hotbuddy raja
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Wah kya baat hi kamukta charmpar haiअगली सुबह जब सूरज की पहली किरणें खिड़की के पर्दों को चीरते हुए कमरे में आईं, तो ममता की आँखें खुलीं।
वह बिस्तर पर लेटी रही, उसकी देह में अब भी रात की उस उत्तेजक बातचीत की सिहरन बाकी थी।
जैसे ही उसने अपनी आँखें मूँदीं, उसे ऋषभ के वे शब्द याद आने लगे— "आपकी चूत का पानी बहुत टेस्टी है माँ।"
यह सोचते ही ममता के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। उसने अनजाने में अपनी जाँघों को आपस में रगड़ा और महसूस किया कि उसकी चूत पहले से ही गीली हो चुकी थी।
रात भर की उस गंदी और कामुक चैट ने उसके भीतर की दबी हुई इच्छाओं को जगा दिया था। वह उठी, फ्रेश हुई, लेकिन नहाते समय भी जब पानी उसकी जाँघों से नीचे उतर रहा था, तो उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे ऋषभ की उँगलियाँ उसकी चूत के अंदर गहराई तक जा रही हों।
ममता जब किचन में पहुँची, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक और शर्म थी। उसने गैस जलाई और चाय का पानी रखा, लेकिन उसका मन कहीं और था।
वह बार-बार अपने फोन की तरफ देख रही थी, यह सोचकर कि ऋषभ क्या सोच रहा होगा। वह याद करने लगी कि कैसे उसने रात को शर्माते हुए स्वीकार किया था कि उसे ऋषभ का अपनी चूत को चाटना पसंद आया था।
'हे भगवान, मैं यह क्या कर रही हूँ? मैं एक माँ हूँ और मैं अपने बेटे के साथ ऐसी बातें कर रही हूँ... मैं कितनी बेशर्म होती जा रही हूँ,' उसने मन ही मन सोचा।
लेकिन इस सोच के साथ ही उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई और उसकी चूत से रस की एक और बूंद टपकी, जिसने उसकी साड़ी के भीगे हुए हिस्से को और चिपचिपा बना दिया।
वह अपनी इस कामुकता पर खुद हैरान थी, पर उसे यह अहसास बहुत सुखद लग रहा था।
तभी अचानक पीछे से रीना आई और उसने ममता के कंधे पर हाथ रखा। ममता झटके से चौंक गई, मानो वह किसी बड़े अपराध में पकड़ी गई हो।
"क्या बात है भाभी? आज सुबह-सुबह बहुत मुस्कुरा रही हो! कोई खास बात है क्या?" रीना ने शरारत भरे लहजे में पूछा।
ममता थोड़ा घबरा गई, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उसने जल्दी से अपना चेहरा सामान्य करने की कोशिश की और हकलाते हुए बोली, "अ... अरे नहीं रीना, बस कुछ पुरानी बातें याद आ गई थीं, इसलिए।"
रीना ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "अरे भाभी, मुझे भी बताओ ना! ऐसी कौन सी बात है जिसने आपको इतना खुश कर दिया? आप तो एकदम ब्लश कर रही हैं।"
ममता ने अपनी नज़रें चुराईं और जल्दी से बर्तनों की तरफ मुड़ गई ताकि रीना उसके लाल चेहरे को और न देखे।
"अरे कुछ नहीं रीना, तू बेकार में बातें बना रही है। तू यह बता कि आज नाश्ते में क्या बनाऊँ? कुछ अच्छा सा सोच।"
रीना मुस्कुराई और बोली, "भाभी, जो आपको पसंद हो वही बना लीजिए। वैसे मेरा मन है कि आज कुछ चटपटा हो... क्यों न आज पनीर पकौड़े बना दें? सबको पसंद भी आएंगे और मौसम भी अच्छा है।"
ममता ने सहमति में सिर हिलाया, "हाँ, ठीक है। पनीर पकौड़े ही बनाते हैं।"
अब दोनों किचन में जुट गईं। ममता पनीर काट रही थी और रीना बेसन का घोल तैयार कर रही थी। काम करते-करते भी ममता का ध्यान बार-बार ऋषभ की तरफ जा रहा था।
वह सोच रही थी कि जब ऋषभ नाश्ते की टेबल पर आएगा, तो वह उसकी आँखों में क्या देखेगी।
क्या वह उसे वही इशारा करेगा जो उसने रात को चैट में किया था? यह सोचकर ही ममता की सांसें तेज हो गईं और उसने चुपके से अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी गीली चूत को सहलाया।
तभी सीढ़ियों से उतरने की आवाज़ आई। राजेश और ऋषभ जाग चुके थे और नाश्ते के लिए टेबल की तरफ आ रहे थे।
राजेश अपनी usual धीमी चाल से आ रहा था, जबकि ऋषभ की चाल में एक अलग ही आत्मविश्वास और मर्दानगी थी।
उसकी सफेद टी-शर्ट उसके चौड़े कंधों पर कसी हुई थी, जिससे उसकी मज़बूत बॉडी साफ़ झलक रही थी।
जैसे ही ऋषभ टेबल पर बैठा, उसकी नज़र सीधे ममता पर पड़ी। ममता ने जब उसकी आँखों में देखा, तो उसे महसूस हुआ कि ऋषभ की नज़रों में वही भूख है जो रात को उसके मैसेज में थी।
ऋषभ ने एक पल के लिए अपनी नज़रें ममता की कमर और उसके कूल्हों की तरफ घुमाईं और फिर एक हल्की सी, रहस्यमयी मुस्कान दी।
ममता का शरीर काँप गया। उसने जल्दी से प्लेट में पकौड़े परोसने शुरू किए। राजेश ने प्यार से कहा, "ममता, आज खुश लग रही हो, क्या बात है?"
ममता ने झेंपते हुए जवाब दिया, "बस जी, आज मन अच्छा है।"
सबने नाश्ता करना शुरू किया। टेबल पर हंसी-मज़ाक चल रहा था।
राजेश और रीना अपनी पुरानी बातों में मशगूल थे, लेकिन ममता और ऋषभ के बीच एक खामोश, कामुक युद्ध चल रहा था।
जब ममता ऋषभ को पानी का गिलास देने के लिए झुकी, तो ऋषभ ने जानबूझकर अपना पैर ममता की जाँघ से सटा दिया।
ममता के मुँह से एक हल्की सी आह निकलने ही वाली थी कि उसने खुद को संभाल लिया।
वह अंदर से पूरी तरह पिघल रही थी। उसकी चूत अब पूरी तरह से रस से तरबतर हो चुकी थी और उसे महसूस हो रहा था कि वह बस अभी इसी वक्त ऋषभ की गोद में गिर जाए।
तभी रीना ने बातचीत का रुख बदला और पूछा, "भाभी, आज पट्टी का क्या प्रोग्राम है? चोट अभी भी है, उसे साफ़ करवाना और नई पट्टी बंधवाना ज़रूरी है।"
यह सुनते ही ममता का दिल ज़ोर से धड़का। उसे याद आया कि उसकी चोट की देखभाल ऋषभ और ज्योति कर रहे हैं।
वह थोड़ी असहज हो गई क्योंकि उसे पता था कि जब ऋषभ उसकी पट्टी करेगा, तो वह फिर से उसके शरीर को छुएगा, और इस बार वह खुद को रोक नहीं पाएगी।
ऋषभ ने सहजता से जवाब दिया, "मैं लंच ब्रेक में घर आ जाऊँगा। फिर हम दोनों साथ चलेंगे और ज्योति के क्लिनिक पर उसकी पट्टी करवा दूँगा। ज्योति मेरी अच्छी दोस्त है, वह बहुत सावधानी से कर देगी।"
राजेश ने कहा, "हाँ, यह सही रहेगा। ऋषभ, तुम लंच में आ जाओ, हम सब साथ में खाना खाएंगे।"
ऋषभ ने सिर हिलाया और तुरंत अपना फोन निकाला। उसने अपने असिस्टेंट राजू को फोन लगाया।
"हेलो राजू, सुनो। आज लंच टाइम के आसपास थोड़ा गैप रखना। पेशेंट्स की अपॉइंटमेंट थोड़ी कम लेना या उन्हें थोड़ा एडजस्ट करना, क्योंकि मुझे एक ज़रूरी काम से घर जाना है और फिर बाहर जाना होगा।"
राजू ने जवाब दिया, "जी डॉक्टर साहब, मैं देख लेता हूँ। ओके सर।"
फोन रखने के बाद ऋषभ ने फिर से ममता की तरफ देखा।
ऋषभ की नज़रें सीधे ममता की तरफ गईं। ममता ने अपनी नज़रें उठाईं और ऋषभ की आँखों में वह भूखापन देखा, जिसने उसकी रूह तक को कँपा दिया।
ऋषभ की आँखों में एक साफ़ चुनौती थी
—एक ऐसी भूख जो केवल ममता के शरीर से शांत हो सकती थी।
ममता, जो अभी भी उस स्पर्श की गर्मी महसूस कर रही थी, घबरा गई और तुरंत अपना सिर झुका लिया। उसकी चेहरे पर आई लालिमा और उसकी झुकी हुई पलकें यह बता रही थीं कि वह अंदर से कितनी टूट चुकी है और कितनी उत्तेजित है।
तभी रीना, जो अपनी बातों में मशगूल थी, बीच में बोली, "भैया, कल का अपॉइंटमेंट ले लें आपका डॉक्टर से? अब काफी समय हो गया है और आपकी सेहत का मामला है, देरी नहीं करनी चाहिए।"
राजेश थोड़ा हिचकिचाए। उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी थी। अपनी नपुंसकता और गिरते स्वास्थ्य ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया था।
उन्हें डर था कि डॉक्टर शायद उन्हें कोई ऐसी खबर दे दे जिसे वे स्वीकार न कर पाएं। उन्होंने धीरे से कहा, "हाँ... शायद लेना चाहिए, लेकिन क्या अभी ज़रूरत है?"
ऋषभ ने तुरंत बात संभाली। उसने अपनी आवाज़ में एक दृढ़ता लाते हुए कहा, "हाँ, अपॉइंटमेंट बुक कर लो रीना।
नहीं तो फिर डॉक्टर कहीं बाहर चले गए तो हमें और इंतज़ार करना पड़ेगा।" बोलते-बोलते ऋषभ ने एक बार फिर तिरछी नज़र से ममता की तरफ देखा।
उसकी नज़रें ममता के होंठों से होते हुए उसकी छाती की उभार पर टिकी थीं, जो उसकी तेज़ सांसों के कारण ऊपर-नीचे हो रही थीं।
ममता, जो अब तक चुप थी, ने धीरे से अपना सिर उठाया और ऋषभ की बात का समर्थन करते हुए बोली, "सही तो है... सेहत के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। ऋषभ के पापा को कल जाना ही चाहिए।"
ममता की आवाज़ में एक हल्की सी थरथराहट थी। वह जानती थी कि वह अपने पति की सेहत की बात नहीं कर रही, बल्कि वह उस आज़ादी की बात कर रही है जिसका रास्ता यह अपॉइंटमेंट खोल सकता था।
राजेश ने लंबी सांस ली और सहमति जताते हुए कहा, "ठीक है, बुक कर लो। लेकिन... हम चलेंगे कैसे? मेरी तबीयत ऐसी नहीं कि मैं लंबी यात्रा कर सकूँ और रीना के पति भी तो अपने काम में व्यस्त होंगे।"
रीना ने तुरंत जवाब दिया, "भैया, आप चिंता मत कीजिए। मैं अपने हसबैंड को बोलती हूँ, वह कल सुबह की फ्लाइट बुक कर देंगे। हम साथ चलेंगे और आराम से डॉक्टर के पास पहुँच जाएंगे।"
जैसे ही रीना ने 'सुबह की फ्लाइट' और 'सबके साथ जाने' की बात कही, ऋषभ के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गई। उसने मौका ताड़ लिया। उसने बड़े प्यार से कहा, "कोई बात नहीं, मैं बुआ और पापा को कल सुबह एयरपोर्ट छोड़ दूँगा।"
यह वाक्य सुनते ही ममता के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। 'एयरपोर्ट छोड़ना'—इसका मतलब था कि कल सुबह रीना और राजेश घर से चले जाएंगे अपने इलाज के लिए , और सबसे बड़ी बात, रीना भी उनके साथ होगी जाएगी ।
ऋषभ का यह प्रस्ताव वास्तव में एक योजना थी। वह जानता था कि जब वह उन्हें एयरपोर्ट छोड़ेगा,
उसके बाद जो बवाल होगा उसको भगवान ही जानते हैं ।
लेकिन इस बात ने ममता के अंदर एक अलग ही हलचल मचा दी। जैसे ही ऋषभ ने 'एयरपोर्ट' शब्द कहा, ममता की चूत ने जैसे एक ज़ोरदार झटका महसूस किया और अचानक रस का एक फव्वारा छूटा।
उसे महसूस हुआ कि उसकी चूत से निकलने वाला गर्म पानी उसकी साड़ी के कपड़े को और ज़्यादा भिगो रहा है। वह इतनी उत्तेजित हो गई कि उसकी जाँघें अपने आप आपस में रगड़ने लगीं। उसे ऐसा लगा जैसे ऋषभ का वह सख्त लंड उसकी कल्पना में उसके अंदर धंस गया हो।
ममता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक दबी हुई आह ली। उसे डर था कि कहीं उसकी यह उत्तेजना सबके सामने न आ जाए। वह सोच रही थी, 'हे भगवान, मैं कितनी गिर चुकी हूँ।
मेरा पति अपनी बीमारी से जूझ रहा है, मेरी ननद हमारे साथ है, और मैं अपने बेटे के साथ बिस्तर साझा करने के सपने देख रही हूँ। लेकिन... लेकिन मेरा शरीर अब इस तड़प को और नहीं सह सकता। मुझे ऋषभ का वह लंड चाहिए, मुझे उसकी वह जंगली भूख चाहिए।'
राजेश, जो इस पूरी कामुकता से अनजान थे, ने राहत की सांस ली और कहा, "ठीक है रीना, फिर कल चलते हैं। ऋषभ, शुक्रिया बेटा कि तुम हमें छोड़ दोगे।"
ऋषभ ने मुस्कुराते हुए कहा, "पापा, इसमें शुक्रिया कैसा? यह तो मेरा फर्ज़ है।"
लेकिन ऋषभ का 'फर्ज़' कुछ और ही था। उसकी नज़रें अब भी ममता के चेहरे पर थीं। वह देख सकता था कि उसकी माँ इस वक्त किस मानसिक और शारीरिक स्थिति से गुज़र रही है।
वह समझ गया था कि ममता की चूत इस वक्त पानी-पानी हो चुकी है। उसे ममता की वह बेचैनी, वह शर्म और वह तड़प साफ़ नज़र आ रही थी
Mamla lagbhag me haiलंच का समय हो चुका था। ऋषभ ने अपने क्लिनिक से निकला और अपनी कार की ओर बढ़ा। उसके दिमाग में अभी भी उन दस मरीजों के साथ किए गए कामुक प्रयोगों की यादें ताज़ा थीं,
लेकिन अब उसकी भूख किसी मरीज के लिए नहीं, बल्कि अपनी माँ की उस 'प्यास' के लिए थी जिसका उसने मैसेज में जिक्र किया था। वह तेज़ी से कार चलाकर घर पहुँचा।
जैसे ही उसने डोरबेल बजाई, दरवाज़ा खुला। सामने ममता खड़ी थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और चेहरे पर वह शर्म जो उसे और भी कामुक बना रही थी।
ऋषभ ने उसकी आँखों में गहराई से देखा और एक शरारती मुस्कुराहट के साथ अंदर दाखिल हुआ। उसने जानबूझकर ममता के कंधे को हल्का सा छुआ, जिससे ममता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।
राजेश पहले से ही लंच टेबल पर बैठ चुके थे। ममता और रीना ने मिलकर टेबल पर गरमा-गरम खाना लगाया था। दाल, चावल, सब्ज़ी और रोटियों की खुशबू पूरे कमरे में फैली थी,
लेकिन ऋषभ की नाक केवल ममता के शरीर से आने वाली उस भीनी खुशबू को महसूस कर रही थी, जो उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रही थी।
ऋषभ टेबल पर बैठा और उसने जानबूझकर ममता के ठीक बगल वाली कुर्सी चुनी।
दोनों के कंधे एक-दूसरे से सट रहे थे। जैसे ही सबने खाना शुरू किया, ऋषभ ने टेबल के नीचे अपना दायाँ पैर धीरे से ममता की जाँघ पर रखा।
ममता अचानक चौंक गई। उसने एक पल के लिए ऋषभ की ओर देखा, लेकिन ऋषभ बड़े आराम से अपनी रोटी चबा रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो।
ममता ने अपना पैर हटाने की कोशिश की, लेकिन ऋषभ ने अपने पैर को और ऊपर सरकाया और अपनी उँगलियों से ममता की जाँघ के अंदरूनी हिस्से को सहलाने लगा।
ममता की साँसें अटक गईं। उसे याद आया कि सुबह ऋषभ ने उसे क्या मैसेज भेजा था—"आपकी चूत की प्यास मिटने वाली है।" अब जब ऋषभ का पैर उसकी जाँघों के बीच उस संवेदनशील जगह की ओर बढ़ रहा था,
तो ममता की चूत में फिर से रस का प्रवाह शुरू हो गया। वह घबराहट में राजेश की ओर देखने लगी कि कहीं उन्हें शक न हो जाए, लेकिन राजेश अपनी बातों में मगन थे।
तभी रीना ने बातचीत शुरू की, "भैया, कल की टिकट फाइनल हो गई है। हमें सुबह चार बजे एयरपोर्ट के लिए निकलना होगा।"
राजेश ने सिर हिलाते हुए कहा, "ठीक है, समय तो सही है।"
रीना ने ऋषभ की ओर देखते हुए कहा, "ऋषभ, हमें तुम सुबह चार बजे छोड़ देना। टैक्सी का झंझट नहीं रहेगा और हम समय पर पहुँच जाएंगे।"
ममता, जो ऋषभ के पैर की शरारतों से पूरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी और जिसकी चूत अब गीली होकर उसकी साड़ी में चिपक रही थी, उसने धीरे से कहा, "मैं भी आऊँगी एयरपोर्ट ड्रॉप करने।"
राजेश ने हैरानी से ममता की ओर देखा और बोले, "जी, क्यों सुबह-सुबह तुम परेशान होगी? इतनी जल्दी उठना मुश्किल होगा, तुम आराम करना।"
ऋषभ ने इस मौके का फायदा उठाया। उसने टेबल के नीचे अपना पैर अब ममता की चूत के बिल्कुल करीब ले जाकर उसे हल्का सा दबाया। ममता के मुँह से एक दबी हुई आह निकलने ही वाली थी कि ऋषभ ने बात संभाल ली।
ऋषभ मुस्कुराते हुए बोला, "अगर माँ आना चाहती हैं तो आने देना पापा। सब साथ चलेंगे। वैसे भी, सुबह की ताजी हवा अच्छी होती है और हम सब साथ में समय बिता पाएंगे।"
ऋषभ की आवाज़ में एक गहरा अर्थ था।
ममता ने ऋषभ की ओर देखा। उसकी आँखों में अब शर्म के साथ-साथ एक तीव्र इच्छा थी। वह समझ गई थी कि ऋषभ उसे संकेत दे रहा है।
ऋषभ ने एक बार फिर अपने पैर से उसकी चूत के उभार को सहलाया, जिससे ममता की कमर अपने आप झुक गई और उसने अपनी जाँघों को कस लिया।
रीना और राजेश को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके सामने बैठे इस माँ-बेटे के बीच वासना का एक ऐसा खेल चल रहा है,
जो कल सुबह की यात्रा को और भी रोमांचक और वर्जित बनाने वाला था। लंच खत्म हुआ, लेकिन ऋषभ और ममता के मन में भूख और बढ़ गई थी—एक ऐसी भूख जिसे केवल एक-दूसरे का शरीर ही शांत कर सकता था।
Man gye guruलंच का समय हो चुका था। ऋषभ ने अपने क्लिनिक से निकला और अपनी कार की ओर बढ़ा। उसके दिमाग में अभी भी उन दस मरीजों के साथ किए गए कामुक प्रयोगों की यादें ताज़ा थीं,
लेकिन अब उसकी भूख किसी मरीज के लिए नहीं, बल्कि अपनी माँ की उस 'प्यास' के लिए थी जिसका उसने मैसेज में जिक्र किया था। वह तेज़ी से कार चलाकर घर पहुँचा।
जैसे ही उसने डोरबेल बजाई, दरवाज़ा खुला। सामने ममता खड़ी थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और चेहरे पर वह शर्म जो उसे और भी कामुक बना रही थी।
ऋषभ ने उसकी आँखों में गहराई से देखा और एक शरारती मुस्कुराहट के साथ अंदर दाखिल हुआ। उसने जानबूझकर ममता के कंधे को हल्का सा छुआ, जिससे ममता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।
राजेश पहले से ही लंच टेबल पर बैठ चुके थे। ममता और रीना ने मिलकर टेबल पर गरमा-गरम खाना लगाया था। दाल, चावल, सब्ज़ी और रोटियों की खुशबू पूरे कमरे में फैली थी,
लेकिन ऋषभ की नाक केवल ममता के शरीर से आने वाली उस भीनी खुशबू को महसूस कर रही थी, जो उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रही थी।
ऋषभ टेबल पर बैठा और उसने जानबूझकर ममता के ठीक बगल वाली कुर्सी चुनी।
दोनों के कंधे एक-दूसरे से सट रहे थे। जैसे ही सबने खाना शुरू किया, ऋषभ ने टेबल के नीचे अपना दायाँ पैर धीरे से ममता की जाँघ पर रखा।
ममता अचानक चौंक गई। उसने एक पल के लिए ऋषभ की ओर देखा, लेकिन ऋषभ बड़े आराम से अपनी रोटी चबा रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो।
ममता ने अपना पैर हटाने की कोशिश की, लेकिन ऋषभ ने अपने पैर को और ऊपर सरकाया और अपनी उँगलियों से ममता की जाँघ के अंदरूनी हिस्से को सहलाने लगा।
ममता की साँसें अटक गईं। उसे याद आया कि सुबह ऋषभ ने उसे क्या मैसेज भेजा था—"आपकी चूत की प्यास मिटने वाली है।" अब जब ऋषभ का पैर उसकी जाँघों के बीच उस संवेदनशील जगह की ओर बढ़ रहा था,
तो ममता की चूत में फिर से रस का प्रवाह शुरू हो गया। वह घबराहट में राजेश की ओर देखने लगी कि कहीं उन्हें शक न हो जाए, लेकिन राजेश अपनी बातों में मगन थे।
तभी रीना ने बातचीत शुरू की, "भैया, कल की टिकट फाइनल हो गई है। हमें सुबह चार बजे एयरपोर्ट के लिए निकलना होगा।"
राजेश ने सिर हिलाते हुए कहा, "ठीक है, समय तो सही है।"
रीना ने ऋषभ की ओर देखते हुए कहा, "ऋषभ, हमें तुम सुबह चार बजे छोड़ देना। टैक्सी का झंझट नहीं रहेगा और हम समय पर पहुँच जाएंगे।"
ममता, जो ऋषभ के पैर की शरारतों से पूरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी और जिसकी चूत अब गीली होकर उसकी साड़ी में चिपक रही थी, उसने धीरे से कहा, "मैं भी आऊँगी एयरपोर्ट ड्रॉप करने।"
राजेश ने हैरानी से ममता की ओर देखा और बोले, "जी, क्यों सुबह-सुबह तुम परेशान होगी? इतनी जल्दी उठना मुश्किल होगा, तुम आराम करना।"
ऋषभ ने इस मौके का फायदा उठाया। उसने टेबल के नीचे अपना पैर अब ममता की चूत के बिल्कुल करीब ले जाकर उसे हल्का सा दबाया। ममता के मुँह से एक दबी हुई आह निकलने ही वाली थी कि ऋषभ ने बात संभाल ली।
ऋषभ मुस्कुराते हुए बोला, "अगर माँ आना चाहती हैं तो आने देना पापा। सब साथ चलेंगे। वैसे भी, सुबह की ताजी हवा अच्छी होती है और हम सब साथ में समय बिता पाएंगे।"
ऋषभ की आवाज़ में एक गहरा अर्थ था।
ममता ने ऋषभ की ओर देखा। उसकी आँखों में अब शर्म के साथ-साथ एक तीव्र इच्छा थी। वह समझ गई थी कि ऋषभ उसे संकेत दे रहा है।
ऋषभ ने एक बार फिर अपने पैर से उसकी चूत के उभार को सहलाया, जिससे ममता की कमर अपने आप झुक गई और उसने अपनी जाँघों को कस लिया।
रीना और राजेश को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके सामने बैठे इस माँ-बेटे के बीच वासना का एक ऐसा खेल चल रहा है,
जो कल सुबह की यात्रा को और भी रोमांचक और वर्जित बनाने वाला था। लंच खत्म हुआ, लेकिन ऋषभ और ममता के मन में भूख और बढ़ गई थी—एक ऐसी भूख जिसे केवल एक-दूसरे का शरीर ही शांत कर सकता था।
Man gye guruलंच का समय हो चुका था। ऋषभ ने अपने क्लिनिक से निकला और अपनी कार की ओर बढ़ा। उसके दिमाग में अभी भी उन दस मरीजों के साथ किए गए कामुक प्रयोगों की यादें ताज़ा थीं,
लेकिन अब उसकी भूख किसी मरीज के लिए नहीं, बल्कि अपनी माँ की उस 'प्यास' के लिए थी जिसका उसने मैसेज में जिक्र किया था। वह तेज़ी से कार चलाकर घर पहुँचा।
जैसे ही उसने डोरबेल बजाई, दरवाज़ा खुला। सामने ममता खड़ी थी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और चेहरे पर वह शर्म जो उसे और भी कामुक बना रही थी।
ऋषभ ने उसकी आँखों में गहराई से देखा और एक शरारती मुस्कुराहट के साथ अंदर दाखिल हुआ। उसने जानबूझकर ममता के कंधे को हल्का सा छुआ, जिससे ममता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।
राजेश पहले से ही लंच टेबल पर बैठ चुके थे। ममता और रीना ने मिलकर टेबल पर गरमा-गरम खाना लगाया था। दाल, चावल, सब्ज़ी और रोटियों की खुशबू पूरे कमरे में फैली थी,
लेकिन ऋषभ की नाक केवल ममता के शरीर से आने वाली उस भीनी खुशबू को महसूस कर रही थी, जो उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रही थी।
ऋषभ टेबल पर बैठा और उसने जानबूझकर ममता के ठीक बगल वाली कुर्सी चुनी।
दोनों के कंधे एक-दूसरे से सट रहे थे। जैसे ही सबने खाना शुरू किया, ऋषभ ने टेबल के नीचे अपना दायाँ पैर धीरे से ममता की जाँघ पर रखा।
ममता अचानक चौंक गई। उसने एक पल के लिए ऋषभ की ओर देखा, लेकिन ऋषभ बड़े आराम से अपनी रोटी चबा रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो।
ममता ने अपना पैर हटाने की कोशिश की, लेकिन ऋषभ ने अपने पैर को और ऊपर सरकाया और अपनी उँगलियों से ममता की जाँघ के अंदरूनी हिस्से को सहलाने लगा।
ममता की साँसें अटक गईं। उसे याद आया कि सुबह ऋषभ ने उसे क्या मैसेज भेजा था—"आपकी चूत की प्यास मिटने वाली है।" अब जब ऋषभ का पैर उसकी जाँघों के बीच उस संवेदनशील जगह की ओर बढ़ रहा था,
तो ममता की चूत में फिर से रस का प्रवाह शुरू हो गया। वह घबराहट में राजेश की ओर देखने लगी कि कहीं उन्हें शक न हो जाए, लेकिन राजेश अपनी बातों में मगन थे।
तभी रीना ने बातचीत शुरू की, "भैया, कल की टिकट फाइनल हो गई है। हमें सुबह चार बजे एयरपोर्ट के लिए निकलना होगा।"
राजेश ने सिर हिलाते हुए कहा, "ठीक है, समय तो सही है।"
रीना ने ऋषभ की ओर देखते हुए कहा, "ऋषभ, हमें तुम सुबह चार बजे छोड़ देना। टैक्सी का झंझट नहीं रहेगा और हम समय पर पहुँच जाएंगे।"
ममता, जो ऋषभ के पैर की शरारतों से पूरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी और जिसकी चूत अब गीली होकर उसकी साड़ी में चिपक रही थी, उसने धीरे से कहा, "मैं भी आऊँगी एयरपोर्ट ड्रॉप करने।"
राजेश ने हैरानी से ममता की ओर देखा और बोले, "जी, क्यों सुबह-सुबह तुम परेशान होगी? इतनी जल्दी उठना मुश्किल होगा, तुम आराम करना।"
ऋषभ ने इस मौके का फायदा उठाया। उसने टेबल के नीचे अपना पैर अब ममता की चूत के बिल्कुल करीब ले जाकर उसे हल्का सा दबाया। ममता के मुँह से एक दबी हुई आह निकलने ही वाली थी कि ऋषभ ने बात संभाल ली।
ऋषभ मुस्कुराते हुए बोला, "अगर माँ आना चाहती हैं तो आने देना पापा। सब साथ चलेंगे। वैसे भी, सुबह की ताजी हवा अच्छी होती है और हम सब साथ में समय बिता पाएंगे।"
ऋषभ की आवाज़ में एक गहरा अर्थ था।
ममता ने ऋषभ की ओर देखा। उसकी आँखों में अब शर्म के साथ-साथ एक तीव्र इच्छा थी। वह समझ गई थी कि ऋषभ उसे संकेत दे रहा है।
ऋषभ ने एक बार फिर अपने पैर से उसकी चूत के उभार को सहलाया, जिससे ममता की कमर अपने आप झुक गई और उसने अपनी जाँघों को कस लिया।
रीना और राजेश को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके सामने बैठे इस माँ-बेटे के बीच वासना का एक ऐसा खेल चल रहा है,
जो कल सुबह की यात्रा को और भी रोमांचक और वर्जित बनाने वाला था। लंच खत्म हुआ, लेकिन ऋषभ और ममता के मन में भूख और बढ़ गई थी—एक ऐसी भूख जिसे केवल एक-दूसरे का शरीर ही शांत कर सकता था।