यह कहानी बहुत ही नवीन और अलग तरह की रचना है। इसकी कल्पना थोड़ी असामान्य है, लेकिन वही इसे बेहद दिलचस्प बनाती है। पढ़ते-पढ़ते एक पल के लिए ऐसा लगता है मानो हम अपने बचपन के उन दिनों में लौट आए हैं, जब ऐसी मासूम मगर गहरी कहानियाँ किताबों में पढ़ते थे और उनकी दुनिया में खो जाया करते थे।
सतरंगी मुनिया जी ने इस कहानी में पंखों वाले जीवों और जंगल के वाशिंदों के माध्यम से एक ऐसी पुकार रच दी है, जो इंसानी सभ्यता के विकास की आड़ में हो रही तबाही का सजीव चित्र खींचती है। मोरनी सुनीता, तोती वीना, चतुरसेन बंदर, दुर्गम सिंह शेर... हर किरदार जैसे इस धरती के असली मालिकों का प्रतिनिधि बनकर सामने आता है।
कहानी का दर्द, संवादों की सहजता में रच-बसकर ऐसा बहता है कि कई बार रुक कर सांस लेनी पड़ती है। वीना की निरीह पुकार, दुर्गम सिंह का विवेक, चतुरसेन का सुझाव.. सब कुछ दिल को छू जाता है। ऐसा लगता नहीं कि कोई कथा पढ़ रहे हैं, बल्कि जैसे जंगल के बीच बैठकर खुद उनकी मीटिंग सुन रहे हैं। भाषा में सजीवता और भावनाओं का बहाव गजब है। बिना भाषण दिए, कहानी खुद सवाल उठा देती है.. ‘किसका हक़ ज़्यादा है इस धरती पर?’ बिना ओवरड्रामैटिक हुए, जानवरों को ऐसी मासूम सोच दी गई है कि पढ़ने वाला इंसान भी खुद को उनके बराबर खड़ा महसूस करे। सोशल मीडिया, कोर्ट स्टे, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं.. कहानी आधुनिक ज़माने से भी जुड़ी हुई है, जो इसे आज के पाठक के लिए प्रासंगिक बनाती है।
कुछ सुझाव:
कहीं-कहीं संवाद थोड़ा दोहराव लिए हुए हैं (जैसे मोरनी और तोती के बीच चिंता व्यक्त करने के तरीके)। थोड़ा कसाव होता तो कहानी और ज्यादा तीखी बन सकती थी। कुछ चरित्रों का और गहरा चित्रण हो सकता था.. जैसे भीम अजगर का संवाद एकबारगी हल्का-फुल्का बनकर रह गया, जबकि उसमें भी डर और व्यंग्य का एक गहरा स्तर लाया जा सकता था।
अंतिम निष्कर्ष:
"जीवों का करुण क्रंदन" कोई साधारण कहानी नहीं है। यह एक जिंदा दस्तावेज़ है उस मौन त्रासदी का, जो हम इंसान हर दिन करते हैं और फिर अनदेखा कर देते हैं। सतरंगी मुनिया ने अपने शब्दों से एक पूरा जंगल जिंदा कर दिया है... उनकी आवाज़ हमारे कानों में न सही पर हमारी आत्मा में जरूर गूंजती है।