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### कंधों पर बोझ
Hi I'm a comicsvilla
Is story ko enjoy kare,,,,
गांव के किनारे बसी एक छोटी-सी झोपड़ी में रहती थी राधा। उम्र अभी तीस की ही हुई थी, लेकिन चेहरे पर झुर्रियां पहले ही आ चुकी थीं। पति की मौत को दो साल हो चुके थे—एक सड़क हादसे में। तब से वो अकेली ही घर संभाल रही थी। उसके पति का पिता, हरिया चाचा, उसी छत के नीचे रहते थे। हरिया चाचा साठ के करीब थे, लेकिन मजबूत कद-काठी वाले। सालों तक खेतों में हल चलाने से उनका शरीर अभी भी ताकतवर था। राधा का बेटा, छोटू, छोटा था—स्कूल जाता, दोस्तों के साथ खेलता, और शाम को घर लौटता। घर में तीनों ही थे, लेकिन राधा के दिल में हमेशा एक खालीपन सा रहता। पति की यादें तो थीं, लेकिन रातों की उदासी और तनहाई कुछ और ही कहानी बुनती।
एक दोपहर की बात है। छोटू स्कूल गया हुआ था। राधा खेत से लौटी तो कमर में दर्द होने लगा। सुबह से वो धान की फसल बो रही थी, और अब पीठ ऐसी लग रही थी मानो कोई भारी बोझ लाद दिया हो। वो रसोई में खड़ी होकर रोटियां सेंक रही थी, लेकिन हर झुकाव पर दर्द चुभ जाता। "अरे बाप रे!" वो दर्द से कराह उठी और दीवार से टेक लगाकर बैठ गई।
हरिया चाचा बाहर से लौटे। उनके हाथों में ताजा कटी सब्जियां थीं। वो राधा को ऐसी हालत में देखकर चौंक गए। "क्या हुआ बेटी? चेहरा क्यों पीला पड़ गया?" उन्होंने पूछा, और पास आकर बैठ गए।
राधा ने सिर झुकाकर कहा, "चाचा जी, कमर में दर्द हो रहा है। सुबह से खेत में काम किया, अब सीधी खड़ी भी नहीं हो पा रही।"
हरिया चाचा ने सिर हिलाया। वो जानते थे कि राधा कितनी मेहनती है। "अरे, ये तो ठीक नहीं। मैं मालिश कर दूं? पुराने जमाने का तेल है मेरे पास, लगाने से राहत मिल जाएगी।"
राधा थोड़ा हिचकिचाई। गांव में ये आम बात थी—परिवार के बुजुर्ग मालिश करते, लेकिन उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। फिर भी, दर्द इतना तेज था कि वो राजी हो गई। "ठीक है चाचा जी, लेकिन जल्दी से कर दीजिए। छोटू आने वाला होगा।"
हरिया चाचा ने तेल की शीशी निकाली—नीम का तेल, जो घर में हमेशा रहता था। राधा ने साड़ी की चोली ऊपर की और पीठ नंगी कर ली। वो बिस्तर पर लेट गई, प्रोन करके। हरिया चाचा ने हाथों में तेल लगाया और धीरे-धीरे मालिश शुरू की। उनके हाथ मजबूत थे, लेकिन दबाव सही था। राधा को पहले तो राहत मिली। "हां चाचा जी, यहीं दबाइए... अरे, हल्का सा..."
लेकिन जैसे-जैसे मालिश नीचे की ओर बढ़ी, कमर के पास, राधा के शरीर में एक अजीब सी सनसनाहट होने लगी। हरिया चाचा के हाथ गर्म थे, और सालों बाद किसी मर्द के स्पर्श से राधा का तन मन जाग उठा। वो चुपचाप लेटी रही, लेकिन सांसें तेज हो गईं। हरिया चाचा को भी ये महसूस हो रहा था। राधा की त्वचा मुलायम थी, और उनकी उंगलियां अनजाने में थोड़ी और गहराई से दबाने लगीं।
"बेटी, दर्द कहां है बता?" हरिया चacha ने पूछा, लेकिन उनकी आवाज में एक हल्की सी कांप थी।
"नीचे... हिप्स के पास," राधा ने फुसफुसाया। अब दर्द कम हो रहा था, लेकिन जगह खाली सा लग रहा था। हरिया चाचा ने साड़ी को थोड़ा नीचे सरकाया और मालिश जारी रखी। राधा के मन में पति की यादें घूमने लगीं, लेकिन साथ ही हरिया चाचा का स्पर्श नया था—कुछ गलत, लेकिन रोक न पाने वाला।
अचानक, हरिया चाचा का हाथ फिसला और राधा की जांघ पर चला गया। दोनों ही रुक गए। राधा ने सिर उठाया, आंखों में शर्म और कुछ और। "चाचा जी..."
हरिया चाचा ने हाथ हटाया, लेकिन उनकी सांसें भारी थीं। "माफ करना बेटी... तेल फिसल गया।"
राधा उठी, साड़ी ठीक की। "कोई बात नहीं। दर्द कम हो गया। धन्यवाद।" लेकिन उसके चेहरे पर लाली थी, और मन में एक उथल-पुथल। छोटू की आवाज बाहर से आई—स्कूल से लौट आया था। दिन कट गया, लेकिन राधा की नींद उड़ी हुई थी। रात को खाना बनाते हुए भी हरिया चाचा की नजरें उस पर ठहर जातीं।
रात नौ बजे छोटू सो गया। घर छोटा था—एक कमरा राधा और छोटू का, अगला कमरा हरिया चाचा का। बीच में सिर्फ पतली दीवार। राधा ने लेटने की कोशिश की, लेकिन कमर का दर्द फिर लौट आया। वो करवटें बदल रही थी। तभी दरवाजा खटखटाया। हरिया चाचा खड़े थे। "बेटी, नींद नहीं आ रही? दर्द तो ठीक हो गया?"
राधा ने कंबल ओढ़ लिया। "हां चाचा जी, थोड़ा सा है। आप सो जाइए।"
लेकिन हरिया चाचा अंदर आ गए। "मालिश फिर कर दूं? रात का समय है, तेल गर्म हो जाएगा।" उनकी आंखों में कुछ था—भूख, जो सालों से दबी हुई थी। राधा जानती थी, लेकिन रोक न सकी। "ठीक है... लेकिन धीरे से।"
हरिया चाचा ने तेल गर्म किया—चूल्हे पर। फिर राधा को उसके कमरे में ही लिटाया। छोटू गहरी नींद में था, सिर दूसरी तरफ। मालिश शुरू हुई। इस बार हाथ और नीचे गए। राधा की सांसें तेज हो गईं। "चाचा जी... ये..."
"शशश... चुप रहो बेटी। दर्द जाएगा।" हरिया चाचा के हाथ अब मालिश से ज्यादा सहलाने लगे। राधा का शरीर गर्म हो गया। सालों की तन्हाई ने उसे कमजोर कर दिया था। वो फुसफुसाई, "चाचा जी, ये गलत है..."
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गांव के किनारे बसी एक छोटी-सी झोपड़ी में रहती थी राधा। उम्र अभी तीस की ही हुई थी, लेकिन चेहरे पर झुर्रियां पहले ही आ चुकी थीं। पति की मौत को दो साल हो चुके थे—एक सड़क हादसे में। तब से वो अकेली ही घर संभाल रही थी। उसके पति का पिता, हरिया चाचा, उसी छत के नीचे रहते थे। हरिया चाचा साठ के करीब थे, लेकिन मजबूत कद-काठी वाले। सालों तक खेतों में हल चलाने से उनका शरीर अभी भी ताकतवर था। राधा का बेटा, छोटू, छोटा था—स्कूल जाता, दोस्तों के साथ खेलता, और शाम को घर लौटता। घर में तीनों ही थे, लेकिन राधा के दिल में हमेशा एक खालीपन सा रहता। पति की यादें तो थीं, लेकिन रातों की उदासी और तनहाई कुछ और ही कहानी बुनती।
एक दोपहर की बात है। छोटू स्कूल गया हुआ था। राधा खेत से लौटी तो कमर में दर्द होने लगा। सुबह से वो धान की फसल बो रही थी, और अब पीठ ऐसी लग रही थी मानो कोई भारी बोझ लाद दिया हो। वो रसोई में खड़ी होकर रोटियां सेंक रही थी, लेकिन हर झुकाव पर दर्द चुभ जाता। "अरे बाप रे!" वो दर्द से कराह उठी और दीवार से टेक लगाकर बैठ गई।
हरिया चाचा बाहर से लौटे। उनके हाथों में ताजा कटी सब्जियां थीं। वो राधा को ऐसी हालत में देखकर चौंक गए। "क्या हुआ बेटी? चेहरा क्यों पीला पड़ गया?" उन्होंने पूछा, और पास आकर बैठ गए।
राधा ने सिर झुकाकर कहा, "चाचा जी, कमर में दर्द हो रहा है। सुबह से खेत में काम किया, अब सीधी खड़ी भी नहीं हो पा रही।"
हरिया चाचा ने सिर हिलाया। वो जानते थे कि राधा कितनी मेहनती है। "अरे, ये तो ठीक नहीं। मैं मालिश कर दूं? पुराने जमाने का तेल है मेरे पास, लगाने से राहत मिल जाएगी।"
राधा थोड़ा हिचकिचाई। गांव में ये आम बात थी—परिवार के बुजुर्ग मालिश करते, लेकिन उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। फिर भी, दर्द इतना तेज था कि वो राजी हो गई। "ठीक है चाचा जी, लेकिन जल्दी से कर दीजिए। छोटू आने वाला होगा।"
हरिया चाचा ने तेल की शीशी निकाली—नीम का तेल, जो घर में हमेशा रहता था। राधा ने साड़ी की चोली ऊपर की और पीठ नंगी कर ली। वो बिस्तर पर लेट गई, प्रोन करके। हरिया चाचा ने हाथों में तेल लगाया और धीरे-धीरे मालिश शुरू की। उनके हाथ मजबूत थे, लेकिन दबाव सही था। राधा को पहले तो राहत मिली। "हां चाचा जी, यहीं दबाइए... अरे, हल्का सा..."
लेकिन जैसे-जैसे मालिश नीचे की ओर बढ़ी, कमर के पास, राधा के शरीर में एक अजीब सी सनसनाहट होने लगी। हरिया चाचा के हाथ गर्म थे, और सालों बाद किसी मर्द के स्पर्श से राधा का तन मन जाग उठा। वो चुपचाप लेटी रही, लेकिन सांसें तेज हो गईं। हरिया चाचा को भी ये महसूस हो रहा था। राधा की त्वचा मुलायम थी, और उनकी उंगलियां अनजाने में थोड़ी और गहराई से दबाने लगीं।
"बेटी, दर्द कहां है बता?" हरिया चacha ने पूछा, लेकिन उनकी आवाज में एक हल्की सी कांप थी।
"नीचे... हिप्स के पास," राधा ने फुसफुसाया। अब दर्द कम हो रहा था, लेकिन जगह खाली सा लग रहा था। हरिया चाचा ने साड़ी को थोड़ा नीचे सरकाया और मालिश जारी रखी। राधा के मन में पति की यादें घूमने लगीं, लेकिन साथ ही हरिया चाचा का स्पर्श नया था—कुछ गलत, लेकिन रोक न पाने वाला।
अचानक, हरिया चाचा का हाथ फिसला और राधा की जांघ पर चला गया। दोनों ही रुक गए। राधा ने सिर उठाया, आंखों में शर्म और कुछ और। "चाचा जी..."
हरिया चाचा ने हाथ हटाया, लेकिन उनकी सांसें भारी थीं। "माफ करना बेटी... तेल फिसल गया।"
राधा उठी, साड़ी ठीक की। "कोई बात नहीं। दर्द कम हो गया। धन्यवाद।" लेकिन उसके चेहरे पर लाली थी, और मन में एक उथल-पुथल। छोटू की आवाज बाहर से आई—स्कूल से लौट आया था। दिन कट गया, लेकिन राधा की नींद उड़ी हुई थी। रात को खाना बनाते हुए भी हरिया चाचा की नजरें उस पर ठहर जातीं।
रात नौ बजे छोटू सो गया। घर छोटा था—एक कमरा राधा और छोटू का, अगला कमरा हरिया चाचा का। बीच में सिर्फ पतली दीवार। राधा ने लेटने की कोशिश की, लेकिन कमर का दर्द फिर लौट आया। वो करवटें बदल रही थी। तभी दरवाजा खटखटाया। हरिया चाचा खड़े थे। "बेटी, नींद नहीं आ रही? दर्द तो ठीक हो गया?"
राधा ने कंबल ओढ़ लिया। "हां चाचा जी, थोड़ा सा है। आप सो जाइए।"
लेकिन हरिया चाचा अंदर आ गए। "मालिश फिर कर दूं? रात का समय है, तेल गर्म हो जाएगा।" उनकी आंखों में कुछ था—भूख, जो सालों से दबी हुई थी। राधा जानती थी, लेकिन रोक न सकी। "ठीक है... लेकिन धीरे से।"
हरिया चाचा ने तेल गर्म किया—चूल्हे पर। फिर राधा को उसके कमरे में ही लिटाया। छोटू गहरी नींद में था, सिर दूसरी तरफ। मालिश शुरू हुई। इस बार हाथ और नीचे गए। राधा की सांसें तेज हो गईं। "चाचा जी... ये..."
"शशश... चुप रहो बेटी। दर्द जाएगा।" हरिया चाचा के हाथ अब मालिश से ज्यादा सहलाने लगे। राधा का शरीर गर्म हो गया। सालों की तन्हाई ने उसे कमजोर कर दिया था। वो फुसफुसाई, "चाचा जी, ये गलत है..."