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Incest शरीफ बाप और उसकी शैतान बेटी

Hitman007

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फिर मैं अपने कमरे में गयी जहाँ मैंने सब से पहले अपनी स्कर्ट उतरी जो की पापा के माल से तर बे तर हो गयी थी.

फिर मैंने अपनी चड्डी उतरी वो भी मेरे अपने और पापा के वीर्य से लथपथ थी. सचमुच हम दोनों बाप बेटी का खूब पानी निकला था.

मैंने अपनी नंगी चूत पर हाथ फेरा और उसकी दरार में ऊँगली चलाई. मेरी चूत पापा की याद में गीली हो रही थी, मैं उसमे ऊँगली घुसा दी

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और ऊँगली को अंदर बाहर चलाते हुए बोली

"अरे मेरी प्यारी चूत, रो मत, बस लगता है की ज्यादा देर नहीं है, जल्दी ही तेरी तपस्या सफल होने वाली है, पापा का बेलन जैसा लौड़ा जल्दी ही तेरे अंदर होगा. थोड़ा सबर कर। जल्दी ही या शायद आज ही तुजे पापा से मजे मिलने वाले हैं. "
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पर सब्र करना इतना आसान थोड़े ही होता है,

खैर मैं किचन में आयी और खाना बनाया. हम दोनों बाप बेटी ने ड्राइंग रूम में जहाँ पापा सोफे पर बैठे थे वहीँ बैठ कर खाना खाया.

पापा आज बहुत ही खुश मूड में थे. होते भी क्यों नहीं अभी ही तो अपनी जवान बेटी की चूत में अपना लौड़ा रगड़ कर झड़े थे वो , और सब से ऊपर उन्हें जल्दी ही अपनी प्यारी और जवान बेटी की चूत चखने का मौका मिलने वाला था. पापा खुश तो होने ही थे.

खाना खाने के बाद और कुछ देर पापा से बात करने पर मैं उठी और अपने रूम की और जाने लगी तो पापा मुझसे बोले
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"सुमन! कहाँ जा रही हो कुछ देर और बैठो ना। "

मैं समझ रही थी की पापा थोड़ी मस्ती करने के मूड में है, तो मैं शर्माते हुए एक अदा से अपनी आंख उठाकर पापा को देखते कहा,

"जी वो नींद आ रही ही "

तो पापा बोले "अरे बेटी , चली जाना कुछ देर बाद कुछ देर तो बैठो."

पापा ने मुझे अपने पास ही सोफे पर बिठा लिया. पापा खुश मूड में होने के कारण कुछ गुनगुना रहे थे.
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और पापा ने रुम में म्यूजिक ऑन कर दिया तो मैं मन ही मन धीरे से बोली कि पापा सुन ना ली,

"सुमन लगता ही तेरे पापा के इरादे नेक नहीं है आज रात ही तेरा बाजा बजा डालेंगे।"

तो फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए खुद ही मन मैं बोली, "बजाना तो इन्होने ही है तेरा बाजा आज बजे या कल" और मैं चलती पापा के पास आ गई.
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पापा म्यूजिक के साथ-साथ धीरे-धीरे डांस करने लगे अपनी कमर हिलाते पापा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया कर मुझसे बोले आओ ना सुमन कुछ देर डांस करते हैं पापा का ये रोमांटिक अंदाज देख जहां मैं अंदर से खुशी से झूम रही थी पर अभी थोड़ी शर्म और झिझक भी थी पापा ने हाथ बढ़ाया और बोले

"आओ ना सुमन."

तो मैंने अपने बालों को ठीक किया कहा

"मुझे नाचना नहीं आता" तो पापा ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खींचे हुए बोले "आओ ना जानता हूं तुम कितना अच्छा डांस करती हो ।"
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पापा के इस तरह खिंचने पर मैं खिंची चली गई तो पापा ने मुझे अपनी बाहो में भर लियामैं पापा से चिपकी मुस्कराते हुए बोली

"मुझे नहीं पता था कि अपने ऐसे शौक पाल रखे हैं ."

पापा मेरा एक हाथ अपने हाथ में थामे और अपने दूसरे हाथ को मेरी कमर मैं डाल कर धीरे-धीरे नाचने लगे मैंने अपना दूसरा हाथ पापा के कंधे पर रख दिया और पापा की आंखें मुझे देख कर मुस्कुराती हुई अपनी गांड को धीरे हिलाने लगी।

जिस से मेरे मुँह से प्यार और मस्ती भारी आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह निकल जाती है।
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हम दोनों के बदन एक दम से चिपके हुए थे पापा के गाल मेरे चिकने गालों से रगड़ खा रहे थे जिस से मेरे अंदर एक अलग ही उत्तेजना सी उठ रही थी। कि पापा से एक दम चिपक गई जिस से पापा का खड़ा लंड मुझे मेरी स्कर्ट के ऊपर से मेरी चूत के ऊपर टकराता हुआ महसूस हुआ।

मेरी सांसे और तेज चलने लगी। जिस से मैं और भी कामातुर हो गई और मेरे पापा के साथ और भी चिपक गई।

पापा के होठों और मेरे होठों के बीच बस एक ही इंच की दुरी थी
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पापा और मैं काफी देर तक ऐसे ही डांस करते और एक दूसरे के साथ चिपके रहे तो थोड़ी देर बाद मैं पापा की बाहो से निकल बोली

"पापा क्या सारी रात ऐसे ही नाचने का इरादाहै."

तो पापा मेरा हाथ पकड़ कर बोले

"दिल तो यहीं करता है मेरी बेटी की बस तुम्हें बांहों मैं ले कर सारी जिंदगी ऐसे ही प्यार करता रहु."

मैं शर्माते हुए पापा की बाँहों से बाहर निकल गई और मूड कर उनकी और देखते हुई बोली

"पापा आप भी न , कभी कभी बच्चों की तरह करने लग जाते हैं। "

और पापा की बाहो से अलग हो कर अपने कमरे की और जाने लगी.

पापा अपनी में अपने लण्ड को सहलाते रहे. तो मैं बस नज़ारे झुकाए खड़ी थी।
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पापा न जाने क्यों अपनी लुंगी खोल कर फिर से कस कर बाँधने लगे. जैसे की उनकी लुंगी थोड़ी ढीली हो रही हो.

मेरी नज़र अंडरवियर मैं खड़े पापा के लंड पर पड़ी। पापा का लंड वो छोटा सा अंडरवियर संभाल नहीं पा रहा था।
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अंडरवियर के साइड से पापा की बड़ी बड़ी झांटे और बाल साफ दिखाई दे रहे थे। पापा का अंडरवियर पापा के लंड को संभाल नहीं पा रहा था पर मुझे तो अब पापा के लंड को संभालना ही था।

मेरे पापा के लंड को इस तरफ से बाहर निकला देख पहले से पापा से बोली,

"आप ना अंडरवियर बड़ा ले आइए, यह तो छोटा हो रहा है,"
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तो पापा मेरे सामने अपने लंड को सहलाते हैं. और बिना किसी शर्म के मेरे कान में बोले,

"सुमन अभी तुम कह रही हो बड़ा लाने के लिए, अभी जब तुम्हारी मम्मी आ जाएगी तो वो कहेगी की आखिर अंडरवियर पहनने की क्या जरूरी है. तुम दोनों माँ बेटी की अलग अलग इच्छा है."

और ये बोल कर मेरे सामने ही अपने लंड को सहलाने लगे और मेरे चेहरे को अपने और करते बोले

"सुमन चाहे तो छुप कर सुन लेना, तुम्हारी मामी यहीं कहोगी कि इसको पहनने की क्या जरूरत है. असल में तुम्हारी मम्मी को मैं ऐसे ही पसंद हूँ. "

इस "ऐसे ही पसंद हूँ " का मतलब मैं सब समझती थी. तो मैं ये सुन कर और देख कर वही खड़ी शर्माते रही।

और बोली "पापा आप भी न पूरे बेशरम हो गए हैं. अब जैसे आप मम्मी के साथ रहते हैं, वैसे मैं थोड़े ही हूँ. थोड़ा फर्क भी तो है न "

पापा भी मुस्कुराते बोले

"हाँ अभी तो फर्क है. पर देखता हूँ कब तक रहता है ?"

और यह कह कर अपने लण्ड को सहलाते रहे। "
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"आप भी ना पापा, बेशर्म हैं," और ये बोल कर मुस्कुराते हुए अपने रूम में आ गई।

मुझे नींद नहीं आ रही थी कि तभी मुझे ध्यान आया कि क्यों ना मैं कोई सेक्सी सी ब्रा और पैंटी पहन कर देखूं कि उसमें मुझे कैसी लगती हूं. आखिर रात की भी तो तयारी करनी थी, आज रात को पापा मेरी जांघों की रेशेस ठीक करने वाले जो थे.

अभी तो मुझे अपनी चूत की शेविंग भी करनी थी, मैं चाहती थी की जब पापा मेरी चूत के पास आएं तो मेरी प्ले ग्राउंड बिलकुल घास फूस और झाडिओं वगैरह से साफ़ हो, ताकि पापा को खेलने मैं मजा आये.

और मैंने झट से बैग खोला और एक जोड़ा ब्रा और पैंटी का निकाला और जैसी ही वो पहन कर आईने के सामने खुद को देखा तो खुद ही शर्मा गई मैं सोचने लगी क्या सचमैं पापा मुझे इस रूप मैं देखने के लिए बेचैन हैं मैं कैसे इस हालत में मैं उनके सामने लेट जाऊंगी

और मुझे यकीन था कि पापा आज मुझे इस रूप में सोच कर अपना लंड निकाल कर हिला रहे होंगे।

मुझे मन में आया की चल कर देखूं की क्या पापा भी अपनी बेटी की याद में मगन हैं.

मैं ये देखने के लिए कि पापा क्या कर रहे हैं हो भी सकता है की अपनी बेटी की जवानी के बारे में सोच कर अपना हिला रहे हो.
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मेरे उनके कमरे की और चल पड़ी और बाहर से देखा तो पापा के कमरे का दरवाजा खुला था और पापा अपना मूसल लंड अपना अंडरवियर में हाथ डाल कर बाहर निकाल रहे थे और पापा का विशाल लंड देख कर मेरी दरवाजे की ओट में खड़ी खड़ी उसे निहारने लगी और खुद मेरा हाथ मेरी स्कर्ट में से हो गया और अपनी चूत पर पहुंच गया.

मैं पापा के विशाल लंड को देख कर अपनी चूत को सहलाने लगी और खुद ही अपना मन में कहने लगी कि अब तो हम दोनों बाप बेटी से बिल्कुल भी कंट्रोल नहीं होता। ये अब कुछ दिनों की बात है.

वो अपना घोड़े जैसा लंड निकाल जोर जोर से हिला रहे थे मेरी नज़र पापा के घोड़े जैसे लंड पर टिक गयी वह अपने लंड तकिया पर दबा कर धक्के मारते हुए बड़बड़ा रहे थे.

और मैं अपने मन में कह रही थी कि पापा मेरी जवानी आपके लिए ही तो है तो मेरे होते हुए कैसे बेचैन हो कर हिला रहे हो। पापा बस कुछ देर के और बात है और फिर आप को ऐसे इसको हिलाने नहीं दूंगी और अपना छेद मैं नहीं तो कम से कम अपने हाथ से पकड़ कर आपका जोश निकाल देती.
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अपने हाथ में पापा का लंड पकड़ने के बारे में मेरी सोच कर मुझे ऐसा एहसास होने लगा कि पापा का गधे जैसा मोटा लंड मैंने अपने हाथ में पापा का लंड पकड़ लिया है राम क्या शाही लंड था पापा का और मेरा एक हाथ अपनी चूत पर चला गया और फिर से मुझे याद आया कि मैं कहां खड़ी हूं, मैं शर्मा अपने कमरे में आ गई हूं,

यहां मेरी हालत भी पापा के जैसी ही हो रही थी, मेरी चूत पानी छोड़ रही थी, मुझसे रहा नहीं गया और मैं पापा के लंड के बारे में सोचते सोचते नंगी हो गई और अपनी चूत को सहलाने लगी और पापा को सोचते सोचते मेरी चूत गीली होने लगी और अब मुझे उसने ठंडा किए बिना सोना भी मुश्किल हो रहा था.

मैंने अपने मुँह को तकिये में छुपा लिया जिससे मुझे लगा कि मैं पापा के चौड़े सीने से मैं अपना मुँह छुपा लिया और अपनी चूत मैं उंगली ऐसे डालने लगी जैसे कि वो मेरी उंगली नहीं पापा का लंड हो।
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पापा के लंड के ख्याल से मेरा चेहरा शर्म से लाल हो उठा। मेरे अंदर की आग तो धीरे-धीरे भुजने की बजाये खराब रही थी पर हमारे समय मेरे पास उस समय मेरे पास सिवाये उंगली के दूसरा रास्ता नहीं था।

मेरी आँखो बंद थी पर बंद आँखो के सामने मुझे पापा दिखायी दे रहे थे। उनका वो मजबूत गठेला शरीर, मजबूत कंधे, उनका चौड़ा सीना और सीना के घने बाल और सब से बड़ी बात उनकी टांगों के बीच किसी शेर की तरह दहाड़ता लंड जिसकी तो मेरी दीवानी हो चुकी थी मेरी नज़र पापा के घोड़े जैसे लंड पर टिक गयी.

मैं अपनी चूत में अपनी उंगलियों को घचाघच खेल रही थी और कभी तकिये को अपनी टांगों के बीच में दबाकर चूत पर रगड़ रही थी.
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सच मेरे पापा का क्या शाही लंड था अब इस शाही लंड पर मेरी माँ का नाम लिखा था पर जल्दी ही मैं इस के सुपाडे पर अपना नाम लिख ही लूंगी।

आज मैं अपनी चूत की आग को अपनी उंगली से ठंडा करने की कोशिश कर रही हूं लेकिन कुछ समय के बाद पापा अपने उसी शाही लंड को चूत के अंदर डालकर मेरी चूत के अकड़ को ठंडा कर रहे होंगे.

मेरे अंदर भयानक आग लगी हुई थी मैं अपनी चूत में उंगली डालें सिर्फ को उधर झटका करेगी थी मैं उंगली डालकर उसका पानी निकालने लगी.

एक हाथ से अपने चूत को और दूसरे हाथ से अपने चूचियों को सहलाने लगी फिर निपल को धीरे धीरे मसलने लगी मेरे मुँह से आआआआआआह्हह्हह्हह्हह्ह की आवाज निकल रही थी।
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मैं पापा के हथियार के बारे में मैं सोच कर अपनी चूत मैं उंगली कर रही थी। मेरे लाख चाहने पर भी अपनी चूत की आग को ठंडा नहीं कर पा रही थी बल्की मैं तो आग में घी डाल रही थी.

मेरी उंगली वो काम कैसे कर सकती थी जो काम पापा का लंड कर सकता था.

खैर जब तक पापा का लौड़ा मेरी चूत में नहीं जाता तब तक तो मुझे भगवान् के दिए हाथ का ही सहारा था.

खैर थोड़ी देर पापा को अपने लण्ड से खेलते देख कर मैं अपने कमरे में आ गयी,
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मुझे रात की भी तो तैयारी करनी थी, चूत की शेविंग तो करनी थी तो मैंने सोच की चलो नहा भी लेती हूँ.


किचन में काम करके पसीना भी आ गया था तो शरीर से अच्छी सुगंध भी आएगी और पापा को रात में मजे ज्यादा मिलेंगे.
Very nice update! Superb descriptions!!
Really hot and exciting writings! Please keep going!
 

Ting ting

Ting Ting
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मैंने सोचा की पहले नहा लेती हूँ और अपनी चूत की सफाई भी कर लेती हूँ ताकि रात को ज्यादा मजा आये.

यह सोच कर मैंने एक शेविंग रेज़र लिया और गुसलखाने में चली गयी,

मैं बहुत खुश थी,,,,घर में बने गुसलखाने में मैं अपने सारे कपड़े उतार कर एकदम नंगी होकर नहा रही थी,,,

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वैसे तो अगर मैं न भी नहाती तो भी कोई कह नहीं सकता था कि मैं नहाई नहीं। एकदम गोरी चिट्टी होने के नाते मैं हमेशा तरोताजा दिखाई देती थी लेकिन आज का दिन मेरे लिए भी बहुत खास था आज मैं अपने हुस्न का जादू पूरी तरह से पापा पर बिखेर देना चाहती थी,,,, इसलिए अपने बदन को रगड़ रगड़ कर नहा रही थी,,,,,,,
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बड़े घराने की होने के नाते घर में ही सब सुख सुविधा मौजूद थीं,,, घर में बने गुशलखाने में आदम कद का आईना लगा हुआ था जिसमें मैं अपने प्रतिबिंब को देख रही थी और मन ही मन अपनी खूबसूरती पर गर्व कर रही थी,,,,,, एक-एक करके अपने सारे कपड़े उतार कर वह नंगी हो चुकी थी,,,,। मेरे बदन पर केवल मरून रंग की कच्छी थी.

आईने के सामने खड़ी होकर,,, मैंने अपनी कच्छी को अपनी नाजुक उंगलियों में फंसाकर धीरे-धीरे उतारना शुरू कर दी,,,,, और देखते ही देखते अपनी मांसल चिकनी सुडोल जांघों से होते हुए मैंने अपनी लंबी टांग में से उस कच्छी को निकालकर वही नीचे रखदी,,,
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और बड़ी प्यार भरी नजरों से अपनी दोनों टांगों के बीच बस दो इंच की ऊभरी हुई दरार को देखने के लिए जो कि हल्के हल्के बालों से घीरी हुई थी,,,,, अपनी हथेली को उस पर रखकर हल्के से दबाते हुए अपने मन में सोचने लगी कि मर्दों की सबसे बड़ी कमजोरी यही है जिसके चलते और इस दुनिया में किसी को भी अपने वश में कर सकती हैं अपना मनचाहा काम करा सकती है,,,,,,

जैसा कि मैं अपनी बुरके बदोलत अपने पापा को पूरी तरह से अपने वश में की हुई थी,,, और मेरा पापा भी अपनी जवान बेटी के रूप जाल में पूरी तरह से बंध सा गया था,,,।

मैं अपनी बुर की दरार में अपनी एक ऊँगली रख कर उसे हल्के हल्के से सहला भी रही थी और उसे रगड़ कर गर्म भी कर रही थी,,, जिससे मेरे बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी थी,,,
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फिर मैंने अपनी चूत को पानी डाल कर गीला किया और एक छोटे से स्टूल पर बैठ गयी. .

मैंने अपनी टाँगें पूरी खोल ली ताकि मेरी चूत का दरवाज़ा पूरी तरह से खुल गया और मुझे मेरी चूत साफ दिखाई दे रही थी,
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असल में मैं डरती थी की कहीं शेविंग करते हुए चूत के पास या चूत पर कट न लग जाये.

फिर मैंने रेजर उठा कर धीरे धीरे अपनी छोटी छोटी झांटें साफ करनी शुरू कर दी.
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मुझे ऐसे अनुभव हो रहा था कि जैसे कोई दुल्हन अपने दूल्हे के लिए सज धज कर तैयार हो रही हो. वैसे ही मैं अपनी चूत को अपने पापा के लिए तैयार कर रही थी, मेरी चूत पर बहुत छोटे छोटे रोएं जैसे ही तो बाल थे पर मैंने वो भी सबसाफ़ कर दिया.

थोड़ी ही देर में मेरी चूत इस तरह साफ़ होकर चमक उठी जैसे कोई सुन्दर इस्त्री का चमकदार चेहरा मेकअप के बाद चमक जाता है,

मेरी चूत मेरे हाथ की हथेली की तरह साफ हो चुकी थी,
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शेव करने के बाद मैंने अपनी चूत को पानी डाल कर साफ किया और अपनी चूत में ऊँगली फेरी. मेरी चूत पापा के लौड़े को याद कर कर के खूब पानी छोड़ रही थी,

ऐसे लग रहा था की आने वाले पलों के इन्तजार में ख़ुशी के आंसू बहा रही हो.
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मुझे रात का इन्तजार था. और मुझे पापा याद आने लगे ,,,, उनका मोटा तगड़ा लंबा लंड हवा में लहराता हुआ नजर आने लगा जिसके बदौलत मैं इतना तर कट रची थी,,,,यह सारा ताम झाम पापा के मोटे तगड़े लंबे लंड के प्रति आकर्षण का ही नतीजा था,,,मैं किसी भी कीमत पर पापा के मोटे तगड़े लंबे लंड को अपनी बुर के अंदर लेना चाहती थी,,,,, उत्तेजना से भरी हुई मैं वैसे भी पहले से ही कामुक औरत थी,,, और इस समय पापा चुदाई के टैलेंट को याद करके मैं मेरी बुर से काम रस टपक रहा था,,, ऊससे रहा नहीं जा रहा था। मेरे मन पर कामवासना का जोर इतना चढ़ चूका था कि मुझे बिना चुदे रहा नहीं जा रहा था. समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करू.

तो मैं,,,, गुसलखाना का दरवाजा खोलकर गुसलखाने से बाहर निकल गई,, और वह भी एकदम नंगी,,, बेझिझक चेहरे पर शर्म का कोई भाव नहीं था,,, वैसे भी मैं जानती थी कि घर में कोई भी नहीं है सिर्फ पापा ही तो हैं जो इस समय अपने कमरे में हैं.
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(और अगर पापा मुझे इस तरह नंगी देख भी लेते तो भी क्या हो जाता. जहां इतना कुछ तो हम बाप बेटी के बीच हो ही चूका था तो अधिक से अधिक जो बाकि था वो भी हो जाता. और उसके लिए ही तो यह सब तयारी हो रही थी,

इसलिए मैं बिना झिझक बिना कपड़ों के गुशल खाने से बाहर निकल गई और चहल कदमी करते हुए रसोई घर की तरफ जा रही थी,,,,
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मेरी चाल एकदम मादक थी, नितंबों की थिरकन अद्भुत थी,,, कमर की बलखाहट,,, कयामत ढा रही थी छातियों की शोभा बढ़ा रही दोनों दशहरी आम सीना ताने किसी सरहद पर तैनात जवान कि तरह, मैं आगे बढ़ रही थी,,, मेरी चूचीयों की कडकपन बरकरार थी,,,,

पतली कमर के नीचे मेरी मदमस्त उभार ली हुई गांड,,, जिसकी दोनों फांकें आपस में रगड़ खा रही थी जिससे पूरे बदन में और ज्यादा गर्मी पैदा हो रही थी,,, मैं अपनी खूबसूरती और अपनी खूबसूरत बदन पर गर्व करते हुए और ज्यादा इतरा कर चल रही थी वह तो अच्छा था कि इस हाल में मुझे देखने वाला इस समय कोई नहीं था।
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मेरे लिए यह पहली बार नहीं था कि मैं घर में इधर से उधर पूरे कपड़े उतार कर नंगी घूम रही होऊं. कई बार जब कोई घर में नहीं होता तो मैं सारे कपडे उतार कर नंगी रहने का भी अनुभव लेती थी,

बिना कपड़ों के घर में इधर से उधर खूब मुझे ज्यादा तेजना का अनुभव होता था और वैसे भी मैं इस समय काफी उत्तेजित हो चुकी थी,,, रसोई घर में पहुंचते ही मैं लाई हुई ताजी सब्जियों के बीच रखे हुए उस मोटे तगड़े लंबे बैगन को ढुंढने लगी जो कि आज सुबह-सुबह ही अपने लिए लाई थी,,,

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उसे हाथ में लेते ही मेरे गोरे गोरे गाल शर्म के मारे लाल हो गए ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरे हाथों में बैगन नहीं पापा का लंड आ गया हो,,,

मैं तुरंत उस बेगन को लेकर वापस गुसल खाने में आ गई,,,।
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ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं गुसल खाने में बेगन नहीं बल्कि किसी लण्ड को लेकर आई हूँ मैं काफी उत्साहित नजर आ रही थी,,, मैं अपनी हथेली में उस बेगन की मोटाई को लेकर पापा के लंड के बारे में सोच रही थी,,,
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अपने मन में उस बैगन की तुलना पापा के लंड से कर रही थी,,,, उस पर ढेर सारा थूक लगाकर मैंने एक टांग उठा कर टेबल पर रख दी और उस बैगन के टॉप को अपनी चूत के छेद के मुहाने पर रखकर धीरे धीरे उसे अंदर की तरफ जाने लगी और अपनी आंखों को बंद कर ली,,, आंखों को बंद करके मैं पापा के बारे में कल्पना कर रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे पापा मेरी पतली कमर को अपने दोनों हाथों से पकड़कर अपने मौटे तगड़े लंड को मेरी बुर में डाल रहा हो,,,। इस ख्याल से मैं पूरी तरह से उत्तेजित हो गई थी और एक ही बार में,, पूरे बैगन को अपनी बुर की गहराई में डाल दी,,, फिर उसे धीरे धीरे अंदर बाहर करते हो यह सोचने लगी कि पापा अपने लंड को मेरी बुर में डालकर धीरे-धीरे अपनी कमर हिला कर उसे चोद रहे हों।
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यह ख्याल मेरे लिए पूरी तरह से मदहोश कर देने वाला था मैं एकदम मस्त हुए जा रही थी,,,,ओहहह पापा और जोर से पापा और जोर से,,,, ऐसा कहते हुए मैं पूरी तरह से बावली होकर बैगन से मजा ले रही थी,,,, और देखते ही देखते मैं एकदम से झड़ गई,,, इतनी ज्यादा उत्तेजना का अनुभव एक बैंगन के साथ में मैं पहली बार कर रही थी,,,, शांत होने के बाद मैं बैंगन को पानी से धोकर रख दीऔर नहाने के बाद उसे अपने साथ वापस लेकर आई और रसोई घर में रखकर अपने कमरे की तरफ चल दी और वह भी उसी तरह से एकदम नंगी,,,,।
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थोड़ी ही देर में मैं बड़े अच्छे से तैयार हो गई मैं पहले से ही ज्यादा खूबसूरत थी लेकिन आज उसकी खूबसूरती निखर कर सामने आ रही थी।

आज मैंने एक लम्बी सी मैक्सी पहनी थी और उसके नीचे एक ब्रा और चड्डी भी पहनी थी,

मुझे पापा ने कहा था कि वो मेरी जाँघों को चाट कर मेरे रेशेस ठीक करने वाले थे. और मैं जानती थी कि रेशेस के बहाने से पापा कुछ और शरारत भी करने वाले थे.

बस मैं जा कर बिस्तर पर लेट गयी
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और अब इन्तजार था तो पापा का।
 

Premkumar65

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शाम को हम बाप बेटी सो गए. पापा तो शायद सो गए थे पर मैं तो इसी सोच में थी कि जल्दी ही मम्मी आ जाएँगी फिर तो पापा को पटा पाना काफी मुश्किल हो जायेगा. और यहाँ तो जब हम दो बाप बेटी ही हैं, तब भी मेरी इतनी कोशिश के बाद भी मैं अभी तक पापा से चुदवाने में सफल नहीं हो पायी.
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हालाँकि मुझे ख़ुशी थी कि आज मैंने पापा को अपनी गांड दिखला दी थी और पापा ने भी मुझे अपना लौड़ा दिखला दिया था.

हालाँकि पहले भी पापा मेरी चूत और गांड और मैं पापा का लण्ड देख चुकी थी पर वो सब छुप कर था. पर आज तो हम दोनों ने जानभूझ कर अपने अपने हथियार एक दुसरे को दिखाए थे.

इस तरह से लग तो रहा था की बात आगे बढ़ तो रही है.

पर मुझे मम्मी के आने से पहले चुदना था. क्योंकि मम्मी आ जाएगी तो फिर पापा को चोदने के लिए मम्मी मिल जाएगी फिर शायद पापा मेरी ओर ध्यान न भी दें.

वैसे भी अभी पापा को चुदाई किये कई दिन हो गए थे तो वो भी किसी चूत को चोदने के लिए तड़प रहे थे.

मैंने सोच लिया एक जब तक मम्मी नहीं आ जाती मैं अपनी कोशिश जारी रखूंगी,

सुबह उठ कर मैंने नाश्ता बनाया और स्नान वगैरा करके तैयार हो गयी,

कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ, तो ऐसे ही पापा को कहा कि पापा चलो आज कहीं घूमने चलते है,

पापा तो आराम से लुंगी और शर्ट पेहने सोफे पर बैठे टीवी देख रहे थे, तो उन्हें भी लगा की टीवी देखने से तो अपनी सेक्सी बेटी के साथ कहीं जाना ज्यादा मजेदार होगा.
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तो वो बोले, "सुमन बेटी ! ठीक है. मैं जरा पैंट पहन लूँ, फिर चलते हैं. "

मैं तो पापा का लण्ड देखने को उत्सुक थी और पैंट में कहाँ लौड़ा दिख पायेगा, तो मैंने पापा को मना करते हुए कहा

"अरे पापा हम किसी के घर थोड़े ही न जा रहे हैं. लुंगी ही ठीक है, देखो मैंने भी तो कोई सूट नहीं पहना है, मैं भी सिर्फ स्कर्ट और टी शर्ट में ही हूँ. चलो थोड़ा लॉन्ग ड्राइव पर ही चलते हैं. "

मैंने वैसे आज स्कर्ट के नीचे पैंटी और शर्ट के नीचे ब्रा भी पहनी थी. आखिर हम लोग बाहर जा रहे थे तो बिना ब्रा पैंटी अच्छा नहीं होगा.

पापा राजी हो गए और हम बाप बेटी गाड़ी निकल कर चल पड़े.
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गाड़ी में चलते चलते हम लोग शहर के बाहर आ गए थे और अब चारों ओर खेत थे. यहाँ पर सड़क पर यातायात तो बिलकुल न के बराबर था.

थोड़ी थी देर में गाड़ी बिलकुल सुनसान एरिया में आ गयी.
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मुझे लगा की यही मौका है, पापा को पटाने का कुछ करना चाहिए.

पर कुछ समज़ नहीं आ रहा था. अचानक मुझे एक आईडिया आया।

मैंने देखा की दूर दूर तक कोई नहीं है , तो मैंने पापा से कहा

"पापा जरा साइड में गाडी रोकिये, मुझे जोर से सूसू आया है. मैं जरा पेशाब कर लूँ। "

पापा ने साइड में गाडी रोकते हुए कहा.

"बेटी. यह चलती सड़क है, कोई आ सकता है. तुम इन खेतों में जा कर पेशाब कर लो, "
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पर मुझे खेतों में छुप कर पेशाब थोड़े ही करना था.

मैंने इठलाते हुए पापा से कहा

"अरे पापा, मुझे बहुत जोर से पेशाब आया है, यहाँ तो वैसे भी कोई नहीं आता. खेतों में जाने तक तो कहीं मेरा पेशाब निकल ही न जाये. मैं ऐसा करती हूँ की गाडी की ओट में ही बैठ कर पेशाब कर लेती हूँ."

और फिर शरारत से मुस्कुराते हुए बोली

"हम औरतों को आप मर्दों वाली सुविधा तो है नहीं, की खड़े हो कर पेशाब कर लें. मैं तो गाड़ी के पीछे बैठ जाउंगी। आने जाने वाले वाहनों को तो दिखाई भी नहीं दूँगी,बस आप जरा ध्यान रखना। "
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(यह ध्यान पता नहीं सड़क पर आने वाले वाहनों का रखना था या पेशाब करती हुई अपनी जवान बेटी का। मेरी बात दो अर्थी थी, )

मैं पापा के साथ ड्राइवर के बराबर वाली सीट पर बैठी थी, तो दरवाजा खोल कर मैं साइड से उतर गयी.

मैंने देखा की पापा साइड मिरर जो खिड़की के पास होता है में से अपनी बेटी को देखने की कोशिश कर रहे थे,

मैं जानभूझ कर गाड़ी के थोड़ा पीछे गयी और ध्यान रखा की मैं गाड़ी की ओट में ऐसी जगह बैठ कर पेशाब करूँ जहाँ से पापा को मेरी नंगी गांड दिखाई दे सके.

पापा का पूरा ध्यान साइड मिरर से मेरी ओर ही था.

मैंने धीरे धीरे पूरा समय ले कर अपनी स्कर्ट ऊपर उठाई ताकि पापा को मेरी नंगी टांगे और पैंटी दिखाई दे सके.
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फिर मैंने आराम से अपनी पैंटी नीचे घुटनों तक खींच कर उतारी , और अपनी चूत को नंगा कर दिया।
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मैं काफी देर से पापा को पटाने का सोच रही थी तो मेरी चूत तो पहले से ही गीली थी,

मैंने देखा की मेरी चूत का चिपचिपा सा अमृत मेरी पैंटी में लग चूका था. और चूत की जगह से पैंटी गीली हो गयी थी.

मैं पैंटी को उतार कर , नंगी हो कर अपनी टांगों को पूरा फैला कर पेशाब करने बैठी, ताकि पापा को मेरी नंगी चूत का पूरा और खुल कर दर्शन हो सके.
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मैंने कनखीओं से गाड़ी से साइड मिरर को देखा तो पाया की पापा पूरी टकटकी लगाए अपनी प्यारी बेटी की नंगी चूत को ही देख रहे थे.

पेशाब तो मुझे आया ही था. तो मैंने अपनी टांगो को खोल कर अपनी चूत को ठीक पापा की ओर करके जोर से मूतना शुरू कर दिया.
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मेरी चूत से शर शर तेज पेशाब निकल रहा था और चूत से सीटी जैसी आवाज निकल रही थी,

उधर पापा भी ध्यान से मेरी चूत को देख रहे थे, और मैं जानभूझ कर मिरर में पापा को नहीं देख रही थी ताकि पापा को ऐसा लगे की मुझे पापा द्वारा देखे जाने का कुछ भी पता नहीं हैं।

मैं काफी देर तक इसी तरह बैठी रही और पापा को जन्नत का नजारा करवाती रही उधर पापा भी शायद अपना लौड़ा मसल रहे होंगे ,

खैर आखिर कितनी देर तक पेशाब करती रह सकती थी,

थोड़ी ही देर में पेशाब की धार धीमी होती होती बंद हो गयी,

अब न चाहते हुए भी मुझे उठना ही पड़ना था.

उठते उठते मुझे एक और शरारत सूझी।
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मैं जब उठ खड़ी हुई तो मैंने नंगी ही खड़ी हो कर एक लास्ट बार अपनी चूत पापा को दिखाई और अपनी पैंटी घुटनो से ऊपर करने लगी.

मैंने जब पैंटी मेरी जांघो के जोड़ के पास आयी तो मैंने जान भूज कर जोर लगा कर थोड़ा पेशाब और निकाल दिया.
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अब पैंटी चूत के पास ही थी तो पेशाब पैंटी के ऊपर गिर गया और पैंटी पेशाब से गीली हो गयी.
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मैंने ऐसे पैंटी की ओर देखा की जैसे गलती से पैंटी पर पेशाब हो गया हो (हालाँकि मैंने यह सब जानभूझ कर किया था. और मैं जानती थी की पापा देख रहे हैं. )
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फिर मैंने पैंटी को फिर से निकाल दिया और उसे हाथ में ही पकड़ कर पापा की ओर आयी. पापा तुरंत दूसरी ओर देखने लगे.
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मैं दरवाजा खोल कर गाड़ी के अंदर आयी और हाथ में पकड़ी गीली पैंटी पापा को दिखती हुई बोली

"पापा देखा मैंने कहा था न कि मुझे जोर से पेशाब आयी है, देखो थोड़ी सी पेशाब पैंटी के ऊपर भी गिर गयी और ये गीली हो गयी है, अब मैं इसे पहन नहीं सकती मैं क्या करूँ। "
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पापा ने मेरे हाथ से पैंटी ले ली और उसे देखा.

मेरी पैंटी चूत वाली जगह से चुतरस से चिपचिपी हो रही थी,

बाकि की पैंटी तो चाहे पेशाब से गीली थी पर बीच में चूत का गाढ़ा सा चुतरस अलग ही चमक रहा था.
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पापा ध्यान से चुतरस को देख रहे थे.

मुझे शर्म आ रही थी, पापा ने अपनी उँगलियाँ मेरे चिपचिपे चुतरस में घुमाई और बोले

"सुमन बेटी। तुम्हारी कच्छी तो बहुत गीली हो गयी है, इसे न पहनना , वर्ना तुम्हे रैशेस हो जायेंगे. कोई बात नहीं, तुमने स्कर्ट तो पहनी ही है, ऐसा करते हैं की तुम्हारी कच्छी को सीट पर सूखने डाल देते हैं. घर जा कर दूसरी पहन लेना."

पापा यह सब कहते हुए पैंटी के चुतरस पर अपनी उंगलिआ सेहला रहे थे।

शायद पापा को अपनी बेटी का चुतरस अच्छा लग रहा था क्योंकि कहने के बाद भी उन्होंने अभी तक पैंटी को पीछे सीट पर नहीं रखा था.

मुझे लगा की पापा को अपनी बेटी की गीली पैंटी से खेलने का थोड़ा और मौका देना चाहिए ,
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मैंने पीछे रिअर व्यू मिरर में देखा की पीछे दूर पर एक नलका लगा था.

मुझे तुरंत एक आईडिया आया और मैंने पापा से कहा.

"पापा देखिये वो पीछे एक नल लगा हुआ है, मेरे हाथ पेशाब से गीले हो गए हैं. आप रुकिए मैं जरा जा कर हाथ धो कर आती हूँ."

यह कहते हुए मैंने कार का दरवाजा खोला और बाहर निकल गयी , बाहर निकलते हुए मैंने एक शरारत और की , और वो यह के मैंने कार से उतरते हुए अपने चूतड़ों से कार का रिअर मिरर (जो दरवाजे के साइड में लगा होता है,) उसे बंद कर दिया.

अब पापा मुझे साइड मिरर से नहीं देख सकते थे.

असल में मेरा पीछे नल तक जाने और हाथ धोने का कोई इरादा नहीं था. मैं तो देखना चाहती थी की मेरे जाने के बाद पापा मेरी पैंटी के साथ क्या करते हैं.

पापा को लगा कि मैं पीछे नल के पास चली गयी,

पर मैं तो थोड़ा सा ही पीछे तक गयी और फिर दबे पाओं वापिस आ गयी और कार की साइड में खड़ी हो कर पापा की हरकतें देखने लगी,

पापा ने मेरी गीली कच्छी की चिपचिपे चुतरस को सूंघना शुरू कर दिया. पापा ने मेरी पैंटी अपनी नाक पर रख ली और अपनी प्यारी बेटी के कामरस को चाटने लगे.
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शायद पापा को अपनी बेटी का रस स्वादिष्ठ लग रहा था.
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पापा मेरी पैंटी को पूरी जीभ से चाट रहे थे,

फिर पापा ने अपना दूसरा हाथ अपनी लुंगी में डाल लिया और अपना लण्ड बाहर निकाल लिया और उसे सहलाना शुरू कर दिया.

मैंने देखा कि पापा का लण्ड पूरा लोहे की तरह टाइट हो चूका था. कि उस पर लण्ड की नसें भी उभरी हुई दिखाइ दे रही थी,

पापा हवस में अंधे हो कर यह भूल हे गए थे की उनकी बेटी पीछे हाथ धोने गयी है जो किसी भी टाइम वापिस आ सकती है,

अब पापा एक हाथ से अपने मुंह पर मेरी कच्छी रखे उसे चाट रहे थे और दुसरे हाथ से तेज तेज अपना मुठ मार रहे थे.
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पापा का लौड़ा बहुत मोटा और लम्बा था.

जब पापा का हाथ नीचे जाता तो लौड़े का टमाटर जैसा सुपाड़ा बाहर आ जाता और जब हाथ ऊपर आता तो सुपाड़ा मांस से ढक जाता।
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ऐसा लग रहा था की जैसे कोई चूहा अपने बिल में छुपा हुआ हो और फिर अपनी गर्दन बाहर निकाल कर इधर उधर देखता हो फिर अपनी गर्दन अपनी बिल में छुपा लेता हो, पापा के लौड़े का सुपाड़ा ऐसे ही छुपा छुपी का खेल खेल रहा था.
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मुझे पापा का लौड़ा जिसे वो मुठ मार रहे थे इतना सूंदर लग रहा था की मैं तो जैसे किसी सम्मोहन की अवस्था में ही पहुँच गयी और गौर से पापा के लौड़े को ही देखे जा रही थी.
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यह सीन मेरे लिए भी इतना कामुक था की मुझे भी पता ही नहीं लगा की कब मेरा अपना हाथ मेरी पैंटी में घुस गया और नंगी चूत (क्योंकि अब पैंटी तो उतर चुकी थी और चूत तो नंगी ही थी ) को सहलाने लगा.
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अपने आप मेरी दो उँगलियाँ मेरी चूत में घुस गयी और मैंने भी बाहर सड़क पर खड़े खड़े ही अपनी चूत को रगड़ना शुरू कर दिया.

मैं पापा के लौड़े को देखने में इतनी मगन थी की मैं तो भूल ही गयी थी कि अभी हम लोग चलती सड़क पर खड़े हैं और किसी भी टाइम कोई भी आ सकता है,
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कोई आ जाये तो क्या देखेगा कि एक अधेड़ सा आदमी गाड़ी की ड्राइवर सीट पर बेठा सरेआम मुठ मार रहा है और एक कच्छी को चाट रहा है और एक नौजवान लड़की कार के बाहर खड़ी उसे मुठ मारते हुए देख रही है, और अपनी दो उँगलियों से अपनी चूत को अंदर बाहर करती हुई रगड़ रही है,

खैर वो तो हमारी किस्मत ही अच्छी थी कि कोई आया नहीं,

मुठे मारते और पैंटी चाटते पापा साथ ही बड़बड़ा रहे थे
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"ओह मेरी प्यारी बेटी सुमन ! तेरी चूत की सुगंध कितनी मनमोहक है और तुम्हारी चूत का यह रस भी कितना स्वादिष्ठ है, मजा आ गया। कितना खुशकिस्मत होगा वो जो तुम्हारी चूत पर सीधे अपने मुंह को रख कर तुम्हारा चुतरस पियेगा। हे भगवान क्या मेरी किस्मत में सिर्फ मेरी बेटी की पैंटी चाटना ही लिखा है, मुझे अपनी बेटी की चूत चाटने का आशीर्वाद दे दो। कितना शुभ दिन होगा जब मैं अपनी बेटी की चूत को चाट चाट कर उसका रस पियूँगा। "

यह कहते हुए पापा तेज तेज मुठ मार रहे थे.

में पापा को मुठ मारते देखने में इतनी मस्त हो गयी थी कि मेरे को इतना भी ध्यान नहीं रहा कि मैं बाहर सड़क पर खड़ी हूँ और अचानक से कोई वाहन भी आ सकता है,
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हम दोनों बाप बेटी अपना अपना मुठ मारने में मस्त थे.

अचानक पापा का शरीर जोर से अकड़ गया और पापा की मुठ मारने की स्पीड बिजली की तरह तेज हो गयी,

पापा का काम तमाम होने वाला था. इधर अपने आप मेरी भी उँगलियों की स्पीड बढ़ गयी.

एक जोर की आह की आवाज के साथ पापा का माल निकल गया.
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पापा वीर्य छूटने से एकदम हड़बड़ा गए. उन्हें कुछ नहीं सूझा की वो पिचकारी मार रहे अपने लौड़े को क्या करें.

अनजाने में पापा ने अपने दुसरे हाथ में पकड़ी मेरी पैंटी को तुरंत अपने लौड़े पर रख लिए और सारा माल मेरी पैंटी में निकाल दिया.

इधर ज्यों ही मैंने देखा की मेरी पैंटी में पापा ने माल भर दिया है तो मेरा भी पानी छूट गया. और मेरा भी पूरा हाथ मेरे चूत के पानी से गीला हो गया.
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शुक्र तो यह था की मैंने पैंटी तो पहनी नहीं थी. तो मेरी चूत का अमृत मेरी टांगो से बहता हुआ मेरे पैरों के ओर चला गया.

मैंने अपनी टांगों पर हाथ फेर कर अपने चुतरस टांगों पर ही मल लिया.

इधर अब पापा का भी वीर्य निकलना बंद हो चूका था.
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पापा के हाथ में मेरी पैंटी पापा के माल के तर बर तर हो चुकी थी.
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मैं डर गयी की अब पापा पीछे मुड कर मुझे देखेंगे।

तो मैंने थोड़ा पीछे जा कर कुछ आवाज करी जिस से पापा को लगे कि मैं आ रही हूँ.

पापा ने मेरी आवाज सुनी तो उन्हें एकदम मेरा ध्यान आया.

उनके हाथ में मेरी पैंटी थी जो अब उनके वीर्य से भरी हुई थी,
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घबराहट में उन्हें कुछ नहीं सूझा की उसका क्या करें, तो उन्होंने उसे फटाफट अपनी सीट के नीचे छुपा लिया।

इतने में मैं भी कार के पास आ गयी और दरवाजा खोल कर अंदर घुस गयी,

मैंने बिलकुल भी ऐसा शो नहीं होने दिया की मैंने पापा का मुठ मरने का देख लिया है,

जबकि मेरा खुद का भी इतना पानी निकल गया था की मेरे शरीर से जैसे सारी ताकत ही निकल गयी थी,

पर मेरी शैतानी ख़तम कैसे हो सकती थी,

मैंने पापा से गाड़ी चलाने और घर को चलने को कहा।

फिर मैंने शरारत से पूछा

"पापा मेरी पैंटी दिखाई नहीं दे रही. वो जो मेरी गीली पैंटी थी वो कहाँ है,"

पापा बेचारे एकदम से हड़बड़ा गए , वो क्या बोलते कि बेटी तुम्हारी पैंटी में तो मैंने मुठ मारा है और इस समय वो मेरे माल से लथपथ सीट के नीचे पड़ी है,

वो हड़बड़ाए से बोले "अरे वो गीली हो गयी थी, और उस में से तुम्हारे पेशाब की गंध आ रही थी तो मैंने उसे खिड़की से बाहर फेंक दिया. छोड़ो उसे मैं तुम्हे नयी पैंटी ले दूंगा। "

मैं पापा की हड़बड़ाहट और फंस जाने का घबराहट का आनंद लेते हुए बोली

"अरे पापा , तो क्या हुआ, जरा सा पेशाब ही तो लगा था. मैं उसे घर जा कर धो लूंगी, जरा रुकिए मैं उसे उठा लेती हूँ। "

मन ही मन मुस्कुराते और पापा की हालत पे मन में हँसते हुए मैंने खिड़की खोलने का उपक्रम किया। मुझे खिड़की खोलते देख कर पापा घबरा उठे. क्योंकि वो तो जानते थे कि मेरी पैंटी कहीं बाहर तो फेंकी नहीं है, वो तो उनके माल में लथपथ पड़ी है,

मैं पापा की हालत पर मन में हँसते हुए मजे ले रही थी,

पापा ने फटाफट गाड़ी स्टार्ट कर दी और बोले

"अरे सुमन छोडो. तुम भी क्या पुरानी कच्छी के पीछे ही पड गयी हो, मैंने कहा न की मैं तुम्हे नयी और इस से कहीं बढ़िया दिला दूंगा. तो अब चुपचाप बैठी रहो."

और इस डर से की कहीं मैं गाड़ी से उतर न जाऊ पापा ने तुरंत गाड़ी चालू कर दी और आगे बढ़ा दी,

मैंने भी पापा की और खिंचाई न करते हुए, चुप रहना ही बेहतर समझा.

पर फिर भी मैंने पापा को और तंग करने की सोची और बोली.

"पापा यह गाड़ी में से एक अजीब सी लेकिन बहुत ही बढ़िया सी खुशबू कैसी आ रही है, क्या आप ने कोई इत्र छिड़का है या कोई सेंट लगाया है,"

असल में गाड़ी में पापा के वीर्य की खुशबू फैली हुई थी,

मैं तो अपनी शैतानी कर रही थी , पर बेचारे पापा घबरा गए वो क्या बोलते कि यह तो उनके लण्ड रस की खुशबू है,

पापा को कुछ नहीं सूझा तो बोले

"अरे कहाँ कोई खुशबू नहीं है, हाँ अभी तुम कार के अंदर आयी तो यह एक सुगंध आने लगी है, शायद तुम्हारी गंध हो."

यह कह कर पापा ने बात को टालना चाहा, पर मैं इतनी जल्दी अपनी शैतानी थोड़े ही ख़तम करने वाली थी,

मैंने फिर बात को खींचा और कहा

"पापा मैं तो बस पेशाब करके ही आयी हूँ. मैंने तो कोई सुगंध नहीं लगाई है,"

पापा को अचानक बात को टालने का ढंग सूझ गया और वो बोले

"सुमन बेटी , तो यह शायद तुम्हारे ही पेशाब की गंध है, तुमने इस टाइम पैंटी नहीं पहनी हुई है तो तुम्हारे पेशाब की सुगंध ही आ रही है,"

मैंने फिर इस बात में भी मौका ढूंढते हुए बात को आग बढ़ाया और कहा

"पापा ठीक है कि इस समय मैंने कच्छी नहीं पहनी है पर यह जो सुगंध है वो पेशाब की नहीं है. आप कोई बात छुपा तो नहीं रहे हैं."

पापा फिर बोले (बेचारे किसी तरह अपनी वीर्य से भरी मेरी पैंटी की बात को टालना जो चाह रहे थे.)

"अरे सुमन ! यह तुम्हारे पेशाब की ही गंध है, चाहे तो चेक कर लो"

अब यह तो मेरी शैतानी के लिए एक सुनहरा मौका था.

मैंने तुरंत अपना हाथ अपनी स्कर्ट के अंदर अपनी चूत पर फेरा और अपनी चूत की दरार में उसे फेरा. मेरी चूत को कामरस से भरी पड़ी थी, तो मेरी ऊँगली मेरी चूत के रस से गीली हो गयी.
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मैंने अपना हाथ स्कर्ट से बाहर निकाला और पापा की ओर करके कहा
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"पापा देखो मेरे पेशाब का यह गंध नहीं है."

मेरी ऊँगली मेरे कामरस से चमक रही थी,

पापा ने मेरा हाथ पकड़ कर अपने मुंह के पास किया और मेरी गीली उँगलियों को सूंघते हुए बोले

"सुमन! यह तुम्हारी उँगलियों से शहद जैसी सुगंध क्यों आ रही है,"

और यह कहते हुए पापा मेरी चूत के माल को सूंघते रहे.
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यह एक बहुत ही कामुक दृश्य था. मेरी तो चूत में जैसे फिर से पानी की भाड़ ही आ गयी,

मैं बात को टालते हुए बोली

"पापा आप बात को टालो मत. मेरे हाथ से शहद की गंध कैसे आ सकती है देखो मैं फिर से दिखती हूँ."

यह कह कर मैंने फिर से अपना हाथ अपनी स्कर्ट के अंदर करके अपनी दो उँगलियाँ अपनी चूत में डाल ली और, उन्हें अच्छे से अपने पानी से गीला कर लिया और फिर उन्हें बाहर निकल कर पापा के आगे करके कहा

"पापा देखो ऐसा कुछ भी नहीं है,"

पापा को मेरा चुतरस उँगलियों पर चमकता दिखाई दे रहा था.

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर अपने मुंह के पास किया और अचानक से मेरी दोनों गीली उँगलियाँ अपने मुंह में डाल ली और उन्हें चूसना शुरू कर दिया।

और मेरी चुतरस को मेरे सामने ही चाटते हुए बोले

"सुमन! तुम बहुत शरारती हो, तुमने जरूर अपनी टांगो के बीच कोई शहद की शीशी छुपा रखी है, देखो तो तुम्हारी उँगलियों पर कितना मीठा मीठा रस लगा है, मैंने इतना मीठा और स्वादिष्ठ रस कभी नहीं चखा। "

यह कहते हुए पापा ने मेरी दोनों उँगलियों को ऐसे चूसना शुरू कर दिया कि जैसे बच्चे कोई कुल्फी चूसते हैं.

यह देख कर कि मेरे सामने ही मेरे पापा मेरी चूत का पानी चाट रहे है, मैं तो वासना से अंधी ही हो गयी.

मेरा मन कर रहा था थी बस तुरंत पापा का मोटा सा लौड़ा उनकी लुंगी से बाहर निकाल लूँ और चूसना शुरू कर दूँ.

पर मैं यह नहीं कर सकती थी, आखिर हम लोग चलती सड़क पर खड़े थे.

आखिर हम दोनों बाप बेटी कोई बच्चे तो थे नहीं कि हमे शहद और चुतरस में कोई फर्क न कर सकें.
हम दोनों ही जानते थे की यह चुतरस है उन की बेटी का, और मैं भी जान भुज कर अपने पापा को अपनी चूत का रस चटवा रही थी. बहुत ही कामुक दृश्य था यह.

मेरी चूत इतनी गीली हो चुकी थी की मेरी चूत के पानी ने पूरी सीट गीली कर दी थी,

मैंने पापा के मुंह से अपनी उँगलियाँ खींच कर बाहर निकाली और कहा

"पापा कोई शहद वहद नहीं है, आप शरारत न करो और गाडी चलाओ। हमें देर हो रही है, और सड़क पर कोई आ सकता है,"

पापा भी जैसे किसी प्यारे से सपने से जागे और गाड़ी घर की ओर बढ़ा दी,
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घर पहुँच कर मैं तुरंत दौड़ कर बाथरूम में चली गयी क्योंकि मेरी चूत में पेशाब की बाढ़ आयी हुई थी,

वहां मैंने पेशाब करने के बाद अपनी चूत में उँगलियाँ डाल कर फिर से पानी निकला.

फिर बाहर आ कर घर के काम में लग गयी।
Just tooo hot. Mazaa aa gaya beti ki sharert ka.
 

Ting ting

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