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Incest Kandho ki bojh 1 by comicsvilla

realkahani2

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### कंधों पर बोझ

Hi I'm a comicsvilla

Is story ko enjoy kare,,,,

गांव के किनारे बसी एक छोटी-सी झोपड़ी में रहती थी राधा। उम्र अभी तीस की ही हुई थी, लेकिन चेहरे पर झुर्रियां पहले ही आ चुकी थीं। पति की मौत को दो साल हो चुके थे—एक सड़क हादसे में। तब से वो अकेली ही घर संभाल रही थी। उसके पति का पिता, हरिया चाचा, उसी छत के नीचे रहते थे। हरिया चाचा साठ के करीब थे, लेकिन मजबूत कद-काठी वाले। सालों तक खेतों में हल चलाने से उनका शरीर अभी भी ताकतवर था। राधा का बेटा, छोटू, छोटा था—स्कूल जाता, दोस्तों के साथ खेलता, और शाम को घर लौटता। घर में तीनों ही थे, लेकिन राधा के दिल में हमेशा एक खालीपन सा रहता। पति की यादें तो थीं, लेकिन रातों की उदासी और तनहाई कुछ और ही कहानी बुनती।

एक दोपहर की बात है। छोटू स्कूल गया हुआ था। राधा खेत से लौटी तो कमर में दर्द होने लगा। सुबह से वो धान की फसल बो रही थी, और अब पीठ ऐसी लग रही थी मानो कोई भारी बोझ लाद दिया हो। वो रसोई में खड़ी होकर रोटियां सेंक रही थी, लेकिन हर झुकाव पर दर्द चुभ जाता। "अरे बाप रे!" वो दर्द से कराह उठी और दीवार से टेक लगाकर बैठ गई।

हरिया चाचा बाहर से लौटे। उनके हाथों में ताजा कटी सब्जियां थीं। वो राधा को ऐसी हालत में देखकर चौंक गए। "क्या हुआ बेटी? चेहरा क्यों पीला पड़ गया?" उन्होंने पूछा, और पास आकर बैठ गए।

राधा ने सिर झुकाकर कहा, "चाचा जी, कमर में दर्द हो रहा है। सुबह से खेत में काम किया, अब सीधी खड़ी भी नहीं हो पा रही।"

हरिया चाचा ने सिर हिलाया। वो जानते थे कि राधा कितनी मेहनती है। "अरे, ये तो ठीक नहीं। मैं मालिश कर दूं? पुराने जमाने का तेल है मेरे पास, लगाने से राहत मिल जाएगी।"

राधा थोड़ा हिचकिचाई। गांव में ये आम बात थी—परिवार के बुजुर्ग मालिश करते, लेकिन उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। फिर भी, दर्द इतना तेज था कि वो राजी हो गई। "ठीक है चाचा जी, लेकिन जल्दी से कर दीजिए। छोटू आने वाला होगा।"

हरिया चाचा ने तेल की शीशी निकाली—नीम का तेल, जो घर में हमेशा रहता था। राधा ने साड़ी की चोली ऊपर की और पीठ नंगी कर ली। वो बिस्तर पर लेट गई, प्रोन करके। हरिया चाचा ने हाथों में तेल लगाया और धीरे-धीरे मालिश शुरू की। उनके हाथ मजबूत थे, लेकिन दबाव सही था। राधा को पहले तो राहत मिली। "हां चाचा जी, यहीं दबाइए... अरे, हल्का सा..."

लेकिन जैसे-जैसे मालिश नीचे की ओर बढ़ी, कमर के पास, राधा के शरीर में एक अजीब सी सनसनाहट होने लगी। हरिया चाचा के हाथ गर्म थे, और सालों बाद किसी मर्द के स्पर्श से राधा का तन मन जाग उठा। वो चुपचाप लेटी रही, लेकिन सांसें तेज हो गईं। हरिया चाचा को भी ये महसूस हो रहा था। राधा की त्वचा मुलायम थी, और उनकी उंगलियां अनजाने में थोड़ी और गहराई से दबाने लगीं।

"बेटी, दर्द कहां है बता?" हरिया चacha ने पूछा, लेकिन उनकी आवाज में एक हल्की सी कांप थी।

"नीचे... हिप्स के पास," राधा ने फुसफुसाया। अब दर्द कम हो रहा था, लेकिन जगह खाली सा लग रहा था। हरिया चाचा ने साड़ी को थोड़ा नीचे सरकाया और मालिश जारी रखी। राधा के मन में पति की यादें घूमने लगीं, लेकिन साथ ही हरिया चाचा का स्पर्श नया था—कुछ गलत, लेकिन रोक न पाने वाला।

अचानक, हरिया चाचा का हाथ फिसला और राधा की जांघ पर चला गया। दोनों ही रुक गए। राधा ने सिर उठाया, आंखों में शर्म और कुछ और। "चाचा जी..."

हरिया चाचा ने हाथ हटाया, लेकिन उनकी सांसें भारी थीं। "माफ करना बेटी... तेल फिसल गया।"

राधा उठी, साड़ी ठीक की। "कोई बात नहीं। दर्द कम हो गया। धन्यवाद।" लेकिन उसके चेहरे पर लाली थी, और मन में एक उथल-पुथल। छोटू की आवाज बाहर से आई—स्कूल से लौट आया था। दिन कट गया, लेकिन राधा की नींद उड़ी हुई थी। रात को खाना बनाते हुए भी हरिया चाचा की नजरें उस पर ठहर जातीं।

रात नौ बजे छोटू सो गया। घर छोटा था—एक कमरा राधा और छोटू का, अगला कमरा हरिया चाचा का। बीच में सिर्फ पतली दीवार। राधा ने लेटने की कोशिश की, लेकिन कमर का दर्द फिर लौट आया। वो करवटें बदल रही थी। तभी दरवाजा खटखटाया। हरिया चाचा खड़े थे। "बेटी, नींद नहीं आ रही? दर्द तो ठीक हो गया?"

राधा ने कंबल ओढ़ लिया। "हां चाचा जी, थोड़ा सा है। आप सो जाइए।"

लेकिन हरिया चाचा अंदर आ गए। "मालिश फिर कर दूं? रात का समय है, तेल गर्म हो जाएगा।" उनकी आंखों में कुछ था—भूख, जो सालों से दबी हुई थी। राधा जानती थी, लेकिन रोक न सकी। "ठीक है... लेकिन धीरे से।"

हरिया चाचा ने तेल गर्म किया—चूल्हे पर। फिर राधा को उसके कमरे में ही लिटाया। छोटू गहरी नींद में था, सिर दूसरी तरफ। मालिश शुरू हुई। इस बार हाथ और नीचे गए। राधा की सांसें तेज हो गईं। "चाचा जी... ये..."

"शशश... चुप रहो बेटी। दर्द जाएगा।" हरिया चाचा के हाथ अब मालिश से ज्यादा सहलाने लगे। राधा का शरीर गर्म हो गया। सालों की तन्हाई ने उसे कमजोर कर दिया था। वो फुसफुसाई, "चाचा जी, ये गलत है..."
 

realkahani2

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लेकिन हरिया चाचा ने साड़ी खींच ली। "गलत क्या? तेरी कमर दुख रही है, मैं ठीक कर रहा हूं।" उनके होंठ राधा की पीठ पर लग गए। राधा सिहर उठी। विरोध की कोशिश हुई, लेकिन शरीर साथ न दिया। हरिया चाचा ने उसे उल्टा किया, और चुम्बनों की बौछार कर दी। राधा की आंखें बंद हो गईं। "अह... चाचा जी..."

रात के दस बज चुके थे। कमरे में अंधेरा था, सिर्फ चांदनी खिड़की से आ रही। हरिया चाचा ने अपनी धोती उतारी। उनका लंड कड़ा था, सालों बाद जागा हुआ। राधा ने देखा तो शर्मा गई, लेकिन हाथ बढ़ा दिया। "धीरे से... दर्द न हो।"

हरिया चाचा ने राधा की चोली खोली। उसके स्तन नंगे हो गए—भरे हुए, दूध की तरह सफेद। वो चूसने लगे। राधा सिसकारी भरने लगी। "आह... हां... चाचा जी..."

फिर हरिया चाचा ने राधा को लिटाया। उसकी पेटीकोट ऊपर किया और चूत पर हाथ फेरा। राधा गीली थी। "बेटी, तू कितनी गर्म है..." उन्होंने उंगली डाली। राधा चीख पड़ी, लेकिन मुंह दबा लिया। "सिस... आह..."

अब हरिया चाचा ऊपर चढ़ गए। उनका लंड राधा की चूत पर रगड़ने लगा। धीरे-धीरे अंदर घुसा। राधा ने दांत काट लिए। "दर्द... अरे..."

"चुप... सह ले बेटी।" हरिया चाचा ने धक्का दिया। चूत और लंड की टकराहट शुरू हो गई—चपचप की आवाज, जो कमरे में गूंज रही थी। राधा की सिसकियां तेज हो गईं। "आह... हां... चोदो चाचा जी... आह..."

अगले कमरे में छोटू सो रहा था। लेकिन रात के सन्नाटे में आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं। पहले तो वो सोचता रहा कि कोई सपना है। लेकिन मां की वो सिसकियां— "आह... हां... और जोर से..." और उसके बाद वो अजीब चपचप की आवाज, जैसे कोई गीला कपड़ा पीट रहा हो। छोटू की आंखें खुल गईं। वो डर गया। "मां?" उसने पुकारा, लेकिन आवाज दबी।

राधा को कुछ सुनाई न दिया। वो हरिया चाचा के नीचे तड़प रही थी। हरिया चाचा का लंड तेजी से अंदर-बाहर हो रहा था। "बेटी... तेरी चूत कितनी टाइट है... आह..." उनकी सांसें भारी थीं। राधा ने पैर फैला दिए। "चोदो... चाचा... आह... सिस..."

आवाजें बढ़ती जा रही थीं। चूत-लंड की टकराहट तेज, जैसे बारिश की बूंदें। राधा की सिसकियां अब चीखों में बदल गईं। "आह... हां... निकल आया... चाचा..." वो झड़ गई। हरिया चाचा ने भी जोर लगाया और अंदर ही झड़ दिया। लेकिन रुक न सके। वो फिर से शुरू हो गए। राधा थक चुकी थी, लेकिन आनंद में डूबी। "नहीं... अब रुको... आह..."

लेकिन हरिया चाचा कहां मानने वाले। उन्होंने राधा को घुमाया, पीछे से पकड़ लिया। डॉगी स्टाइल में फिर चुदाई शुरू। आवाजें और तेज—पटपट, चपचप। राधा के स्तन लटक रहे थे, हरिया चाचा उन्हें पकड़कर दबा रहे। "बेटी... तू मेरी हो गई..."

रात के बारह बज चुके थे। छोटू बिस्तर पर लेटा था, कान पर हाथ रखे। लेकिन आवाजें रुकने का नाम न ले रहीं। मां की वो "आह... सिस... हां चाचा..." और वो गंदी चपचप। उसे समझ न आया कि क्या हो रहा। डर लग रहा था, लेकिन नींद न आ रही। वो कंबल में सिकुड़ गया।

हरिया चाचा और राधा थक चुके थे, लेकिन रुके नहीं। बीच-बीच में पानी पिया, फिर लिपट गए। राधा ऊपर चढ़ी। "अब मैं..." उसने कहा, और लंड पर बैठ गई। ऊपर-नीचे होने लगी। सिसकियां फिर शुरू। "आह... कितना मोटा है... सिस..."

एक बज चुका था। दो बजे। छोटू ने घड़ी देखी—मां की घड़ी टेबल पर रखी थी। आवाजें कम हो रही थीं, लेकिन फिर तेज। आखिरकार, तीन बजे के करीब, सब शांत हो गया। हरिया चाचा राधा के बगल में लेटे, हांफते हुए। "बेटी, ये हमारा राज रहेगा।"

राधा ने सिर हिलाया। "हां चाचा जी... लेकिन कल से सावधान रहना।"

सुबह हुई। सूरज निकला। छोटू उठा तो आंखें खराब लग रही थीं। राधा रसोई में चाय बना रही थी। हरिया चाचा बाहर खेत चले गए। छोटू ने मां को देखा। "मां, रात को क्या हो गया था?"

राधा चौंकी। "क्या बेटा?"

"रात को तुम्हारी आवाज आ रही थी। सिससिस... और वो अजीब आवाज... जैसे कोई पीट रहा हो। मैं डर गया।"

राधा का चेहरा लाल हो गया। वो झट से मुस्कुराई। "अरे बेटा, कुछ नहीं। मां को रात को सपना आ गया था। बुरा सपना। इसलिए चिल्ला रही थी। और वो आवाज... उफ्फ, पड़ोसी के घर में बकरी थी, वो रात को बच्चा पैदा कर रही थी। पटपट की आवाज उसी की थी। तू चिंता मत कर। जाकर नहा ले, स्कूल जाने का समय हो गया।"

छोटू को थोड़ा शक हुआ, लेकिन मां की मुस्कान देखकर मान गया। "ठीक है मां।" वो चला गया।

राधा ने दीवार की ओर देखा। मन में पछतावा था, लेकिन साथ ही एक नई तृप्ति। हरिया चाचा लौटे तो नजर मिली। दोनों ने मुस्कुरा लिया। घर में अब एक नया राज था—कंधों पर बोझ कम हो गया था, लेकिन दिल पर एक नया भार आ गया। गांव की जिंदगी चलती रही, लेकिन रातें अब वैसी न रहीं। राधा जानती थी, ये गलत था, लेकिन रोक पाना मुश्किल। छोटू बड़ा हो रहा था, और हरिया चाचा की उम्र ढल रही थी। लेकिन वो रातें... वो सिसकियां... वो चपचप... सब कुछ बदल चुकी थीं।
 

realkahani2

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कुछ दिनों बाद, राधा फिर कमर दर्द की शिकायत करने लगी। हरिया चाचा मुस्कुराते। छोटू स्कूल चला जाता। और रातें... रातें लंबी हो जातीं।
 
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### अगला भाग: बोझ और बंधन

समय की धारा में दो साल और बह चुके थे। राधा अब इकतालीस की हो चुकी थी, लेकिन चेहरे पर वो थकान अब भी थी जो विधवा जीवन की देन थी। छोटू—अब वो खुद को विक्की कहलवाता था—उनवीं साल का हो गया था। कॉलेज जाता, शाम को ट्यूशन पढ़ाता, और घर लौटता तो मां के लिए चाय बनाता। हरिया चाचा की मौत ने घर को और खाली कर दिया था। वो दो साल पहले एक साधारण बुखार से चल बसे थे। अंतिम संस्कार की रस्में निभाने में जो थोड़ी-बहुत जमा-पूंजी थी, वो सब उड़ गई। अब राधा और विक्की किराए के एक छोटे से फ्लैट में रहते थे—शहर के बाहरी इलाके में, जहां किराया हर महीने की चिंता बन जाता। फ्लैट मालिक, रामलाल, एक मोटा-तगड़ा पचास साल का आदमी था। व्यापार करता था, लेकिन आंखों में हमेशा एक भूखी चमक रहती।

अंतिम संस्कार के ठीक अगले दिन की बात है। राधा तब अट्ठावन की थी, विक्की अठारह का। संस्कार की रस्में निपटाने के बाद राधा थककर चूर हो चुकी थी। आंखें सूजी हुईं, साड़ी पर कालिख के धब्बे। विक्की बाहर पानी भरने गया था। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। रामलाल खड़ा था, हाथ में रसीद की किताब लिए। "बहू, किराया लाने आया हूं। तीन महीने का बकाया है—चार हजार पांच सौ।"

राधा का चेहरा पीला पड़ गया। "रामलाल जी, अभी तो... संस्कार की रस्में हुई हैं। सारी जमा-पूंजी चली गई। थोड़ा समय दीजिए, मैं मजूरी कर लूंगी।"

रामलाल ने अंदर कदम रखा। कमरा छोटा था—एक हॉल, दो छोटे कमरे। उसकी नजर राधा के भारी शरीर पर ठहर गई। राधा की साड़ी पुरानी थी, लेकिन कंधे चौड़े, कमर मोटी, और छाती भरी हुई। विधवा होने के बावजूद, उसके शरीर में वो नरमी थी जो उम्र के साथ और गहरी हो जाती है। रामलाल ने मुस्कुराया—एक ऐसी मुस्कान जो भरोसे से ज्यादा लालच की थी। "समय तो सबको चाहिए बहू। लेकिन देख, मैं दयालु हूं। अगर तू मुझे पैसे के बदले कुछ और दे दे, तो तीन महीने का किराया माफ।"

राधा गhabra गई। वो पीछे हट गई, दीवार से टेक लगाई। "क्या मतलब? रामलाल जी, आप... आप ऐसा न कहें। मैं किसी और तरीके से चुकाऊंगी।"

रामलाल ने किताब बंद की और पास आया। उसकी सांसें भारी थीं। "अरे बहू, इतना शरमाना मत। तीन महीने का किराया—महीने का पंद्रह सौ, तो कुल चार हजार पांच सौ। मैं तेरी चूत में अपना लंड डालकर चोदूंगा। जितनी बार लंड अंदर-बाहर होगा, उतनी बार किराया माफ। एक बार लंड का एक धक्का—एक रुपया। चार हजार पांच सौ धक्के, बस। फिर तू फ्री।"

राधा की सांस अटक गई। आंखों में आंसू आ गए। "नहीं रामलाल जी... ये पाप है। मेरा बेटा... वो..."

लेकिन रामलाल ने हाथ बढ़ा दिया। "बेटा तो बाहर है। और पाप क्या? तेरी मजबूरी देख। कल से तू सड़क पर होगी। सोच ले।" राधा रोने लगी, लेकिन विक्की की पढ़ाई, घर का किराया—सब कुछ दांव पर था। आखिरकार, वो सिर झुका ली। "ठीक है... लेकिन सिर्फ आज। और चुपचाप।"

रामलाल की आंखें चमक उठीं। उसने दरवाजा बंद किया। राधा को दीवार से सटाकर खींच लिया। साड़ी खींची, चोली खोली। राधा के स्तन बाहर आ गए—भारी, लटकते हुए। रामलाल ने मुंह में भर लिया। राधा सिसकी भरने लगी। "आह... रामलाल जी... दर्द..."

"चुप रह बहू। ये तो शुरुआत है।" रामलाल ने पेटीकोट ऊपर किया। राधा की चूत पर हाथ फेरा—गीली न थी, लेकिन मजबूरी में गीली हो गई। उसने अपना पैंट उतारा। लंड मोटा था, काला। "पकड़ ले।" राधा ने हाथ बढ़ाया, लेकिन कांप रहा था। रामलाल ने खुद ही अंदर धकेला। "एक... दो... तीन..." वो गिनने लगा। चूत और लंड की टकराहट शुरू हो गई—चपचप, पटपट। राधा दांत काटे रही। "आह... धीरे... सिस..."

विक्की बाहर से लौटा तो दरवाजा बंद देखा। अंदर से मां की सिसकियां आ रही थीं। वो डर गया, लेकिन समझ न सका। रामलाल ने घंटों चलाया—चार हजार पांच सौ धक्के। बीच में रुकता, पानी पिलाता, फिर शुरू। राधा थक गई, रोई, लेकिन सह गई। आखिरकार, शाम ढलते-ढलते खत्म हुआ। रामलाल ने रसीद पर साइन किया। "तीन महीने माफ। लेकिन याद रख, ये राज रहेगा।"

राधा ने साड़ी ठीक की। आंखें सूजीं, शरीर दर्द से भरा। विक्की ने पूछा, "मां, क्या हुआ? रामलाल चाचा क्यों आए थे?" राधा ने मुस्कुराने की कोशिश की। "किराया लेने बेटा। लेकिन माफ कर दिया। तू चिंता मत कर।"

हरिया चाचा की मौत के बाद रामलाल का आना-जाना बढ़ गया। पहले हफ्ते में वो रोज आता—कभी किराए की याद दिलाने, कभी 'सहानुभूति' दिखाने। धीरे-धीरे वो खाने साथ बैठने लगा। राधा खाना बनाती, विक्की के साथ तीनों खाते। "बहू, तू तो कमाल की रसोईबान हो," रामलाल कहता, और नजरें राधा के शरीर पर। रात को सब अपने-अपने कमरे में। विक्की का कमरा बीच में, मां का बगल में, रामलाल कभी-कभी रुक जाता—कहता, "देर हो गई, यहीं सो जाऊंगा।"
 
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realkahani2

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लेकिन रात दस बजे के बाद... विक्की को वही आवाजें सुनाई देने लगीं। सालों पहले की तरह—मां की सिसकियां। "आह... रामलाल जी... धीरे... सिस... हां..." और उसके बाद वो चपचप, पटपट—चूत और लंड की टकराहट। दीवार पतली थी, आवाजें साफ। विक्की बिस्तर पर लेटा, कंबल ओढ़े, सुनता रहता। पहले तो सोचता, सपना है। लेकिन हफ्ते भर में समझ आ गया—रामलाल चाचा मां के कमरे में जाते हैं। विक्की रो लेता, लेकिन कुछ कह न पाता। मां की मजबूरी, पिता की याद—सब कुछ उलझ जाता।

सोमवार को पूछा, "मां, रात को फिर आवाज आई। क्या हो रहा है?" राधा चौंकी। चाय का कप हाथ से छूटते-छूटते बचा। "अरे बेटा, पड़ोसी का कुत्ता भौंक रहा था। तू सो जा।" विक्की मान गया, लेकिन मन में शक पनपने लगा।

बुधवार को फिर। "मां, वो सिसकियां... जैसे दर्द हो।" राधा ने आंसू पी लिए। "बेटा, मां को पुराना दर्द है कमर का। मालिश करवा रही हूं। चुपचाप पढ़ाई कर।" विक्की ने सिर हिलाया, लेकिन नींद उड़ी रहती।

शुक्रवार को। "मां, वो पटपट की आवाज... जैसे कोई मारपीट।" राधा का दिल बैठ गया। वो विक्की को गले लगा लिया। "बेटा, मां का राज है। तू बड़ा हो रहा है, लेकिन ये मत पूछ। सब ठीक हो जाएगा।" विक्की ने महसूस किया—मां का शरीर गर्म था, लेकिन आंखों में उदासी। वो चुप हो गया, लेकिन हर हफ्ते पूछता रहा। राधा हर बार बहाना बनाती—कभी बिल्ली का बच्चा, कभी टीवी की आवाज, कभी सपना। लेकिन विक्की जानता था—ये झूठ हैं। मां की आंखों में वो अपराधबोध साफ दिखता, जो रातों की मजबूरी से आता।

समय बीता। राधा चालीस की हो गई। विक्की बीस का। कॉलेज खत्म होने वाला था, जॉब की तलाश में। लेकिन अब विक्की का ध्यान मां के शरीर पर जाने लगा। पहले तो अनजाने में। सुबह रसोई में मां झुकती तो साड़ी से नजर आता—स्तन भारी, लेकिन ऊंचे। कमर मोटी, लेकिन टाइट। गांड गोल, भरी हुई—जैसे सालों पहले न हो। पैंटी की लाइन साफ दिखती, पतली, टाइट। कभी साड़ी पारदर्शी होती, तो चूत के पास का उभार साफ। विक्की सोचता, "मां तो घर पर ही रहती हैं। खेत का काम छोड़ दिया। फिर ये शरीर... जैसे जिम जाती हों। फिटनेस, योगा—कुछ तो करती होंगी।"

तीन दिन लगातार विक्की ने गौर किया। सोमवार: मां ने नीली साड़ी पहनी, लेकिन पल्लू सरक गया। स्तन के निप्पल्स की छाया दिखी। मोटे, लेकिन सख्त। विक्की ने नजर हटाई, लेकिन मन में सवाल। मंगलवार: मां ने झाड़ू लगाई, गांड हिली—बड़ी, लेकिन कसी हुई। पैंटी का निशान गहरा। "मां, आप तो फिट लग रही हो। क्या करती हैं?" राधा हंसी। "बेटा, घर का काम ही जिम है।" लेकिन विक्की को शक—रामलाल चाचा के आने से पहले मां वैसी न थीं। अब चेहरा चमकता, त्वचा चिकनी।

बुधवार: रात को फिर आवाजें। विक्की ने कान लगाया। "आह... रामलाल... और जोर से... सिस..." चपचप तेज। विक्की का दिल जलने लगा। मां का शरीर—ये सब उसी की देन? सुबह पूछा, "मां, आपका शरीर बदल गया। पहले ढीला था, अब टाइट। पैंटी भी नई लगती।" राधा शर्मा गई। "बेटा, उम्र के साथ... और हां, बाजार से नई साड़ियां लीं। तू चिंता मत कर।" लेकिन विक्की ने देखा—मां की आंखों में आंसू। वो गले लग गया। "मां, जो भी है, बताओ। मैं हूं न।"
मां ने कुछ नहीं बताया,,
 
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### भाग १: सपनों की आग

कमिनी की जिंदगी एक पुरानी किताब की तरह थी—पन्ने पीले पड़ चुके थे, लेकिन हर पन्ने पर कुछ न कुछ दर्द की स्याही बसी हुई थी। उम्र के तैंतीसवें साल में जब उसके पति की सड़क हादसे में मौत हो गई थी, तब कमिनी ने सोचा था कि जीवन का हर रंग फीका पड़ जाएगा। लेकिन बच्चे की वजह से वह जीती रही। उसका बेटा, अजय, अब सत्रह साल का हो चुका था। अगले महीने ही अठारह का हो जाना था। कमिनी उसे देखकर हमेशा सोचती, "ये मेरा सहारा है, मेरा सब कुछ।" लेकिन रातों की तन्हाई में, जब घर की दीवारें सांस लेने लगतीं, तो कमिनी के मन में एक खालीपन सा घिर आता—वो खालीपन जो सालों से दबा हुआ था, लेकिन कभी-कभी फूट पड़ता, जैसे कोई पुरानी चिंगारी जो हवा लगते ही भड़क उठे।

कमिनी एक छोटे से कस्बे में रहती थी, जहाँ नदी का किनारा शहर की हलचल से दूर, शांति का आश्रय देता था। वहाँ के लोग उसे "कमिनी भाभी" कहते, क्योंकि उसकी मुस्कान में अभी भी वो पुरानी चमक बाकी थी। लेकिन अंदर से वह टूट चुकी थी। चौंतीस साल की उम्र में भी उसका शरीर भरा-भरा था—कमर पर थोड़ी चर्बी, स्तनों की गोलाई जो साड़ी के ब्लाउज में कैद रहती, और चेहरे पर वो हल्की-हल्की झुर्रियाँ जो रातों की बेचैनियों का निशान थीं। वह स्कूल में टीचर थी, बच्चों को पढ़ाती, लेकिन खुद के अंदर के बच्चे—वो जज्बात जो कभी निभे न थे—को दबा रखा था। दिन भर वह व्यस्त रहती, लेकिन रात को जब अजय सो जाता, तो कमिनी अकेले बिस्तर पर लेटी, छत की दरारों को घूरती रहती। कभी-कभी पुरानी यादें आ जातीं—पति की वो आखिरी रात, जब वह हँसते हुए कहा था, "कमिनी, तू तो मेरी जान है।" लेकिन अब वो हँसी सिर्फ सपनों में गूँजती।

उस रात मौसम अजीब सा था। नवंबर का महीना था, लेकिन हवा में नमी घुली हुई थी, जैसे नदी खुद सांस ले रही हो। कमिनी ने थका-थका सा खाना खाया—दाल-चावल, जो अजय के लिए बनाया था। बेटा स्कूल से लौटा तो थका हुआ था, परीक्षाओं की तैयारी में डूबा हुआ। "माँ, कल मैथ्स का पेपर है," उसने कहा, और कमिनी ने मुस्कुरा कर उसके कंधे पर हाथ फेरा। "सब ठीक हो जाएगा, बेटा। सो जा।" अजय ने सिर हिलाया और अपने कमरे में चला गया। कमिनी ने घर का ताला लगाया, साड़ी उतारी, और साधारण सी नाइटी पहन ली। बिस्तर पर लेटते हुए उसने सोचा, "काश, कोई मेरे पास होता। कोई जो समझे ये तन्हाई को।" लेकिन ये ख्याल जल्दी ही नींद में डूब गया।

नींद गहरी थी, लेकिन सपना... सपना तो जैसे कोई ज्वाला था। कमिनी खुद को नदी के किनारे पाती है। वो जगह जहाँ वह कभी-कभी सैर करने जाती—पीपल के पेड़ों की छाँव, पानी की कल-कल, और दूर पहाड़ों की काली परछाईं। लेकिन आज रात वहाँ कुछ अलग था। हवा में एक गंध थी—मिट्टी की, पसीने की, और कुछ और... कुछ जो उसके शरीर को झकझोर दे। वह देखती है, नदी का किनारा चाँदनी में चमक रहा है, और वहाँ एक साधु खड़ा है। लंबा, कदकठोर, भगवा वस्त्र पहने, लेकिन उसके चेहरे पर वो शांति नहीं जो साधुओं में होती। आँखों में आग है, जैसे कोई पुरानी वासना जो सालों से दबाई गई हो। कमिनी का दिल धड़कता है। "ये कौन है?" वह सोचती है, लेकिन शरीर जैसे खुद चल पड़ता है। वह साड़ी में है, लेकिन वो साड़ी अब बोझ लग रही है—गीली, चिपचिपी, मानो नदी का पानी उसके शरीर से लिपट गया हो।

साधु मुस्कुराता है। "आओ, कमिनी। नदी सब धो लेगी।" उसकी आवाज गहरी है, जैसे नदी की धारा। कमिनी डरती है, लेकिन पैर रुकते नहीं। वह उसके पास पहुँचती है, और साधु का हाथ उसके कंधे पर रखता है। वो स्पर्श... उफ्फ, वो स्पर्श जैसे बिजली का करंट। कमिनी के शरीर में सालों से जमी बर्फ पिघलने लगती है। साधु उसे नदी के किनारे की घास पर लिटाता है। घास नरम है, लेकिन ठंडी—जैसे मौत का आलिंगन। लेकिन कमिनी को गर्मी लग रही है। साधु का हाथ उसकी साड़ी पर सरकता है, धीरे-धीरे, जैसे कोई पुरानी किताब के पन्ने पलट रहा हो। "तुम्हारी तन्हाई मेरा आश्रम है," साधु फुसफुसाता है। कमिनी की साँसें तेज हो जाती हैं। वह विरोध करना चाहती है, लेकिन शरीर बागी हो गया है। सालों की कुंठा, वो दबी हुई आग, अब बाहर आने को बेताब।

साड़ी खिसक जाती है। कमिनी का शरीर नंगा हो जाता है—भरा हुआ, थोड़ा मोटा, लेकिन वो मोटापन जो आकर्षण का राज़ है। स्तन भारी, कमर पर वो हल्की लटकन, और नीचे... नीचे वो जगह जो सालों से सूनी पड़ी थी। साधु की आँखें लाल हो जाती हैं। वह झुकता है, उसके होंठ कमिनी के स्तनों पर लगते हैं। कमिनी चीखती है—दर्द से नहीं, सुख से। वो सुख जो भूल चुकी थी। साधु का शरीर उसके ऊपर दबता है। भारी, पसीने से तर, लेकिन मजबूत। कमिनी के हाथ उसके पीठ पर पहुँचते हैं, नाखून धंस जाते हैं। "और... और करो," वह बुदबुदाती है। साधु हँसता है, एक जानवर जैसी हँसी। उसके वस्त्र उतर जाते हैं, और कमिनी देखती है—वो लंड, कठोर, नसों से भरा, जैसे कोई प्राचीन मूर्ति।
 
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वह अंदर घुसता है। धीरे-धीरे, लेकिन गहराई तक। कमिनी का शरीर काँपता है। दर्द है, लेकिन वो दर्द जो मिठास से भरा। नदी की लहरें उनके शरीर को छू रही हैं, पानी ठंडा, लेकिन उनके बीच की गर्मी ज्वालामुखी जैसी। कमिनी की चूत—वो जगह जो सालों से बंद पड़ी थी—अब जाग उठी। टाइट, गीली, जैसे कोई पुरानी ताला जो चाबी लगते ही खुल गया। साधु धक्के मारता है, तेज, और तेज। कमिनी की वासना भड़क उठती है। "हाँ... हाँ... मत रुको," वह चिल्लाती है। हवा में उनकी साँसें गूँज रही हैं, नदी की कल-कल उनके साथ ताल मिला रही। लेकिन जैसे-जैसे वासना बढ़ती जाती, कमिनी के अंदर कुछ बदल जाता है। उसकी चूत... उफ्फ, वो सिकुड़ने लगती है। पहले हल्का, फिर तेज। जैसे कोई लोहे की मुष्टि। साधु को महसूस होता है। "क्या... क्या हो रहा है?" वह हाँफता है। लेकिन कमिनी की आँखें बंद हैं, वासना की आग में जल रही। उसकी चूत इतनी टाइट हो जाती है कि साधु का लंड दर्द से चीखने लगता। गर्मी... अंदर से एक जलन, जैसे कोई एसिड। साधु चिल्लाता है, "निकल... निकालो!" वह पीछे हटने की कोशिश करता है, हाथ-पैर फेंकता, लेकिन कमिनी का शरीर उसे जकड़ लेता। वासना की दीवानगी में वह हिलती नहीं। साधु का चेहरा लाल, पसीना टपकता, और अचानक... एक कराह। उसका लंड पिघलने लगता—गर्मी से, दबाव से। खून, दर्द, और मौत। साधु की आँखें फटी की फटी रह जातीं, साँस थम जाती। नदी के किनारे उसका शरीर गिर पड़ता, नंगा, टूटा हुआ। कमिनी खुली आँखों से देखती है—उसके हाथों पर खून, लेकिन अंदर... शांति? नहीं, डर।

सपना टूटता है। कमिनी की आँखें खुलीं। कमरा अंधेरा है, सिर्फ खिड़की से चाँद की रोशनी आ रही। बगल में अजय सो रहा—शांत, मासूम चेहरे पर नींद की मासूमियत। कमिनी का दिल जोरों से धड़क रहा। "ये... ये क्या था?" वह सोचती है। शरीर पर पसीना, नाइटी गीली। और नीचे... महसूस होता है। उसकी चूत से दो बूँदें—गीली, चिपचिपी—बिस्तर पर फैल रही। वासना का रस, सपने का निशान। कमिनी का चेहरा लाल हो जाता। शर्म? हाँ। लेकिन उसके साथ एक अजीब सी उत्तेजना। वह हाथ नीचे ले जाती है, छूती है—गीला, गर्म। सालों बाद। अजय हल्का सा हिलता है, और कमिनी सिहर जाती। "नहीं... ये गलत है।" वह खुद को कोसती है। लेकिन मन में वो साधु की छवि घूम रही—उसकी ताकत, वो स्पर्श। और मौत? वो डरावनी मौत जो उसकी वासना का शिकार बनी।

कमिनी उठती है, धीरे से। बाथरूम जाती है। ठंडे पानी से मुंह धोती, लेकिन आग बुझती नहीं। आईने में खुद को देखती—चौंतीस की उम्र, लेकिन आँखों में वो भूख जो छुप न सके। "मैं क्या हो गई हूँ?" वह फुसफुसाती है। बाहर आकर अजय को देखती। बेटा, जो कल बूढ़ा हो जाएगा। अठारह का। कमिनी के मन में एक नया ख्याल कौंधता है—डरावना, लेकिन मोहक। क्या सपना खत्म हो गया, या ये तो शुरुआत है? नदी का किनारा बुला रहा था, और कमिनी जानती थी, कल वह वहाँ जाएगी?
 
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### भाग २: लाश की छाया

सुबह की पहली किरण जब कमिनी की खिड़की से झाँकी, तो कमरा अभी भी अंधेरा सा लग रहा था। रात भर नींद आती-जाती रही, जैसे कोई पुराना घाव जो दर्द देकर चुप हो जाता। कमिनी ने बिस्तर से उठते हुए महसूस किया—शरीर भारी, मन और भी। अजय अभी सो रहा था, उसके चेहरे पर वो मासूमियत जो कमिनी को हमेशा शांति देती। लेकिन आज... आज वो शांति कहीं खो सी गई थी। सपना। वो साधु, वो नदी का किनारा, और वो मौत। कमिनी ने सिर हिलाया, जैसे कोई बुरा ख्याल भगा रही हो। "बस एक सपना था," वह खुद से बोली, लेकिन आवाज काँप रही थी। उम्र के इकतालीसवें साल में भी—नहीं, गिनती गड़बड़ा गई थी; वह अब इकतालीस की हो चुकी थी, लेकिन दिल अभी भी वही तैंतीस का लगता, जब सब कुछ छिन गया था। अजय अब सत्रह का, अगले हफ्ते ही अठारह का। समय कितनी तेज भागा, लेकिन कमिनी की तन्हाई वैसी ही जमी हुई।

चाय बनाते हुए कमिनी का मन भटक गया। नदी। हाँ, आज नदी जाना था। स्कूल छुट्टी थी, और वो जगह हमेशा उसे सुकून देती। या शायद आज... आज वो सपने को झुठला देना चाहती थी। साड़ी पहनी—नीली, सादी, जो उसके भरे शरीर को और नरम बना देती। कमर पर वो हल्की चर्बी, जो सालों की मेहनत का निशान थी, साड़ी की किनारी से झाँक रही। आईने में देखा—चेहरे पर थकान, आँखों के नीचे हल्के काले घेरे। "सुंदर लग रही हो, कमिनी," वह खुद को धोखा देने की कोशिश की, लेकिन मन में वो गीलापन महसूस हो रहा था, जो रात भर न सूखा। अजय जागा, "माँ, कहाँ जा रही हो?" कमिनी मुस्कुराई, "बस सैर पर, बेटा। तू पढ़ाई कर।" अजय ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में चिंता थी। बेटा था, लेकिन कभी-कभी लगता, जैसे वो खुद कमिनी का पिता हो गया हो—उसकी चुप्पी को समझने वाला।

नदी का किनारा वैसा ही था—पीपल के पेड़ हवा में झूम रहे, पानी की धारा सुबह की धूप में चमक रही। लेकिन जैसे ही कमिनी आगे बढ़ी, हवा में कुछ अजीब सा था। मछलियों की बदबू नहीं, बल्कि... सड़न की। दूर से आवाजें आ रही—लोगों की, घबराई हुई। कमिनी का दिल धक् से रह गया। "क्या हुआ?" वह तेज कदमों से पहुँची। नदी के किनारे, घास पर, एक भीड़। और बीच में... लाश। नंगा शरीर, भगवा वस्त्र पास फेंके हुए। चेहरा विकृत, आँखें खुलीं, जैसे मौत को घूर रही हों। साधु। वही साधु—सपने वाला। कमिनी की दुनिया थम गई। पैर लड़खड़ाए, हाथ काँपने लगा। "नहीं... ये..." वह बुदबुदाई। लोकल लोग इकट्ठे थे—रामू काका, जो नाव चलाते थे; सुनीता आंटी, जो पास के खेतों में काम करती; और कुछ और, जो सुबह की सैर पर थे। रामू काका ने देखा कमिनी को, "कमिनी भाभी! तू यहाँ? ये... ये साधु कल रात से यहीं पड़ा है। सुबह मछली पकड़ने आए तो मिला। चीख मार के भागे हम।"

कमिनी का चेहरा सफेद पड़ गया। सपना? या... सच? वह करीब गई, लेकिन घुटने कमजोर। साधु का शरीर सूजा हुआ था, नीचे से खून बहा हुआ, जैसे कोई हिंसक खेल खेला गया हो। आँखों में वो डर, जो सपने में था। कमिनी के मन में चीख उठी—मेरी वजह से? मेरी वासना ने? लेकिन बाहर सिर्फ सिसकियाँ। सुनीता आंटी ने कंधा थामा, "भाभी, रो मत। हमने थाने फोन कर दिया। ये CID वाले आएँगे। कस्बे में ऐसी मौत... भगवान मालिक।" लोग फुसफुसा रहे थे—"शायद डकैती," "या कोई पुरानी दुश्मनी।" लेकिन कमिनी को सब झूठा लग रहा। उसके अंदर की आग, वो सपना, सब सच हो गया। वह बैठ गई घास पर, हाथ नदी के पानी में डुबोया—ठंडा, लेकिन उसके अंदर जलन। "मैंने मार डाला," वह सोचती रही। इमोशनल तूफान आ गया—गिल्ट, डर, और एक अजीब सी उदासी। पति की मौत के बाद पहली बार इतना रोया। आंसू नदी में मिल गए, लेकिन दर्द न बुझा।

दोपहर तक CID की टीम पहुँची। दो अफसर—एक बुजुर्ग, इंस्पेक्टर शर्मा, चेहरे पर दाढ़ी, आँखों में थकान; दूसरा युवा, कांस्टेबल राजू, जो नोट्स ले रहा। लोकल लोगों ने बयान दिए—रामू काका ने कहा, "कल शाम तक तो यहीं भिक्षा माँग रहा था। रात को कोई न देखा।" सुनीता आंटी ने जोड़ा, "महिला जैसा कोई न दिखा।" कमिनी का बयान लेते हुए इंस्पेक्टर शर्मा ने पूछा, "तुम कब पहुँची? कुछ देखा?" कमिनी ने सिर झुकाया, "बस... सैर पर आई थी। लाश देखी तो... डर गई।" लेकिन अंदर से झूठ काट रहा था। अफसरों ने लाश को कवर किया, फोटो लिए, सैंपल कलेक्ट किए। "पोस्टमॉर्टम में पता चलेगा," शर्मा ने कहा। "शायद हार्ट अटैक, या... कुछ और।" लेकिन कमिनी जानती थी—कुछ और। जब लाश को ले जाने के लिए एम्बुलेंस आई, तो कमिनी खड़ी रही, जैसे अपना ही हिस्सा जा रहा हो। लोग बिखर गए, लेकिन कमिनी घंटों वहीं बैठी रही। नदी बह रही थी, लेकिन उसके आंसू रुकते नहीं। "भगवान, ये क्या सजा है?" वह फुसफुसाई। घर लौटते वक्त पैर भारी, मन टूटा। अजय ने पूछा, "माँ, क्या हुआ? चेहरा सड़ा हुआ।" कमिनी ने गले लगाया, "कुछ नहीं, बेटा। बस... जिंदगी।" लेकिन अंदर, डर पनप रहा था। क्या सपना मेरी वासना का श्राप है?
 
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Update 4

रात गिरी, और थकान ने कमिनी को बिस्तर पर लिटा दिया। अजय सो चुका था, उसकी साँसें नियमित। कमिनी ने आँखें बंद कीं, लेकिन नींद नहीं आई। मन में साधु की लाश घूम रही—वो विकृत चेहरा, वो खून। लेकिन धीरे-धीरे, अंधेरा गहराया, और नींद ने दबोच लिया। सपना आया—नया, लेकिन वैसा ही डरावना। इस बार नदी नहीं, बल्कि एक पुरानी जीप। बारिश हो रही, रास्ता कीचड़ भरा। कमिनी खुद को देखती है—साड़ी गीली, चिपकी हुई शरीर से, उसके भरे स्तनों को उभारती। सामने ड्राइवर—एक अनजान आदमी, मोटा, पसीने से तर, लेकिन आँखों में भूख। "मैडम, रुक जाओ। बारिश रुकेगी," वह कहता है, लेकिन कमिनी जानती—रुकना नहीं है। वह झुकती है, उसके होंठों पर। ड्राइवर हाँफता है, हाथ उसके कंधे पर। जीप के पीछे वाले सीट पर वे पहुँचते हैं। कमिनी ऊपर चढ़ती है—काउगर्ल पोजिशन, जैसे कोई पुरानी फिल्म का सीन। उसका शरीर भारी, लेकिन लचीला। ड्राइवर का लंड—मोटा, कठोर, नसों से लबरेज—अंदर घुसता है। कमिनी ऊपर-नीचे होने लगती, धीरे-धीरे, फिर तेज। "हाँ... और," वह कराहती है। वासना की लहरें उठ रही—स्तन उछल रहे, पसीना टपक रहा, जीप हिल रही बारिश के साथ। ड्राइवर के हाथ उसकी कमर पर, नाखून धंसाते। कमिनी की चूत गीली, टाइट, सालों की भूख को सोख रही। ऊपर-नीचे के हर धक्के में आग बढ़ती। लेकिन जैसे-जैसे वासना चरम पर पहुँचती, कमिनी की चूत सिकुड़ने लगती—पहले हल्का, फिर लोहे की जकड़न। ड्राइवर चिल्लाता, "क्या... अरे!" लेकिन कमिनी रुकती नहीं, ऊपर-नीचे, तेज। वीर्य निकलता है—गर्म, बाढ़ की तरह। लेकिन उसी पल, चूत खिंच जाती—वीर्य के साथ खून। ड्राइवर का चेहरा पीला, आँखें फटीं। "निकल... निकालो!" वह चीखता, लेकिन कमिनी की वासना उसे जकड़ लेती। खून बहता, लंड सिकुड़ता, और मौत। ड्राइवर का शरीर ढीला, आँखें खुलीं, बारिश में भीगती। कमिनी ऊपर ही रहती, साँसें तेज, लेकिन अंदर खालीपन।

आँखें खुलीं। कमरा वैसा ही, लेकिन कमिनी का शरीर काँप रहा। नीचे फिर वही—गीलापन, दो-चार बूँदें, रस की। लेकिन इस बार डर ज्यादा। "फिर? क्यों?" वह सिसकियाँ लेती। अजय बगल में सो रहा, अनजान। कमिनी ने उसे देखा—मेरा बेटा, मेरा सहारा। लेकिन मन में सवाल—क्या ये श्राप मेरी तन्हाई का है? या मेरी वासना का? बाहर बारिश शुरू हो गई, जैसे सपना सच होने को बेताब। कमिनी जानती थी, कल फिर नदी बुलाएगी। या शायद... वो ड्राइवर। लेकिन सबसे डरावना था—अजय। क्या ये सपने उसे छू लेंगे...?
 
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सूरज का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसकी साँसें तेज़ और गर्म थीं। कमरे में सिर्फ़ एक मद्धम लाल बल्ब जल रहा था, जिसकी रोशनी में उसकी माँ सुजाता का चेहरा लाल-गुलाबी दिख रहा था। आँसुओं से भरी आँखें, काँपते होंठ, और वो नंगी देह जो अब तक उसने कभी इस नज़र से नहीं देखी थी।

सूरज ने फिर कोशिश की। कमर को पीछे खींचा, लेकिन लंड का सुपारा उसकी माँ की चूत में फेवीकॉल की मोटी परत से ऐसा चिपका था कि एक इंच भी बाहर नहीं निकल रहा था। हर झटका देते ही सुजाता के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकल रही थी – “आह्ह… सूरज… धीरे…”

उस अंधेरे कोने से फिर वही ठंडी, मज़ाकिया आवाज़ आई,
“अरे वाह! माँ-बेटे का पहला सेक्सुअल एक्सपीरियंस। कितना प्यारा है ना? चलो, मैं टाइमर शुरू करता हूँ। तुम्हारे पास ठीक 30 मिनट हैं। अगर 30 मिनट में तुम अपनी माँ की चूत से 10 बार झड़कर उसका रस नहीं निकालोगे, तो ये फेवीकॉल परमानेंट हो जाएगा। फिर तो ज़िंदगी भर तुम्हारा लंड तुम्हारी माँ की चूत में ही रहेगा। हा हा हा…”

सूरज चीखा, “हरामी कौन है तू? बाहर निकल!”

“बाहर नहीं निकलूँगा बेटा। बस मज़ा लूँगा। और हाँ, तुम्हारी मम्मी की चूत तो पहले से ही गीली हो रही है… देखो ना।”

सुजाता ने शर्म से सिर झुका लिया। सच था। उसकी चूत के होंठ फूलकर लाल हो चुके थे और हर बार जब सूरज झटका देता, एक चिपचिपी आवाज़ के साथ उसकी चूत से हल्का-हल्का रस टपकने लगा था।

सूरज को समझते देर नहीं लगी – अगर निकालना है तो करना ही पड़ेगा।
उसने अपनी माँ की आँखों में देखा। सुजाता रो रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब-सी बेबसी थी।

सूरज धीरे से बोला, “माँ… माफ़ करना… मुझे करना पड़ेगा।”

सुजाता ने होंठ काटे और सिर हिलाया, “बेटा… कर… बस जल्दी… मुझे शर्मिंदगी से मार डालो…”

सूरज ने कमर आगे-पीछे करनी शुरू की। पहले धीरे-धीरे। हर धक्के में लंड का सुपारा चूत की दीवारों से रगड़ खा रहा था। फेवीकॉल की परत पतली होने लगी। सुजाता के मुँह से अब सिसकारियाँ नहीं, हल्की-हल्की आहें निकलने लगीं।

“आह्ह… सूरज… धीरे… बड़ा है तेरा…”

सूरज की आँखें बंद हो गईं। वो नहीं चाहता था, लेकिन उसका लंड अब पूरी तरह टाइट हो चुका था – 7 इंच का पूरा रोड, मोटा और नसों वाला। हर धक्के में सुजाता की चूत और गीली होती जा रही थी।

5 मिनट बाद सुजाता का शरीर काँपने लगा। उसकी आँखें पलट गईं। वो पहली बार झड़ी। उसकी चूत ने इतना रस छोड़ा कि फेवीकॉल की परत पिघलने लगी। सूरज को लगा – अब लंड एक-दो इंच और अंदर जा सकता है।

उसने स्पीड बढ़ा दी।
पच्-पच्-पच्… की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी।
सुजाता की आहें अब चीखों में बदल चुकी थीं,
“हाय… सूरज… आह्ह… बेटा… तेरी माँ को चोद रहा है तू… आह्ह्ह…!”

सूरज भी अब रुक नहीं पा रहा था। उसकी कमर अपने आप तेज़-तेज़ चल रही थी।
10 मिनट में सुजाता तीन बार झड़ चुकी थी। उसकी चूत से रस की बाढ़ आ गई थी। फेवीकॉल अब पूरी तरह पिघल चुका था। लेकिन सूरज का लंड अब भी अंदर ही था – क्योंकि अब वो खुद नहीं निकालना चाहता था।

उसने माँ की आँखों में देखा। सुजाता की आँखों में अब शर्म नहीं, एक अजीब-सी भूख थी।
सुजाता ने फुसफुसाया, “बेटा… अब रुक मत… माँ को पूरा चोद… आज तेरी माँ तेरी रंडी है…”

सूरज ने आखिरी 10 मिनट में ऐसा चोदा कि सुजाता की चूत से फुहारें निकलने लगीं। वो पाँचवीं बार झड़ी तो उसका पूरा शरीर अकड़ गया। सूरज ने भी अब कंट्रोल नहीं रखा – उसने माँ की चूत में गहराई तक अपना पूरा माल उड़ेल दिया।

जैसे ही उसका वीर्य सुजाता की बच्चेदानी से टकराया, फेवीकॉल पूरी तरह घुल गया। लंड आसानी से बाहर निकल आया।

दोनों हाँफ रहे थे। पसीने और रस से लथपथ।
अंधेरे से फिर वही आवाज़ आई,
“वाह! 28 मिनट 47 सेकंड। रिकॉर्ड टाइम। माँ-बेटे ने कमाल कर दिया। अब तुम दोनों आज़ाद हो। दरवाज़ा खुला है। लेकिन याद रखना… ये रस्सियाँ कल फिर बाँधेंगी। और अगली बार… फेवीकॉल नहीं, कुछ और होगा।”

सुजाता और सूरज एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे।
सुजाता ने धीरे से कहा, “बेटा… घर चलें?”

सूरज ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में अब वो मासूमियत नहीं थी।
दोनों ने कपड़े पहने और बाहर निकले।
लेकिन दोनों जानते थे – अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।

रात को जब घर पहुँचे, सुजाता बाथरूम में नहाने गई।
सूरज उसके कमरे के बाहर खड़ा रहा।
जब सुजाता बाहर आई, तो सिर्फ़ एक पतली सी नाइटी पहनी थी – बिना कुछ अंदर।

वो सूरज के पास आई। उसका हाथ पकड़ा।
और धीरे से बोली,
“बेटा… आज जो हुआ… उसे भूल मत जाना। माँ को फिर वैसे ही चाहिए… हर रात।”

सूरज ने माँ को बाँहों में खींच लिया।
और उस रात… बिना किसी फेवीकॉल के… माँ-बेटे ने पूरी रात एक-दूसरे को चोदा। जैसे कभी रुकना ही नहीं था।
 
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