भाग 40-1: उँगली की जगह
अगले दिन शाम को नज़मा ने पूरी तैयारी कर ली थी।
उसने फिर वही ढीली, घुटनों से थोड़ी ऊपर वाली सफेद फ्रॉक पहनी, अंदर कुछ नहीं – न ब्रा, न पैंटी। आईने के सामने खड़ी होकर उसने फ्रॉक उठाई। उसकी चिकनी चूत पहले से चमक रही थी। मुनिया हल्की गुलाबी और गीली थी। उसने उंगली से हल्के से छुआ तो रस चिपक गया।
“मेरी मुनिया..., आज तो पापा ही करेंगे तुझे प्यार,” उसने फुसफुसाया।
शहजाद ऑफिस से लौटे और सीधे टीवी वाले सोफे पर बैठ गए। नज़मा बिना ट्रे के ही आई। आज कोई बहाना नहीं। वह सीधे उनके पास गई और उनकी गोद में बैठ गई – इस बार पापा की तरफ मुँह करके। दोनों पैर उनके कमर के दोनों तरफ फैला दिए। फ्रॉक तुरंत कमर तक खिसक गई। उसकी नंगी, गरम और पहले से गीली चूत पापा की पैंट पर पूरा दबाव डाल रही थी। चूत के होंठ फैलकर लंड की मोटी लकीर पर चिपक गए।
शहजाद की साँस एकदम रुक गई। उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“पापा, क्या हुआ, आज आप चुप क्यों हो?” नज़मा ने मासूमियत से पूछा। “थके हुए हो क्या?”
शहजाद की आवाज़ भारी निकली। “नहीं… बस… तू… मेरी प्यारी बेटी…”
नज़मा ने उनके कंधों पर दोनों हाथ रख दिए। चेहरा बिल्कुल सामान्य। “पापा, टीवी देख रहे हो? कौन सा चैनल लगाऊँ?”
शहजाद की आँखें नीचे फिसल रही थीं। “जो मरज़ी लगा दे बेटी… मेरा इंटरेस्ट तो सिर्फ अपनी प्यारी बेटी में है। अच्छा चल, वो लगा दे जिसमें घोड़ा और हिरनी एक साथ खेलते हैं।”
नज़मा हँसते हुए “ऐसा कोई चैनल नहीं है पापा, नेशनल ज्योग्राफिक लगा देती हूँ।”
मन ही मन सोचा – बड़ा आए घोड़े वाले… लौड़े ने पानी तो दस मिनट में छोड़ दिया था।
वह धीरे-धीरे कमर हिलाने लगी। चूत पैंट पर रगड़ खा रही थी। हर हिलने पर चूत के होंठ लंड को सहला रहे थे। कामरस धीरे-धीरे कपड़े को गीला करने लगा। शहजाद का लंड तेजी से सख्त हो गया। पैंट में तंबू सा बनने लगा। नज़मा महसूस कर सकती थी – उसकी नंगी चूत के नीचे वह गर्म, कठोर, धड़कती हुई चीज़।
शहजाद के दोनों हाथ उसकी गाँड पर आ गए। उन्होंने दोनों फाँकों को भर लिया और आटे की तरह गूँथने लगे। उंगलियाँ दरार में घूम रही थीं। एक उँगली धीरे से गाँड के छेद पर रुक गई और हल्का दबाव बनाते हुए अंदर सरक गई।
नज़मा की कमर लचक गई। “आह… पापा…”
वह और करीब सिमट गई। दोनों हाथों से उनके गले में बाँहें डाल लीं और कसकर चिपक गई। चेहरा उनके कंधे में छुपा लिया।
“पापा… आप अच्छे से प्यार नहीं करते,” उसने फुसफुसाया। “कल भी जल्दी भगा दिया मुझे। आज जल्दी नहीं जाने दूँगी…”
शहजाद ने कहा “अरे क्यों चिंता करती है, आज मैं भी कमर कस के आया हूँ।”
उनकी उँगली गाँड में धीरे-धीरे अंदर-बाहर होने लगी। दूसरा हाथ अभी भी चूतड़ मसल रहा था। नज़मा की चूत पैंट पर लगातार रगड़ खा रही थी। हर रगड़ के साथ लंड और सख्त होता जा रहा था। चूत का रस पैंट को भिगो रहा था।
तभी गलियारे में कदमों की आवाज़ आई। परवीन पानी का जग लेकर आई। उसने देखा – बेटी बाप की गोद में सवारी की पोजीशन में, फ्रॉक कमर तक, नंगी गाँड दोनों हाथों में, एक उँगली अंदर।
परवीन की आँखें जल उठीं। मन में चीख उठी – या अल्लाह, ये गुनाह देखने से पहले मैं मर क्यों नहीं गई।
नज़मा ने बेशर्मी से मुस्कुराते हुए कहा, “माँ, गर्मी बहुत है। मेरे लिए और पापा के लिए रूहअफज़ा बना के ला दो ना।”
परवीन की साँस थम-सी गई। उसने जग टेबल पर रखा, लंबी निगाह नज़मा पर डाली। वह एक ज़ोरदार चटाका नज़मा के गाल पर मारना चाहती थी, लेकिन न जाने कौन-सी बेबसी थी कि बिना एक भी शब्द कहे रसोई की तरफ चली गई। कदम डगमगा रहे थे।
जैसे ही माँ गई, शहजाद ने दूसरा हाथ नज़मा की चूत की तरफ बढ़ाया। उँगलियाँ गीले होंठों पर घूमने लगीं। लेकिन नज़मा इतनी कसकर चिपक हुई थी कि जगह पूरी नहीं बन पा रही थी। उँगली अंदर तक नहीं जा पा रही थी।
नज़मा ने महसूस किया। जगह पूरी नहीं है। इस पोजीशन में पापा की उँगली ठीक से अंदर नहीं जा सकती।
“मैं तो टीवी देख ही नहीं पा रही हूँ,” उसने धीरे से कहा। फिर कमर उठाई और पोजीशन बदल ली। अब वह पापा की तरफ पीठ करके बैठ गई। गाँड सीधे उनके तने हुए लंड पर टिक गई। फ्रॉक और ऊपर खिसक गई।
अब उँगली की जगह बन गई थी।
शहजाद भी तुरंत नज़मा के मन की बात भाँप गए। उन्होंने बेटी की पीठ को अपने सीने से चिपकाते हुए अपना गाल, बेटी के मुलायम गाल के साथ गाल सटा दिया। “हाँ, ऐसा हम दोनों को टीवी सही से दिखाई देगा।”
यह बोलते हुए शहजाद ने अपने दायें हाथ की बीच वाली उँगली नज़मा की चूत में सरका दी। नज़मा के मुँह से सिसकी निकली। शहजाद ने मौका देखते हुए, फ्रॉक के ऊपर से ही बायें हाथ की पूरी हथेली बेटी के चूचे पर रख दी। निप्पल कड़क था। हथेली के नीचे गोल, नरम मांस दब रहा था। अब एक उँगली चूत में अंदर-बाहर हो रही थी, दूसरा हाथ चूचे मसल रहा था, और गाँड तने हुए लंड पर रगड़ खा रही थी। नज़मा की साँसें तेज हो गईं। वह सिर पीछे करके पापा के कंधे से सट गई। चूत की दीवारें उँगली को कस रही थीं। अब नज़मा की चूत से रस लगातार बह रहा था।
परवीन दो गिलास रूहअफज़ा लेकर वापस आई। उसने देखा – बेटी अब उल्टी बैठी है, गाँड लंड पर, एक उँगली चूत में तेजी से अंदर-बाहर, दूसरा हाथ फ्रॉक के ऊपर चूचे पर। उसने गिलास टेबल पर रखे। आँखें फटी हुईं। साँसें तेज। गले में कुछ अटक गया। फिर बिना कुछ बोले चली गई। दरवाज़ा बंद करते समय हल्की सिसकी सुनाई दी।
शहजाद की उँगली अब आराम से अंदर-बाहर हो रही थी। नज़मा की चूत पूरी तरह खुल चुकी थी। चूचे हथेली के नीचे दब-दबकर फूल रहे थे। गाँड लंड पर रगड़ खा रही थी। पैंट पर बड़ा गीला धब्बा फैल चुका था।
खेल अभी शुरू ही हुआ था।