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Fantasy Aryamani:- A Pure Alfa Between Two World's

nain11ster

Prime
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Tiger 786

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भाग:–42





वायु संरक्षण भेदकर हर वेंडिगो हमला कर रहा था। ऐसा लग रहा था हर वेंडिगो काट मंत्र के साथ हमला कर रहा हो। एक–दो सहायक के नाक में काला धुवां घुसा और उसके प्राण लेकर बाहर निकला। वहां पर तांत्रिक उध्यात और ऐडियाना का प्रकोप चारो ओर से घेर–घेर कर हमला शुरू कर चुका था। सिद्ध पुरुष ओमकार नारायण ने भी मोर्चा संभाला। एक साथ 5 संन्यासी और दोनो सिद्ध पुरुष के मुख से मंत्र इस प्रकार निकल रहे थे, जैसे कोई भजन चल रहा हो। हर मंत्र के छंद का अंत होते ही १० सहायक एक साथ अपने झोले से कुछ विभूति निकालते और भूमि पर पटक देते।


भूमि पर विभूति पटकने के साथ ही नाना प्रकार की असंख्य चीजें धुवां का रूप लेकर निकलती। किसी धुएं से असंख्य उजले से साये निकल रहे थे। उनका स्वरूप ऐडियाना के आसमान से ऊंची आकृति को एक साथ ढक रही थी। आस–पास मंडराते काले साये को पूरा गिल जाते। किसी विभूति के विस्फोट से असंख्य उजले धुएं के शेर निकले। अनगिनत शेर एक बार में ही इतनी तेजी से उस बर्फ के मैदान पर फैले, की पूरा मैदान में वेंडिगो उस साये वाले शेर से उलझ गये। देखते ही देखते वेंडिगो की संख्या विलुप्त हो रही थी। रक्त, पुष्प, जल, मेघ, बिजली और अग्नि सब उस विभूति की पटक से निकले और तांत्रिक के अग्नि, बिजली और श्वेत वर्षा को शांत करते उल्टा हमला करने लगे.…


आर्यमणि और निशांत के लिए तो जैसे कोई पौराणिक कथा का कोई युद्ध आंखों के सामने चल रहा हो। दोनो ने अपने हाथ जोड़ लिये। "हमे भी कुछ करना चाहिए आर्य, वरना हमारे यहां होने का क्या अर्थ निकलता है"…. "हां निशांत तुमने सही कहा। उनके पास मंत्र शक्ति है और मेरे पास बाहुबल, हम मिलकर आगे बढ़ते है।"


निशांत:– मेरे पास भ्रमित अंगूठी है, और ट्रैप करने का समान। देखता हूं इनसे क्या कर सकता हूं।


अगले ही पल पर्वत को भी झुका दे ऐसी दहाड़ उन फिजाओं में गूंजने लगी। एक पल तो दोनो पक्ष बिलकुल शांत होकर बस उस दहाड़ को ही सुन रहे थे... दहाड़ते हुए बिजली की तेजी से आर्यमणि बीच रण में खड़ा था और उसके ठीक सामने थी महाजनिका। 1 सिद्ध पुरुष 5 और संन्यासियों को लेकर आर्यमणि के ओर रुख किया।


मंत्र से मंत्र टकरा रहे थे। चारो ओर विस्फोट का माहोल था। वेंडिगो साये के बने शेर के साथ भीड़ रहे थे। हर शेर वेंडिगो को निगलता और विजय दहाड़ के साथ गायब हो जाता। ऐडियाना का भव्य साया, असंख्य उजले साये से बांधते हुये धीरे–धीरे छोटा होने लगा था। तांत्रिक अध्यात और उसके हजार चेले भी डटे हुये थे। मंत्र से मंत्र का काट हो रहा था। इधर सिद्ध पुरुष के १० सहायकों में से एक सहायक की जान जाती तो उधर अध्यात के २०० चेले दुनिया छोड़ चुके होते।


२०० चेलों की आहुति देने के बाद भी तांत्रिक अध्यात अपने पूरे उत्साह में था। क्योंकि उसे पता था कि आगे क्या होने वाला है। उसे पता था कि फिलहाल १० हाथियों की ताकत के साथ जब महाजनिका आगे बढ़ेगी तब यहां सभी की लाश बिछी होगी। और कुछ ऐसा शायद हो भी रहा था। आर्यमणि, महाजनिका के ठीक सामने और महाजनिका मुख से मंत्र पढ़ती अपने सामने आये आर्यमणि को फुटबॉल समझकर लात मार दी। आर्यमणि उसके इस प्रहार से कोसों दूर जाकर गिरा। न केवल आर्यमणि वरन एक सिद्ध पुरुष जो अपने 5 संन्यासियों के साथ महाजनिका के मंत्र काट रहा था। उनका काट मंत्र इतना कमजोर था कि मंत्र काटने के बाद भी उसके असर के वजह वह सिद्ध पुरुष मिलो दूर जाकर गिरा। शायद उस साधु के प्राण चले गये होते, यदि आर्यमणि अपने हाथ की पुर्नस्थापित अंगूठी उसके ऊपर न फेंका होता और वह अंगूठी उस साधु ने पकड़ी नही होती।


सिद्ध पुरुष जैसे ही गिरा मानो वह फट सा गया, लेकिन अगले ही पल वह उठकर खड़ा भी हो गया। एक नजर आर्यमणि और सिद्ध पुरुष के टकराये और नजरों से जैसे उन्होंने आर्यमणि का अभिवादन किया हो। लेकिन युद्ध के मैदान में जैसे महाजनिका काल बन गई थी। एक सिद्ध पुरुष का मंत्र जाप बंद क्या हुआ, अगले ही पल महाजनिका अपने मंत्र से पांचों संन्यासियों को मार चुकी थी। 5 संन्यासियों और 10 सहायकों के साथ ओमकार नारायण दोनो ओर का मोर्चा संभाले थे। लेकिन महाजनिका अपने खोये सिद्धि और कम बाहुबल केl साथ भी इन सब से कई गुणा खतरनाक थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि महाजनिका अकेले ही सभी मंत्रो को काटती हुई आगे बढ़ी और देखते ही देखते पर्वत समान ऊंची हो गई। उसका स्वरूप मानो किसी राक्षसी जैसा था। विशाल विकराल रूप और एक ही बार में ऐसा हाथ चलाई की उसकी चपेट में सभी आ गये। जमीन ऐसा कांपा की उसकी कंपन मिलो दूर तक मेहसूस हुई।


आर्यमणि कुछ देख तो नहीं पाया लेकिन वह सिद्ध पुरुष को अपने पीठ पर उठाकर बिजली समान तेजी से दौड़ लगा चुका था। उसने साधु को ऐडियाना के कब्र के पास छोड़ा और दौड़ लगाते हुए महाजनिका के ठीक पीछे पहुंचा। यूं तो आर्यमणि, महाजनिका के टखने से ऊंचा नही था, लेकिन उसका हौसला महाजनिका के ऊंचाई से भी कई गुणा ज्यादा बड़ा था। शेप शिफ्ट नही हुआ लेकिन झटके से हथेली खोलते ही धारदार क्ला बाहर आ गया। और फिर देखते ही देखते क्षण भर में आर्यमणी क्ला घुसाकर पूरे तेजी से गर्दन के नीचे तक पहुंच गया। आगे से तो महाजनिका बहुत हाथ पाऊं मार रही थी। मंत्र उच्चारण भी जारी था। पास खड़ा तांत्रिक अध्यात भी अब अपने मंत्रों की बौछार आर्यमणि पर कर रहा था। आर्यमणि जब ऊपर के ओर बढ़ रहा था तब बिजली बरसे, अग्नि की लपटे उठी, लेकिन कोई भी आर्यमणि की चढ़ाई को रोक न सका। जब आर्यमणि, महाजनिका के गर्दन के नीचे पहुंचा, फिर दोनो मुठ्ठी में महाजनिका के बाल को दबोचकर, एक जोरदार लात उसके पीठ पर मारा। पीठ पर वह इतना तेज प्रहार था कि महाजनिका आगे के ओर झुक गई, वहीं आर्यमणि बालों को मुट्ठी में दबोचे पीछे से आगे आ गया और इस जोड़ का बल नीचे धरातल को ओर लगाया की महाजनिका के गर्दन की हड्डियों से कर–कर–कर कर्राने की आवाज आने लगी। जोर इतना था की गर्दन नीचे झुकते चला गया। शायद टूट गई होती यदि वह घुटनों पर नही आती। महाजनिका घुटनों पर और उसका सर पूरा बर्फ में घुसा दिया।


क्या बाहुबल का प्रदर्शन था। महाजनिका अगले ही पल अपने वास्तविक रूप में आयि और सीधी खड़ी होकर घूरती नजरों से आर्यमणि को देखती... "इतना दुस्साहस".. गुस्से से बिलबिलाती महाजनिका एक बार फिर अपना पाऊं चला दी। पता नही कहां से और कैसे नयि ऊर्जा आर्यमणि में आ गई। आर्यमणि एक कदम नहीं चला। जहां खड़ा था उसी धरातल पर अपने पाऊं को जमाया और ज्यों ही अपने ऊपरी बदन को उछाला वह हवा में था। १० हाथियों की ताकत वाली महाजनिका, आर्यमणि को फुटबॉल की तरह उड़ाने के लिए लात चलायि। लेकिन ठीक उसी पल आर्यमणि एक लंबी उछाल लेकर कई फिट ऊपर हवा में था। और जब वह नीचे महाजनिका के चेहरे के सामने पहुंचा, फिर तो महाजनिका का बदन कोई रूई था और आर्यमणि का क्ला कोई रूई धुनने की मशीन। पंजे फैलाकर जो ही बिजली की रफ्तार से चमरी उधेरा, पूरा शरीर लह–लुहान हो गया। महाजनिका घायल अवस्था में और भी ज्यादा खूंखार होती अपना 25000 किलो वजनी वाला मुक्का आर्यमणि के चेहरे पर चला दी।


आर्यमणि वह मुक्का अपने पंजे से रोका। उसके मुक्के को अपने चंगुल में दबोचकर कलाई को ही उल्टा मरोड़ दिया। कर–कर की आवाज के साथ हड्डी का चटकना सुना जा सकता था। उसके बाद तो जैसे कोई बॉक्सर अपनी सामान्य रफ्तार से १०० गुणा ज्यादा रफ्तार में जैसे बॉक्सिंग बैग पर पंच मारता हो, ठीक उसी प्रकार का नजारा था। हाथ दिख ना रहे थे। आर्यमणि का मुक्का कहां और कब लगा वह नही दिख रहा था। बस हर सेकंड में सैकड़ों विस्फोट की आवाज महाजनिका के शरीर से निकल रही थी।


वहीं कुछ वक्त पूर्व जब दूसरे सिद्ध पुरुष के हाथ में जैसे ही पुनर्स्थापित अंगूठी आयि, उसने सबसे पहले अपने सभी साथियों को ही सुरक्षित किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि महाजनिका के चपेट में आने के बाद भी वह सभी के सभी उठ खड़े हुये और इसी के साथ यह भेद भी खुल गया की पुर्नस्थापित अंगूठी कब्र में नही है। तांत्रिक अध्यात समझ चुका था कि वह युद्ध हार चुका है। लेकिन इस से पहले की वह भागता, महाजनिका, आर्यमणि के साथ लड़ाई आरंभ कर चुकी थी। मंत्र उच्चारण वह कर रही थी, लेकिन सिद्ध पुरुष उसके मंत्र को काट रहे थे और आर्यमणि अपने बाहुबल से अपना परिचय दे रहा था। कुछ देर ही उसने महाजनिका पर मुक्का चलाया था और जब आर्यमणि रुका महाजनिका अचेत अवस्था में धम्म से गिरी।


तांत्रिक अध्यात और उसके कुछ साथी पहले से ही तैयार थे। जैसे ही महाजनिका धरातल पर गिरी ठीक उसी पल ऐडियाना के मकबरे से बहरूपिया चोगा और बिजली की खंजर हवा में आ गयि। हवा में आते ही उसे हासिल करने के लिए दोनो ओर से लड़ाई एक बार फिर भीषण हो गयि। सबका ध्यान ऐडियाना की इच्छा पर थी और इसी बीच तांत्रिक अध्यात एक नया द्वार (पोर्टल) खोल दिया। वस्तु खींचने का जादू दोनो ओर से चल रहा था। एक दूसरे को घायल करने अथवा मारने की कोशिश लगातार हो रही थी। ठीक उसी वक्त आर्यमणि थोड़ा सा विश्राम की स्थिति में आया था। तांत्रिक अध्यात का इशारा हुआ और महाजनिका लहराती हुई निकली।


इसके पूर्व निशांत जो इस पूरे एक्शन का मजा ले रहा था, उसे दूर से ही तांत्रिक अध्यात की चालबाजी नजर आ गयि। उसने भी थोड़ा सा दौड़ लगाया और हवा में छलांग लगाकर जैसे ही खुद पर सुरक्षा मंत्र पढ़ा, वह हवा में उड़ गया। तेजी के साथ उसने भागने वाले रास्ते पर छोटे–छोटे ट्रैप वायर के मैट बिछा दिये और जैसे ही नीचे पहुंचा सभी किनारे पर कील ठोकने वाली गन से कील को फायर करते हर मैट को चारो ओर से ठोक दिया।


महाजनिका जब द्वार के ओर भाग रही थी तभी उसे रास्तों में बिछी ट्रैप वायर दिख गई। वह तो हवा में लहराती हुई पोर्टल में घुसी और घुसने के साथ खींचने का ताकतवर मंत्र चला दी। नतीजा यह निकला कि पोर्टल में घुसते समय बिजली की खंजर उसके हाथ में थी और बहरूपिया चोगा दो दिशाओं की खींचा तानी में फट गया। महाजनिका तो भाग गयि लेकिन तांत्रिक और उसके गुर्गे भागते हुए ट्रैप वायर में फंस गये। एक तो गिरते वक्त मजबूत मंत्र उच्चारण टूटा और छोटे से मौके को सिद्ध पुरुष ओमकार नारायण भुनाते हुये एक पल में ही तांत्रिक को उसके घुटने पर ले आये। नुकसान दोनो ओर से हुआ था। कहीं कम तो कहीं ज्यादा। महाजनिका जब भाग रही थी, तब उसके पीछे आर्यमणि भी जा रहा था, लेकिन उसे दूसरे सिद्ध पुरुष ने रोक लिया।


माहोल बिलकुल शांत हो गया था। बचे सभी तांत्रिक को बंदी बनाकर ले जाने की तैयारी चल रही थी। एक द्वार (portal) सिद्ध पुरुष ने भी खोला। वहां केवल एक संन्यासी जो आर्यमणि से शुरू से बात कर रहा था, उसे छोड़कर बाकी सब उस द्वार से चले गये। जाते हुये सभी आर्यमणि को शौर्य और वीरता पर बधाई दे रहे थे और उसकी मदद के लिये हृदय से आभार भी प्रकट कर रहे थे। उस जगह पर अब केवल ३ लोग बचे थे। संन्यासी, आर्यमणि और निशांत।


निशांत:– यहां का माहोल कितना शांत हो गया न...


संन्यासी:– हां लेकिन एक काम अब भी बचा है। जादूगरनी (ऐडियाना) को मोक्ष देना...


निशांत:– क्या उसकी आत्मा अब भी यहीं है।



संन्यासी:– हां अब भी यहीं है और ज्यादा देर तक बंधी भी नही रहेगी। मुझे कुछ वक्त दो, फिर साथ चलते हैं...


संन्यासी अपना काम करने चल दिये। सफेद बर्फीले जगह पर केवल २ लोग बचे थे.… "आर्य क्या तुमने यह जगह पहले भी देखी है?"


आर्यमणि:– नही, ये रसिया का कोई बर्फीला मैदान है, जहां बर्फ जमी है। मैने रसिया का बोरियाल जंगल देखा है। वैसे तूने क्या सोचा...


निशांत:– किस बारे में...


आर्यमणि:– खोजी बनने के बारे में...


निशांत:– अगर मुझे ये लोग उस लायक समझेंगे तब तो मेरे लिए खुशकिस्मती होगी...


"किसी काम की तलाश में गये व्यक्ति को जितनी नौकरी की जरूरत होती है। नौकरी देने वाले को उस से कहीं ज्यादा एक कर्मचारी की जरूरत होती है। और अच्छे कर्मचारी की जरूरत कुछ ऐसी है कि रात के १२ बजे नौकरी ले लो.… क्या समझे"....


निशांत:– यही की आप संन्यासी कम और कर्मचारी से पीड़ित मालिक ज्यादा लग रहे।


सन्यासी:– मेरा नाम शिवम है और कैलाश मठ की ओर से हम, तुम्हे अपना खोजी बनाने के लिए प्रशिक्षित करना चाहते हैं? राह बिलकुल आसन नहीं होगी। कर्म पथ पर चलते हुए हो सकता है कि किसी दिन तुम्हारा दोस्त गलत के साथ खड़ा रहे और तुम्हे उसके विरुद्ध लड़ना पड़े? तो क्या ऐसे मौकों पर भी तुम हमारे साथ खड़े रहोगे?


निशांत:– हां बिलकुल.... आपके प्रस्ताव और आपके व्याख्या की हुई परिस्थिति, दोनो के लिए उत्तर हां है।


संन्यासी:– जितनी आसानी से कह गये, क्या उतनी आसानी से कर पाओगे...


निशांत:– क्यों नही... वास्तविक परिस्थिति में यदि आर्यमणि मेरे नजरों में दोषी होगा, तब मैं ही वो पहला रहूंगा जो इसके खिलाफ खड़ा मिलेगा। यदि आर्य मेरी नजर में दोषी नहीं, फिर मैं सच के साथ खड़ा रहूंगा... क्योंकि गीता में एक बात बहुत प्यारी बात लिखी है...


संन्यासी:– क्या?


निशांत:– जो मेरे लिये सच है वही किसी और के लिये सच हो, जरूरी नहीं… एक लड़का पहाड़ से गिरा... मैं कहूंगा आत्महत्या है, कोई कह सकता है एक्सीडेंट है... यहां पर जो "मरा" वो सच है... लेकिन हर सच का अपना–अपना नजरिया होता है और हर पक्ष अपने हिसाब से सही होता हैं।


संन्यासी शिवम:– और यदि इसी उधारहण में मैं कह दूं की लड़का अपने आत्महत्या के बारे में लिखकर गया था।


निशांत:– मैं कह सकता हूं कि जरूर किसी की साजिश है, और पहाड़ी की चोटी से धक्का देकर उसका कत्ल किया गया है। क्योंकि वह लड़का आत्महत्या करने वालों में से नही था।


संन्यासी:– ठीक है फिर कल से तुम्हारा प्रशिक्षण शुरू हो जायेगा। जब हम अलग हो रहे हो, तब तुम अपनी पुस्तक ले लेना निशांत।


निशांत:– क्यों आप भी हमारे साथ कहीं चल रहे है क्या?


संन्यासी:– नही यहां आने से पहले आर्यमणि के बहुत से सवाल थे शायद। बस उन्ही का जवाब देते–देते जहां तक जा सकूं...


आर्यमणि:– संन्यासी शिवम जी, अब बहुत कुछ जानने या समझने की इच्छा नही रही। इतना तो समझ में आ गया की आपकी और मेरी दुनिया बिलकुल अलग है। और आप सब सच्चे योद्धा हैं, जिसके बारे में शायद ही लोग जानते हो। अब आप सबके विषय में अभी नहीं जानना। मेरा दोस्त है न, वो बता देगा... बस जिज्ञासा सिर्फ एक बात की है... जिस रोचक तथ्य के किताब में मुझे रीछ स्त्री मिली, वह पूरा इतिहास ही गलत था।


संन्यासी शिवम:– "वहां लिखी हर बात सच थी। किंतु अलग–अलग सच्ची घटना को एक मुख्य घटना से जोड़कर पूरी बात लिखी गयि है। और वह किताब भी हाल के ही वर्षों में लिखी गयि थी। जिस क्षेत्र में रीछ स्त्री महाजनिका बंधी थी, उस क्षेत्र को तो गुरुओं ने वैसे भी बांध रखा होगा। एक भ्रमित क्षेत्र जहां लोग आये–जाये, कोई परेशानी नही हो। यदि कोई प्रतिबंधित क्षेत्र होता तब उसे ढूंढना बिलकुल ही आसान नहीं हो जाता"

"तांत्रिक अध्यात, ऐसे घराने से आता है जिसका पूर्वज रीछ स्त्री का सेवक था। महाजनिका को ढूंढने के लिये इनके पूर्वजों ने जमीन आसमान एक कर दिया। हजारों वर्षों से यह तांत्रिक घराना रीछ स्त्री को ढूंढ रहे थे। पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी संस्कृति, अपना ज्ञान और अपनी खोज बच्चों को सिखाते रहे। आखिरकार तांत्रिक अध्यात को रीछ स्त्री महाजनिका का पता चल ही गया।"


आर्यमणि:– बीच में रोकना चाहूंगा... यदि ये लोग खोजी है, तो खोज के दौरान इन्हे अलौकिक वस्तु भी मिली होगी? और जब वो लोग रीछ स्त्री की भ्रमित जगह ढूंढ सकते है, फिर उन्हे पारीयान का तिलिस्म क्यों नही मिला?


संन्यासी शिवम:– मेरे ख्याल से जब पारीयान की मृत्यु हुई होगी तब तक वो लोग हिमालय का पूरा क्षेत्र छान चुके होंगे। रीछ स्त्री लगभग 5000 वर्ष पूर्व कैद हुई थी और पारीयान तो बस 600 वर्ष पुराना होगा। हमारे पास पारीयान का तो पूरा इतिहास ही है। तांत्रिक सबसे पहले वहीं से खोज शुरू करेगा जो हमारा केंद्र था। और जिस जगह तुम्हे पारीयान का तिलिस्म मिला था, हिमालय का क्षेत्र, वह तो सभी सिद्ध पुरुषों के शक्ति का केंद्र रहा है। वहां के पूरे क्षेत्र को तो वो लोग इंच दर इंच कम से कम 100 बार और हर तरह के जाल को तोड़ने वाले 100 तरह के मंत्रों से ढूंढकर पहले सुनिश्चित हुये होंगे। इसलिए पारीयान का खजाना वहां सुरक्षित रहा। वरना यदि पुर्नस्थापित अंगूठी तांत्रिक मिल गयि होती तो तुम सोच भी नही सकते की महाजनिका क्या उत्पात मचा सकती थी।
Superb update
 

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भाग:–43






संन्यासी शिवम:– मेरे ख्याल से जब पारीयान की मृत्यु हुई होगी तब तक वो लोग हिमालय का पूरा क्षेत्र छान चुके होंगे। रीछ स्त्री लगभग 5000 वर्ष पूर्व कैद हुई थी और पारीयान तो बस 600 वर्ष पुराना होगा। हमारे पास पारीयान का तो पूरा इतिहास ही है। तांत्रिक सबसे पहले वहीं से खोज शुरू करेगा जो हमारा केंद्र था। और जिस जगह तुम्हे पारीयान का तिलिस्म मिला था, हिमालय का क्षेत्र, वह तो सभी सिद्ध पुरुषों के शक्ति का केंद्र रहा है। वहां के पूरे क्षेत्र को तो वो लोग इंच दर इंच कम से कम 100 बार और हर तरह के जाल को तोड़ने वाले 100 तरह के मंत्रों से ढूंढकर पहले सुनिश्चित हुये होंगे। इसलिए पारीयान का खजाना वहां सुरक्षित रहा। वरना यदि पुर्नस्थापित अंगूठी तांत्रिक मिल गयि होती तो तुम सोच भी नही सकते की महाजनिका क्या उत्पात मचा सकती थी।


निशांत:– क्या होता संन्यासी सर?


संन्यासी शिवम:– "वह आगे तुम खुद आकलन कर लेना। हां तो मैं रीछ स्त्री के ढूंढने की बात कर रहा था। हम कैलाश मठ से जुड़े है और यह भी मात्र एक इकाई है। ऐसे न जाने सैकड़ों इकाई पूरे भारतवर्ष में थी और सबका केंद्र पूर्वी हिमालय का एक गांव था। तांत्रिक की पीढ़ी दर पीढ़ी कि खोज पहले तो हमारे केंद्र से लेकर सभी इकाई के बीच हुई होगी। फिर जब उन्हें रीछ स्त्री इन सब जगहों में नही मिली होगी, तब ये लोग समस्त विश्व में ढूंढने निकले होंगे। आखिरकार उनके भी हजारों वर्षों की खोज समाप्त हुयि, और अध्यात को रीछ स्त्री महाजनिका मिल गयि। अब जो इतने जतन के बाद मिली थी, उसे वापस नींद से जगाने के लिए तांत्रिक और उसके सहयोगियों ने बिलकुल भी जल्दबाजी नही दिखायि। योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़े।"

"वह पुस्तक रोचक तथ्य मैने भी पढ़ी थी। जिस हिसाब से उन लोगों ने रीछ स्त्री को किताब में मात्र छोटी सी जगह देकर विदर्भ में बताया था और प्रहरी इतिहास का गुणगान किया था, हम समझ चुके थे कि यह तांत्रिक कितने दूर से निशाना साध रहा था। प्रहरी ने फिर पहले संपादक से संपर्क किया और उस संपादक के जरिये तांत्रिक और प्रहरी मिले। विष मोक्ष श्राप से किसी को जगाना आसान नहीं होता। जहां से रीछ स्त्री महाजनिका को निकाला गया था, उस जगह पर पिछले कई वर्षों से अनुष्ठान हो रहा था। कई बलि ली गयि। कइयों की आहुति दी गयि और तब जाकर वह रीछ स्त्री अपने नींद से जागी। वर्तमान समय को देखा जाय तो प्रहरी के पास पैसे ताकत और शासन का पूरा समर्थन है। तांत्रिक के अनुष्ठान में कोई विघ्न न हो इसलिए प्रहरी ने पूरे क्षेत्र को ही प्रतिबंधित कर दिया। मात्र कुछ प्रहरियों को पता था कि वहां असल में क्या खेल चल रहा और तांत्रिक अध्यात की हर जरूरत वही पूरी करते थे। बाकी सभी प्रहरी को यही पता था कि वहां कुछ शापित है जो सबके लिए खतरा है।"

"ऐडियाना का मकबरा ढूंढना तांत्रिक के लिए कौन सी बड़ी बात थी। और वहीं मकबरे में ऐसी १ ऐसी वस्तु थी जो महाजनिका को जागने के तुरंत बाद चाहिए थी, पुर्नस्थापित अंगूठी। वैसे एक सत्य यह भी है कि पुर्नस्थापित अंगूठी का पत्थर और बिजली की खंजर दोनो ही महाजनिका की ही खोज है। प्रहरी और तांत्रिक के बीच संधि हुई थी। ऐडियाना का मकबरा खुलते ही वह खंजर प्रहरी का होगा और बाकी सारा सामान तांत्रिक का। इन सबके बीच तुम चले आये और इनके सारी योजना में सेंध मार गये...


आर्य मणि:– सब कुछ तो आपने किया है, फिर मैं कहां से बीच में आया...


संन्यासी शिवम:– हमे तो किसी भी चीज की भनक ही नहीं होती। जिस दिन तुमने पारीयान के भ्रम जाल से उसके पोटली को निकाला, (आर्यमणि जब जर्मनी की घटना के बाद लौटा था, तब सबसे पहले अपने मां पिताजी से मिलने गंगटोक ही गया था), उसी दिन कैलाश मठ में पता चला था कि भ्रमित अंगूठी किसी को मिल गई है। मैं तो भ्रमित अंगूठी लेने तुम्हारे पीछे आया। और जब तुम्हारे पीछे आया तभी सारी बातों का खुलासा हुआ। तुम गंगटोक में अपनी उन पुस्तकों को जला रहे थे जो 4 साल की यात्रा के दौरान तुमने एकत्र किए थे। कुल 6 किताब जलाई थी और उन सभी पुस्तकों को हमने एक बार पलटा था। उन्ही मे से एक पुस्तक थी रोचक तथ्य। उसके बाद फिर हम सारे काम को छोड़कर विदर्भ आ गये।


आर्य मणि:– जब आपको पहले ही सब पता चल चुका था, फिर रीछ स्त्री को जागने ही क्यों दिया।


संन्यासी शिवम:– अच्छा सवाल है। लेकिन क्या पता भी है कि महाजनिका कौन थी और विष–मोक्ष श्राप से उसे किसने बंधा था? और क्या जितना वक्त पहले हमे पता चला, वह वक्त महा जनिका को नींद से न जगाने के लिये पर्याप्त थी?


आर्य मणि ने ना में अपना सर हिला दिया। संन्यासी शिवम अपनी बात आगे बढ़ाते.… "यूं तो रीछ की सदैव अपनी एक दुनिया रही है, जिसमे उन्होंने मानव समाज के लिए सकारात्मक कार्य किये और कभी भी अपने ऊपर अहम को हावी नही होने दिया। कई तरह के योद्धा, वीर और कुशल सेना नायक सिद्ध पुरुष के बताये सच की राह पर अपना सर्वोच्च योगदान दिया है। जहां भी उल्लेख है हमेसा सच के साथ खड़े रहे और धर्म के लिये युद्ध किया।"

"महाजनिका भी उन्ही अच्छे रीछ में से एक थी। वह सिद्धि प्राप्त स्त्री थी। उसकी ख्याति समस्त जगत में फैली थी। शक्ति और दया का अनोखा मिश्रण जिसने अपने गुरु के लिये कंचनजंगा में दो पर्वतों के बीच एक अलौकिक गांव बसाया। वहां का वातावरण और कठिन जलवायु आम रहने वालों के हिसाब से बिलकुल भी नहीं था। इसलिए उसने अपनी सिद्धि से वहां की जलवायु को रहने योग्य बना दी। यश और प्रसिद्धि का दूसरा नाम थी वह।"

"उसके अनंत अनुयायियों में से सबसे प्रिय अनुयायि तांत्रिक नैत्रायण था। तांत्रिक का पूरा समुदाय महाजनिका में किसी देवी जैसी श्रद्धा रखते थे। हर आयोजन का पहला अनुष्ठान महाजनिका के नाम से शुरू होता और साक्षात अपने समक्ष रखकर उसकी आराधना के बाद ही अनुष्ठान को शुरू किया करते थे। महाजनिका जब भी उनके पास जाती वह खुद को ईश्वर के समतुल्य ही समझती थी। किंतु वास्तविकता तो यह भी थी कि तांत्रिक नैत्रायण और उसका पूरा समुदाय अहंकारी और कुरुर मानसिकता के थे। सामान्य लोगों का उपहास करना तांत्रिक और उनके गुटों का मनोरंजन हुआ करता था।"

"उसी दौड़ में एक महान गुरु अमोघ देव हुआ करते थे, जो महाजनिका के भी गुरु थे, किंतु निम्न जीवन जीते थे और लोक कल्याण के लिये अपने शिष्यों को दूर दराज के क्षेत्रों में भेजा करते थे। उन्ही दिनों की बात थी जब गुरु अमोघ देव के एक शिष्य आरंभ्य को एक सामान्य मानव समझ कर तांत्रिक नैत्रायण ने उसका उपहास कर दिया। उसके प्रतिउत्तर में आरंभ्य ने उसकी सारी सिद्धियां मात्र एक मंत्र से छीन लिया और सामान्य लोगों के जीवन को समझने के लिए उसे भटकते संसार में बिना किसी भौतिक वस्तु के छोड़ दिया।"

"तांत्रिक नैत्रायण ने जिन–जिन लोगों का उपहास अपने मनोरंजन के लिए किया किया था, हर कोई बदले में उपहास ही करता। कोई उसकी धोती खींच देता तो कोई उसके आगे कचरा फेंक देता। तांत्रिक यह अपमान सहन नही कर पाया और महाजनिका के समक्ष अपना सिर काट लिया। महाजनिका इस घटना से इतनी आहत हुयि कि बिना सोचे उसने पूरे एक क्षेत्र से सभी मनुष्यों का सर काटकर उस क्षेत्र को वीरान कर दिया। उन सभी लोगों में गुरु अमोघ देव के शिष्य आरंभ्य भी था।"

"गुरु अमोघ देव इतनी अराजकता देखकर स्वयं उस गांव से बाहर आये और महाजनिका को सजा देने की ठान ली। गुरु अमोघ देव और महाजनिका दोनो आमने से थे। भयंकर युद्ध हुआ। हारने की परिस्थिति में महाजनिका वहां से भाग गयि। महाजनिका वहां से जब भागी तब एक चेतावनी के देकर भागी, "कि जब वह लौटेगी तब खुद को इतना ऊंचा बना लेगी कि कोई भी उसकी शक्ति के सामने टिक न पाय। लोग उसके नाम की मंदिर बनाकर पूजे और लोक कल्याण की एकमात्र देवी वही हो और दूसरा कोई नहीं।"

"इस घटना को बीते सैकड़ों वर्ष हो गये। महाजनिका किसी के ख्यालों में भी नही थी। फिर एक दौड़ आया जब महाजनिका का नाम एक बार फिर अस्तित्व में था। जिस क्षेत्र से गुजरती वहां केवल नर्क जैसा माहौल होता। पूरा आकाश हल्के काले रंग के बादल से ढक जाता। चारो ओर केवल लाश बिछी होती जिसका अंतिम संस्कार तक करने वाला कोई नहीं था। उसके पीछे तांत्रिक नैत्रायण के वंशज की विशाल तांत्रिक सेना थी जिसका नेतृत्व तांत्रिक विशेसना करता था। महाजनिका के पास एक ऐसा चमत्कारिक कृपाण (बिजली का खंजर) थी, जिसके जरिये वह मुख से निकले मंत्र तक को काट रही थी। सकल जगत ही मानो काली चादर से ढक गया हो, जो न रात होने का संकेत देती और ना ही दिन। बस मेहसूस होती तो केवल मंहूसियत और मौत।"

"गुरु अमोघ देव के नौवें शिष्य गुरु निरावण्म मुख्य गुरु हुआ करते थे। 8 दिन के घोर तप के बाद उन्होंने ही पता लगाया था कि महाजनिका अपनी शक्तियों को बढ़ाने के लिये, प्रकृति के सबसे बड़े रहस्य के द्वार को खोल चुकी थी... समनंतर दुनिया (parellel world) के द्वार। अपनी ही दुनिया की प्रतिबिंब दुनिया, जहां नकारात्मक शक्तियों का ऐसा भंडार था, जिसकी शक्तियां पाकर कोई भी सिद्ध प्राप्त इंसान स्वयं शक्ति का श्रोत बन जाए। इतना शक्तिशाली की मूल दुनिया के संतुलन को पूर्ण रूप से बिगाड़ अथवा नष्ट कर सकता था।"

"उस दौड़ में मानवता दम तोड़ रही और महाजनिका सिद्धि और बाहुबल के दम पर हर राज्य, हर सीमा और हर प्रकार की सेना को मारती हुई अपना आधिपत्य कायम कर रही थी। लोक कल्याण के बहुत से गुरुओं ने मिलकर भूमि, समुद्र तथा आकाश, तीनों मध्यम से वीरों को बुलवाया। इन तीनों मध्यम में बसने वाले मुख्य गुरु सब भी साथ आये। कुल २२ गुरु एक साथ खड़े मंत्रो से मंत्र काट रहे थे, वहीं तीनों लोकों से आये वीर सामने से द्वंद कर रहे थे। लेकिन महाजनिका तो अपने आप में ही शक्ति श्रोत थी। उसका बाहुबल मानो किसी पर्वत के समान था। ऐसा बाहुबल जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। अंधकार की दुनिया (parellel world) से उसने ऐसे–ऐसे अस्त्र लाये जो एक बार में विशाल से विशाल सेना को मौत की आगोश में सुला दिया करती थी।"

महाजनिका विकृत थी। अंधकार की दुनिया से लौटने के बाद उसका हृदय ही नही बल्कि रक्त भी काली हो चुकी थी। वह अपने शक्ति के अहंकार में चूर। उसे यकीन सा हो चला था कि वही एकमात्र आराध्या देवी है। किंतु वह कुछ भूल गयि। वह भूल गयि कि गुरु निरावण्म को समस्त ब्रह्माण्ड का ज्ञान था। ब्रह्मांड की उत्पत्ति जिन शक्ति पत्थरों से हुयि, फिर वह सकारात्मक प्रभाव दे या फिर नकारात्मक, उनको पूरा ज्ञान था। अंत में गुरु निरावण्म स्वयं सामने आये और उनके साथ था समस्त ब्रह्माण्ड का सबसे शक्तिशाली समुदाय का सबसे शक्तिशाली योद्धा, जिसे विग्गो सिग्मा कहते थे।

ब्रह्मांड के कई ग्रहों में से किसी एक ग्रह का वो निवासी था जिसे गुरु निरावण्म टेलीपोर्टेशन की जरिये लेकर आये थे। वह वीर अकेला चला बस शक्ति श्रोत के कयि सारे पत्थर संग जो युद्ध के लिये नही वरन महाजनिका को मात्र बांधने के उपयोग में आती। हर बुरे मंत्रो का काट गुरु निरावण्म पीछे खड़े रहकर कर रहे थे। उस विगो सिग्मा के बाहुबल की सिर्फ इतनी परिभाषा थी कि स्वयं महाजनिका उसके बाहुबल से भयभीत हो गयि। जैसा गुरु निरावण्म ने समझाया उसने ठीक वैसा ही किया। कई तरह के पत्थरों के जाल में महाजनिका को फसा दिया। शक्ति पत्थरों का ऐसा जाल जिसमे फंसकर कोई भी सिद्धि दम तोड़ दे। जो भी उस जाल में फसा वह अपनी सिद्धि को अपनी आखों से धुएं के माफिक हवा में उड़ते तो देखते, किंतु कुछ कर नही सकते थे। उसके कैद होते ही तांत्रिक विशेसना की सेना परास्त होने लगी।"

"महाजनिका और तांत्रिक विशेसना दोनो को ही समझ में आ चुका था की अब मृत्यु निश्चित है। तभी लिया गया एक बड़ा फैसला और तांत्रिक विशेसना के शिष्य विष मोक्ष श्राप से महाजनिका को कैद करने लगे। गुरु निरावण्म पहले मंत्र से ही भांप गये थे कि महाजनिका को कैद करके उसकी जान बचाई जा रही थी। लेकिन विष मोक्ष श्राप मात्र २ मंत्रों का होता है और कुछ क्षण में ही समाप्त किया जा सकता है। गुरु निरावण्म के हाथ में कुछ नही था, इसलिए उन्होंने टेलीपोर्टेशन के जरिये कैद महाजनिका को ही विस्थापित कर दिया।"

"कमजोर तो महाजनिका भी नही थी। उसे पता था यदि उसके शरीर को नष्ट कर दिया गया तब वह कभी वापस नहीं आ सकती। इसलिए जब गुरु निरावण्म उसे टेलीपोर्टेशन के जरिए विस्थापित कर रहे थे, ठीक उसी वक्त महाजनिका ने भी उसी टेलीपोर्टेशन द्वार के ऊपर अपना विपरीत द्वार खोल दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि महाजनिका की आत्मा समानांतर दुनिया (parellel world) के इस हिस्से में रह गयि और शरीर अंधकार की दुनिया में। यूं समझा जा सकता है कि आईने के एक ओर आत्मा और दूसरे ओर उसका शरीर। और दोनो ही टेलीपोर्टेशन के दौरान विष मोक्ष श्राप से कैद हो गये।"

"तांत्रिक विशेसना के सामने २ चुनौतियां थी, पहला अंधकार की दुनिया का दरवाजा खोलकर महाजनिका के शरीर और आत्मा को एक जगह लाकर उसे विष मोक्ष श्राप से मुक्त करना। और दूसरा ये सब काम करने के लिये सबसे पहले महाजनिका को टेलीपोर्ट करके कहां भेजा गया था, उसका पता लगाना... हां लेकिन इन २ समस्या के आगे एक तीसरी समस्या सामने खड़ी थी। अपने और अपने बच्चों की जान बचाना। टेलीपोर्टेशन विद्या आदिकाल से कई सिद्ध पुरुषों के पास रही थी किंतु तंत्रिक के पास वो सिद्धि नही थी जो उसे टेलीपोर्ट कर दे, इसलिए खुद ही उसने आत्म समर्पण कर दिया। इस आत्म समर्पण के कारण उसके बच्चों की जान बच गयि।"


"महाजनिका को विष मोक्ष श्राप उसे किसी गुरु द्वारा नही दी गई थी बल्कि तांत्रिक विशेसना के नेतृत्व में उसी के चेलों ने दी थी। हालाकि रक्त–मोक्ष श्राप से भी बांध सकते थे किंतु रक्त मोक्ष श्राप की विधि लंबी थी और समय बिलकुल भी नहीं था। महाजनिका को जगाने की प्रक्रिया कुछ वर्षों से चल रही थी। हम तो उसके आखरी चरण में पहुंचे थे। मैं आखरी चरण को विस्तार से समझाता हूं। विष–मोक्ष श्राप से जब किसी को वापस लाया जाता है तो वह उसके पुनर्जनम के समान होता है। गर्भ में जैसे बच्चा पलता है, ठीक वैसा ही एक गर्भ होता है, जहां शापित स्त्री या पुरुष 9 महीने के लिये रहते हैं। एक बार जब गर्भ की स्थापना हो जाती है, फिर स्वयं ब्रह्मा भी उसे नष्ट नही कर सकते। उसके जब वह अस्तित्व में आ जाये तभी कुछ किया जा सकता था। और हम तो गर्भ लगभग पूर्ण होने के वक्त पहुंचे।"

"आज जिस महाजनिका से हम लड़े है उसकी शक्ति एक नवजात शिशु के समान थी। यूं समझ लो की अपनी सिद्धि के वह कुछ अंश, जिन्हे हम अनुवांसिक अंश भी कहते हैं, उसके साथ लड़ी थी। यह तो उसकी पूर्ण शक्ति का मात्र १००वा हिस्सा रहा होगा। इसके अलावा वह २ बार मात खाई हुई घायल है, इस बार क्या साथ लेकर वापस लैटेगी, ये मुख्य चिंता का विषय है?"


आर्यमणि:– महाजनिका कहां से क्या साथ लेकर आयेगी? आप लोग इतने ज्ञानी है और महाजनिका इस वक्त बहुत ही दुर्बल। इस वक्त यदि छोड़ दिया तब तो वह अपनी पूरी शक्ति के साथ वापस आयेगी। आप लोगों को इसी वक्त उसे ढूंढना चाहिए...


संन्यासी शिवम:– "कहां ढूंढेंगे... वह इस लोक में होगी तो न ढूंढेंगे। महाजनिका अंधकार की दुनिया (parellel world) में है। अंधकार की दुनिया (parellel world) अपनी ही दुनिया की प्रतिबिंब दुनिया है, जिसका निर्माण प्रकृति ने संतुलन बनाए रखने के लिए किया है। जैसे की ऑक्सीजन जीवन दायक गैस लेकिन उसे बैलेंस करने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड बनाया। प्रकृति संतुलन बनाए रखने के लिए दोनो ही तरह के निर्माण करती है।"

"समांनानतर ब्रह्मांड भी इसी चीज का हिस्सा है, बस वहां जीवन नही बसता, बसता है तो कई तरह के विचित्र जीव जो उस दुनिया के वातावरण में पैदा हुए होते हैं। यहां के जीवन से उलट और सामान्य लोगों के लिए एक प्रतिकूल वातावरण जहां जीने के लिए संघर्ष करने के बारे में सोचना ही अपने आप से धोका करने जैसा है। ऐसा नहीं था कि महाजनिका वह पहली थी जो अंधकार की दुनिया (Parellel world) में घुसी। उसके पहले भी कई विकृत सिद्ध पुरुष और काली शक्ति के उपासक, और ज्यादा शक्ति की तलाश में जा चुके हैं। उसके बाद भी कई लोग गये हैं। किंतु वहां जो एक बार गया वह वहीं का होकर रह गया। किसी की सिद्धि में बहुत शक्ति होता तो वह किसी तरह मूल दुनिया में वापस आ जाता। कहने का सीधा अर्थ है उसके दरवाजा को कोई भी अपने मन मुताबिक नही खोल सकता, सिवाय महाजनिका के। वह इकलौती ऐसी है जो चाह ले तो २ दुनिया के बीच का दरवाजा ऐसे खोल दे जैसे किसी घर का दरवाजा हो।"

"टेलीपोर्टेशन (teleportation) और टेलीपैथी (telepathy) एक ऐसी विधा है जो सभी कुंडलिनी चक्र जागृत होने के बाद भी उनपर सिद्धि प्राप्त करना असंभव सा होता है। आज के वक्त में टेलीपोर्टेशन विद्या तो विलुप्त हो गयि है, हां टेलीपैथी को हम संभाल कर रखने में कामयाब हुये। महाजनिका पूरे ब्रह्मांड में इकलौती ऐसी है जो टेलीपोर्टेशन कर सकती है। जिस युग में सिद्ध पुरुष टेलीपोर्टेशन भी किया करते थे तो भी कोई अंधकार की दुनिया में रास्ता नहीं खोल सकता था। महाजनिका ने वह सिद्धि हासिल की थी जिससे वो दोनो दुनिया में टेलीपोर्टेशन कर सकती थी।
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B2.

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भाग:–47






आर्यमणि अपने माता-पिता और अपनी मौसेरी बहन के अभिनय को देखकर अंदर ही अंदर नमन किया और वो भी सामान्य रूप से, बिना किसी बदलाव के सबसे बातें करता रहा। कुछ ही देर बाद पार्टी शुरू हो गई थी। उस पार्टी में आर्यमणि शिरकत करते एक ही बात नोटिस की, यहां बहुत से ऐसे लोग थे जिनकी भावना वो मेहसूस नहीं कर सकता था।


उनमें ना केवल पलक थी बल्कि कुछ लोगों को छोड़कर सभी एक जैसे थे। आर्यमणि आश्चर्य से उन सभी के चेहरे देख रहा था तभी पीछे से पलक ने उसके कंधे पर हाथ रखी। काले और लाल धारियों वाली ड्रेस जो उसके बदन से बिल्कुल चिपकी हुई थी, ओपन शोल्डर और चेहरे का लगा मेकअप, आर्यमणि देखते ही अपना छाती पकड़ लिया… "क्या हुआ आर्य"..


आर्यमणि:- श्वांस लेने में थोड़ी तकलीफ हो रही है, यहां से चलो।


पलक, कंधे का सहारा देती, हड़बड़ी में उसके साथ निकली। दोनो चल रहे थे तभी आर्य को एक पैसेज दिखा और उसने पलक का हाथ खींचकर पैसेज की दीवार से चिपका दिया, और अपने होंठ आगे ही बढ़ाया ही था… "क्या कर रहे हो आर्य, यहां कोई आ जाएगा।"..


आर्यमणि उसके बदन की खुशबू लेते…. "आह्हहह ! तुम मुझे दीवाना बना रही हो पलक।"..


पलक:- हीहीहीहीही… कंट्रोल किंग, आप तो अपनी रानी को देखकर उतावले हो गये।


आर्यमणि आगे कोई बात ना करके अपने होंठ आगे बढ़ा दिया, पलक भी अपने बदन को ढीला छोड़ती, उसके होंठ से होंठ लगाकर चूमने लगी। दोनो एक दूसरे के होंठ का स्पर्श पाकर एक अलग ही दुनिया में थे। तभी गले की खराश से दोनो का ध्यान टूटा…. "इतना प्रोग्रेस, लगता है तुम दोनो की एंगेजमेंट भी जल्द करवानी होगी।"..


आर्यमणि का ध्यान टूटा। दोनो ने जब सामने नम्रता को देखा तब झटके के साथ अलग हो गए। आर्यमणि, नम्रता के इमोशंस को साफ पढ़ सकता था, उसे थोड़ा आश्चर्य हुआ और वो गौर से उसे देखने लगा… नम्रता हंसती हुई उसके बाल बिखेरते…. "पलकी संभाल इसे, ये तो मुझे ही घूरने लगा।"


पलक:- दीदी आप लग ही इतनी खूबसूरत रही हो। किसी की नजर थम जाए।


नम्रता:- और तुम दोनो जो ये सब कर रहे थे हां.. ये सब क्या है?


पलक:- इंसानी इमोशन है दीदी अपने पार्टनर को देखकर नहीं निकलेगा तो किसे देखकर निकलेगा।


आर्यमणि:- हमे चलना चाहिए।


दोनो वहां से वापस हॉल में चले आये। पलक आर्यमणि के कंधे पर अपने दोनो हाथ टिकाकर, चुपके से उसके गाल पर किस्स करती… "तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया आर्य। लेकिन ऐसा लगता है जैसे मैंने तुम्हारी वाह-वाही अपने नाम करवा ली है।"


आर्यमणि:- तुम भी तो मै ही हूं ना। तुम खुश तो मै खुश।


पलक, आर्यमणि के गाल खींचती… "लेकिन तुम तो यहां खुश नजर नहीं आ रहे आर्य। बात क्या है, किसी ने कुछ कह दिया क्या?"


आर्यमणि, पलक के ओर देखकर मुस्कुराते हुए… "चलो बैठकर कुछ बातें करते है।"


पलक:- हां अब बताओ।


आर्यमणि:- तुम्हे नहीं लगता कि मेरे मौसा जी थोड़े अजीब है। और साथ ने तुम्हारे पापा भी.. सॉरी दिल पर मत लेना..


यह सुनते पलक के चेहरे का रंग थोड़ा उड़ा… "आर्य, खुलकर कहो ना क्या कहना चाहते हो।"..


आर्यमणि:- मैंने भारतीय इतिहास की खाक छान मारी। आज से 400 वर्ष पूर्व युद्ध के लिये केवल 12 तरह के हथियार इस्तमाल होते थे। अनंत कीर्ति के पुस्तक को खोलने के लिए जो शर्तें बताई गई है वो एक भ्रम है। और मै जान गया हूं उसे कैसे खोलना है। या यूं समझो की मै वो पुस्तक सभी लोगो के लिये खोल सकता हूं।


पलक, उत्सुकता से… "कैसे?"


आर्यमणि:- तुम मांसहारी हो ना। ना तो तुम्हे विधि बताई जा सकती है ना अनुष्ठान का कोई काम करवाया जा सकता है। बस यूं समझ लो कि वो एक शुद्ध पुस्तक है, जिसे शुद्ध मंत्र के द्वारा बंद किया गया है। 7 से 11 दिन के बीच छोटे से अनुष्ठान से वो पुस्तक बड़े आराम से खुल जायेगी। पुस्तक पूर्णिमा की रात को ही खुलेगी और तब जाकर लोग उस कमरे में जाएंगे, पुस्तक को नमन करके अपनी पढ़ाई शुरू कर देंगे।


पलक:- और यदि नहीं खुली तो..


आर्यमणि:- दुनिया ये सवाल करे तो समझ में आता है, तुम्हारा ऐसा सवाल करना दर्द दे जाता है। खैर, मुझे कोई दिलचस्पी नहीं उस पुस्तक में। मै बस सही जरिया के बारे में जब सोचा और मौसा जी का चेहरा सामने आया तो हंसी आ गयि। हंसी आयि मुझे इस बात पर की जिस युग में युद्ध के बड़ी मुश्किल से 12 हथियार मिलते हो, वहां 25 अलग-अलग तरह के हथियार बंद लोग। फनी है ना।


पलक, आर्यमणि के गाल को चूमती…. "तुम तो यहां मेरे प्राउड हो। सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा लेकिन जब हम अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे तब इन लोगो को एक बार और हम पर प्राउड फील होगा।"


आर्यमणि, हैरानी से उसका चेहरा देखते हुए… "पर ऐसा होगा ही क्यों? मौसा जी से कल मै इस विषय में बात करूंगा और किसी सुध् साकहारी के हाथो पूरे अनुष्ठान की विधि को बता दूंगा। वो जाने और उनका काम।"… कहते हुए आर्यमणि ने पलक को बाहों में भर लिया..


पलक अपनी केवाहनी आर्यमणि के पेट में मारती… "लोग है आर्य, क्या कर रहे हो।"


आर्यमणि:- अपनी रानी के साथ रोमांस कर रहा हूं।


पलक:- कुछ बातें 2 लोगों के बीच ही हो तो ही अच्छी लगती है। वैसे भी इस वक़्त तुम्हारी रानी को इंतजार है तुम्हारे एक नए कीर्तिमान की। यूं समझो मेरे जीवन की ख्वाहिश। बचपन से उस पुस्तक के बारे में सुनती आयी हूं, एक अरमान तो दिल में है ही वो पुस्तक मैं खोलूं, इसलिए तो 25 तरह के हथियारबंद लोगो से लड़ने की कोशिश करती हूं।


आर्यमणि:- ये शर्त पूरी करना आसान है। बुलेट प्रूफ जैकेट लो और उसके ऊपर स्टील मेश फेंसिंग करवाओ सर पर भी वैसा ही नाईट वाला हेलमेट डालो। बड़ी सी भाला लेकर जय प्रहरी बोलते हुए घुस जाओ…


पलक:- कुछ तुम्हारे ही दिमाग वाले थे, उन्होंने तो एक स्टेप आगे का सोच लिया था और रोबो सूट पहन कर आये थे। काका हंसते हुए उसे ले गये पुस्तक के पास और सब के सब नाकाम रहे। क्या चाहते हो, इतनी मेहनत के बाद मै भी नाकामयाब रहूं।


आर्यमणि:- विश्वास होना चाहिए, कामयाबी खुद व खुद मिलेगी।


पलक:- विश्वास तो है मेरे किंग। पर किंग अपनी क्वीन की नहीं सुन रहे।


आर्यमणि:- हम्मम ! एक राजा जब अपने रानी के विश्वास भरी फरियाद नहीं सुन सकता तो वो प्रजा की क्या सुनेगा.. बताओ।


पलक:- सब लोग यहां है, चलो उस पुस्तक को चुरा लेंगे, और फिर 7 दिन बाद सबको सरप्राइज देंगे।


आर्यमणि:- इस से अच्छा मैं मांग ना लूं।


पलक:- काका नहीं देंगे।


आर्यमणि:- हां तो मैं नहीं लूंगा।


पलक:- तुम्हारी रानी नाराज हो जायेगी।


आर्यमणि:- रानी को अपने काबू में रखना और उसकी नजायज मांग पर उसे एक थप्पड़ लगाना एक बुद्धिमान राजा का काम होता है।


आर्यमणि अपनी बात कहते हुए धीमे से पलक को एक थप्पड़ मार दिया। कम तो आर्यमणि भी नहीं था। जब सुकेश भारद्वाज की नजर उनके ओर थी तभी वो थप्पड़ मारा। सुकेश भारद्वाज दोनो को काफी देर से देख भी रहा था, थप्पड़ परते ही वो आर्यमणि के पास पहुंचा…. "ये क्या है, तुम दोनो यहां बैठकर झगड़ा कर रहे।"..


पलक, अपने आंख से 2 बूंद आशु टपकाती…. "काका जिस काम से 10 लोगों का भला हो वो काम के लिए प्रेरित करना क्या नाजायज काम है।"..


सुकेश:- बिल्कुल नहीं, क्यों आर्य पलक के कौन से काम के लिए तुम ना कह रहे हो।


"मौसा वो"… तभी पलक उसके मुंह पर हाथ रखती… "काका इस से कहो कि मेरा काम कर दे। मेरी तो नहीं सुना, कहीं आपकी सुन ले।"..


सुकेश:- शायद मै अपनी एक ख्वाहिश के लिए आर्य से जिद नहीं कर सका, इसलिए तुम्हारे काम के लिए भी नहीं कह पाऊंगा। लेकिन, भूमि को तो यहां भेज ही सकता हूं।


आर्यमणि, अपने मुंह पर से पलक का हाथ हटाकर, अपने दोनो हाथ जोड़ते झुक गया… "किसी को भी मत बुलाओ मौसा जी, मै कर दूंगा चिंता ना करो। और हां आपने अपनी ख्वाहिश ना बता कर मुझे हर्ट किया है। मै कोई गैर नहीं था, आप मुझसे कह सकते थे, वो भी हक से और ऑर्डर देकर। चलो पलक"..


पलक के साथ वो बाहर आ गया। पलक उसके कंधे और हाथ रखती…. "इतना नहीं सोचते जिंदगी में थोड़ा स्पेस देना सीखो, ताकि लोगों को समझ सको। अभी तुम्हारा मूड ठीक नहीं है, किताब के बारे में फिर कभी देखते है।"


आर्यमणि:- लोग अगर धैर्य के साथ काम लेते, तब वो पुस्तक कब का खुल चुकी होती। मेरी रानी, 7 दिन के अनुष्ठान के लिए तैयारी भी करनी होती है। 2 महीने बाद गुरु पूर्णिमा है। क्या समझी..


पलक:- लेकिन आर्य, उस दिन तो राजदीप दादा और नम्रता दीदी की शादी है...


आर्यमणि:- हां लेकिन वह शुभ दिन है। पुस्तक खोलने के लिए देर रात का एक शानदार मुहरत मे पुस्तक खोलने की कोशिश करूंगा।


पलक:- 7 दिन बाद भी तो पूर्णिमा है..


आर्यमणि:- रानी को फिर भी 2 महीने इंतजार करना होगा। चलो अन्दर चलते है और हां एक बात और..


पलक:- क्या आर्य...


आर्यमणि:- लव यू माय क्वीन...


पलक:- लव यू टू माय किंग...


आर्यमणि, पलक के होंठ का एक छोटा सा स्पर्श लेते… "चलो चला जाए।


आर्यमणि रात के इस पार्टी के बाद सीधा ट्विंस के जंगल में पहुंचा, जहां चारों उनका इंतजार कर रहे थे। आर्यमणि चारो को सब से खुशखबरी देते हुए बताया.… "2 महीने तक कोई प्रहरी उन्हे परेशान नहीं करने वाला। वो इस वक्त नहीं चाहेंगे कि आर्यमणि अपने पैक के सोक मे रहे, इसलिए यहां तुम सब प्रहरी से मेहफूज हो।"


फिर बात आगे बढ़ाते हुए आर्यमणि उन्हे चेतावनी देने लगा... "प्रहरी कुछ नहीं करेंगे इसका ये मतलब नहीं कि हम सुस्त पड़ जाएं। मानता हूं, तुम सब ने बहुत कुछ झेला है। लेकिन मेरे लिए बस 2 महीने और कष्ट कर लो। अगले 2 महीने तक शरीर को बीमार कर देने वाली ट्रेनिंग, खून जला देने वाली ट्रेनिंग। बिना रुके और बेहोशी में भी केवल ट्रेनिंग। एक बात और, एक शिकारी भी आयेगी तुम सब को प्रशिक्षित करने, कोई काट मत लेना उसे। रूही, मै रहूं की ना रहूं, तुम्हे सब पर नजर बनाए रखनी है"…


रूही:- बॉस 3 टीन वूल्फ की जिम्मेदारी.…. इतने हॉट फिगर वाली लड़की को इतने बड़े बच्चों की मां बना दिये।


आर्यमणि उसे घूरते हुए वहां से निकल गया। आर्यमणि ने अब तो जैसे यहां से दूर जाने की ठान ली हो। मुंबई प्रहरी समूह का नया चेहरा स्वामी भी गुप्त रूप से जांच करने नागपुर पहुंच चुका था। दरअसल वो यहां कुछ पता करने नहीं आया था, बल्कि अपने और भूमि के बीच के रिश्ते को नया रूप देने आया था, ताकि आगे की राह आसान हो जाए।


इसी संदर्व मे जब वो भूमि से मिला और आर्यमणि के महत्वकांछी प्रोजेक्ट, "आर्म्स डेवलपमेंट यूनिट" के बारे में सुना, उसने तुरंत प्रहरी की मीटिंग में उसे "प्रहरी समुदाय महत्वकांछी प्रोजेक्ट" का नाम दिया, जिसे एक गैर प्रहरी, आर्यमणि अपनी देख रेख मे चलाता और उसके साथ प्रहरी की उसमे भागीदारी रहती। पैसों कि तो इस समुदाय के पास कोई कमी थी नहीं। आर्यमणि ने जो छोटा प्रारूप के मॉडल को इन सबके सामने पेश किया। उस छोटे प्रारूप को कई गुना ज्यादा बढ़ाकर एक पूरे क्षमता वाले प्रोजेक्ट के रूप में गवर्नमेंट के पास एप्रोवल के लिए भेज दिया गया था।


शायद एप्रोवाल मे वक्त लगता, लेकिन गवर्नमेंट को सेक्योरिटीज अमाउंट दिखाने के लिए आर्यमणि के पास कई बिलियन व्हाइट मनी उसके कंपनी अकाउंट में जमा हो चुके थे। देवगिरी भाऊ अलग से अपनी कुल संपत्ति का 40% हिस्सा आर्यमणि को देने का एनाउंस कर चुके थे।


हालांकि इस घोसना के बाद मुंबई की लॉबी में एक बार और फुट पड़ने लगी थी। लेकिन अमृत पाठक सबको धैर्य बनाए रखने और धीरेन पर विश्वास करने की सलाह दिया। उसने सबको केवल इतना ही समझाते हुए अपना पक्ष रखा.… "स्वामी, प्रहरी के मुख्यालय, नागपुर में है। इतना घन कुछ भी नहीं यदि वो प्रहरी भारद्वाज को पूरे समुदाय से साफ कर दे। एक बार वो लोग चले गये फिर हम सोच भी नहीं सकते उस से कहीं ज्यादा पैसा हमारे पास होगा"…


मूर्ख लोग छोटी साजिशों से बस भूमि की मुश्किलें बढ़ाने से ज्यादा कुछ नहीं कर रहे थे। लेकिन इन सब को दरकिनार कर भूमि और आर्यमणि दोनो जितना वक्त मिलता उतने मे एक दूसरे के करीब रहते। आर्यमणि भूमि के पेट की चूमकर, मुस्कुराते हुए अक्सर कहता... "हीरो तेरे जन्म के वक्त मै नहीं रहूंगा लेकिन तू जब आये तो मेरी भूमि दीदी को फिर मेरी याद ना आये"…


भूमि लेटी हुई बस आर्यमणि की प्यारी बातों को सुन रही होती और उसके सर पर हाथ फेर रही होती। कई बार आर्यमणि कई तरह की कथाएं कहता, जिसे भूमि भी बड़े इत्मीनान से सुना करती थी। कब दोनो को सुकून भरी नींद आ जाती, पता ही नहीं चलता था।


आर्यमणि कॉलेज जाना छोड़ चुका था और सुबह से लेकर कॉलेज के वक्त तक अपने पैक के साथ होता। उन्हे प्रशिक्षित करता। अलग ही लगाव था, जिसे आर्यमणि उनसे कभी जता तो नहीं पता लेकिन दिल जलता, जब उसे यह ख्याल आता की शिकारी कितनी बेरहमी से एक वूल्फ पैक को आधा खत्म करते और आधा को सरदार खान के किले में भटकने छोड़ देते।


उसे ऐसा मेहसूस होता मानो किसी परिवार को मारकर उसके कुछ लोग को रोज मरने के लिए किसी कसाई की गली छोड़ आये हो। रूही और अलबेली मे आर्यमणि के गुजरे वक्त की कड़वी यादें दिखने लगती। हां लेकिन उन कड़वी यादों पर मरहम लगाने के लिए चित्रा, निशांत और माधव थे। उनके बीच पलक भी होती थी और कुछ तो लगाव आर्यमणि का पलक के साथ भी था।
Shandaar update Bhai ❤️

Palak jis tarah se Arya k peeche pad gayi hai book k liye lgta vo khud hi personally hasil Krna chahati hai book se milne wala Gyan ya power,
Aur kya beast wolf sardar Khan ka blood agar ruhi ya albeli piti hai to vo bhi beast wolf ban jaaegi, aur agr banti hai to vo bhi sardar Khan ki trah men eater ho jaaegi ,
Ya Arya ke sikhaye tarike se control me reh legi ???
 

Xabhi

"Injoy Everything In Limits"
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भाग:–47






आर्यमणि अपने माता-पिता और अपनी मौसेरी बहन के अभिनय को देखकर अंदर ही अंदर नमन किया और वो भी सामान्य रूप से, बिना किसी बदलाव के सबसे बातें करता रहा। कुछ ही देर बाद पार्टी शुरू हो गई थी। उस पार्टी में आर्यमणि शिरकत करते एक ही बात नोटिस की, यहां बहुत से ऐसे लोग थे जिनकी भावना वो मेहसूस नहीं कर सकता था।


उनमें ना केवल पलक थी बल्कि कुछ लोगों को छोड़कर सभी एक जैसे थे। आर्यमणि आश्चर्य से उन सभी के चेहरे देख रहा था तभी पीछे से पलक ने उसके कंधे पर हाथ रखी। काले और लाल धारियों वाली ड्रेस जो उसके बदन से बिल्कुल चिपकी हुई थी, ओपन शोल्डर और चेहरे का लगा मेकअप, आर्यमणि देखते ही अपना छाती पकड़ लिया… "क्या हुआ आर्य"..


आर्यमणि:- श्वांस लेने में थोड़ी तकलीफ हो रही है, यहां से चलो।


पलक, कंधे का सहारा देती, हड़बड़ी में उसके साथ निकली। दोनो चल रहे थे तभी आर्य को एक पैसेज दिखा और उसने पलक का हाथ खींचकर पैसेज की दीवार से चिपका दिया, और अपने होंठ आगे ही बढ़ाया ही था… "क्या कर रहे हो आर्य, यहां कोई आ जाएगा।"..


आर्यमणि उसके बदन की खुशबू लेते…. "आह्हहह ! तुम मुझे दीवाना बना रही हो पलक।"..


पलक:- हीहीहीहीही… कंट्रोल किंग, आप तो अपनी रानी को देखकर उतावले हो गये।


आर्यमणि आगे कोई बात ना करके अपने होंठ आगे बढ़ा दिया, पलक भी अपने बदन को ढीला छोड़ती, उसके होंठ से होंठ लगाकर चूमने लगी। दोनो एक दूसरे के होंठ का स्पर्श पाकर एक अलग ही दुनिया में थे। तभी गले की खराश से दोनो का ध्यान टूटा…. "इतना प्रोग्रेस, लगता है तुम दोनो की एंगेजमेंट भी जल्द करवानी होगी।"..


आर्यमणि का ध्यान टूटा। दोनो ने जब सामने नम्रता को देखा तब झटके के साथ अलग हो गए। आर्यमणि, नम्रता के इमोशंस को साफ पढ़ सकता था, उसे थोड़ा आश्चर्य हुआ और वो गौर से उसे देखने लगा… नम्रता हंसती हुई उसके बाल बिखेरते…. "पलकी संभाल इसे, ये तो मुझे ही घूरने लगा।"


पलक:- दीदी आप लग ही इतनी खूबसूरत रही हो। किसी की नजर थम जाए।


नम्रता:- और तुम दोनो जो ये सब कर रहे थे हां.. ये सब क्या है?


पलक:- इंसानी इमोशन है दीदी अपने पार्टनर को देखकर नहीं निकलेगा तो किसे देखकर निकलेगा।


आर्यमणि:- हमे चलना चाहिए।


दोनो वहां से वापस हॉल में चले आये। पलक आर्यमणि के कंधे पर अपने दोनो हाथ टिकाकर, चुपके से उसके गाल पर किस्स करती… "तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया आर्य। लेकिन ऐसा लगता है जैसे मैंने तुम्हारी वाह-वाही अपने नाम करवा ली है।"


आर्यमणि:- तुम भी तो मै ही हूं ना। तुम खुश तो मै खुश।


पलक, आर्यमणि के गाल खींचती… "लेकिन तुम तो यहां खुश नजर नहीं आ रहे आर्य। बात क्या है, किसी ने कुछ कह दिया क्या?"


आर्यमणि, पलक के ओर देखकर मुस्कुराते हुए… "चलो बैठकर कुछ बातें करते है।"


पलक:- हां अब बताओ।


आर्यमणि:- तुम्हे नहीं लगता कि मेरे मौसा जी थोड़े अजीब है। और साथ ने तुम्हारे पापा भी.. सॉरी दिल पर मत लेना..


यह सुनते पलक के चेहरे का रंग थोड़ा उड़ा… "आर्य, खुलकर कहो ना क्या कहना चाहते हो।"..


आर्यमणि:- मैंने भारतीय इतिहास की खाक छान मारी। आज से 400 वर्ष पूर्व युद्ध के लिये केवल 12 तरह के हथियार इस्तमाल होते थे। अनंत कीर्ति के पुस्तक को खोलने के लिए जो शर्तें बताई गई है वो एक भ्रम है। और मै जान गया हूं उसे कैसे खोलना है। या यूं समझो की मै वो पुस्तक सभी लोगो के लिये खोल सकता हूं।


पलक, उत्सुकता से… "कैसे?"


आर्यमणि:- तुम मांसहारी हो ना। ना तो तुम्हे विधि बताई जा सकती है ना अनुष्ठान का कोई काम करवाया जा सकता है। बस यूं समझ लो कि वो एक शुद्ध पुस्तक है, जिसे शुद्ध मंत्र के द्वारा बंद किया गया है। 7 से 11 दिन के बीच छोटे से अनुष्ठान से वो पुस्तक बड़े आराम से खुल जायेगी। पुस्तक पूर्णिमा की रात को ही खुलेगी और तब जाकर लोग उस कमरे में जाएंगे, पुस्तक को नमन करके अपनी पढ़ाई शुरू कर देंगे।


पलक:- और यदि नहीं खुली तो..


आर्यमणि:- दुनिया ये सवाल करे तो समझ में आता है, तुम्हारा ऐसा सवाल करना दर्द दे जाता है। खैर, मुझे कोई दिलचस्पी नहीं उस पुस्तक में। मै बस सही जरिया के बारे में जब सोचा और मौसा जी का चेहरा सामने आया तो हंसी आ गयि। हंसी आयि मुझे इस बात पर की जिस युग में युद्ध के बड़ी मुश्किल से 12 हथियार मिलते हो, वहां 25 अलग-अलग तरह के हथियार बंद लोग। फनी है ना।


पलक, आर्यमणि के गाल को चूमती…. "तुम तो यहां मेरे प्राउड हो। सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा लेकिन जब हम अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे तब इन लोगो को एक बार और हम पर प्राउड फील होगा।"


आर्यमणि, हैरानी से उसका चेहरा देखते हुए… "पर ऐसा होगा ही क्यों? मौसा जी से कल मै इस विषय में बात करूंगा और किसी सुध् साकहारी के हाथो पूरे अनुष्ठान की विधि को बता दूंगा। वो जाने और उनका काम।"… कहते हुए आर्यमणि ने पलक को बाहों में भर लिया..


पलक अपनी केवाहनी आर्यमणि के पेट में मारती… "लोग है आर्य, क्या कर रहे हो।"


आर्यमणि:- अपनी रानी के साथ रोमांस कर रहा हूं।


पलक:- कुछ बातें 2 लोगों के बीच ही हो तो ही अच्छी लगती है। वैसे भी इस वक़्त तुम्हारी रानी को इंतजार है तुम्हारे एक नए कीर्तिमान की। यूं समझो मेरे जीवन की ख्वाहिश। बचपन से उस पुस्तक के बारे में सुनती आयी हूं, एक अरमान तो दिल में है ही वो पुस्तक मैं खोलूं, इसलिए तो 25 तरह के हथियारबंद लोगो से लड़ने की कोशिश करती हूं।


आर्यमणि:- ये शर्त पूरी करना आसान है। बुलेट प्रूफ जैकेट लो और उसके ऊपर स्टील मेश फेंसिंग करवाओ सर पर भी वैसा ही नाईट वाला हेलमेट डालो। बड़ी सी भाला लेकर जय प्रहरी बोलते हुए घुस जाओ…


पलक:- कुछ तुम्हारे ही दिमाग वाले थे, उन्होंने तो एक स्टेप आगे का सोच लिया था और रोबो सूट पहन कर आये थे। काका हंसते हुए उसे ले गये पुस्तक के पास और सब के सब नाकाम रहे। क्या चाहते हो, इतनी मेहनत के बाद मै भी नाकामयाब रहूं।


आर्यमणि:- विश्वास होना चाहिए, कामयाबी खुद व खुद मिलेगी।


पलक:- विश्वास तो है मेरे किंग। पर किंग अपनी क्वीन की नहीं सुन रहे।


आर्यमणि:- हम्मम ! एक राजा जब अपने रानी के विश्वास भरी फरियाद नहीं सुन सकता तो वो प्रजा की क्या सुनेगा.. बताओ।


पलक:- सब लोग यहां है, चलो उस पुस्तक को चुरा लेंगे, और फिर 7 दिन बाद सबको सरप्राइज देंगे।


आर्यमणि:- इस से अच्छा मैं मांग ना लूं।


पलक:- काका नहीं देंगे।


आर्यमणि:- हां तो मैं नहीं लूंगा।


पलक:- तुम्हारी रानी नाराज हो जायेगी।


आर्यमणि:- रानी को अपने काबू में रखना और उसकी नजायज मांग पर उसे एक थप्पड़ लगाना एक बुद्धिमान राजा का काम होता है।


आर्यमणि अपनी बात कहते हुए धीमे से पलक को एक थप्पड़ मार दिया। कम तो आर्यमणि भी नहीं था। जब सुकेश भारद्वाज की नजर उनके ओर थी तभी वो थप्पड़ मारा। सुकेश भारद्वाज दोनो को काफी देर से देख भी रहा था, थप्पड़ परते ही वो आर्यमणि के पास पहुंचा…. "ये क्या है, तुम दोनो यहां बैठकर झगड़ा कर रहे।"..


पलक, अपने आंख से 2 बूंद आशु टपकाती…. "काका जिस काम से 10 लोगों का भला हो वो काम के लिए प्रेरित करना क्या नाजायज काम है।"..


सुकेश:- बिल्कुल नहीं, क्यों आर्य पलक के कौन से काम के लिए तुम ना कह रहे हो।


"मौसा वो"… तभी पलक उसके मुंह पर हाथ रखती… "काका इस से कहो कि मेरा काम कर दे। मेरी तो नहीं सुना, कहीं आपकी सुन ले।"..


सुकेश:- शायद मै अपनी एक ख्वाहिश के लिए आर्य से जिद नहीं कर सका, इसलिए तुम्हारे काम के लिए भी नहीं कह पाऊंगा। लेकिन, भूमि को तो यहां भेज ही सकता हूं।


आर्यमणि, अपने मुंह पर से पलक का हाथ हटाकर, अपने दोनो हाथ जोड़ते झुक गया… "किसी को भी मत बुलाओ मौसा जी, मै कर दूंगा चिंता ना करो। और हां आपने अपनी ख्वाहिश ना बता कर मुझे हर्ट किया है। मै कोई गैर नहीं था, आप मुझसे कह सकते थे, वो भी हक से और ऑर्डर देकर। चलो पलक"..


पलक के साथ वो बाहर आ गया। पलक उसके कंधे और हाथ रखती…. "इतना नहीं सोचते जिंदगी में थोड़ा स्पेस देना सीखो, ताकि लोगों को समझ सको। अभी तुम्हारा मूड ठीक नहीं है, किताब के बारे में फिर कभी देखते है।"


आर्यमणि:- लोग अगर धैर्य के साथ काम लेते, तब वो पुस्तक कब का खुल चुकी होती। मेरी रानी, 7 दिन के अनुष्ठान के लिए तैयारी भी करनी होती है। 2 महीने बाद गुरु पूर्णिमा है। क्या समझी..


पलक:- लेकिन आर्य, उस दिन तो राजदीप दादा और नम्रता दीदी की शादी है...


आर्यमणि:- हां लेकिन वह शुभ दिन है। पुस्तक खोलने के लिए देर रात का एक शानदार मुहरत मे पुस्तक खोलने की कोशिश करूंगा।


पलक:- 7 दिन बाद भी तो पूर्णिमा है..


आर्यमणि:- रानी को फिर भी 2 महीने इंतजार करना होगा। चलो अन्दर चलते है और हां एक बात और..


पलक:- क्या आर्य...


आर्यमणि:- लव यू माय क्वीन...


पलक:- लव यू टू माय किंग...


आर्यमणि, पलक के होंठ का एक छोटा सा स्पर्श लेते… "चलो चला जाए।


आर्यमणि रात के इस पार्टी के बाद सीधा ट्विंस के जंगल में पहुंचा, जहां चारों उनका इंतजार कर रहे थे। आर्यमणि चारो को सब से खुशखबरी देते हुए बताया.… "2 महीने तक कोई प्रहरी उन्हे परेशान नहीं करने वाला। वो इस वक्त नहीं चाहेंगे कि आर्यमणि अपने पैक के सोक मे रहे, इसलिए यहां तुम सब प्रहरी से मेहफूज हो।"


फिर बात आगे बढ़ाते हुए आर्यमणि उन्हे चेतावनी देने लगा... "प्रहरी कुछ नहीं करेंगे इसका ये मतलब नहीं कि हम सुस्त पड़ जाएं। मानता हूं, तुम सब ने बहुत कुछ झेला है। लेकिन मेरे लिए बस 2 महीने और कष्ट कर लो। अगले 2 महीने तक शरीर को बीमार कर देने वाली ट्रेनिंग, खून जला देने वाली ट्रेनिंग। बिना रुके और बेहोशी में भी केवल ट्रेनिंग। एक बात और, एक शिकारी भी आयेगी तुम सब को प्रशिक्षित करने, कोई काट मत लेना उसे। रूही, मै रहूं की ना रहूं, तुम्हे सब पर नजर बनाए रखनी है"…


रूही:- बॉस 3 टीन वूल्फ की जिम्मेदारी.…. इतने हॉट फिगर वाली लड़की को इतने बड़े बच्चों की मां बना दिये।


आर्यमणि उसे घूरते हुए वहां से निकल गया। आर्यमणि ने अब तो जैसे यहां से दूर जाने की ठान ली हो। मुंबई प्रहरी समूह का नया चेहरा स्वामी भी गुप्त रूप से जांच करने नागपुर पहुंच चुका था। दरअसल वो यहां कुछ पता करने नहीं आया था, बल्कि अपने और भूमि के बीच के रिश्ते को नया रूप देने आया था, ताकि आगे की राह आसान हो जाए।


इसी संदर्व मे जब वो भूमि से मिला और आर्यमणि के महत्वकांछी प्रोजेक्ट, "आर्म्स डेवलपमेंट यूनिट" के बारे में सुना, उसने तुरंत प्रहरी की मीटिंग में उसे "प्रहरी समुदाय महत्वकांछी प्रोजेक्ट" का नाम दिया, जिसे एक गैर प्रहरी, आर्यमणि अपनी देख रेख मे चलाता और उसके साथ प्रहरी की उसमे भागीदारी रहती। पैसों कि तो इस समुदाय के पास कोई कमी थी नहीं। आर्यमणि ने जो छोटा प्रारूप के मॉडल को इन सबके सामने पेश किया। उस छोटे प्रारूप को कई गुना ज्यादा बढ़ाकर एक पूरे क्षमता वाले प्रोजेक्ट के रूप में गवर्नमेंट के पास एप्रोवल के लिए भेज दिया गया था।


शायद एप्रोवाल मे वक्त लगता, लेकिन गवर्नमेंट को सेक्योरिटीज अमाउंट दिखाने के लिए आर्यमणि के पास कई बिलियन व्हाइट मनी उसके कंपनी अकाउंट में जमा हो चुके थे। देवगिरी भाऊ अलग से अपनी कुल संपत्ति का 40% हिस्सा आर्यमणि को देने का एनाउंस कर चुके थे।


हालांकि इस घोसना के बाद मुंबई की लॉबी में एक बार और फुट पड़ने लगी थी। लेकिन अमृत पाठक सबको धैर्य बनाए रखने और धीरेन पर विश्वास करने की सलाह दिया। उसने सबको केवल इतना ही समझाते हुए अपना पक्ष रखा.… "स्वामी, प्रहरी के मुख्यालय, नागपुर में है। इतना घन कुछ भी नहीं यदि वो प्रहरी भारद्वाज को पूरे समुदाय से साफ कर दे। एक बार वो लोग चले गये फिर हम सोच भी नहीं सकते उस से कहीं ज्यादा पैसा हमारे पास होगा"…


मूर्ख लोग छोटी साजिशों से बस भूमि की मुश्किलें बढ़ाने से ज्यादा कुछ नहीं कर रहे थे। लेकिन इन सब को दरकिनार कर भूमि और आर्यमणि दोनो जितना वक्त मिलता उतने मे एक दूसरे के करीब रहते। आर्यमणि भूमि के पेट की चूमकर, मुस्कुराते हुए अक्सर कहता... "हीरो तेरे जन्म के वक्त मै नहीं रहूंगा लेकिन तू जब आये तो मेरी भूमि दीदी को फिर मेरी याद ना आये"…


भूमि लेटी हुई बस आर्यमणि की प्यारी बातों को सुन रही होती और उसके सर पर हाथ फेर रही होती। कई बार आर्यमणि कई तरह की कथाएं कहता, जिसे भूमि भी बड़े इत्मीनान से सुना करती थी। कब दोनो को सुकून भरी नींद आ जाती, पता ही नहीं चलता था।


आर्यमणि कॉलेज जाना छोड़ चुका था और सुबह से लेकर कॉलेज के वक्त तक अपने पैक के साथ होता। उन्हे प्रशिक्षित करता। अलग ही लगाव था, जिसे आर्यमणि उनसे कभी जता तो नहीं पता लेकिन दिल जलता, जब उसे यह ख्याल आता की शिकारी कितनी बेरहमी से एक वूल्फ पैक को आधा खत्म करते और आधा को सरदार खान के किले में भटकने छोड़ देते।


उसे ऐसा मेहसूस होता मानो किसी परिवार को मारकर उसके कुछ लोग को रोज मरने के लिए किसी कसाई की गली छोड़ आये हो। रूही और अलबेली मे आर्यमणि के गुजरे वक्त की कड़वी यादें दिखने लगती। हां लेकिन उन कड़वी यादों पर मरहम लगाने के लिए चित्रा, निशांत और माधव थे। उनके बीच पलक भी होती थी और कुछ तो लगाव आर्यमणि का पलक के साथ भी था।
Pure update ko Padhne ke baad Jb maine like ki button ko press kiya tb ek dam se meri tandra bhang Hui ki ye kya update khatm bhi ho gya or mujhe pta bhi nhi chla, Mai aapke sabdo ke jaal me aisa fasa ki uski lay me bah gya or nikla tb jb sab khatm ho gya tha...


Bhumi Di ke little champ Jo abhi tk bahar nhi aaya hai usko Abhimanyu ki tarah arya kahani suna kr samjhane me lga hai... Bhumi Di bhi dhyan se sab sun rhi, Chalo Accha hai little champ ko sadbhavna ka padh pdha rhe hai...

Palak ko apne jhase me le liya or uske jariye sukesh bharadwaj ko 2 mahino ke liye sant krva diya...

Training jor shor se chal rhi hai, ruhi ne Ada se kaha tha ki 3 Teen Wolf ki MA bna di, hasi kafi aayi or maza bhi aaya...

Chitra Nishant or madhav bhi arya ke sath uska thoda Bahut gam bhula rhe, ab dekhna ye hai ki ye sab nikalte kb hai in jaalshajo ke bich se...

Bs ek sawal kya surpmarich abhi parallel world me hai ya yhi kahi...

Superb update bhai sandar jabarjast amazing
 

Xabhi

"Injoy Everything In Limits"
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Sabse pehle to namastey ...... apka post padha aur apke dil ka haal samjhta hu kuch character ke saath attachment ho hi jata hai ....jesa apko nishcal aur jivisha se hai ..... wesa hi mera Apsyu aur Avni aka amy se hai..... to apke post ka me reply jarur dunga... aur haa jab ishq risk part 2 me ye jivisha aur apsyu wala update aya tha to me bhi us time padh raha tha aur thoda bura mujhe bhi laga tha lekin bhai ....agar apne bhavnr padhi hai aur aap ek acche reader ho to apko uska character smjh aa jata kis tarha nainu bhaiya usko dikha rahe the aur wo jo scene hai aap usko apsyu ki najar se dekhte to aap jis jalan me jal rahe ho ...wesa kuch nhi hota ..... aur ye baat sirf ek character ke liye nhi real life me bhi insaan par lagu hoti hai .... insaan ka dil me koi khot nhi ho man saaf ho aur wo adhyatm se juda ho to fir apke samne bhi koi si bhi ladki kitni hi sundar bina kapdo ke aa jaye aapke liye wo sirf had maans ki body hi rahegi jab tak apke man me koi galat khayal nhi aate uske prati....aur rahi apsyu ne nischal se uski power le li thi kyu ki usne bekasoor logo ki hatya ki thi to usko dikhane ka ek hi matlab tha ki aap bhale hi ache ho ya bure bekasoor logo ko maaroge to saja to milegi ache ho to kuch aziz chiz apse chiin li jayegi aur bure ho to apki jaan ya fir jese apke karma ho .....aur me bhi karmo par bhot believe karta hu......... aur rahi baat lust dikhane ki story me to jab aap ek negative logo ko dikhana negative shade laana ho to ye sab dikhana padta hai aur jo ki hota bhi hai real life me ....aap khud bhi samjhdar ho aur news pr bhi dekhne ko kitne kisse milte hai agar yaad ho to Bihar ka muzaffarpur shelter home case kitne hi ameer log govt ke officers aur MLA bhi fase the.........aur sabse best to aap mahabharat me dekh lo jab paandav haar gaye the to Kaurvo ne bhi draupadi ka cheerharan ki kosis kari thi aur agar mythology aap padho to apko pata chalega ki pandav log bhi nark gaye the sirf Yudhistar ji ko chodh kr ...........aur nischal ko kisi aur ke saath intimate relationship dikhana to bhai simple hai kisi ki bhi memory agar chali jaaye to aap usse ye kese expect kar sakte ho ki wo memory jaane ke pehle jesa tha wesa hi memory jane ke bad ho..... esa case dekhne ko nhi milte normal life me to me example nhi de sakta tha lekin aap khud hi sochiye....khair me apko jese smjha sakta tha kosis kari bura laga ho to maaf karna aur ek baat aur story hai to usko wese hi padho .... mazak ke liye ye sab chal jata hai lekin ek hi ciz ko man me rakh kr baar baar usi ko laa ke saamne wale ko bolna ( nainu bhaiya ko) wo acha nhi hai .....
Lagta hai is jagah pr Naina ji ko hona chahiye tha aapka reply dene ke liye...

Vo jis andaj me bol rha Nainu bhaya ke sath apne sanju bhaya or death king bhaya bhi samajh gye...

Sayad aap bhi samajh gye Tabhi aisa reply kiya jo ki sandar hai...

Vo kya hai na yha ham Sabhi masti khor hai, is mauke pr Yadi kisi ke pass meam Ho to dalne ka idhar ---- why are you so serious... Vala...
 
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Kaise na aate Sanju Bhai,nainu bhai ke fen hai hum

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आर्य का भूमि के गर्भ में पल रहे बच्चे से बातें करना मुझे भी बहुत भावुक कर दिया ।‌‌ भाई बहन का एक ऐसा पवित्र रिश्ता लगा जो लोग भुलते जा रहे हैं ।
बहुत बढ़िया रिव्यू दिया आपने भाई ।
 

The king

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भाग:–45





आर्यमणि को लौटे २ दिन हो गये थे किंतु भूमि का शोक और क्रोध कम होने का नाम ही नही ले रहा था। पहले दिन आर्यमणि ने यथा संभव समझाने की कोशिश तो किया था, लेकिन शायद भूमि कुछ सुनने को तैयार नही थी। २ दिन बाद आर्यमणि से रहा नही गया। उसके मानसिक परिस्थिति का सीधा असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी होता। कितनी ही मिन्नतें किया तब भूमि साथ आने को तैयार हुई। लेकिन इस बार आर्यमणि अकेले कोशिश नही करना चाहता था, इसलिए साथ में निशांत को ले लिया।


तीनों ही एक मंदिर में बैठे। भूमि कुछ देर तक शांत होकर मां दुर्गा की प्रतिमा को देखती रही, फिर अचानक ही उसके आंखों से आंसू निकल आये.… "रिचा और पैट्रिक ने क्या नही किया मेरे लिये और मैं यहां एक असहाय की तरह बैठी उसके मरने की खबर पर आंसू बहा रही"…


आर्यमणि, भूमि के आंखों से आंसू साफ करने लगा। इधर निशांत अपने शब्द तीर छोड़ते.… "रिचा भी तो कोई साफ प्रहरी नही थी। अपने ब्वॉयफ्रेंड मानस के साथ मिलकर वह भी तो साजिश ही कर रही थी दीदी"…


भूमि, लगभग चिल्लाती हुई... "जिसके बारे में पता नही हो, उसपर ऐसे तंज़ नही करते समझे।"…


आर्यमणि:– ऐसा क्या हो गया दीदी... निशांत पर क्यों भड़क रही हो...


भूमि खींचकर एक थप्पड़ मारती.… "तू बस अपने ही धुन में रह। सरदार खान को जाकर बस चुनौती दे, और मैं तेरे किये को अपना बताकर आज ये दिन देख रही। उन सबको यही लगता है कि तेरे पीछे से मैं ही सब कुछ करवा रही।


आर्यमणि:– आप किसके पीछे है? मेरे कुछ करने का असर आपकी टीम पर कैसे,... कभी कुछ बताया है आपने?


भूमि:– मुझे कुछ नहीं बताना केवल रीछ स्त्री चाहिये। सबको मारने के बाद कहां गयि वो?


निशांत:– यहीं नागपुर में आयि है।


भूमि आश्चर्य से.… "क्या?"


निशांत:– हां बिलकुल... रीछ स्त्री के नाम पर सरदार खान ने ही तो सबकी बलि ले ली थी। वहां जो भी बवंडर और जादुई खेला था, वह तो बस कंप्यूटराइज्ड था। जादुई हमला मंत्र से होता है। आपको आश्चर्य नही हुआ कि हवा के बवंडर से भाले और तीर निकल रहे थे....


भूमि अपना सर झुका कर निशांत की बातों पर सोच रही थी। ऊपर आर्यमणि अपनी आंखें बड़ी किये सवालिया नजरों से घूरने लगा, मानो कह रहा हो... "ये क्या गंध मचा रहा है।"…. निशांत भी उसे शांत रहने और आगे साथ देने का इशारा कर दिया। कुछ देर तक भूमि सोचती रही...


भूमि:– तुम्हारी बातों का क्या आधार है? क्या तुमने वहां सरदार खान को देखा था?


आर्यमणि:– तेनु वहां का मुखिया बना था। उसे पता है कि सरदार खान वहां था।


भूमि:– तुम दोनो को पक्का यकीन है...


दोनो एक साथ... "हां"..


भूमि, ने 2–3 कॉल किये। थोड़ा जोड़ देकर पूछी और बात सच निकली। सरदार खान को सतपुरा के जंगल में देखा गया था। भूमि गहरी श्वास लेती... "रिचा मेरी बुराई करती थी। वह हमारे परिवार के खिलाफ बोलती थी।हर जगह मुझे और भारद्वाज खानदान को कदमों में लाने की साजिश करती हुई पायि जाती थी। इसलिए वह दूसरे खेमे की चहीती हो गयि और वहां की सभी सूचना मुझ तक मिल जाती। पहले तो हम दोनो को मामला सीधा लगा, जिसमे पैसे और पावर के कारण करप्शन दिखता है। लेकिन यहां उस से भी बड़ी कुछ और बात थी।"..


आर्यमणि:– कौन सी बात दीदी...


भूमि:– मुझे बस अंदेशा है अभी। सरदार खान का नाम आ गया, मतलब इन सबके पीछे भी वही है...


आर्यमणि:– पहेलियां क्यों बुझा रही हो दीदी, पूरी बात बताओ?


भूमि:– जल्द ही बताऊंगी, तब तक अपनी जिंदगी एंजॉय कर.… वैसे भी तुझसे इस बारे में बात करती ही भले सतपुरा वाला कांड होता की नही होता।


आर्यमणि:– अधूरी बातें हां..


भूमि:– थप्पड़ खायेगा फिर से...


निशांत:– लगता है मैं यहां पर हूं इसलिए नही बता रही..


भूमि:– बेटा तुम दोनो को मैं डिलीवरी के वक्त से जानती हूं। तेरे रायते भी यहां कुछ कम नहीं है निशांत। बस एक ही बात कहूंगी अपनी जिंदगी जी, और प्रहरी से पूरा दूरी बना ले। वक्त अब बिल्कुल सही नही, आपसी मौत का खेल शुरू हो गया है। अब रीछ स्त्री के नाम से सबकी बलि ली जायेगी, जैसे रिचा और पैट्रिक के साथ हुआ। आर्य बेटा प्लीज मेरी बात मान ले। देख तुझे मैं जल्द ही पूरी बात बता दूंगी... तू मेरा प्यारा भाई है कि नही..


आर्यमणि:– ठीक है दीदी, जैसा आप कहो... आज से मैं प्रहरी से दूर ही रहूंगा...


निशांत:– दीदी आप चिंता मत करो। आज से इसे मैं अपने साथ रखूंगा..


भूमि:– हां ये ज्यादा सही है...


आर्यमणि:– क्या सही है। सबकी जान खतरे में है और शांत रहने कह रहे...


भूमि:– मैं तो पहले ही १० सालों के लिए प्रहरी से बाहर हो गयि। यदि उन्हें मुझे मारना होता तो मेरी टीम के साथ मुझे भी ले जाते। उन्हे मुझसे कोई खतरा नही। तू भी किनारे हो जा, तुम्हे भी कोई खतरा नही.. आसान है..


आर्यमणि:– जैसा आप ठीक समझो... चलो चलते हैं यहां से...


कुछ वक्त बिता। धीरे–धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा। आर्यमणि की जिंदगी कॉलेज, दोस्त और पलक के संग प्यार से बीत रहा था। ख्यालों में भी कुछ ऐसा नहीं चल रहा था, जो प्रहरी के संग किसी तरह के तालमेल को दर्शाते हो। सबकुल जैसे पहले की तरह हो चुका था। कॉलेज के वक्त को छोड़ दिया जाय तो, निशांत के साथ 5–6 घंटे गुजर ही जाते थे। बचा समय पलक और परिवार का।


निशांत की ट्रेनिंग भी शुरू हो चुकी थी। चर्चाओं के दौरान वह अपनी ट्रेनिंग की बातें साझा किया करता था। संन्यासी शिवम, निशांत से टेलीपैथी के माध्यम से बात किया करता था। दोनो रात के २ घंटे और सुबह के २ घंटे योग और मंत्र अभ्यास करते थे। वहीं बातों के दौरान, संन्यासी शिवम द्वारा आर्यमणि को दी गयि किताब के बारे में निशांत ने पूछ लिया। किताब के विषय में चर्चा करते हुए आर्यमणि काफी खुश नजर आ रहा था। यहां तक कि उसने यह भी स्वीकार किया कि उस पुस्तक का जबसे वह अनुसरण किया है, फिर प्रहरी एक साइड लाइन स्टोरी हो गयि और वह किताब मुख्य धारा में चली आयि।


अब इतना रायता फैलाने के बाद कोई पुस्तक के कारण शांत बैठ जाए, फिर तो उस पुस्तक के बारे में जानने की जिज्ञासा बढ़ जाती है। निशांत ने भी जिज्ञासावश पूछ लिया और फिर तो उसके बाद जैसे आर्यमणि किसी ख्यालों की गहराई में खो गया हो...


"वह किताब नही है निशांत, जीवन जीने का तरीका है। हमारे पुरातन सभ्यता की सबसे बड़ी पूंजी। हमारे दुनिया में होने का अर्थ। बाजार में बहुत से योग और अध्यात्म की पुस्तक मिलती है लेकिन एक भी पुस्तक संन्यासी शिवम की दी हुई पुस्तक के समतुल्य नही।"


आर्यमणि की भावना सुनकर निशांत हंसते हुये कह भी दिया.… "मुझे संन्यासियों ने मंत्र शक्ति दिखाकर अपने ओर खींच लिया और तुझे उस पुस्तक के जरिए"… निशांत की बात सुनकर आर्यमणि हंसने लगा। रोज की तरह ही दोनो दोस्त बात करते हुये रूही और अलबेली से मिलने ट्रेनिंग पॉइंट तक जा रहे थे। आज दोनो को पहुंचने में शायद देर हो चुकी थी। वहां चित्रा, अलबेली के साथ बैठी थी और दोनो आपसी बातचीत के मध्य में थे... "अपने पैक के मुखिया को गर्व महसूस करवाना तो हमारा एकमात्र लक्ष्य होता है। उसमे भी जब एक अल्फा आर्य भईया जैसा हो। जिस दिन हम सतपुरा से यहां पहुंचे थे, उसी दिन हमे बस्ती से निकाल दिया गया था।".... अलबेली, चित्रा के किसी सवाल का जवाब दे रही थी शायद।


आर्यमणि:- क्या कही..


अलबेली:- हम परेशान नहीं करना चाहते थे आपको।


आर्यमणि:- मै जानता था ऐसा कुछ होने वाला है। चिंता मत करो तुम्हे तुम्हारे घर ले जाने आया हूं, लेकिन वादा करो वहां तुम कुछ गड़बड़ नहीं करोगी, वरना हम सबके लिये मुश्किलें में बढ़ जाएगी। रूही कहां है..


अलबेली:– अपनी टेंपररी ब्वॉयफ्रेंड के साथ घूमने... हिहिहिहि...


चित्रा:– अब मुझे ही चिढ़ाने लगी...


अलबेली, अपने दोनो कान पकड़कर, मासूम सा चेहरा बनाती... "सॉरी दीदी"..


निशांत:– तुम दोनो कब आयि चित्रा..


चित्रा:– आज सोची की हम चारो मिलकर कहीं धमाल करते है। इसलिए तुम दोनो को लेने यहीं चली आयि।


आर्यमणि:– ठीक है फिर जैसा तुम कहो। मैं जरा रूही और अलबेली के घर की समस्या का समाधान कर दूं, फिर वहीं से निकल चलेंगे.…


सहमति होते ही आर्यमणि ने एक धीमा संकेत दिया जिसे सुनकर रूही, माधव के साथ वापस आयी। …. "चित्रा, माधव को बहुत डारा कर रखी हो यार, एक किस्स कही देने तो लड़का 2 फिट दूर खड़ा हो गया।"….


चित्रा, माधव को आंख दिखती….. "क्या है, कहीं खुद को उसका सच का बॉयफ्रेंड तो नहीं समझ रहे थे माधव। दाल में जरूर कुछ काला है इसलिए रूही कह रही है। जरूर तुमने किस्स करने की कोशिश की होगी।


माधव:- इ तो हद हो गई। रूही ने सब साफ़ साफ़ कह दिया फिर भी तुम हमसे ही मज़े लेने पर तुल जाओ चित्रा। बेकार मे इतना सुनने से तो अच्छा था एक झन्नाटेदार चुम्मा ले ही लेते।


"तुमलोग एक मिनट जरा शांत रहो।"… कहते हुए आर्य ने कॉल उठाया… "हां दीदी"….. उधर से जो भी बात हुई हो… "ठीक है दीदी, आता हूं मै।"..


"चलो वापस। तुम दोनो (रूही और अलबेली) भी आओ मेरे साथ।"… सभी कार से निकल गये। रास्ते में आर्यमणि ने रूही और अलबेली को एक फ्लैट में ड्रॉप करते हुए कहने लगा… "फिलहाल तुम दोनो यहां एडजस्ट करो। कोई स्थाई पता ढूंढ़ता हूं। जरूरत का लगभग समान है। रूही, अलबेली का ख्याल रखना। अभी अनुभव कम है और यहां आसपास लोगो को कटने या चोट लगने से खून निकलते रहता है।"..


रूही:- अलबेली के साथ-साथ मुझे भी कंट्रोल करना होगा। फिलहाल तो हम लेथारिया वुलपिना से काम चला लेंगे।


आर्यमणि:- यहां शिकारियों का पूरा जाल बसता है रूही। एक छोटी सी गलती पूरे पैक को मुसीबत में डाल देगी, बस ये ख्याल रखना।


अलबेली:- भईया हमे ट्विन वोल्फ वाले जंगल का इलाका दे दो। वहीं कॉटेज बनाकर रह लेंगे।


आर्यमणि:- हम्मम ! मै देखता हूं क्या कर सकता हूं, फिलहाल यहां एडजस्ट करो। और ये कुछ पैसे रखो, काम आयेंगे।


आर्यमणि उन्हें समझाकर 20 हजार रूपए दिया और वहां से निकल गया। निशांत, माधव और चित्रा को लेकर अपनी मासी के घर चला आया। घर के अंदर कदम रखते ही, माणिक और मुक्ता से परिचय करवाते हुए सभी कहने लगे… "यही है आर्य।" माहोल थोड़ा तड़कता भड़कता था और यहां सरप्राइज इंजेगमेंट देखने को मिल रहा था। माणिक का रिश्ता पलक की बड़ी बहन नम्रता से और मुक्ता का रिश्ता पलक के बड़े भाई राजदीप से होने का रहा था।


आर्यमणि सबको नमस्ते करते हुए अपने साथ आये माधव का परिचय भी सबसे करवाने लगा। आर्यमणि पीछे जाकर आराम से बैठ गया। थोड़ी ही देर बाद नम्रता और राजदीप, अपने-अपने जीवन साथी को अंगूठी पहना रहे थे और 2 महीने बाद नाशिक से इन दोनो की शादी।


पूरे रिश्तेदारों का जमावड़ा था। वो लोग भी २ घंटे बाद शुरू होने वाले पार्टी का इंतजार कर रहे थे। आर्यमणि लगभग भिड़ से दूर था और अकेले बैठकर कुछ सोच रहा था।… "क्या बात है आर्यमणि, तेरे और पलक के बीच में कोई झगड़ा हुआ है क्या, तू तो इसे देख भी नहीं रहा।"… भूमि सबके बीच से आवाज़ लगाती हुई कहने लगी।


नम्रता:- मेरा लगन मेरे पूरे खानदान ने बैठकर तय किया है। मुश्किल से मै घंटा भर भी नहीं मिली होऊंगी, लेकिन जितना उसे जाना है, अब तो घरवाले ये लगन कैंसल भी कर दे तो भी मै आर्य से ही लगन करूंगी।..


प्रहरी मीटिंग में पलक द्वारा कही गई बात जो नम्रता ने तंज कसते कहा। जैसे ही नम्रता का डायलॉग खत्म हुआ पूरे घरवाले जोड़ से हंसने लगे। पलक सबसे नजरे चुराती अपनी मां अक्षरा के पास बैठ गई। अक्षरा उसके सर पर हाथ फेरती… "राजदीप फिर उस लड़के का क्या हुआ जिससे ये मिलने उस दिन सुबह निकली थी।"..


जया:- इन दोनों के बीच में कोई लड़का भी है?


मीनाक्षी:- लव ट्राइंगल।


वैदेही:- ट्राइंगल नहीं है लव स्क्वेयर है। एक शनिवार कि सुबह तो आर्य भी किसी के साथ डेट पर निकला था।


पलक:- हां समझ गयि की आप लोगो को भूमि दीदी या राजदीप दादा ने सब कुछ बता दिया है।


अक्षरा:- मतलब तुम्हारी अरेंज मैरेज नहीं हुई?


पलक:- कंप्लीट अरेंज मैरिज है। कुछ महीने पहले मुझे दादा (राजदीप) ने कहा था दोनो परिवार के रिश्ते मजबूत करने के लिए आर्य को मै इस घर का जमाई बनाऊंगा। जिस लड़के से लगन होना है, उसी से मिल रही थी। पहले तो यही कहते ना एक दूसरे से मिलकर एक दूसरे को जान लो, सो हमने जान लिया।


नम्रता:- बहुत स्यानी है ये दादा।


जया:- स्यानि नहीं समझदार है। जब पता है कि दोनो ओर से एक ही कोशिश हो रही है, तो किसी और से मिलने नहीं गयि, किसी और को देखने नहीं गयि, बल्कि उसी को जानने गयि, जिसके साथ लोग उसका लगन करवाना चाह रहे थे।


अक्षरा:- काही ही असो, दोन्ही कुटुंब एकत्र आले (जो भी हो दोनो परिवार को एक साथ ले आयी)


जहां लोग होंगे वहां महफिल भी होगी। लेकिन इस महफिल में 2 लोग बिल्कुल ही ख़ामोश थे। एक थी भूमि और दूसरा आर्यमणि। शायद दोनो के दिमाग में इस वक़्त कुछ बात चल रही थी और दोनो एक दूसरे से बात करना भी चाह रहे थे, लेकिन भिड़ की वजह से मौका नहीं मिल रहा था।


तभी भूमि कहने लगी… "आप लोग बातें करो मै डॉक्टर के पास से होकर आती हूं। चल आर्य।"..


जया:- वो क्या करेगा जाकर, मै चलती हूं।


भूमि:- माझी भोळी मासी, बस रूटीन चेकअप है। आप अपनी बहू के साथ बैठो, और दोनो बहने बस बहू की होकर रह जाना।


मीनाक्षी:- जा डॉक्टर को दिखा कर आ, अपना खून मत जला। वैसे भी हीमोग्लोबिन कम है तेरा।


भूमि:- हाव, फिक्र मत करो आपका ब्लड ग्रुप मैच नहीं करता मुझसे। अच्छा मै छाया (पर्सनल असिस्टेंट) से मिलती हुई आऊंगी, इसलिए थोड़ी देर हो जायेगी।


भूमि अपनी बात कहकर निकल गई। दोनो कार में बैठकर चलने लगे। घर से थोड़ी दूर जैसे ही कार आगे बढ़ी….. "मुसीबत आती नहीं है उसे हम खुद निमंत्रण देते है।"


आर्यमणि:- पलक की सारी गलती मेरी है और मै उसे ठीक करके दूंगा। (सतपुरा जंगल कांड जहां पलक, भूमि की पूरी टीम को लेकर गयि थी)


भूमि:- हाहाहाहा… हां मुझे तुमसे यही उम्मीद है आर्य। वैसे पलक की ग़लती तो तू नहीं ही सुधरेगा, हां लेकिन अपने लक्ष्य के ओर जरूर बढ़ेगा.…


आर्यमणि:- कैसे समझ लेती हो मेरे बारे मे इतना कुछ..


भूमि:- क्योंकि जब तू इस दुनिया मे पहली बार आया था, तब तुझे वहां घेरे बहुत से लोग खड़े थे। लेकिन पहली बार अपने नन्ही सी उंगलियों से तूने मेरी उंगली थामी थी। बच्चा है तू मेरा, और इसी मोह ने कभी ख्याल ही नहीं आने दिया कि मेरा अपना कोई बच्चा नहीं। तुझे ना समझूं...


आर्यमणि:- हम्मम !!! जानती हो दीदी जब मै यहां आने के बारे सोचता हूं तो खुद मे हंसी आ जाती है। मैं केवल एक सवाल का जवाब लेने आया था। ऐसा फंसा की वो सवाल ही याद नहीं रहता और दुनिया भर पंगे हजार...


भूमि:- हाहाहाहाहा.. छोड़ जाने दे। बस तुझे मैं बता दूं... तू जब अपना मकसद साध चुका होगा, तब मै नागपुर प्रहरी समुदाय को अलग कर लूंगी। इनके साथ रहकर बीच के लोगो का पता करना मुश्किल है, लेकिन अलग होकर बहुत कुछ किया जा सकता है। चल बाकी बहुत कुछ आराम से तुझे सामझा दूंगी, अभी पहले कुछ और काम किया जाए..


आर्यमणि:- लेकिन दीदी आप उनके पीछे हो, जिसने ३० शिकारी को तो यूं साफ कर दिया। आप प्लीज उनके पीछे मत जाओ... मुझे बहुत चिंता हो रही है।


भूमि:– मैं अकेली कहां हूं। हमे जान लेना भी आता है और खुद की जान बचाना भी। तुझे पता हो की न हो लेकिन हम जिनका पता लगा रहे वो कोई आम इंसान नही। वो कोई वेयरवोल्फ भी नहीं लेकिन जो सरदार खान जैसे बीस्ट को पालते हो, उसे मामूली इंसान समझने की भूल नही कर सकती। इसलिए पूरे सुरक्षित रहकर खेल खेलते हैं। वैसे तेरे आने का मुझे बहुत फायदा हुआ है, सबका ध्यान बस तेरी ओर है।


आर्यमणि:– २ तरह की बात आप खुद ही बोलती हो। उस दिन की मंदिर वाली बात और आज की बात में कोई मेल ही नही है।


भूमि:– उस दिन गुस्से में थी। मुझे अपने २ सागिर्द के जाने का अफसोस हो रहा था। गुस्से में निकल गया।
Nice update bhai
 

Xabhi

"Injoy Everything In Limits"
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आर्य का भूमि के गर्भ में पल रहे बच्चे से बातें करना मुझे भी बहुत भावुक कर दिया ।‌‌ भाई बहन का एक ऐसा पवित्र रिश्ता लगा जो लोग भुलते जा रहे हैं ।
बहुत बढ़िया रिव्यू दिया आपने भाई ।
:approve:
 

The king

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भाग:–46






भूमि:– उस दिन गुस्से में थी। मुझे अपने २ सागिर्द के जाने का अफसोस हो रहा था। गुस्से में निकल गया।


आर्यमणि:– ना ना, अभी क्यों नही कहती उन सबके मौत का जिम्मेदार मैं ही हूं... लेकिन सतपुरा के जंगल में मेरी जान चली जाती उसकी कोई फिक्र नहीं...


भूमि:– मुझे सतपुरा मात्र एक यात्रा लगी। रीछ स्त्री किसी को इतनी आसानी से कैसे मिलेगी.. वो भी पता किसने लगाया था तो शुकेश भारद्वाज ने... मुझे उसपर रत्ती भर भी यकीन नही था।


आर्यमणि, आश्चर्य से... "क्या आपको मौसा जी पर यकीन नही"…


भूमि:– जैसे तुझे बड़ा यकीन था... अपना ये झूठा एक्सप्रेशन किसी और को दिखाना।


आर्यमणि:– अच्छा ऐसी बात है तो एक बात का जवाब दो, जब पलक ने टीम अनाउंस किया और आप भी जाने को इच्छुक थी, तब तो मुझे कुछ और बात ही लग रही थी..


भूमि:– क्या लगा तुझे?


आर्यमणि:– यही की आपकी पूरी टीम को जान बूझकर ले जा रहे हैं। उन्हे मारने की साजिश खुद आपके पिताजी बना रहे...


भूमि:– हां तुमने बिलकुल सही अंदाजा लगाया था।


आर्यमणि:– इसका मतलब आप भी शहिद होना चाहती थी।


भूमि:– जिस वक्त मंदिर में तुम दोनो ने मुझे शांत किया ठीक उसी वक्त मैं सारी बातों को कनेक्ट कर चुकी थी। एक पुरानी पापी नाम है "नित्या".. उसी का किया है सब कुछ। तुम्हारे दादा वर्धराज को उस वक्त बहुत वाह–वाही मिली थी, जब उन्होंने नित्या को बेनकाब किया था। एक पूर्व की प्रहरी, जो खुद विचित्र प्रकार की सुपरनैचुरल थी। नित्या जिसके बारे में पता करना था की वो किस प्रकार की सुपरनेचुरल है, वह प्रहरी के अड्डे से भाग गयि। उसे वेयरवोल्फ घोषित कर दिया गया और सबसे हास्यप्रद तो आगे आने वाला था। उसे भगाने का इल्ज़ाम भी तुम्हारे दादा जी पर लगा था।


आर्यमणि:– एक वुल्फ को भगाना क्या इतनी बड़ी बात होती है...


भूमि:– प्रायः मौकों पर तो कभी नही लेकिन जब कोई तथाकथित वेयरवोल्फ नित्या, किसी प्रहरी के अड्डे से एक पूरी टीम को खत्म करके निकली हो, तब बहुत बड़ी बात होती है।


आर्यमणि:– अतीत की इतनी बातें मुझसे छिपाई गई..


भूमि:– 8 साल की उम्र से जो लड़का जंगल में रहे और घर के अभिभावक की एक न सुने, उसके मुंह से ये सब सुनना सोभा नही देता मेरे लाल... तुझे दुनिया एक्सप्लोर करना है, लेकिन परिवार को नही जानना। तुम्हे स्वार्थी कह दूं गलत होगा क्या, जिसे अपनी मां का इतिहास पता नही। जया कुलकर्णी जब प्रहरी में शिकारी हुआ करती थी तब क्या बला थी और कैसे एक द्वंद में उसने सामने से सरदार खान और उसके गुर्गों को अपनी जूती पर ले आयि थी।


आर्यमणि, छोटा सा मुंह बनाते.… "शौली (solly), माफ कर दो...


भूमि:– तेरा अभिनय मैं खूब जानती हूं। अभी भी दिमाग बस उसी सवाल पर अटका है, कि क्यों मैं सतपुरा के जंगल साथ जाना चाहती थी? ऊपर से बस ऐसे भोली सूरत बना रहे...


आर्यमणि:– गिल्ट फील मत करवाओ... मैं जानता हूं कि तुम भड़ास निकालने के लिए मुझे लेकर आयि हो, इसलिए सवाल के जवाब में सीधा इतिहास से शुरू कर दी...


भूमि:– मैं सतपुरा जाना चाहती थी क्योंकि किसी की शक्ति रावण के समतुल्य क्यों न हो, हम उनसे भी अपनी और अपनी टीम की जान बचा सकते हैं। मिल गया तेरा जवाब...


आर्यमणि:– क्या सच में ऐसा है?


भूमि:– यकीन करने के अलावा कोई विकल्प है क्या? यदि फिर भी तुझे इस सत्य को सत्यापित ही करना है तब जया मासी से पूछ लेना...


आर्यमणि:– अच्छा सुनो दीदी मुंह मत फुलाओ, मैं दिल से माफी मांगता हूं। दरअसल जब भी मैं दादा जी के बारे में सुनता हूं, और प्रहरी जिस प्रकार से आज भी उन्हें बेजजत करते हैं, मेरा खून खौल जाता है। इसलिए मैं किसी भी उस अतीत को नही जानना चाहता जिसकी कहानी में कहीं न कहीं वही जिक्र हो... "कैसे वर्धराज कुलकर्णी को बेज्जत किया गया।


भूमि:– शायद प्रेगनेंसी की वजह से मूड स्विंग ज्यादा हो रहा। जया मासी ने तेरे २१वे जन्मदिवस पर सब कुछ बताने के फैसला किया था, और मैं तुझे उस वक्त के लिए कोस रही थी, जब हम तुम्हे बताते भी नही...


आर्यमणि:– छोड़ो जाने दो... आप कुछ अतीत की बातें कर रही थी, वो पूरी करो..


भूमि:– तुम्हारे दादा जी जया मासी के पथप्रदर्शक रहे थे। उन्होंने ही जया मासी को एक भस्म बनाना सिखाया था। टारगेट को देखकर वह भस्म बस हवा में उड़ा दो। सामने वाला कुछ देर के लिए भ्रमित हो जाता है।…


आर्यमणि:– अच्छा एक सिद्ध किया हुआ ट्रिक। तुम्हे क्या लगता है, रावण जैसा ब्रह्म ज्ञानी इस भ्रम में फंस सकता है...


भूमि:– तो मैं कौन सा राम हुई जा रही। बस मुंह से निकल गया... दूसरे तो यकीन कर लिये इसपर..


आर्यमणि:– लोग इतने भी मूर्ख होते हैं आज पता चला। भगवान श्री राम इसलिए कहलाए क्योंकि उन्होंने रावण को मारा था। बस इस एक बात से रावण की शक्ति की व्याख्या की जा सकती है।


भूमि:– चल छोड़.. ये बता की इस ट्रिक से मैं नित्या से बच सकती थी या नही...


आर्यमणि:– मैंने उसे नही देखा इसलिए कह नही सकता.. इस ट्रिक से आप अपने दुश्मन को एक बार चौंका जरूर सकती हो, लेकिन इस से जान नही बचेगी। इसलिए कहता हूं दूर रहो प्रहरी से।


भूमि:– केवल एक भस्म ही थोड़े ना है...


आर्यमणि:– और क्या है?


भूमि:– दिमाग..


आर्यमणि:– हां वो भी देख लिया। भस्म से रावण को भरमाने का जो स्त्री दम रखे, उसके दिमाग पर तो मुझे बिल्कुल भी शक करना ही नही चाहिए...


भूमि:– मजाक मत बना... अच्छा तू बता सबसे अच्छी तकनीक क्या है?


आर्यमणि:– बिलकुल खामोश रहे। छिप कर रहे। खुद को कमजोर और डरा हुआ साबित करो। दुश्मनों की पहचान और उसकी पूरी ताकत का पता लगाती रहो। और मैं इतिहास के सबसे बड़े हथियार का वर्णन कर देता हूं। होलिका भी उस आग में जल गयि थी जिसे वह अपने काबू में समझती थी... क्या समझी...


भूमि:– क्या बात है, मेरे साथ रहकर तेरा दिमाग भी बिलकुल शार्प हो गया है।


आर्यमणि:– हां कुछ तो आपकी सोभत का असर है।


दोनो बात करते चले जा रहे थे। भूमि कार को एक छोटे से घर के पास रोकती… "आओ मेरे साथ।"..


भूमि अपने साथ उसे उस घर के अंदर ले आयी। चाभी से उस घर को खोलती अंदर घुसी। आर्यमणि जैसे ही वहां घुसा, आंख मूंदकर अपनी श्वांस अंदर खींचने लगा… भूमि उसे अपने साथ घर के नीचे बने तहखाने में ले आयी। जैसे ही नीचे पहुंचे… एक लड़का और एक लड़की भूमि के ओर दौड़कर आये, दोनो भूमि के गाल मुंह चूमते… "आई बहुत भूख लगी है कुछ खाने को दो ना।"..


भूमि, दोनो को ढेर सारे चिकन मटन देती हुई आर्य को ऊपर ले आयी… "हम्मम ! किस सोच में डूब गये आर्य।"..


आर्यमणि:- 2 टीन वुल्फ..


भूमि:- नहीं, 2 जुड़वा टीन वुल्फ..


आर्यमणि:- जो भी हो, ये आपको आई क्यों पुकार रहे है।


भूमि:- केवल दूध नहीं पिलाया है, बाकी जब ये 2 महीने के थे, तबसे पाल रही हूं। तू रूही और अलबेली को बुला ले यहां।


आर्यमणि ने रूही को सन्देश भेजने के बाद… "दीदी कुछ समझाओगी मुझे।"..


भूमि:- ये सुकेश भारद्वाज यानी के मेरा बाबा के बच्चे है।


कानो में तानपूरा जैसे बजने लगे हो। चारो ओर दिमाग झन्नाने वाली ऐसी ध्वनि जो दिमाग को पागल कर दे। आर्यमणि लड़खड़ाकर पास पड़े कुर्सी पर बैठ गया। आश्चर्य भरी घूरती नज़रों से भूमि को देखते हुए…. "मासी को इस बारे में पता है।"….


भूमि:- "शायद हां, और शायद उन्हे कोई आपत्ती भी नहीं। प्रहरी के बहुत से राज बहुत से लोगो को पता है, लेकिन किसी को भी प्रहरी के सीक्रेट ग्रुप के बारे में नही पता, जिसके मुखिया सुकेश भारद्वाज है। बड़ी सी महफिल में सुकेश, उज्जवल, अक्षरा और मीनाक्षी का नंगा नाच होता है। उसकी महफिल में और कौन–कौन होता है पता न लगा पायि। लेकिन हर महीने एक बड़ी महफिल सरदार खान महल में ही सजती है, और ये सभी बूढ़े तुझे 25–26 वर्ष से ज्यादा के नही दिखेंगे। इंसानों को जिंदा नोचकर खाना, सरदार खान के खून को अपने नब्ज में चढ़ाना इस महफिल का सबसे बड़ा आकर्षण होता है।"

"जिन-जिन को इस राज पता चला वो मारे गये और जिन्हे इनके राज के बारे में भनक लगी उन्हें प्रहरी से निकालकर कहीं दूर भेज दिया गया। सरदार खान को सह कोई और नहीं बल्कि भारद्वाज खानदान दे रहा है। फेहरीन, रूही की मां एक अल्फा हीलर थी। विश्व में अपनी जैसी इकलौती और वो २०० साल पुराने विशाल बरगद के पेड़ तक को हील कर सकती थी। उसके पास बहुत से राज थे। लेकिन मरने से कुछ समय पूर्व इन्हे। मेरे कदमों में फेंक कर इतना ही कही थी… "मै तो मरने ही वाली हूं, तुम चाहो तो अपने सौतेले भाई-बहन को मार सकती हो या बचा सकती हो।"… कुछ और बातें हो पाती उससे पहले ही वहां आहट होने लगी और मै इन दोनों को लेकर चली आयी।"


"तो ये है प्रहरी का घिनौना रूप"…. इससे पहले कि रूही आगे कुछ और बोल पाती, आर्यमणि ने अपना हाथ रूही के ओर किया और वो अपनी जगह रुक गई।…


भूमि:- उसे बोलने दो आर्यमणि। मै यहां के झूट की ज़िंदगी से थक गई हूं। मुझे सुकून दे दो।


आर्यमणि:- हमे यहां लाने का मतलब..


भूमि:- तुम्हारी, रूही और अलबेली की जान खतरे में है। रूही और अलबेली के बाहर होने के कारण ही किले कि इतनी इंफॉर्मेशन बाहर आयी है। उन्हें अब तुम खतरा लगने लगे हो और तुम्हे मारने का फरमान जारी हो चुका है।


आर्यमणि:- किसने किया ये फरमान जारी।


भूमि:- प्रहरी के सिक्रेट बॉडी ने। पलक ने मीटिंग आम कर दी है इसलिए प्रहरी की सिक्रेट बॉडी उन 22 लोगो का सजा तय कर चुकी है, साथ में सरदार खान को मारकर उसकी शक्ति उसका बेटा लेगा, फने खान। ये भी तय हो चुका है ताकि पलक को हीरो दिखाया जा सके। इन सब कांड के बीच तुम लोगो को मारकर एक दूसरे की दुश्मनी दिखा देंगे।


आर्यमणि:- हम्मम ! कितना वक़्त है हमारे पास।


भूमि:- ज्यादा वक़्त नहीं है आर्यमणि। यूं समझ लो 2 महीने है। क्योंकि जिस दिन शादी के लिए हम नाशिक जाएंगे, सारा खेल रचा जायेगा।


आर्यमणि:- आप इन दोनों ट्विन के खाने में लेथारिया वुलपिना देती आ रही हो ना।


भूमि:- नहीं, कभी-कभी देती हूं। इनका इंसान पक्ष काफी स्ट्रॉन्ग है और दोनो के पास अद्भुत कंट्रोल है। बहुत बचाकर इन्हे रखना पड़ता है।


आर्यमणि:- हम्मम ! ठीक है.. कोई नहीं आज से ये मेरी जिम्मेदारी है दीदी। लेकिन एक बात बताओ क्या आप यहां जिंदा हो।


भूमि:- जब तक मर नहीं जाती इनके राज का पता लगाती रहूंगी, वरना मुझे लगभग मरा ही समझो। बात यहां उतनी भी सीधी नहीं है आर्य जितनी दिखती है। तुम्हे एक बात जानकर हैरानी होगी कि प्रहरी में 12 ऐसे लोग है जिन्हें आज तक छींक भी नहीं आयी। यानी कि कभी किसी प्रकार की बीमार नहीं हुई। मुझे तो ऐसा लग रहा है मै किसी जाल में हूं, गुत्थी सुलझने के बदले और उलझ ही जाती है।


तभी वहां धड़ाम से दरवाजा खुला, जया और केशव अंदर पहुंच गए… "भूमि तुमने सब बता दिया इसे।"…


आर्यमणि:- मां मै तो यहां एक सवाल का जवाब ढूंढते हुए पहुंचा था अब तो ऐसा लग रहा है, ज़िन्दगी ही सवाल बन गई है।


केशव:- हाहाहाहा… ये तुम्हारे पैक है, रूही तो दिखने में काफी हॉट है।


जया, केशव को एक हाथ मारती…. "शर्म करो कुछ तो।"… "अरे बाबा माहौल तो थोड़ा हल्का कर लेने दो। बैठ जाओ तुम सब आराम से।"..


जया, आर्यमणि का हाथ थामती हुई…. "तुम्हे पता है तुम्हारी मीनाक्षी मासी ने और उस अक्षरा ने तुम्हारी शादी कब तय कि थी, जब तुमने मैत्री के भाई शूहोत्र लोपचे को मारा था। पलक को बचपन से इसलिए तैयार ही किया गया है। उन सबको लगता है तुम्हारे दादा यानी वर्धराज कुलकर्णी ने तुम्हारे अंदर कुछ अलोकिक शक्ति निहित कर दिया। और यही वजह थी कि तुम इन सब की नजर मे शुरू से हो...


रूही:- कमाल की बात है, मै यहां मौजूद हर किसी के इमोशन को परख सकती हूं, लेकिन पलक कई बार कॉलेज में मेरे पास से गुजरी थी और उसके इमोशंस मै नहीं समझ पायि। बॉस ने मुझे जब ये बताया तब मुझे लगा मजाक है लेकिन वाकई में बॉस की बात सच थी।


जया:- ऐसे बहुत से राज दफन है यहां, जो मै 30 सालो से समझ नहीं पायि।


भूमि:- और मै 20 सालों से।


जया:- तुझे तो तभी समझ जाना चाहिए था जब हमने तुम्हे मीनाक्षी के घर नहीं रहने दिया था। मै, भूमि और केशव तो बहुत खुश थे की तुम बिना कॉन्टैक्ट के गायब हो गये। हमे सुकून था कि कम से कम तुम इस खतरनाक माहौल का हिस्सा नहीं बने। सच तो ये है भूमि ने तुम्हे कभी ढूंढने की कोशिश ही नहीं की वरना भूमि को तुम नहीं मिलते, ऐसा हो सकता है क्या?


केशव:- फिर तुम एक दिन अचानक आ गये। हम मजबूर थे तुम्हे नागपुर भेजने के लिये, इसलिए तुम्हे यहां भेजना पड़ा।


आर्यमणि:- पापा गंगटोक मे मेरे जंगल जाने पर जो कहते थे नागपुर भेज दूंगा। नागपुर भेज दूंगा… उसका क्या...


भूमि:- मौसा और मौसी की मजबूरी थी। यदि मेरी आई–बाबा को भनक लग जाती की हमे इनके पूरे समुदाय पर शक है, तो वो तुम्हे बस जिंदा छोड़ देते और बाकी हम सब मारे जाते। ये सब ताकत के भूखे इंसान है और तुम अपने जंगल के कारनामे के कारण हीरो थे। तुम्हे नहीं लगता कि एक पुलिस ऑफिसर का बार-बार घूम फिर कर उसी जगह ट्रांसफर हो जाना, जहां तुम्हारे मम्मी पापा है, एक सोची समझी नीति होगी। जी हां राकेश नाईक मेरे आई-बाबा के आंख और कान है।


आर्यमणि:- और कितने लोगो को पता है ये बात।


भूमि:- हम तीनो के अलावा कुछ है करीबी जो इस बात की जानकारी रखते है और सीक्रेटली काम करते है।


जया, अपने बेटे के सर पर हाथ फेरती उसके माथे को चूमती…. "जनता है तुझमें सब कुछ बहुत अच्छा है बस एक ही कमी है। तुम एक काम में इतने फोकस हो जाते हो की तुम्हे उस काम के अलावा कुछ दिखता ही नहीं। मै ये नहीं कहती की ये गलत है, लेकिन तुम जिस जगह पर अपने सवाल के जवाब ढूंढ़ने आये वो एक व्यूह हैं। एक ऐसी रचना जहां राज पता करने आओगे तो अपने सवाल भूलकर यहां की चक्की में पीस जाओगे। चल मुझे तू ये मत बता की तू कौन सा सवाल का जवाब ढूंढ़ने आया था। बस ये बता दे कि तुम्हे उन सवाल के जवाब मिले कि नहीं। या ये बता दे कि कितने दिन में मिल जाएंगे


आर्यमणि:- ऐसा कोई तूफान वाले सवाल नही थे। मुझे बस मेरी जिज्ञासा ने खींचा था। मैं तो सवाल के बारे में ही भूल चुका हूं। रोज नई पहेली का पता चलता है और रोज नई कहानी सामने आती है। ऐसा लग रहा है मै पागल हो जाऊंगा।


केशव:- तुम जिस सवाल के जवाब के लिये आये और यहां आकर जो नये सवालों के उलझन में किया है, वैसे इन प्रहरी के इतिहास में पहले कभी नही हुआ। मै बता दू, तुमने कुछ महीने में यहां सबको अपना दुश्मन बना लिया। हां एक काम अच्छा किए जो हमे भूमि के पास पहुंचा दिया। हमे इससे ज्यादा चिंता किसी कि नहीं थी, और तुम्हारी तो बिल्कुल भी नहीं..


जया:- मेरी एक बात मानेगा..


आर्यमणि:- क्या मां?


जया:- यें तेरा पैक है ना..


आर्यमणि:- हां मां..


जया:- अपने पैक को लेकर नई जगह जा, कुछ साल सवालों को भुल जा। क्योंकि जब तू सवालों को भूलेगा तब जिंदगी तुझे उन सवालों के जवाब रोज मर्रा के अनुभव से हिंट करेगी। खुलकर जीना सीखा, जिंदगी को थोड़ा कैजुअली ले। फिर देख काम के साथ जीवन में भी आनंद आएगा।


आर्यमणि:- हम्मम ! शायद आप सही कहती हो मां।


जया:- और एक बात मेरे लाल, तेरे रायते को हम यहां साथ मिलकर संभाल लेंगे, तू हमारी चिंता तो बिल्कुल भी मत करना।


भूमि:- अब कुछ काम की बात। जाने से पहले तुम वो अनंत कीर्ति की पुस्तक अपने साथ लिए जाना। एक बार वो खोल लिए तो समझो यहां के बहुत सारे राज खुल जाएंगे। दूसरा यदि जाने से पहले तुम सरदार खान की शक्तियों को उसके शरीर से अलग करते चले गए तो नागपुर समझो साफ़ हो जाएगा। खैर इस पर तो तुम्हारा खुद भी फोकस है। एक बार सरदार साफ फिर हम यहां अपने कारनामे कर सकते है। तीसरी सबसे जरूरी बात, बीस्ट अल्फा मे सरदार खान सबसे बड़ा बीस्ट है। हो सकता है कि तुम उसे पहले भी मात दे चुके होगे लेकिन इस भूल से मत जाना कि इस बार भी मात दे दोगे। पहली बात उसके अंदर कुछ भी भोंक नही सकते और दूसरी सबसे जरूरी बात, उसके पीछे बहुत बड़ा दिमाग है। बस एक बात ख्याल रहे उसे मारने के चक्कर में तुम मरना मत और यदि कामयाब होते हो तो ये समझ लेना सीक्रेट प्रहरी समुदाय तुम्हारे पीछे पड़ गया, और वो तुम्हे जमीन के किसी भी कोने से ढूंढ निकालेंगे।


जया:- चल अब हंस दे और जिंदगी को जी। अपने पैक के साथ रह। रूही, तुम सब एक पैक हो, ख्याल रखना एक दूसरे का। और कहीं भी ये जाए, इसको बोलना कोई भी काम वक़्त लेकर करे, ऐसा ना हो वहां भी नागपुर जैसा हाल कर दे। 3-4 एक्शन में तो फिल्म का क्लाइमेक्स आ जाता है, और इसने तो कुछ महीने में केवल और केवल एक्शन करके रायता फैला दिया।


रूही:- आप सब जाओ… हम सब निकलने कि तैयारी करते है। आर्यमणि मै इन सबको लेकर ट्विंस के जंगल में मिलूंगी।


आर्यमणि, भूमि के साथ चला। पहले डॉक्टर, फिर छाया और वापस सीधा अपने घर। आर्यमणि को बड़ा आश्चर्य हुआ जब घर आकर उसने भूमि को देखा। अपनी माता पिता से बिल्कुल सामान्य रूप से मिल रही थी। वो साफ समझ पा रहा था कि क्या छलावा है और क्या हकीकत।


आर्यमणि अपने माता-पिता और अपनी मौसेरी बहन के अभिनय को देखकर अंदर ही अंदर नमन किया और वो भी सामान्य रूप से, बिना किसी बदलाव के सबसे बातें करता रहा। कुछ ही देर बाद पार्टी शुरू हो गई थी। उस पार्टी में आर्यमणि शिरकत करते एक ही बात नोटिस की, यहां बहुत से ऐसे लोग थे जिनकी भावना वो मेहसूस नहीं कर सकता था।
Awesome update bhai
 
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