से ये मेरा फोन तेरे पास.. कम से कम मेरा फोन तेरे पास रहेगा तो तू मेरी बात भी करवा दिया करेगा और मेरे फोन पर बात करने के क्रम में मेरे साथ-साथ तू भी नाच भी लेगा"..


उफ्फ, लड़के की शक्ल देखने लायक थी. दबी सी हंसी ऋतु की भी निकल गई, क्योंकि शायद उसकी नजरें भी भांप चुकी थी कि मेरी नजरों ने उसके सीने पर क्या नोटिस किया था. नकुल आगे-आगे चल रहा था, ऋतु मेरा हाथ पकड़कर 5-6 कदम पीछे कर दी और खुस्फुसती हुई कहने लगी... "क्यों हम दोनों के मज़े के बीच ग्रहण बन रही हो"…


मै:- जब नकुल ने मेरी आवाज सुनी तो उसे मेरे पास आना चाहिए था ना, उसे पता है की सुनसान जगह पर मुझे दिन में डर लग जाता है, फिर तो यहां का माहौल अनजान, सुनसान और हल्के अंधेरे वाला है...


ऋतु:- ओह तो तुमने मुंह फेर कर फोन पर इसलिए बात शुरू की ताकि नकुल का ध्यान खींच सको, मुझे लगा तुम्हे अच्छा नहीं लगा इसलिए तुम हमे वहां से जाने के लिए जान बूझकर फोन के बहाने से सुना रही हो कि तुम भी यहां हो..


"वाह !! वाह !! वाह !! सुना इसलिए रही हूं कि कहीं और जाकर अपनी रास लीला रचाओ. जी तो कर रहा है चार चप्पल मारूं. पति पत्नी भी हो तो क्या पब्लिक मे अपनी बहन के सामने रास लीला करेंगे, देखने में अजीब और खराब नहीं लगेगा क्या पागल.. जानता तो हर कोई है कि गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड के बीच क्या-क्या हो सकता है, इसका ये मतलब की सबको दिखाकर करोगे.. क्या यही सब देखने मै इस ट्रिप पर आयी हूं जाहिल लड़की. कामिनी तेरे चक्कर में मै ढंग से वृंदावन नहीं देख पाई. एक ही दिन में तूने उस बैल को इतना खुला निमंत्रण दे दी है कि वो अब पगलाए घूम रहा है, और अब ऐसा लग रहा है कि मै पूरे ट्रिप गिल्ट मे घूमती रहूंगी. ठीक से घुमुंगी भी या नहीं वो भी नहीं पता. बेशर्मी का इतना नंगा नाच नाचने के लिए मेरा ही नकुल मिला था, कोई और नहीं मिला"…


ऋतु की बात पर मै अद्भुत ख्यालों मे थी और अंदर ही अंदर पूरी तरह से गुस्सा. वो मुझे खुद को घूरते देख समझ गई की मेरे दिमाग में बहुत सी बातें चल रही है. वो मुझे हिलाकर लगभग जागती हुई कहने लगी... "हमे किस्स करते देख तुम्हे अच्छा नहीं लगा ना.. सॉरी"..


मै:- "हद पागल हो. ये तुम्हारा जो सोचना है कि उसकी किसिंग देखकर मुझे अच्छा लगा या बुरा, तुम्हारा ऐसा सोचना ही पागलपन है. तुम्हारा भाई तुम्हारे सामने अपनी गर्लफ्रेंड को किस्स और स्मूच करे तो तुम क्या आखें फाड़कर देखोगी.... मुझे बहुत ही ज्यादा अजीब और खराब लग रहा था.. अंदर से अब तक गिल्ट फील हो रहा है कि मै ये सब देखी..."

"मैटर ये भी नहीं है की बंद कमरे की किसिंग को देख ली हूं, जो मज़ाक में छेड़ती हुई कह दूं, कम से कम घर में पर्दे का ख्याल करो और मेरी बात सुनकर किस्स करने वाले कपल पूरे दिन शर्माए शर्माए घूम रहे हो.. यहां तो सब कुछ खुल्लम खुला चल रहा है.. तुम्ही बताओ क्या रिएक्शन दूं.. हम उम्र है, दोस्त है, तुमने कहा 10 दिन के लिए बॉयफ्रेंड, तो चलो वो भी मान ली. लेकिन इतना खतरनाक इसका असर होगा, सब कुछ मेरी आंखों के सामने..



ऋतु:- मतलब तुम्हे मेरा उसके साथ होना से कोई परेशानी नहीं..


मै:- नहीं बिल्कुल नहीं, बस ये सब कुछ अजीब लग रहा है, जिसे मै एक्सप्लेन नहीं कर सकती..


ऋतु:- सो सॉरी, शायद मुझे ये बात तुम्हे नहीं बतानी चाहिए थी कि नकुल को मै ट्रिप पर अपना बॉयफ्रेंड बाना लेती हूं. मुझे लगा दोनो बस रिलेटिव हो लेकिन अब लग रहा है कि दोनो जुड़वा भाई बहन हो. ऐसी बातें तो अजीब लगेगी ही.. मै पूरी कोशिश करूंगी कि तुम्हे कुछ भी अजीब ना लगे..


ऋतु की बात सुनकर मै तो जोड़ से हंसी ही, वो भी जोर-जोर हसने लगी. इसकी तो ये ना की झूठा ही कह दे, अब हमारे बीच कुछ नहीं होगा, और सब कुछ रात के अंधेरे में बिना किसी की जानकारी के करे. दिन भर जितने नैन मट्टका करने है करे ना. लेकिन नहीं शादी से पहले पूरे मजे करने है, और मै तो मज़े करूंगी ऐसा भी बताना है. मुझसे तो देखा नहीं जाएगा... मैसूर से बंगलौर ज्यादा दूर भी नहीं क्यों ना इन सबको एन्जॉय करने दू, और मै ही यहां से चली जाऊं, फिर सब ठीक हो जाएगा...
:superb: :good: amazing update hai nain bhai,
behad hi shandaar aur lajawab update hai bhai,
 

SHADOW KING

Supreme
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अध्याय 11 भाग:- 6 (जिंगदी का पहला लंबा सफर)






संगीता ने एयरपोर्ट पर गर्मजोशी के साथ हमारा स्वागत किया. वाकई नकुल और मेरे आने का वो दिल से खुशी जाहिर कर रही थी. हम तीनो ही संगीता के साथ उनके फ्लैट के ओर चल दी. रास्ते भर हम वहां के चारो ओर का नजारा लेने लगे. ऊंची-ऊंची बिल्डिंग और सड़क पर भागती जिंदगी.. हां वो अलग बात थी कि यहां की बिल्डिंग जितनी ऊंची थी उनके अंदर के मकान उतने ही छोटे...


संगीता अपने रूम पार्टनर ऋतु के साथ 2 बीएचके फ्लैट में रहती थी. संगीता कुछ दिनों के लिए अपने रूम पार्टनर के रूम मे शिफ्ट हो गई. उन्होंने अपना कमरा मुझे दे दिया और नकुल हॉल में एडजस्ट हो गया.


बाकी सब तो ठीक था लेकिन 2 दिन बाद ही मुझे और नकुल को मेहसूस हुआ कि इस जगह मे कुछ ज्यादा ही बोरियत है. दिन भर हम दोनों फ्लैट मे पड़े रहते, ना तो कोई पड़ोसी हमे जानने वाला और ना ही घूमने के लिए ऐसी जगह जहां जाया जा सके.


शाम को हम संगीता के साथ कभी इस मॉल तो कभी उस मॉल मे घूमने जाया करते थे. इसके अलावा और कुछ भी करने को नहीं था. अब लोग शॉपिंग ही करेंगे तो कितना कर सकते है. हां किन्तु कुछ गजेट हमे अच्छी क्वालिटी के वहां सस्ते रेट में मिल गए.


बंगलौर में हमारा ये सातवा दिन था जब नकुल का दोस्त शशांक हमारे यहां फ्लैट पर आया. पिछले 4 दिन से वो यहां आता और दोनो फिर शाम तक घूमने निकल जाते. रोज की तरह वो दोनो बिल्कुल गर्मजोशी के साथ मिले. शशांक से महज औपचारिक बातें करके मै कमरे में चली गई और लैपटॉप ऑन करके बैठ गई. थोड़ी देर बाद नकुल कमरे में आया और पूछने लगा क्या वो शशांक के साथ बाहर जाए. मै मुस्कुराते हुए उसके बाल बिखेर दी और कहने लगी आराम से पुरा घूमकर आना..


कुछ घंटे ही सही, लेकिन मै वहां पूरी अकेले थी. जिंदगी का ये मेरा पहला अनुभव था. थोड़ा असहज और थोड़ा खो जाने वाले पल होते थे. "इस वक्त का भी अपना ही मजा है" … खुद से कहती हुई मै मुस्कुराई और अपने स्टडी मटेरियल को देखने लगी...


किसी ने सच ही कहा है किताब आपका सच्चा साथी होता है. मै एक बार जब अपने किताब मै डूबती, फिर कहां होश था. मुझे तो होश नहीं था लेकिन आज पहली बार ऐसा हुआ था कि नकुल की भी बेहोश होने की खबर आयी थी.


उस वक्त मै और संगीता बैठकर बातें कर रहे थे, जब शशांक ने मेरे नंबर पर कॉल किया और बताया कि नकुल घर जाने के लायक नहीं है. उसकी बात सुनकर मै बता नहीं सकती कितनी परेशान हो गई. फोन मैंने संगीता को दिया और उसके बताए पते पर हम दोनों पहुंचे...


वहां पहुंची तो पता चला वो थ्री स्तर होटल की एक बार थी, जहां नकुल जमीन पर बैठा था, 2 वेटर उसे घेरे हुए थे और उसके पास शशांक नहीं था. हम दोनों भागकर उसके पास पहुंचे. बार के मैनेजर ने हमे पूरी बात बताई. नकुल, शशांक और उसके दोस्तों ने मिलकर 40 हजार का शराब पी गए थे...


मै घुरकर् उस बार मैनेजर को देखी और पूछने लगी... "जब सबने मिलकर पिया था, फिर मेरे भाई को चोर की तरह पकड़ कर क्यों रखे हो"..


बार मैनेजर:- बाकी सब कहां गए हमे नही पता, एक यही बचा हुआ था इसलिए हमने इसे बिठा लिया..


संगीता:- छोड़ ना पेमेंट करते हैं और चलते है.


मै:- पेमेंट तो 40 हजार के बदले मै 4 लाख का कर दूं, लेकिन इनकी हिम्मत कैसे हुए नकुल को ऐसे बिठाने की... ओय क्या मेरे भाई ने दारू ऑर्डर किया था.. बोलते क्यों नहीं..


बार मैनेजर:- देखिए मिस आप चिल्लाए नहीं, हमारे दूसरे कस्टमर डीस्ट्रब हो रहे हैं..


मै:- कुछ देर में तुम्हारा पुरा बार डीस्ट्रब हो जाएगा...


बार मैनेजर:- तुम जैसों को पीने की औकाद नहीं रहती तो ऐसे ही करते हो. लेकिन हमे भी तुम्हे सीधा करने आता है.. मै अभी पुलिस बुलाता हूं..


संगीता:- मेनका बहुत हुआ, चलो. नकुल की हालात भी ठीक नहीं लग रही...


मै:- आप 2 मिनट चुप रहिए. इसने समझ क्या रखा है.. तुम जैसे अपनी तुची हरकत को ढकने के लिए ऐसे पुलिस का नाम लेते हो. डराते किसे हो पुलिस के नाम से.. बुलाओ तुम पुलिस और मै मीडिया बुलाती हूं.. तुम जानते भी हो तुमने 11th के एक स्टूडेंट को दारू पिलाई है.. तुम्हारे पूरे बार का लाइसेंस नहीं कैंसल करवाया तो मेरा नाम मेनका नहीं..


जैसे ही मैंने नकुल की डिटेल और लॉ की बात की, उस मैनेजर को पसीने आने लगे. मै तो पूरे गुस्से में थी इसलिए उन लोगों ने संगीता से ही बात करने में समझादरी समझी..


मैनेजर लगभग मिन्नत करते संगीता से मेरे विषय में कहने लगा.. प्लीज उस लड़की को समझाए कि ऐसा करने से हमारी नौकरी चली जाएगी.. यहां हंगामा नहीं करने... संगीता मेरी ओर लगभग रिक्वेस्ट भरी नजरो से देखती हुई कहने लगी.. "अब तो जो होना था वो हो गया, तुम क्या चाहती हो"..


मै:- ये लोग यहां माईक पर अनाउंस कर सबके सामने माफी मांगे, और कहे कि गलती से उन्होंने नकुल को यहां बिठा दिया, पूरे प्रकरण में उसका दोष नही है. और इज्जत के साथ नकुल को कार में बिठाए, तब जाकर मुझे सुकून मिलेगा.. हिम्मत कैसे हो गई नकुल को चोरों की तरह बिठाने की..


जैसा मैंने कहा ठीक वैसा ही हुआ. वो अनाउंस करके सबके सामने माफी मांगे और नकुल को कार तक छोड़ने आए. संगीता जबतक उसे कार में बिठा रही थी, मैंने उसका पूरा बिल पेमेंट कर दिया. पेमेंट करके मै जैसे ही मुड़ी, सामने शशांक और उसके 2 दोस्त खड़े थे.. "मेनका तुमने क्यों पेमेंट किया, हम तो आ ही गए थे पेमेंट करने.. मैने तो बस नकुल को ले जाने के लिए कह रहा था".


उसकी बातें सुनकर मै गुस्से से और पागल हो गई. खींचकर उसे एक तमाचा मारते... "मैनेजर साहब आपने सुना ना ये पुरा पेमेंट करेगा, मेरे पैसा वापस कीजिए और इनसे पेमेंट ले लीजिए. साथ मे मेरा नंबर भी नोट कर लीजिए. यदि ये पेमेंट ना दे पाए तो कल सुबह मुझे कॉल कीजिए. साथ मे पेमेंट ना देने की स्तिथि में आप लोगों ने इसके साथ क्या किया, उसकी डिटेल हिस्ट्री भी बता दीजिएगा. यदि इनकी रात भर की हिस्ट्री अच्छी लगी तो 40 की जगह 60 हजार पेमेंट करूंगी"..


जितना मैंने बेइज्जत किया था उस मैनेजर को, शायद वो पुरा याद किया. उसने 40 हजार पुरा वापस करते हुए कहा.. "आप जाइए मिस, आप पर पूरा यकीन है कि मेरे पैसे कहीं नहीं जाएंगे.. बाकी इनका क्या करना है वो मै देख लेता हूं.


मै उसके बैच से उसका नाम पढ़ती.. "ठीक है सुरेश कार्तिक भैया, गुस्से में कहा सुना माफ कीजिएगा. हम कभी ऐसे माहौल में नहीं जिए जहां पैसों के लिए कोई हमे ऐसे चोरों की तरह बिठा दे. अंदर से खून खौल जाता है


मैनेजर:- सुरेश कर्तिकेन है पुरा नाम. वैसे मुझे भी आप माफ कर दीजिएगा. क्या करूं ये बार है ना इसलिए पैसे ना देने वालों से जब हम प्यार से मांगकर थक जाते हैं तो मजबूरन हमे कड़ा रुख इख्तियार करना पड़ता है. वो औकाद वाली बात पर मै भी शर्मिंदा हूं. आप जाइए, बाकी मै देखता हूं...


मै, मैनेजर से अपना झगड़ा निपटाकर, वहां से तुरंत कार मे आ गई. नकुल की हालत एक अलग ही चिंता का विषय था. संगीता ड्राइव कर रही थी और मै नकुल को देखकर आंसू बहा रही थी... "संगीता ये पहले से पीता है, फिर इसकी हालत इतनी खराब क्यों लग रही है. बिल्कुल होश में ही नहीं है"..


संगीता:- तुम्हे कैसे पता की ये पीता है..


मै:- बचपन से उसके साथ रहती हूं संगीता, मै नहीं जानुगी तो कौन जानेगा.. कितना भी पी ले, मुझे देखकर होश में ही रहेगा.. उन कुत्तों ने जरूर कुछ मिलाकर पिलाया है..


संगीता:- एक काम करते है फिर, इसे हॉस्पिटल लेकर चलते है. रिस्क नहीं ले सकते..


मै:- हां मै भी वही सोच रही थी..


हम दोनों फ्लैट के थोड़ी दूर पर स्थित एक हॉस्पिटल गए. नाईट डॉक्टर ने उसका चेक उप किया और कुछ ब्लड टेस्ट करने भेज दिया... तकरीबन आधे घंटे बाद आकर कहने लगा... "ड्रग ओवर डोज के कारन हुआ है, एक रात एडमिट करना होगा"..


संगीता:- डॉक्टर कैसा ड्रग ओवरडोज..


डॉक्टर:- इसने पहले मेडिकल नशा किया फिर काफी ज्यादा अल्कोहल लिया है, इसलिए इसकी हालत ऐसी है. इसे कॉडीन फॉस्फेट का ओवर डोज मिला है..


डॉक्टर की बात सुनकर मै रोने लगी. संगीता मुझे कंधे का सहारा देकर मेरी आंसू पोछती हुई शांत की. एक टेबल पर बैठकर हम दोनों ही कॉफी की चुस्की लेने लगे... संगीता मुझे देखती हुई पूछने लगी, तुम्हें कब से पता है कि वो पीता है"..


मै:- इस बार होली का त्योहार से. होली मे ये नकुल मनीष भैया के साथ चाचू चाचू करते जा चिपका था.. बहुत सुनाया था मैंने तो दोनो को..


संगीत:- तुमने फिर छोड़ने के लिए नहीं कहा..


मै:- ज्यादा नहीं कह पाती, हम दोनों हम उम्र भी तो है, इसलिए हम एक दूसरे को लगभग दोस्त की तरह ही ट्रीट करते है. हां लेकिन मेरे टोकने के कारन, मेरे डर से कम से कम लिमिट मे तो रहता है, ज्यादा टोकी तो वो जो एक बीच की छोटी सी दीवार है, वो भी ना चला जाए कहीं. कहीं वो सोचने ना लगे, जब सबको सब कुछ पता ही है तो अब क्या छिपाना.. क्या करूं कुछ बातो में हार जाती हूं.. फिर घर में कौन ऐसा नहीं जो पीता ना हो.. सीखा तो उसने घर से ही है...


संगीता:- चलो कम से कम नकुल मे सेंस ऑफ़ रिस्पांसिबिलिटी तो है. नकुल मे बिल्कुल तुम्हारी छवि है मेनका, उसमे भी तुम्हारी तरह केयरिंग नेचर है..


मै, थोड़ा मुस्कुराती हुई... "सब यही कहते है कि नकुल मे मेरी छवि दिखती है, जबकि सच तो ये है कि मुझमें नकुल की छवि है. वो जितना केयरिंग पूरे खानदान के लिए है और खासकर मेरे लिए रहता है, उसी की वजह से मै भी सबकी केयर करना सीख गई.

आपको पता नहीं है वो कई ऐसे मामले तो बाहर निपटा देता है, जो किसी को पता नहीं चलता. इसलिए लोगों को नकुल के किए का पता नहीं लगता. मै तो कई ऐसे मामले उंगली पर गिनवा सकती हूं...


संगीता:- चलो इस बात से बात समाप्त करते है, कि तुम दोनो कमाल के हो.


मै:- ये हुई ना बात...


सुबह 10 बजे उसे डिस्चार्ज मिला. हालांकि नकुल को होश तो 6 बजे ही आ गया था, लेकिन सीनियर डॉक्टर के सुपरविजन और डिस्चार्ज के बाद ही उसे जाने दिया जाता. मैंने संगीता को जबरदस्ती ऑफिस भेज दिया और नकुल को लेकर फ्लैट चल दी..


वो अपने आप में अफ़सोस कर रहा था, साथ ही साथ मै अपनी नाराज़गी पहले ही दिखा चुकी थी, इसलिए वो हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था मुझसे बात करने की. पूरे रास्ते दोनो के बीच लगभग खामोशी ही बनी रही. जब वो फ्लैट पहुंचा तब सीधा वो अपने कमरे में जाने लगा.. कड़क आवाज में उसे बस खाने के लिए कहने लगी और वहीं हॉल में बैठ गई...


वो 1 ही प्लेट मे हम दोनों के लिए नाश्ता निकालकर ले आया, और खाने के लिए कहने लगा.. मै थोड़ी सी नाराजगी दिखती हुई उसे अकेले खाने के लिए बोल दी. कुछ ज्यादा ही जब वो जिद करने लगा, तो मैने साफ कह दिया मै यहां से चली जाऊंगी.… मेरी बात सुनकर वो खाने लगा और खाकर सोने चला गया.


उसे डांटने का मुझे अफ़सोस भी हो रहा था, लेकिन उसकी हरकत ही कुछ ऐसी थी कि गुस्सा आना लाजमी था. दिन का खाना बनाकर मै 11 बजे के करीब खाकर वहीं हॉल में ही सो गई.. रात भर की जागी थी बहुत गहरी नींद में थी.


बहुत तेज आहट हो रही थी, मेरी नींद खुल गई. आखों के सामने जो नजारा था वो देखकर तो मै दंग रह गई. हॉल के कई सामान बिखरे परे थे और फर्श पर पेट पकड़े शशांक और उसके साथ वही उसके 2 दोस्त थे, जिसे कल मै बार मे देखी थी..


"नकुल तू ये क्या कर रहा है. इन्हे पिट क्यों रहा है. नकुल तू सुन भी रहा है कि नहीं"… मै नकुल का कंधा खींचकर कहने लगी. बड़ी-बड़ी लाल-लाल आंखे मुझे दिखाते हुए कहने लगा.. "बिल्कुल चुप और जाकर बैठ जाओ"..


उसकी बात सुनकर मै उसे खींचकर एक थप्पड़ मारती... "कुछ पूछ रही हूं, मुझे बताएगा"


नकुल लगभग मुझ पर चिल्लाते... "एक बार से समझती नहीं क्या, अभी तुम्हे किनारे रहना है. समझी या नहीं"..


मै हां मे सर हिलाकर पीछे हटती हुई कहने लगी... "खून का एक कतरा फर्श पर नहीं गिरना चाहिए".. और इतना कहकर मै आकर चेयर पर बैठ गई. नकुल काफी गुस्से में दिख रहा था. गुस्से में उसने फिर से तीनो के पेट पर लात जमा दिया... जाकर किचेन से चाकू और बिस्तर से चादर उठाकर ले आया. बड़ी तेजी के साथ चादर को काटकर उसने रस्सी बनाई और एक-एक चेयर पर तीनो को बांध दिया.
zabardast update ..maja aa gaya .ye nakul ko drugs diya tha kya un teeno ne 🤔..aur lagta hai waha bar me bhi chhodkar bhag gaye the ..
nakul achche se peet raha hai teeno ko ,un jaise dosto ke saath aisa hi karna chahiye 🤩..abhi pura matter pata nahi par jitna samajh me aaya usse un teeno ki hi galti lagti hai .

menka ne bar ke manager ko achcha sabak sikhaya 🤩..
 
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