Ajju Landwalia
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राजेश, पुनम की चुचियों को चूस चूस कर दूध पीता रहा । पुनम उसकी बालो को प्यार से सहला रही थी।
कुछ देर तक दूध पिलाने के बाद,,
पुनम _देवर जीऔर कितने देर तक पियोगे? कुछ मुन्ने के लिए भी बचा कर रखो।
राजेश _माफ करना भौजी, दूध इतना स्वादिष्ट है कि छोड़ने का मन नही कर रहा। दूध पीने में बहुत मजा आ रहा है।
पुनम _अगर मुन्ने को भूख लगी तो उसे क्या पिलाऊंगी, थोड़ा मुन्ने के लिए भी छोड़ो।
राजेश ने दूध पीना बंद कर दिया।
पुनम मुस्कुराने लगी और अपनी ब्लाउज की बटन बंद करने लगी,,
पुनम _शुक्रिया देवर जी।
राजेश _किस बात के लिए शुक्रिया भौजी? शुक्रिया तो मुझे कहना चाहिए, दूध पिलाने के लिए।
पुनम _मैं तो तुम्हे शुक्रिया इसलिए बोली की मुन्ने के लिए दूध बचाया।
राजेश _क्यू नही बचाऊंगा भौजी, आखिर दूध पर पहला हक तो मुन्ने का ही है।
पुनम _अब मैं चलूं, रात बहुत हो चुकी है अब तुम भी सो जाओ।
राजेश _ठीक है भौजी? पर यह तो बता दो कल पीने को मिलेगा कि नही।
पुनम _मुस्कुराते हुवे बोली,, सोचूंगी।
पुनम अपनी कमर मटकाते हुवे वहा से चली गई।
राजेश अपना लंद सहलाते हुए उसे मटकती गाड़ को देखता रहा।
अगले दिन राजेश का समय पूर्व दिनो की तरह ही बीता लेकिन आज हवेली में कुछ खास होने वाला था, आइए जानते हैं हवेली में आज क्या होने वाला है?
राजेश, पुनम की चुचियों को चूस चूस कर दूध पीता रहा । पुनम उसकी बालो को प्यार से सहला रही थी।
कुछ देर तक दूध पिलाने के बाद,,
पुनम _देवर जीऔर कितने देर तक पियोगे? कुछ मुन्ने के लिए भी बचा कर रखो।
राजेश _माफ करना भौजी, दूध इतना स्वादिष्ट है कि छोड़ने का मन नही कर रहा। दूध पीने में बहुत मजा आ रहा है।
पुनम _अगर मुन्ने को भूख लगी तो उसे क्या पिलाऊंगी, थोड़ा मुन्ने के लिए भी छोड़ो।
राजेश ने दूध पीना बंद कर दिया।
पुनम मुस्कुराने लगी और अपनी ब्लाउज की बटन बंद करने लगी,,
पुनम _शुक्रिया देवर जी।
राजेश _किस बात के लिए शुक्रिया भौजी? शुक्रिया तो मुझे कहना चाहिए, दूध पिलाने के लिए।
पुनम _मैं तो तुम्हे शुक्रिया इसलिए बोली की मुन्ने के लिए दूध बचाया।
राजेश _क्यू नही बचाऊंगा भौजी, आखिर दूध पर पहला हक तो मुन्ने का ही है।
पुनम _अब मैं चलूं, रात बहुत हो चुकी है अब तुम भी सो जाओ।
राजेश _ठीक है भौजी? पर यह तो बता दो कल पीने को मिलेगा कि नही।
पुनम _मुस्कुराते हुवे बोली,, सोचूंगी।
पुनम अपनी कमर मटकाते हुवे वहा से चली गई।
राजेश अपना लंद सहलाते हुए उसे मटकती गाड़ को देखता रहा।
अगले दिन राजेश का समय पूर्व दिनो की तरह ही बीता लेकिन आज हवेली में कुछ खास होने वाला था, आइए जानते हैं हवेली में आज क्या होने वाला है?
आजादी के पहले इस क्षेत्र के आस पास की अधिकांश जमीन, भानगढ़ के राजा का ही था। जब देश आज़ाद हुडा तो केंद्र सरकार के दबाव में महेंद्र सिंह के पिता जी ने अपने राज्य का अधिकांस जमीन गांव में रहने वाले अपने विश्वास पात्र किसानों के नाम कर दी। बदले में उसने किसानों से उन्हे दिए गए जमीन के बदले, उसमें प्रतिवर्ष होने वाले उपज का 25% राजा को लगान के रूप में देने का अनुबध पत्र पर दस्तखत करा लिया गया था।
किसान प्रतिवर्ष अपने जमीन पर उपजे फसल का 25% राजा को देता था।
महेंद्र सिंह के पिता जी ने यह परंपरा भी बनाया कि वे किसान को हमे लगान देते है वह हमारे परिवार के सदस्य है।
जब कभी भी इन किसान परिवारों मे बेटे की शादी होता। तो किसान अपनी बहु को बीहा कर लाने के बाद अपने घर न ले जाकर सीधा राजा के हवेली में आशीर्वाद के लिए ले कर आता।
हवेली में राजा और राजमाता के द्वारा नई दूल्हे और दुल्हन के भव्य स्वागत किया जाता उन्हे भेट दिया जाता। उन्हे राज परिवार के साथ रात्रि भोज कराया जाता, एक रात हवेली में ही गुजारने के बाद, दूल्हा और दुल्हन को हवेली से अगले दिन बिदा किया जाता।
यह परंपरा ठाकुर महेंद्र सिंह के समय तक बहुँत ही अच्छे से चलता रहा लेकिन जब उसकी मृत्यु हो गई।
तब ठाकुर बालेंद्र सिंह इस परंपरा के फायदा उठाने लगा।
ठाकुर बालेंद्र सिंह अय्याश किस्म का था, जवान और खुबसूरत स्त्री को देखकर उसका मन मचलने लगता था।
जब किसान परिवार परंपरा के अनुसार अपनी नई बहू को ठाकुर और ठकुराइन का आशीर्वाद लेने उसे हवेली लाते।
खुबसूरत दुल्हन को देखकर ठाकुर बालेंद्र सिंह के नियत खराब हो जाता। नई दुल्हन को किसी तरह भरोसा में लेकर उसका सिल तोड़ता। इस काम में उसका साथ देती ठाकुर की खास सेविका तारा बाई।
यह राज सिर्फ तीन लॉग ही जानते थे एक तारा बाई, दूसरा ठाकुर बालेंद्र सिंह और तीसरा वह नई दुल्हन।
ठाकुर उस दुल्हन को धमकाता भी अगर यह बात किसी को भी बताई तो तुम्हारे पति के परिवार वालों का पूरा जमीन हड़प लेंगे। और तुम्हे बदनाम भी कर देगें। तुम्हारी भलाई इसी में है की हवेली का यह राज तुम किसी को भी न बताना, अपने पति को भी नही।
नई दुल्हन डर जाती और वह ठाकुर के द्वारा सिल तोड़ने की बात किसी को भी नही बताती।
न जाने कितने नाई दुल्हनों का सील ठाकुर बालेंद्र ने तोड़ा था, उसका राज अभी तक गुप्त था।
आज एक किसान परिवार अपने नई बहू को आशीर्वाद दिलाने हवेली ला रहे थे।
नई दूल्हे और दुल्हन को शाम को ही आशीर्वाद के लिए हवेली लाया जाता। हवेली में पहले ही खबर दे दिया जाता कि आज नई दुल्हन और दूल्हा ठाकुर और ठकुराइन का आशीर्वाद लेने हवेली आयेंगे।
हवेली में रात्रि भोज का आयोजन किया जाता।
दूल्हे दुल्हन को हवेली लेकर दूल्हे के पिता लाते और ठाकुर से मिलकर चले जाते अगले दिन दूल्हे दुल्हन को लें जाने के लिए दूल्हे के पिता फिर आता। ठाकुर से आज्ञा लेकर दूल्हे दुल्हन को घर ले जाता।
आज मोहनलाल किसान ने अपने बेटे के लिए बहु को बिहा के लाने के बाद शाम को दोनो को लेकर हवेली पहुंचा।
मोहनलाल _प्रणाम मालिक ।
बालनेंद्र सिंह _अरे आओ मोहनलाल। बहुत बहुत बधाई बेटे की शादी की।
मोहन लाल _शुक्रिया मालिक।
परंपरा के मुताबिक मैं अपने बेटे और उसकी नई दुल्हन को आपसे आशीर्वाद लेने के लिए हवेली लाया हूं।
मेरे बेटे और बहू को आशीर्वाद दीजिए।
देखो मोहनलाल जी, हमारे पूर्वज अपने अधीनस्थ किसानों को अपने परिवार की तरह मानते है अतः परंपरा के अनुसार जब भी किसी किसान के घर नई बहू आती हैं तो हवेली में उसका स्वागत किया जाता है। हम तुमसे खुश हुवे कि तुमने इस परंपरा का पालन किया।
पहले इन दोनो को ठकुराइन आशीर्वाद देगी, उसके बाद हम आशीर्वाद देगें।
ताराबाई, तुम दूल्हा और दुल्हन को ठकुराइन के पास ले जाओ।
तारा बाई _जी ठाकुर साहब।
तारा बाई दूल्हा और दुल्हन जो घूंघट डाल रखी थी को लेकर ठकुराइन के पास ले गई।
मोहनलाल _अच्छा मालिक अब मुझे आज्ञा दीजिए।
ठाकुर _ठीक है मोहनलाल अब तुम जाओ कल अपने बहु और बेटे को ले जाना।
मोहनलाल _ठीक है मालिक।
मोहनलाल चला गया।
इधर तारा बाई ने दूल्हा और दुल्हन को ठकुराइन रत्नवती के पास लेकर गई।
तारा बाई _ मालकिन, ये नई दुल्हन और दूल्हा आपसे आशीर्वाद लेने आए है। इन्हे आशीर्वाद दीजिए।
दूल्हा दुल्हन दोनो ने ठकुराइन का पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
ठकुराइन _जीते रहो, तुम दोनो को शादी की ढेर सारी शुभकामनाएं।
रत्नवती _बहु अपनी घूंघट उठाकर चेहरा तो दिखाओ।
तारा बाई _मालकिन दुल्हन की घूंघट तो आप ही उठाती है, और बदले में तोफा देती है।
रत्नावती _हां re जानती हूं।
रत्नवती ने दुल्हन का घूंघट उठाया।
रत्नवती _दुल्हन तो बहुत सुंदर है क्या नाम है तुम्हारा?
दुल्हन _शरमाते हुवे बोली, जी रूपा।
रत्नावती _नाम के अनुरूप, रूपवती हो।
लो मेरी तरफ से ये मुंहदिखाई,
रत्नावती ने सोने की हार,दूल्हा दुल्हन को पहनाया।
दुल्हन बड़ी खुश हुई।
रत्नावती _तारा जाओ दुल्हन और दूल्हे थक गए होगे . उनके आराम के लिए कमरे तैयार करो। रात में शाही भोजन की तैयारी करो।
ताराबाई _दूल्हा और दुल्हन के ठहरने के लिए कमरा को सजा दिया गया है, मालकिन और रसोइया शाही भोजन की तैयारी में लग गए हैं।
रत्नावती _रूपा जाओ तुम लोग अपने कमरे में आराम करो। अब शाही भोज के लिए भोजन कक्ष में मिलेंगे।
ताराबाई ने दूल्हा और दुल्हन को उनके कमरे में ले गए।
दोनो को अलग अलग कमरे ठहरने के लिए दिया गया था। यह भी परंपरा का हिस्सा ही था। दूल्हे और दुल्हन के सुहाग रात अपने घर में जाकर ही मनाना था। अगर उन्हे एक ही कमरे में ठहरा देते तो, हो सकता है की दोनो यही सुहागरात मना लेते।
दोनो के कमरे को अच्छे से सजाया गया था।
दुल्हन की सेज को फूलो से सजाया गया था जैसे की उनकी सुहागरात हो।
ताराबाई, ठाकुर के पास पहुंचा।
ताराबाई _ठाकुर साहब, दुल्हन तो बहुत सुंदर है। अपने हथियार की धार तेज़ कर लीजिए, आपको फिर शील तोड़ने को मिलने वाली है।
ठाकुर _सच तारा।
वैद्य जी ने जो दवाई दिया है न हॉर्स पावर वाली, उसको तैयार रखना, रात में भोजन के बाद, उसे लेकर अपना घोड़े की पावर बढ़ाऊंगा। और नई दुल्हन को अपने घोड़े पर बिठाकर जन्नत की सैर कराने ले जाऊंगा।
ताराबाई _आपकी दवाई पहले ही तैयार है ठाकुर साहब।
ठाकुर _ये हुई न बात, तारा तुम मेरी कितनी खयाल रखती हो। आज तो मजा ही आ जाएगा।
तारा _ठाकुर साहब आपके सिवा मेरा है ही कौन?
टरात में 8बजते ही दूल्हा और दुल्हन को शाही भोज के लिए भोजन कक्ष में बुलाया गया।
ठाकुर परिवार के सभी लोग, एवम ठाकुर के खास लोगो को भी आमन्त्रित किया गया।
विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए गए थे। सभी ने शाही भोजन का जमकर लुफ्त उठाया।
भोजन के बाद, दूल्हे और दुल्हन को उनके कक्ष में ले जाया गया। सभी मेहमान भी घर चले गए।
इधर ठाकुर और तारा बाई रात की योजना बनाने लगे।
ठाकुर _तारा, जाओ देखो घर के सभी सदस्य सो गए हैं कि नही।
ताराबाई _हा ठाकुर साहब मैं समझती हूं आपके घोड़े की बेकरारी, पहले ये दवाई तो खा लीजिए, हॉर्स पावर वाली।
ठाकुर ने वह दवाई खा ली।
ताराबाई _ठाकुर साहब अब मैं देख कर आती हूं, मालकिन और बिटिया लोग सोए है कि नही।
ठाकुर _जाओ जल्दी जाओ।
तारा बाई, हवेली के सभी कमरों का जायजा लिया।
फिर ठाकुर के कमरे में पहुंची।
ताराबाई _ठाकुर साहब रास्ता एकदम क्लियर है।
ठाकुर _तुम दुल्हन के कमरे में जाओ और हमारे आने की जानकारी दो।
ताराबाई _ठीक है ठाकुर साहब।
ताराबाई दुल्हन के कमरे में गई।
ताराबाई _अरी, दुल्हन तुम सो गई क्या?
रूपा की नींद लग गई थी।
उसे तारा बाई ने उठाया।
रूपा _काकी आप।
तारा _अरे अभी तो एक रस्म और बाकी है? और तुम सो गई।
रूपा _कैसी रस्म काकी।
तारा _अरे अभी तो ठाकुर ने तुम्हारा चेहरा देखा ही नहीं है। वह तुम्हारा घूंघट उठाने आएगा। चलो जाओ तुम बाथरुम में जल्दी फ्रेस हो जाओ, और अपने कपड़े व्यवस्थित कर घूंघट डालकर सेज पर बैठ जाओ।
रूपा _पर काकी, ठाकुर साहब इतनी रात को घूंघट उठाने क्यू आयेंगे वे पहले ही घूंघट उठा सकते थे।
तारा _अरे ये एक परंपरा है। ठाकुर साहब रात में ही नई दुल्हन का घूंघट उठाते हैं और उसे महंगे तोहफा देते है।
ठाकुर साहब तुम्हे कुछ सिखाएंगे भी, जिससे तुम अपनी मर्द को अपने काबू में रख सकोगी। और तुम्हारा दांपत्य जीवन सुखमय रहेगा।
हा ठाकुर साहब, तुम्हे जो भी सिखाएंगे उसे अच्छे से सीखना। उसे नाराज मत करना। अगर वो तुमसे खुश हुवे तो वे तुम्हे गहने और पैसे भी भेट करेंगे।
समझी की नही।
रूपा _जी काकी।
ताराबाई _और देखो तुम घबराना नहीं, मैं दरवाज़े के बाहर ही रहूंगी।
ठाकुर साहब बहुत अच्छे हैं वह जो बोले वह करना।
उसे नाराज मत करना नहीं तो तोहफा की जगह तुम्हे दंड भी दे सकते है।
रूपा डर गई,,
तारा बाई _अब मैं चलती हु, कुछ ही समय में ठाकुर साहब तुम्हारे कमरे में आएंगे, तुम तैयार होकर बैठ जाओ।
रूपा, हां में सिर हिलाया।
ताराबाई ठाकुर के कमरे में पहुंची।
ठाकुर _जाइए ठाकुर साहब दुल्हन तुम्हारा इन्तजार कर रही है।
ठाकुर अपने हाथ में पहने मोंगरे की माला को सूंघते हुए जाने लगा,,
ताराबाई _ठाकुर साहब थोड़ा रुकिए, पहले तुम्हारे घोड़े को तैयार तो कर दू।
ठाकुर दूल्हे के ड्रेस में था। सेरवानी और पजामा पहना था। अपने पजामा का नाडा खोल दिया और लंद बाहर निकाल दिया, उसका लंद पहले से ही तना हुआ था।
ताराबाई _, अरे आप तो पहले से ही तैयार है।
ताराबाई ने ठाकुर का लंद मुंह में ले कर चूसने लगी।
जिससे उसका लंद और मोटा और कड़क हो गया।
ठाकुर अपने पजामा का नाडा बांध लिया और दुल्हन की कमरे में जाने लगा।
इधर दुल्हन डरी हुई थी पता नही क्या होने वाला है?
ठाकुर दुल्हन के कमरे में पहुंचा।
और मोंगरे की माला सूंघने लगा।
दुल्हन घूंघट डाल कर सेज पर बैठी थी।
ठाकुर उसके पास जाकर बैठ गया।
ठाकुर _तारा कह रही थी कि तुम बहुंत सुंदर हो।
हम तुम्हारा मुंह देखने आए है।
अपना घूंघट तो उठाओ।
दुल्हन बैठी रही।
तब ठाकुर ने खुद ही अपने हाथ से घूंघट धीरे धीरे उठाने लगा।
दुल्हन का दिल जोरो से धड़कने लगा। वह अपनी आंखे बंद कर दी।
घूंघट उठने के बाद।
ठाकुर _सच में तुम बहुत सुंदर हो।
अरे अपनी आंखे बंद क्यू कर दी।
हमारे तरफ देखो, शरमाओ मत।
दुल्हन ने आंखे खोली।
ठाकुर _दिखाओ अपनी हाथ को।
ठाकुर ने दुल्हन की हाथ को पकड़ कर उसमें सोने की कंगन पहनाने लगा।
ये तुम्हारी मुंह दिखाई का तोहफा है ये तुम्हारी हाथो में खुब जचेगी।
ठाकुर ने दुल्हन की दोनो हाथो को चूम लिया।
दुल्हन सिहर उठी। अपनी हाथो को अपनी ओर खींची।
ठाकुर _अरे क्या huwa तुम्हे कंगन पसंद नहीं आए।
देखो तो कितनी प्यारी लग रही है तुम्हारे हाथो मे।
ठाकुर ने उनकी हाथो को फिर से चूम लिया।
क्या नाम है तुम्हारा?
दुल्हन _जी रूपा,,
ठाकुर _बहुत प्यारा नाम है।
अच्छा कल तुम्हारी सुहागरात होगी, ये बताओ सुहागरात में क्या होता है ये तो तुम्हे पता है ना।
रूपा शर्मा गई।
ठाकुर _अरे शर्मा क्यू रही हो?
मुझसे शरमाने की जरूरत नही।
बताओ सुहागरात कैसे मनाते हैं तुम्हे पता है कि नही।
रूपा _जी नही,, शरमाते हुवे बोली।
ठाकुर _तुम्हारी सहेलियों ने तो कुछ बताया होगा।
रूपा शर्मा गई,,
ठाकुर _देखो रूपा, आज की रात हम तुम्हे सिखाएंगे की पति को कैसे खुश किया जाता है। ताकि तुम अपनी पति को खुश रख सको। और तुम्हारा दांपत्य जीवन सुखमय रहे।
यह भी एक परंपरा ही है, यहां आने वाली दुल्हनों को यह परंपरा निभानी पड़ती है। हां और इस परंपरा के बारे में सिर्फ तुमको, मुझे और तारा को की पता रहेगी। किसी अन्य को पता नही होगा?
इसके बारे में तुम अपने पति को भी नही बताओगी।
रूपा खामोश रही।
ठाकुर _तारा अंदर आ जाओ।
तारा बाई अंदर प्रवेश की।
ठाकुर _तारा, दुल्हन को सिखाओ की मर्द को कैसे खुश किया जाता है? ताकि वह अपने पति को खुश रख सके।
ताराबाई _जी ठाकुर साहब, रूपा तुम देखना और सीखना, मर्द को कैसे खुश किया जाता है?
तारा बाई ने ठाकुर के कपड़े एक एक करके उतरना शुरू कर दिया।
ठाकुर सिर्फ कच्छे में रह गया।
उसके बाद ठाकुर ने तारा बाई के साड़ी उतारने लगा। वह सिर्फ पेटीकोट और में थी।
ठाकुर ने फिर तारा बाई की ब्लाउज खोल उसकी ब्रा भी उतार दिया।
उसकी मस्त चूचियां ठाकुर के आंखो सामने आ गया।
ठाकुर ने उसकी चूचियों को मसल मसल कर पीने लगा।
रूपा उनकी हरकतों को देखने लगी। उसे बड़ी शर्म आ रही थी।
उधर तारा बाई सिसकने लगी।
फिर ठाकुर ने उसकी पेटीकोट को भी उतार दिया।
वह सिर्फ पेंटी में रह गई।
तारा बाई बेड पर लेट गई।
ठाकुर उसके पूरे बदन को चूमने चाटने लगा।
उसके बाद तारा बाई उठी और ठाकुर साहब का कच्छा भी उतार दिया।
उसका मोटा तना लंद रूपा की आंखो के सामने आ गया। उसका दिल जोरो से धड़क रहा था।
वह पहली बार किसी पुरुष के खड़े लंद को देख रही थी।
तारा _रूपा देखो, पुरुष का लंद कैसे होता है?
इसके पहले तुमने लंद देखी है?
रूपा शर्मा गई,,
तारा _अरे शर्मा क्यू रही, नंगे तो हम है और शर्मा तुम रही हो। बोलो देखी हो?
रूपा न में सिर हिलाया।
तारा _देखो अच्छे से इसे टोपा कहते हैं, इसमें ये छेद को देखो, इसी से पेशाब बाहर आता है, और पुरुष का बीज भी जिससे बीज बाहर निकल कर औरत के गर्भ में जाता है और वो मां बनती है।
इसे अंडकोष कहते है इसमें पुरुष का शुक्र भरा होता है।
अरे दूर से काहे देख रही पकड़ के देखो,,
रूपा _काकी मुझे शर्म आ रही,,
तारा _अरे शर्माएगी तो सीखेगी कैसे?
चलो पकड़ो।
रूपा ने कपकपाते हाथो से लंद को पकड़ने की कोशिश की।
तभी तारा ने उसकी हाथ पकड़ कर लंद पर रख दिया। ठीक से पकड़ो।
तारा _पुरुष के लंद को पहले अच्छे से सहलाना चाहिए। देखो,,
अब तुम भी सहलाओ,,
रूपा शरमाने लगी,,
तारा _अरे शर्माओगी तो सीखेगी कैसे?
रूपा अपनी हाथ से ठाकुर का लंद सहलाने लगी।
तारा _अब लंद को थोड़ा दबाकर आगे पीछे करो।
अरे ऐसे नही re देखो कैसे करना है।
तारा ने मूठ मारकर दिखाया।
तारा _अब तुम करो।
रूपा ने तारा के बताए अनुसार मूठ मारने लगी।
तारा _हा ऐसे ही। इसे मूठ मारना कहते है।
जब किसी पुरुष को बुर नही मिलता तब मूठ मारकर अपना वीर्य निकालकर अपना लंद शांत करते हैं।
कभी कभी जब लंद ढीला हो तो उसे खड़ा करने के लिए दूसरा तरीका अपनाते है। जिससे पुरुषो को बड़ा मजा आता है और उसका ढीला लंद खड़ा हो जाता है!
अभी तो ठाकुर का लंद खड़ा है फिर भी तुम्हे सीखा देती हूं। क्या पता तुम्हारा पति का लंद खड़ा हो या न हो। इस लिए अच्छे से सीख लो तुम्हारा काम आएगा।
तारा ने ठाकुर का लंद मुंह में लेकर चूसना शुरु कर दी।
ठाकुर _आह बड़ा मजा आ रहा है और चूसो।
तारा _देखा न लंद चूसने से पुरुषो को कितना मजा आता है । अब तुम चूसो।
रूपा _नही काकी मुझे शर्म आती है।
तारा अरे शर्मायेगी तो सीखेगी कैसे? चलो चूसो।
रूपा ने लंद चूसना शुरू कर दिया।
तारा _थोड़ा और अंदर लो और दबाओ बनाकर चूसो । हा ऐसे ही।
ठाकुर _आह रूपा तुम बहुत अच्छा चूस रही हो आह बड़ा मजा आ रहा है।
तभी लंद का कुछ नमकीन पानी रूपा के मुंह में गई। वह लंद निकाल दी।
तारा _अरे निकाल क्यू दी क्या huwa?
रूपा _काकी इससे कुछ निकला।
तारा _नमकीन लगा क्या?
रूपा हां में सिर हिलाई।
तारा _अरे ये वीर्य है चूसने से थोड़ा निकलता रहता है। इसे अंदर घुटक लो।
अच्छा लगेगा।
रूपा _हूं, ताई मुझसे नही होगा?
तारा _अच्छा जाओ बाथरुम में थूककर आओ।
रूपा बाथरुम में थूकने चली गईं।
उसके बाद ठाकुर ने तारा को बेड पे लिटा दिया। और उसकी पेंटी निकाल दिया। तारा बिलकुल नंगी हो गई।
ठाकुर तारा की बुर को चाटने और चूसने लगा।
तारा सिसकने लगी।
आई उन उई मां आई,,,
रूपा हैरानी से देखती रही।
कुछ देर चूसने के बाद ठाकुर ने कहा,,,
रूपा अब तुम भी लेट जाओ। तुमको भी पता चले बुर चुसवाने में कैसा लगता है।
रूपा शर्मा गई।
तारा _अरे लेट जा न।
रूपा _काकी, मुझे बड़ी शर्म आयेगी।
तारा _अरे एक बार चुसवा कर तो देखो कितना मजा आता है।
तारा ने रूपा को जबरदस्ती लिटा दिया।
रूपा, घाघरा, चोली और चुनरी पहनी थी।
ठाकुर ने घाघरा ऊपर उठा कर उसकी कच्छी जबरदस्ती उतार दी।
रूपा शर्म से अपनी हाथो से बुर छिपाने लगीं।
ठाकुर ने अपने हाथ से रूपा की हाथ को उसके बुर से हटाया और उसकी बुर में अपना मुंह घुसा दिया। फिर उसकी बुर चाटने लगी।
रूपा का यह पहला अनुभव था। उसके हाथ पैर कपकपाने लगे उत्तेजना के मार उसकी बुर पानी छोड़ने लगी। उसकी मुंह से कामुक सिसकारी निकलने लगी।
ठाकुर ने जब उसकी बुर की भगनासा को चूसना शुरू किया।
रूपा के पूरे शरीर में करंट दौड़ने लगी। उसका शरीर थरथराने लगा।
उसका शरीर उत्तेजना की मारे ठाकुर की के लिएसर को अपने हाथो से पकड़ लिया।
और झड़ने लगी।
वह स्वर्ग की अनुभूति करने लगी।
ठाकुर ने चूसना बंद कर दिया।
तारा _कैसा लगा? आया ना मजा।
रूपा शर्मा गई।
ठाकुर ने रूपा की चोली खोल कर ब्रा भी निकाल दिया। और उसकी चूचक को मुंह में भर कर चूसने लगा।
यह रूपा के लिए पहला अनुभव था।
उसके शरीर में उत्तेजना फिर से भरने लगा।
ठाकुर रूपा को मस्त चुचियों को दबा दबा कर पीने लगा।
रूपा के मुंह से फिर से कामुक सिसकारी निकलने लगी।
तारा _क्यू re कैसा लग रहा है चूची चूसने से।
अब ठाकुर रूपा की बुर फिर से चाटने लगा।
रूपा जन्नत में उड़ने लगी।
तभी तारा ने ठाकुर को इसारा किया।
तारा ने एक कपड़ा लाया और रूपा के कमर के नीचे बिछा दिया। ताकि रूपा की बुर का शील टूटने पर निकलने वाला खून से बेड खराब न हो।
तारा रूपा के बाजू लेट गई।
ठाकुर तारा के टांगो के बीच आई और उसकी बुर पे अपना लंद रख कर गच से पेल दिया। और गपागप चोदना शुरू कर दिया।
तारा ठाकुर की कमर को पकड़ कर सहयोग करने लगी।
इधर ठाकुर अपनी एक उंगली से रूपा के बुर की भगनासा को छेड़ने लगा। जिससे रूपा सिसकने लागी। इधर तारा की chudai जारी रखा।
कुछ देर तारा को चोदने के बाद वह रूपा की टांगो के बीच आ गया और अपना लंद रूपा की बुर के छेद पर रख दिया।
तारा ने रूपा के मुंह में उसकी पेंटी ठूस दिया।
अब ठाकुर देर न करते हुवे एक जोर का धक्का मारा। लंद एक ही बार में बुर फाड़ दियारूपा चीखना चाही पर मुंह में पेंटी की वजह से चीख न पाई। उसकी बुर की झिल्ली फट चुकी थीउसकी योनि से खून निकल कर बहने लगा।
रूपा की आंखो में आंसू भर आए।
ठाकुर कुछ देर रुका रहा।
तारा प्यार से रूपा की बालो को सहलाने लगी।
उसके बाद ठाकुर रूपा की चूची को चूसने लगा। और हल्के हल्के धक्का मारने लगा।
लंद बुर में धीरे धीरे अंदर बाहर होने लगा। रूपा का दर्द धीरे धीरे कम होने लगा।
अब ठाकुर अपना स्पीड बढ़ाने लगा। रूपा को धीरे धीरे अब मजा आने लगा उसकी बुर में पानी भरने लगा।
अब लंद रूपा की बुर की गहराई में उतर चुका था।
ठाकुर पूरे जोश में चोदने लगा।
रूपा को chudai में अब मजा आने लगा। उसकी मुंह से सिसकारी निकलने लगा।
ठाकुर का लंद रूपा की बुर में कसा कसा अंदर बाहर हो रहा था जिससे उसे कुंवारी चूत चोदने में बहुत मजा आ रहा था।
ठाकुर ने रूपा को उठाकर घोड़ी बना दिया और पीछे से लंद डालकर चोदना शुरू कर दिया।
रूपा तो जैसे जन्नत में पहुंच गई थी।
ठाकुर रूपा की कमर को पकड़ कर गाच गच चोदने लगा।
रूपा के मुंह से मादक सिसकारी निकलने लगी। उसकी चूड़ियां खन खन खनकने लगी।
कुछ देर में रूपा फिर से झड़ गई। और ठाकुर भी उसकी बुर में ही झड़ गया।
कुछ देर तीनो सुस्ताने लगे।
तारा ने रूपा को उठाया और बाथरुम जाकर उसकी बुर को अच्छे से धोया।
कपड़े जिसपर खून गिरा था को हटाया।
ठाकुर ने भी अपना लंद धोया।
और तीनो फिर से बेड पर आ गए।
उसके बाद तारा ने फिर से ठाकुर का लंद चूसना शुरू कर दी। जिससे ठाकुर कस लंद फिर से खड़ा हो गया।
ठाकुर बेड पर लेट गया। तारा ठाकुर के लंद को हाथ से पकड़ कार अपनी बुर पे सेट कर बैठ गई। फिर उछल उछल कर चुदने लगी।
रूपा तारा को चुद्ते देख फिर गर्म जो गई वह अपनी बुर सहलाने लगी।
इधर तारा लंद की ऊपर उछल उछल कर chud रही थी कुछ देर में झड़ गई।
अब ठाकुर रूपा की बुर चाटने लगा। रूपा सिसकने लगी
ठाकुर लेट गया।
तारा _रूपा क्या देख रही है चल बैठ जा लंद पे।
रूपा लंद को पकड़ कर अपनी बुर के छेद में रख कर धीरे धीरे बैठ गई। और धीरे धीरे कमर ऊपर नीचे करने लगी।
धीरे धीरे रूपा अपनी स्पीड बढ़ाने लगी। ठाकुर भी रूपा की दोनो कमर पकड़ कर नीचे से धक्का लगाने लगा।
फिर से रूपा जन्नत में पहुंच गई। वह लंद पर उछल उछल कर चुदने लगी।
कुछ देर में रूपा फिर से झड़ गई।
ठाकुर ने कभी तारा तो कभी रूपा की रातभर जमकर chudai किया। और तीनो सो गए।
जब रूपा का नींद खुली तो रोने लगी।
तारा _अरे दुल्हन रो क्यों रही है।
रूपा _काकी मेरी शील तो टूट चुकी है। अब मेरे पति को पता चल जाएगा।
और मेरे बुर में सूजन भी आ गई है कल सुहागरात कैसे मनाऊंगी।
तारा _अरे तु चिन्ता मत कर। मैं तुम्हे एक क्रीम दूंगी उसे अपनी बुर पे लगाना, सूजन कम हो जाएगी और बुर टाइट हो जाएगी।
ठाकुर साहब, पंडित से कहला देगा की अभी सुहागरात की मुरहुत चारदीन बाद है। तब तक तुम्हारी बुर ठीक हो जाएगी।
हा तुम यह बात किसी को बताना मत, नही तो तुम्हारा पति तुम्हे घर से निकाल देगा। समझी।
ठाकुर _अरे रूपा तुमने मुझे बहुत मज़ा दिया है। तुम्हें मजा आया की नही।
रूपा शर्मा गई।
ठाकुर _रूपा तुम चिन्ता मत करो। किसी में हिम्मत नही कोइ मेरा खिलाफ जा सके। बस तुम रात में जो huwa उसे किसी को मत बताना।
रूपा ने हा में सिर हिलाया।
Bahut hi shandar update he rajesh bhagat Bhai,
Thakur ki ek aur kartut ka pata chala hum sabko.............
Rajesh aur punam ke beech bhi kuch karwao bhai
Keep rocking