Update:-20
आरव तो वहां से लावणी के लिए निकल गया लेकिन जाते-जाते साची को उपाय बताते चला गया। बिना देर किए साची भी निकली, मस्त अपनी स्कूटी से, होटों पर गीत गुनगुनाए…. "तेरी गलियां…गलियां तेरी, गलियां……. मुझको भावें गलियां, तेरी गलियां"
साची गीत गुनगुनाती हुई मस्त अपने रास्ते चली जा रही थी और इसी चक्कर में वो भूल ही गई की दूसरी गली से अपार्टमेंट में जाना है। जैसे ही वो अपार्टमेंट के गेट पर पहुंची, सुलेखा बाहर के दरवाजे पर खड़ी गाय को रोटी डाल रही थीं।
साची मुड़ कर जैसे ही अपने घर के ओर देखी, उसकी धड़कने हो गई तेज और वो स्कूटी को पूरे स्पीड से गली के मोड़ तक लेे गई। इधर सुलेखा को भी ऐसा लगा कि उसने साची को देखा, लेकिन जबतक वो उसे पूरा पहचान पाती, स्कूटी नजरों से इतनी दूर हो गई की मन में बस शंका ही रह गया… "ये सांची है या कोई और"..
साची जैसे ही मोड़ पर मुड़ी, अपनी स्कूटी किनारे खड़ी करके अपने छाती पर हांथ रख कर अपनी श्वास को सामान्य करने लगी।….. "बच गई साची, वरना छोटी मां ने तो पकड़ ही लिया था"…. अब काहे कोई गीत साची के होटों पर आए। बचे रास्ते बस इतना ही ख्याल रहा की "बच गई आज तू"
किंतु जैसे ही अपस्यु ने दरवाजा खोला और उसके चेहरे का दीदार हुआ, उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ अाई… "हाय !! आज कितना मस्त दिख रहा है। दिल करता है लिपट जाऊं। कंट्रोल, कंट्रोल, कंट्रोल"….
साची वहीं दरवाजे के पास ही खड़ी अपनी मुट्ठी भींचकर, आखें मूंदे बस खुद के भावनाओ पर संयम करने की कोशिश करने लगी। किंतु जब फिर से आखें खोल कर उसे देखी…. "आह्हह ! लगता है आज कोई पागलपन ना हो जाए"
ये इश्क की मुश्क, कितना भी संयम रखो दिख ही जाता है। अपस्यु भी साची के इस मुस्कान को मेहसूस कर रहा था… "क्या हो गया, वहीं खड़े
-खड़े किस सोच में डूब गई"।
साची मुस्कुराती हुई "कुछ नहीं" बोली और अाकर अपस्यु के पास बैठ गई। शायद वो बात करने के लिए कुछ शब्द ढूंढ रही थी, किंतु नजर बार-बार अपस्यु के चेहरे को ही देखने कि कोशिश कर रही थी, जिसे वो काबू करने में लगी थी।
अपस्यु:- हेल्लो मिस, क्या हुआ? आज आप बड़ी खुश नजर आ रही है?
साची:- खुश तो मैं इसलिए हूं क्योंकि छोटे पापा आज मुझे स्कूटी दिलवा रहे हैं (झुट)। और हां मैं तुमसे नाराज हूं..
अपस्यु:- नाराज, वो क्यों भला…
साची:- तुमने दरवाजा क्यों नहीं खोला सुबह। कितना बेकार लग रहा था बाहर खड़े रहकर बार-बार बेल बजाना।
अपस्यु:- हां, फिर तो तुम्हारी नाराजगी जायज है। मैं तुम्हारी जगह होता तो इतना कम गुस्सा कभी नहीं दिखता?
साची:- अच्छा !! तो फिर क्या करते?
अपस्यु:- वहीं सोच रहा हूं क्या कहानी बना दूं कि मैं क्या करता। क्योंकि कभी ऐसा मौका मिला ही नहीं। कभी कोई दोस्त हुआ ही नहीं जो मुझे इंतजार करवा सके।
थोड़ी सी मायूसी जो अपस्यु से चहेरे पर साफ झलक रही थी। साची उसे देखकर अपनी आखें शिकुड़ ली और चेहरे से बनावटी गुस्से कि अभिव्यक्ति (एक्सप्रेशन) करती कहने लगी…. "हर वक़्त मुझे देख कर इमोशनल होने की जरूरत नहीं। चलो अब ये चेहरे के ज्योग्राफी को ठीक करो।
अपस्यु खुल कर हंसते हुए…. "मेरे तो पूरे शरीर का भूगोल बिगड़ा हुआ है, तुम्हे केवल चेहरे की पड़ी है"…
साची, अपने सिर पर हाथ रखती….. "मैं भी ना, बस अपनी ही बातें किए जा रही हूं, तुम्हारे बारे में पूछना ही भूल गई"।
अपस्यु:- कोई बात नहीं। लेकिन मैंने भी केवल इस वजह से ध्यान खींचा क्योंकि मुझे एक हेल्पिंग हैंड चाहिए और आरव गायब है।
साची, हंसती हुई:- हां जानती हूं कहां है वो।
अपस्यु:- कमाल है, मुझे पता नहीं और तुम्हे पूरी जानकारी हैं। कर क्या रहा था वो…
साची:- तुम्हे अभी एक हेल्पिंग हैंड चाहिए था ना, उसको देखे। आरव की डिटेल तुम उसी से लेते रहना।
अपस्यु:- हां ये भी ठीक है। हाथ के और शरीर के ऊपरी हिस्से के पालास्टर काट कर निकालने है। क्या तुम मदद कर सकती हो।
साची:- क्यों? प्लास्टर क्यों निकालनी है?
अपस्यु:- कुछ नहीं बस मुझे लगता है यह प्लास्टर जबरदस्ती का लगाया हुआ है। हाथ और पसलियों में केवल चोट था, कोई फ्रैक्चर नहीं।
साची:- तुम क्या डॉक्टर हो? अगर ऐसी बात है तो चलते है हॉस्पिटल। डॉक्टर से संपर्क करके ये प्लास्टर भी हटा देंगे।
अपस्यु:- मुझसे गलती हो गई, तुमसे कहना ही नहीं चाहिए था। मुझे आरव का ही इंतजार कर लेना था।
साची वहां पड़े प्लास्टर कटर को अपने हाथ में लेती हुई कहने लगी…. "हम भारतीयों को अपना काम निकलवाना अच्छे से आता है। कुछ हुआ नहीं की इमोशनल ड्रामा शुरू हो जाता है। हम लड़कियों का तो पता है, तुम लड़कों में भी होता है"…
साची भनभनाते हुई बांह के ओर से कटर लगा कर काटना शुरू की। पहले दाएं हाथ की फिर बाएं हाथ कि प्लास्टर को निकालकर अपस्यु को बैठने के लिए बोली। पीछे जाकर उसने गर्दन से कटर को लगाया और बीचोबीच काटती हुई चली गई। आगे से अपस्यु ने जैसे ही उस प्लास्टर को निकला, उसके पीठ पर खुरदरे कई ज़ख्म के निशान उभर कर सामने अा गए।
साची उन निशानों को बड़े ध्यान से देखते हुए उनपर अपनी उंगली चलाने लगी, मानो वो उस दर्द को जी रही हो। अपस्यु को पीठ पर गिरे उन आशुओं का भी अनुभव हुआ जो इस वक़्त साची के आखों से बहकर नीचे टपक रहे थे।
अपस्यु:- अब कौन इमोशनल हो रहा है साची।
साची अपने आंसू पोंछति…. "इतने गहरे ज़ख्मों के निशान देखकर किसी का भी रूह कांप जाए। अपस्यु ये निशान तो ऐक्सिडेंट के नहीं लगते। कैसे लगे ये ज़ख्म।
अपस्यु:- इसकी कहानी तो बड़ी ही हास्यप्रद है। एक बार मैं फुल तोड़ने के लिए ऊपर चढ़ा था और फिसल कर नीचे गिर गया। और नीचे ढेर सारे कंकड़ पत्थर थे।
साची:- ईईईईईईई !! यह हास्य घटना कैसे हुई जरा बताओगे।
अपस्यु:- कभी फुर्सत में बताऊंगा, कैसे ये घटना हास्य थी। फिलहाल एक काम और करोगी। थोड़ा कपड़ा भिंगो कर पीछे साफ कर दोगी।
साची ने मुस्कुरा कर हां कहा और कपड़े भिगो कर लेे अाई। पीछे साफ करने के बाद वो आगे आई। हालांकि अपस्यु आगे खुद साफ करना चाहता था लेकिन साची ने उसके होटों पर अपनी उंगली डाल कर उसे चुप करा दिया और बिस्तर पर लिटा दी।
पसलियों के ऊपरी हिस्से पर जमे खून के निशान साफ देखे जा सकते थे। साची अपने हाथ धीरे-धीरे उसके बदन पर फुराती, साफ करने लगी। किंतु इन हिस्सों में शायद अब भी दर्द हो रहा था और दर्द के कारण अपस्यु के मुंह से "आह" निकल गई।
साची अपना हाथ उसके बदन पर धीरे धीरे फिराती, उसके नजरों से नजरें मिला कर मुस्कुराती हुई देखती रही। इधर उसके हाथ चलते रहे और उधर दोनों मुस्कुरा कर एक दूसरे को देखते रहे। तभी अचानक एक बार फिर अपस्यु के मुंह से दर्द भारी चिंखे निकलनी शुरू हुई, लेकिन वजह साची का हाथ लगाना नहीं बल्कि उसने पूरे बदन का ही भार उसके पसलियों पर अा गया था।
साची:- सॉरी सॉरी सॉरी… वो मैंने ध्यान ही नहीं दिया।
अपस्यु:- सॉरी कहने की कोई जरूरत नहीं। शायद बदन ने कुछ ज्यादा ही दर्द मेहसूस कर लिया इसलिए चींख़ निकल गई वरना मस्त वाली फीलिंग अा रही थी।
साची उसके मुंह पर कपड़ा मारती हुई … "धत"… कही और वहां से उठ कर भागने लगी। लेकिन अपस्यु ने उसका कलाई पकड़ कर जाने से रोक लिया। साची भी बिना कोई जोर लगाए नाटकीय रूप से बस दिखाती रही को वो हाथ छुड़ाने की कोशिश में है और बस इतना ही कहती रही…. "हाथ छोड़ो ना प्लीज जाना है"
अपस्यु:- थोड़ी देर और ठहर जाओ….
साची अपनी गर्दन घुमा कर, झुकी हुई पलकों को ऊपर उठा कर उसे देखती हुई बस अपने होटों को हिलाई…. "जाने दो ना बाद मे आती हूं"…
धड़कने दोनों की तेज थी, और गुदगुदी के मीठा एहसास सीने में कहीं उठ रहा था। अपस्यु ने "ठीक है" कहते हुए उसका हाथ छोड़ दिया, और वो दौड़ कर उसके कमरे से बाहर चली अाई। कमरे के बाहर आकर वहीं दीवार से वो चिपक गई। अपनी बढ़ी हुई गुदगुदाती धड़कनों को काबू करती, आखें मूंदकर बस वही पल याद कर रही थी जब अपस्यु ने उसका हाथ पीछे से पकड़ लिया।
साची ठंडी-ठंडी सासें लेती उसी दृश्य को अपने अंदर मेहसूस कर रही थी। इधर अपस्यु भी उसके जाते ही सिरहाने को अपने बाहों में भींच कर करवट बदल-बदल कर उसी के ख्यालों में खोन लगा। साची वहां से खिलखिलाती हुई निकली। चेहरा खिला, चाल में नजाकत और होटों पर मध्यम-मध्यम गुनगुनाए गीत…..
हवा के झोंके आज मौसमों से रूठ गए
गुलों की शोखियाँ जो भँवरे आके लूट गए
बदल रही है आज ज़िन्दगी की चाल ज़रा
इसी बहाने क्यूँ ना मैं भी दिल का हाल ज़रा
संवार लूं हाय सवार लूं
संवार लूं हाय सवार लूं…
लगभग 3.30 बजे दोपहर का समय, दिल्ली की वो गर्मी और ऐसे वातावरण में भी साची को सब खिला-खिला और खुशनुमा मेहसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था पूरा समा ही सुहाना हो और मौसम ने जैसे प्यार के तराने छेड़ दिए हों।
इन्हीं सब को मेहसूस करती होटों पर "सवार लूं"… वाला गीत गुनगुनाती वो स्कूटी चलाने लगी। लेकिन कहते हैं ना हर रंग में कोई ना कोई भंग पर ही जाता है। एक बार फिर वो अपनी गली के सामने वाले ही मुख्य द्वार से निकली और अचानक से बड़ी तेजी में ब्रेक लगाना पड़ गया क्योंकि स्कूटी के ठीक सामने खड़ी थी सुलेखा…
गरम मौसम, कहर बरसाती धूप और सामने सुलेखा जी अपनी आखें छोटी किए हुए। बस साची को ही घूर रही थी।