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Incest आखिरी ख़्वाहिश (मां बनी बेटे की सुहागन)

Roohani Musaafir

सफर जारी है क्योंकि कुछ ख्वाब अभी मुकम्मल नहीं
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Update 01

कहानी सुरु होती है अस्पताल से सुरज के पिताजी अपनी आखरी सांस गिन रहे थे, सुरज की मां पूनमदेवी अपने आसू रोक के पति के हाथ को पकड़े बैठी थी और सुरज दूसरी और अपना दर्द सीने में लिए बैठा गया था..

"बेटा सुरज अपनी मां का ध्यान रखना.. में सब जानता हु तू अपनी मां से कितना प्यार करता है.. तुम्हारी मां पे मेने कभी ध्यान कही दिया उसकी खुशियों के बारे में कभी सोचा तक नहीं लेकिन अब तू बड़ा हो गया है और इस काबिल हैं की अपनी मां को वो सब दे जिसकी वो हकदार हैं......." सुरज के पिताजी बोलते हुए हाफ रहे थे...

"आप आराम कीजिए ना क्या लेके बैठ गई हो" बोलते हुए पूनमदेवी की आखों से आशु की धार निकल गई...

"बेटा सुरज में जा रहा हु याद रखना बेटा तेरी मां भी एक औरत है में तो कभी उसे एक औरत होने का अहसास ठीक से नही करावा पाया लेकिन तू ये कर सकता है. और मुझे पता है तू भी यही चाहता है और कही न कही तेरी मां भी लेकिन वो बोल नही पाएगी..."

सुरज के पापा अपनी पत्नी हाथ सुरज के हाथो में देकर बोले "बेटा मेरे जाने के बाद तुझे अपनी मां को संभालना है और पूनम वादा करो तुम भी अपने बेटे को वो हक दोगी.. बनोगी ना उसकी सुहागन"

पूनम की आखों से आसू टपकते हुए उसके और सुरज के हाथो पे गिर रहे थे.. और सुरज के पिताजी ये दुनिया छोड़ चले गई...

दो महीने बाद.. पूनमदेवी सफेद रंग की साड़ी में आंगन में बैठे हुए गेहूं साफ कर रही थी..दो बाइक आके उसके आंगन में रुकी..

पूनमदेवी ने अपना सारा दुख छुपाते हुए हक्की सी मुस्कान के साथ उसकी बड़ी बहन का अभिवादन किया और आंगन के कोने में रखे मटके से पानी ले आई.. आंगन पे पड़ी हुए खटिया पे सभी लोग बैठ चुके थे.. दो दो कर के.. एक पे तो उसकी बड़ी बहन और जीजा और दूसरे खटिया पे एक काला मोटा आदमी और उसके पास एक बुड्ढी औरत दोनो के देख के कोई भी समझ जाता की दोनो मां बेटे है..

पानी देने के लिए जैसे ही पूनमदेवी हक्का सा आगे की और झुकी उसके स्तनों के उभार से ब्लाउस पुरु तरह से गोलाकार हो गया और उसके स्तनों के दर्शन उसके आगे बैठे मां बेटे को हो गया.. काले मोटे आदमी के मुंह में पानी आ गया... और पानी का ग्लास लेते हुए जब उसकी एक उंगली पूनमदेवी के गोरे गोरे हाथों से लगी उसके पूरे शरीर में करंट सा लगा...

"सुमित्रा तेरी बहन तो सो टका खरा सोना है.. बिलकुल तेरी तरह दूधिया बदन है, बिचारी भरी जवानी में विधवा हो गई" बुड्ढी औरत दोनो बहनों को देख के बोली...

पूनमदेवी शर्म से पानी पानी हो गई और वहा से तेज कदमों के साथ अंदर कमरे में घुस गई..

"देवर जी लगता है आप को पसंद नही आए हमारी बहन" सुमित्रा ने उसके देवर को छेड़ने के लिए कहा

"मुझे ये रिश्ता मजूर है मां" काला मोटा आदमी मुस्कराते हुए बोला..

काफी देर के बाद भी जब पूनमदेवी बहार नही आई तो सुमित्रा कमरे में आई.. कमरे में पूनम बिस्तर पे बैठी थी उसकी आखों में आसू थे..

"पूरे दो महीने हो गई कब तक रोती रहेगी तेरे रोने से तेरा पति जिंदा नही होने वाला पगली.. सुन बहार जो तुझे देखने आया है मेरा देवर है.. अच्छी सरकारी नोकरी करते है सहर में.. ज्यादा बड़ा भी नही तेरे से तेरा अच्छा खयाल रखेगा पूनम.. दिल का भी अच्छा है बस शादी में देरी हो गई और अब उनकी उम्र निकल गई है की कोई कुवारी लड़की उनके साथ शादी के लिए मान जाए बस यही बात है" सुमित्रा ने कहा...

"आप जानती होना मुझे दूसरी शादी नही करनी आप भूल क्यों जाती हो मेरा बेटा भी है में खुश हूं दीदी"
पूनम की आखों से आसू निकल आई..

"पूनम पागल मत बन तेरा बेटा कल को शादी कर लेगा सहर चला जायेगा फिर कोन होगा तेरे साथ इसे गांव में अकेली रहेगी तो पता हैं ना कितनी बुरी नजरे तूझे नोच खाने के लिए तड़प रही होंगी, हम जैसी औरतों का मर्द के बिना ये जमाना क्या हाल करेगा अभी तुझे समझ नही आया, क्या खराबी है मेरे देवर में की को काला है मोटा है.."

"दीदी आप गलत समझ रही हो ऐसी बात नही है"

"फिर क्या बात है कब तक इसे रहेगी अकेली सुरज को भी एक बाप मिल जायेगा.. उसके बारे में तो सोच.. ये घर कैसे चलेगा क्या तू चाहती है वो अपनी पढ़ाई भी पूरी ना करे"

"नही दीदी, मुझे ये शादी मंजूर है.. लेकिन आप सुरज को कुच मत बताना" इतना कहते हुए पूनमदेवी रो पड़ी...

पुनमदेवी
उम्र 40

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सुमित्रा
उम्र 48
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Roohani Musaafir

सफर जारी है क्योंकि कुछ ख्वाब अभी मुकम्मल नहीं
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Update 02

शादी की तैयारी शुरू हो गई और शादी में बस कुछ घर के लोग ही रहने वाले थे तो कुछ ज्यादा तैयारी भी नही करनी थी सिर्फ पूनमदेवी के लिए कुछ गहने और कपड़ो की खरीदी ही बड़ा काम था जोकि सुमित्रा सांभल रही थी, शादी को बस अब दो दिन बचे थे.. की कही से सुरज को पता चल गया की उसकी मां की शादी हो रही हैं, शादी की एक रात पहले ही सुरज गांव पहुंच गया.. बेटे को सामने देख पूनमदेवी हैरान थी उसे कुछ समझ ना आया क्या करे..

"मां ये सब क्या है पापा गई अभी तो बस कुछ महीने हुए हैं और आप ये सब" सुरज की आखों में आसू थे..

"बेटा तू गलत समझ रहा है ये सब में तेरे लिए ही कर रही हु" पूनमदेवी की आखों से भी आसू की धार निकल गई..

"मां मुझे कुछ नही चाइए आप बस मेरे पास रहो.. कुछ महीने बाद मेरी नौकरी भी लग जायेगी मां हमे किसी और की जरूरत नहीं आप भूल गई क्या की पापा ने आप का हाथ मेरे हाथो मे दिया था, तभी से आप मेरी जिमेदारी हो और मां आप ने ये फैसला कैसे ले लिया आप पे अब सिर्फ मेरा हक में सिर्फ मेरा"

सुरज इतना कहते हुए अपनी मां को अपनी बाहों में लेकर रोने लगा.. पूनमदेवी भी अपने बेटे को बातो से भावुक होकर रो रही थी..

पूनमदेवी काफी देर से बेटे की बाहों में थी उसे जब थोड़ा होश आता हालत का उसे याद आया की उसकी बड़ी बहन कभी भी आती ही होगी, पूनमदेवी बेटे को खुद से दूर करते हुए जाने लगती है लेकिन सुरज अपनी मां के बदन के स्पर्श से काफी मदहोश हो चुका था वो अपनी मां की सफेद साड़ी के पल्लू को पकड़ लेता है और पूनमदेवी के आगे बड़ने से उसकी साड़ी उसके बदन से अलग हो गई.. सुरज पूरी तरह से कामवासना में अंधा होकर ये भी भूल चुका था की उसके आगे उसकी मां है.. वो अपने कदम अपनी मां की और बड़ा रहा था पूनमदेवी इस तरह आंगन में अपने पति के आगे भी इस हालत में आज तक नही आई थी उसे कुछ समझ नहीं आया उसे क्या करना चाहिए था..

वो कुछ बोल पाती उस से पहले ही सुरज उसे पीछे से पकड़ लेता है और अपने होठ अपनी मां के गले पे रख चूमने लगा.. पूनमदेवी की तो जैसे जान ही निकल आई..

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इतने महीने के अकेलपन के बाद आज उसे कोई हाथ लगा रहा था उसे अहसास दिला रहा था की वो उसके लिए कितनी खास है.. और उसकी ममता भी अपने बेटे को अपने सीने से लगाने के लिए कितने महीने से तड़प रही थी और आज वही बेटा उसके जिस्म को चूम रहा था वो चाह के भी उसे रोक नही पाई..

की तभी आंगन का दरवाजा खुला और दोनो मां बेटे एक दूसरे से अलग हो गई.. उनके सामने हाथ में कुछ सामान लिए सुमित्रा खड़ी थी.
 
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