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Kya likhte ho bhai maza aa gayaअध्याय ४
घर के अंदर पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ था। लल्लू सुबह-सुबह खेतों में काम करने चला गया था और कोमल अपनी सहेली के घर गई थी और लीला घर पर अकेली थी।
लीला आंगन में पुरानी लकड़ी की चारपाई पर बैठी हुई थी, उसके सामने एक पुरानी साड़ी पड़ी थी जिस पर से वह धूल झाड़ रही थी लेकिन उसका ध्यान बिलकुल कहीं और था, उसका भारी-भरकम बदन गर्मी के कारण पसीने से तर था, ब्लाउज उसके मोटे, भरे हुए स्तनों पर तनी हुई थी, गर्दन से लेकर क्लीवेज तक पसीना बह रहा था। बीच-बीच में उसकी सांसें भारी हो रही थीं स्तनों के निप्पल ब्लाउज के अंदर सख्त होकर चुभ रहे थे और उसकी चूत में हल्की-हल्की लेकिन लगातार खुजली हो रही थी।
लीला ने एक लंबी, गहरी सांस ली, उसने खुद को मन ही मन डाँटा “क्या सोच रही है तू लीला? ये गलत है... लल्लू तेरा बेटा है... तू विधवा है।”
लेकिन जितना वह खुद को समझाने की कोशिश कर रही थी उतना ही उसके बदन में आग बढ़ती जा रही थी। उसकी जांघें आपस में कस गई थीं, वह अनजाने में ही अपनी जांघों को रगड़ रही थी जिससे चूत में हल्की-हल्की सनसनी बढ़ रही थी।
आज सुबह की घटना ने उसकी भूख को और उकसा दिया था। लल्लू के कमरे में उसका ढीली धोती के अंदर तना हुआ लम्बा और मोटा उभार, बार-बार उसके दिमाग में घूम रहा था।
तभी अचानक दरवाजे किसी की दस्तक हुई।
“भाभी... घर पर हो क्या?”
लीला चौंककर खड़ी हो गई, उसने जल्दी से साड़ी का पल्लू ठीक किया और धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ गई, उसके मन में हल्का-सा डर और उत्सुकता दोनों एक साथ उभर रहे थे, उसने दरवाजा खोला तो सामने रामू खड़ा था।
रामू, चालीस साल का, ठरकी आदमी था। तालाब के किनारे उसका छोटा–सा मकान था। रामू, लीला का देवर था, उसकी पत्नी शशि, पैंतीस साल की, गृहिणी थी। बेटी नीतू, उन्नीस साल की, घर के काम में अपनी मां की मदद करती थी। साला संजय, तीस साल का, गांव में छोटा–सा मेडिकल स्टोर चलाता था।
“अरे देवर जी... तुम?” लीला ने थोड़ा हैरानी से लेकिन सामान्य स्वर में कहा।
रामू ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ भाभी, मैं ही हूँ। कैसी हो? अंदर आ सकता हूं?”
लीला ने हल्का सा हिचकिचाते हुए दरवाजा थोड़ा और खोला और बोली, “ठीक हूं, हाँ... आ जाओ”
रामू अंदर आया और पुरानी चौकी पर बैठ गया, उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई और पूछा, “भाभी, आज घर में बिलकुल सन्नाटा है, लल्लू और कोमल कहाँ हैं?”
लीला खड़ी-खड़ी ही बोली, “लल्लू तो सुबह–सुबह खेत चला गया था। कोमल अपनी सहेली के घर गई है, दोनों शाम को ही लौटेंगे।”
रामू ने सिर हिलाया और बोला, “अच्छा... तो आज तुम पूरी तरह अकेली हो।”
लीला को यह वाक्य थोड़ा अजीब लगा, वह हल्के से बोली, “हाँ देवर जी, अकेली ही हूँ, क्यों?”
रामू ने आराम से चौकी पर पीछे टेक लगाई और मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, पिछले महीने से गेहूँ के फसल की कटाई में दिन-रात लगा हुआ था। आज थोड़ा समय मिला तो सोचा कि चलो भाभी के पास हो आऊँ।”
लीला ने साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए कहा, “अच्छा! देवर जी, मैं चाय बना कर लाती हूँ।”
लीला मुड़कर रसोई की ओर बढ़ी तो रामू की नजर उसके हिलते-डुलते गोल नितंबों पर चली गई, लीला ने उसकी नजर महसूस की जिससे उसके भारी–भरकम बदन में एक हल्की-सी सिहरन दौड़ गई।
रामू ने पीछे से आवाज लगाई, “भाभी, चाय में थोड़ी ज्यादा चीनी डालना, धूप से आया हूं पूरा शरीर सूख गया है।”
लीला ने बिना मुड़े हल्के से जवाब दिया, “ठीक है... देवर जी”
रसोई में लीला ने चाय का पानी चढ़ाया, उसके हाथ हल्के काँप रहे थे। रामू की नजरें उसके अंदर मौजूद बेचैनी को और बढ़ा रही थीं।
लीला रसोई से चाय का ट्रे लेकर वापस आंगन में आ गई, रामू चौकी पर आराम से बैठा था, उसने लीला को आते हुए देखा तो बिल्कुल सीधा हो गया।
लीला ने चाय का कप रामू के सामने रख दिया और खुद उसके सामने वाली चौकी पर अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करके बैठ गई।
रामू ने चाय का कप उठाया, एक घूँट लिया और बोला, “भाभी, चाय तो बहुत अच्छी बनाई है तुमने।”
लीला ने हल्के से सिर हिलाया और बोली, “धन्यवाद, देवर जी।”
कुछ देर चुप रहने के बाद रामू ने बात शुरू की, “भाभी, आजकल खेतों की हालत देखकर मन खराब हो जाता है।”
लीला ने चाय का घूँट लेते हुए पूछा, “क्यों? फसल अच्छी नहीं आई क्या?”
रामू ने सिर हिलाया और बोला, “फसल तो ठीक-ठाक आई है, लेकिन समस्या ये है कि खेत बहुत सूख गए हैं भाभी, मिट्टी पूरी तरह सूखकर कड़ी हो गई है।
लीला बोली "तो ठीक से पानी क्यों नहीं डाल रहे हो, देवर जी?"
रामू ने आगे कहा, “सूखे खेत में सिर्फ पानी डालने से काम नहीं चलता, भाभी। उसकी अच्छे से जुताई करनी पड़ती है हल को गहराई तक घुसाना पड़ता है फिर जोर-जोर से चलाना पड़ता है, बार-बार फेरना पड़ता है।”
लीला की सांस थोड़ी तेज हो गई, उसने शर्माते हुए कहा, “देवर जी, तुम कहना क्या चाहते हो?”
रामू ने लीला की आँखों में देखते हुए मुस्कुराकर कहा, "देखो भाभी, तुम्हारा खेत भी तो पांच साल से सूखा पड़ा है भैया के जाने के बाद शायद उसमें कोई भी हल नहीं डाला गया, मिट्टी कितनी कड़ी हो गई होगी, तुम्हारे खेत को भी तो अंदर तक प्यास लगी होगी।
लीला का चेहरा शर्म से लाल हो गया, उसने नजरें झुका लीं, उसके अंदर फिर से गर्मी बढ़ने लगी थी लेकिन बाहर से उसने खुद को संभालते हुए कहा, “मेरा खेत सूखा है तो क्या हुआ? तुम्हें उसकी इतनी चिंता क्यों हो रही है देवर जी!”
रामू ने चाय का आखिरी घूँट लिया और धीरे से बोला, “चिंता इसलिए हो रही है भाभी, क्योंकि मेरे भैया का खेत है और जब मैं देखता हूँ कि घर का खेत सूखा पड़ा है, तो मन नहीं मानता। ऐसा लगता है कि अगर कोई मजबूत हल डाल दिया जाए, अच्छे से जुताई कर दी जाए तो शायद खेत फिर से हरा-भरा और रसीला हो सकता है।”
लीला की सांसें तेज हो गई थीं, उसके स्तन हल्के-हल्के ऊपर-नीचे हो रहे थे, उसका चेहरा और लाल हो गया, उसने चाय का कप नीचे रख दिया। लीला की जांघें आपस में कस गई, उसकी चूत में गर्मी बढ़ रही थी और वह अनजाने में ही अपनी जांघें रगड़ रही थी।
लीला हल्का सा तेज स्वर में बोली "ये क्या बकवास कर रहे हो देवर जी?"
रामू ने आगे झुकते हुए धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज में कहा, "बकवास नहीं सच बोल रहा हूं, भाभी। जब भी मैं तुम्हारे खेत के पास से गुजरता हूँ तो मुझे दुख होता है।"
लीला ने शर्म से नजरें झुकाए रखते हुए हल्के से कहा, “देवर जी... मेरे खेत की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है तुम्हें?”
रामू ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“जरूरत कैसे नहीं है भाभी, तुम्हारे खेत को बहुत समय से जुताई नहीं मिली है, बस तुम एक बार इजाजत दे दो फिर जितना पानी खेत के लिए लगेगा उतना पानी लगातार डालता रहूंगा।”
लीला की चूत अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी और अंदर से हल्के-हल्के सिकुड़–फैल रही थी।
लीला संकोच करते हुए बोली, “बस करो! देवर–भाभी के बीच ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं।"
रामू ने हल्के से हँसकर कहा, “देवर हूँ इसलिए तो कह रहा हूँ भाभी, मैं सोचता हूँ कि मैं अपना मजबूत हल लेकर आ जाऊँ, पहले तो खेत को अच्छे से गहराई तक जोत दूँ फिर इतना पानी डालूँ कि सूखी मिट्टी पूरी तरह भीग जाए और नरम हो जाए।”
लीला ने नजरें झुकाए रखते हुए धीरे से कहा, “मुझे बहुत शर्म आ रही है देवर जी, ऐसी बातें मत करो"
फिर भी रामू रुका नहीं, वह थोड़ा और आगे झुककर बोला, “शर्म की क्या बात है भाभी, मैं तो बस खेत की बात कर रहा हूं अगर खेत में कोई हल नहीं डाला जाए तो मिट्टी बिलकुल बंजर हो जाती है घर का सूखा खेत देखकर कोई भी किसान चुप नहीं रह सकता, अभी भी हल नहीं डाला गया तो आगे चलकर और मुश्किल पैदा हो सकती है।”
लीला ने नजरें झुकाए रखते हुए कहा, “तो तुम क्या चाहते हो? देवर जी”
रामू ने लीला की आँखों में देखते हुए जवाब दिया, “भाभी, बस तुम्हारे खेत का किसान बनना चाहता हूं मैं, एक बार शुरू किया तो रुकूँगा नहीं... जब तक खेत पूरी तरह हरा–भरा न हो जाए।”
लीला की सांसें और तेज हो गई थीं, उसके भारी स्तन तेजी से ऊपर-नीचे हो रहे थे, वह अनजाने में ही अपनी जांघें कस-कसकर रगड़ रही थी, उसकी चूत में इतनी गर्मी और खुजली हो रही थी कि उसकी चूत से रस बूंद–बूंद करके टपक रहा था।
लीला शर्म से लाल चेहरे के साथ बोली, “देवर जी, शशि को पता चल गया तो क्या सोचेगी?”
रामू ने हँसते हुए कहा, “शशि को कुछ पता नहीं चलेगा और मैं तो बस अपना फर्ज निभा रहा हूँ। घर का खेत सूखा पड़ा देखकर मुझे बुरा लगता है। मैं एक नौकर की तरह अपनी मालकिन के खेत की पूरी देखभाल कर सकता हूँ।”
लीला ने एक गहरी सांस ली, उसका गला सूख रहा था। वह धीरे से लेकिन गंभीर स्वर में बोली “देवर जी... अब बस करो! एक शब्द भी और अपने मुंह से निकाला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
रामू ने लीला के शर्माए हुए चेहरे को देखा। वह जान गया था कि उसकी बातें लीला को अंदर ही अंदर प्रभावित कर रही हैं। फिर भी उसने आखिरी तीर चलाया, “ठीक है भाभी, मैं चुप हो जाता हूँ लेकिन याद रखना... जब भी तुम्हारे खेत को अंदर से तेज प्यास लगे तो एक बार याद कर लेना।”
लीला बिना कुछ कहे बस नजरें झुकाए बैठी रही, उसके बदन में आग लगी हुई थी।
रामू ने एक आखिरी नजर लीला के भरे हुए स्तनों और गोल नितंबों पर डाली, फिर मुस्कुराते हुए बोला, “अच्छा भाभी, अब मैं चलता हूँ। खेत भी जाना है।”
रामू ने दरवाजे की ओर कदम बढ़ाए और बाहर निकल गया।
जैसे ही रामू बाहर निकला, लीला ने तुरंत उठकर दरवाजा बंद कर दिया।
दरवाजा बंद करते ही उसका पूरा बदन काँपने लगा। लीला दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गई क्योंकि उसके पैरों में ताकत नहीं रह गई थी, उसकी सांसें बहुत तेज और भारी हो गई थीं, स्तन जोर-जोर से ऊपर-नीचे हो रहे थे, ब्लाउज के अंदर निप्पल सख्त होकर चुभ रहे थे, उसकी चूत पूरी तरह गीली होकर फड़क रही थी, पेटीकोट और साड़ी के बीच उसकी जांघों पर गीलापन महसूस हो रहा था।
लीला ने आँखें बंद कर लीं। वह मन ही मन काँपती हुई सोच रही थी, “हाय रे... ये मेरा देवर आज मुझे कितना उत्तेजित कर गया, इतनी गंदी बातें... मैं क्यों सुन रही थी?”
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