Arjunsingh287
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फौजी भाई कुछ तो रहम करो
, इतने भी सस्पेंस मत दो की बंदा फ़्रस्ट्रेशन मे ही मर जाये।
और प्लीज अपडेट थोड़ा बड़ा दो

और प्लीज अपडेट थोड़ा बड़ा दो
Awesome update and nice story#४०
वो गोली मंजू को नहीं बल्कि मेरे मन को बेध गयी थी.
“कबीर ” टूटी आवाज में उसने पुकारा मुझे. मेरे लिए दो राहे थी ,हमलावर का पीछा करना जरुरी था मेरे लिए पर उस से भी ज्यादा जरुरी था इन लोगो की हिफाजत.
“होश में रह , कुछ नही होगा तुझे ” मैंने मंजू के जख्म की जांच करते हुए कहा .
किस्मत की बात थी गोली बदन में जाने के बाद भी नुकसान कम ही था .
“विक्रम ” कहा उसने
मैंने दरोगा को देखा, साँसे चल रही थी .
“डॉक्टर की जरुरत है इसे ” मैंने विक्रम को उठाया , मंजू को सहारा दिया . दरोगा को इलाज की सख्त जरुरत थी और हम लोग बस्ती से बहुत दूर थे. समय पर इलाज की बहुत जरूरत थी . इतना बोझ उठा कर चलना भी तो मुश्किल था ऊपर से रात का समय . जैसे तैसे करके मैं उन दोनों को कुवे तक लाया क्योंकि उम्मीद यही पर थी, हमारा ट्रेक्टर. जल्दी से मैंने दोनों को उस पर लादा और डॉक्टर के पास चल दिए. बीच बीच में मैं दरोगा की नब्ज़ चेक करता रहा जो डूबती ही जा रही थी . हॉस्पिटल पहुँच कर जैसे राहत की साँस ली मैंने. दोनों को तुरंत इलाज के लिए ले जाया गया .मैं पास में ही पड़ी बेंच पर बैठ गया और सोच में डूब गया. पुलिस अधिकारी पर जानलेवा हमला हुआ था , बात अब बिगड़ने वाली थी और मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं था .
और सबसे महत्वपूर्ण बात ये की किस किस को इस खान के बारे में मालूम था . मेरे लिए इस चुतियापे को ख़तम करना बेहद जरुरी था, और मौका भी था उस हमलावर को पकड़ने का . शक तो मुझे हर किसी पर था ,पर सबूत किसी के खिलाफ नहीं था . ये रात साली हद से ज्यादा लम्बी हो गयी थी . हॉस्पिटल वालो ने पुलिस को इत्तिला दे दी थी और मेरे पास उनके किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था , शुक्र इस बात का था की मंजू बयाँ देने की हालत में थी तो उसने झूठी-मूठी कहानी बना ली की वो और दरोगा साथ में थे तो कुछ आवारा लोगो ने उन्हें लुटने की कोशिश की , दरोगा ने प्रतिकार किया तो उन्होंने गोली मार दी. खैर, मेरा ब्यान देने के बाद पुलिस ने मुझे राहत प्रदान की .
इस घटना ने मुझे हिला कर रख दिया था , मुझे जल्दी से जल्दी कुछ करना था . एक बार फिर मैं खान में मोजूद था किसी सुराग की तलाश करने. हमलावर जिधर से भागा था मैंने उस रस्ते पर गौर फ़रमाया और मैं हैरान था , क्या क्या छिपा था इस जंगल में . ये एक बेहद सीधा सरल सा रास्ता था जो उसी जगह मिलता था जहाँ पर उस जली हुई झोपडी के निशान थे और अगर हमलावर इधर से भागा था तो फिर एक ही रस्ता बचता था वापिस जाने के लिए जो हमारे खेतो से होकर गुजरता था . वो कहते है न वक्त का पहिया घूमता जरुर है और शायद आज वो दिन था , उन गड्ढो के पास मुझे कुत्ते मिले जो हड्डी के लिए लड़ रहे थे , मिटटी से सनी हड्डी जो शायद उन्होंने गड्ढे से ही निकाली थी .कुत्तो को भागने के बाद मैंने हड्डी को देखा . वो हड्डी बहुत कुछ कह रही थी मुझसे क्योंकि वो किसी जानवर की नहीं बल्कि इन्सान की हड्डी थी. मेरे खेतो में इन्सान की हड्डिया , दिमाग में एक एक बात घुमने लगी थी . तमाम बाते एक एक करके मेरे मन में कहानी बुन रही थी वो कहानी जिसका मैंने अवलोकन किया तो मेरे पैर कांप गए. पानी की खेली में मैंने अपना सर दिया और खुद को शांत करने की कोशिश करने लगा. दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था .एक बात मुझे खटक रही थी ,सिर्फ उस एक बात की तहकीकात करना बेहद जरुरी था. दरोगा के साथ मंजू तो नहीं थी उस रात को चबूतरे वाले पेड़ के पास क्योंकि मंजू ने खुद कहा था की उसका रत्ना से कोई लेना देना नहीं था जबकि पेड़ के पास जो औरत दरोगा के साथ थी उसने सुनार का जिक्र किया था . यानि दरोगा मंजू के साथ साथ किसी और औरत से भी फंसा हुआ था और ये दूसरी औरत ही हो न हो इस चुतियापे की सूत्रधार थी.
दिन ढलने लगा था मैं वापिस गाँव की तरफ लौटने लगा. मौसम एक बार फिर से करवट ले रहा था , शायद मेह बरसना चाहता था .जब तक मैं धेल पर पहुंचा अच्छी खासी बारिश पड़ने लगी थी . एक बार फिर मेरे कदम हवेली के रस्ते को महसूस करके थम गए , ये घर भी बहुत अजीब चीज होती है. एक बार फिर हवेली में मोजूद था . मैंने रौशनी की . चिमनी की लौ में हवेली की दीवारे अजीब सी लग ही थी . मेरी सांसे ना जाने क्यों तेज सी चल रही थी . पानी के लिए मैंने मटके को उठाया पर वो खाली था , उसे आँगन में बारिश के निचे रखा . इतनी बेचैनी मैंने कभी महसूस नहीं की . बचपन यही बीता, जवानी यही आयी अपने ही घर में खुद को इतना बेबस क्यों समझने लगे इन्सान.
“तू ही बता कुछ , तुझसे तो कुछ नहीं छिपा ” हताशा में मैं हवेली से ही बाते करने लगा. कभी सुना था की जब भी मांगो बेहिसाब माँगना चाहिए क्योंकि जब कोई दुआ कबूल हो तो वो रब्ब न जाने क्या दे दे. आज भी ऐसी ही शाम थी , खिड़की से आती तेज हवा के झोंके से मेरी माँ की वो तस्वीर गिर गयी जिसको मैंने कुछ दिन पहले ही रखा था , टूटे कांच को हटाते हुए मैंने माँ की तस्वीर पर उंगलिया फेरी तो उंगलियों को कुछ महसूस हुआ . मैंने तस्वीर को सरकाया , वो एक पायल थी चांदी की . जोड़े में नहीं थी वो . मैं कुछ और सोच पाता तभी पीछे से आकर वो मुझसे लिपट गयी. उसके थरथराते होंठो ने मेरे गालो को चूमा . मुझे अपनी बाहों में कसते हुए वो बस इतना बोली ,”उफ्फ्फ कबीर, कितना तड़पाता है तू मुझे, ”
मैंने अपनी पीठ में नर्म छातियो को धंसते हुए महसूस किया. उसके गर्म हाथ मेरे लंड पर पहुच चुके थे .
मंजू बच गयी पर शायद उससे भी कबीर को कुछ मालूम नहीं होगा.....#४०
वो गोली मंजू को नहीं बल्कि मेरे मन को बेध गयी थी.
“कबीर ” टूटी आवाज में उसने पुकारा मुझे. मेरे लिए दो राहे थी ,हमलावर का पीछा करना जरुरी था मेरे लिए पर उस से भी ज्यादा जरुरी था इन लोगो की हिफाजत.
“होश में रह , कुछ नही होगा तुझे ” मैंने मंजू के जख्म की जांच करते हुए कहा .
किस्मत की बात थी गोली बदन में जाने के बाद भी नुकसान कम ही था .
“विक्रम ” कहा उसने
मैंने दरोगा को देखा, साँसे चल रही थी .
“डॉक्टर की जरुरत है इसे ” मैंने विक्रम को उठाया , मंजू को सहारा दिया . दरोगा को इलाज की सख्त जरुरत थी और हम लोग बस्ती से बहुत दूर थे. समय पर इलाज की बहुत जरूरत थी . इतना बोझ उठा कर चलना भी तो मुश्किल था ऊपर से रात का समय . जैसे तैसे करके मैं उन दोनों को कुवे तक लाया क्योंकि उम्मीद यही पर थी, हमारा ट्रेक्टर. जल्दी से मैंने दोनों को उस पर लादा और डॉक्टर के पास चल दिए. बीच बीच में मैं दरोगा की नब्ज़ चेक करता रहा जो डूबती ही जा रही थी . हॉस्पिटल पहुँच कर जैसे राहत की साँस ली मैंने. दोनों को तुरंत इलाज के लिए ले जाया गया .मैं पास में ही पड़ी बेंच पर बैठ गया और सोच में डूब गया. पुलिस अधिकारी पर जानलेवा हमला हुआ था , बात अब बिगड़ने वाली थी और मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं था .
और सबसे महत्वपूर्ण बात ये की किस किस को इस खान के बारे में मालूम था . मेरे लिए इस चुतियापे को ख़तम करना बेहद जरुरी था, और मौका भी था उस हमलावर को पकड़ने का . शक तो मुझे हर किसी पर था ,पर सबूत किसी के खिलाफ नहीं था . ये रात साली हद से ज्यादा लम्बी हो गयी थी . हॉस्पिटल वालो ने पुलिस को इत्तिला दे दी थी और मेरे पास उनके किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था , शुक्र इस बात का था की मंजू बयाँ देने की हालत में थी तो उसने झूठी-मूठी कहानी बना ली की वो और दरोगा साथ में थे तो कुछ आवारा लोगो ने उन्हें लुटने की कोशिश की , दरोगा ने प्रतिकार किया तो उन्होंने गोली मार दी. खैर, मेरा ब्यान देने के बाद पुलिस ने मुझे राहत प्रदान की .
इस घटना ने मुझे हिला कर रख दिया था , मुझे जल्दी से जल्दी कुछ करना था . एक बार फिर मैं खान में मोजूद था किसी सुराग की तलाश करने. हमलावर जिधर से भागा था मैंने उस रस्ते पर गौर फ़रमाया और मैं हैरान था , क्या क्या छिपा था इस जंगल में . ये एक बेहद सीधा सरल सा रास्ता था जो उसी जगह मिलता था जहाँ पर उस जली हुई झोपडी के निशान थे और अगर हमलावर इधर से भागा था तो फिर एक ही रस्ता बचता था वापिस जाने के लिए जो हमारे खेतो से होकर गुजरता था . वो कहते है न वक्त का पहिया घूमता जरुर है और शायद आज वो दिन था , उन गड्ढो के पास मुझे कुत्ते मिले जो हड्डी के लिए लड़ रहे थे , मिटटी से सनी हड्डी जो शायद उन्होंने गड्ढे से ही निकाली थी .कुत्तो को भागने के बाद मैंने हड्डी को देखा . वो हड्डी बहुत कुछ कह रही थी मुझसे क्योंकि वो किसी जानवर की नहीं बल्कि इन्सान की हड्डी थी. मेरे खेतो में इन्सान की हड्डिया , दिमाग में एक एक बात घुमने लगी थी . तमाम बाते एक एक करके मेरे मन में कहानी बुन रही थी वो कहानी जिसका मैंने अवलोकन किया तो मेरे पैर कांप गए. पानी की खेली में मैंने अपना सर दिया और खुद को शांत करने की कोशिश करने लगा. दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था .एक बात मुझे खटक रही थी ,सिर्फ उस एक बात की तहकीकात करना बेहद जरुरी था. दरोगा के साथ मंजू तो नहीं थी उस रात को चबूतरे वाले पेड़ के पास क्योंकि मंजू ने खुद कहा था की उसका रत्ना से कोई लेना देना नहीं था जबकि पेड़ के पास जो औरत दरोगा के साथ थी उसने सुनार का जिक्र किया था . यानि दरोगा मंजू के साथ साथ किसी और औरत से भी फंसा हुआ था और ये दूसरी औरत ही हो न हो इस चुतियापे की सूत्रधार थी.
दिन ढलने लगा था मैं वापिस गाँव की तरफ लौटने लगा. मौसम एक बार फिर से करवट ले रहा था , शायद मेह बरसना चाहता था .जब तक मैं धेल पर पहुंचा अच्छी खासी बारिश पड़ने लगी थी . एक बार फिर मेरे कदम हवेली के रस्ते को महसूस करके थम गए , ये घर भी बहुत अजीब चीज होती है. एक बार फिर हवेली में मोजूद था . मैंने रौशनी की . चिमनी की लौ में हवेली की दीवारे अजीब सी लग ही थी . मेरी सांसे ना जाने क्यों तेज सी चल रही थी . पानी के लिए मैंने मटके को उठाया पर वो खाली था , उसे आँगन में बारिश के निचे रखा . इतनी बेचैनी मैंने कभी महसूस नहीं की . बचपन यही बीता, जवानी यही आयी अपने ही घर में खुद को इतना बेबस क्यों समझने लगे इन्सान.
“तू ही बता कुछ , तुझसे तो कुछ नहीं छिपा ” हताशा में मैं हवेली से ही बाते करने लगा. कभी सुना था की जब भी मांगो बेहिसाब माँगना चाहिए क्योंकि जब कोई दुआ कबूल हो तो वो रब्ब न जाने क्या दे दे. आज भी ऐसी ही शाम थी , खिड़की से आती तेज हवा के झोंके से मेरी माँ की वो तस्वीर गिर गयी जिसको मैंने कुछ दिन पहले ही रखा था , टूटे कांच को हटाते हुए मैंने माँ की तस्वीर पर उंगलिया फेरी तो उंगलियों को कुछ महसूस हुआ . मैंने तस्वीर को सरकाया , वो एक पायल थी चांदी की . जोड़े में नहीं थी वो . मैं कुछ और सोच पाता तभी पीछे से आकर वो मुझसे लिपट गयी. उसके थरथराते होंठो ने मेरे गालो को चूमा . मुझे अपनी बाहों में कसते हुए वो बस इतना बोली ,”उफ्फ्फ कबीर, कितना तड़पाता है तू मुझे, ”
मैंने अपनी पीठ में नर्म छातियो को धंसते हुए महसूस किया. उसके गर्म हाथ मेरे लंड पर पहुच चुके थे .
Droga or Manju bach gaye ya fir yeh keh le ki Kabeer time hospital pohcha kar bacha lia#४०
वो गोली मंजू को नहीं बल्कि मेरे मन को बेध गयी थी.
“कबीर ” टूटी आवाज में उसने पुकारा मुझे. मेरे लिए दो राहे थी ,हमलावर का पीछा करना जरुरी था मेरे लिए पर उस से भी ज्यादा जरुरी था इन लोगो की हिफाजत.
“होश में रह , कुछ नही होगा तुझे ” मैंने मंजू के जख्म की जांच करते हुए कहा .
किस्मत की बात थी गोली बदन में जाने के बाद भी नुकसान कम ही था .
“विक्रम ” कहा उसने
मैंने दरोगा को देखा, साँसे चल रही थी .
“डॉक्टर की जरुरत है इसे ” मैंने विक्रम को उठाया , मंजू को सहारा दिया . दरोगा को इलाज की सख्त जरुरत थी और हम लोग बस्ती से बहुत दूर थे. समय पर इलाज की बहुत जरूरत थी . इतना बोझ उठा कर चलना भी तो मुश्किल था ऊपर से रात का समय . जैसे तैसे करके मैं उन दोनों को कुवे तक लाया क्योंकि उम्मीद यही पर थी, हमारा ट्रेक्टर. जल्दी से मैंने दोनों को उस पर लादा और डॉक्टर के पास चल दिए. बीच बीच में मैं दरोगा की नब्ज़ चेक करता रहा जो डूबती ही जा रही थी . हॉस्पिटल पहुँच कर जैसे राहत की साँस ली मैंने. दोनों को तुरंत इलाज के लिए ले जाया गया .मैं पास में ही पड़ी बेंच पर बैठ गया और सोच में डूब गया. पुलिस अधिकारी पर जानलेवा हमला हुआ था , बात अब बिगड़ने वाली थी और मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं था .
और सबसे महत्वपूर्ण बात ये की किस किस को इस खान के बारे में मालूम था . मेरे लिए इस चुतियापे को ख़तम करना बेहद जरुरी था, और मौका भी था उस हमलावर को पकड़ने का . शक तो मुझे हर किसी पर था ,पर सबूत किसी के खिलाफ नहीं था . ये रात साली हद से ज्यादा लम्बी हो गयी थी . हॉस्पिटल वालो ने पुलिस को इत्तिला दे दी थी और मेरे पास उनके किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं था , शुक्र इस बात का था की मंजू बयाँ देने की हालत में थी तो उसने झूठी-मूठी कहानी बना ली की वो और दरोगा साथ में थे तो कुछ आवारा लोगो ने उन्हें लुटने की कोशिश की , दरोगा ने प्रतिकार किया तो उन्होंने गोली मार दी. खैर, मेरा ब्यान देने के बाद पुलिस ने मुझे राहत प्रदान की .
इस घटना ने मुझे हिला कर रख दिया था , मुझे जल्दी से जल्दी कुछ करना था . एक बार फिर मैं खान में मोजूद था किसी सुराग की तलाश करने. हमलावर जिधर से भागा था मैंने उस रस्ते पर गौर फ़रमाया और मैं हैरान था , क्या क्या छिपा था इस जंगल में . ये एक बेहद सीधा सरल सा रास्ता था जो उसी जगह मिलता था जहाँ पर उस जली हुई झोपडी के निशान थे और अगर हमलावर इधर से भागा था तो फिर एक ही रस्ता बचता था वापिस जाने के लिए जो हमारे खेतो से होकर गुजरता था . वो कहते है न वक्त का पहिया घूमता जरुर है और शायद आज वो दिन था , उन गड्ढो के पास मुझे कुत्ते मिले जो हड्डी के लिए लड़ रहे थे , मिटटी से सनी हड्डी जो शायद उन्होंने गड्ढे से ही निकाली थी .कुत्तो को भागने के बाद मैंने हड्डी को देखा . वो हड्डी बहुत कुछ कह रही थी मुझसे क्योंकि वो किसी जानवर की नहीं बल्कि इन्सान की हड्डी थी. मेरे खेतो में इन्सान की हड्डिया , दिमाग में एक एक बात घुमने लगी थी . तमाम बाते एक एक करके मेरे मन में कहानी बुन रही थी वो कहानी जिसका मैंने अवलोकन किया तो मेरे पैर कांप गए. पानी की खेली में मैंने अपना सर दिया और खुद को शांत करने की कोशिश करने लगा. दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था .एक बात मुझे खटक रही थी ,सिर्फ उस एक बात की तहकीकात करना बेहद जरुरी था. दरोगा के साथ मंजू तो नहीं थी उस रात को चबूतरे वाले पेड़ के पास क्योंकि मंजू ने खुद कहा था की उसका रत्ना से कोई लेना देना नहीं था जबकि पेड़ के पास जो औरत दरोगा के साथ थी उसने सुनार का जिक्र किया था . यानि दरोगा मंजू के साथ साथ किसी और औरत से भी फंसा हुआ था और ये दूसरी औरत ही हो न हो इस चुतियापे की सूत्रधार थी.
दिन ढलने लगा था मैं वापिस गाँव की तरफ लौटने लगा. मौसम एक बार फिर से करवट ले रहा था , शायद मेह बरसना चाहता था .जब तक मैं धेल पर पहुंचा अच्छी खासी बारिश पड़ने लगी थी . एक बार फिर मेरे कदम हवेली के रस्ते को महसूस करके थम गए , ये घर भी बहुत अजीब चीज होती है. एक बार फिर हवेली में मोजूद था . मैंने रौशनी की . चिमनी की लौ में हवेली की दीवारे अजीब सी लग ही थी . मेरी सांसे ना जाने क्यों तेज सी चल रही थी . पानी के लिए मैंने मटके को उठाया पर वो खाली था , उसे आँगन में बारिश के निचे रखा . इतनी बेचैनी मैंने कभी महसूस नहीं की . बचपन यही बीता, जवानी यही आयी अपने ही घर में खुद को इतना बेबस क्यों समझने लगे इन्सान.
“तू ही बता कुछ , तुझसे तो कुछ नहीं छिपा ” हताशा में मैं हवेली से ही बाते करने लगा. कभी सुना था की जब भी मांगो बेहिसाब माँगना चाहिए क्योंकि जब कोई दुआ कबूल हो तो वो रब्ब न जाने क्या दे दे. आज भी ऐसी ही शाम थी , खिड़की से आती तेज हवा के झोंके से मेरी माँ की वो तस्वीर गिर गयी जिसको मैंने कुछ दिन पहले ही रखा था , टूटे कांच को हटाते हुए मैंने माँ की तस्वीर पर उंगलिया फेरी तो उंगलियों को कुछ महसूस हुआ . मैंने तस्वीर को सरकाया , वो एक पायल थी चांदी की . जोड़े में नहीं थी वो . मैं कुछ और सोच पाता तभी पीछे से आकर वो मुझसे लिपट गयी. उसके थरथराते होंठो ने मेरे गालो को चूमा . मुझे अपनी बाहों में कसते हुए वो बस इतना बोली ,”उफ्फ्फ कबीर, कितना तड़पाता है तू मुझे, ”
मैंने अपनी पीठ में नर्म छातियो को धंसते हुए महसूस किया. उसके गर्म हाथ मेरे लंड पर पहुच चुके थे .
बहुत ही शानदार और लाजवाब अपडेट है फौजी भाई कबीर के हाथों लाला का डर शहर से और लाला खुद दुनिया से उठ जाता लेकिन उसी वक्त कबीर का अतीत यानि कबीर की दिलरुबा पुलिसवाली आ गई और लाला बच गया#6
लाला गाड़ी से उतरा और अगले ही पल उसने गाडी में से उसी लड़की को खीच लिया जिसकी वजह से ये सब शुरू हुआ था . अजीब सी सिचुएय्शन हो गयी थी , लाला भी था पुलिस भी थी और मैं भी था , बरिश की बूंदे गिरने अलगी थी शायद आसमान भी नहीं चाहता था की शोएब का खून धरती से पनाह मांगे.
“भैया ” लगभग चीख ही तो पड़ी थी वो लड़की
“लड़की को छोड़ लाला ” मैंने आगे बढ़ते हुए कहा
“दम है तो ले जा इसे ” सुर्ख लहजे में बोला लाला
“तू भी मरेगा लाला, काश थोड़ी देर पहले आता तू , शोएब की जान निकलते देखता बहुत मजेदार नजारा था ” मैंने कहा और लाला की तरफ लपका . लाला भी बढ़ा मेरी तरफ पर बीच में पुलिस आ आगयी . कुछ ने मुझे पकड़ा कुछ ने लाला को .
“हरामी जगदीश , बीच में पड़ , मामला मेरे और इसके बीच का है मेरे टुकडो पर पलने वाले खाकी कुत्तो की इतनी हिम्मत नहीं की शेर का रास्ता रोक सके ” लाला ने गुस्से से कहा
मैं- dsp , हट जा यहाँ से , इसके बेटे को मारा है इसे भी मारूंगा . बार बार मरूँगा जब तक मारूंगा की ये मर नहीं जाता , आज के बाद शहर में लाला का नाम कोई नहीं लेगा नाम लेने वालो को मारूंगा
“आ साले कसम है मिटटी नसीब नहीं होगी तेरी जिस्म को ” लाला ने अपने को पुलिस वालो से छुड़ाया और मेरी तरफ लपका . लाला के लोगो ने शोर मचाना शुरू किया . इस से पहले की मैं अपनी गिरफ्त से आजाद हो पाता लाला की हत्थी मेरे सर पर लगी और कसम से एक ही वार में सर घूम गया. लाला ने मुझे उठाया और शोएब की कार पर पटक दिया . कार पर बनी चील का एक हिस्सा मेरी पसलियों में घुस गया . दर्द को महसूस किया मैंने तभी लाला का घुटना मेरे सीने पर लगा और मुह से उलटी गिर गयी .
“इस शहर में एक ही मर्द है और वो है जहाँगीर लाला . तू अब तक जिन्दा सिर्फ इसलिए है की तेरी सूरत छिपी हुई है , मसीहा बनने का शौक है न तुझे . तेरी रूह तुझसे सिर्फ सवाल पूछेगी की किन नामर्दों का मसीहा बनने चला था , इस शहर में मेरा खौफ इसलिए नहीं है की मैं बुरा हूँ , यहाँ के लोग नामर्द है ” लाला ने फिर से हत्थी मारी और मैं जमीन पर गिर गया .
“उठ साले, किस्मत सबको मौका देती है , उठ और देख सामने खड़ी मौत को . तेरी किस्मत आज मौत है ” लाला ने मुझे लात मार. लाला में सांड जैसी ताकत थी .काबू ही नहीं आ रहा था .
“लड़की को लाओ रे ” लाला की बात सुनकर दो गुंडे लड़की को हमारे पास लेकर आये
“इस दुनिया में कीड़े मकौड़ो के माफिक भरे है लोग.रोज कितने लोग मरते है किसी को कोई हिसाब नहीं , क्या लगती है ये लडकी जिसके लिए तूने बहनचोद सब कुछ मिटटी में मिला दिया . ”लाला ने लड़की को थप्पड़ मारा
“सर पर हाथ रखा है इसके लाला, तू तो क्या कायनात तक इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती ” मैंने पसलियों पर हाथ रखते हुए खड़े होते हुए कहा
“अजीब इत्तेफाक है दुनिया की तमाम लड़ाइयाँ औरतो के लिए ही लड़ी गयी है ” लाला ने हँसते हुए कहा पर उसकी हंसी रुक गयी क्योंकि मैंने मुक्का मार दिया था उसको. आसमान दिन में ही काला हो चूका था बारिश अपने रौद्र रूप पर पहुँच गयी थी लाला कभी मुझ पर भारी पड़े और कभी मैं लाला पर . दरअसल अब ये लड़ाई ईगो की भी तो हो गयी थी .
सीने पर पड़ी लात से लाला निचे गिर गया उठने से पहले ही मैंने उसके घुटने पर मारा दर्द से तड़प उठा पर उस से उठा नहीं गया. मैं समझ गया था की बाज़ी मेरे हाथ में है . “खेल ख़तम लाला ” इस से पहले की मैं उसकी गर्दन तोड़ देता “धाएं ” गोलियों की आवाज गूंजने लगी . मेरी नजर ने सामने जो देखा फिर बस देखता ही रहा .
“बस यही तो नहीं चाहता था मैं ” मैंने आसमान से कहा .
ऐसा तो हरगिज नहीं था की उस से खूबसूरत लड़की मैंने और कही नहीं देखी थी पर ये भी सच था की जिन्दगी में जो भी थी बस वो ही थी . हाथो में पिस्तौल लिए वो हमारी तरफ ही बढ़ रही थी , पता नहीं वक्त थम सा गया था या मेरा अतीत दौड़ आया था मुझे गले से लगाने को . बरसो पहले एक बारिश आई थी जब उसे भीगते हुए देखा था बरसो बाद आज ये बारिश थी जब वो मेरे सामने थी .
“बंद करो ये तमाशा ” हांफते हुए उसने कहा . मेरी आँखे बस उसे ही देखे जा रही थी .
“गिरफ्तार करो लाला को और समेटो सब कुछ यहाँ से अभी के अभी ” चीखते हुए उसने अपनी कैप उतारी और मुझसे रूबरू हुई. कहने को बहुत कुछ था पर जुबान खामोश थी , वो मुझे देख रही थी और मैं उसे . “कबीर ”उसने कांपते होंठो से मेरा नाम लिया एक पल को लगा की सीने से लग जाएगी पर तभी वो पलट गयी . मुड़कर ना देखा उसने दुबारा. दिल की बुझी आग की राख में से कोई चिंगारी जैसे जी उठी.
“पानी पिला दो कोई ” मैंने कहा और गाड़ी से पीठ टिका कर बैठ गया. दूर खड़ी वो पुलिस वालो से ना जाने क्या कह रही थी पर भाग दौड़ बहुँत बढ़ गयी थी .
“पानी भैया ” उस लड़की ने मुझे जग दिया. घूँट मुह से लगाये मैं अतीत की गहराई में डूबने लगा था. कभी सोचा नहीं था की जिन्दगी के इस मोड़ पर वो यूँ मेरे सामने आकर खड़ी हो जाएगी बहुत मुश्किल से संभाला था खुद को समझ नही आ रहा था की ये खुश होने की घड़ी है या फिर रोने की .
“उठ, चल मेरे साथ ” dsp ने मेरे पास आकर कहा
“इस लड़की को सुरक्षित इसके घर पहुंचा दो ” मैंने कहा
Dsp- फ़िक्र मत कर इसकी , इसके लिए शहर जला दिया तूने किसकी मजाल जो नजर भी उठा सके
मैं- थाने ले जायेगा क्या
Dsp- गाड़ी में तो बैठ जा मेरे बाप.
मैंने उस लड़की के सर पर हाथ रखा और गाडी में बैठ गया. रस्ते में ठेका आया तो मैंने गाड़ी रुकवा कर बोतल ले ली , कडवा पानी हलक से निचे जाते ही चैन सा आया. आँखे भीग जाना चाहती थी . मैंने सर खिड़की से लगाया और आँखे बंद कर ली .
“कौन है भाई तू ” dsp ने पुछा मुझसे
“कोई नहीं ” मैंने बस इतना ही कहा ..........