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Adultery रति मार्गदर्शिका

Chutiyadr

Well-Known Member
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बहुत दिन हो गए कोई स्टोरी नही लिखा था सोचा कि ai से कुछ लिखा जाए लेकिन प्रयास करते करते 1साल से ज्यादा गुजर गया ,मनचाहा परिणाम नही मिल रहा था ,अब भी नही मिल रहा है लेकिन कामचलाऊ जरूर है,इतना आलसी हो चुका हु की खुद तो नही लिख पता ai ही सही
तो पेश है मेरी नई स्टोरी जिसे मैंने ai के माध्यम से लिख रहा हु,मैं कोशिश करूंगा कि साथ में उसका प्रॉम्प्ट भी देता चालू जो मैंने ai को दिया है ,पहले लगता था ai से लिखना आसान है लेकिन सच बताऊँ तो उतना भी आसान नही है,दूसरा खुद जो लिखो उसकी क्वालिटी ही अलग होती है फिर भी दुखी मन से ही सही ये पोस्ट करने का निश्चय किया है
आशा है आप लोगो को पसंद आएगा


नोट = कुछ दोस्तों ने सलाह दिया की प्रॉम्प्ट मत डालो मजा खराब हो जाता है इसलिए प्रॉम्प्ट डिलीट कर दिया हु ai से कैसे लिखना है इसके लिए नया पोस्ट बना दूंगा जो उत्सुक हो मेसेज कर दे
 
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Chutiyadr

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अध्याय 1

नगर के पश्चिमी द्वार से थोड़ा आगे, यमुना के किनारे बसा वह वेश्यालय उस समय की सबसे अधिक चर्चित संस्था था। नाम था – ‘कामसुन्दरी-निकेतन’।
बाहर से देखने में वह एक विशाल, स्तम्भयुक्त भवन था, जिसके प्रवेशद्वार पर दो विशालकाय कदम्ब-वृक्ष खड़े थे और उनके नीचे घंटियाँ लटक रही थीं, जो हवा के झोंके से मन्द-मन्द बज उठतीं। परन्तु भीतर प्रवेश करते ही वह संसार बदल जाता था – एक ऐसा संसार जिसमें सुगन्ध, संगीत, मन्द प्रकाश और मानवीय शरीरों की उष्णता एक साथ साँस लेते थे।

मैं, सत्ताईसवें वर्ष में प्रवेश कर चुका एक साधारण कुल का युवक,नाम चारुदत्त, उस रात्रि प्रथम बार उस द्वार से भीतर गया।
पैरों के नीचे संगमरमर ठण्डा था, किन्तु हृदय की धड़कनें इतनी तीव्र थीं कि मुझे लगा जैसे रक्त की धारा ही गर्म होकर शरीर के भीतर भटक रही हो।

प्रथम कक्ष में प्रवेश करते ही दृष्टि ठहर गई।
वह वहाँ नहीं थी।
परन्तु उसकी उपस्थिति का आभास चारों ओर था।
वायु में चन्दन, कस्तूरी और केतकी की मिश्रित सुगन्ध।
दीवारों पर चित्रित रति-दृश्य – कुछ इतने सूक्ष्म कि देखने वाले की श्वास रुक जाती, कुछ इतने साहसिक कि लज्जा और उत्तेजना एक साथ जाग उठती।

तब एक दासी ने मुझे सूचित किया –
“आर्य, देवी चंद्रकला आपको अपनी अन्तःकक्षा में आमन्त्रित कर रही हैं।”

मैंने सिर हिलाया।
पैर स्वयं आगे बढ़ने लगे, मानो कोई अदृश्य सूत्र उन्हें खींच रहा हो।

चंद्रकला का कक्ष सबसे ऊपरी तल पर था।
सीढ़ियाँ चढ़ते समय मेरे कदम धीमे हो गए।
प्रत्येक सीढ़ी के साथ मेरे मन में एक प्रश्न उभरता गया – मैं यहाँ क्यों आया?
क्या केवल जिज्ञासा थी?
या वह अनाम आकर्षण जो कभी-कभार किसी स्त्री की एक झलक में ही जीवन-भर के लिए बंधन बना देता है?

द्वार पर पहुँचते ही एक परदा हटा।
और फिर मैंने उसे देखा।

चंद्रकला

वह एक रजत-रंग के आसन पर विराजमान थी।
उसके शरीर पर केवल एक सूक्ष्म रेशमी वस्त्र था – इतना पतला कि उसकी त्वचा की आभा उसमें से स्पष्ट झलक रही थी।
वक्ष पर मोतियों की एक लम्बी माला लटक रही थी, जो ठीक उसके स्तनों के मध्य से होकर नीचे जाती थी।
स्तन स्वयं उन्नत, गोलाकार और इतने सघन कि मानो प्रकृति ने उन्हें किसी विशेष उद्देश्य से ही इस प्रकार रचा हो।
कमर अत्यन्त पतली, फिर कूल्हे अचानक फैलते हुए एक पूर्ण वृत्त बनाते हुए।
उसकी बैठने की मुद्रा में भी एक संगीत था – कूल्हों की मन्द गति, जाँघों का हल्का स्पर्श, पैरों की उँगलियों का सूक्ष्म संकोच।

परन्तु सबसे अधिक प्रभावकारी थे उसके नेत्र।
गहरे, काले, लगभग अर्ध-बन्द।
जैसे वे देखते नहीं, बल्कि किसी की आत्मा को छूकर उसमें उतर जाते हों।

हमारी दृष्टि मिली।
एक क्षण।
दो क्षण।
फिर उसने धीमे से मुस्कुराते हुए कहा –

“आये हो, अजेय?”

मेरा नाम नहीं जानती थी, तथापि उसने मुझे ऐसा नाम दे दिया मानो वह सदियों से मेरी प्रतीक्षा कर रही हो।

मैं कुछ बोल नहीं पाया।
कण्ठ सूख गया था।

वह उठी।
चाल इतनी मन्द और तरल कि लगा जैसे कोई तरंग धीरे-धीरे किनारे की ओर बढ़ रही हो।
मेरे निकट आई।
इतने निकट कि उसकी श्वास मेरे गालों पर लगी।
चन्दन-कस्तूरी की सुगन्ध अब और प्रबल हो गई।

“तुम्हारी आँखें बहुत कुछ देखती हैं,” उसने कहा, स्वर में एक प्रकार की कोमलता और प्रभुत्व दोनों थे। “ऐसी आँखें जिस वस्तु को देखती हैं, उसे समझ भी लेती हैं। क्या यह सत्य है?”

मैंने कठिनाई से उत्तर दिया –
“मैं… प्रयत्न करता हूँ कि जो देखूँ, उसे केवल देखूँ नहीं, समझूँ भी।”

वह मुस्कुराई।
उस मुस्कान में विजय थी।

“तुम्हें देखकर यही लगा था।
इसलिए मैंने तुम्हें बुलाया।
मैं तुमसे प्रेम करने लगी हूँ, अजेय।
परन्तु मेरे प्रेम की एक शर्त है।”

मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा।

“मैं तुम्हारी पत्नी बनना चाहती हूँ।
किन्तु पहले तुम्हें एक महान् कार्य करना होगा।
तुम एक ऐसा ग्रन्थ लिखोगे जो संसार को रति-क्रीड़ा का सत्य, शास्त्रीय और कलात्मक ज्ञान दे।
न केवल शारीरिक संयोग का, अपितु उसमें निहित भाव, ऊर्जा, समर्पण और मुक्ति का भी।
तुम्हारी अवलोकन-शक्ति इसका सबसे बड़ा आधार बनेगी।
क्या तुम यह वचन देते हो?”

मेरा हृदय इतनी तेजी से धड़क रहा था कि मुझे लगा कहीं यह बाहर सुनाई न दे जाए।

“यदि मैं यह कार्य करूँगा, तो क्या तुम मेरी पत्नी बनोगी?”

“हाँ,” उसने कहा, और फिर मेरे होंठों के निकट आकर फुसफुसाई, “और उस दिन से तुम मेरे साथ इसी निकेतन में पति-पत्नी के रूप में रहोगे।
परन्तु पहले एक वर्ष तक तुम्हें यहाँ रहकर प्रत्येक प्रकार की रति-क्रीड़ा को सूक्ष्मता से देखना, समझना और लिखना होगा।
क्या तुम तैयार हो?”

मैंने उसकी आँखों में देखा।
उनमें प्रेम भी था, चुनौती भी, और एक गहन रहस्य भी।

“हाँ,” मैंने कहा।
“मैं वचन देता हूँ।”

तब उसने मेरे गाल पर हल्के से स्पर्श किया।
उँगलियाँ ठण्डी थीं, किन्तु स्पर्श में अग्नि थी।

फिर उसने मुझे अपने आसन की ओर ले जाया।
हम दोनों बैठ गए।
वह मेरे सामने, मैं उसके।
हमारे घुटने एक-दूसरे को छू रहे थे।

धीरे-धीरे उसने अपना वस्त्र सरकाया।
रेशम फिसलता हुआ नीचे गिरा।
उसका शरीर पूर्णतः मेरे समक्ष था।

स्तन उन्नत, गुलाबी ग्रन्थियों से सजे।
नाभि गहरी, एक छोटे से कुण्ड की भाँति।
कूल्हे विस्तृत, गोल, जैसे किसी मूर्तिकार ने उन्हें महीनों तक तराशा हो।
जाँघें मोटी, सघन, और उनके मध्य में वह गहन, रहस्यमयी त्रिकोण जिसे देखते ही मेरी श्वास रुक गई।

वह मेरे निकट आई।
मेरे वस्त्र भी धीरे-धीरे उतारे गए।
मेरा लिंग पहले से ही उत्तेजित था – कठोर, नसों से उभरा हुआ, शीर्ष पर एक बूँद मोती-सी चमक रही थी।

हमने एक-दूसरे को स्पर्श किया।
कोई शीघ्रता नहीं।
कोई जल्दबाजी नहीं।

उसने मेरे लिंग को हाथ में लिया।
हल्के से दबाया, फिर ऊपर-नीचे किया।
मैंने उसके स्तनों को दोनों हाथों से थामा।
अँगूठों से ग्रन्थियों को सहलाया।
वह सिसकारी।
एक मधुर, गहरी सिसकारी।

फिर वह पीठ के बल लेट गई।
मैं उसके ऊपर।
हमारी दृष्टि फिर मिली।

“धीरे,” उसने कहा। “यह केवल संभोग नहीं है। यह प्रथम पाठ है। प्रत्येक स्पर्श को समझो। प्रत्येक कम्पन को अनुभव करो।”

मैंने धीरे से अपना लिंग उसके योनि-द्वार पर रखा।
वह पहले से ही गीली थी।
गर्म।
स्वागत करने को तत्पर।

मैंने धकेला।
धीरे।
बहुत धीरे।

शीर्ष अन्दर गया।
फिर कुछ और।
फिर पूरा।

हम दोनों ने एक साथ श्वास छोड़ी।

वहाँ कोई तीव्रता नहीं थी।
कोई हिंसा नहीं।
केवल एक गहन, मन्द गति।

मैं अन्दर-बाहर होता रहा।
प्रत्येक आवागमन के साथ मैं उसके शरीर के भीतर की बनावट को महसूस करता रहा –
उसकी योनि की दीवारों का संकोच,
उसका गर्म, तरल आलिंगन,
उसके कूल्हों का मेरे जाँघों पर दबाव,
उसके स्तनों का मेरी छाती से रगड़ना।

वह मेरी पीठ पर नाखून फिराती रही।
हल्के-हल्के।
कभी मेरी गर्दन को चूमती, कभी कान में फुसफुसाती –

“इसे महसूस करो… यह केवल शरीर का मिलन नहीं… यह दो आत्माओं का एक क्षण भर का समर्पण है… इसे लिखना… इसे समझना…”

मैंने उसकी बात सुनी।
और देखा।
और महसूस किया।

जब हम दोनों चरम पर पहुँचे, तब भी कोई शोर नहीं हुआ।
केवल एक लम्बी, गहरी, एक साथ निकली हुई श्वास।
मेरा वीर्य उसके भीतर उमड़ा।
वह काँपी।
उसकी योनि ने मुझे और कसकर पकड़ा।
हम दोनों एक-दूसरे में विलीन हो गए – कुछ क्षणों के लिए।

फिर हम अलग हुए।
परन्तु वह दूरी केवल शारीरिक थी।
मन में, आत्मा में, हम पहले से कहीं अधिक निकट आ चुके थे।

वह मेरी ओर मुड़ी।
उसकी आँखों में सन्तुष्टि थी।
और एक गहन प्रतिज्ञा।

“अब तुम मेरे हो,” उसने कहा। “और मैं तुम्हारी।
कल से तुम्हारा एक वर्ष का महान् कार्य प्रारम्भ होगा।
तैयार रहो, अजेय।
यह निकेतन अब तुम्हारा विद्यालय भी होगा, और तुम्हारा घर भी।”

मैंने उसका हाथ पकड़ा।
उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में फँस गईं।

और उस रात्रि, मैंने जाना –
प्रेम केवल मिलन नहीं होता।
वह एक दर्शन भी होता है।
एक शास्त्र भी।
और सबसे बढ़कर – एक अनन्त यात्रा।


जिसकी प्रथम सीढ़ी मैं अभी-अभी चढ़ा था।
 
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hgupta112285

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Bhai kamla nam pasand nhi aaya nam change karo kamla nam kaam bakiyo ka hota hai
 
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