14 - फ़ैशन परेड
बीती रात के बाद जयसिंह एक बात अच्छे से समझ चुके थे. मनिका का हुस्न उनकी मंज़िल पर लगा ऐसा गुलाब था जिसकी राह में काँटे ही काँटे थे. उसके हुस्न में उनके लिंग को बेबस करने वाला जादू था और उनके लिंग में उनके दिमाग़ को बेबस करने की शक्ति. अगर उन्हें फूल तोड़ना है तो काँटों से बचते रहना होगा और उसके लिए एक बार गुलाब से नज़र हटानी ज़रूरी थी. अब उन्हें अपनी काम-वासना की बजाय मनिका के मन में काम-क्रीड़ा के बीज बोने पर ध्यान देना होगा.
परन्तु वे यह नहीं जानते थे कि इस बार उनका साथ उनकी किस्मत नहीं बल्कि उनकी बीवी और मनिका की माँ मधु देने वाली है.
दरअसल जब से वे दोनों दिल्ली आए थे मनिका की अपनी माँ से एक बार भी बात नहीं हुई थी. जब भी घर से कॉल आता था जयसिंह के पास ही आता था और वे सब ठीक बता कर फोन रख देते थे. उस दिन उठने के बाद जयसिंह ने मनिका के साथ ब्रेकफास्ट किया और फिर नहाने चले गए.
मनिका यूँही बैठी अखबार के पन्ने पलट रही थी, तभी पास पड़े जयसिंह के फोन पर रिंग आने लगी, उसकी माँ का फोन था.
“हेल्लो?" मनिका ने फोन उठाया. उसे अपनी माँ से हुई अपनी आखिरी बातें याद आन पड़ी थी.
"हेल्लो मनि?" उसकी माँ ने पूछा, "कैसे चल रहे हैं इंटर्व्यू?"
मधु को जयसिंह ने झूठ कह रखा था कि मनिका के इंटर्व्यू तीन स्टेज में होंगे.
"इंटर्व्यू…? ओह हाँ अच्छे हुए मम्मी… परसों लास्ट राउंड है."
मनिका एक पल के लिए समझी नहीं पर फिर उसे भी याद जयसिंह का कहा झूठ याद आ गया.
उसने माथे पर हाथ रख सोचा,
"बाप रे अभी पोल खोल देती मैं पापा के इतना समझाने के बाद भी…"
"पापा कहाँ है तुम्हारे?" मधु ने पूछा.
"नहाने गए है…" मनिका ने बता दिया.
"इतनी लेट…?" मधु ने एक और सवाल किया.
"ओहो मम्मी… अब यहाँ होटल में रहते हैं तो आराम से उठना-नहाना होता रहता है…" मनिका ने मधु के सवालों से झुँझला कर कहा.
उसे बुरा इस बात से भी लगा था कि उसकी माँ ने एक बार भी उससे उसकी खैरियत नहीं पूछी थी.
"अच्छा, अच्छा… तुम पापा के रूम में आई हुई हो?" मधु फिर बोली.
"हाँ भई…" मनिका ने छोटा सा जवाब दिया.
आख़िर घर पर तो यही कहा गया था कि उनके कमरे अलग-अलग हैं. हालाँकि मनिका को पहले इस बात का पता नहीं था, पर एक दिन उसने पापा को फ़ोन पर ऐसा कहते सुना था.
जयसिंह को नहाते हुए ही आभास हुआ कि मनिका किसी से ऊँची आवाज़ में बाते कर रही है. लेकिन शॉवर में उन्हें उसके कहे बोल साफ़ सुनाई नहीं पड़ रहे थे. जब तक उन्होंने शॉवर ऑफ किया मनिका की आवाज़ आनी बंद हो चुकी थी.
जब वे बाहर आए तो मनिका का चेहरा ग़ुस्से से दहक रहा था. उन्होंने पूछा,
"क्या हुआ मनिका? किस से बात कर रहीं थी?"
"आपकी बीवी से और किस से…?" मनिका ने गुस्से से तमतमाते हुए कहा.
मनिका के तल्खी भरे जवाबों से उसकी माँ भी छिड़ गई थी. मधु ने फिर से वही पुराना राग आलापना शुरू कर दिया था कि कैसे वह हाथ से निकलती ही जा रही है और कितनी बदतमीज़ हो गई है इत्यादि.
लेकिन मनिका के भी दिल्ली आने के बाद से पर निकल चुके थे. वह अब वो मनिका नहीं रही थी जो मधु की नुक़्ताचीनी चुपचाप सुन लिया करती थी. उसने भी अपनी माँ से कह दिया कि वे बिना मतलब उस पर लगती रहती हैं जबकि उसकी कोई गलती नहीं होती.
इस पर मधु ने हमेशा की तरह उसके पापा पर उसे शह देने का आरोप मढ़ा था. जयसिंह की बात आने पर मनिका अब उनका भी पक्ष लेने लगी थी. आखिर उसने गुस्से में आ फोन ही डिसकनेक्ट कर दिया था. उसने फोन रखने से पहले अपनी माँ से कहा था,
"आपसे तो सौ गुना अच्छे हैं पापा… मेरा इतना ख़याल रखते हैं… बेचारे पता नहीं इतने साल से उन्होंने आपको कैसे झेला है…?"
उधर मधु अपनी बेटी के मुँह से ऐसी बात सुन स्तब्ध रह गई थी.
इधर मनिका ने शिकायत पर शिकायत करते हुए जयसिंह को बता रही थी कि कैसे मम्मी ने उसको फिर से डाँट दिया था.
"और बस एक बार जब वो शुरू हो जातीं है तो फिर पूरी दुनियाँ की कमियाँ मुझ में ही नज़र आने लगती है उनको… मनि ऐसी मनि वैसी… ढंग से बाहर निकलो, ढंग से कपड़े पहनो, ढंग से ये करना ढंग से वो करना… और जब कुछ नहीं बचता तो फिर आप का नाम लेकर ताने… पापा की शह है तुम्हें… पापा बिगाड़ रहे हैं तुम्हें… हद होती है मतलब…!"
मनिका का गुस्सा उसकी माँ की कही बातों को याद कर बार-बार फूट रहा था.
"मैं तो मर जाऊँ तो ही चैन आएगा उनको…" मनिका रुआंसी हो बोली.
जयसिंह उसके पास गए और उसके कंधे पर हाथ रख उसे ढाँढस बँधाते हुए बोले,
"तुम दोनों का भी हर बार का यही झगड़ा है… फिर भी हर बार तुम अपसेट हो जाती हो, कितनी बार कहा है बोलने दिया करो उसे…"
"हाँ पापा… पर मुझे बुरा नहीं लगता क्या… आप ही बताओ?" मनिका ने उनका सपोर्ट पा कर कहा और उन्हें बताया,
"मैंने भी कह दिया आज तो कि आपसे तो पापा अच्छे हैं और वो पता नहीं कैसे झेलते हैं आपको…"
"हैं…?" जयसिंह की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गई थी, "सचमुच ऐसा बोल दिया तुमने अपनी माँ से…?" उन्होंने पूछा.
"हाँ…" मनिका को भी अब लगा कि वह कुछ ज्यादा ही बोल गई थी.
"हाहाहा… मधु की तो धज्जियाँ उड़ा दीं तुमने…" जयसिंह हँसते हुए बोले.
"और क्या तो पापा मुझे गुस्सा आ गया था, तेज़ वाला…" मनिका ने धीरे से कहा, पर फिर अपनी गलती स्वीकारी, "पर ज्यादा ही बोल दिया कुछ…"
"हेहे… अरे तुम चिंता मत करो मैं सम्भाल लूँगा उसे…"
जयसिंह ने प्यार से मनिका का गाल खींच दिया था. मनिका भी अपनी मुस्कान रोक न सकी.
"ओह पापा काश मम्मी भी आप के जैसी कूल और प्यार करने वाली होती…" मनिका ने आह भर कहा.
जयसिंह ने मन ही मन सोचा,
"तेरी मम्मी भी मेरी तरह कूल हो जाती अगर उसके लंड होता तो… हाहाहा!"
फिर मुस्का कर खुद की तरफ इशारा करते हुए कहा,
"अब होती तो बात अलग थी मगर अब तो तुम्हें जो है उसी से काम चलाना पड़ेगा…"
कुछ देर समझाने-बुझाने पर मनिका का मूड कुछ ठीक होने लगा.
फिर जयसिंह ने मनिका के सामने ही अपनी बीवी को फोन लगा कर उसे बच्चों से टोका-टोकी न करने की अपनी हिदायत दोहरा दी थी. इस पर वह थोड़ी और बहल गई.
अब वे बैठ कर घूमने-फिरने का प्लान बनाने का सोच ही रहे थे कि जयसिंह के फ़ोन पर फिर से रिंग आने लगी.
कॉल उनके ऑफिस से था. इतने दिन ऑफिस से नदारद रहने की वजह वहाँ काम अटकने लगा था. सो जयसिंह फोन पर अपने असिस्टेंट से खोज-खबर लेने में लग गए.
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जब मनिका ने देखा कि जयसिंह लम्बी बातचीत करेंगे तो वह इधर-उधर पड़ा उनका छोटा-मोटा सामान व्यवस्थित करने लगी. फिर उसने बेड के पास रखा अपना सूटकेस खोला और लॉंड्री से वापस आए कपड़े जँचाने लगी.
मनिका और जयसिंह ने अपना सामान बेड की एक तरफ बनी एक अलमारी के पास नीचे रखा हुआ था.
शुरू में तो उनका सिर्फ़ दो दिन रुकने का प्लान था, सो उन्होंने अपना सामान ज्यादा खोला नहीं था. फिर जब उनका लम्बा रुकने का इरादा पक्का हो गया तो जयसिंह कुछ चीजें अलमारी में भी रखने लगे थे.
मनिका ने अपने कपड़े रखने के बाद सोचा कि पापा का सामान भी सेट कर देती हूँ. सो उसने अलमारी खोल ली.
अलमारी में जयसिंह के कपड़ों और शेविंग किट के अलावा होटल वालों की तरफ़ से कुछ चादर, तौलिए, इत्यादि भी रखे था. फिर उसने देखा कि नीचे वाले रैक में उसके शॉपिंग बैग भी रखे थे. जयसिंह से लड़ाई हो जाने के बाद मनिका तो इनके बारे में भूल ही गई थी. फिर जब उनके बीच सुलह हुई तो ख़ुशी के मारे उसे ये सब याद नहीं रहा था.
उसे याद आया कि उसके पापा ने तो वो बैग लाकर उनके सामान के पास ही रखे थे लेकिन शायद कमरे की साफ़-सफ़ाई करने आने वालों ने उन्हें उठाकर अलमारी में रख दिया था. मनिका ने सारे बैग निकाले और उत्साह से बेड पर बैठ अपनी लाई चीज़ें निकालने लगी. जयसिंह की पीठ उसकी तरफ़ थी और वे अभी भी फोन पर बात कर रहे थे.
अपने नए कपड़े देख-देख मनिका खुश होने लगी.
“O wow!… मेरे पास कितनी सारी नई ड्रेसें आ गई हैं… सबको दिखाने में कितना मजा आएगा… हहा!"
अपनी सहेलियों की प्रतिक्रियाएँ सोच वह आनंदित हो रही थी.
"पर… मम्मी देखेंगी जब…? फिर से वही लड़ाई होगी… खर्चा कम… ढंग के कपड़े… और तेरे पापा… ले-देके यही चार बातें हैं उनके पास…"
मधु से लड़ाई अभी भी उसके जेहन में ताजी थी और उसके विचार घूम-फिर के फिर उन्हीं बातों पर लौट आए थे.
"पर पापा ने कहा कि वे मम्मी को सम्भाल लेंगे… हा… पापा के सामने फ़ुस्स हो जाती है मम्मी की तोप भी… हीहाहा… अरे! कल पापा ने कहा था कि उन्हें तो दिखाया ही नहीं कि क्या कुछ शॉप कर के लाई हूँ?”
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कुर्सी पर बैठे हुए जयसिंह अपने असिस्टेंट को ऑफिस में आ रही दिक्कतों को सम्भालने के तौर-तरीक़े समझा रहे थे. जब मनिका की आवाज़ आई.
“पापा…”
“हूँ?” उन्होंने उसकी तरफ़ बिना देखे ही पूछा.
“क्या पापा, फ़ोन रखो ना… देखो मेरी नई ड्रेसेज़ देखते हैं.”
जयसिंह ने कुर्सी पर बैठे हुए ही मुड़ कर पीछे देखा और फोन में बोले,
"हाँ माथुर, जो मैंने कहा है वो करो. कोई दिक्कत हो तो कल मुझे कॉल कर लेना, अभी थोड़ा बिजी हूँ…"
माथुर ने उधर से कुछ कहा था लेकिन मनिका की बात सुनते ही जयसिंह फोन काट चुके थे.
मनिका शॉपिंग का सामान लेकर उनके पास आ बैठी. जयसिंह ने कौतुहल से उसके हाथ में पकड़े कपड़े और शॉपिंग बैग देखे और बोले,
“हाँ भई देखें तो क्या कुछ आया है इतना खर्चा कर के.”
“क्या पापा! आपने तो कहा था पैसों कि चिंता नहीं करनी.” मनिका ने सामान टेबल पर फैलाते हुए मुँह बनाया.
“अरे चिंता नहीं करनी है पर पता तो हो कहाँ लगे हैं…” जयसिंह ने हँस कर कहा.
“हीही…” मनिका खिखियाई.
मनिका ने पहले अपनी पसंद की ड्रेसों वाला बैग ही खोला था. टेबल पर अब तीन जोड़ी जींस, दो जोड़ी हॉट-पैंट्स, जो कि एक प्रकार की कसी हुई छोटी शॉर्ट्स होती हैं, एक स्कर्ट, एक पार्टी ड्रेस और कुछ टी-शर्ट रखीं थी. जयसिंह ने उन्हें उलट-पलट कर देखा. मनिका बोली,
“तो पापा? कैसी लगी मेरी ड्रेसेज़?”
“अच्छी हैं…” जयसिंह ने छोटा सा जवाब दिया.
“क्या पापा, बस अच्छी हैं?” मनिका ने मुँह लटकाते हुए कहा.
“अरे भई, पहन के दिखाओ तो पता चले. मुझे क्या पता लड़कियों के कपड़ों का…”
“हेहे पापा… बात तो सही है. रुको अभी पहन के आती हूँ.”
मनिका ने एक जींस और टॉप उठाया और बाथरूम में जा घुसी. कुछ देर बाद जब वो वापस आई तो जयसिंह ने मुस्कुरा कर उसकी तारीफ़ कर दी.
“Looking great Manika… काफ़ी अच्छी फ़िटिंग के लग रहे हैं कपड़े तो.”
“हाँ पापा… and they are so comfortable also…” मनिका ने चहचहा कर कहा.
फिर मनिका ने अपना फोन उनकी तरफ बढ़ाया,
"पापा मेरी पिक्स तो ले दो… फ्रेंड्स को भेजूंगी और जलाऊँगी… हीही…"
लेकिन जयसिंह ने उसके ऐसा कहते ही अपने फोन का कैमरा ऑन कर लिया. सो मनिका ने अपना फोन पास रखे टेबल पर रख दिया और पोज़ बनाते हुए बोली,
"अच्छा फिर मुझे सेंड कर देना पिक्स बाद में…"
"हम्म…" जयसिंह उसका फोटो खींचते हुए बोले.
चिड़िया पिंजरे में आ बैठी थी.
फिर मनिका ने बाक़ी की दो जींस पहन कर दिखाई. उस पर भी जयसिंह ने उसकी तारीफ़ में कोई कमीं नहीं छोड़ी. लेकिन अब जो ड्रेसेज़ बचीं थी वो सभी मनिका ने उस छोटे कपड़ों वाले सेक्शन से ली थी. सो वो थोड़ी सकपका कर जयसिंह के पास आ बैठी और बोली,
“पापा पिक्स दिखाओ ना कैसी आई है?”
“अरे पहले सारे कपड़े ट्राई तो कर लो.” जयसिंह ने आवाज़ में बिना कोई भाव लाए कहा.
“ओह… वो पापा…” मनिका से कुछ कहते न बना.
“क्या हुआ?”
“वो ड्रेसेज़ थोड़ी मॉडर्न सी हैं…”
जयसिंह तो उसकी मन:स्थिति पहले भी भाँप चुके थे.
“अरे मैं भी तो देखूँ कैसी होती हैं मॉडर्न ड्रेसेज़… अपने इन्वेस्टमेंट का रिटर्न तो मिले.” उन्होंने ठिठोली के अंदाज़ में कहा.
“हेहे… क्या पापा, आप भी न… लाओ पहन कर आती हूँ.”
मनिका ने पहले एक टॉप और स्कर्ट उठाया और बाथरूम में आ गई. उस चटख लाल स्लीवलेस टी-शर्ट और काली शॉर्ट-स्कर्ट को लेकर वो संकोच में पड़ गई कि,
"पता नहीं पापा क्या सोचेंगे?"
पर फिर उसे अपनी माँ की समझाईशें याद आ गई और उसने चिढ़ कर कपड़े बदल लिए. बाथरूम के शीशे में उसने अपने-आप को निहारा तो उसे जयसिंह की बात याद आ गई,
"कपड़े ही तो हैं…"
और वो मुस्कुराती हुई बाहर निकल आई.
पर उसने यह नहीं सोचा था कि कपड़ों के अंदर जिस्म भी तो होते हैं.
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"तो पापा? कैसी लग रही हूँ मैं?" मनिका ने चहक कर पूछा. उसके पूरे बदन में एक अजीब सी सनसनी थी.
"बहुत खूबसूरत है ये ड्रेस तो… बिलकुल तुम्हारे जैसी…" जयसिंह ऊपर से नीचे तक उसे देखते हुए बोले.
मनिका को हल्की सी लाज आई पर वह खड़ी रही.
स्कर्ट उसके घुटनों से थोड़ा ऊपर तक का था. उसकी गोरी-गोरी बाँहें और जाँघें देख जयसिंह को उसके साथ बिताई पहली रात याद आ गई,
"ओह्ह मैं तो भूल ही गया था कि कितनी चिकनी है ये कमीनी…"
अब मनिका बारी-बारी से वो छोटे-छोटे कपड़े बदल कर उनके सामने आने लगी और जयसिंह उसके फोटो लेने लगे.
जब वह अपनी डेनिम हॉट-पैंट्स पहन कर आई थी, उसकी जवान जाँघों के उभार ने जयसिंह को निरुत्तर कर दिया था. ऊपर से उसकी ज्यादातर नई टी-शर्टें स्लीवेलेस थी. जयसिंह का लंड उछाल मार रहा था. हर बार मनिका के बाथरूम में जाते ही जयसिंह लंड को शांत करने के प्रयास चालू कर देते थे.
उसके बाद मनिका एक काली पार्टी-ड्रेस पहन कर बाहर निकली. जयसिंह उसे देखते ही तड़प गए. ड्रेस का गला भी थोड़ा गहरा था जिससे मनिका के वक्ष की घाटी नज़र आ रही थी. ड्रेस की लंबाई भी पहले वाले स्कर्ट के मुकाबले कम थी. लेकिन ड्रेस की सबसे उत्तेजक बात थी उसका सिल्की कपड़ा. जिसने मनिका के बदन से चिपक कर उसके उभारों को निखार दिया था. साथ ही, उसकी ब्रा-पैंटी की रेखाएँ भी साफ़ नज़र आ रही थी.
मनिका पहले-पहल तो शीशे में अच्छे से देख-भाल कर बाहर आ रही थी. लेकिन बार-बार कपड़े बदलने के कारण उसका ध्यान जल्दी बाहर आ कर अपने पापा की तारीफ़ें बटोरने की तरफ़ ज़्यादा हो गया था. इस बार वह ड्रेस पहनते ही एक नज़र अपने-आप को देख बाहर आ गई थी. उसने यह नहीं सोचा कि रेशमी कपड़े पहनने के बाद अक्सर बदन से चिपक जाते हैं.
उस ड्रेस का कपड़ा उसके बाहर आते-आते ही उसके बदन से चिपकना शुरू हुआ था. पर उसे अपनी इस स्थिति का कोई अंदाज़ा न था.
इस बार फोटो खींचते वक्त जयसिंह का हाथ एकबारगी काँप गया.
मनिका के पास दिखाने को अब और कोई ड्रेस नहीं बची थी सो वह खड़ी रही. उसने देखा कि इस बार जयसिंह ने ज्यादा फोटो लिए थे.
"बस पापा इतनी ही थीं…" मनिका ने उन्हें बताया.
"बस? इतने से कपड़ों का बिल था वो…?" जयसिंह ने हैरानी जताई.
"हाहाहा… मैंने कहा था ना पापा… क्या हुआ शॉक लग गया आपको?" मनिका ने हँसते हुए उनके थोड़ा करीब आते हुए कहा.
"नहीं-नहीं… पैसे की फ़िक्र थोड़े ही कर रहा हूँ. मुझे लगा और भी ड्रेस होंगी…" जयसिंह ने मुस्का कर कहा.
फिर उसे अपनी गोद में आने का इशारा किया.
मनिका इतनी कातिल लग रही थी कि लाख रोकने के बाद भी वे अपने लंड की डिमांड को अनसुना नहीं कर सके थे.
उनका इशारा समझ मनिका ने थोड़ी आनाक़ानी की, क्योंकि उसे एहसास हुआ कि ड्रेस छोटी थी. अमूमन ऐसी ड्रेस के नीचे सेम कलर की शॉर्ट-नुमा पैंटी पहनी जाती हैं. ताकि बैठने पर अगर ड्रेस थोड़ी ऊपर भी हो तो कुछ अप्रिय न घट जाए. पर मनिका ने तो सिर्फ़ पैंटी पहन रखी थी, वो भी थोंग. अगर वह जयसिंह की जाँघ पर बैठती तो उसके अंडरवियर के एक्सपोज़ होने का खतरा था.
मनिका को यह आभास अजीब सा लगा. पर उसने अपने चेहरे पर शरम की अभिव्यक्ति नहीं होने दी.
लेकिन जयसिंह भी कहाँ मानने वाले थे.
"अरे नई ड्रेस में एक फ़ोटो तो पापा के साथ भी बनता है. Come on darling…"
इस बार उनका सम्बोधन भी उकसाऊ था, और अंग्रेज़ी भी.
मनिका धीरे-धीरे चल कर उनके पास आई. उसने अपने हाथों से ड्रेस पकड़ रखी थी. फिर वो टांगें भींच जयसिंह की गोद में बैठ गई.
जयसिंह ने उसकी कमर में हाथ डाल अपने से सटा लिया और फ़ोन का फ़्रंट कैमरा ऑन किया. वे थोड़ा ऊपर हाथ कर के सेल्फ़ी लेने लगे.
जब मनिका ने फ़ोन की स्क्रीन में अपनी नग्न जाँघें देखी तो उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी. फिर उसके पापा ने फ़ोन इतना ऊपर पकड़ा था कि उसका वक्ष भी नज़र आ रहा था. अनायास ही उसका चेहरा लाल हो गया. तब तक जयसिंह ने मुस्कुराते हुए दो-तीन फ़ोटो ले लिए थे.
"हाय! ये पिक्स तो डिलीट कर दूँगी पापा से लेकर…" मनिका ने मन ही मन सोचा.
जयसिंह भी उसकी असहजता भाँप गए थे. सो उन्होंने उसे बहलाने के लिए पूछा कि वो और क्या कुछ लेकर आई थी. फ़ोन का कैमरा बंद हुआ तो मनिका भी थोड़ा सहज हुई.
"और तो पापा दो पर्स लिए थे मैंने और एक वॉच… और क्या था…? हाँ बेल्ट और… सैंडिलस्…" मनिका सोच-सोच कर गिनाने लगी.
"अच्छा-अच्छा ठीक है." जयसिंह ने कहा.
"पापा मैं चेंज कर के आती हूँ… फिर मुझे पिक्स दिखाना."
फिर जयसिंह को याद आया,
"मनिका…!"
"जी पापा?" मनिका बाथरूम के दरवाजे पर पहुँच रुक गई थी.
"वो मेरी दिलाई चीज़ तो तुमने दिखाई ही नहीं पहन कर…" जयसिंह ने मुस्कुराते हुए कहा.
"कौनसी चीज़…? ओह्ह… हाँ पापा… भूल गई मैं… रुको."
मनिका उनकी बात पर मुस्कुरा उठी थी. उसका एक शॉपिंग बैग अभी भी बेड पर रखा था. वो बेड के पास गई और बैग से सामान बेड पर बिखेर लेग्गिंग्स की जोड़ी खोजने लगी. ऐसा करते हुए वो थोड़ा झुक गई थी.
जयसिंह ने देखा कि मनिका ने अपना एक घुटना मोड़ कर बेड पर रखा हुआ था और उसका दूसरा पैर नीचे फर्श पर था. वह आगे झुकी हुई थी सो उसकी कमर और नितम्ब ऊपर हो गए थे, और साथ ही वह ड्रेस भी. मनिका के नितम्बों के नीचे की गोलाइयों का हल्का भाग नज़र आ रहा था. जयसिंह का बदन एक बार फिर से गरमा गया. उन्होंने अपने बचे-खुचे विवेक का इस्तेमाल करते हुए फ़ोन का कैमरा चालू कर वीडियो मोड पर किया. फिर उस मादक से पोज़ में झुकी अपनी बेटी की गांड का वीडियो बनाने लगे.
कुछ दस सेकंड यह वाकया चला जिसके बाद मनिका ने सीधे हो कर मुस्कुराते हुए जयसिंह को अपने हाथ में ली हुई लेग्गिंग्स दिखाई और बाथरूम में चली गई.
जयसिंह ने फटाफट वीडियो बंद कर दिया था. उसके जाते ही उन्होंने अपने फोन की गैलरी खोली, विडीयो सेव हो गया था. लेकिन गैलरी में उसका आइकॉन देख मनिका को जयसिंह की कारस्तानी का साफ़ पता चल जाना था. जयसिंह ने जल्दी से वीडियो और उसके पहले ली तस्वीरों का बैकअप ले उस वीडियो को वहाँ से डिलीट कर दिया.
मनिका को लेग्गिंग पहन कर बाहर आने में थोड़ा वक्त लग गया. खड़े-खड़े इतनी पतली पायज़ामी पहनने में उसे थोड़ी मशक़्क़त करनी पड़ी थी. तब तक जयसिंह ने भी अपनी सेफ साइड रख ली थी. मनिका ने ऊपर से एक टी-शर्ट डाली और इस बार बिना आईना देखे ही बाहर आ गई. जयसिंह जो अभी अपने-आप को शांत कर ही रहे थे, पर कहर बरप पड़ा.
एक तो जयसिंह ने पहले ही लेग्गिंग चार साइज़ छोटी ले कर दी थी, उस पर उसका कपड़ा बिलकुल झीना था, तिस पर उसका रंग भी लाइट-स्किन कलर जैसा था; और मनिका यह सब बिन देखे ही बाहर निकल आई थी. लेग्गिंग्स के रंग की वजह से ऐसा लग रहा था कि मनिका ने नीचे कुछ नहीं पहन रखा. ऊपर से इतनी टाइट लेग्गिंग्स में उसके अधो-भाग का एक-एक उभार नज़र आ रहा था.
जयसिंह के बदन में करंट दौड़ने लगा.
अभी तक तो उन्हें अपनी बेटी के मॉडर्न कपड़ों में उसकी जाँघों और नितम्बों का ही दीदार अच्छे से होता आया था. लेकिन यह लेग्गिंग्स इतनी ज्यादा टाइट कसी हुई थी कि कपड़ा पूरी तरह से उसकी जाँघों और योनि पर चिपक गया था. मनिका की टांगों के बीच का फ़ासला और योनि का उभार साफ़ दिख रहा था.
"कैसी लग रहीं है पापा?" मनिका चहकते हुए बाहर आई थी.
"उह्…" जयसिंह ने कुछ शब्द निकालने का प्रयास किया था पर सिर्फ आह ही निकल सकी.
चलते हुए मनिका उनके पास आ पहुंची.
जयसिंह को पहले से ही इल्म था की कहाँ-कहाँ ध्यान से देखने पर मनिका के जिस्मानी जादू का लुत्फ़ उठाया जा सकता है. उनकी नज़र सीधी उसके गुप्तांग पर जा टिकी. उसके करीब आते-आते उन्हें उसकी पहनी हुई पैंटी के रंग और साइज़ का पता चल चुका था. लेग्गिंग्स इतनी लाइट कलर की और झीनी थी कि मनिका कि पैंटी साफ़ नज़र आ रही थी. उसने आज अपनी आसमानी रंग वाली थोंग पहन रखी थी.
मनिका की उभरी हुई योनि देख जयसिंह वैसे ही आपा खो रहे थे जब मनिका ठीक उनके सामने आ कर खड़ी हो गई.
"बताओ न पापा?"
"बहुत… बहुत अच्छी ल… लग रही है…" जयसिंह ने तरस कर कहा.
अपने लंड को काबू करने की उनकी सारी कोशिशें बेकार जा चुकीं थी.
इस बार मनिका अपने-आप ही उनकी गोद में आ बैठी. जयसिंह को अपनी बेटी की कच्ची सी योनि अपनी जाँघ पर टिकती हुई महसूस हुई, उनकी रूह काँप गई.
“Oh Manika, you are so beautiful…” उनके मुँह से निकला.
"इश्श पापा… you are making me shy…” मनिका ने मुस्काते हुए जवाब दिया, "इतनी भी सुन्दर नहीं हूँ मैं… मुझे बहलाओ मत…"
"तुम्हें क्या पता?" जयसिंह ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा और फिर से अपना दूसरा हाथ उसकी जाँघ पर रख लिया.
मनिका की योनि का आभास उन्हें पागल किए जा रहा था.
"आज तो रेप होगा मुझसे लग रहा है..!" जयसिंह ने मन ही मन अपनी लाचारी व्यक्त की.
असल में मनिका को भी जयसिंह की तारीफ़ बहुत भाई थी. एक बात और थी जिसने आज मनिका को अपनी ये फैशन परेड करने के लिए उकसाया था. लेकिन जिसका भान अभी उसके चेतन मन को नहीं हुआ था. पिछली रोज जब जयसिंह टीवी में दिखाई जा रही लड़कियाँ ताड़ रहे थे तो मनिका ने नोटिस कर लिया था व उन्हें छेड़ा था. शायद उस बात ने भी आज कहीं ना कहीं एक भूमिका निभाई थी.
जयसिंह उसकी जाँघ सहलाना शुरू कर चुके थे.
"पापा फ़ोन दो ना. पिक्स देखते हैं…" मनिका बोली.
जयसिंह ने उसकी जाँघ से हाथ हटा अपने बाजू में रखा फ़ोन उसे पकड़ा दिया और फिर से उसकी जाँघों पर हाथ ले गए. मनिका फ़ोन की फोटो-गैलरी खोल जयसिंह की ली हुई तस्वीरें देखने लगी.
शुरुआत की कुछ फोटो देख वह बोली,
"पापा! कितनी अच्छी पिक्स ली है आपने… and these dresses are looking amazing na?”
उसने अपने साथ-साथ जयसिंह की भी तारीफ़ करते हुए पूछा था.
जयसिंह को तो हाँ कहना ही था, उनका खड़ा हुआ लिंग भी उनके अंडरवियर में कसमसा कर हाँ कह रहा था.
फिर आगे मनिका की छोटी ड्रेसेज़ वाले फोटो आने शुरू हो गए. इस बार वह झेंप गई. जयसिंह ने फोटो भी ज्यादा ले रखे थे सो उन्हें आगे कर-कर देखते हुए उसकी झेंप शरम में तब्दील होती जा रही थी. उसने पार्टी-ड्रेस वाले एक फोटो पर रुकते हुए डिलीट-बटन दबाया. जयसिंह ने तपाक से पूछा कि वह क्या कर रही है? तो उसने थोड़ा सकुचा कर कहा कि वे फोटो ज्यादा अच्छे नहीं आए थे. जिसका असली मतलब था कि उनमें उसके पहने अंडरगारमेंट्स का पता चल रहा था.
मनिका ने एक दो फोटो ही डिलीट किए थे कि जयसिंह के फ़ोन पर एक बार फिर से रिंग आने लगी, ऑफिस से माथुर का फ़ोन था.
"ओहो आज तो कुछ ज्यादा ही कॉल्स आ रहीं है आपको…!" मनिका ने झुंझला कर कहा.
"बजने दो… अभी तो बात की थी…" जयसिंह ने कहा.
उनका चेहरा अब मनिका के बालों के पास था और वे उनकी भीनी-भीनी ख़ुशबू में खोए थे.
मनिका ने फ़ोन के अपने-आप डिसकनेक्ट हो जाने तक इंतज़ार किया और फिर से वो सब फ़ोटो डिलीट करने लगी जो उसे ज्यादा ही अंतरंग लगीं.
लेकिन सब चीज़ों का बैकअप ले चुके जयसिंह बेफिक्र थे. फ़ोन एक बार फिर से बजने लगा.
"हाँ माथुर बोलो?" जयसिंह ने मनिका से फ़ोन लेकर तल्खी से पूछा.
उनके सेक्रेटरी ने उन्हें बताया की उनका एक बहुत बड़ा क्लाइंट उनसे बात करने के लिए रोज कॉल कर रहा था, और वह भी अभी दिल्ली में था. माथुर ने जब उसे जयसिंह के दिल्ली गए होने की सूचना दी थी, तो उसने मीटिंग फिक्स करने के लिए कहा था. सो इसी बाबत उनका सेक्रेटरी उन्हें कॉल पर कॉल कर रहा था.
जयसिंह सोच में पड़ गए. यह क्लाइंट बहुत बड़ी आसामी थी, सो मीटिंग करनी ज़रूरी थी. उन्होंने सेक्रेटरी से मीटिंग फिक्स कर उन्हें कॉल करने को कहा. अचानक घटनाक्रम में हुए परिवर्तन ने उनके हवस के मीटर की सुई को चरम पर पहुँच कर टूटने से बचा लिया था.
"कुछ करना पड़ेगा…जल्द." जयसिंह ने गोद में बैठी मनिका की तरफ़ देख सोचा, फिर उससे बोले,
"जाना पड़ेगा मुझे… एक क्लाइंट यहाँ आया हुआ है." जयसिंह ने मनिका से कहा.
“But papa, we are on a holiday na?” मनिका ने बेमन से कहा.
“Yes darling, I know… पर ये काफी मालदार क्लाइंट है… इन जैसों से ही तुम्हारी शॉपिंग पूरी होती है." जयसिंह ने उसके गाल सहला उसे बहलाया.
“चलो… get up now… I have to get ready.” जयसिंह ने आगे कहा.
फिर भी मनिका के न उठने पर जयसिंह ने काम-वासना के वशीभूत अपने हाथ से मनिका के नितम्ब पर हल्की सी थपकी दे दी.
पर अगले ही पल उनका दिल मनिका के रिऐक्शन को लेकर आशंकित हो तेज़ी से धड़कने लगा.
"Ouch… okay-okay papa!” मनिका उचक कर खड़ी हो गई. उसे अंदेशा नहीं था कि पापा इस तरह उसे छुएँगे.
जयसिंह ने ऐसा दर्शाया कि उन्होंने कोई गलत या अजीब हरकत नहीं की थी. वे उठ कर मीटिंग के लिए तैयार होने चल दिए.
उनके उस आकस्मिक स्पर्श से मनिका को अपनी गांड में एक हल्की सी तरंग उठती महसूस हुई. वह कुछ पल वैसे ही खड़ी उनको जाते हुए देखती रही.
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जयसिंह के मीटिंग में जाने के बाद मनिका ने अपने नए कपड़े समेटने शुरू किए. सब कुछ सूटकेस में रखने के बाद वह बाथरूम में गई ताकि लेग्गिंग्स बदल कर अपनी पहले वाली पोशाक पहन सके. लेकिन जब उसकी नज़र बाथरूम के शीशे पर पड़ी तो उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई. लेग्गिंग्स का कलर और कसाव देख उसे एहसास हुआ कि उसने अपने पापा को अभी-अभी क्या कुछ दिखा दिया था. शीशे से कुछ दूर खड़ी होने पर भी उसे अपनी पैंटी साफ़ दिख रही थी.
“Oh god… फिर से! इस ट्रिप पर तो पता नहीं क्या हो रहा है!" उसने अपने दिल को थामते हुए सोचा. "जितना पापा के सामने ढंग से रहने की कोशिश करती हूँ, उतना ही बड़ा अनर्थ हो जाता है… he could see my panties in these leggings!"
पर अब क्या हो सकता था, मनिका ने कपड़े बदले और भारी मन से बेड पर लेट गई. इतना सब होने के बाद भी जयसिंह का सामान्य बर्ताव करना उसे आश्चर्यचकित भी करता था और लुभाता भी था. हर ग़लती के साथ जैसे वह अपने पिता के साथ और ज़्यादा खुलती जा रही थी. इस बार तो उसे उबरने में भी ज़्यादा वक़्त नहीं लगा था. वह सोच रही थी,
“But papa is so cool and caring… वो तो बस मेरी तारीफ़ ही करते हैं, जैसे उन्हें फ़र्क़ ही नहीं पड़ता कि मैंने क्या पहना है… पर क्या उन्हें अजीब नहीं लगता होगा, मुझे ऐसे कपड़ों में देखना…? हाय! कितना सोचा था मैंने… after our first night… I mean first night staying in this hotel… कि ढंग से कपड़े पहनूँगी… और आज सब कबाड़ा हो गया."
फ़र्स्ट नाइट शब्द मन में आने पर मनिका को एक बार के लिए सुहागरात का ख़याल आ गया था. तभी उसने अपनी सोच में सुधार कर अपने-आप को सफ़ाई दी थी.
"पर फिर भी… उस दिन कितना छेड़ा था मुझे… और टीवी पर वो लांज़रे वाला एड… हाय! उसमें लिखे कैप्शन देख कर तो पापा ये भी जान गए होंगे कि मैं… hot and sexy thongs… पहनती हूँ… कल तो पापा की तबियत ख़राब थी तो ये सब भूल गई थी… पर यार… I keep embarrassing myself… उस सेल्स गर्ल के कहने पर पापा इतनी टाइट लेग्गिंग्स उठा लाए कि… सब दिख गया उन्हें… और मुझे उठाने के लिए… he slapped my bums today… पर वो तो उन्होंने ऐसे ही… मगर फिर भी… कितना फ़्रैंक हो गए हैं हम यहाँ आकर. बिलकुल मूवीज़ में जैसा दिखाते हैं वैसे…"
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