अध्याय १४
हवन कुंड की अग्नि प्रज्वलित थी,
पर साधु के चेहरे पर चिंताएं की रेखाएं साफ साफ झलक रही थी। मंत्र उच्चारण के बावजूद साधु का मन अशांत था। साधु की आँखे बंद थी और वो दृढ़ निश्चय के साथ हवन कुंड में आहुति दे रहा था। उसे रह रह कर पिशाच की बढ़ती हुई ताकत का अंदाजा था। तभी उसके कानों में एक आवाज़ गुंजी जिसे सुन साधु विचलित हो उठा और एक एक उसकी आँखें खुल गई।
आवाज: तू मेरा अब कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मैं हर पल अपनी शक्तियां प्राप्त कर रहा हूं। तेरे गुरु ने भी मुझे धोखे से ही क़ैद किया था। पर अब मैं पहले से भी ज्यादा शक्तिशाली और ताकतवर हो गया हूं। मेरी २०० साल की तपस्या अब रंग लाएगी। जो साधना करनी है कर ले। हां हां हां
और वो आवाज़ ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी।
साधु को विचलित देख उसके शिष्य भी परेशान होने लगे।
शिष्य: क्या हुआ गुरुजी, आप बहुत विचलित नज़र आ रहे है।
साधु: शिष्य पिशाच की शक्तियां बढ़ती जा रही है। हमें तो ऐसा लग रहा हैं कि अब उसे रोक पाना हमारे बस में नहीं।
शिष्य: तो अब हम क्या करेंगे गुरुजी।
साधु: हार तो नहीं मानेंगे, और ईश्वर से घोर प्रार्थना करेंगे कि वो औरत शीघ्र ही उस पिशाच की जिंदगी में आये और उसके क्रोध को शांत करे। आखिर हुआ तो उसके साथ भी गलत था।
शिष्य: क्या हुआ था गुरुजी।
साधु: बहुत लंबी और दर्दभरी कहानी है, किसी दिन विस्तार से सुनायेंगे। अभी के लिए हमें थोड़ा ध्यान लगाना है और कोई हल ढूंढना है उस पिशाच को रोकने का।
ये बोलके साधु ने हवन कुंड के समक्ष अपने हाथ जोड़े और देखते देखते हवन कुंड की अग्नि शांत पड़ गयी।
सुधा अपने कमरे में लौट आई थी। उसकी आँखों के समक्ष अभी भी उस घमासान चुदाई के दृश्य आँखो के सामने घूम रहे थे।
वो चुदाई जो करीब एक घंटे से ज्यादा चली थी और उस औरत को कितना मजा आ रहा था चुदवाने में। वो बार बार और तेज़ धक्के मारने को कह रही।
वो उस आदमी को मालिक कह कर संबोधन कर रही थी।सुधा की खुद की चूत तीन बार पानी छोड़ चुकी थी ऐसी चुदाई देख कर। वो मन ही मन सोच रही थी कि आखिर वो औरत कौन थी। लड़का तो लल्लू ही था क्योंकि उसके इलावा इस घर में कोई और मर्द हैं नहीं और इतना बड़ा लंड किसी और का हो नहीं सकता।
पर वो औरत कौन थी क्योंकि कमला और रत्ना दोनों साथ में थे और सो रहे थे। माया देवी भी अपने कमरे में थी और ऊषा तो तीन चार दिन से लापता है। वरना वो रॉड तो एक मिनट गंवाए बिना अपनी टांगे खोल देती। आखिर औरत थी कौन? इसी उलझन को सुलझाने में लगी सुधा लल्लू का इंतजार करने लगती है।
इधर तबेले में वो औरत अभी अभी लल्लू का भूत पीकर उठी थी। लल्लू ने तुरंत उस औरत को अपने बहुपाश में ले लिया। वो औरत एक बेल की तरह लल्लू की छाती पर गिर गई।
औरत: आह मालिक, अभी मन नहीं भरा क्या।
लल्लू: हाय मेरी जान तू चीज ही ऐसी है कि मन भरता नहीं।
औरत: मेरा भी वही हाल हैं मालिक, जब से आपने चोदा है, तब से ये निगोडी चूत हर दम आपका लंड मांगती हैं।
लल्लू: बस कुछ दिन की बात और है फिर तुम सब को इस घर में नंगी ही रखूँगा। फिर खुले में तेरी चूत मारूंगा दौड़ा दौड़ा के। कल वैसे भी कमला की चीखें इस घर में गूंजेंगी।
औरत : और रत्ना और सुधा का क्या होगा।
लल्लू: सही समय पर सबका उद्धार होगा।
औरत: और अपनी बेटियों को कब बुलाऊ आपके लंच से उद्धार के लिए।
जी हाँ औरत और कोई नहीं माया देवी थी। सुधा को क्या पता कि लल्लू के अंदर एक पिशाच वास कर चुका है जिसके मायाजाल को कोई नहीं समझ सकता।
लल्लू: जब कहूंगा तब।
माया: अब चले मालिक, घोड़ी बने बने कमर दुख गई है।
लल्लू का मन तो नहीं था वो माया को अभी और पेलना चाहता था पर सुधा का ख्याल आते ही उसने इस विचार को त्याग दिया। उसने आँखो से माया देवी को चलने की सहमति दिखाई। माया देवी उठी और अपने कपड़े उठाने लगी परन्तु पिशाच के दिमाग में कुछ और था। उसने तुरंत ही माया देवी के हाथ से कपड़े छीन लिए, तो माया देवी ने प्रश्न भरी निगाहों से लल्लू की तरफ देखा।
लल्लू: ऐसे ही नंगी चल अपने कमरे तक।
माया देवी: और कोई उठ गया और ऐसे मुझे देख लिया तो।
लालू: देख लिया तो उसको पता चल जाएगा कि तू अपने मालिक की रांड है।
इतना सुनते ही माया देवी अपनी गांड मटकाती हुई चलने लगी। उसकी गांड की थिरकन देख कर पिशाच का मन किया कि अभी पटक कर चोद दे, पर मौके की नज़ाकत सोचते हुए उसने इस विचार को त्याग दिया। थोड़ी देर में माया देवी अपने दरवाजे के बाहर खड़ी थी। माया देवी पलट गई और लल्लू की आंखों में देखने लगी। लल्लू ने भी महसूस किया माया देवी की आंखों में बिछड़ने का दुख है, तुरंत लल्लू ने माया देवी को अपनी बाहों में कस लिया और अपने होठों को माया देवी के होठों से जोड़ दिये। माया देवी भी पूरे संसार की शक्ति समेट कर पिशाच का साथ देने लगी। इस चुंबन में इतनी कशिश थी जैसे दो जिस्म एक जान। सुधा का ख्याल आते ही लल्लू ने तुरंत इस चुंबन को तोड़ा। माया देवी कुछ समझ पाती तब तक लल्लू मुड़ चुका था। माया देवी ने तुरंत अपने कपड़े उठाये, उनके चेहरे पे असीम संतुष्टि के भाव थे और होठों पर एक क़ातिल मुस्कान थी।
सुधा अपनी ही उलझनों में कब नींद की आग़ोश में चली गई, उसे पता भी नहीं पड़ा। लल्लू ने जब कमरे में कदम रखा तो सामने के दृश्य बड़ा ही मनमोहक था। सुधा का पेटीकोट उसकी जांघों तक उठा हुआ था और उसकी विशाल चुचिया हर साँस के साथ उठ बैठ रही थी। सुधा की साड़ी वही फर्श पड़ी हुई थी और साड़ी के बीच में पड़ी सुधा की पेटी जो उसके मदनरस से लबालब भरी पड़ी थी। लल्लू ने तुरंत ही उस पेटी को उठाया और अपनी नाक से उस मदनरस को सूंघने लगा।
लल्लू: आह क्या खुशबू हैं तेरी चूत की मेरी लुगाई। जब तेरे बिल में अपना सांप डालूंगा तब कितना मजा आएगा। पूरी चूत भर दूंगा अपने माल से मैं, फिर नौ महीने बाद तू मेरे बच्चे जनेंगी, फिर तेरे इन सुंदर चुचियो में से दूध की धारा बहेगी जो मैं सारी निचोड़ लूंगा, अपने बच्चों को भी नहीं पीने दूंगा। इन पर सिर्फ मेरा हक होगा।
लल्लू तुरंत ही सुधा के करीब बैठ गया और उसके मासूम चेहरे को देखने लग गया। उसने अपने हाथों से सुधा के चेहरे पर आए बालों को हटाने लगा। लल्लू की आंखों में पहली बार प्यार था वासना नहीं। उसके मन में एक ही बात आ रही थी "कितनी खूबसूरत हैं मेरी लुगाई"। लल्लू बिल्कुल सुधा के करीब लेट गया, अब उसे सुधा के गरम साँसे महसूस हो रही थी। सुधा की आंखों के नीचे लकीर बनी हुई थी जिससे पता चलता है कि वो खूब रोई है। लल्लू उर्फ पिशाच के मन में पहली बार ग्लानि सी हुई। पिशाच ये बात जनता था कि उसे अपने अभियान या प्रतिशोध के लिए ये सब करना पड़ेगा, अन्यथा अगर वो सुधा के मोहजाल में फंस के रह गया तो वो कभी भी अपना प्रतिशोध नहीं ले पाएगा। इस पूरे संसार में सुधा ही है जो उसके वेग को संभाल सकती है, और उसके मोह में केवल प्रेम हैं, वासना नहीं। सुधा दिल ओ जान से लल्लू को अपना सबकुछ मान चुकी थी। पर कहते हैं न जिसके सिर इश्क़ सवार हो वो कहां ज़माने की सोचता है। यही हाल पिशाच का भी था वो चाहकर भी खुद को रोक नहीं पा रहा था।
पिशाच सुधा के ऊपर झुकता चला जा रहा था। सुधा और लल्लू उर्फ पिशाच के अधरों में केवल हवा गुजरने जितना फासला बचा था। पिशाच का अंतर्मन उसे रोक भी रहा था पर सुधा के प्रेम की पवित्रता के आगे उसने घुटने टेक दिए। पिशाच उर्फ लल्लू ने सुधा के निचले अधर को अपनी गिरफ्त में ले लिया और उसका रसपान करने लगा। सुधा एक दम से चौंक गई, उसका जिस्म एक दम से सर्द हो गया और उसने अपनी आँखें खोल दी। सामने लल्लू को देख उसने राहत की सांस ली और अपने जिस्म को ढीला छोड़ दिया। सुधा लल्लू के इस हमले से एक दम मोम की तरह पिघलती चली गई, और खुद लल्लू का साथ देने लगी। लल्लू के अधर की तपिश में सुधा का सारा गुस्सा जल गया। वो दोनों बस एक दूसरे में समा जाने को आतुर प्रेमी युगल की तरह एक दूसरे के अधरों का रसपान किये जा रहे थे। प्रेम था ये कोई वासना नहीं। दोनों को ये भी नहीं ध्यान था कि सांसलेन की भी जरूरत पड़ती है। सुधा और लल्लू दोनों इस कदर खोये हुए थे एक दूसरे में जैसे वक़्त यही थम गया हो, और आज रात के बाद सुबह होगी ही नहीं। कभी दोनों एक दूसरे के अधरों को चूसते या कभी दोनों की जीभ ना जीतने वाली जंग लड़ती। पर प्रेम का अंत तो चरमसुख ही होता है, वही हाल लल्लू उर्फ पिशाच का भी था, उसके हाथ अब सुधा की विशाल गुंबदों का मर्दन करने लगे। असीम संतुष्टि के भाव सुधा के चेहरे पर थे जब भी लल्लू का दबाव उसकी चुचियो पर महसूस होता। सुधा जोर जोर से चिल्लाना चाहती थी और अपनी मादक सिसकियां सबको सुनाना चाहती थी पर अफसोस अगर वो ऐसा करती तो अधरों की जंग में हार जाती, जो सुधा को कतई नामंजूर था। वो तो अपने स्वामी अपने पति परमेश्वर को बताना चाहती थी कि वो उनसे किसी भी मामले में कम नहीं है। कमरे की गर्मी इतनी बढ़ चुकी थी के दोनों पंखे के नीचे भी पसीने में लत पथ थे। लल्लू उर्फ पिशाच के हाथ हर कोण से सुधा के अभिमानी चुचियो का मर्दन कर रहे। हर दबाव के साथ उनका अभिमान ध्वस्त कर रहे थे। तापमान इतना बढ़ गया थी जो थोड़े बहुत कपड़े दोनों के जिस्म पर थे वो भी बोझ लगने लगे थे। तभी एक आवाज ने पूरे वातावरण के सन्नाटे को चीर दिया।
चररररररररररररररररररररररर
इस आवाज के साथ ही दोनों के अधरों का मिलन टूट गया। सुधा ने जब नीचे देखा तो पाया लल्लू ने एक झटके में उसके ब्लाउज और ब्रा को चीर के रख दिया, अब उसका वेषकीमती खजाना उसके पति की आंखों के सामने थे। उसका खजाना अब बेपर्दा हो चुका था। लल्लू उन खूबसूरत गुंबदों का दीदार में खोया हुआ था कि तभी सुधा ने लल्लू के सिर को पकड़ कर अपने खजाने को लूटने का निमंत्रण दे दिया, जिसे पिशाच उर्फ लल्लू ने उस खजाने को चूम कर निमंत्रण स्वीकार किया। लल्लू कभी उन साँचे सी गुंबदों को कभी चुसता, कभी काटता, कभी अपनी जीभ से उसके निप्पलो को कुरेदता। पूरे वातावरण में सिर्फ सुधा की सिसकियां ही गूंज रही थी।
सुधा: आह ......ऊ .....ओह, ऐसे ही बहुत तड़पी हूं तुम्हारे बिना.... आह ओ अब छोड़ के मत जाना। आह ओह
सुधा को अपने अंदर एक उबाल सा उमड़त हुआ महसूस हो रहा था। उसने अपनी दोनों टांगे आपस में जोड़ ली जिससे उसकी पानी से लबालब मुनिया को और मजा मिलने लगा। उसे हर समय ऐसा लगता जैसे उसकी जान उसकी चूत से होकर ही निकलने वाली है। लल्लूं के हर वार के साथ सुधा की चूत आनंद के सागर की नई नई गहराइयों तक पहुंच रही थी। वो क्षण भी आ गया जिसके लिए हर स्त्री अभिसार करती है।
सुधा: आह ..... लल्लू... ओह मैं गई।
सुधा के मदनरस ने उसके जिस्म का साथ छोड़ दिया अब वो उसकी चूत से बहता हुआ बिस्तर को गीला करने लगा। मौहल में सिर्फ इस समय सुधा की धौंकनी सी चलती हुई साँसों के सिवा कुछ और सुनाई नहीं दे रहा था। सुधा अपनी साँसे दुरुस्त करने में लगी थी। जब वो थोड़ी होश में आई तो उसने लल्लू की तरफ पलट कर देखा तो पाया लल्लू करवट करके उसकी तरफ पीठ करके सो चुका था। सुधा सोच में पड़ गई अगर लल्लू चाहता तो आज सारी हदे पार करके उसे अपनी बना सकता था और मैं मना भी नहीं करती। आज लल्लू उसके जिस्म के हर कोने पे अपनी मोहर लगा सकता था। सुधा को एहसास हुआ कि अभी भी उसका फटा ब्लाउज और ब्रा उसके जिस्म पे अभी भी है। सुधा ने तुरंत उन्हें अपने जिस्म से अलग कर दिया। सुधा की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ये लड़का उससे चाहता क्या हैं और कौन थी वो औरत और कैसे लल्लू के स्पर्श मात्र से ही उसका गुस्सा शांत हो गया और कैसे सिर्फ़ उसकी चुचियो का मर्दन करके उसके पति ने उसे चरमसुख प्रदान करा। इतने सवाल पर जवाब कोई नहीं। उसके माथे पर बल पड़ने लगे। सुधा को पता था कि उसके सारे जवाबो का एक ही उत्तर है " लल्लू"।