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Update 36
टैक्सी आकर ठीक घर के सामने रुकी। मैं नीचे उतरा और घूमकर माँ की तरफ का दरवाजा खोला। माँ जैसे ही बाहर आई, मैंने सारा सामान नीचे उतारा और ड्राइवर को किराया देकर विदा किया। माँ उत्सुकता से घर के आस-पास का माहौल देख रही थी।
मैं दो सूटकेस खींचते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ा। तभी माँ ने तीसरा सूटकेस उठाने की कोशिश की। मैंने उन्हें प्यार से मना किया और पास जाकर एक हाथ से सूटकेस खींचते हुए, दूसरे हाथ से बड़ी सहजता के साथ उनका हाथ थाम लिया। मैंने धीरे से कहा— "चलो..."
माँ ने बस एक प्यारी सी मुस्कुराहट दी और शर्माकर अपनी पलकें झुका लीं। मैं उनका हाथ पकड़े हुए दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा। हम दोनों ही खामोश थे, पर जब भी हमारी नज़रें मिलतीं, वो मुस्कुराहटें हमारे प्यार की गवाही दे देती थीं। माँ जब चल रही थी, तो उनके पायलों की मीठी झंकार सन्नाटे को और भी खुशनुमा बना रही थी।
मैंने चाबी निकालकर दरवाजा खोला और फिर माँ की तरफ देखा। मैंने धीरे से कहा— "नई बहू के घर में कदम रखने से पहले, यहाँ उनका स्वागत करने के लिए कोई और तो नहीं है..."
इतना कहकर मैं थोड़ा ठहर गया। माँ मुझे देख रही थी और उनके होंठों पर एक मीठी सी हंसी खेल रही थी। उन्होंने मुड़कर खुद ही घर के अंदर कदम बढ़ाना चाहा, पर मैंने उन्हें रोक लिया।
"रुक जाइए..."
माँ ने पलटकर मेरी तरफ देखा। मैंने उनकी आँखों में आँखें डालकर जैसे उनके मन की गहराई को छूना चाहा, और फिर बिल्कुल पास जाकर फुसफुसाया— "कोई नहीं है तो क्या हुआ, मैं स्वागत करूँगा।"
माँ हैरानी भरी नज़रों से मुझे देखती रही और फिर मुस्कुराकर मेरे इस 'पागलपन' में शरीक हो गई। जब वह हंसी, तो उनके गुलाबी होंठों के पीछे से मोतियों जैसे चमकते दांत नज़र आए—वह उस पल बला की खूबसूरत लग रही थी।
मेरा दिल जैसे पिघलकर उनके कदमों में बिछ गया।
मैं फुर्ती से घर के अंदर गया और माँ के सामने आकर खड़ा हो गया। वह अब भी समझ नहीं पा रही थी कि आखिर मेरे दिमाग में चल क्या रहा है और मैं उनका स्वागत किस तरह करने वाला हूँ। मैं दौड़कर अंदर कमरे में गया, एक कलश को चावलों से लबालब भरा और उसे लाकर घर की दहलीज पर, ठीक उनके पैरों के पास रख दिया।
फिर, मैं अपना दायां घुटना ज़मीन पर टिकाकर वहीं दरवाजे के पास बैठ गया। मैंने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया और हथेली का पिछला हिस्सा फर्श पर रख दिया, जबकि बायां हाथ माँ की तरफ बढ़ा दिया। मेरी आँखों में बेपनाह मोहब्बत थी और चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान।
माँ अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में हैरानी और सरप्राइज लिए बस मुझे देखे जा रही थी। मैं खामोश था, पर मेरी खामोशी सब कुछ कह रही थी। तभी अचानक माँ की आँखें भर आईं।
उनके होंठों पर एक ऐसी मुस्कान खिली जो प्यार और अहसानमंदी से भरी थी। देखते ही देखते उनकी पलकें भीगने लगीं और होंठ धीरे से कांपने लगे। मैं समझ गया था कि उनके भीतर भावनाओं का कोई सैलाब उमड़ पड़ा है, जिसकी गवाही उनकी वो नम आँखें और कांपती हुई मुस्कुराहट दे रही थी।
मैंने बिल्कुल धीमी और बेहद प्यार भरी आवाज़ में कहा— "आओ।"
यह सुनते ही माँ ने अपना दाहिना हाथ उठाकर होंठों पर रख लिया। वह अपनी खुशी के आँसुओं को छिपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी, पर मेरी नज़रों से कुछ भी छिप नहीं पाया। मैंने एक गहरी और सुकून भरी मुस्कान के साथ माहौल को हल्का किया और फिर से दोहराया— "आओ।"
तभी माँ ने अपने दाएं पैर से उस कलश को धीरे से धकेला, जिससे उसमें भरे चावल जमीन पर बिखर गए। भारतीय संस्कृति में एक विवाहित स्त्री का प्रवेश इसी तरह होता है—माना जाता है कि उनके ये कदम ससुराल में खुशहाली लाते हैं और वह घर की 'लक्ष्मी' बनती है। माँ अब मेरी और मेरे घर की लक्ष्मी थी, मेरी पत्नी थी, तो उनका गृह-प्रवेश भी तो इसी गरिमा के साथ होना था।
उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाकर मेरा हाथ थाम लिया। जैसे ही मैंने उनकी उंगलियों को अपनी गिरफ्त में लिया, माँ ने अपना पैर आगे बढ़ाया और मेरी हथेली पर रख दिया।
उस पल मैंने मन ही मन कसम खाई—मैं अपनी ज़िंदगी में कभी उनके कदमों के नीचे कोई काँटा नहीं आने दूँगा। अपने प्यार से उनका हर रास्ता गुलाब की पंखुड़ियों जैसा बना दूँगा। इसी अटूट वादे के साथ मैंने उनका घर में स्वागत किया।
जैसे ही माँ घर के अंदर आई, मैं खड़ा हो गया और उनका हाथ छोड़ दिया। वह अब भी एक अद्भुत और गहरे प्यार भरी नज़रों से मुझे ही निहारे जा रही थी। उन्हें थोड़ा सहज महसूस करवाने के लिए मैंने मुस्कुराते हुए कहा—
"Welcome, Mrs. Manju Hitesh Patel!"
मेरे बोलने के इस अंदाज़ पर उनकी गीली आँखें एक प्यारी सी मुस्कान के साथ चमक उठीं और उन्होंने झेंपकर अपनी नज़रें झुका लीं। मैं बाहर गया, सारा लगेज अंदर लाया और दरवाज़ा बंद कर दिया। आज से यही माँ का घर था, उनका छोटा सा संसार। उनके पति का घर।
माँ बस खामोशी से खड़ी मुझे ये सब करते हुए देख रही थी। उनकी नज़रें घर के सामान पर नहीं, बल्कि मुझ पर टिकी थीं। शायद वह भी मेरी इन नई अदाओं को देखकर मुझे एक नए रूप में स्वीकार कर रही थी। मुझे इस तरह देख कर उनके चेहरे पर एक सुखद आश्चर्य था; यकीनन उनके मन के भीतर भी आनंद का एक तूफ़ान चल रहा होगा।
मैंने उनकी आँखों में आँखें डालकर एक धीमी मुस्कान दी और धीरे-धीरे उनके करीब बढ़ा। हमारी नज़रें एक-दूसरे से उलझी हुई थीं और हम दोनों ही इस नए अहसास की खुशी में डूबे जा रहे थे। जब मैं उनके बिल्कुल करीब पहुँचा, तो उनकी बड़ी-बड़ी आँखों में वही बेपनाह प्यार छलक रहा था।
मैंने अपनी सारी हिम्मत बटोरी और अपना हाथ बढ़ाकर उनके दोनों कंधे थाम लिए। फिर उन्हें हल्के से अपनी ओर खींचकर अपनी बाँहों में भर लिया। माँ ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उन्होंने भी खुद को पूरी तरह मुझ पर छोड़ दिया और कसकर मुझे पकड़ लिया। उन्होंने अपना सिर मेरी छाती पर टिका दिया और अपने दोनों हाथ मेरी पीठ पर लपेट लिए।
मैंने भी उन्हें अपनी बाहों के घेरे में मज़बूती से जकड़ लिया। हम दोनों ही एक-दूसरे के दिल की तेज़ धड़कनों को साफ़ महसूस कर पा रहे थे। कुछ देर हम यूँ ही खामोश, एक-दूसरे के आगोश में सिमटे रहे। जैसे-जैसे पल बीत रहे थे, हमारी साँसों की रफ़्तार तेज़ होने लगी।
मैंने झुककर, अपने होंठ उनके कान के पास ले जाकर धीमे से कहा— "I LOVE YOU।"
माँ मेरी बाँहों में जैसे पूरी तरह पिघल सी गई और बहुत हौले से फुसफुसाकर बोली— "I LOVE YOU TOO।"
Update 37
हम दोनों के जिस्मों के बीच की दूरियाँ अब मिट चुकी थीं। मैंने उन्हें अपनी बाहों के घेरे में इतनी शिद्दत से भींचा कि उनके जिस्म पे उभरे बूब्स की नरमी को अपनी छाती पर महसूस कर पा रहा था। उस छुअन के असर से मेरा लौड़ा एक बेलगाम घोड़े की तरह मचलने लगा—जैसे जींस के अंदर कोई आतिशबाज़ी हो रही हो। हमारी उंगलियाँ एक दूसरे की पीठ पर एक अनकही इबारत लिख रही थीं।
मैंने झुककर, उनके कानों के पास अपनी भारी होती आवाज़ में फुसफुसाया, "अब भी वक़्त नहीं आया क्या?"
माँ ने शरमाकर अपना चेहरा मेरी छाती में और गहराई से छुपा लिया। उनकी मद्धम सी आवाज़ आई, "कौन सा वक़्त?"
उनके बदन की गर्माहट मेरे रोम-रोम में उतर रही थी। मैंने उन्हें खुद में और समेटते हुए कहा, "तुम हमेशा हर बात पर कहती थी न—वक़्त आने दीजिये... तो क्या वो वक़्त अब भी दूर है?"
माँ ख़ामोश थी, पर उनकी वह ख़ामोशी हज़ारों शब्द कह रही थी। उन्होंने जवाब देने के बजाय मुझे और कसकर थाम लिया, मानो वह मुझमें ही कहीं विलीन हो जाना चाहती हो।
मैंने उनके अहसास को अपनी रूह तक महसूस करते हुए, प्यार और बेइंतहा जुनून के साथ फिर से पुकारा, "बोलो न मंजु..."
कुछ लम्हों तक वक्त जैसे ठहर सा गया। फिर उन्होंने हौसले जुटाए और अपना चेहरा मेरी छाती से थोड़ा अलग किया। मैं महसूस कर पा रहा था कि उनका पूरा वजूद एक अनजानी सिहरन से काँप रहा है। मेरे भीतर भी भावनाओं का एक तूफ़ान उमड़ रहा था, जिसने मेरे लौड़े को फूला कर एक दम बड़ा कर दिया और उसे गर्मी व उत्तेजना से भर दिया था।
माँ ने धीरे-धीरे अपनी गर्दन ऊपर उठाई। उनकी पलकें कसकर बंद थीं और साँसें तेज़, जैसे किसी कशमकश में हों। मैं बस एकटक उन्हें निहार रहा था—उनकी वह मासूमियत और वह समर्पण। मेरा शरीर अब जिस्म की गर्मी में तप रहा था। उन्होंने अपना चेहरा धीरे धीरे ऊपर करना शुरू किया, उनके गुलाबी होंठ थरथरा रहे थे।
उन होंठों पर हया और चाहत की एक अनोखी जंग साफ़ दिख रही थी। उन्होंने मेरे सवाल का लफ्ज़ों में कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि अपना चेहरा मेरी ओर ऊपर उठाकर खुद को पूरी तरह मुझे समर्पित कर दिया।
इस वक्त मेरा दिल किसी हथौड़े की तरह सीने की दीवारों पर चोट कर रहा था। नसों में दौड़ता पूरा खून जैसे मेरे लौड़े में ठहर कर जम गया हो, और उसे किसी लोहे की रोड से भी सख्त बना रहा हो। पूरी दुनिया बस उन थरथराते होंठों पर सिमट आई थी।
माँ अब पूरी तरह मेरे सामने सरेंडर कर चुकी थी। वह सिर्फ मेरी माँ नहीं, अब मेरी बीवी भी थी। मैंने अपना हाथ उनकी पीठ पर टिकाया और उन्हें धीरे से अपनी ओर खींचते हुए अपने होंठ उनके करीब ले जाने लगा। मैने अपने एक हाथ से उनके चेहरे को थाम लिया और अपने अंगूठे उसे उनके गालों से होते हुए उनके होंठो को छूने लगा। जैसे ही हमारे चेहरे एक-दूसरे के एकदम पास आए, हम एक-दूसरे की गर्म साँसों को एक दूसरे के चेहरों पर महसूस कर पा रहे थे।
मेरे अंदर एक अजीब सी घबराहट और बेचैनी थी, जिसने मुझे और आगे बढ़ने के लिए उकसाया। और फिर, मैंने अपने होंठ माँ के होठों पर रख दिए।
टच होते ही माँ का पूरा बदन एक झटके के साथ काँप उठा। मेरी बाहों में सिमटे उनके उस कोमल और हल्के शरीर की सिहरन मेरे सीने तक महसूस हो रही थी। मेरे भीतर भी एक तूफ़ान सा उठने लगा। मैंने बहुत आहिस्ता से अपना मुँह खोला और उनके होठों की नमी को चूसने लगा। जब मेरे होठों का गीलापन उनके होठों पे लगा, तो उन्होंने भी धीरे से अपना मुँह खोल दिया और मुझे रास्ता दिया।
अगले ही पल, हम एक-दूसरे के होठों को अपने होंठो के बीच दबाकर उन्हें बड़े प्यार से पीने लगे। यह अहसास वैसा ही था जैसे शहद की बनी किसी बेहद नाज़ुक चीज़ को होंठो से चूस कर स्वाद लिया जा रहा हो—इतनी सावधानी से कि उनका शेप और साइज़ न बिगड़ जाए, और इतनी शिद्दत से कि कोई भी कतरा छूट न जाए। हम बिल्कुल किसी न्यू लवर्स की तरह एक-दूसरे को चख और चूस कर अपना प्यार जाता रहे थे।
माँ के हाथ जो अब तक मेरी पीठ पर थे, धीरे-धीरे ऊपर सरककर मेरे कंधों पर जम गए। मैंने अपने लेफ्ट हाथ से उनकी पीठ को सहलाना शुरू किया और राइट हाथ से उनकी कमर को थामकर खुद को बैलेंस किया। जुनून बढ़ रहा था; मैंने अपना मुँह और खोलकर उनके पूरे होठों को अपनी गिरफ़्त में ले लिया और उन्हें चाटने लगा। मेरी जीभ जब उनके होठों से टकराई, तो उन्होंने भी कोई रेजिस्टेंस नहीं दिखाया, बल्कि वह और भी सहज होकर मेरा साथ देने लगी।
माँ जिस तरह मुझे "Kiss" कर रही थी, वह मेरी लाइफ के बेस्ट मोमेंट्स में से एक था। अक्सर लोग समझते हैं कि किस का मतलब सिर्फ होठों का मिलना, उन्हें चूसना या उन्हें दबाना होता है, पर आज समझ आया कि यह उससे कहीं बढ़कर है। मैंने सपनों में न जाने कितनी बार इसे इमेजिन किया था, और सपनों पर तो अपना कंट्रोल होता है, हम उन्हें जैसा चाहें वैसा बना सकते हैं। पर हकीकत में माँ का यह "Kiss", उन हसीन से हसीन सपनों से भी कहीं ज्यादा गहरा और जादुई था।
मैं तो जैसे एक स्टेचू बनकर रह गया था। कभी सोचा नहीं था कि एक 'Kiss' में इतना प्यार और इतनी शिद्दत हो सकती है। अगर माँ के सिर्फ चूमने में इतना जादू है, तो खुदा खैर करे, आगे तो शायद मैं सच में किसी दूसरी दुनिया में पहुँच जाऊँगा। माँ के शांत स्वभाव के पीछे इतना प्यार और इतना जुनून छिपा है, यह आज देखने को मिला।
भले ही उनको बरसों बाद यह मौका मिला था, लेकिन माँ को कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। वह जिस 'Softness' के साथ मुझे चूम रही थी, वह किसी की भी जान लेने के लिए काफी था—एक जानलेवा "Kiss"! मेरा दिल जैसे चीख-चीख कर कह रहा था कि अपनी आँखें बंद कर लूँ और बस इस अहसास में डूब जाऊँ।
उनके होंठ मेरे होठों पर मक्खन की तरह फिसल रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हम 'दो जिस्म, एक जान' बन गए हों। आज हमारे शरीर नहीं, बल्कि हमारी आत्माएं एक-दूसरे को प्यार रही थीं। मैंने अपनी ज़बान एक बार उनके मुँह के अंदर डाली, जहाँ वह उनकी ज़बान से जा टकराई। फिर माँ ने अपनी ज़बान मेरे मुँह में सरकाई और मैंने उन्हें अपने होठों के बीच भरकर चूसना शुरू किया।
उफ़! क्या स्वाद था... जैसे शहद और रूहानी सुकून का कोई मेल हो। काफी देर तक उनकी ज़बान का रस पीने के बाद मैंने अपनी जीभ उनके मुँह में डाली। अब माँ की बारी थी, और वह पूरी तरह मग्न होकर चूसचूस कर मेरी ज़बान का स्वाद लेने लगी। फिर मैंने अपनी जीभ निकालकर उनके ऊपर वाले होंठ को चूमना और चूसना शुरू किया। हमारा किस पल-दर-पल और भी गहरा (Intense) होता जा रहा था।
हम दोनों के हाथों की हलचल एक-दूसरे को बता रही थी कि हम कितने उत्तेजित हो चुके हैं। मेरी ज़िंदगी का यह पहला किस था, और वह भी मेरी अपनी माँ के साथ! माँ भी करीब 18 साल बाद किसी मर्द का ऐसा स्पर्श पाकर मेरी बाहों में मोम की तरह पिघल रही थी। हमारे शरीर के बीच अब इतनी भी जगह नहीं बची थी कि हवा गुज़र सके।
मेरा लण्ङ अब उनके बदन पर टकराते हुए उन्हें यह जता रहा था कि मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकता। मेरा लौड़ा अपनी उस पसंदीदा जगह पर जाने के लिए बेताब था, जहां से वो दुनिया में आया था।
जिसकी चाहत हर मर्द हर बेटे को होती है। माँ भी मेरे मन की तड़प और मेरे शरीर की ज़रूरत को बखूबी समझ रही थी। वह अब पूरी तरह, तन और मन से, अपने बेटे और अब पति के सामने सरेंडर करने के लिए तैयार थी।
जुनून अपने चरम पर था कि तभी अचानक मोबाइल की रिंग बजी। पहले तो हम उस नशे में इतने डूबे थे कि सुनाई ही नहीं दिया, पर कुछ देर बाद उस लगातार बजती घंटी ने हमें इस जादुई दुनिया से खींचकर वापस हकीकत की ज़मीन पर पटक दिया।