अध्याय 1
कुट्टनाड गांव को जैसे आज धूप ने जिंदा उबाल देने की कसम खा रखी थी। राजन कच्चे रास्ते से उतरकर अपनी जमीन पर आया। उसके जूते गीली, काली मिट्टी में धंस गए। रबर के बागान की वो अजीब सी महक—जमते हुए लेटेक्स और सड़ती हुई पत्तियों की वो तीखी बदबू—उसकी चमड़ी से ऐसे चिपकी थी जैसे मिट्टी की एक और परत हो। उसने अपने माथे से पसीना पोंछने के लिए अपनी बांह रगड़ी, जिससे नमक और भूरी धूल का एक लेप सा उसके माथे पर फैल गया। उसका पूरा जिस्म दर्द से दुख रहा था, एक मीठा-मीठा पर लगातार दर्द जो उसकी पीठ के निचले हिस्से से शुरू होकर सीधा एड़ियों तक जा रहा था।
उसने अपने घर की तरफ देखा। सफेद पुताई वाला वो छोटा सा घर, आस-पास के घने, दम-घोंटू हरे पेड़ों के बीच उदास सा खड़ा था। घर कुछ ज्यादा ही शांत लग रहा था।
श्रीदेवी सुबह तड़के ही निकल गई थी। कह रही थी कि बगल वाले गांव में उसकी बुआ बीमार है। एक छोटा सा चक्कर था। कुछ घंटे उनकी देख-भाल, शायद खाना-पीना, और दोपहर की तेज धूप होने से पहले वापसी। लेकिन सूरज कब का सर पर चढ़ कर जमीन को झुलसा चुका था, और अब ढल भी गया था। आसमान में जामुनी और नारंगी रंग ऐसे फैल गए थे जैसे किसी ने उसे पीट कर नीला कर दिया हो, पर घर में अभी भी सन्नाटा था।
राजन रसोई में घुसा। वहां की हवा भारी और रुकी हुई थी। उसने आते ही बत्ती नहीं जलाई। वो उस अंधेरे में खड़ा रहा, बस सुनता रहा। दीवार घड़ी की 'टिक-टिक' ऐसे लग रही थी जैसे कोई कील पर हथौड़ा मार रहा हो। उसके पेट में वही जानी-पहचानी ऐंठ शुरू हो गई—एक शक का बीज जो पिछले कई सालों से उसके अंदर पनप रहा था।
उसने अपने लिए एक ग्लास में ताड़ी उंडेली। नारियल का वो खमीर उठा, धुंधला और खट्टा रस। वो उसे लंबे, प्यासे घूंटों में पी गया। शराब उसके गले को जलाती हुई नीचे उतर गई। उसके दिमाग में अरुण का खयाल आया। उसका भतीजा, उन्नीस साल का लड़का, जिसके जिस्म से शहर के महंगे परफ्यूम और ऐंठ की बू आती थी। वो लड़का तीन हफ्ते पहले ही यहां आया था और अपने साथ ऐसी बेचैनी लाया था जिसने पूरे घर की हवा को अजीब सा बना दिया था। अरुण का जिस्म वैसा कसीला और चुस्त था जैसा राजन तो कब का भूल चुका था कि मर्दों का होता भी है—चौड़े कंधे, पतली कमर, और एक ऐसी मुस्कान जैसे वो कोई ऐसा राज जानता हो जो राजन को नहीं पता।
राजन ने ग्लास लकड़ी की मेज पर खटाक से पटका। उसके दिमाग में एक चित्र उभरा—अरुण का हाथ श्रीदेवी की कमर पर। उसने सोचा कैसे उस लड़के की गर्मी और जवानी उसकी बीवी के मुलायम जिस्म से टकरा रही होगी। इस एक खयाल ने उसके अंदर ऐसी आग लगा दी जिसका इस गर्मी के मौसम से कोई लेना-देना नहीं था।
बाहर का दरवाजा चरमराते हुए खुला।
राजन तस से मस नहीं हुआ। वो रसोई के अंधेरे में ही दुबका रहा, उसकी आंखें दरवाजे पर गड़ी थीं। श्रीदेवी अंदर आई, डूबती हुई धूप में उसकी परछाई लंबी हो गई थी। उसके हाथ में दवाइयों की एक छोटी थैली और कुछ मिठाई थी। वो पूरी तरह थकी हुई लग रही थी, उसके कंधे झुके हुए थे। लेकिन जैसे ही वो आंगन की मद्धिम रोशनी में आई, राजन की निगाहें तीखी हो गईं।
उसने कॉटन की साड़ी पहनी हुई थी। उमस की वजह से कपड़ा गीला होकर उसके बदन से चिपक गया था। हल्का सुनहरा कपड़ा उसकी भारी और चौड़ी छाती के उभारों पर इतना कस गया था कि उसकी हर सांस के साथ लगता था अभी फट जाएगा। जैसे ही वो आगे बढ़ी, साड़ी थोड़ी खिसकी, और उसके चौड़े, भरे हुए कुल्हों और पेट की गुददार नरमी बिल्कुल उभर आई। वो पूरी तरह से भरी-पूरी औरत थी, गोलाईयों का एक ऐसा जाल जिसे राजन पिछले बीस साल से अपनी जागीर समझता था, पर सच में उसने कभी उस पर पूरा हक नहीं जमाया था।
उसने राजन को देखा तो ठिठक गई।
“तुम आ गए,” वो बोली। उसकी आवाज धीमी और थकी हुई थी, पर उसमें एक कांपकाहट थी—एक डर जिसे राजन बखूबी पहचानता था।
राजन ने कोई जवाब नहीं दिया। वो सीने पर हाथ बांधे काउंटर से टेक लगाए खड़ा रहा। उसकी आंखें श्रीदेवी के जिस्म को घूर रही थीं। उसने उसके टखने पर लगी थोड़ी मिट्टी और पसीने से गाल पर चिपकी एक लट को देखा।
“वो बुआ,” राजन की आवाज खुरदरी और भारी थी। “मरी नहीं क्या अब तक?”
श्रीदेवी एकदम से सहम गई। उसने थैली को आहिस्ता और ध्यान से मेज पर रख दिया।
“वो सच में बहुत बीमार है, राजन। बुखार उतर ही नहीं रहा था। जब बच्चे दवाई लाने में परेशान हो रहे हों, तो मैं उन्हें ऐसे हाल में कैसे छोड़ सकती थी।”
“बच्चे। हाँ, बिल्कुल।”
राजन आगे बढ़ा। उसके वजन से फर्श की लकड़ियां चरचराईं। वो चल कर बिल्कुल उसके करीब आ गया। श्रीदेवी के जिस्म की महक—चमेली, पसीना, और कुछ गहरी, कुछ कस्तूरी जैसी—किसी घूंसे की तरह उसके दिमाग पर पड़ी। वो देख सकता था कि श्रीदेवी के गले की नस कैसे तेजी से फड़क रही थी।
“शाम के सात बज रहे हैं, श्रीदेवी। बगल वाला गांव रिक्शे से सिर्फ बीस मिनट दूर है। और तुम पिछले चौदह घंटे से गायब हो।”
“मैंने तुमसे कहा था कि मुझे वक्त लग सकता है।”
“वक्त किस चीज में? पूजा-पाठ में? या किसी और काम में?”
श्रीदेवी ने एक भारी सांस ली, एक ऐसी सांस जिसमें उसकी पूरी थकान साफ झलक रही थी। उसने बगल से निकलकर चूल्हे तक जाने की कोशिश की, पर राजन आगे आ गया और रास्ता रोक लिया। वो उससे लंबा-चौड़ा था, गुस्से और मैले कपड़ों में लिपटे किसी पहाड़ जैसा।
“रास्ते से हटो, राजन। मैं थक चुकी हूं। मुझे नहाना है।”
“देखकर तो लग रहा है जैसे तुम अभी कोई भारी कसरत करके आई हो,” उसने जहर उगलते हुए कहा। “चेहरा लाल हो रखा है। बाल बिखरे पड़े हैं। क्या बुआ ने तुमसे पूरे घर के चक्कर लगवाए थे?”
श्रीदेवी रुक गई। उसने सिर उठाकर उसे देखा, उसकी आंखों में डर और एक थका हुआ गुस्सा दोनों तैर रहे थे।
“तुम ऐसे कैसे हो सकते हो? जब भी मैं घर से निकलती हूं, तुम्हारा रवैया बिल्कुल उस कुत्ते जैसा हो जाता है जो अपनी हड्डी पर किसी को आने नहीं देता। मैं तुम्हारी बीवी हूं, तुम्हारी कैदी नहीं।”
“एक ऐसी बीवी जो पूरे दिन गायब रहती है,” राजन आवाज ऊंची करते हुए भड़का। “एक ऐसी बीवी जो मेरे घर आने पर मेरी तरफ ठीक से देखती तक नहीं। जिसे अपने बिस्तर से ज्यादा गांव भर की औरतों के साथ गप्पे लड़ाने में सुकून मिलता है।”
“हमारे बीच सब कुछ कब का मर चुका है, राजन। तुम्हें पता है।”
ये शब्द उसे किसी थप्पड़ की तरह लगे। राजन ने जोर से मेज का किनारा पकड़ लिया। उसने सालों की उस चुप्पी के बारे में सोचा, कैसे उनके बिस्तर का खेल बस एक दिनचर्या बन कर रह गया था—जो हमेशा अंधेरे में बत्ती बुझा कर किया जाता था, ताकि उसे श्रीदेवी की आंखों में झलकती वो निराशा न देखनी पड़े। उसे अपने ढले हुए जिस्म और कमजोरी का खयाल आया। उसके अपने जिस्म ने उसे धोखा दे दिया था, और ऐसी भूख उसके अंदर छोड़ दी थी जिसे मिटाने का तरीका उसे समझ नहीं आता था।
“शायद अगर तुम बर्फ की तरह ठंडी न होती, तो मेरे पास भी वैसा न रहने की कोई वजह होती,” वो गुर्राया।
श्रीदेवी ने एक छोटी और फीकी हंसी हंसी।
“ठंडी? मैं भूखी हूं, राजन। मैं प्यार के दो बोल सुनने के लिए तरसती हूं। एक ऐसे छुअन के लिए तड़पती हूं जिसके बदले में मुझसे कोई कीमत न मांगी जाए। मैं एक ऐसे मर्द के लिए तड़पती हूं जो अपनी शामें इस हिसाब-किताब में न बिताता हो कि मैं उससे कितने मिनट दूर रही।”
राजन एक कदम और आगे आया, उसका सीना लगभग उससे टकरा गया था। वो श्रीदेवी के जिस्म से निकल रही गर्मी को ठीक-ठीक महसूस कर सकता था। उसकी निगाह नीचे फिसल कर उसकी भारी छाती पर गई, जो गुस्से की वजह से तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके दिमाग में छवि अचानक बदल गई। अब वो उसे रसोई में नहीं देख रहा था; उसके दिमाग में एक अंधेरे कमरे की तस्वीर आ गई, जहां श्रीदेवी की साड़ी उसकी कमर तक उठी हुई थी, और उसकी भारी, गुदादार जांघें किसी जवान और कसे हुए कंधों पर टिकी थीं। उसने सोचा कैसे अरुण के हाथों ने उसकी चौड़ी कमर को दबोच रखा होगा, उसके मुलायम मांस में अपनी उंगलियां गड़ा रखी होंगी, और उसे अपनी तरफ खींच रहा होगा जबकि वो हांफते हुए सांस ले रही होगी।
ये बेहूदा खयाल उसके दिमाग में आग की तरह फैल गया, बिल्कुल जिंदा और घिनौना। उसे भीड़ नजर आई—गांव के उन सारे जवान छोकरों की भीड़, वही लड़के जो बाजार में श्रीदेवी को भूखी निगाहों से घूरते थे। उसने सोचा कैसे वो सब बारी-बारी अपना हवस का खेल खेल रहे होंगे, और श्रीदेवी पूरी पागलपंती के साथ उन सबको अपना रही होगी, बिल्कुल वैसी भूख के साथ जो उसने राजन को कभी नहीं दिखाई थी।
इस एक खयाल ने ही उसका खून खोल दिया, और एक घिनौनी, दर्द भरी बेचैनी के साथ उसका लिंग अकड़ गया।
“कहां था वो?” राजन फुसफुसाया, उसकी आवाज कांप रही थी।
श्रीदेवी ने भौंहें सिकोड़ी, उसके चेहरे पर अजीब सी उलझन दिखी।
“कौन?”
“अरुण। क्या वो गया था तुम्हारे साथ? क्या उसने दवाइयां उठाने में तुम्हारी ‘मदद’ की?”
श्रीदेवी उसे हैरत से घूरती रह गई, उसका मुंह थोड़ा खुला रह गया।
“अरुण? वो तो दिन भर यहीं था। सुबह लाइब्रेरी गया होगा शहर और दोपहर तक वापस आ गया होगा। अपने कमरे में बैठ कर पढ़ रहा होगा अभी। तुम पागल हो गए हो क्या?”
राजन के दिमाग में एक पल के लिए शक डगमगाया, पर उसका वहम एक भूखे जानवर जैसा था; उसे सच नहीं चाहिए था, उसे बस एक शिकार चाहिए था।
“शायद वो अपनी लाइब्रेरी न गया हो। शायद वहां से खिसक गया हो। या शायद तुम दोनों की पहले से ही कोई सेटिंग चल रही हो।”
“सेटिंग?” श्रीदेवी की आवाज चीख में बदल गई, उसका संयम पूरी तरह टूट चुका था। “वो तुम्हारा भतीजा है! एक बच्चा है! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या, राजन? क्या हो गया है तुम्हारी सोच को?”
“मेरा दिमाग बिल्कुल ठीक है! मेरा दिमाग ही तो है जो सब कुछ साफ-साफ देख रहा है! मैं देखता हूं कि तुम दुनिया को किस नजर से देखती हो। जब तुम्हें लगता है कि मैं नहीं देख रहा, तब शीशे के सामने तुम्हारा खुद को निहारना देखता हूं मैं। तुम कोई बेचारी सती-सावित्री नहीं हो, श्रीदेवी। तुम एक ऐसी औरत हो जो अंदर से तड़प रही है क्योंकि उसकी हवस और भूख कभी नहीं मिटती।”
श्रीदेवी एकदम पीछे हटी जैसे उसे झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा हो। उसका चेहरा पहले सफेद पड़ा, और फिर किसी गहरी चोट की तरह लाल हो गया।
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे ही घर में मुझसे इस तरह बात करने की।”
“तुम्हारा घर? इस छत का पैसा मैं देता हूं! मैं उन रबर के पेड़ों में अपना खून और पसीना बहाता हूं तब जाकर तुम ये महंगी साड़ियां पहनती हो और गांव की सती-सावित्री बनने का नाटक करती हो!”
“मुझे तुम्हारा पैसा नहीं चाहिए, राजन! मुझे एक पति चाहिए! एक मर्द जो मुझे किसी बकसे में कैद करने वाली जायदाद न समझे!”
राजन झपटा और उसकी बांह जोर से जकड़ ली। उसकी उंगलियां श्रीदेवी की बाजू के मुलायम मांस में गड़ गईं। उसने उसे अपनी तरफ खींचा, जोरदार तरीके से ताकि वो उसकी आंखों में देखे।
“तुम्हें लगता है कि तुम बहुत खास हो,” वो फुंकारा, उसकी सांस से ताड़ी और गुस्से की बदबू आ रही थी। “तुम्हें लगता है कि इस गांव के लड़के तुम्हारे आगे-पीछे इसलिए घूमते हैं क्योंकि तुम बड़ी अच्छी औरत हो? उन्हें बस ये चाहिए।”
उसने श्रीदेवी की एक चूची जोर से दबाई। उसकी नजरें उसके पूरे बदन पर एक अजीब सी नफरत और भूखी हवस के साथ रेंग रही थीं।
“उन सबको अपने हाथ तुम्हारी इन चूचियों पर फेरने हैं। वो सब ये देखना चाहते हैं कि चुदाई के वक्त तुम्हारी चीखें गूंजती हैं या नहीं। क्या सच में तुम उतना जोर से चीखती हो? बताओ मुझे, श्रीदेवी। क्या तुमने अपनी चूत लेने दी उनको? जब तुम अपनी उस ‘बुआ के यहां’ थी, क्या तुमने किसी शहरी लौंडे को या इस गांव के किसी छपरी छोकरे का लंड अपने अंदर घुसने दिया?”
श्रीदेवी ने उसकी पकड़ से छूटने की कोशिश की, उसका पूरा बदन झटपटाया। इस जोर-आजमाइश में उसकी साड़ी कंधे से थोड़ी खिसक गई, जिससे उसकी गोरी, मुलायम चमड़ी और ब्लाउज की पट्टी दिख गई।
“छोड़ो मुझे! मुझे दर्द हो रहा है!”
“जवाब दो मुझे!” वो दहाड़ा।
“किसी ने नहीं छुआ मुझे! मैं अपनी बुआ के साथ थी! मैं उनके घाव साफ कर रही थी और उन्हें सूप पिला रही थी! मैंने अपना पूरा दिन एक ऐसे कमरे में बिताया है जहां से बीमारी और मौत की बदबू आती है, और मैं वापस घर आती हूं तो देखती हूं कि एक पागल मर्द मेरा इंतजार कर रहा है!”
राजन ने उसे धक्का दे दिया। वो लड़खड़ा कर पीछे हटी और रसोई की मेज से जा टकराई। दवाइयों का थैला जमीन पर गिर कर बिखर गया। वो पल भर वहीं खड़ी रही, बुरी तरह हांफती हुई। उसकी सांसें फूल रही थीं, और उसके सीने के उभार सांस की तेजी के कारण लगातार ऊपर-नीचे हो रहे थे।
राजन उसे देखता रहा, उसकी सांसें भी श्रीदेवी के साथ ही उतर-चढ़ रही थीं। गुस्सा अभी भी वहां था, पर आहिस्ता-आहिस्ता उस पर एक दमघोंटू, खोखलेपन और नमर्दी का एहसास हावी होने लगा। उसने श्रीदेवी को देखा—सचमुच, ठीक से देखा—और उसके होंठों के आस-पास की झुर्रियों में कैद बेबसी को देखा। उसकी आंखों की वो खोखली उदासी देखी। उसे वहां एक ऐसी औरत नजर आई जो सिर्फ आज के दिन भर की मशक्कत से नहीं थकी थी, बल्कि सालों से उस थकान का बोझ उठा रही थी।
और उसके बावजूद, उसकी बेवफाई की वो घिनौनी तस्वीर राजन का पीछा नहीं छोड़ रही थी। जैसे उसके दिमाग के पिछले हिस्से में कोई फिल्म लूप पर चल रही हो। उसे श्रीदेवी अपनी कमर को मोड़ती हुई दिख रही थी, उसकी आंखें पलट चुकी थीं, उसकी चौड़ी और भारी जांघें कांप रही थीं, जबकि कोई जवान, ताकतवर और ज्यादा आग वाला मर्द उसके चूत को अपने लंड से चीर रहा था। उसे वो आवाजें सुनाई दीं—जिस्म से जिस्म टकराने की वो थप-थप आवाजें, औरत के आह भरने और सिसकने की वो गहरी आवाज, जिसे आखिरकार कोई वो सुकून दे रहा हो जिसके लिए वो तड़पी है।
इस खयाल ने उसे खुद अपनी नजरों में गिरा दिया। एकदम छोटा और लाचार।
“जाओ यहां से,” वो बोला, उसकी आवाज अचानक ठंडी और सपाट हो चुकी थी।
श्रीदेवी ने उसकी तरफ देखा, आखिरकार एक आँसू छलककर उसके गाल पर बहने लगा।
“क्या?”
“दफा हो जाओ मेरी नजरों के सामने से। अपने कमरे में जाओ। जा कर नहा लो। अपने बदन से उस गांव की बदबू धो डालो।”
श्रीदेवी कुछ देर तक तस-से-मस नहीं हुई। उसने जमीन पर बिखरी दवाइयों को देखा और फिर वापस राजन को। उसके चेहरे पर अब ज़रा-बराबर भी गुस्सा नहीं था, बस एक गहरा, गूंजता हुआ सन्नाटा था।
“तुम मुझे खो चुके हो, राजन,” उसने फुसफुसाते हुए मरी हुई आवाज में कहा। “बस तुम्हें अभी इसका एहसास नहीं हुआ है।”
वो पलटी और रसोई से बाहर चली गई। उसके कदम धीमे और भारी थे। राजन उसे जाते हुए देखता रहा। उसकी आंखें श्रीदेवी के कुल्हों के मटकते उतार-चढ़ाव, और उस भारी गोलाई पर कसी हुई साड़ी के खिंचाव पर अटकी रह गईं।
वो रसोई के उस खालीपन में खड़ा रहा, जहां सिर्फ घड़ी की टिक-टिक ही थी जो उस खालीपन को भर रही थी। उसने हाथ बढ़ाकर ताड़ी की बची-खुची बोतल उठाई और एक आखिरी, बेबस घूंट में वो पूरा खत्म कर दिया।
उसने आंगन से होते हुए उस कमरे की तरफ देखा, जहां अरुण था। वो लड़का इस घर में किसी साए की तरह था—एक ऐसी आग को भड़काने वाली चिंगारी जो पिछले एक दशक से सुलग रही थी। राजन के अंदर उस लड़के के लिए अचानक एक अजीब सी नफरत उमड़ पड़ी। पर उस नफरत के अंदर, एक और भी गहरा और उलझा देने वाला एहसास दबा हुआ था। वो अरुण से इसलिए जलता था क्योंकि वो जवान था, खूबसूरत था, और उस एक भयानक सच्चाई के डर से नफरत करता था कि शायद राजन के दिमाग में चलने वाली यही घिनौनी कल्पनाएं ही थीं जिनमें श्रीदेवी खुद को जिंदा महसूस करती होगी।
उसने ठंडी दीवार पर अपना सिर टिकाया और आंखें बंद कर लीं। उस घने अंधेरे में भी वो श्रीदेवी की धड़कनें सुन सकता था। वो अभी भी अपनी उंगलियों के नीचे उसकी चुचियों को महसूस कर सकता था। और वो अब भी उसे मर्दों की भीड़ से घिरी हुई देख पा रहा था, उसका वही जिस्म पाप और हवस का एक अखाड़ा बना हुआ था, और उसका चेहरा उस चरमसुख से मचल रहा था जो राजन उसे पूरी जिंदगी में कभी नहीं दे पाया।
कुट्टनाड की उस रात की चिपचिपी, उबलती हुई गर्मी ने उसे चारों तरफ से दबोच लिया था। किसी भारी, गीले कंबल की तरह जो सीधा उसकी रूह पर लपेट दिया गया हो। वो बहुत देर तक वहीं अंधेरे में खड़ा रहा, इस सन्नाटे भरे घर में एक पूरी तरह से टूटा हुआ मर्द, किसी ऐसे सच का इंतजार करते हुए जिसे खोजने से उसकी रूह भी डरती थी।