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Erotica लल्लू लल्लू न रहा😇😇

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भाग २




दो लड़के तेजी से भाग रहे थे और बहुत तेज तेज चिल्ला रहे थे "गुरु जी गुरु जी"। दोनो के चेहरे के भाव को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कोई भूत देख लिया। चेहरे का रंग फीका और आंखो में दहशत। दोनो बालक एक भागते हुए एक कमरे में प्रवेश करते हैं। वो जिस कक्ष में प्रवेश करते हैं, वहां पर एक साधु किस के चेहरे का तेज देखते ही बनता था।

साधु: क्या हुआ शिष्यों। इतने विचलित क्यों हो। क्या समस्या हैं।

एक बालक: गुरु जी मैं और शंभू समाधि वाले मंदिर की सफाई कर रहे थे की हमने देखा सबसे बड़े गुरुजी की प्रतिमा के आंखो से खून निकल रहा है। इसलिए हम इतने विचलित हैं।

साधु समझ गया, जरूर बड़े गुरुजी को बड़ी अनहोनी की तरफ इशारा कर रहे हैं। उसने वही बैठ के ध्यान लगाया और कुछ २ से ३ मिनट के लिए वातावरण में संपूर्ण शांति और तभी उस साधु का सारा तेज गायब हो गया और माथे पे बल पड़ने लगे और चेहरे पर चिंता की लकीर। तुरंत ही उसने आंखे खोल दी। गुरु की हालत देखकर शिष्यों को मन और विचलित हो गया। जिज्ञासा वश वो फिर से साधु से सवाल करने लगा।

शिष्य: क्या हुआ गुरुजी? आप भी विचलित लग रहे हैं।

साधु: (चेहरे पर भय के भाव) बड़े गुरुजी ने एक बहुत ही शक्तिशाली पिशांच को कैद किया था। आज उसी पिशाच को उसी के वंशज ने आजाद कर दिया। सर्वनाश होगा अब।

शिष्य: तो गुरु जी हमे चल के उस पिशाच को रोकना चाहिए।

साधु: अब वो पिशाच और ताकतवर हो गया है। २०० साल से कैद था। तबाही मचेंगी चारो ओर।

शिष्य: तो गुरु जी हम कुछ नही करेंगे, हाथ पर हाथ धरे तबाही देखेंगे।

साधु: नही हम जायेंगे पर पूरी तैयारी से। समय लगेगा पर तब तक ईश्वर से प्रार्थना भी करेंगे की किसी को अधिक क्षति न पहुंचे। तुम लोग हवन की तैयारी करो।

दोनो शिष्य कमरे से निकलकर हवन की तैयारी में लग गए।

उधर लल्लू के घर पर सुधा की चीख सुन कर माया देवी और रतना भी गुसलखाने में पहुंची किसी का भी ध्यान लल्लू की तरफ नही था वो तो बस सुधा की चीख से चिंतित थी।

माया देवी: क्या हुआ सुधा, ऐसे क्यू चीखी।

सुधा के खड़े होने से माया देवी और रतना को लल्लू नही दिख रहा था और जैसे ही सुधा सामने से हटी दोनो की आंखे बड़ी हो गई। ऐसा लग रहा था की आंखों से गोटी निकल कर बाहर गिर गई हो।


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माया देवी: ये क्या है सुधा।

रतना: दीदी परसो मैने ही लल्लू को नहलाया था तब तो इतना सा था, (उसने हाथ का इशारा किया) पर अब तो हाथ में भी नही आयेगा।

सुधा: कही कोई अंदरूनी चोट की वजह से सूज तो नही गया।

रतना: दीदी ये नदी किनारे मिला कही पानी तो नही भर गया।

माया देवी: कुछ भी रतना, मुझे लगता हैं की सुधा सही बोल रही है। परसो में शहर जाऊंगी तब डॉक्टर को दिखा दूंगी।

तीनों की तीनो हैरत में थी जो भी उन्होंने देखा था। किसी ने भी आज से पहले इतना बड़ा नही देखा था। और गोटों का साइज देख कर तो ऐसा लग रहा था जैसे समस्त संसार का मॉल इनमे बसा हूं। लेकिन इक बात ये भी सत्य थी कि तीनों चोर निगाहों से उसे देख रही थी और तीनों की ही चूत रस छोड रही थी। फडप्फड़ा रही थी तीनो की चूत उस विकराल लन्ड को देख कर।

सुधा: (खुद को संभालते हुए) दीदी सरला को बोल दूंगी कोई अच्छा सा डॉक्टर ढुंढ के रखेगी।

माया देवी: (जैसे होश में आई) पागल हो गई है क्या, एक बहन को उसके भाई के बारे में ऐसा कुछ बताएगी।

सुधा: दीदी डॉक्टर और वकील से कभी भी कुछ नही छुपाना चाहिए।

रतना: हां दीदी छोटी दीदी बिलकुल सही कह रही है। सरला ही कोई अच्छा डॉक्टर बता देगी।

माया देवी: ठीक है, पूछ लेना और हो सके उस दिमाग के डॉक्टर से भी समय ले लेना। अच्छा तू अब इसे नेहला दे और सुन लल्लू पूरा दिन घर पे रहना, कई बाहर मत जाना।

लल्लू हा में सर हिलाता हैं, रतना और माया देवी गुसलखाने से बाहर निकल जाती हैं। तीनों अपनी बातो मे इतनी मशगूल थी कि उन्हे लल्लू के चेहरे की कामिनी हसी नही दिखाई दी।

सुधा किसी तरह अपने आप को संभालते हुए लल्लू को नहलाने लगी। जैसे जैसे उसके हाथ लल्लू के शरीर पर घूम रहे थे वैसे वैसे लल्लू का डंडा सख्त होता जा रहा था। लल्लू के दिमाग में भी कुछ आवाजे चल रही थी।

दिमाग की आवाज: आह कितनी दिनों बाद चूत की महक। बड़ा स्वादिष्ट होगा इसका पानी। कितनी सदियों बाद आज मुझे ये महक नसीब हुई है। वीर प्रताप की मां धन्यवाद तुझे, तूने मुझे वो सुख दिया है जिससे मैं वंचित था सदियों से और इसका इनाम तुझे जरूर मिलेगा।

सुधा भी लल्लू के लोड़े में आए तनाव को महसूस कर थी, वो तिरछी नजरों से बार बार अपने बेटे के हाहाकारी लोड़े को देख रही थी। वर्षो बाद उसकी चूत रस बहाए जा रही थी। चीटियां सी रेंग रही थी उसकी चूत में। वो बार बार अपनी चूत के साड़ी के ऊपर से सहला रही थी लल्लू की नजर से बचा के, पर भोली ये नही जानती थी की लल्लू के जिस्म में एक शक्तिशाली पिशाच है जो उसकी इज्जत तार तार कर देगा। उसे वो सुख देगा जिससे वो अभी तक वंचित थी। जैसे जैसे सुधा के हाथ नीचे बड़ते जा रहें थे लल्लू का लुंड पूर्ण रूप इख्तियार कर रहा था। जैसे ही सुधा कमर तक पहुंची उसकी आंखे वही जम गई। लल्लू का डंडा पूरा तन के खड़ा था।


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वो बस उसे देखे जा रही थी। इतना बड़ा और उसकी कलाई जितना मोटा। उसके मन में तरंगे उठने लगी। वो मन ही मन लल्लू के विशालकायी लन्ड की तुलना अपने गुजरे हुए पति की लुल्ली से करने लगी। पर तुलना हो तो वो करे। लन्ड में इतना तेज तनाव था की वो खुद ब खुद ऊपर नीचे होने लगा, जैसे उठक बैठक कर रहा हूं। लल्लू की आवाज से सुधा होश में आई।

लल्लू: मां बहुत दर्द कर रहा है।

सुधा: (परेशान हो कर) कहा दर्द हो रहा हैं मेरे लाल। कही चोट तो नहीं लगीं लल्ला।

लल्लू: नही मां, इधर पेशाब वाली जगह में दर्द हो रहा हैं।

सुधा: लल्ला पहले नाहले, फिर तेल से मालिश कर दूंगी।

सुधा ने जल्दी जल्दी लल्लू को नहलाया और उसके बदन को तौलिए से सुखाया फिर तेल की कटोरी लेकर लल्लू के शरीर पर लगाने लगी। जैसे ही सुधा लल्लू के लुंड के नजदीक पहुंची, वो आश्चर्यचकित थी कि लन्ड में तनाव अभी तक बरकरार हैं। उसने इतनी देर तक किसी का भी लोड़ा खड़ा नही देखा था। सुधा के लिए अब परीक्षा की घड़ी थी। फिर भी उसने हिम्मत करी और लल्लू के लन्ड की मालिश करने लगी।


cock-and-ball-mas-6557


जैसे ही उसने लल्लू के लुंड की चमड़ी को पीछे खींचा लाल रंग का सुपाड़ा सुधा की आंखों के सामने आ गया। एक मीडियम आलू के बराबर का सुपाड़ा सुधा की आंखों के सामने था। सुधा अपनी पलके झपकना भूल गई थी। उसकी चूत बहुत बुरी तरह पानिया गई थी। उसे गीलेपन का एहसास अपनी जांघों पर हो रहा था। चमड़ी पीछे खींचने से लल्लू की आह निकल गई और सुधा उस कामवासना से बाहर आई और खुद को ही कोसने लगी। फिर पूरी ममता के साथ लल्लू के डंडे की मालिश करने लगी। वो आगे पीछे कर उसकी मालिश कर रही थी। कोई देखता तो ऐसा लगता की जैसे कामवासना में लिप्त औरत किसी मर्द को पूर्ण रूप से संतुष्ट करने में लगी हुई है। कोई ममतामई सुधा की स्थिति नही समझेगा।

पिशाच को असीम आनंद की प्राप्ति हो रही थी। ये वो स्पर्श था जिसके लिए वो सदियों से तड़प रहा था। वो तो मंत्रमुग्ध सा सुधा द्वारा किए जाने वाली क्रिया का आनंद उठा रहा था। वो खुद पर नियंत्रण रखने में असमर्थ था। जो उबाल उसके अंदर वर्षो से था वो अब बाहर निकलने को बेहाल था। और वो ही हुआ बांध टूट गया। नदी का बहाव इतना तेज था की सुधा का चेहरा पूरा लल्लू के वीर्य से सन गया।


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इतना गाड़ा वीर्य जो जहा गिरा वही चिपक कर रह गया। सुधा इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। उसके मुंह से सिर्फ इतना ही निकला

सुधा: ये क्या किया लल्लू।




Awesome update👌👌.
 

park

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भाग २




दो लड़के तेजी से भाग रहे थे और बहुत तेज तेज चिल्ला रहे थे "गुरु जी गुरु जी"। दोनो के चेहरे के भाव को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कोई भूत देख लिया। चेहरे का रंग फीका और आंखो में दहशत। दोनो बालक एक भागते हुए एक कमरे में प्रवेश करते हैं। वो जिस कक्ष में प्रवेश करते हैं, वहां पर एक साधु किस के चेहरे का तेज देखते ही बनता था।

साधु: क्या हुआ शिष्यों। इतने विचलित क्यों हो। क्या समस्या हैं।

एक बालक: गुरु जी मैं और शंभू समाधि वाले मंदिर की सफाई कर रहे थे की हमने देखा सबसे बड़े गुरुजी की प्रतिमा के आंखो से खून निकल रहा है। इसलिए हम इतने विचलित हैं।

साधु समझ गया, जरूर बड़े गुरुजी को बड़ी अनहोनी की तरफ इशारा कर रहे हैं। उसने वही बैठ के ध्यान लगाया और कुछ २ से ३ मिनट के लिए वातावरण में संपूर्ण शांति और तभी उस साधु का सारा तेज गायब हो गया और माथे पे बल पड़ने लगे और चेहरे पर चिंता की लकीर। तुरंत ही उसने आंखे खोल दी। गुरु की हालत देखकर शिष्यों को मन और विचलित हो गया। जिज्ञासा वश वो फिर से साधु से सवाल करने लगा।

शिष्य: क्या हुआ गुरुजी? आप भी विचलित लग रहे हैं।

साधु: (चेहरे पर भय के भाव) बड़े गुरुजी ने एक बहुत ही शक्तिशाली पिशांच को कैद किया था। आज उसी पिशाच को उसी के वंशज ने आजाद कर दिया। सर्वनाश होगा अब।

शिष्य: तो गुरु जी हमे चल के उस पिशाच को रोकना चाहिए।

साधु: अब वो पिशाच और ताकतवर हो गया है। २०० साल से कैद था। तबाही मचेंगी चारो ओर।

शिष्य: तो गुरु जी हम कुछ नही करेंगे, हाथ पर हाथ धरे तबाही देखेंगे।

साधु: नही हम जायेंगे पर पूरी तैयारी से। समय लगेगा पर तब तक ईश्वर से प्रार्थना भी करेंगे की किसी को अधिक क्षति न पहुंचे। तुम लोग हवन की तैयारी करो।

दोनो शिष्य कमरे से निकलकर हवन की तैयारी में लग गए।

उधर लल्लू के घर पर सुधा की चीख सुन कर माया देवी और रतना भी गुसलखाने में पहुंची किसी का भी ध्यान लल्लू की तरफ नही था वो तो बस सुधा की चीख से चिंतित थी।

माया देवी: क्या हुआ सुधा, ऐसे क्यू चीखी।

सुधा के खड़े होने से माया देवी और रतना को लल्लू नही दिख रहा था और जैसे ही सुधा सामने से हटी दोनो की आंखे बड़ी हो गई। ऐसा लग रहा था की आंखों से गोटी निकल कर बाहर गिर गई हो।


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माया देवी: ये क्या है सुधा।

रतना: दीदी परसो मैने ही लल्लू को नहलाया था तब तो इतना सा था, (उसने हाथ का इशारा किया) पर अब तो हाथ में भी नही आयेगा।

सुधा: कही कोई अंदरूनी चोट की वजह से सूज तो नही गया।

रतना: दीदी ये नदी किनारे मिला कही पानी तो नही भर गया।

माया देवी: कुछ भी रतना, मुझे लगता हैं की सुधा सही बोल रही है। परसो में शहर जाऊंगी तब डॉक्टर को दिखा दूंगी।

तीनों की तीनो हैरत में थी जो भी उन्होंने देखा था। किसी ने भी आज से पहले इतना बड़ा नही देखा था। और गोटों का साइज देख कर तो ऐसा लग रहा था जैसे समस्त संसार का मॉल इनमे बसा हूं। लेकिन इक बात ये भी सत्य थी कि तीनों चोर निगाहों से उसे देख रही थी और तीनों की ही चूत रस छोड रही थी। फडप्फड़ा रही थी तीनो की चूत उस विकराल लन्ड को देख कर।

सुधा: (खुद को संभालते हुए) दीदी सरला को बोल दूंगी कोई अच्छा सा डॉक्टर ढुंढ के रखेगी।

माया देवी: (जैसे होश में आई) पागल हो गई है क्या, एक बहन को उसके भाई के बारे में ऐसा कुछ बताएगी।

सुधा: दीदी डॉक्टर और वकील से कभी भी कुछ नही छुपाना चाहिए।

रतना: हां दीदी छोटी दीदी बिलकुल सही कह रही है। सरला ही कोई अच्छा डॉक्टर बता देगी।

माया देवी: ठीक है, पूछ लेना और हो सके उस दिमाग के डॉक्टर से भी समय ले लेना। अच्छा तू अब इसे नेहला दे और सुन लल्लू पूरा दिन घर पे रहना, कई बाहर मत जाना।

लल्लू हा में सर हिलाता हैं, रतना और माया देवी गुसलखाने से बाहर निकल जाती हैं। तीनों अपनी बातो मे इतनी मशगूल थी कि उन्हे लल्लू के चेहरे की कामिनी हसी नही दिखाई दी।

सुधा किसी तरह अपने आप को संभालते हुए लल्लू को नहलाने लगी। जैसे जैसे उसके हाथ लल्लू के शरीर पर घूम रहे थे वैसे वैसे लल्लू का डंडा सख्त होता जा रहा था। लल्लू के दिमाग में भी कुछ आवाजे चल रही थी।

दिमाग की आवाज: आह कितनी दिनों बाद चूत की महक। बड़ा स्वादिष्ट होगा इसका पानी। कितनी सदियों बाद आज मुझे ये महक नसीब हुई है। वीर प्रताप की मां धन्यवाद तुझे, तूने मुझे वो सुख दिया है जिससे मैं वंचित था सदियों से और इसका इनाम तुझे जरूर मिलेगा।

सुधा भी लल्लू के लोड़े में आए तनाव को महसूस कर थी, वो तिरछी नजरों से बार बार अपने बेटे के हाहाकारी लोड़े को देख रही थी। वर्षो बाद उसकी चूत रस बहाए जा रही थी। चीटियां सी रेंग रही थी उसकी चूत में। वो बार बार अपनी चूत के साड़ी के ऊपर से सहला रही थी लल्लू की नजर से बचा के, पर भोली ये नही जानती थी की लल्लू के जिस्म में एक शक्तिशाली पिशाच है जो उसकी इज्जत तार तार कर देगा। उसे वो सुख देगा जिससे वो अभी तक वंचित थी। जैसे जैसे सुधा के हाथ नीचे बड़ते जा रहें थे लल्लू का लुंड पूर्ण रूप इख्तियार कर रहा था। जैसे ही सुधा कमर तक पहुंची उसकी आंखे वही जम गई। लल्लू का डंडा पूरा तन के खड़ा था।


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वो बस उसे देखे जा रही थी। इतना बड़ा और उसकी कलाई जितना मोटा। उसके मन में तरंगे उठने लगी। वो मन ही मन लल्लू के विशालकायी लन्ड की तुलना अपने गुजरे हुए पति की लुल्ली से करने लगी। पर तुलना हो तो वो करे। लन्ड में इतना तेज तनाव था की वो खुद ब खुद ऊपर नीचे होने लगा, जैसे उठक बैठक कर रहा हूं। लल्लू की आवाज से सुधा होश में आई।

लल्लू: मां बहुत दर्द कर रहा है।

सुधा: (परेशान हो कर) कहा दर्द हो रहा हैं मेरे लाल। कही चोट तो नहीं लगीं लल्ला।

लल्लू: नही मां, इधर पेशाब वाली जगह में दर्द हो रहा हैं।

सुधा: लल्ला पहले नाहले, फिर तेल से मालिश कर दूंगी।

सुधा ने जल्दी जल्दी लल्लू को नहलाया और उसके बदन को तौलिए से सुखाया फिर तेल की कटोरी लेकर लल्लू के शरीर पर लगाने लगी। जैसे ही सुधा लल्लू के लुंड के नजदीक पहुंची, वो आश्चर्यचकित थी कि लन्ड में तनाव अभी तक बरकरार हैं। उसने इतनी देर तक किसी का भी लोड़ा खड़ा नही देखा था। सुधा के लिए अब परीक्षा की घड़ी थी। फिर भी उसने हिम्मत करी और लल्लू के लन्ड की मालिश करने लगी।


cock-and-ball-mas-6557


जैसे ही उसने लल्लू के लुंड की चमड़ी को पीछे खींचा लाल रंग का सुपाड़ा सुधा की आंखों के सामने आ गया। एक मीडियम आलू के बराबर का सुपाड़ा सुधा की आंखों के सामने था। सुधा अपनी पलके झपकना भूल गई थी। उसकी चूत बहुत बुरी तरह पानिया गई थी। उसे गीलेपन का एहसास अपनी जांघों पर हो रहा था। चमड़ी पीछे खींचने से लल्लू की आह निकल गई और सुधा उस कामवासना से बाहर आई और खुद को ही कोसने लगी। फिर पूरी ममता के साथ लल्लू के डंडे की मालिश करने लगी। वो आगे पीछे कर उसकी मालिश कर रही थी। कोई देखता तो ऐसा लगता की जैसे कामवासना में लिप्त औरत किसी मर्द को पूर्ण रूप से संतुष्ट करने में लगी हुई है। कोई ममतामई सुधा की स्थिति नही समझेगा।

पिशाच को असीम आनंद की प्राप्ति हो रही थी। ये वो स्पर्श था जिसके लिए वो सदियों से तड़प रहा था। वो तो मंत्रमुग्ध सा सुधा द्वारा किए जाने वाली क्रिया का आनंद उठा रहा था। वो खुद पर नियंत्रण रखने में असमर्थ था। जो उबाल उसके अंदर वर्षो से था वो अब बाहर निकलने को बेहाल था। और वो ही हुआ बांध टूट गया। नदी का बहाव इतना तेज था की सुधा का चेहरा पूरा लल्लू के वीर्य से सन गया।


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इतना गाड़ा वीर्य जो जहा गिरा वही चिपक कर रह गया। सुधा इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। उसके मुंह से सिर्फ इतना ही निकला

सुधा: ये क्या किया लल्लू।




Nice and superb update.....
 

mitzerotics

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Bahot bdhiya shuruat hui hai kahaani ki.. Lekin agr pishach pr lallu ka control hota toh jyada behtar hota.. Pishach ka kaam sirf lallu ko guide krna hota toh better hota.. Wese kahaani mast lg rhi hai
सही कह रहे हैं। पर कहानी का नायक मंद बुद्धि हैं जो समाज और उसके बनाए हुए नियमो का बोध नहीं हैं। इसलिए पिशाच का नियंत्रण नायक पर और फिर कैसे उसके चरित्र का निर्माण होता हैं। पर आपके सुझाव के लिए शुक्रिया।
 

Kartik kumarr

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सही कह रहे हैं। पर कहानी का नायक मंद बुद्धि हैं जो समाज और उसके बनाए हुए नियमो का बोध नहीं हैं। इसलिए पिशाच का नियंत्रण नायक पर और फिर कैसे उसके चरित्र का निर्माण होता हैं। पर आपके सुझाव के लिए शुक्रिया।
Isliye toh kaha Bhai ki pishach usko sirf guide krta tbhi toh lallu khud ko smjhdaar bnata or samaaj ke samne khud ko khada kr payega... Nhi toh pishach uske body se nikal jayega toh lallu fir se pehle jesa mandh buddhi lallu reh jayega... Wese dhanyawad 👍👍🙂🙂
 
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