अध्याय 15
ठण्ड अब बढ़ने लगी थीं रात और भी गहरे हो चले थे हर गांव की तरह हमारा गांव भी आराम कर रहा था हर तरफ सन्नाटा था जानवर भी अपने जगह सोये थे गाड़ियों की आवाज़ बंद थीं,
हल्की ठंडी हवा सुबह के 4 बजे की शांति को चिर रही थीं किसी के चप्पलो की आवाज़ चप चप आ रही थीं, सॉल ओढे वो दोनों इंसान कितना भी धीरे चले उनके चप्पल बता रहे थे वो कही जल्दी जल्दी चल रहे थे,
"भाई मैं आधे रास्ते ही जाऊंगा उसके आगे तुम खुद चले जाना मैंने बोला रुक जा सुबह चले जाना पर तू मानता ही नहीं" एक की आवाज़ धीरे से आयी
"मुझे थोड़े पता था भाई रमा गाडी ऐसे धोखा दे देगी और तेरे कहने पर ही मैं तेरे घर से यहाँ उसको लेके आया था वरना मैं तो पैदल ही चलने कह रहा था" अगले ने जवाब दिया
"छोड़ अब वो सब कल कार्यक्रम के बाद खेत वाले झोपडी मे रुक कर उसके साथ मज़ा करने का फैसला सही रहा या नहीं तू बता" रमा ने कहा
"साले नशा के साथ ये वाला नशा करना तो पूछ ही मत, क्या ही कड़क था पहली बार ये नशा मैंने चखा है" साथी ने जवाब मे कहा
"पर मानना पड़ेगा तेरा लेने का तरीका कुछ अलग ही था, बहुत दिनों का सपना हमारा साथ मे मज़ा करने का पूरा हो गया" रमा ने उसको उकसाते हुए बोला
"यार कल नशे मे मज़ा तो किया हमने पर कही ना कही घर वालो को ऐसे धोखे मे रखना मुझे सही नहीं लग रहा" दूसरे आदमी ने कहा
"साले ज्यादा सोचना बंद कर अब जब हमने उसको बजा दिया फिर क्या सोचना और वैसे भी उसका जुगाड़ मैंने बाहर वाला ही किया था" रमा ने समझाते हुए बोला
"सही कह रहा यार जो मज़ा बाहर की माल की लेने मे है वो मज़ा अंदर की माल मे कहा और तुझे कैसे पता वो बाहर की माल है" पहले आदमी ने पूछा
"क्युकी ये मेरे घर के कार्यक्रम मे जो आयी थीं" रमा ने मुस्कुराते हुए बोला
"इसका मतलब तेरा पहले से इसके साथ कुछ लफड़ा था सही कहा ना मैंने" पहले आदमी ने कहा
"हा मैंने तो उसकी कई बार लिया है यहाँ भी और उसके गांव मे भी क्यों की अब मैं तुझे वो बताने वाला हूँ जिसपे शायद तू यकीन ना करें" रमा ने कहा
"ऐसा कोनसा बात है जिसपे मुझे यकीन नहीं होगा" पहले आदमी ने जिज्ञासा वस पूछा
"क्यों की वो मेरी सगी सासु मा थीं" थोड़ा रुक कर रमा ने जवाब दिया
ये सुनना पहले आदमी के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था ऐसे रिश्ते के लिए सोचना भी उसके लिए नामुमकिन था जिसे सभी के सामने बताना भी अपराध माना जा सकता है,
"भाई मज़ाक की बात नहीं है तू सच कह रहा ना" पहले आदमी ने कहा
"मैं तुझे अपना खास मित्र मानता हूँ इसलिए ये बात बताई है और ये बिलकुल सच है" रमा ने जवाब देते हुए कहा
"तभी मैं सोचु वो इतने अच्छे से तेरे साथ कैसे बातो का मजे ले रही थीं सही है भाई तूने तो एक अलग ही दुनिया दिखा दी मुझे" पहले आदमी ने उसका साथ देते हुए कहा
"चल फिर कभी मौका बनेगा तो तुझे और भी नया मज़ा दिलाने की कोशिश रहेगी मेरी और ले सामने तेरा घर भी आ गया" दोनों मित्र विदा लेते हुए सुन तेरी गाडी अपने लड़के से बोल के घर भिजवा दूंगा उसके लिए बेफिक्र रहना" रमा उससे अलविदा लेके एक कुटिल मुस्कुराहट के साथ अपने घर की ओर निकाल पड़ा
रमा के मन की सोच "तुझे क्या लगता है मैंने अपने सास को तेरे साथ ऐसे थोड़े चुदवा दिया, मुझे तो तेरी बीवी चंचल भाभी की ग़दराई जवानी को चखना है"
जी हा दोस्तों ये आदमी रमा का दोस्त हमारे रमेश चंद जी के बड़े बेटे पंकज थे जिन्होंने रात को कार्यक्रम के बाद अपने मित्र के साथ मिलकर दोनों ने उसकी सास की जबरदस्त चुदाई की थीं ये पहली बार था जब पंकज ने अपनी बीवी के अलावा किसी दूसरी औरत की चुदाई की थीं वो भी नशे मे जिसका पंकज ने भरपूर मज़ा लिया था,
पंकज के कदम घर के बाहर सुबह सुबह ही पड़ चुके थे सभी घर के अंदर सो रहे थे घर अंदर से बंद था उसने दरवाजा खोलने के लिए सीधे अपने बीवी को फोन मिलाया पर दो तीन बार लगाने के बाद भी उसने नहीं उठाया,
पंकज ने फिर अगला फ़ोन अपने पिता जी रमेश को लगाया दो बार के बाद उसने फ़ोन उठाया और आके दरवाजा खोल गए,
पंकज सीधे अपने कमरे की तरफ पहुंच चूका था पर वहा भी उसे दरवाजा बंद मिला उसने थोड़े देर सोचने के बाद वही सोफे मे लेट गया,
लगभग आधे घंटे के बाद उसे किसी की दरवाजा खोलने की आहाट ने जगा दिया 5 बज चुके थे ये लेखा थीं जो नाईटी पहने बाहर आयी,
लेखा को सोफे पर लेटे पंकज नहीं दिखे, उसके हिसाब से इतने सुबह किसी के जागने का सवाल ही नहीं था, वो बाहर बने शौच की तरफ जाने के लिए मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ रही थीं,
यहाँ सोफे पर लेटे पंकज ने धुंधली आँखों से लेखा को देखा, जिसे देखते ही उसके ख्याल ने किसी नये सोच को सामने ला दिया उसने चलते हुए लेखा के शरीर को बड़े गौर से देखा फिर उसे रमा की बात याद आयी "उसने अपनी सगी सासु मा के साथ कई बार चुदाई की है जो उसके परिवार की हिस्सा थीं"
पंकज को लेखा के शरीर की बनावट भाने लगा था उसकी नजर चलते हुए लेखा के स्तन और गांड पर पड़ी जो लगभग उसके बीवी चंचल की ही तरह थीं,
पर फिर अचानक पंकज के ख्यालो मे वही सामाजिक रिश्ते सामने आ गए और वहा से नजर हटा के पहले की तरफ लेट गया,
10 मिनट बाद फिर किसी की आहट ने पंकज की आराम मे बाधा डाली उसने फिर नजर उठा के देखा तो इस बार उसकी पत्नी चंचल थीं वो तुरंत उठ खड़ा हुआ,
चंचल जो नाईटी मे थीं बाल को बांधते हुए बाहर आ रही थीं उसने सामने खड़े अपने पति को देखा और उसकी तरफ जाने लगी पंकज भी उसकी तरफ जाने लगा,
चंचल "आप इतनी सुबह आ गए मुझे लगा आप और देरी से आएंगे"
पंकज "नींद खुली तो आ गया" और अपनी पत्नी को वही बाहों मे पकड़ लिया
चंचल उसको अलग करते हुए "अजी छोड़िये क्या सुबह सुबह ये सब करने लगे कोई जग के आ गया तो"
पंकज "इतनी सुबह कोई उठा ही नहीं तो कैसे देख लेगा बापू जी जगे थे वो भी सो गए"
चंचल अलग होके गरम पानी पिने रसोई की तरफ चल पड़ी पीछे पीछे पंकज भी चल पड़ा,
जैसे ही चंचल ने पानी गरम करने स्टोव मे लगाया पंकज ने पीछे से फिर पकड़ लिया और हाथो से सीधे नाइटी के ऊपर से उसके चूचो पर धावा बोल दिया,
थोड़ी देर तो चंचल ने किसी के देखे जाने के डर से ना नुकर करती रही पर कल रात की तपिश ने जो उसकी चूत को अब तक गिला कर रखी थीं अपने पति के चूचो के मर्दन से साथ देने लगी,
पंकज भी रात की घनघोर चुदाई और रमा की बातो को याद कर अब फिर उसका मन लंड को शांत करना चाह रहा था जिसका सबसे अच्छा रास्ता उसकी पत्नी की चूत थीं,
चंचल "आह आराम से जी क्या कर रहे यहाँ किसी की नजर पड़ गयी तो क्या सोचेगा कोई"
पंकज "उम्म उम्म ये तुम्हारे बड़े गोल सख्त चूचे क्या बताऊ सिस्स्स्स मुझे किसी का डर नहीं"
पंकज के हाथ अब और भी जोरदार तरीके से चंचल के चूचो को दबा रहे थे चंचल बस आह उंह की आवाज़ ही निकाल पा रही थीं उसकी चूत मे गिलापन साफ आने लगा था वो अपने सुडोल जांघो को चिपकाने लगी,
लेखा बाहर से अब घर के अंदर आने वाली थीं उसने जैसे ही अपने कदम दरवाजे से अंदर रखे, रसोई से आ रही आवाज़ ने उसका ध्यान खींचा, उसने बगल मे खड़े होकर पहले तो आसपास का जायजा लिया फिर मन मे सोची इतनी सुबह रसोई मे ऐसे आवाज़ के साथ कौन हो सकता है,
थोड़ा आगे बढकर उसने चुपके से देखा तो हैरान रह गयी उसके जेठ जी अपनी पत्नी चंचल के चुच्चों को बेरहमी से मसल रहे थे वो थोड़ी देर वही खड़ी रहके दोनों को देखने की सोची,
यहाँ पंकज बिना जाने की उन्हें कोई देख रहा सामने से, अपनी पत्नी के होठो को चूमते हुए नंगे चुच्चों को दबा रहा था और उसका साथ देते हुए उसकी पत्नी उसके लंड को बाहर निकाल रही थीं,
लेखा का ध्यान बिना पलके झपकाये अब भी दोनों की हरकतो पर थीं जब से उसका पति घूमने गया है लंड से वंचित लेखा को अब अंदर से गर्माहट होने लगी,
उसने देखा अब सामने चंचल अपने पति के लंड को बाहर निकाल निचे बैठ रही है, जिससे लेखा को अब अपने जेठ जी का लंड साफ साफ दिखाई दे रहा था उसने कुछ दिनों मे कई लंड देख चुकी थीं जिससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा फिर भी उसने मन मे सोचा "जेठ जी का लंड तो बाकियो की तरह कितना मोटा और लम्बा है"
फिर अचानक मन मे "हे भगवान ये मैं क्या क्या सोचने लग गयी हूँ क्यों मेरे साथ ये सब हो रहा जब से मेरे पति बाहर घूमने गए है मुझे क्यों हर जगह नये लंड ही दिख रही है"
"पहले अनि का फिर कमल का अब जेठ जी का, मैं क्या करू कितना भी विरोध करू खुद को रोक नहीं पा रही हूँ" फिर सामने का नजारा देखने लगी,
चंचल बड़ी चाव के साथ पंकज के लंड को मुँह मे ले रही थीं कभी लंड के टोपे को होठो मे रख अंदर से जीभ से उसे चाटती तो कभी उसे पूरा गले तक अंदर ले जाती,
पंकज की आंखे बंद चेहरा ऊपर अपनी पत्नी की लंड चूसाई का मज़ा लेटे हुए "आह मैं तुम्हारे इसी अदा पर तो फ़िदा हूँ जब भी लंड मुँह मे लेती तो मुझे जन्नत दिखा देती हो, आह हा ऐसे ही और अंदर पूरा अंदर तक लो मेरी जान",
रसोई से आ रही गुगुगू चपड़ चपड़ की आवाज़ और उनकी बातो से लेखा भी यहाँ उत्तेजित होने लगी, अपने शरीर को मरोड़ते कसमसाते हुए दोनों को देख रही थीं,
पंकज ने चंचल को उसी हाल मे उठा के सीधे रसोई के पाठ मे बैठा दिया और उसकी टांगो को फैला के सीधे अपने गीले लंड को चंचल की रस से भारी बज्बजाति चूत मे घुसेड़ दिया, वहां एक हल्की सी आह्ह गुंजी,
लेखा के सब्र का बात बांध टुटा वो छिपते हुए सीधे अपने कमरे ने चली गयी और वहा से बाथरूम मे पहुंच नाईटी को कमर तक उठा के दो ऊँगली चूत मे डाल दी,
रसोई मे सब चीज से बेखबर पंकज चंचल की चूत बजाने मे लगा था
चंचल "आह्ह माँ अजी थोड़ा और जोर से चोदो ना"
पंकज दोनों टांगो को हाथ मे लिए "आह्ह मेरी जान ले फिर पूरा लंड ले ले और मज़ा चाहिए"
चंचल "हा जी आह्ह बहुत मज़ा आ रहा है ऐसे ही डालिये अपने मोटे लंड को मेरी चूत मे कल रात बहुत पानी बहाया है इसने आपके लंड के बिना"
चंचल पति के लंड को लेने के साथ साथ कल रात नये दिखे दो लंड को भी याद कर रही थीं उनकी मोटाई और लम्बाई का ख्याल उसे एक अलग ही चेतना दे रही थीं,
पंकज ने चंचल को उल्टा किया और अब पीछे से चंचल की चूत मारने लगा साथ ही उसकी गांड को भी दबा रहा था,
पंकज "आहह ये तेरी बड़ी नरम गांड जब भी मेरा लंड तेरी चूत मे जा रहा बड़े मजे से हिल रहा है"
चंचल "आह्ह मेरी चूत कितना अच्छा लग रहा जी करते रहिये ऐसे ही और तेज आह्ह माँ मर गयी मैं"
पंकज ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी अब उसके झटके घातक हो चुके थे पूरा रसोई उनकी चुदाई की आवाज़ थप थप से गूंज रहा था वो तो अच्छा था बाकी लोग अभी सो ही रहे थे लेखा और इनको छोड़,
चंचल ने चूत को पीछे से अंदर बाहर होते लंड को सामने से छुआ तो उसकी हथेली चुतरस और लंड के रस से गीली को गयी जिसे उसने सीधा अपनी मुँह की ओर बढ़ा दिया और उसे चाट गयी,
चंचल "आह्ह आह्ह और तेज और जोर से आह्ह मेरा होने वाला है और तेज करिये ना जी" चंचल ने अपनी चूत के छल्ले को पंकज के लंड पे और कस लिया,
पंकज इस कसावट से खुद को रोक नहीं पाया और तेजी के साथ उसने चंचल की चूत मे एक के बाद एक तेज धार छोड़ने लगा पति की लंड से निकली तेज धार की गति को चंचल भी सह नहीं पायी और काम्पते पैर के साथ लगातार चूत से रस छोड़ने लगी,
यहाँ दोनों का झड़ना हुआ और वहा बाथरूम मे लेखा भी इन दोनों की चुदाई की कल्पना कर झड़ चुकी थीं और बाथरूम मे शांति से निचे बैठ आँख बंद किये साँसो को आराम से दे रही थीं,
चंचल थक के रसोई के पाठ मे झुकी पड़ी थीं वही पंकज भी झड़ के पीछे चंचल के ऊपर ही पड़ा था, चुदाई का तूफान शांत हो चूका था, 5 मिनट सुस्ताने के बाद दोनों ने अपने अपने कपडे ठीक किये और अपने कमरे मे चल दिए,
आज के लिए इतना ही मिलते है अगले अध्याय मे,
अपनी प्रतिक्रिया अवश्य बताये अगला अध्याय आधी हो चुकी है,
मेरे लिए ज्यादा प्रतिक्रिया ज्यादा उत्साह वर्धन है धन्यवाद 