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Adultery गुजारिश

SKYESH

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सरोज के बातों से तो शकुंतला भी शक के दायरे में आ गयी और उपर से बाबा, रूपा भी कहानी में भरपूर सस्पेंस बढ़ा रहे हैं

शरीर का नीला पड़ना और सांप से क्या रिश्ता है देव का ?

कहीं देव पिछले जनम में सपेरा और रूपा साँपिन तो नहीं ? :vhappy1:


Nag aur Nagin ki jodi .....
 

Naik

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Shakuntala aur sarla ki kahani n tow dev ko hila ker rakh dia ab kon sach bol raha h kon jhoot yeh sirf dev ko hi pata kerna h baaki dekhte h joona gadh m kia hota h
Bahot shaandaar update bhai
Intizar rehega aapke agle update ka
Thank you
 

Nevil singh

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#23

“तुम्हे क्या चाहिए ” शकुन्तला ने पूछा

मैं- क्या दे सकती हो तुम

शकुन्तला- जो तुम सोच रहे हो वो मुमकिन नहीं

मैं- पर मैंने तो कुछ सोचा ही नहीं

शकुन्तला- कच्ची गोटिया नहीं खेली मैंने छोटे चौधरी, जितनी तुम्हारी उम्र है उस से जायदा साल मुझे चुदते हुए हो गए,

मैं- तो एक बार और चुदने में क्या हर्ज है

शकुन्तला- मैंने कहा न ये मुमकिन नहीं .

अब मैं उसे ये नहीं बताना चाहता था की मैं उतावला हूँ उसे चोदने को और औरत के आगे जितना मर्जी खुशामद करो उतना ही उसके नखरे बढ़ते है , तो मैं बिना उसका जबाब सुने वहां से चल दिया. घर आकर मैंने कपडे बदलने चाहे तो देखा की जिस्म पर गहरे नीले घाव थे, बदन में कही भी कोई दर्द नहीं था पर पुरे सीने, पेट पैरो पर ये नीले निशान थे, ये एक और अजीब बात थी .

मैंने रजाई ओढ़ी और आँखे बंद कर ली, दिमाग में शकुन्तला की कही बाते घूम रही थी ,मेरा उस सर्प से क्या रिश्ता था , और सबसे बड़ी बात शकुन्तला समझ गयी थी की मैं उसकी चूत लेना चाहता था , मेरे परिवार के इतिहास में कुछ तो ऐसे राज़ दफन थे , जिन पर समय की धुल जम चुकी थी मुझे कुछ भी करके उस धुल को साफ़ करना था .



जो भी था या नहीं था , फिलहाल इतना जरुर था की मैंने एक सपना देखा था , उस सपने में एक खेत था सरसों का लहलहाता और आंचल लहराती रूपा , मैं खेत के डोले पर बैठे उसे देख रहा था , पीली सरसों में नीला सूट पहने रूपा बाहें फैलाये मुझे अपनी तरफ बुला रही थी , मैं बस रूपा के साथ जीना चाहता था . मेरे अकेलेपन को अगर कोई भर सकती थी वो थी रूपा.

और किस्मत देखो , मैं भी जूनागढ़ जा रहा था जहाँ वो भी गयी हुई थी . रूपा का ख्याल आते ही होंठो पर एक ऐसी मुस्कान आ गयी जिसे बस आशिक लोग ही समझ सकते है . मैं उठा और खिड़की खोली, बिजली आ रही थी, डेक चलाया और गाने लगा दिए. दिल न जाने क्यों झूम रहा था .

शाम को मैं सरोज काकी के घर गया तो सबसे पहले वो चाय ले आई.

सरोज- पुरे दिन सेआये नहीं खाना भी नहीं खाया.

मैं- भूख -प्यास अब लगती नहीं मुझे

काकी- वो क्यों भला.

मैं- क्या मालूम

काकी- तो किस चीज की चाह है

मैं- मालूम नहीं , दिल ही जाने

काकी- अच्छा तो बात दिलो तक पहुँच गयी , मुझे बताओ कौन है वो , मैं करती हु तुम्हारे चाचा से बात , मैं भी थक जाती हु घर के कामो में कोई आएगी तो मेरा हाथ भी हल्का रहेगा.

मैं- बड़ी दूर तक पहुंच गयी काकी, ऐसा भी कुछ नहीं है वो तो मैं बस यु ही फिरकी ले रहा था .

काकी- मुझसे झूठ नहीं बोल पाओगे, ये जो चेहरे पर गुलाबी रंगत आई है समझती हु मैं .

मैंने चाय का कप निचे रखा और सरोज के पास जाकर बोला- इस रंगत का कारण तुम हो . जब से तुम्हे देखा है , तुम्हे पाया है एक नयी दुनिया देखि है,

मैंने सरोज की चूची पर हाथ रखा और उसे दबाने लगा.

सरोज- अभी नहीं , करतार बस दूकान तक गया है आता ही होगा. जल्दी ही करती हु तुम्हारे लिए कुछ .

मैं- ठीक है .

सरोज- क्या ख़ाक ठीक है , घर पर रहोगे जब कुछ होगा न, मै देना भी चाहू तो तुम रहते ही नहीं , पहले तो केवल रातो में गुम रहते थे अब दिन में भी गायब . क्या करू मैं तुम्हारा.

मैं- कभी कभी बस हो जाता है .

काकी- खैर, तुम कल दरजी के पास हो आओ, शादी के लिए नए कपडे सिलवा लो

मैं- मैं नहीं जा रहा शादी में

काकी- क्यों देव, ये अच्छा मौका है परिवार से जुड़ने का .

मैं- दरअसल मुझे कही और जाना है और समय पर लौट आया तो पक्का जाऊंगा.

काकी- कहाँ जाना है तुम्हे

मैं- बस यही शहर में

काकी- मुझे बताओ पूरी बात

मैं- कालेज में एक दोस्त बना है बस उसके साथ ही थोडा घुमने जा रहा हु मैं

काकी- जो करना है वो करना ही है तुम्हे , मेरी फ़िक्र क्या मायने रखती है तुम्हारे लिए ,

मैं- इसीलिए तो कह रहा हूँ बस दो चार रोज में आ जाऊंगा वापिस.

काकी- मैं जाने से नहीं रोक रही बस ये पूछ रही हूँ की जा कहाँ रहे हो .

मैं- बताया न दोस्त के साथ उसके गाँव वाले घर पर .

काकी- तुम लाख झूठ बोल लो पर जितना मैं तुम्हे जानती हूँ तुम्हारे हर झूठ को पकड़ ही लुंगी

मैं- सो तो है मेरी सरकार , पर मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ

काकी- बेशक

मैं- क्या कोई सांप मुझे यहाँ छोड़ कर गया था बचपन में

मेरी बात सुनकर सरोज के चेहरे के भाव बदल गए .

“किसने कहा तुमसे ऐसा ” सरोज काकी गुस्से से बोली

मैं- किसी ने नहीं बस मुझे मालूम हो गया .

“मैं जानती हूँ कौन लगा रही है ये आग, जरुर ये लाला की रांड ने तुम्हे कहा होगा. उसके सिवा कोई नहीं करेगा ऐसा, उस हरामजादी की चोटी उखाड़ दूंगी मैं तू देखना ” सरोज का पारा आसमान पर चढ़ गया था .

मैं- तो ये सच बात है .

काकी- देव मेरे बच्चे, तू समझने की कोशिश कर दुनिया वैसी नहीं है जैसी तुम समझते हो . , तू वादा कर उस रांड से दूर रहेगा, उसकी किसी भी बात पर विश्वास नहीं करेगा.

मैं- आप कहती हो तो नहीं करूँगा, पर शकुन्तला ने सच ही तो कहा .

काकी- कुछ नहीं पता उस चूतिया की बच्ची को . वो सांप बस इत्तेफाक से वहां पर था जब तुम्हारे दादा को तुम मिले थे .

मैं- और दादा को भी उसी ने मारा था .

काकी- हे भगबान क्या क्या सुन आये हो तुम

मैं- अभी तो तुमसे ही सुनना चाहता हूँ

काकी- तुम्हारे दादा को तुम कभी पसंद नहीं थे,वो तुम्हे तुम्हारे पिता का हत्यारा मानते थे .......

काकी के शब्दों ने बहुत गहरी चोट की थी मुझ पर

“मुझे, मुझे तो याद भी नहीं की मेरे माता-पिता कौन थे , कैसे दीखते थे फिर मैं कैसे ” मैंने कहा

काकी- मैं कहाँ ऐसा कह रही हूँ बस तुम्हारे दादा की सोच थी ये . क्योंकि तुम्हारे जन्म के कुछ महीनो बाद ही उनकी हत्या हो गयी थी , और आज तक कातिल का कोई पता नहीं मिला.


“क्या मेरी माँ जूनागढ़ की थी ” मैंने पूछा ......
Kuch bhule hue apno ka pata mila v priye se milne ki tadaf dil me tufan la gai.Aur Shaku ka yun mana karna milan ke liye kuch toh kahta hai v Saroj ka ushse dur rahne ke liye Musafir ko kahna bahut kuch bayan karta hai. Aur apne dada ki najar me swaym ko apne pita ka katil samjhna kisi galatfahmi ko janm de raha hai. Musafir ke safar ki ek choty si padyatra ki kahani sach me bheeni-bheeni khushbu bikher rahi hai.
 

Iron Man

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HalfbludPrince

मैं बादल हूं आवारा
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#24

“अब कोई फर्क नहीं पड़ता है की सुहासिनी कहाँ की थी , अब वो नहीं है न ” सरोज काकी ने कहा

मैं- फर्क पड़ता है बहुत फर्क पड़ता है मैं अपनी माँ के बारे में जानना चाहता हूँ , कभी उसे देख तो नहीं पाया पर उसकी यादो को महूसस करना चाहता हु

“यादे तुम्हे कुछ नहीं देंगी सिवाय दर्द के , रुसवाई के सुहासिनी कभी नहीं चाहती की तुम्हे अतीत मालूम हो ” सरोज ने कहा

मैं- ऐसा क्या था अतीत में , जिसने मेरे आज को बदल दिया .

सरोज- मैं नहीं जानती , क्योंकि वो दोनों गाँव छोड़कर चले गए थे , फिर कभी नहीं लौटे, अगर कुछ लौटा तो वो तुम थे , उनकी एकमात्र निशानी , वो तुम थे जिसे अभिशप्त समझा जाता है , वो तुम थे जिसे सबने ठुकरा दिया .

सरोज की बातो ने मेरे दिल को और दुखा दिया पर वो भी वही सब बोल रही थी जो श्याद हुआ होगा.

“तो मैं जाऊ अपने दोस्त के साथ घुमने , दो चार रोज में लौट आऊंगा ” मैंने फिर से कहा

सरोज- ठीक है , पर ऐसा वैसा कुछ न करना जिससे तुम्हे परेशानी हो



मैंने हाँ में सर हिला दिया और वापिस आ गया . मैंने कुछ जोड़ी कपड़े बैग में रख लिए, रूपये रखे और किसी चीज की मुझे जरुरत नहीं थी . बस इंतज़ार था सुबह का जब मन जूनागढ़ जाने वाला था . पूरी रात मैं खूब सोया बाबा के पास भी नहीं गया , सुबह सुबह ही मैं वहां पहुँच गया जहाँ मोना गाड़ी भेजने वाली थी , ठण्ड की सुबह पूरी धुंध से भरी थी और तेज चलती हवा, मौसम श्याद आज फिर बिगड़ने वाला था .

वैसे तो जूनागढ़ की दुरी कोई पंद्रह-बीस कोस ही रही होगी पर फिर भी समय लग गया .



जब मैं वहां पहुंचा तो दिन का उजाला ठीक ठाक हो गया था , बड़ा ही सुन्दर गाँव था , सड़क के दोनों तरफ खेत, फिर कुछ इलाका जंगल जैसा और फिर गाँव, जो बड़े पहाड़ो से घिरा था , मैंने देखा गाँव में ज्यादातर मकान अभी भी पुराने ज़माने के थे , बेशक खेतो में किसी जमींदार ने नयी कोठिया बना ली थी पर फिर अंचल ग्रामीण ही था .

गाँव थोडा सा ही शुरू हुआ था की ड्राईवर ने गाड़ी कच्ची सडक पर ले ली .

मैं- गाँव तो उस तरफ रह गया .

ड्राईवर- साहब, इसी तरफ रहती है ,

कच्चे रस्ते पर दोनों तरफ बड़े पेड़ थे, छायादार इलाका था वो , करीब बीस मिनट बाद मैं एक किले जैसी ईमारत के सामने था , पहली नजर में ही मालूम होता था की किसी ज़माने में बड़ी भव्य रही होगी ये इमारत.

“स्वागत है तुम्हारा देव ” मोना ने मुझसे कहा

मैंने सर हिला कर उसका अभिवादन किया , मोना ने साडी पहनी हुई थी बड़ी दिलकश लग रही थी वो , उसकी तारीफ किये बिना रहा नहीं गया मुझसे

“हुजुर, एक तो ये मौसम बेईमान और एक आप , समझ नहीं आता दो दो बिजलिया कैसे कोई बर्दाश्त करे ” मैंने कहा

मोना- तुम भी न , आओ अन्दर चले.

मैंने नौकर से हटने को कहा और मोना की चेयर को धकाते हुए अन्दर आ गया .

“बड़ी अमीर हो तुम ” मैंने साज सज्जा देखते हुए कहा

मोना- अरे कुछ नहीं , बस पुरखो का मकान है

मैं मुस्कुरा दिया . जल्दी ही खाना आ गया .

“मैंने भी सुबह से कुछ नहीं खाया , तुम्हारा ही इंतज़ार था ” कहा उसने .

मैं- शुक्रिया

बेहद लजीज खाने के बाद मैं और मोना बाते करने लगे.

मोना- मुझे उम्मीद है तुम्हे अच्छा लगेगा यहाँ , तुम साथ हो तो मुझे भी अकेलापन नहीं लगेगा.

मैं- गाँव खूबसूरत है देखना चाहूँगा मैं

मोना- क्यों नहीं , शाम को चलते है , मेरा पैर ठीक होता तो और बेहतर होता.

मैं- कोई नहीं मैं हूँ न सँभालने के लिए .

मोना हंस पड़ी .

मैं- तो तुम बड़े घराने से ताल्लुक रखती हो

मोना-अब तुम्हे तो पता है ही .

मैं- बाकि परिवार कहाँ रहता है,

मोना- गाँव वाले नए घर में, एक घर शहर में भी है पर कही भी रहे मुझे क्या लेना देना , मैं तो अलग हु उनसे

मैं- समझता हु .

हम बाते कर ही रहे थे की नौकरानी मोना की दवाई और पैर में लगाने को कोई मलहम ले आई.

मैंने उस से वो सामान लिया और उसे जाने को कहा

मैंने मोना को दवाई दी . और मलहम हाथ में लिया .

मैं- मैं लगा देता हु

मोना- अरे नहीं तुम मेहमान हो हमारे

मैं- मैं सिर्फ दोस्त हूँ और अपने दोस्त के लिए इतना तो करने का हक़ है ही मुझे

मोना ने मुझे बिस्तर पर लेटाने को कहा .

मैं- पैर में तो ये प्लास्टर है मलहम किधर लगाना है फिर

मोना- बुद्धू ही हो तुम , कमर पर और पीठ पर

मैंने मोना को एडजस्ट किया और उसकी पीठ पर मलहम लगाने लगा. मोना ने अपना ब्लाउज खोल दिया मेरे सामने वो बस गुलाबी ब्रा में थी . पर मैंने ध्यान नहीं दिया. मैं बस उसकी पीठ पर मलहम लगाने लगा. मोना का मादक, मुलायम बदन मेरी कठोर उंगलियों की तान पर नाचने लगा.

“आराम मिल रहा है ” पूछा मैंने

मोना- बहुत बेहतर.

कुछ देर बाद मैं उसकी कमर को मसलने लगा. मोना औंधी सी हुई पड़ी थी तो मैंने उसके कुल्हो में होती थिरकन को साफ़ महसूस किया . दिन बड़ी जल्दी बीत गया शाम को हम दोनों गाँव की सैर के लिए निकल पड़े.

वो मुझे गाँव के बाजार ले गयी .

“बर्फिया बड़ी मशुर है यहाँ की ” मोना ने बताया मुझे तो बाबा की बात याद आई .

मैं- मीरा की दूकान पर ले चलो मुझे .

मोना ने हैरानी से देखा मुझे और बोली- मीरा ने बरसो से मिठाई नहीं बनाई है .

मैं- मैंने सुना की मीरा की बर्फिया बड़ी स्वाद है , मिठाई न सही मिल तो सकते है .

मोना- क्यों नहीं

जल्दी ही हम एक पुराणी की झोपडी के सामने थे , आँगन में एक बुढिया बैठी थी .

मोना- यही है मीरा

मैंने देखा मीरा को ७५-८० साल कु बुजुर्ग औरत थी , मैं उसके पास गया

“रामराम माई ”

मीरा ने मेरा अभिवादन स्वीकार किया

मैं- माई बर्फी चाहिए

मीरा- दूकान बंद किये जमाना हुआ बेटा बाजार जा यहाँ कुछ नहीं

मैं- बड़ी तारीफ सुनी है आपकी बनाई बर्फी की

मीरा- मैंने कहा न बाजार जा

मैं- सुहासिनी को तो कभी बाजार नहीं भेजा , उसके लिए तो बहुत चाव से बर्फिया बनाती थी माई तुम

मेरी बात सुनकर मीरा चौंक गयी . और मोना भी

मीरा- तू कैसे जाने है उसे .

मैं- ........................
 

Iron Man

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“अब कोई फर्क नहीं पड़ता है की सुहासिनी कहाँ की थी , अब वो नहीं है न ” सरोज काकी ने कहा

मैं- फर्क पड़ता है बहुत फर्क पड़ता है मैं अपनी माँ के बारे में जानना चाहता हूँ , कभी उसे देख तो नहीं पाया पर उसकी यादो को महूसस करना चाहता हु

“यादे तुम्हे कुछ नहीं देंगी सिवाय दर्द के , रुसवाई के सुहासिनी कभी नहीं चाहती की तुम्हे अतीत मालूम हो ” सरोज ने कहा

मैं- ऐसा क्या था अतीत में , जिसने मेरे आज को बदल दिया .

सरोज- मैं नहीं जानती , क्योंकि वो दोनों गाँव छोड़कर चले गए थे , फिर कभी नहीं लौटे, अगर कुछ लौटा तो वो तुम थे , उनकी एकमात्र निशानी , वो तुम थे जिसे अभिशप्त समझा जाता है , वो तुम थे जिसे सबने ठुकरा दिया .

सरोज की बातो ने मेरे दिल को और दुखा दिया पर वो भी वही सब बोल रही थी जो श्याद हुआ होगा.

“तो मैं जाऊ अपने दोस्त के साथ घुमने , दो चार रोज में लौट आऊंगा ” मैंने फिर से कहा

सरोज- ठीक है , पर ऐसा वैसा कुछ न करना जिससे तुम्हे परेशानी हो



मैंने हाँ में सर हिला दिया और वापिस आ गया . मैंने कुछ जोड़ी कपड़े बैग में रख लिए, रूपये रखे और किसी चीज की मुझे जरुरत नहीं थी . बस इंतज़ार था सुबह का जब मन जूनागढ़ जाने वाला था . पूरी रात मैं खूब सोया बाबा के पास भी नहीं गया , सुबह सुबह ही मैं वहां पहुँच गया जहाँ मोना गाड़ी भेजने वाली थी , ठण्ड की सुबह पूरी धुंध से भरी थी और तेज चलती हवा, मौसम श्याद आज फिर बिगड़ने वाला था .

वैसे तो जूनागढ़ की दुरी कोई पंद्रह-बीस कोस ही रही होगी पर फिर भी समय लग गया .



जब मैं वहां पहुंचा तो दिन का उजाला ठीक ठाक हो गया था , बड़ा ही सुन्दर गाँव था , सड़क के दोनों तरफ खेत, फिर कुछ इलाका जंगल जैसा और फिर गाँव, जो बड़े पहाड़ो से घिरा था , मैंने देखा गाँव में ज्यादातर मकान अभी भी पुराने ज़माने के थे , बेशक खेतो में किसी जमींदार ने नयी कोठिया बना ली थी पर फिर अंचल ग्रामीण ही था .

गाँव थोडा सा ही शुरू हुआ था की ड्राईवर ने गाड़ी कच्ची सडक पर ले ली .

मैं- गाँव तो उस तरफ रह गया .

ड्राईवर- साहब, इसी तरफ रहती है ,

कच्चे रस्ते पर दोनों तरफ बड़े पेड़ थे, छायादार इलाका था वो , करीब बीस मिनट बाद मैं एक किले जैसी ईमारत के सामने था , पहली नजर में ही मालूम होता था की किसी ज़माने में बड़ी भव्य रही होगी ये इमारत.

“स्वागत है तुम्हारा देव ” मोना ने मुझसे कहा

मैंने सर हिला कर उसका अभिवादन किया , मोना ने साडी पहनी हुई थी बड़ी दिलकश लग रही थी वो , उसकी तारीफ किये बिना रहा नहीं गया मुझसे

“हुजुर, एक तो ये मौसम बेईमान और एक आप , समझ नहीं आता दो दो बिजलिया कैसे कोई बर्दाश्त करे ” मैंने कहा

मोना- तुम भी न , आओ अन्दर चले.

मैंने नौकर से हटने को कहा और मोना की चेयर को धकाते हुए अन्दर आ गया .

“बड़ी अमीर हो तुम ” मैंने साज सज्जा देखते हुए कहा

मोना- अरे कुछ नहीं , बस पुरखो का मकान है

मैं मुस्कुरा दिया . जल्दी ही खाना आ गया .

“मैंने भी सुबह से कुछ नहीं खाया , तुम्हारा ही इंतज़ार था ” कहा उसने .

मैं- शुक्रिया

बेहद लजीज खाने के बाद मैं और मोना बाते करने लगे.

मोना- मुझे उम्मीद है तुम्हे अच्छा लगेगा यहाँ , तुम साथ हो तो मुझे भी अकेलापन नहीं लगेगा.

मैं- गाँव खूबसूरत है देखना चाहूँगा मैं

मोना- क्यों नहीं , शाम को चलते है , मेरा पैर ठीक होता तो और बेहतर होता.

मैं- कोई नहीं मैं हूँ न सँभालने के लिए .

मोना हंस पड़ी .

मैं- तो तुम बड़े घराने से ताल्लुक रखती हो

मोना-अब तुम्हे तो पता है ही .

मैं- बाकि परिवार कहाँ रहता है,

मोना- गाँव वाले नए घर में, एक घर शहर में भी है पर कही भी रहे मुझे क्या लेना देना , मैं तो अलग हु उनसे

मैं- समझता हु .

हम बाते कर ही रहे थे की नौकरानी मोना की दवाई और पैर में लगाने को कोई मलहम ले आई.

मैंने उस से वो सामान लिया और उसे जाने को कहा

मैंने मोना को दवाई दी . और मलहम हाथ में लिया .

मैं- मैं लगा देता हु

मोना- अरे नहीं तुम मेहमान हो हमारे

मैं- मैं सिर्फ दोस्त हूँ और अपने दोस्त के लिए इतना तो करने का हक़ है ही मुझे

मोना ने मुझे बिस्तर पर लेटाने को कहा .

मैं- पैर में तो ये प्लास्टर है मलहम किधर लगाना है फिर

मोना- बुद्धू ही हो तुम , कमर पर और पीठ पर

मैंने मोना को एडजस्ट किया और उसकी पीठ पर मलहम लगाने लगा. मोना ने अपना ब्लाउज खोल दिया मेरे सामने वो बस गुलाबी ब्रा में थी . पर मैंने ध्यान नहीं दिया. मैं बस उसकी पीठ पर मलहम लगाने लगा. मोना का मादक, मुलायम बदन मेरी कठोर उंगलियों की तान पर नाचने लगा.

“आराम मिल रहा है ” पूछा मैंने

मोना- बहुत बेहतर.

कुछ देर बाद मैं उसकी कमर को मसलने लगा. मोना औंधी सी हुई पड़ी थी तो मैंने उसके कुल्हो में होती थिरकन को साफ़ महसूस किया . दिन बड़ी जल्दी बीत गया शाम को हम दोनों गाँव की सैर के लिए निकल पड़े.

वो मुझे गाँव के बाजार ले गयी .

“बर्फिया बड़ी मशुर है यहाँ की ” मोना ने बताया मुझे तो बाबा की बात याद आई .

मैं- मीरा की दूकान पर ले चलो मुझे .

मोना ने हैरानी से देखा मुझे और बोली- मीरा ने बरसो से मिठाई नहीं बनाई है .

मैं- मैंने सुना की मीरा की बर्फिया बड़ी स्वाद है , मिठाई न सही मिल तो सकते है .

मोना- क्यों नहीं

जल्दी ही हम एक पुराणी की झोपडी के सामने थे , आँगन में एक बुढिया बैठी थी .

मोना- यही है मीरा

मैंने देखा मीरा को ७५-८० साल कु बुजुर्ग औरत थी , मैं उसके पास गया

“रामराम माई ”

मीरा ने मेरा अभिवादन स्वीकार किया

मैं- माई बर्फी चाहिए

मीरा- दूकान बंद किये जमाना हुआ बेटा बाजार जा यहाँ कुछ नहीं

मैं- बड़ी तारीफ सुनी है आपकी बनाई बर्फी की

मीरा- मैंने कहा न बाजार जा

मैं- सुहासिनी को तो कभी बाजार नहीं भेजा , उसके लिए तो बहुत चाव से बर्फिया बनाती थी माई तुम

मेरी बात सुनकर मीरा चौंक गयी . और मोना भी

मीरा- तू कैसे जाने है उसे .


मैं- ........................
:reading:
 

Studxyz

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वाह भाई बहुत बढ़िया अब आया है देव असली ठिकाने पर जहाँ उसको खुद की असली पहचान पता लगेगी मीरा से भी बहुत जानकारी मिलेगी

मोड़ा डार्लिंग भी मदद कर सकती है लेकिन चुदाई नहीं होगी पैर का पलस्तर जो नहीं उतरा है

देव के लिए एक झकास जीवन की शुरुआत है
 
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