• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Incest बेटी की जवानी - बाप ने अपनी ही बेटी को पटाया - 🔥 Super Hot 🔥

Daddy's Whore

Manika Singh
2,620
2,720
159

कहानी में अंग्रेज़ी संवाद अब देवनागरी की जगह लैटिन में अप्डेट किया गया है. साथ ही, कहानी के कुछ अध्याय डिलीट कर दिए गए हैं, उनकी जगह नए पोस्ट कर रही हूँ. पुराने पाठक शुरू से या फिर 'बुरा सपना' से आगे पढ़ें.

INDEX:

 

saurabh

Member
342
673
108
Conversation ko badhao or longest convo karo, even manika ki mom dad ki sex life bhi manika se discuss karwao dad ke sath, it will be erotic too
 

Daddy's Whore

Manika Singh
2,620
2,720
159
13 - बुख़ार

मनिका ने देखा कि जयसिंह कपड़े बदले बिना ही सो गए थे. उसके पास भी करने को कोई काम न था, सो वह भी नहाकर आई और सोने की तैयारी करने लगी. उसके बिस्तर में घुसने से पहले कमरे के गेट पर दस्तक हुई.

लॉंड्री वाला उनके कपड़े ले कर आया था. मनिका ने कपड़े रखवा कर उसे कुछ टिप दे दी.

अब मनिका भी जयसिंह के बगल में लेट गई और सोने की कोशिश करने लगी. लेकिन क्योंकि वह दिन में सो चुकी थी तो उसे नींद नहीं आ रही थी.

वह लेटी-लेटी उस दिन की घटनाओं के बारे में सोचने लगी, कि कैसे दिन की शुरुआत में उसे उसके अंडरगारमेंट्स शॉवर में पड़े मिले थे और जयसिंह ने उसका कितना मजाक बनाया था. फिर जब वह सैलून से वापस आई थी तब भी उसके पापा ने कितना स्वीट रिऐक्शन दिया था. उसे एहसास हुआ था कि जयसिंह भले ही मजाक कर रहे थे पर उसमें तारीफ भी छुपी थी. इसीलिए मनिका को लाज आने लगी थी और वो मेकअप उतार आई थी. फिर कैसे वो पापा के साथ काउच पर सोई थी.

"हाय. कितना अजीब था पापा के पास सोना… और जब हम उठे थे तो… I was literally hugging him.”

उसके गाल लाल हो गए.

ऊपर से, आज एक बार फिर से लोगों ने उसे जयसिंह की गर्लफ्रेंड समझ लिया था.

“कितनी हैरान थीं वे लड़कियाँ जब मैंने कहा कि ये मेरे पापा हैं… लोग भी न पता नहीं क्या-क्या सोचते रहते हैं."

मनिका ने थोड़ा तुनक कर सोचा, पर फिर उसका ध्यान जयसिंह की शारीरिक बनावट पर चला गया. वह सोचने लगी कि 46 साल की उम्र में भी जयसिंह उसके चाचा और ताऊजी की तरह मोटे व बेडौल नहीं थे. उन्होंने अपनी बॉडी को फिट रखा हुआ था.

“May be, that’s why… लोग मुझे और पापा को कपल समझ लेते हैं… वैसे भी दिल्ली में कुछ ज़्यादा ही खुलापन है… and papa has maintained his body so well… सो कोई सोचता ही नहीं कि वो मेरे पापा हैं."

ये सब सोचते हुए मनिका ने जयसिंह की तरफ देखा. कुछ ही पल पहले वे हिले थे और करवट बदल उसकी तरफ मुँह किया था. उन्हें सोता पा मनिका धीरे से उठ कर अधलेटी हुई और अपने हाथ टी-शर्ट में पीछे डाल अपनी ब्रा का हुक खोला और वापिस लेट गई.

इतने दिनों से मनिका और जयसिंह रोज बाहर घूम कर आते थे तो थके हुए होते थे. सो रूम में आ कर मनिका को जल्दी नींद आ जाया करती थी. फिर उनकी अनबन हो जाने के बाद दो दिन तनाव में बीत गए थे. लेकिन आज पूरा दिन होटल में रहकर मनिका ने आराम किया था. सो कुछ देर बाद उसे अपनी ब्रा का कसाव खटकने लगा था. वैसे भी उसे ब्रा पहन कर सोने की आदत नहीं थी. इसी वजह से उसने जयसिंह को सोते पा अपनी ब्रा का हुक खोल लिया था.

–​

आग में घी डालना किसे कहते हैं जयसिंह को आज समझ आया था.

खाना खा कर लौटने के बाद जयसिंह मनिका के कहने पर लेट कर रेस्ट करने लगे थे. उन्हें पता था कि अगर वे रोजमर्रा की तरह नहाने घुसे तो शायद अपनी हवस की आँधी को रोक नहीं पाएंगे और मुठ मार बैठेंगे. अपने इस अजीबोगरीब वचन को निभाने के मारे वे बिस्तर पर जा लेटे थे.

साथ ही वे इस ताक में भी थे कि क्या पता उनके सो जाने पर मनिका को भी जल्दी नींद आ जाए. फिर शायद वे कुछ छेड़छाड़ कर अपनी प्यास कुछ शांत कर सकें. इसी के चलते मनिका के बिस्तर में आ जाने के बाद उन्होंने करवट बदली थी. पर मनिका ने तो उनके मन की आँधी को भूचाल में तब्दील कर दिया था.

जब मनिका ने अपनी ब्रा का हुक खोला था तो उसकी टी-शर्ट पीछे से ऊपर हो गई थी. कमरे की हल्की रौशनी में अपनी बेटी की नंगी कमर और पीठ का दूधिया रंग जयसिंह ने अधखुली आँखों से देखा था.

"उह्…उम्म्…" जयसिंह के मुँह से दबी हुई आह निकल गई.

शुक्र इस बात का था कि मनिका के वापस लेट जाने तक वे किसी तरह रुके रहे थे. मनिका ने चौंक कर उनकी तरफ देखा. जयसिंह के माथे पर पसीने की बूँदें छलक आई थी.

"पापा?"

मनिका उठ बैठी थी और एक पल के लिए उसका हाथ अपनी पीठ पर चला गया था.

"पापा उठे हुए हैं…?" उसने धड़कते दिल से सोचा.

पर जयसिंह पहले की भाँति जड़ पड़े रहे.

"पापा आप जाग रहे हो क्या?" मनिका ने फिर से पूछा.

जयसिंह से कोई जवाब तो नहीं मिला पर इस बार उन्होंने फिर से एक आह भरी.

मनिका ने अब बेड-साइड से लाइट ऑन की और उन्हें ध्यान से देखा. उनके चेहरे पर पसीना आया हुआ था.

“Papa! Are you alright?" मनिका ने थोड़ा घबराकर उन्हें हिलाया और उठाने लगी.

जयसिंह ने भी एक-दो पल बाद हड़बड़ाने का नाटक किया और आँखें खोल दीं. वे गहरी साँसें भरने लगे.

“Papa, you are sick!” मनिका ने उनके तपते माथे पर हाथ रखते हुए कहा.

वह उनके ऊपर झुकी हुई थी और उसकी खुली ब्रा में झूलते उरोज जयसिंह के चेहरे के सामने थे.

"हम्प्…" उनका पारा और बढ़ गया.

जयसिंह उठ कर बैठ गए. आशंकाओं से भरी मनिका बार-बार उनसे पूछ रही थी कि वे कैसा फील कर रहे हैं. इधर जयसिंह कम्बल के अंदर अपने लंड का गला दबाते हुए उसे आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे थे कि वे ठीक हैं, उन्हें बस माइनर सा माइग्रेन का अटैक आया है.

लंड को शांति न मिलती देख आख़िर उन्होंने कहा कि वे नहा कर आते हैं ताकि थोड़ा फ्रेश हो जाएँ.

"साला अब तो प्रण गया भाड़ में… लगता है मुठ मारना ही पड़ेगा वरना आज तो लंड और आंड दोनों की एक्सपायरी डेट आ जाएगी."

यह सोच जयसिंह ने कम्बल के अंदर अपने लंड का मुँह ऊपर की तरफ कर उसे अपने अंडरवियर के इलास्टिक में कैद किया. ताकि उठने पर उनकी पैंट में कहीं तम्बू न बना हो. जब वे उठे तो लंड का मुहाना उनके अंडरवियर और पैंट से चार इंच बाहर झाँक रहा था, पर उनकी शर्ट से ढँका हुआ था. वे भारी क़दमों से चलते हुए बाथरूम में घुस गए.

बेड पर बैठी मनिका के चेहरे पर चिंता के भाव थे. उसने हाथ पीछे ले जा कर अपनी ब्रा का हुक फिर से लगाया और जयसिंह के बाहर आने का इंतजार करने लगी.

–​

बाथरूम में जा कर जयसिंह ने बाथटब में ठंडा पानी भरा और उसमें अपना बदन डुबो कर लेट गए. अंदर आते-आते एक बार फिर वे अपनी प्रतिज्ञा के प्रति थोड़ा सीरियस हो गए थे. ठंडे पानी से भरे टब में डूबे वे अपने लंड और टट्टों को रगड़ रहे थे ताकि उनकी गर्मी कुछ शांत कर सकें.

"ये अचानक मुझे क्या हो गया…? बिलकुल भी काबू नहीं कर पा रहा हूँ अपने-आप को… कुतिया की जवानी ने आखिर मेरे दिमाग़ का फ्यूज उड़ा ही दिया है लगता है… क्या होंठ है रांड के, मेरे लंड-रस का स्वाद तो आया ही होगा उसे… आह्ह!"

जयसिंह का लंड उनके हाथ की कैद से बाहर निकलने को फड़फड़ा उठा था.

"भड़वी ने ब्रा का हुक और खोल लिया ऊपर से… क्या झूल रहे थे साली के बोबे… ओहोहो! मसल-मसल कर लाल कर दूँगा भेंचोद एक दिन…"

इसी तरह के गंदे-गंदे विचारों से अपनी बेटी का बलात्कार करते वे आधे घंटे तक पानी में पड़े रहे.

पर फिर धीरे-धीरे ठंडे पानी का असर होने लगा, उनके बदन की गर्मी निकलने लगी और बदन सुन्न होने लगा. लंड और आंड भी शांत पड़ने लगे और जयसिंह के दिमाग़ ने एक बार फिर काम करना शुरू कर दिया.

"अगर ये हाल रहा तो फिर तो मनिका की झाँट भी हाथ नहीं लगेगी… मुझे अपने बस में रहना ही होगा! लेकिन साली हर वक्त जिस्म की नुमाइश करती रहेगी तो दिमाग़ तो ख़राब होगा ही… पर उसकी लिपग्लॉस तो मैंने ही ख़राब की थी. हाँ, तो मुझे क्या पता था ऐसे सामने बैठ कर होंठ चाटेगी रांड…? जो भी हो आज इतना समझ आ गया है कि लंड के आगे दिमाग़ की एक नहीं चलती है… हाहाहाहा…" जयसिंह मन ही मन हँसे.

अब वे थोड़ी राहत महसूस कर रहे थे.

उनका इरेक्शन भी अब मामूली सा रह गया था. उन्होंने मन ही मन तय किया कि जल्द ही उन्हें कोई अहम कदम उठाना होगा. मनिका के इंटर्व्यू को सिर्फ दो दिन बचे थे. अब वे अपनी मंज़िल से भटकने का खतरा मोल नहीं ले सकते थे. अगर घर वापस जाने से पहले कुछ ठोस कदम नहीं उठाया तो उनका किया कराया मिट्टी में मिल जाना था.

यह विचार आते ही उनके लंड का रहा-सहा विरोध भी खत्म हो गया.

जयसिंह ने कामना की के उनकी किस्मत, जिसने अब तक उनका साथ इतना अच्छे से निभाया था, शायद आगे का रास्ता भी दिखा दे. इस तरह एक नए जोश के साथ वे बाथटब से बाहर निकल आए और तौलिए से बदन पोंछ कर अपना पायजामा-कुरता पहन लिया.

जब वे बाहर निकल कर आए तो मनिका बेड से उतरकर उनके पास आई और उनकी ख़ैरियत जाननी चाही.

जयसिंह ने मुस्कुरा कर कहा,

“Don’t worry Manika… अब सब ठीक है…"

और उसका हाथ पकड़ उसे वापस बिस्तर में ले गए.

–​
 

Daddy's Whore

Manika Singh
2,620
2,720
159
14 - फ़ैशन परेड

बीती रात के बाद जयसिंह एक बात अच्छे से समझ चुके थे. मनिका का हुस्न उनकी मंज़िल पर लगा ऐसा गुलाब था जिसकी राह में काँटे ही काँटे थे. उसके हुस्न में उनके लिंग को बेबस करने वाला जादू था और उनके लिंग में उनके दिमाग़ को बेबस करने की शक्ति. अगर उन्हें फूल तोड़ना है तो काँटों से बचते रहना होगा और उसके लिए एक बार गुलाब से नज़र हटानी ज़रूरी थी. अब उन्हें अपनी काम-वासना की बजाय मनिका के मन में काम-क्रीड़ा के बीज बोने पर ध्यान देना होगा.

परन्तु वे यह नहीं जानते थे कि इस बार उनका साथ उनकी किस्मत नहीं बल्कि उनकी बीवी और मनिका की माँ मधु देने वाली है.

दरअसल जब से वे दोनों दिल्ली आए थे मनिका की अपनी माँ से एक बार भी बात नहीं हुई थी. जब भी घर से कॉल आता था जयसिंह के पास ही आता था और वे सब ठीक बता कर फोन रख देते थे. उस दिन उठने के बाद जयसिंह ने मनिका के साथ ब्रेकफास्ट किया और फिर नहाने चले गए.

मनिका यूँही बैठी अखबार के पन्ने पलट रही थी, तभी पास पड़े जयसिंह के फोन पर रिंग आने लगी, उसकी माँ का फोन था.

“हेल्लो?" मनिका ने फोन उठाया. उसे अपनी माँ से हुई अपनी आखिरी बातें याद आन पड़ी थी.
"हेल्लो मनि?" उसकी माँ ने पूछा, "कैसे चल रहे हैं इंटर्व्यू?"
मधु को जयसिंह ने झूठ कह रखा था कि मनिका के इंटर्व्यू तीन स्टेज में होंगे.
"इंटर्व्यू…? ओह हाँ अच्छे हुए मम्मी… परसों लास्ट राउंड है."

मनिका एक पल के लिए समझी नहीं पर फिर उसे भी याद जयसिंह का कहा झूठ याद आ गया.

उसने माथे पर हाथ रख सोचा,
"बाप रे अभी पोल खोल देती मैं पापा के इतना समझाने के बाद भी…"
"पापा कहाँ है तुम्हारे?" मधु ने पूछा.
"नहाने गए है…" मनिका ने बता दिया.
"इतनी लेट…?" मधु ने एक और सवाल किया.
"ओहो मम्मी… अब यहाँ होटल में रहते हैं तो आराम से उठना-नहाना होता रहता है…" मनिका ने मधु के सवालों से झुँझला कर कहा.

उसे बुरा इस बात से भी लगा था कि उसकी माँ ने एक बार भी उससे उसकी खैरियत नहीं पूछी थी.

"अच्छा, अच्छा… तुम पापा के रूम में आई हुई हो?" मधु फिर बोली.
"हाँ भई…" मनिका ने छोटा सा जवाब दिया.

आख़िर घर पर तो यही कहा गया था कि उनके कमरे अलग-अलग हैं. हालाँकि मनिका को पहले इस बात का पता नहीं था, पर एक दिन उसने पापा को फ़ोन पर ऐसा कहते सुना था.
जयसिंह को नहाते हुए ही आभास हुआ कि मनिका किसी से ऊँची आवाज़ में बाते कर रही है. लेकिन शॉवर में उन्हें उसके कहे बोल साफ़ सुनाई नहीं पड़ रहे थे. जब तक उन्होंने शॉवर ऑफ किया मनिका की आवाज़ आनी बंद हो चुकी थी.

जब वे बाहर आए तो मनिका का चेहरा ग़ुस्से से दहक रहा था. उन्होंने पूछा,

"क्या हुआ मनिका? किस से बात कर रहीं थी?"
"आपकी बीवी से और किस से…?" मनिका ने गुस्से से तमतमाते हुए कहा.

मनिका के तल्खी भरे जवाबों से उसकी माँ भी छिड़ गई थी. मधु ने फिर से वही पुराना राग आलापना शुरू कर दिया था कि कैसे वह हाथ से निकलती ही जा रही है और कितनी बदतमीज़ हो गई है इत्यादि.

लेकिन मनिका के भी दिल्ली आने के बाद से पर निकल चुके थे. वह अब वो मनिका नहीं रही थी जो मधु की नुक़्ताचीनी चुपचाप सुन लिया करती थी. उसने भी अपनी माँ से कह दिया कि वे बिना मतलब उस पर लगती रहती हैं जबकि उसकी कोई गलती नहीं होती.

इस पर मधु ने हमेशा की तरह उसके पापा पर उसे शह देने का आरोप मढ़ा था. जयसिंह की बात आने पर मनिका अब उनका भी पक्ष लेने लगी थी. आखिर उसने गुस्से में आ फोन ही डिसकनेक्ट कर दिया था. उसने फोन रखने से पहले अपनी माँ से कहा था,

"आपसे तो सौ गुना अच्छे हैं पापा… मेरा इतना ख़याल रखते हैं… बेचारे पता नहीं इतने साल से उन्होंने आपको कैसे झेला है…?"

उधर मधु अपनी बेटी के मुँह से ऐसी बात सुन स्तब्ध रह गई थी.

इधर मनिका ने शिकायत पर शिकायत करते हुए जयसिंह को बता रही थी कि कैसे मम्मी ने उसको फिर से डाँट दिया था.

"और बस एक बार जब वो शुरू हो जातीं है तो फिर पूरी दुनियाँ की कमियाँ मुझ में ही नज़र आने लगती है उनको… मनि ऐसी मनि वैसी… ढंग से बाहर निकलो, ढंग से कपड़े पहनो, ढंग से ये करना ढंग से वो करना… और जब कुछ नहीं बचता तो फिर आप का नाम लेकर ताने… पापा की शह है तुम्हें… पापा बिगाड़ रहे हैं तुम्हें… हद होती है मतलब…!"

मनिका का गुस्सा उसकी माँ की कही बातों को याद कर बार-बार फूट रहा था.

"मैं तो मर जाऊँ तो ही चैन आएगा उनको…" मनिका रुआंसी हो बोली.
जयसिंह उसके पास गए और उसके कंधे पर हाथ रख उसे ढाँढस बँधाते हुए बोले,
"तुम दोनों का भी हर बार का यही झगड़ा है… फिर भी हर बार तुम अपसेट हो जाती हो, कितनी बार कहा है बोलने दिया करो उसे…"
"हाँ पापा… पर मुझे बुरा नहीं लगता क्या… आप ही बताओ?" मनिका ने उनका सपोर्ट पा कर कहा और उन्हें बताया,
"मैंने भी कह दिया आज तो कि आपसे तो पापा अच्छे हैं और वो पता नहीं कैसे झेलते हैं आपको…"
"हैं…?" जयसिंह की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गई थी, "सचमुच ऐसा बोल दिया तुमने अपनी माँ से…?" उन्होंने पूछा.
"हाँ…" मनिका को भी अब लगा कि वह कुछ ज्यादा ही बोल गई थी.
"हाहाहा… मधु की तो धज्जियाँ उड़ा दीं तुमने…" जयसिंह हँसते हुए बोले.
"और क्या तो पापा मुझे गुस्सा आ गया था, तेज़ वाला…" मनिका ने धीरे से कहा, पर फिर अपनी गलती स्वीकारी, "पर ज्यादा ही बोल दिया कुछ…"
"हेहे… अरे तुम चिंता मत करो मैं सम्भाल लूँगा उसे…"

जयसिंह ने प्यार से मनिका का गाल खींच दिया था. मनिका भी अपनी मुस्कान रोक न सकी.

"ओह पापा काश मम्मी भी आप के जैसी कूल और प्यार करने वाली होती…" मनिका ने आह भर कहा.

जयसिंह ने मन ही मन सोचा,

"तेरी मम्मी भी मेरी तरह कूल हो जाती अगर उसके लंड होता तो… हाहाहा!"

फिर मुस्का कर खुद की तरफ इशारा करते हुए कहा,
"अब होती तो बात अलग थी मगर अब तो तुम्हें जो है उसी से काम चलाना पड़ेगा…"

कुछ देर समझाने-बुझाने पर मनिका का मूड कुछ ठीक होने लगा.

फिर जयसिंह ने मनिका के सामने ही अपनी बीवी को फोन लगा कर उसे बच्चों से टोका-टोकी न करने की अपनी हिदायत दोहरा दी थी. इस पर वह थोड़ी और बहल गई.
अब वे बैठ कर घूमने-फिरने का प्लान बनाने का सोच ही रहे थे कि जयसिंह के फ़ोन पर फिर से रिंग आने लगी.

कॉल उनके ऑफिस से था. इतने दिन ऑफिस से नदारद रहने की वजह वहाँ काम अटकने लगा था. सो जयसिंह फोन पर अपने असिस्टेंट से खोज-खबर लेने में लग गए.

–​

जब मनिका ने देखा कि जयसिंह लम्बी बातचीत करेंगे तो वह इधर-उधर पड़ा उनका छोटा-मोटा सामान व्यवस्थित करने लगी. फिर उसने बेड के पास रखा अपना सूटकेस खोला और लॉंड्री से वापस आए कपड़े जँचाने लगी.

मनिका और जयसिंह ने अपना सामान बेड की एक तरफ बनी एक अलमारी के पास नीचे रखा हुआ था.

शुरू में तो उनका सिर्फ़ दो दिन रुकने का प्लान था, सो उन्होंने अपना सामान ज्यादा खोला नहीं था. फिर जब उनका लम्बा रुकने का इरादा पक्का हो गया तो जयसिंह कुछ चीजें अलमारी में भी रखने लगे थे.

मनिका ने अपने कपड़े रखने के बाद सोचा कि पापा का सामान भी सेट कर देती हूँ. सो उसने अलमारी खोल ली.

अलमारी में जयसिंह के कपड़ों और शेविंग किट के अलावा होटल वालों की तरफ़ से कुछ चादर, तौलिए, इत्यादि भी रखे था. फिर उसने देखा कि नीचे वाले रैक में उसके शॉपिंग बैग भी रखे थे. जयसिंह से लड़ाई हो जाने के बाद मनिका तो इनके बारे में भूल ही गई थी. फिर जब उनके बीच सुलह हुई तो ख़ुशी के मारे उसे ये सब याद नहीं रहा था.

उसे याद आया कि उसके पापा ने तो वो बैग लाकर उनके सामान के पास ही रखे थे लेकिन शायद कमरे की साफ़-सफ़ाई करने आने वालों ने उन्हें उठाकर अलमारी में रख दिया था. मनिका ने सारे बैग निकाले और उत्साह से बेड पर बैठ अपनी लाई चीज़ें निकालने लगी. जयसिंह की पीठ उसकी तरफ़ थी और वे अभी भी फोन पर बात कर रहे थे.

अपने नए कपड़े देख-देख मनिका खुश होने लगी.

“O wow!… मेरे पास कितनी सारी नई ड्रेसें आ गई हैं… सबको दिखाने में कितना मजा आएगा… हहा!"

अपनी सहेलियों की प्रतिक्रियाएँ सोच वह आनंदित हो रही थी.

"पर… मम्मी देखेंगी जब…? फिर से वही लड़ाई होगी… खर्चा कम… ढंग के कपड़े… और तेरे पापा… ले-देके यही चार बातें हैं उनके पास…"

मधु से लड़ाई अभी भी उसके जेहन में ताजी थी और उसके विचार घूम-फिर के फिर उन्हीं बातों पर लौट आए थे.

"पर पापा ने कहा कि वे मम्मी को सम्भाल लेंगे… हा… पापा के सामने फ़ुस्स हो जाती है मम्मी की तोप भी… हीहाहा… अरे! कल पापा ने कहा था कि उन्हें तो दिखाया ही नहीं कि क्या कुछ शॉप कर के लाई हूँ?”

-​

कुर्सी पर बैठे हुए जयसिंह अपने असिस्टेंट को ऑफिस में आ रही दिक्कतों को सम्भालने के तौर-तरीक़े समझा रहे थे. जब मनिका की आवाज़ आई.

“पापा…”
“हूँ?” उन्होंने उसकी तरफ़ बिना देखे ही पूछा.
“क्या पापा, फ़ोन रखो ना… देखो मेरी नई ड्रेसेज़ देखते हैं.”

जयसिंह ने कुर्सी पर बैठे हुए ही मुड़ कर पीछे देखा और फोन में बोले,

"हाँ माथुर, जो मैंने कहा है वो करो. कोई दिक्कत हो तो कल मुझे कॉल कर लेना, अभी थोड़ा बिजी हूँ…"

माथुर ने उधर से कुछ कहा था लेकिन मनिका की बात सुनते ही जयसिंह फोन काट चुके थे.

मनिका शॉपिंग का सामान लेकर उनके पास आ बैठी. जयसिंह ने कौतुहल से उसके हाथ में पकड़े कपड़े और शॉपिंग बैग देखे और बोले,
“हाँ भई देखें तो क्या कुछ आया है इतना खर्चा कर के.”
“क्या पापा! आपने तो कहा था पैसों कि चिंता नहीं करनी.” मनिका ने सामान टेबल पर फैलाते हुए मुँह बनाया.
“अरे चिंता नहीं करनी है पर पता तो हो कहाँ लगे हैं…” जयसिंह ने हँस कर कहा.
“हीही…” मनिका खिखियाई.

मनिका ने पहले अपनी पसंद की ड्रेसों वाला बैग ही खोला था. टेबल पर अब तीन जोड़ी जींस, दो जोड़ी हॉट-पैंट्स, जो कि एक प्रकार की कसी हुई छोटी शॉर्ट्स होती हैं, एक स्कर्ट, एक पार्टी ड्रेस और कुछ टी-शर्ट रखीं थी. जयसिंह ने उन्हें उलट-पलट कर देखा. मनिका बोली,

“तो पापा? कैसी लगी मेरी ड्रेसेज़?”
“अच्छी हैं…” जयसिंह ने छोटा सा जवाब दिया.
“क्या पापा, बस अच्छी हैं?” मनिका ने मुँह लटकाते हुए कहा.
“अरे भई, पहन के दिखाओ तो पता चले. मुझे क्या पता लड़कियों के कपड़ों का…”
“हेहे पापा… बात तो सही है. रुको अभी पहन के आती हूँ.”

मनिका ने एक जींस और टॉप उठाया और बाथरूम में जा घुसी. कुछ देर बाद जब वो वापस आई तो जयसिंह ने मुस्कुरा कर उसकी तारीफ़ कर दी.

“Looking great Manika… काफ़ी अच्छी फ़िटिंग के लग रहे हैं कपड़े तो.”
“हाँ पापा… and they are so comfortable also…” मनिका ने चहचहा कर कहा.

फिर मनिका ने अपना फोन उनकी तरफ बढ़ाया,

"पापा मेरी पिक्स तो ले दो… फ्रेंड्स को भेजूंगी और जलाऊँगी… हीही…"

लेकिन जयसिंह ने उसके ऐसा कहते ही अपने फोन का कैमरा ऑन कर लिया. सो मनिका ने अपना फोन पास रखे टेबल पर रख दिया और पोज़ बनाते हुए बोली,

"अच्छा फिर मुझे सेंड कर देना पिक्स बाद में…"
"हम्म…" जयसिंह उसका फोटो खींचते हुए बोले.

चिड़िया पिंजरे में आ बैठी थी.

फिर मनिका ने बाक़ी की दो जींस पहन कर दिखाई. उस पर भी जयसिंह ने उसकी तारीफ़ में कोई कमीं नहीं छोड़ी. लेकिन अब जो ड्रेसेज़ बचीं थी वो सभी मनिका ने उस छोटे कपड़ों वाले सेक्शन से ली थी. सो वो थोड़ी सकपका कर जयसिंह के पास आ बैठी और बोली,

“पापा पिक्स दिखाओ ना कैसी आई है?”
“अरे पहले सारे कपड़े ट्राई तो कर लो.” जयसिंह ने आवाज़ में बिना कोई भाव लाए कहा.
“ओह… वो पापा…” मनिका से कुछ कहते न बना.
“क्या हुआ?”
“वो ड्रेसेज़ थोड़ी मॉडर्न सी हैं…”

जयसिंह तो उसकी मन:स्थिति पहले भी भाँप चुके थे.

“अरे मैं भी तो देखूँ कैसी होती हैं मॉडर्न ड्रेसेज़… अपने इन्वेस्टमेंट का रिटर्न तो मिले.” उन्होंने ठिठोली के अंदाज़ में कहा.
“हेहे… क्या पापा, आप भी न… लाओ पहन कर आती हूँ.”

मनिका ने पहले एक टॉप और स्कर्ट उठाया और बाथरूम में आ गई. उस चटख लाल स्लीवलेस टी-शर्ट और काली शॉर्ट-स्कर्ट को लेकर वो संकोच में पड़ गई कि,

"पता नहीं पापा क्या सोचेंगे?"

पर फिर उसे अपनी माँ की समझाईशें याद आ गई और उसने चिढ़ कर कपड़े बदल लिए. बाथरूम के शीशे में उसने अपने-आप को निहारा तो उसे जयसिंह की बात याद आ गई,

"कपड़े ही तो हैं…"

और वो मुस्कुराती हुई बाहर निकल आई.

पर उसने यह नहीं सोचा था कि कपड़ों के अंदर जिस्म भी तो होते हैं.

–​

"तो पापा? कैसी लग रही हूँ मैं?" मनिका ने चहक कर पूछा. उसके पूरे बदन में एक अजीब सी सनसनी थी.
"बहुत खूबसूरत है ये ड्रेस तो… बिलकुल तुम्हारे जैसी…" जयसिंह ऊपर से नीचे तक उसे देखते हुए बोले.

मनिका को हल्की सी लाज आई पर वह खड़ी रही.

स्कर्ट उसके घुटनों से थोड़ा ऊपर तक का था. उसकी गोरी-गोरी बाँहें और जाँघें देख जयसिंह को उसके साथ बिताई पहली रात याद आ गई,

"ओह्ह मैं तो भूल ही गया था कि कितनी चिकनी है ये कमीनी…"

अब मनिका बारी-बारी से वो छोटे-छोटे कपड़े बदल कर उनके सामने आने लगी और जयसिंह उसके फोटो लेने लगे.

जब वह अपनी डेनिम हॉट-पैंट्स पहन कर आई थी, उसकी जवान जाँघों के उभार ने जयसिंह को निरुत्तर कर दिया था. ऊपर से उसकी ज्यादातर नई टी-शर्टें स्लीवेलेस थी. जयसिंह का लंड उछाल मार रहा था. हर बार मनिका के बाथरूम में जाते ही जयसिंह लंड को शांत करने के प्रयास चालू कर देते थे.

उसके बाद मनिका एक काली पार्टी-ड्रेस पहन कर बाहर निकली. जयसिंह उसे देखते ही तड़प गए. ड्रेस का गला भी थोड़ा गहरा था जिससे मनिका के वक्ष की घाटी नज़र आ रही थी. ड्रेस की लंबाई भी पहले वाले स्कर्ट के मुकाबले कम थी. लेकिन ड्रेस की सबसे उत्तेजक बात थी उसका सिल्की कपड़ा. जिसने मनिका के बदन से चिपक कर उसके उभारों को निखार दिया था. साथ ही, उसकी ब्रा-पैंटी की रेखाएँ भी साफ़ नज़र आ रही थी.

मनिका पहले-पहल तो शीशे में अच्छे से देख-भाल कर बाहर आ रही थी. लेकिन बार-बार कपड़े बदलने के कारण उसका ध्यान जल्दी बाहर आ कर अपने पापा की तारीफ़ें बटोरने की तरफ़ ज़्यादा हो गया था. इस बार वह ड्रेस पहनते ही एक नज़र अपने-आप को देख बाहर आ गई थी. उसने यह नहीं सोचा कि रेशमी कपड़े पहनने के बाद अक्सर बदन से चिपक जाते हैं.

उस ड्रेस का कपड़ा उसके बाहर आते-आते ही उसके बदन से चिपकना शुरू हुआ था. पर उसे अपनी इस स्थिति का कोई अंदाज़ा न था.

इस बार फोटो खींचते वक्त जयसिंह का हाथ एकबारगी काँप गया.

मनिका के पास दिखाने को अब और कोई ड्रेस नहीं बची थी सो वह खड़ी रही. उसने देखा कि इस बार जयसिंह ने ज्यादा फोटो लिए थे.

"बस पापा इतनी ही थीं…" मनिका ने उन्हें बताया.
"बस? इतने से कपड़ों का बिल था वो…?" जयसिंह ने हैरानी जताई.
"हाहाहा… मैंने कहा था ना पापा… क्या हुआ शॉक लग गया आपको?" मनिका ने हँसते हुए उनके थोड़ा करीब आते हुए कहा.
"नहीं-नहीं… पैसे की फ़िक्र थोड़े ही कर रहा हूँ. मुझे लगा और भी ड्रेस होंगी…" जयसिंह ने मुस्का कर कहा.

फिर उसे अपनी गोद में आने का इशारा किया.

मनिका इतनी कातिल लग रही थी कि लाख रोकने के बाद भी वे अपने लंड की डिमांड को अनसुना नहीं कर सके थे.

उनका इशारा समझ मनिका ने थोड़ी आनाक़ानी की, क्योंकि उसे एहसास हुआ कि ड्रेस छोटी थी. अमूमन ऐसी ड्रेस के नीचे सेम कलर की शॉर्ट-नुमा पैंटी पहनी जाती हैं. ताकि बैठने पर अगर ड्रेस थोड़ी ऊपर भी हो तो कुछ अप्रिय न घट जाए. पर मनिका ने तो सिर्फ़ पैंटी पहन रखी थी, वो भी थोंग. अगर वह जयसिंह की जाँघ पर बैठती तो उसके अंडरवियर के एक्सपोज़ होने का खतरा था.
मनिका को यह आभास अजीब सा लगा. पर उसने अपने चेहरे पर शरम की अभिव्यक्ति नहीं होने दी.

लेकिन जयसिंह भी कहाँ मानने वाले थे.

"अरे नई ड्रेस में एक फ़ोटो तो पापा के साथ भी बनता है. Come on darling…"

इस बार उनका सम्बोधन भी उकसाऊ था, और अंग्रेज़ी भी.

मनिका धीरे-धीरे चल कर उनके पास आई. उसने अपने हाथों से ड्रेस पकड़ रखी थी. फिर वो टांगें भींच जयसिंह की गोद में बैठ गई.

जयसिंह ने उसकी कमर में हाथ डाल अपने से सटा लिया और फ़ोन का फ़्रंट कैमरा ऑन किया. वे थोड़ा ऊपर हाथ कर के सेल्फ़ी लेने लगे.

जब मनिका ने फ़ोन की स्क्रीन में अपनी नग्न जाँघें देखी तो उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी. फिर उसके पापा ने फ़ोन इतना ऊपर पकड़ा था कि उसका वक्ष भी नज़र आ रहा था. अनायास ही उसका चेहरा लाल हो गया. तब तक जयसिंह ने मुस्कुराते हुए दो-तीन फ़ोटो ले लिए थे.

"हाय! ये पिक्स तो डिलीट कर दूँगी पापा से लेकर…" मनिका ने मन ही मन सोचा.

जयसिंह भी उसकी असहजता भाँप गए थे. सो उन्होंने उसे बहलाने के लिए पूछा कि वो और क्या कुछ लेकर आई थी. फ़ोन का कैमरा बंद हुआ तो मनिका भी थोड़ा सहज हुई.

"और तो पापा दो पर्स लिए थे मैंने और एक वॉच… और क्या था…? हाँ बेल्ट और… सैंडिलस्…" मनिका सोच-सोच कर गिनाने लगी.
"अच्छा-अच्छा ठीक है." जयसिंह ने कहा.
"पापा मैं चेंज कर के आती हूँ… फिर मुझे पिक्स दिखाना."

फिर जयसिंह को याद आया,

"मनिका…!"
"जी पापा?" मनिका बाथरूम के दरवाजे पर पहुँच रुक गई थी.
"वो मेरी दिलाई चीज़ तो तुमने दिखाई ही नहीं पहन कर…" जयसिंह ने मुस्कुराते हुए कहा.
"कौनसी चीज़…? ओह्ह… हाँ पापा… भूल गई मैं… रुको."

मनिका उनकी बात पर मुस्कुरा उठी थी. उसका एक शॉपिंग बैग अभी भी बेड पर रखा था. वो बेड के पास गई और बैग से सामान बेड पर बिखेर लेग्गिंग्स की जोड़ी खोजने लगी. ऐसा करते हुए वो थोड़ा झुक गई थी.

जयसिंह ने देखा कि मनिका ने अपना एक घुटना मोड़ कर बेड पर रखा हुआ था और उसका दूसरा पैर नीचे फर्श पर था. वह आगे झुकी हुई थी सो उसकी कमर और नितम्ब ऊपर हो गए थे, और साथ ही वह ड्रेस भी. मनिका के नितम्बों के नीचे की गोलाइयों का हल्का भाग नज़र आ रहा था. जयसिंह का बदन एक बार फिर से गरमा गया. उन्होंने अपने बचे-खुचे विवेक का इस्तेमाल करते हुए फ़ोन का कैमरा चालू कर वीडियो मोड पर किया. फिर उस मादक से पोज़ में झुकी अपनी बेटी की गांड का वीडियो बनाने लगे.

कुछ दस सेकंड यह वाकया चला जिसके बाद मनिका ने सीधे हो कर मुस्कुराते हुए जयसिंह को अपने हाथ में ली हुई लेग्गिंग्स दिखाई और बाथरूम में चली गई.

जयसिंह ने फटाफट वीडियो बंद कर दिया था. उसके जाते ही उन्होंने अपने फोन की गैलरी खोली, विडीयो सेव हो गया था. लेकिन गैलरी में उसका आइकॉन देख मनिका को जयसिंह की कारस्तानी का साफ़ पता चल जाना था. जयसिंह ने जल्दी से वीडियो और उसके पहले ली तस्वीरों का बैकअप ले उस वीडियो को वहाँ से डिलीट कर दिया.

मनिका को लेग्गिंग पहन कर बाहर आने में थोड़ा वक्त लग गया. खड़े-खड़े इतनी पतली पायज़ामी पहनने में उसे थोड़ी मशक़्क़त करनी पड़ी थी. तब तक जयसिंह ने भी अपनी सेफ साइड रख ली थी. मनिका ने ऊपर से एक टी-शर्ट डाली और इस बार बिना आईना देखे ही बाहर आ गई. जयसिंह जो अभी अपने-आप को शांत कर ही रहे थे, पर कहर बरप पड़ा.

एक तो जयसिंह ने पहले ही लेग्गिंग चार साइज़ छोटी ले कर दी थी, उस पर उसका कपड़ा बिलकुल झीना था, तिस पर उसका रंग भी लाइट-स्किन कलर जैसा था; और मनिका यह सब बिन देखे ही बाहर निकल आई थी. लेग्गिंग्स के रंग की वजह से ऐसा लग रहा था कि मनिका ने नीचे कुछ नहीं पहन रखा. ऊपर से इतनी टाइट लेग्गिंग्स में उसके अधो-भाग का एक-एक उभार नज़र आ रहा था.

जयसिंह के बदन में करंट दौड़ने लगा.

अभी तक तो उन्हें अपनी बेटी के मॉडर्न कपड़ों में उसकी जाँघों और नितम्बों का ही दीदार अच्छे से होता आया था. लेकिन यह लेग्गिंग्स इतनी ज्यादा टाइट कसी हुई थी कि कपड़ा पूरी तरह से उसकी जाँघों और योनि पर चिपक गया था. मनिका की टांगों के बीच का फ़ासला और योनि का उभार साफ़ दिख रहा था.

"कैसी लग रहीं है पापा?" मनिका चहकते हुए बाहर आई थी.
"उह्…" जयसिंह ने कुछ शब्द निकालने का प्रयास किया था पर सिर्फ आह ही निकल सकी.

चलते हुए मनिका उनके पास आ पहुंची.

जयसिंह को पहले से ही इल्म था की कहाँ-कहाँ ध्यान से देखने पर मनिका के जिस्मानी जादू का लुत्फ़ उठाया जा सकता है. उनकी नज़र सीधी उसके गुप्तांग पर जा टिकी. उसके करीब आते-आते उन्हें उसकी पहनी हुई पैंटी के रंग और साइज़ का पता चल चुका था. लेग्गिंग्स इतनी लाइट कलर की और झीनी थी कि मनिका कि पैंटी साफ़ नज़र आ रही थी. उसने आज अपनी आसमानी रंग वाली थोंग पहन रखी थी.

मनिका की उभरी हुई योनि देख जयसिंह वैसे ही आपा खो रहे थे जब मनिका ठीक उनके सामने आ कर खड़ी हो गई.

"बताओ न पापा?"
"बहुत… बहुत अच्छी ल… लग रही है…" जयसिंह ने तरस कर कहा.

अपने लंड को काबू करने की उनकी सारी कोशिशें बेकार जा चुकीं थी.

इस बार मनिका अपने-आप ही उनकी गोद में आ बैठी. जयसिंह को अपनी बेटी की कच्ची सी योनि अपनी जाँघ पर टिकती हुई महसूस हुई, उनकी रूह काँप गई.

“Oh Manika, you are so beautiful…” उनके मुँह से निकला.
"इश्श पापा… you are making me shy…” मनिका ने मुस्काते हुए जवाब दिया, "इतनी भी सुन्दर नहीं हूँ मैं… मुझे बहलाओ मत…"
"तुम्हें क्या पता?" जयसिंह ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा और फिर से अपना दूसरा हाथ उसकी जाँघ पर रख लिया.

मनिका की योनि का आभास उन्हें पागल किए जा रहा था.

"आज तो रेप होगा मुझसे लग रहा है..!" जयसिंह ने मन ही मन अपनी लाचारी व्यक्त की.

असल में मनिका को भी जयसिंह की तारीफ़ बहुत भाई थी. एक बात और थी जिसने आज मनिका को अपनी ये फैशन परेड करने के लिए उकसाया था. लेकिन जिसका भान अभी उसके चेतन मन को नहीं हुआ था. पिछली रोज जब जयसिंह टीवी में दिखाई जा रही लड़कियाँ ताड़ रहे थे तो मनिका ने नोटिस कर लिया था व उन्हें छेड़ा था. शायद उस बात ने भी आज कहीं ना कहीं एक भूमिका निभाई थी.
जयसिंह उसकी जाँघ सहलाना शुरू कर चुके थे.

"पापा फ़ोन दो ना. पिक्स देखते हैं…" मनिका बोली.

जयसिंह ने उसकी जाँघ से हाथ हटा अपने बाजू में रखा फ़ोन उसे पकड़ा दिया और फिर से उसकी जाँघों पर हाथ ले गए. मनिका फ़ोन की फोटो-गैलरी खोल जयसिंह की ली हुई तस्वीरें देखने लगी.
शुरुआत की कुछ फोटो देख वह बोली,

"पापा! कितनी अच्छी पिक्स ली है आपने… and these dresses are looking amazing na?”

उसने अपने साथ-साथ जयसिंह की भी तारीफ़ करते हुए पूछा था.

जयसिंह को तो हाँ कहना ही था, उनका खड़ा हुआ लिंग भी उनके अंडरवियर में कसमसा कर हाँ कह रहा था.

फिर आगे मनिका की छोटी ड्रेसेज़ वाले फोटो आने शुरू हो गए. इस बार वह झेंप गई. जयसिंह ने फोटो भी ज्यादा ले रखे थे सो उन्हें आगे कर-कर देखते हुए उसकी झेंप शरम में तब्दील होती जा रही थी. उसने पार्टी-ड्रेस वाले एक फोटो पर रुकते हुए डिलीट-बटन दबाया. जयसिंह ने तपाक से पूछा कि वह क्या कर रही है? तो उसने थोड़ा सकुचा कर कहा कि वे फोटो ज्यादा अच्छे नहीं आए थे. जिसका असली मतलब था कि उनमें उसके पहने अंडरगारमेंट्स का पता चल रहा था.

मनिका ने एक दो फोटो ही डिलीट किए थे कि जयसिंह के फ़ोन पर एक बार फिर से रिंग आने लगी, ऑफिस से माथुर का फ़ोन था.

"ओहो आज तो कुछ ज्यादा ही कॉल्स आ रहीं है आपको…!" मनिका ने झुंझला कर कहा.
"बजने दो… अभी तो बात की थी…" जयसिंह ने कहा.

उनका चेहरा अब मनिका के बालों के पास था और वे उनकी भीनी-भीनी ख़ुशबू में खोए थे.

मनिका ने फ़ोन के अपने-आप डिसकनेक्ट हो जाने तक इंतज़ार किया और फिर से वो सब फ़ोटो डिलीट करने लगी जो उसे ज्यादा ही अंतरंग लगीं.

लेकिन सब चीज़ों का बैकअप ले चुके जयसिंह बेफिक्र थे. फ़ोन एक बार फिर से बजने लगा.

"हाँ माथुर बोलो?" जयसिंह ने मनिका से फ़ोन लेकर तल्खी से पूछा.

उनके सेक्रेटरी ने उन्हें बताया की उनका एक बहुत बड़ा क्लाइंट उनसे बात करने के लिए रोज कॉल कर रहा था, और वह भी अभी दिल्ली में था. माथुर ने जब उसे जयसिंह के दिल्ली गए होने की सूचना दी थी, तो उसने मीटिंग फिक्स करने के लिए कहा था. सो इसी बाबत उनका सेक्रेटरी उन्हें कॉल पर कॉल कर रहा था.

जयसिंह सोच में पड़ गए. यह क्लाइंट बहुत बड़ी आसामी थी, सो मीटिंग करनी ज़रूरी थी. उन्होंने सेक्रेटरी से मीटिंग फिक्स कर उन्हें कॉल करने को कहा. अचानक घटनाक्रम में हुए परिवर्तन ने उनके हवस के मीटर की सुई को चरम पर पहुँच कर टूटने से बचा लिया था.

"कुछ करना पड़ेगा…जल्द." जयसिंह ने गोद में बैठी मनिका की तरफ़ देख सोचा, फिर उससे बोले,
"जाना पड़ेगा मुझे… एक क्लाइंट यहाँ आया हुआ है." जयसिंह ने मनिका से कहा.
“But papa, we are on a holiday na?” मनिका ने बेमन से कहा.
“Yes darling, I know… पर ये काफी मालदार क्लाइंट है… इन जैसों से ही तुम्हारी शॉपिंग पूरी होती है." जयसिंह ने उसके गाल सहला उसे बहलाया.
“चलो… get up now… I have to get ready.” जयसिंह ने आगे कहा.

फिर भी मनिका के न उठने पर जयसिंह ने काम-वासना के वशीभूत अपने हाथ से मनिका के नितम्ब पर हल्की सी थपकी दे दी.

पर अगले ही पल उनका दिल मनिका के रिऐक्शन को लेकर आशंकित हो तेज़ी से धड़कने लगा.

"Ouch… okay-okay papa!” मनिका उचक कर खड़ी हो गई. उसे अंदेशा नहीं था कि पापा इस तरह उसे छुएँगे.

जयसिंह ने ऐसा दर्शाया कि उन्होंने कोई गलत या अजीब हरकत नहीं की थी. वे उठ कर मीटिंग के लिए तैयार होने चल दिए.

उनके उस आकस्मिक स्पर्श से मनिका को अपनी गांड में एक हल्की सी तरंग उठती महसूस हुई. वह कुछ पल वैसे ही खड़ी उनको जाते हुए देखती रही.

–​

जयसिंह के मीटिंग में जाने के बाद मनिका ने अपने नए कपड़े समेटने शुरू किए. सब कुछ सूटकेस में रखने के बाद वह बाथरूम में गई ताकि लेग्गिंग्स बदल कर अपनी पहले वाली पोशाक पहन सके. लेकिन जब उसकी नज़र बाथरूम के शीशे पर पड़ी तो उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई. लेग्गिंग्स का कलर और कसाव देख उसे एहसास हुआ कि उसने अपने पापा को अभी-अभी क्या कुछ दिखा दिया था. शीशे से कुछ दूर खड़ी होने पर भी उसे अपनी पैंटी साफ़ दिख रही थी.

“Oh god… फिर से! इस ट्रिप पर तो पता नहीं क्या हो रहा है!" उसने अपने दिल को थामते हुए सोचा. "जितना पापा के सामने ढंग से रहने की कोशिश करती हूँ, उतना ही बड़ा अनर्थ हो जाता है… he could see my panties in these leggings!"

पर अब क्या हो सकता था, मनिका ने कपड़े बदले और भारी मन से बेड पर लेट गई. इतना सब होने के बाद भी जयसिंह का सामान्य बर्ताव करना उसे आश्चर्यचकित भी करता था और लुभाता भी था. हर ग़लती के साथ जैसे वह अपने पिता के साथ और ज़्यादा खुलती जा रही थी. इस बार तो उसे उबरने में भी ज़्यादा वक़्त नहीं लगा था. वह सोच रही थी,

“But papa is so cool and caring… वो तो बस मेरी तारीफ़ ही करते हैं, जैसे उन्हें फ़र्क़ ही नहीं पड़ता कि मैंने क्या पहना है… पर क्या उन्हें अजीब नहीं लगता होगा, मुझे ऐसे कपड़ों में देखना…? हाय! कितना सोचा था मैंने… after our first night… I mean first night staying in this hotel… कि ढंग से कपड़े पहनूँगी… और आज सब कबाड़ा हो गया."

फ़र्स्ट नाइट शब्द मन में आने पर मनिका को एक बार के लिए सुहागरात का ख़याल आ गया था. तभी उसने अपनी सोच में सुधार कर अपने-आप को सफ़ाई दी थी.

"पर फिर भी… उस दिन कितना छेड़ा था मुझे… और टीवी पर वो लांज़रे वाला एड… हाय! उसमें लिखे कैप्शन देख कर तो पापा ये भी जान गए होंगे कि मैं… hot and sexy thongs… पहनती हूँ… कल तो पापा की तबियत ख़राब थी तो ये सब भूल गई थी… पर यार… I keep embarrassing myself… उस सेल्स गर्ल के कहने पर पापा इतनी टाइट लेग्गिंग्स उठा लाए कि… सब दिख गया उन्हें… और मुझे उठाने के लिए… he slapped my bums today… पर वो तो उन्होंने ऐसे ही… मगर फिर भी… कितना फ़्रैंक हो गए हैं हम यहाँ आकर. बिलकुल मूवीज़ में जैसा दिखाते हैं वैसे…"

–​
 

Daddy's Whore

Manika Singh
2,620
2,720
159
15 - बड़े दर्शन

उस रात जयसिंह काफ़ी लेट वापस आए. उन्होंने मनिका को कॉल करके बता दिया था कि आज उन्हें आने में देर हो जाएगी.

उनके क्लाइंट ने उन्हें अपने एक-दो जानकारों से भी मिलवाया था. निकट भविष्य में जयसिंह को एक बड़ी डील होती नज़र आ रही थी. मीटिंग से निकल उन्होंने माथुर को फ़ोन कर मीटिंग का ब्यौरा दिया और जल्द से जल्द नए ग्राहकों के लिए बिज़नेस प्लान तैयार करने को कहा था.

"अब तो दिल्ली चक्कर लगते रहेंगे…" वे फ़ोन रखते हुए बोले थे.

जब तक जयसिंह अपने होटल रूम में पहुँचे, मनिका सो चुकी थी. जयसिंह ने भी बाथरूम में जा कर कपड़े बदले और आकर लेट गए.

"हे भगवान, ये डील फाइनल हो जाए तो मजा आ जाए."

उन्होंने प्रार्थना की. उनके दिमाग़ में आज उनकी बिज़नस मीटिंग के ही विचार उठ रहे थे. काफी पैसा आने की सम्भावना ने उनका ध्यान मनिका की जवानी से हटा रखा था. पर फिर उन्होंने करवट बदली और उनके विचार भी बदल गए.

"और ये डील हो जाए तो डबल मजा आ जाए…" उन्होंने अपनी बेटी के जिस्म की तरफ हाथ बढ़ाते हुए सोचा.

जयसिंह ने शुक्र मनाया कि उन्होंने हाथ मनिका के गाल पर रख उसे सहलाया था. मनिका अभी पूरी तरह से नींद में नहीं थी और उनका स्पर्श पाते ही उसने आँखें खोल लीं थी.

"आह… पापा? आ गए आप?" उसने अंगड़ाई लेते हुए पूछा.
"हाँ… सोई नहीं अभी तक?" जयसिंह उसे जागती हुई पा कर थोड़ा घबरा गए थे.
“उन्हूँ… बस नींद आने ही लगी थी आपका वेट करते-करते…" मनिका ने नींद भरी आवाज़ से कहा.
"हम्म… वो मीटिंग जरा देर तक चलती रही सो लेट हो गया." जयसिंह ने बताया, "वैसे तुम्हारे लिए एक ख़ुशख़बरी है."
"क्या पापा…!" मनिका ने उठ कर अपने हाथ पर टेक लगाया और उत्साह से पूछा.
"आज कुछ नए क्लायंट मिले है यहाँ… सो दिल्ली आना जाना लगा रहेगा अब… सो बिस्तर में मेरा इंतज़ार करने की आदत डाल लो…" जयसिंह ने मुसकाते हुए कहा.
"सच में? ओह पापा! आप झूठ तो नहीं बोल रहे ना… please tell me!" मनिका ख़ुशी से झूम उठी.

वो इतनी खुश थी कि जयसिंह ने जिस तरह से उसे बिस्तर में इंतज़ार करने को कहा था, वो बात भी उसे नहीं खटकी थी.

जयसिंह ने उसे दो-तीन बार आश्वासन दिया तो उसे उनकी बात पर यक़ीन आया.

कुछ और देर बात करने के बाद जयसिंह ने सो जाने के लिए लाइट बंद कर दी. उन्होंने सिर उठाते लंड को हल्का सा दबा कर शांत किया क्योंकि मनिका आज जगी थी और वे भी थक चुके थे. कुछ ही देर में उनकी आँख लग गई.

–​

जयसिंह सपना देख रहे थे.

सपने में वे एक बिज़नस मीटिंग में बैठे थे और एक बेहद बड़ी डील कर रहे थे. उन्हें आभास हो रहा था जैसे उनके साथ उनका सेक्रेटरी और ऑफिस के कर्मचारी कागजात लेकर बैठे हुए हैं. काफी गहमा-गहमी का माहौल था. लेकिन जैसा कि सपनों में अक्सर होता है, जयसिंह किसी का भी चेहरा साफ-साफ़ नहीं देख पा रहे थे. कुछ देर इसी तरह सपना चलता रहा जब आखिर सामने बैठा क्लाइंट डील फ़ाइनल करने को राजी हो गया तो उसने उठते हुए उनसे हाथ मिलाया. जयसिंह ने भी उठ कर हाथ आगे बढ़ाया लेकिन अब उनके सामने क्लाइंट की जगह मनिका खड़ी थी और मुस्का रही थी.

“I agree papa…!" सपने वाली मनिका ने कहा, उसने एक छोटी सी काली ड्रेस पहन रखी थी.

जयसिंह ने नीचे देखा और पाया कि वे खुद नंगे खड़े थे और उनका लंड खड़ा हो कर हिलोरे ले रहा था. तभी उस सपने वाली मनिका ने हाथ बढ़ा कर उसे पकड़ लिया; जयसिंह की आँख खुल गई.
उनका हाथ पजामे के अन्दर लंड को थामे हुए था और उनके दिल की धड़कनें बढ़ी हुईं थी.

जयसिंह ने खिड़की की तरफ देखा और पाया कि बाहर अभी भी अँधेरा था. उन्होंने सिरहाने रखे फ़ोन में वक्त देखा. सुबह के 4 बजने वाले थे. उन्होंने मनिका की तरफ देखा. वह पेट के बल लेटी सो रही थी. उनका लंड अभी भी उनके हाथ में था. पर मनिका को सोते हुए पा कर भी उन्होंने उसे छूने की कोशिश नहीं की.

वे लेटे-लेटे सोचने लगे,

"उफ़… अब तो साली के सपने भी आने लगे हैं. बड़ी जालिम है इसकी जवानी… पर कुछ होता दिखाई नहीं देता. इसके सिर पर तो दोस्ती का भूत सवार है और मेरे लंड पर इसकी ठुकाई का. दोनों के बीच मेरी बैंड बजी रहती है. क्या करूँ समझ नहीं आता… आज आखिरी दिन है, कल तो छिनाल का इंटर्व्यू होगा."

जयसिंह अपनी लाचारगी पर तरस खाते हुए मनिका की उभरी हुई गांड देख रहे थे.

"हर तरह से इसे बहला चुका हूँ… पर आगे दिमाग़ में कोई तरकीब आ ही नहीं रही है…"

कुछ पल इसी तरह परेशानी में लेते रहने के बाद उनके लंड ने एक जोरदार हिचकोला खाया. यकायक जयसिंह के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी,

"आह! ये मैंने पहले क्यूँ नहीं सोचा… दिमाग़ से नहीं… अब लंड से काम लेने की बारी है…"

जयसिंह ख़ुशी-ख़ुशी सो गए, आर या पार की लड़ाई का वक्त आ चुका था.

–​

सूरज निकल आने के साथ ही मनिका और जयसिंह भी उठ गए. उन्होंने अपनी दिनचर्या के काम निपटाए और मनिका के कहने पर नाश्ता कमरे में ही मंगवा लिया.

मनिका को भी अगले दिन का अपना इंटर्व्यू नज़र आने लगा था. अपने पिता जयसिंह को अपनी बुद्धिमता के लाख उदाहरण देने के बावजूद अब वह भी कुछ चिंतित थी. उसने अपने पिता से कहा कि आज वह इंटर्व्यू के लिए पढ़ कर थोड़ा रिवीजन करने का सोच रही है. सो अगर उन्हें भी अपने बिज़नस का कोई ज़रूरी काम हो तो वे बेफिक्र कर सकते हैं.

जयसिंह ने मुँह-अँधेरे आँख खुलने पर जो तरकीब सोची थी उसे इस्तेमाल करने की हिम्मत अभी तक नहीं बाँध सके थे. उस वक्त तो नींद में उन्होंने फैसला कर लिया था, लेकिन सुबह मनिका के उठ जाने के बाद उनका असमंजस और व्याकुलता बढ़ गए थे. एक मौका आ कर हाथ से निकल भी चुका था. उन्होंने मनिका की बात पर सहमत होते हुए कहा कि वैसे तो आज वे फ्री हैं पर अगर कोई काम आन पड़ता है तो शायद उन्हें जाना पड़ जाए.

नाश्ता करने के बाद मनिका अपनी किताबें ले कर बैठ गई और जयसिंह कुछ देर कमरे में इधर-उधर होने के बाद उस से बिलीयर्डस खेलने नीचे चले गए. कुछ घंटों बाद उन्होंने रूम में कॉल कर के मनिका को नीचे लंच के लिए बुलाया. लंच के बाद जयसिंह के आग्रह के बावजूद मनिका उनके साथ लाउंज एरिया में न जा कर पढ़ने के लिए रूम में लौट गई थी.

जयसिंह शाम हुए रूम में लौट कर आए. वे बहुत खुश नज़र आ रहे थे, उनको इस कदर मुस्काते देख बेड पर किताब लिए बैठी मनिका ने उन्हें छेड़ते हुए पूछा,

"क्या हुआ पापा? बड़ा मुस्कुरा रहे हो आज तो… कोई गर्लफ्रेंड बना आए हो क्या?"
"हाहाहा… नहीं-नहीं कहाँ गर्लफ्रेंड… पर हाँ अपनी एक गर्लफ्रेंड की शॉपिंग का जुगाड़ कर आया हूँ…" जयसिंह ने भी हँस कर उसे आँख मार दी थी.

उनका इशारा मनिका की तरफ ही था.

"हाहाहा… ये बात है? मुझे भी बताओ फिर तो… कोई बैंक तो नहीं लूटा ना… हाहा.” मनिका ने किताब एक तरफ रखते हुए पूछा.

जयसिंह ने उसे बताया कि आज वे जीत कर आए हैं और जीत की राशि उनकी हार के दोगुने से भी ज्यादा थी, व उसे चेक दिखाया. मनिका भी खुश हो गई. मनिका ने बताया कि उसने तो दिन भर बस पढ़ाई ही करी थी और अब उसे नींद आ रही थी. जयसिंह ने डिनर भी रूम में ही मंगवा लेने का सुझाव दिया.

खाना खा लेने के बाद मनिका नहाने चली गई और जयसिंह बेड पर बैठ सोच में डूब गए.

"क्या वे यह कर सकेंगे?"

कुछ पल बैठे रहने के बाद वे उठे और जा कर सूटकेस में रखे अपने शेविंग-किट में से एक छोटी सी बोतल निकाल लाए. उनका दिल जोरों से धड़क रहा था.

–​

उधर मनिका नहाते वक्त अगले दिन की चिंता में डूबी थी. उसके पापा आज पैसे जीत कर आए थे इस बात से वह खुश भी थी. लेकिन इतने दिन दिल्ली की हवा लग जाने के बाद अब उसे यह डर सता रहा था कि अगर उसका सेलेक्शन नहीं हुआ तो उसे वापस बाड़मेर जाना पड़ेगा.

"अगर कल मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ तो पापा से बोलूंगी कि यहीं किसी और कॉलेज में डोनेशन से एडमिशन लेना है मुझे… वापस तो मैं भी नहीं जाने वाली." उसने मन ही मन सोचा.

जब वो नहा कर बाथरूम से बाहर निकली तो जयसिंह रोज की तरह सामने काउच पर ही बैठे थे. टीवी चल रहा था. वो उनसे कहने ही वाली थी कि वे नहा लें. पर उसके शब्द ज़ुबान पर आने से पहले ही हवा हो गए.

मनिका को जैसे काटो तो खून नहीं, उसका दिल, दिमाग़ और तन तीनों चक्कर खाने लगे थे.


जयसिंह ने अपने किट से तेल की शीशी निकाली थी और बेड पर जा बैठे थे. फिर उन्होंने अपनी पैंट और अंडरवियर निकाल दिए व हाथों में तेल लेकर अपने काले लंड पर लगाने लगे. उनका लंड जो पहले से ही पूरा खड़ा था, अब तेल की मालिश से चमकने लगा था.

उस सुबह नहाते वक़्त जयसिंह ने अपने अंतरंग भाग से बाल भी साफ़ कर लिए थे, सो उनके लंड के नीचे उनके अंडकोष भी साफ नज़र आ रहे थे. कुछ देर अपने लंड को इसी तरह तेल पिलाने के बाद जयसिंह ने उठ कर अलमारी में रखे एक्स्ट्रा तौलियों में से एक निकाल कर लपेट लिया था. फिर उन्होंने अपनी उतारी हुई पैंट और चड्डी को सूटकेस में रख दिया. तेल की शीशी को भी यथास्थान रखने के बाद वे काउच पर जा जमे और मनिका के बाहर आने का इंतज़ार करने लगे थे.

मनिका जब नहा कर बाहर आई तो अपने पिता को काउच पर बैठ टीवी देखते पाया. वे ऊपर तो शर्ट ही पहने हुए थे लेकिन नीचे उन्होंने एक टॉवल लपेट रखा था और पैर पर पैर रख कर बैठे थे. टॉवल बीच से ऊपर उठा हुआ था.

उनकी टांगों के बीच "उनका वो…!" नज़र आ रहा था.

मनिका की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा.

इस उम्र में मनिका को यह तो पता था कि लड़कों के गुप्तांग अलग होते हैं. लेकिन छोटे शहर और परिवार में पली-बढ़ी मनिका सेक्स के मामले में अभी अनजान ही थी. अपनी सहेलियों के गुपचुप खिखियाते हुए उसने थोड़ी बहुत ऐसी-वैसी बातें कीं थी लेकिन असली लंड से उसका सामना पहली बार हुआ था, और वह भी उसके पिता का था. जयसिंह के भीषण काले लंड को देख उसका बदन शरम और घबराहट से तपने लगा था.

"बस अभी नहाता हूँ…" जयसिंह ने मनिका की तरफ एक नज़र देख कर कहा.

उनका हाल भी मनिका से कोई बेहतर नहीं था, दिल की धड़कने रेलगाड़ी सी दौड़ रहीं थी. लेकिन उन्होंने अपनी पूरी इच्छाशक्ति से अपने चेहरे के भाव सामान्य बनाए रखे थे.

मनिका के चेहरे का उड़ा रंग देख उन्होंने झूठी आशंका भी व्यक्त की,

"क्या हुआ मनिका?"
"क… क… कुछ.. .कुछ नहीं… पापा…" मनिका ने हकलाते हुए कहा और पलट कर बेड की तरफ चल दी.

जयसिंह उसे जाते हुए देखते रहे. उसकी पीठ उनकी तरफ थी और उसने अपना सूटकेस खोल रखा था. जयसिंह ने अपनी नज़रें टीवी पर गड़ा लीं, उसी वक्त मनिका ने एक बार फिर उन्हें पलट कर देखा. जयसिंह अपनी बेटी के सामने नग्नता का नाच करने के बाद थोड़े और धृष्ट हो गए. हालाँकि डर उन्हें भी लग रहा था कि कहीं उसकी तरफ से कुछ उल्टा रिऐक्शन ना हो जाए.

"मनिका?" उन्होंने पुकारा.
"ज… जी पापा?" मनिका ने थोड़ा सा मुँह पीछे कर के पूछा. उसकी आवाज़ भर्रा रही थी.
"ये मेरा फ़ोन चार्ज में लगा दो जरा…" जयसिंह ने अपना फ़ोन हाथ में ले उसकी तरफ बढ़ाया.
"जी… हाँ अभी… अभी लगाती हूँ… पापा…" मनिका ने उनकी तरफ देखा और एक बार फिर से सिहर उठी.

थोड़ी हिम्मत कर मनिका पलटी और बिना जयसिंह की टांगों के बीच नज़र ले जाए उनके पास आने लगी. जयसिंह को हाथ में फ़ोन उठाए कुछ पल बीत चुके थे, और वे नज़रें टीवी में लगाए हुए थे.
जैसे ही उन्हें कनखियों से मनिका पास आती दिखी, उन्होंने फ़ोन अपने आगे रखे एक छोटे टेबल पर रख दिया. मनिका की नज़र भी उनके नीचे जाते हाथ के साथ नीची हो गई. अब वह जयसिंह से लगभग चार फुट की दूरी पर थी. ना चाहते हुए भी उसकी नज़र एक बार फिर से जयसिंह के चमकते लंड और आंडों पर जा टिकी.

जयसिंह उत्तेजित तो थे ही, मनिका की नज़र कहाँ है इसका आभास उन्हें हो गया. जैसे ही उसने झुक कर फ़ोन उठाया, उन्होंने अपने उत्तेजित हुए लंड की मांसपेशियाँ कसते हुए उसे एक हुलारा दिला दिया. मनिका झट से उछल कर सीधी हुई और लगभग भागती हुई बेड के पास जा कर उनका फ़ोन चार्जर में लगाने की कोशिश करने लगी, उसके हाथ काँप रहे थे.

–​

जयसिंह के बाथरूम में जाने की आहट होते ही मनिका औंधे मुँह बिस्तर पर जा गिरी. उसे बुख़ार सा हो आया था.

“O shit! O shit! O shit!” मनिका ने अपने दोनों हाथों से मुँह ढंकते हुए सोचा, “I saw papa’s… god!”

अपने पिता के लंड की कल्पना करते ही मनिका का बदन काँप उठा.

"पापा को पता भी नहीं चल रहा था कि… टॉवल ऊपर हो गया है… और उनका… हाय… oh god, what is happening?”

उसके दिमाग़ में भूचाल उठ रहा था.

वह सरक कर बिस्तर में अपनी साइड पर हुई और बेड के सिरहाने लगे स्विच से कमरे की लाइट बुझा दी. फिर अपने पैर सिकोड़ कर कम्बल ओढ़ लेट गई. बार-बार उसके सामने जयसिंह के लंड और आंड आ-जा रहे थे. उसका जिस्म शरम और ग्लानि की आग में तप रहा था. उसे लग रहा था जैसे उसी से कोई भूल हो गई हो.

मनिका को एक खौफ यह भी सता रहा था कि वह अब जयसिंह से नज़र कैसे मिला पाएगी? इसी डर से उसने कमरे की लाइट बुझा दी थी और नाईट-लैम्प भी नहीं जलाया था. जब एक बार फिर से बाथरूम के दरवाज़े के खुलने की आहट हुई थी तो उसका बेचैन दिल धौंकनी सा धड़कने लगा.

जयसिंह बाहर निकले तो कमरे में घुप्प अँधेरा पा कर अचकचा गए.

नहाते हुए उनका भी मन अपने किए इस दुस्साहसी कृत्य से विचलित रहा था.

"पता नहीं क्या सोच रही होगी… लंड ने तो खून जमा दिया उसका, कैसे उठ कर भागी थी साली… कहीं मैंने ज्यादा बड़ा कदम तो नहीं उठा लिया? अब तो पीछे हटने का भी कोई रास्ता नहीं है… कहीं उसे शक हो गया होगा तो…? कि यह मैंने जान-बूझकर किया था… मारे जाएँगे फिर तो…"

जयसिंह भी अपने दुस्साहस को लेकर थोड़ा असमंजस में फंसते जा रहे थे.

लेकिन आखिर में उन्होंने सोचा कि,

"अब जब ओखली में सिर दे ही दिया है तो मूसलों का क्या डर… देखा जाएगा जो होगा, जो योजना बनाई थी उसे तो अब पूरा अंजाम देना ही है…"

जयसिंह ने कमरे के अँधेरे में आवाज़ दी,
"मनिका? सो गई?"
"ज… जी पापा." बिस्तर में से दबी सी आवाज़ आई.
"नाईट-लैम्प तो ऑन कर देती… कुछ दिखाई ही नहीं पड़ रहा." जयसिंह ने कहा.
“Oh sorry papa…" मनिका ने माफ़ी मांगी और हाथ बढ़ा कर नाईट-लैम्प का स्विच ऑन कर दिया.

कुछ ही देर में जयसिंह भी बिस्तर में आ पहुँचे, मनिका की करवट उनसे दूसरी तरफ थी. जयसिंह ने कुछ पल रुक कर सोचा. फिर अपने प्लान के मुताबिक ही चलने का फैसला कर मनिका के कंधे पर हाथ रख उसे हौले से खींचा. मनिका ने उनके इस इशारे पर करवट बदल ली और उनकी तरफ मुँह कर लिया. उसने एक पल के लिए उनसे नज़र मिलाई थी और फिर आँखें मींच लीं थी.

"क्या हुआ मनिका? आज इतना जल्दी सो गई?" जयसिंह ने छेड़ की.
“म्म… वो पापा… आज पढ़ते-पढ़ते थक गई… और सुबह इंटर्व्यू के लिए भी जाना है सो…"

मनिका पहले से ही जानती थी कि उसके पापा यह सवाल पूछ सकते हैं. सो उसने जवाब सोच रखा था. उसने एक पल जयसिंह की तरफ आँख खोल कर देखा और उसकी आँखों में अचरज का भाव आ गया.

"हम्म… चलो फिर सो जाओ." जयसिंह ने हौले से उसका गाल थपथपा कर कहा.
"पापा? आपने शॉर्ट्स कब ली?" मनिका ने पूछा.

दरअसल जयसिंह आज पायजामा-कुरता नहीं बल्कि एक बरमूडा और टी-शर्ट पहन कर आए थे.

"अरे पहले से ही हैं मेरे पास यह तो…" जयसिंह ने बिलकुल सामान्यत: कहा.
"पर पहले तो आपने नहीं पहना…" मनिका बोली.
"हाँ… वो बाथरूम के फर्श पर पानी होता है तो पायजामा नीचे लग कर गीला हो जाता है रोज-रोज. सो आज यह पहन लिया. वैसे भी पायजामा-कुरता लॉंड्री से धुल कर आया हुआ था तो सीधा सूटकेस में ही रख दिया. आज और कल की ही तो बात है अब…"

जयसिंह भी बाप तो मनिका के ही थे. उन्होंने भी अपना तर्क मज़बूत करने के लिए पहले से ये कहानी गढ़ रखी थी. लेकिन उनके मन में तो लड्डू फूट रहे थे.

उन्होंने बेड के पास आने के बाद अपनी तरफ़ का नाइट-लैम्प भी ऑन कर दिया था, सो वे रौशनी के दायरे में थे.

क्यूँकि बरमुडे का कपड़ा ज्यादा मोटा नहीं होता और जयसिंह जानबूझकर अंदर कुछ पहन कर नहीं आए थे, सो अब उनके लंड का उठाव साफ़ नज़र आ रहा था.

उन्होंने देखा कि उनके जवाब देने के दरमियान ही मनिका की नज़र दो-तीन बार उनकी टांगों के बीच चली गई थी. हर नज़र के साथ वह सहम कर आँख बंद कर लेती फिर उनकी तरह देखती कि कहीं उन्होंने उसे ऐसा करते देखा तो नहीं.

जयसिंह चाहते थे कि मनिका अच्छे से आज के घटनाक्रम के बारे में सोचे. सो उन्होंने ज़्यादा बात न करते हुए लेट कर आँखें बंद कर लीं.

–​

लंड दर्शन ने मनिका की नींद वैसे ही उड़ा दी थी. अब वह थोड़ी-थोड़ी देर में आँखें खोल जयसिंह को देख रही थी.

जयसिंह भी कुछ-कुछ देर बाद हल्की सी आँख खोल मनिका की बेचैनी देख कर मन ही मन मस्त हो रहे थे.

मनिका चाहकर भी अपना ध्यान अपने पिता के लंड पर से नहीं हटा पा रही थी. ऊपर से उनके पहने शॉर्ट्स ने उसकी मुसीबत और ज्यादा बढ़ा दी थी.

“Shit… पापा को कैसे नंगा… I mean expose… होते हुए देख लिया मैंने… अगर उन्हें पता चल जाता तो…? Oh god, it’s so embarrassing and bad… और ये शॉर्ट्स जो पापा आज पहन आएं हैं…! Is that his…? हाय ये मैं क्या सोच रही हूँ…"

जयसिंह की शॉर्ट्स में बने उठाव को देख कर मनिका के मन में विचार उठने लगा. उसने झटपट अपनी सोच पर लगाम कसी और पलट कर करवट बदल ली. लेकिन बैरी मन था के थामे नहीं थम रहा था.
"कितना बड़ा था… है… ओह नो नो नो ऐसा मत सोचो… एंड काला… शिट…! पर वो ऐसे चमक क्यूँ रहा… हाय!”

मनिका ने शरम से अपने हाथों से अपने-आप को बाँहों में कसते हुए ऐसे विचारों को दूर झटकने की कोशिश की.

"हितेश का तो बिलकुल छोटा सा… पर वो तो जब वह 10 साल का था तब था… क्या उसका भी… हाय मनिका क्या सोच रही है तू!"

मनिका को अपने छोटे भाई की परवरिश के दौरान देखे मर्दांग की याद आ गई थी.

"तो क्या… men’s private part is like that? हाय…! God no… stop thinking like that Manika, damn it…"

मनिका ने अपने मन की निर्लज्जता पर गुस्सा होते हुए अपने-आप को धिक्कारा और सोने की कोशिश करने लगी.

–​

मनिका की नींद उस रात बार-बार टूटती रही. जयसिंह के नंगेपन का ख़याल रह-रह कर उसके मन में कौंध जाता था. अब उसकी अपने इंटर्व्यू को लेकर टेंशन भी बढ़ गई थी. उसे ऐसा लग रहा था कि वह सब पढ़ी हुई बातें भूल चुकी है.

“Oh God! अब क्या होगा… जब से पापा का प्राइवट पार्ट… देखा है… God…! सारी पढ़ाई भूल गई हूँ… shit… अब क्या करूँगी मैं कल…?"

किसी तरह सुबह होते-होते मनिका की आँख लगी.

उधर जयसिंह मनिका के उहापोह को ताड़ते हुए कब के मीठी नींद सो चुके थे.

–​
 
Top