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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 18 9.7%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 21 11.4%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 73 39.5%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 42 22.7%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 31 16.8%

  • Total voters
    185

Ajju Landwalia

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अध्याय - 66
━━━━━━༻♥༺━━━━━━



अब तक....

कुछ ही पलों में हमारा काफ़िला फिर से चल पड़ा लेकिन इस बार ये काफ़िला हवेली की तरफ चल पड़ा था। संपत, दयाल और मंगू जगन को घसीटते हुए फिर से ले चले थे। जगन की हालत बेहद ख़राब थी। उसके पैरों में अब मानों जान ही नहीं थी। वो लड़खड़ाते हुए चल रहा था। कभी कभी वो गिर भी जाता था जिससे तीनों उसे घसीटने लगते थे। कच्ची मिट्टी पर जब शरीर रगड़ खाता तो वो दर्द से चिल्लाने लगता था और फिर जल्दी ही उठने की कोशिश करता। मैंने मंगू से कह दिया था कि अब उसे ज़्यादा मत घसीटे क्योंकि ऐसे में उसकी जान भी जा सकती थी। फिलहाल उसका ज़िंदा रहना ज़रूरी था। उससे बहुत कुछ जानना शेष था।

अब आगे....

हवेली में उस वक्त सन्नाटा सा गया जब पता चला कि वैभव अपने कमरे में नहीं है। सब के सब बदहवास से हो कर पूरी हवेली में वैभव को खोजने लगे। जब वो कहीं न मिला तो सबके सब सन्नाटे में आ गए। एक तो वैसे ही घर के दो दो अज़ीज़ व्यक्तियों की दुश्मनों ने हत्या कर दी थी जिसका दुख और ज़ख्म अभी पूरी तरह ताज़ा ही था दूसरे अब वैभव का इस तरह से ग़ायब हो जाना मानों सबकी जान हलक में अटका देने के लिए काफी था।

बात दादा ठाकुर के संज्ञान में आई तो वो भी सदमे जैसी हालत में आ गए। उनका मित्र अर्जुन सिंह और समधी बलभद्र सिंह उनके साथ ही बैठक में बैठे हुए थे। वो तीनों भी वैभव के इस तरह हवेली से ग़ायब होने की बात सुन कर सकते में आ गए थे। हवेली की औरतों का एक बार फिर से रोना धोना शुरू हो गया था। हवेली की ठकुराईन सुगंधा देवी रोते बिलखते हुए बैठक में आईं और दादा ठाकुर के सामने आ कर उन्हें इस तरह से देखने लगीं जैसे पल भर वो उन्हें भस्म कर देंगी।

"आप यहां अपने ऊंचे सिंहासन पर बैठे हुए हैं और मेरा बेटा हवेली से ग़ायब है।" सुगंधा देवी गुस्से में चीख ही पड़ीं____"एक बात कान खोल कर सुन लीजिए ठाकुर साहब अगर मेरे बेटे को कुछ हुआ तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। आपकी इस हवेली को आग लगा दूंगी मैं और उसी आग में खुद भी जल कर ख़ाक हो जाऊंगी। उसके बाद आप शान से जीते रहना।"

"शांत हो जाएं ठकुराईन।" अर्जुन सिंह ने बड़ी नम्रता से कहा____"आपके बेटे को कुछ नहीं होगा। दुनिया का कोई भी माई का लाल आपके बेटे को हानि नहीं पहुंचा सकता। अरे! आपका बेटा शेर है शेर। वो ज़रूर यहीं कहीं आस पास ही होगा। थोड़ी देर में आ जाएगा। बस आप धीरज से काम लीजिए और ठाकुर साहब को कुछ मत कहिए। ये वैसे ही बहुत दुखी हैं।"

"अगर ये सच में दुखी होते।" सुगंधा देवी ने उसी तरह चीखते हुए कहा____"तो इस वक्त ये अपने बेटे की ग़ायब होने वाली बात सुन कर यूं चुप चाप बैठे न होते। दुश्मनों ने इनके भाई और इनके बेटे को मार डाला और ये ख़ामोशी से अपने सिंहासन पर बैठे हुए हैं। मैं हमेशा ये सोच कर खुश हुआ करती थी कि ये अपने पिता की तरह गुस्सैल और खूंखार स्वभाव के नहीं हैं लेकिन आज प्रतीत होता है कि इन्हें अपने पिता की तरह ही होना चाहिए था। आज मुझे महसूस हो रहा है कि ठाकुर खानदान का खून इनकी तरह ठंडा नहीं होना चाहिए जो अपने घर के दो दो सदस्यों की हत्या होने के बाद भी न खौले और अपने दुश्मनों का नामो निशान मिटा देने की क्षमता भी न रखे।"

"ये आप क्या कह रही हैं ठकुराईन?" अर्जुन सिंह सुगंधा देवी के तेवर देख पहले ही हैरान परेशान था और अब ऐसी बातें सुन कर आश्चर्य में भी पड़ गया था, बोला____"कृपया शांत हो जाइए और भगवान के लिए ऐसी बातें मत कीजिए।"

"कैसे मित्र हैं आप?" सुगंधा देवी अर्जुन सिंह से मुखातिब हुईं_____"कि इतना कुछ होने के बाद भी आप शांति की बातें कर रहे हैं। शायद आपका खून भी इनकी तरह ही ठंडा पड़ चुका है। अपने आपको दादा ठाकुर और ठाकुर साहब कहलवाने वाले दो ऐसे कायरों को देख रही हूं जो दुश्मनों के ख़ौफ से औरतों की तरह घर में दुबके हुए बैठे हैं। धिक्कार है ठाकुरों के ऐसे ठंडे खून पर।"

"समधन जी।" बलभद्र सिंह ने हिचकिचाते हुए कहा____"हम आपकी मनोदशा को अच्छी तरह समझते हैं किंतु ठाकुर साहब के लिए आपका ये सब कहना बिल्कुल भी उचित नहीं है। आवेश और गुस्से में आप क्या क्या बोले जा रही हैं इसका आपको ख़ुद ही अंदाज़ा नहीं है। देखिए, हम आपकी बेहद इज्ज़त करते हैं और यही चाहते हैं कि ऐसे अवसर पर आप संयम से काम लें। एक बात आप अच्छी तरह जान लीजिए कि ये जो कुछ भी हुआ है उसका बदला ज़रूर लिया जाएगा। हत्यारे ज़्यादा दिनों तक इस दुनिया में जी नहीं पाएंगे।"

"क्या कर लेंगे ये?" सुगंधा देवी का गुस्सा मानों अभी भी शांत नहीं हुआ था, बोलीं____"सच तो ये है कि ये हत्यारों का कुछ बिगाड़ ही नहीं पाएंगे समधी जी। अरे! इन्हें तो ये तक पता नहीं है कि इनके अपनों की हत्या करने वाले आख़िर हैं कौन? आपको अभी यहां के हालातों के बारे में पता नहीं है। ये जो आस पास के गावों का फ़ैसला करते हैं न इन्हें खुद नहीं पता कि हवेली और हवेली में रहने वालों पर इस तरह का संकट पैदा करने वाला कौन है? आप खुद सोचिए कि जब इन्हें कुछ पता ही नहीं है तो ये आख़िर क्या कर लेंगे किसी का? अभी दो लोगों की हत्या की है हत्यारों ने आगे बाकियों की भी ऐसे ही हत्या कर देंगे और ये कुछ नहीं कर सकेंगे। क्या इनके पास इस बात का कोई जवाब है कि इनके यहां बैठे रहने के बाद भी मेरा बेटा हवेली से कैसे ग़ायब हो गया? और इनके पास ही क्यों बल्कि आप दोनों के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं है।"

सुगंधा देवी की इन बातों को सुन कर बलभद्र सिंह को समझ ही न आया कि अब वो क्या कहें? ये सच था कि उन्हें यहां के हालातों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी किंतु जितनी भी अभी हुई थी और जो कुछ ठकुराईन द्वारा अभी उन्होंने सुना था उससे वो अवाक से रह गए थे।

"अर्जुन सिंह।" एकदम से छा गए सन्नाटे को चीरते हुए दादा ठाकुर ने अजीब भाव से कहा____"अब हम और सहन नहीं कर सकते। हम इसी वक्त अपने दुश्मनों को मिट्टी में मिलाने के लिए यहां से जाना चाहते हैं।"

"य...ये आप क्या कह रहे हैं ठाकुर साहब?" दादा ठाकुर को सिघासन से उठ गया देख अर्जुन सिंह चौंके, फिर बोले____"देखिए आवेश में आ कर आप ऐसा कोई भी क़दम उठाने के बारे में मत सोचिए। ठकुराईन की बातों से आहत हो कर आप बिना सोचे समझे कुछ भी ऐसा नहीं करेंगे जिससे कि बाद में आपको खुद ही पछताना पड़े।"

"हमें पछताना मंज़ूर है अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने सख़्त भाव से कहा____"लेकिन अब दुश्मनों को ज़िंदा रखना मंज़ूर नहीं है। आपकी ठकुराईन ने सच ही तो कहा है कि इतना कुछ होने के बाद भी हमारा खून नहीं खौला बल्कि बर्फ़ की मानिंद ठंडा ही पड़ा हुआ है। ऊपर से हमारे छोटे भाई और बेटे की आत्मा भी ये देख कर दुखी ही होंगी कि हम उनकी हत्या का बदला नहीं ले रहे। वो दोनों हमें माफ़ नहीं करेंगे। हमें अब मर जाना मंज़ूर है लेकिन कायरों की तरह यहां बैठे रहना हर्गिज़ मंज़ूर नहीं है।"

दादा ठाकुर की बातें सुन कर अर्जुन सिंह अभी कुछ बोलने ही वाले थे कि तभी बाहर से किसी के आने की आहट हुई और फिर चंद ही पलों में मैं बैठक के सामने आ कर खड़ा हो गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही मां भागते हुए मेरे पास आईं और मुझे अपने सीने से छुपका कर रो पड़ीं।

"कहां चला गया था तू?" मुझे अपने कलेजे से लगाए वो रोते हुए कह रहीं थी____"तुझे हवेली में न पर कर मेरी तो जान ही निकल गई थी। तू इस तरह अपनी मां को छोड़ कर क्यों चला गया था? तुझे कुछ हुआ तो नहीं न?"

कहने के साथ ही मां ने मुझे खुद से अलग किया और फिर पागलों की तरह मेरे जिस्म के हर हिस्से को छू छू कर देखने लगीं। मां की इस हालत को देख कर मेरे दिल में बेहद पीड़ा हुई लेकिन फिर मैंने किसी तरह खुद को सम्हाला और मां से कहा____"मुझे कुछ नहीं हुआ है मां। मैं एकदम ठीक हूं, और मुझे माफ़ कर दीजिए जो मैं बिना किसी को कुछ बताए हवेली से यूं चला गया था।"

"अपने दो बेटों को खो चुकी हूं मैं।" मां की आंखें छलक पड़ीं, मेरे चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों के बीच ले कर करुण स्वर में बोलीं____"अब तुझे नहीं खोना चाहती। मुझे वचन दे कि आज के बाद तू कभी भी इस तरह कहीं नहीं जाएगा।"

"ठीक है मां।" मैंने कहा____"मैं आपको वचन देता हूं। अब शांत हो जाइए और अंदर जाइए।"
"पर तू इस तरह कहां चला गया था?" मां ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"और किसी को बताया क्यों नहीं?"

मैंने मां को किसी तरह बहलाया और उन्हें अंदर भेज दिया। असल में मैं उन्हें सच नहीं बताना चाहता था वरना वो परेशान भी हो जातीं और मुझ पर गुस्सा भी करतीं।

"वैभव बेटा आख़िर ये सब क्या है?" मां के जाने के बाद अर्जुन सिंह ने मुझसे कहा____"तुम बिना किसी को कुछ बताए इस तरह कहां चले गए थे? क्या तुम्हें मौजूदा हालातों की गंभीरता का ज़रा भी एहसास नहीं है? अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो जानते हो कितना गज़ब हो जाता?"

"माफ़ कीजिए चाचा जी।" मैंने शांत भाव से कहा और फिर पिता जी से मुखातिब हुआ____"आप भी मुझे माफ़ कर दीजिए पिता जी। मैं जानता हूं कि मुझे इस तरह हवेली से बाहर नहीं जाना चाहिए था लेकिन मैं ऐसी मानसिक अवस्था में था कि खुद को रोक ही नहीं पाया। हालाकि एक तरह से ये अच्छा ही हुआ क्योंकि मेरा इस तरह से बाहर जाना बेकार नहीं गया।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" पिता जी ने नाराज़गी से मेरी तरफ देखा।
"असल में बात ये है कि मेरे आदमियों ने मुरारी के भाई जगन को पकड़ लिया है।" मैंने कहा____"और इस वक्त वो बाहर ही है। मेरे आदमियों के कब्जे में।"

मेरी बात सुन कर सबके चेहरों पर हैरत के भाव उभर आए। उधर पिता जी ने कहा____"उसे फ़ौरन हमारे सामने ले कर आओ।"

पिता जी के कहने पर मैंने एक दरबान को भेज कर जगन को बुला लिया। जगन बुरी तरह डरा हुआ था और साथ ही उसकी हालत भी बेहद खस्ता थी। जैसे ही वो दादा ठाकुर के सामने आया तो वो और भी ज़्यादा खौफ़जदा हो गया। पिता जी ने क़हर भरी नज़रों से उसकी तरफ देखा।

"मुझे माफ़ कर दीजिए दादा ठाकुर।" जगन आगे बढ़ कर पिता जी के पैरों में ही लोट गया, फिर बोला____"मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं हर तरह से मजबूर हो गया था ये सब करने के लिए।"

"तुमने जो किया है उसके लिए तुम्हें कोई माफ़ी नहीं मिल सकती।" पिता जी ने कठोर भाव से कहा____"तुम्हें सज़ा तो यकीनन मिलेगी लेकिन उससे पहले हम तुमसे ये जानना चाहते हैं कि तुमने ये सब क्यों किया? किसके कहने पर किया और कैसे किया? हम सब कुछ विस्तार से जानना चाहते हैं।"

"सब मेरी बदकिस्मती का ही नतीजा है दादा ठाकुर।" जगन ने दुखी हो कर कहा____"कर्ज़ में ऐसा डूबा कि फिर कभी उबर ही नहीं सका उससे। खेत पात सब गिरवी हो गए इसके बावजूद क़र्ज़ न चुका। हालात इतने ख़राब हो गए कि परिवार का भरण पोषण करना भी मुश्किल पड़ गया। अपनी ख़राब हालत के बारे में मुरारी भैया को बता भी नहीं सकता था क्योंकि वो नाराज़ हो जाते। उनसे न जाने कितनी ही बार मदद ले चुका था मैं, इस लिए अब उनसे सहायता लेने में बेहद शर्म आ रही थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं किस तरह से अपने सिर पर से कर्ज़ का बोझ हटाऊं और किस तरह से अपने परिवार का भरण पोषण करूं? दूसरी तरफ मेरा बड़ा भाई था जिसके सिर पर कर्ज़ का बोझ तो था लेकिन मेरी तरह उसकी हालत ख़राब नहीं थी। उसके पास खेत पात थे जिनसे वो अपना परिवार अच्छे से चला रहा था। सच कहूं तो ये देख कर अब मैं अपने ही भाई से ईर्ष्या के साथ साथ घृणा भी करने लगा था।"

"तो क्या इसी ईर्ष्या और घृणा की वजह से तुमने अपने भाई की हत्या कर दी थी?" पिता जी बीच में ही उसकी तरफ गुस्से से देखते हुए बोल पड़े थे।

"नहीं दादा ठाकुर।" जगन ने इंकार में सिर हिलाते हुए कहा____"ये सच है कि मैं अपने भाई से ईर्ष्या और घृणा करने लगा था लेकिन उसे जान से मार डालने के बारे में कभी नहीं सोचा था, बल्कि यही दुआ करता रहता था कि किसी वजह से उसे कुछ हो जाए ताकि उसका सब कुछ मेरा हो जाए। पर भला चमार के मनाए पड़वा थोड़ी ना मरता है, बस वही हाल था।"

"अगर ऐसी बात है।" अर्जुन सिंह ने कहा____"तो फिर अचानक से तुम्हारे मन में अपने भाई की हत्या करने का ख़याल कैसे आ गया था?"

"ये तब की बात है जब छोटे ठाकुर दादा ठाकुर के द्वारा गांव से निष्कासित किए जाने पर हमारे गांव के पास अपनी बंज़र पड़ी ज़मीन में रहते थे।" जगन ने गंभीर भाव से कहा____"इन्हें वहां पर रहते हुए काफी समय हो गया था। मैं ये भी जानता था कि मेरा भाई इनकी मदद करता था और मेरे भाई से इनके बेहतर संबंध थे जिसके चलते ये मेरे भाई के घर भी जाते रहते थे। मुझे ये देख कर भी अपने भाई से जलन होती थी कि उसके संबंध दादा ठाकुर के लड़के से थे। मैं जानता था कि उस समय भले ही छोटे ठाकुर निष्कासित किए जाने पर अपने घर से बेघर थे लेकिन एक न एक दिन तो वापस हवेली लौटेंगे ही और तब वो मेरे भाई के एहसानों का क़र्ज़ भी बेहतर तरीके से चुकाएंगे। ज़ाहिर है ऐसे में मेरे भाई की स्थिति पहले से और भी बेहतर हो जाती और मैं और भी बदतर हालत में पहुंच जाता। ये सब ऐसी बातें थी जिसके चलते मेरे मन में अपने भाई के प्रति और भी ज़्यादा जलन और नफ़रत पैदा होने लगी थी लेकिन इसके लिए मैं कुछ कर नहीं सकता था। बस अंदर ही अंदर घुट रहा था। फिर एक दिन वो हुआ जिसकी मैंने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी।"

"ऐसा क्या हुआ था?" जगन एकदम से चुप हो गया तो अर्जुन सिंह ने पूछ ही लिया____"जिसकी तुमने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी?"

"मैं बहुत ज़्यादा परेशान था।" जगन ने फिर से कहना शुरू किया____"अपने बच्चों को भूखा देख मैं उनके लिए बहुत चिंतित हो गया था। एक शाम मैं इसी परेशानी और चिंता में अपने उन खेतों में बैठा था जो गिरवी रखे हुए थे। शाम पूरी तरह से घिर चुकी थी और चारो तरफ अंधेरा फैल गया था। मैं सोचो में इतना खोया हुआ था कि मुझे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि एक रहस्यमय साया मेरे क़रीब जाने कहां से आ कर खड़ा हो गया था? जब उसने अपनी अजीब सी आवाज़ में मुझे पुकारा तो मैं एकदम से हड़बड़ा गया और जब उस पर मेरी नज़र पड़ी तो मैं बुरी तरह डर गया। मुझे समझ न आया कि आख़िर उसके जैसा व्यक्ति कौन हो सकता है और मेरे पास किस लिए आया है? मुझे लगा वो ज़रूर कोई ऐसा व्यक्ति है जिससे मैंने कर्ज़ ले रखा है और कर्ज़ न चुकाने की वजह से अब वो मेरी जान लेने आया है। ये सोच कर मैं बेहद खौफ़जदा हो गया और फ़ौरन ही उसके पैरों में पड़ कर उससे रहम की भीख मांगने लगा। तब उसने जो कहा उसे सुन कर मैं एकदम से हैरान रह गया। उसने कहा कि मुझे उससे न तो डरने की ज़रूरत है और ना ही इस तरह रहम की भीख मांगने की। बल्कि वो तो मेरे पास इस लिए आया है ताकि मेरी परेशानियों के साथ साथ मेरे हर दुख का निवारण भी कर सके। मैं सच कहता हूं दादा ठाकुर, सफ़ेद कपड़ों में ढंके उस रहस्यमय व्यक्ति की बातें सुन कर मैं बुत सा बन गया था। फिर मैंने खुद को सम्हाला और उससे पूछा कि क्या सच में वो मेरी समस्याओं का निवारण कर देगा तो जवाब में उसने कहा कि वो एक पल में मेरी हर समस्या को दूर कर देगा लेकिन बदले में मुझे भी कुछ करना पड़ेगा। इतना तो मैं भी समझ गया था कि अगर कोई व्यक्ति इस रूप में आ कर मेरी समस्याओं को दूर करने को बोल रहा है तो वो ये सब मुफ्त में तो करेगा नहीं। यानि बदले में उसे भी मुझसे कुछ न कुछ चाहिए ही था। मैं अब यही जानना चाहता था उससे कि बदले में आख़िर मुझे क्या करना होगा? तब उसने मुझसे कहा कि बदले में मुझे अपने भाई मुरारी की हत्या करनी होगी और उस हत्या का इल्ज़ाम छोटे ठाकुर पर लगाना होगा।"

जगन सांस लेने के लिए रुका तो बैठक में सन्नाटा सा छा गया। पिता जी, अर्जुन सिंह और भैया के चाचा ससुर यानि बलभद्र सिंह उसी की तरफ अपलक देखे जा रहे थे। पिता जी और अर्जुन सिंह के चेहरे पर तो सामान्य भाव ही थे किंतु बलभद्र सिंह के चेहरे कर आश्चर्य के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे। ज़ाहिर है ये सब उनके लिए नई और हैरतअंगेज बात थी।

"उस सफ़ेदपोश आदमी के मुख से ये सुन कर तो मैं सकते में ही आ गया था।" इधर जगन ने फिर से बोलना शुरू किया____"मेरी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के मेरी कनपटियों में बजती महसूस हो रहीं थी। मेरे मुंह से कोई लफ्ज़ नहीं निकल रहे थे। फिर जैसे मुझे होश आया तो मैंने उससे कहा कि ये क्या कह रहे हैं आप? आप होश में तो हैं? तो उसने कहा कि होश में तो मुझे रहना चाहिए। सच तो ये था कि उसकी बातों से मेरे मन में तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे। उसने मुझे समझाया कि ऐसा करने से मुझ पर कभी कोई बात नहीं आएगी। जब मैंने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है तो उसने मुझे कुछ ऐसा बताया जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। उसने कहा कि छोटे ठाकुर के नाजायज संबंध मेरे भाई की बीवी से हैं।"


जगन, मादरचोद ने सबके सामने मेरी इज्ज़त का जनाजा निकाल दिया था। चाचा ससुर ने जब उसके मुख से ये सुन कर मेरी तरफ हैरानी से देखा तो मेरा सिर शर्म से झुकता चला गया। ख़ैर, अब क्या ही हो सकता था।

"उस रहस्यमय व्यक्ति ने कहा कि छोटे ठाकुर के ऐसे नाजायज़ संबंध के आधार पर मुरारी की हत्या का इल्ज़ाम इन पर आसानी से लगाया जा सकता है।" उधर जगन मानों अभी भी मेरी इज्ज़त उतारने पर अमादा था, बोला____"यानि सबको ये कहानी बताई जाएगी कि छोटे ठाकुर ने मेरे भाई की हत्या इस लिए की है क्योंकि मेरे भाई को इनकी काली करतूत का पता चल गया था और वो दादा ठाकुर के पास जा कर इनकी करतूत बता कर उनसे इंसाफ़ मांगने की बात कहने लगा था। छोटे ठाकुर इस बात से डर गए और फिर इन्होंने ये सोच कर मेरे भाई की हत्या कर दी कि जब मुरारी ही नहीं रहेगा तो किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा। अपने मरद की हत्या होने के बाद सरोज भौजी को अगर ये पता भी हो जाता कि छोटे ठाकुर ने ही उसके मरद की हत्या की है तो वो इनसे कुछ कह ही नहीं सकती थी। ऐसा इस लिए क्योंकि उसके मरद की हत्या हो जाने के लिए वो खुद भी ज़िम्मेदारी ही होती और बदनामी के डर से किसी से कुछ कहती ही नहीं। सफ़ेदपोश आदमी ने जब मुझे ये सब समझाया तो मेरे कुंद पड़े ज़हन के मानों सारे कपाट एकदम से खुल गए और मुझे अच्छी तरह ये एहसास हो गया कि अगर सच में मैं अपने भाई की हत्या कर के हत्या का इल्ज़ाम छोटे ठाकुर पर लगा दूं तो यकीनन मुझ पर कभी कोई बात ही नहीं आएगी। सबसे बड़ी बात ये कि ऐसा करने से मेरी हर समस्या भी दूर हो जाएगी। ख़ैर, समझ तो मुझे उसी वक्त आ गया था लेकिन तभी मुझे ये भी आभास हुआ कि ऐसा करना कहीं मुझ पर ही न भारी पड़ जाए क्योंकि जिसके कहने पर मैं अपने भाई की हत्या करूंगा वो बाद में मुझे ही फंसा सकता था। मुझे तो पता भी नहीं है कि सफ़ेद कपड़ों में लिपटा वो व्यक्ति आख़िर है कौन और ये सब करवा कर वो छोटे ठाकुर को क्यों फंसाना चाहता है? मैंने उससे सोचने के लिए कुछ दिन का समय मांगा तो उसने कहा ठीक है। फिर वो ये कह कर चला गया कि मेरे पास सोचने के लिए दो दिन का वक्त है। दो दिन बाद मैं दादा ठाकुर के आमों वाले बाग में आ जाऊं क्योंकि वो मुझे वहीं मिलेगा। उसके जाने के बाद मैं घर आया और खा पी कर बिस्तर में लेट गया। बिस्तर में लेटे हुए मैं उसी के बारे में सोचे जा रहा था। रात भर मुझे नींद नहीं आई। मैंने बहुत सोचा कि वो रहस्यमय आदमी मुझसे ऐसा क्यों करवाना चाहता है लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। ऐसे ही दो दिन गुज़र गए।"

"मेरे भाई की हत्या में छोटे ठाकुर को फंसाने का मुझे एक ही मतलब समझ आया था।" कुछ पल रुकने के बाद जगन ने फिर से कहा____"मतलब कि वो रहस्यमय आदमी छोटे ठाकुर से या तो नफ़रत करता था या फिर वो इन्हें अपना दुश्मन समझता था। मुझे उस पर यकीन नहीं था इस लिए दो दिन बाद जब मैं आपके आमों वाले बाग़ में उस व्यक्ति से मिला तो मैंने उससे साफ कह दिया कि पहले वो मेरी समस्याएं दूर करे, उसके बाद ही मैं उसका काम करूंगा। हालाकि मेरे पास उसका काम करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था, क्योंकि मैं ये भी समझ रहा था कि उसका काम अगर मैं नहीं करूंगा तो वो किसी और से करवा लेगा। यानि मेरे भाई का मरना तो अब निश्चित ही हो चुका था और यदि कोई दूसरा मेरे भाई की हत्या करेगा तो इससे मेरा ही सबसे बड़ा नुकसान होना था। मैंने यही सब सोच कर फ़ैसला कर लिया था कि जब मेरे भाई की मौत निश्चित ही हो चुकी है तो मैं ये काम करने से क्यों मना करूं? अगर मेरे ऐसा करने से मेरी सारी समस्याओं का अंत हो जाना है तो शायद यही बेहतर है मेरे और मेरे परिवार की भलाई के लिए। मेरी उम्मीद के विपरीत दूसरे ही दिन उस रहस्यमय व्यक्ति ने मेरे हाथ में नोटों की एक गड्डी थमा दी। मैं समझ गया कि नोटों की उस गड्डी से मेरा सारा कर्ज़ चुकता हो जाना था और साथ ही गिरवी पड़े मेरे खेत भी मुक्त हो जाने थे। इस बात से मैं बड़ा खुश हुआ और फिर मैंने एक बार भी ये नहीं सोचना चाहा कि अपने ही भाई की हत्या करना कितना बड़ा गुनाह होगा, पाप होगा।"

"मुरारी काका की हत्या कैसे की थी तुमने?" जगन के चुप होते ही मैंने उससे पूछा____"वो तो उस रात आंगन में सो रहे थे न फिर तुमने कैसे उनकी हत्या की और उनकी लाश को बाहर पेड़ के पास छोड़ दिया?"

"सब कुछ बड़ा आसान सा हो गया था छोटे ठाकुर।" जगन ने फीकी मुस्कान के साथ कहा____"मैं जानता था कि मेरा भाई लगभग रोज़ ही देशी पीता था और इतनी पी लेता था कि फिर उसे किसी चीज़ का होश ही नहीं रहता था। उस रात मैं आप दोनों पर नज़र रखे हुए था। मेरा भाई देशी पी कर आंगन में चारपाई पर लेटा हुआ था। इधर मैं सोचने लगा कि उसे बाहर कैसे लाऊं? हालाकि मैं घर के अंदर दीवार फांद कर आसानी से जा सकता था और फिर आंगन में ही उसकी हत्या कर सकता था लेकिन मुझे इस बात का भी एहसास था कि अगर थोड़ी सी भी आहट या आवाज़ हुई तो भौजी या फिर अनुराधा की नींद खुल सकती थी और तब मैं पकड़ा जा सकता था। इस लिए मैंने यही सोचा था कि मुरारी को बाहर बुला कर ही उसकी हत्या की जाए। उसे बाहर बुलाने का मेरे पास फिलहाल कोई उपाय नहीं था। इधर धीरे धीरे रात भी गुज़रती जा रही थी। वक्त के गुज़रने से मेरी परेशानी भी बढ़ती जा रही थी। समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्या करूं जिससे मेरा भाई बाहर आ जाए? उस वक्त शायद भोर का समय था जब मैंने अचानक ही किवाड़ खुलने की आवाज़ सुनी। मैं फ़ौरन ही छुप गया और देखने लगा कि बाहर कौन आता है? कुछ ही देर में मैं ये देख कर खुश हो गया कि किवाड़ खोल कर मेरा भाई बाहर आ गया है और पेड़ की तरफ जा रहा है। मैं समझ गया कि उसे पेशाब लगा था इसी लिए उसकी नींद खुली थी उस वक्त। सच कहूं तो ये मेरे लिए जैसे ऊपर वाले ने ही सुनहरा मौका प्रदान कर दिया था और मैं इस मौके को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता था। मैंने देखा मेरा भाई पेड़ के पास खड़ा पेशाब कर रहा है तो मैं बहुत ही सावधानी से उसकी तरफ बढ़ा। मेरे हाथ में कुल्हाड़ी थी और मैंने उसी कुल्हाड़ी से अपने भाई की जीवन लीला को समाप्त कर देने का सोच लिया था। मेरा समूचा जिस्म ये सोच कर बुरी तरह कांपने लगा था कि मैं अपने भाई को जान से मार देने वाला हूं। इससे पहले कि मैं उसके पास पहुंच कर कुछ करता मेरा भाई पेशाब कर के फारिग़ हो गया और मेरी तरफ पलटा। अंधेरे में मुझ पर नज़र पड़ते ही वो बुरी तरह चौंका और साथ ही डर भी गया। होश तो मेरे भी उड़ गए थे लेकिन फिर मैंने खुद को सम्हाला और फिर तेज़ी से उसकी तरफ झपटा। मैंने तेज़ी से कुल्हाड़ी का वार उस पर किया तो वो ऐन मौके पर झुक गया जिससे मेरा वार खाली चला गया। उधर मैं सम्हल भी न पाया था कि मुरारी ने मुझे दबोच लिया। उसके मुख से अभी भी देशी की दुर्गंध आ रही थी। जब उसने मुझे दबोच लिया तो मैं ये सोच कर बुरी तरह घबरा गया कि शायद उसने मुझे और मेरी नीयत को पहचान लिया है और अब वो मुझे छोड़ने वाला नहीं है। मरता क्या न करता वाली हालत हो गई थी मेरी। मेरा भाई शरीर से और ताक़त से मुझसे ज़्यादा ही था इस लिए मुझे लगा कि कहीं मैं खुद ही न मारा जाऊं। ज़हन में इस ख़याल के आते ही मैंने पूरा जोर लगा कर उसे धक्का दे दिया जिससे वो धड़ाम से ज़मीन पर गिर गया। मैं अवसर देख कर फ़ौरन ही उसके ऊपर सवार हो गया और कुल्हाड़ी को उसके गले में लगा कर उसके गले को चीर दिया। खून का फव्वारा सा निकला जो उछल कर मेरे ऊपर ही आ गिरा। उधर मेरा भाई जल बिन मछली की तरह तड़पने लगा था और इससे पहले की वो दर्द से तड़पते हुए चीखता मैंने जल्दी से उसे दबोच कर उसके मुख को बंद कर दिया। कुछ ही देर में उसका तड़पना बंद हो गया और मेरा भाई मर गया। कुछ देर तक मैं अपनी तेज़ चलती सांसों को नियंत्रित करता रहा और फिर उठ कर खड़ा हो गया। नज़र भाई के मृत शरीर पर पड़ी तो मैं ये सोच कर एकदम से घबरा गया कि ये क्या कर डाला मैंने किंतु फिर जल्दी ही मुझे समझ में आया कि अब इस बारे में कुछ भी सोचने का कोई मतलब नहीं है। बस, ये सोच कर मैं कुल्हाड़ी लेकर वहां से भाग गया।"

"और फिर जब सुबह हुई।" जगन के चुप होते ही मैंने कहा____"तो तुम अपने गांव के लोगों को ले कर मेरे झोपड़े में आ गए। मकसद था सबके सामने मुझे अपने भाई का हत्यारा साबित करना। मेरे चरित्र के बारे में सभी जानते थे इस लिए हर कोई इस बात को मान ही लेता कि अपने आपको बचाने के लिए मैंने ही मुरारी काका की हत्या की है।"

जगन ने मेरी बात सुन कर सिर झुका लिया। बैठक में एक बार फिर से ख़ामोशी छा गई थी। सभी के चेहरों पर कई तरह के भावों का आवा गमन चालू था।


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Behad shandar aur Romanchak update he TheBlackBlood Shubham Bhai,

Jagan ne sirf utna hi bataya jitna use pata tha.............lekin saale ne bhari sabha me vaibhav ki izzat ka faluda kar diya

Keep posting Bhai
 

Sanju@

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अब तक....

मैंने भाभी को किसी तरह शांत किया और उन्हें उनके कमरे में ले आया। पलंग पर मैंने उन्हें बैठाया और फिर दरवाज़े के पास आ कर कुसुम को आवाज़ लगाई। मेरे आवाज़ देने पर कुसुम अपने कमरे से निकल कर भागती हुई मेरे पास आई। मैंने उसे भाभी के पास रहने को कहा और साथ ही ये भी कहा कि वो भाभी को किसी भी हाल में अकेला न छोड़े। कुसुम ने हां में सिर हिलाया और भाभी के कमरे में दाखिल हो गई। मैंने भाभी को ज़बरदस्ती आराम करने को कहा और बाहर निकल कर नीचे की तरफ चल पड़ा।

अब आगे....


शाम हो रही थी।
जगन बहुत परेशान था और साथ ही अंदर से बेहद घबराया हुआ भी था। उसे भी पता चल चुका था कि हवेली में बहुत बड़ी घटना हो गई है जिसमें मझले ठाकुर जगताप और दादा ठाकुर के बड़े बेटे अभिनव ठाकुर की हत्या कर दी गई है। दोनों चाचा भतीजे की इस तरह हत्या हो जाएगी इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। वो अच्छी तरह जानता था कि अब जो होगा वो बहुत ही भयानक होगा जिसके चलते उसकी अपनी ज़िंदगी भी ख़तरे में ही पड़ गई है। वो पिछले कई दिनों से सबसे छुपता फिर रहा था। उसे इस बात का अंदेशा ही नहीं बल्कि पूरा यकीन था कि उसकी असलियत का पता दादा ठाकुर अथवा ठाकुर वैभव सिंह को चल चुका है इस लिए अब वो उनके ख़ौफ से छुपता फिर रहा था। घर में उसकी बीवी और बच्चे बिना किसी सहारे के ही थे जिनकी अब उसे बेहद चिंता होने लगी थी।

सूरज पश्चिम दिशा में अस्त हो चुका था और हर तरफ शाम का धुंधलका छाने लगा था। जगन सबकी नज़रों से खुद को बचाते हुए उस तरफ तेज़ी से बढ़ता चला जा रहा था जिस तरफ दादा ठाकुर के आमों के बाग थे। यूं तो वहां पर जाने के लिए साफ सुथरा रास्ता था लेकिन क्योंकि उसे सबकी नज़रों से खुद को छुपाए रखना था इस लिए वो लंबा चक्कर लगाते हुए बाग़ की तरफ बढ़ रहा था। वो उस सफ़ेदपोश आदमी से मिलना चाहता था जिसके इशारों पर आज कल वो काम कर रहा था।

जगन ने उस वक्त थोड़ी राहत की सांस ली जब वो आमों के बाग़ में आ गया। यहां पर घने पेड़ पौधे थे और शाम घिर जाने की वजह से अंधेरा भी नज़र आ रहा था। ऐसे में किसी के द्वारा उसको देख लिया जाना इतना आसान नहीं था और यही उसके लिए राहत वाली बात थी। ख़ैर बाग़ में दाखिल होते ही वो सावधानी से उस तरफ बढ़ चला जिस तरफ अक्सर उसे सफ़ेदपोश मिला करता था। जल्दी ही वो उस जगह पर आ गया और हल्के अंधेरे में वो इस उम्मीद में चारो तरफ नज़रें घुमाने लगा कि शायद उसे कहीं पर वो सफ़ेदपोश व्यक्ति नज़र आ जाए लेकिन ऐसा न हुआ। जैसे जैसे समय गुज़र रहा था उसके चेहरे पर बेचैनी के साथ साथ चिंता और परेशानी भी बढ़ती जा रही थी।

काफी देर हो जाने पर भी जब जगन को वो सफ़ेदपोश कहीं नज़र ना आया तो वो हताश सा हो कर वापस चल पड़ा। इतना तो उसे भी पता था कि सफ़ेदपोश बाग़ में हर वक्त बैठा नहीं रहता था और जब भी उसे मिलना होता था तो वो अपने काले नकाबपोश व्यक्ति द्वारा उस तक ख़बर भेजवा देता था। ख़ैर निराश और परेशान हालत में जगन बाग़ से निकल कर वापस उसी रास्ते की तरफ बढ़ चला था जिस तरफ से वो आया था। अभी वो कुछ ही दूर चला था कि तभी उसे अजीब तरह की हलचल महसूस हुई जिसके चलते वो बुरी तरह डर गया। उसके दिल की धड़कनें मानों रुक ही गईं। अभी वो अपनी धड़कनों को नियंत्रित करने का प्रयास ही कर रहा था कि तभी दो तरफ से तीन आदमी लट्ठ लिए एकदम से उसके क़रीब आ गए।

तीन आदमियों को यूं किसी जिन्न की तरह अपने क़रीब प्रगट हो गया देख जगन की गांड़ फट के हाथ में आ गई। एक तो वैसे ही वो डरा हुआ था दूसरे तीन तीन लट्ठधारियों को देखते ही उसे ऐसा लगा जैसे न चाहते हुए भी उसका मूत निकल जाएगा।

"क..कौन हो तुम लोग???" फिर उसने अपनी हालत को काबू करने का प्रयास करते हुए उन तीनों को बारी बारी से देखते हुए घबरा कर पूछा।

"तुम्हारे सिर पर मंडराती हुई तुम्हारी मौत।" एक लट्ठधारी ने अजीब भाव से कहा____"आख़िर पकड़ में आ ही गया आज।"

"क..क्या मतलब??" जगन की सिट्टी पिट्टी गुम, सूखे गले को उसने अपने थूक से तर करने का प्रयास किया फिर बड़ी मुश्किल से उसके गले से आवाज़ निकली____"अ...आख़िर क..कौन हो तुम लोग, अ...और ऐसा क्यों कह रहे हो??"

जगन की बात का उनमें से किसी ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि तीनों ने पहले एक दूसरे की तरफ देखा और फिर बिजली की तरह झपट पड़े उस पर। जगन को ऐसा लगा जैसे एकदम से उसके सिर पर गाज गिर गई है। वो मारे डर के हलक फाड़ कर चिल्ला उठा था मगर तभी उनमें से एक ने उसके मुख को अपने हाथों से भींच लिया। जगन को तीनों ने पकड़ लिया था और वो उनसे छूटने के लिए जी तोड़ कोशिश करने लगा था मगर छूट नहीं पाया। उसका बुरी तरह से छटपटाना उस वक्त एकदम से शांत पड़ गया जब उनमें से एक ने उसकी आंखों के सामने तेज़ धार वाला खंज़र दिखाते हुए ये कहा था कि अब अगर चीखा चिल्लाया तो ये खंज़र हलक में घुसेड़ दूंगा।

✮✮✮✮

मैं जानता था कि ऐसे माहौल में मेरा हवेली से अकेले निकालना कहीं से भी उचित नहीं था मगर अब मैं इसका क्या करता कि मुझसे सब्र ही नहीं हो रहा था। मेरे अंदर आक्रोश, गुस्सा और बदले की आग इस क़दर तांडव सा कर रही थी जिसे काबू में रख पाना अब मेरे बस में नहीं था। पिता जी ने जो पिस्तौल मुझे दिया था उसे ले कर मैं हवेली से निकल आया था और इस बात का ख़ास ध्यान रखा था कि किसी की नज़र मुझ पर न पड़े। शाम का अंधेरा मेरे लिए बेहद उपयोगी साबित हुआ था जिसके चलते हवेली से बाहर निकल आने में मुझे कोई समस्या नहीं हुई थी।

मैं एक गमछा ले रखा था जिससे मैंने अपना चेहरा ढंक लिया था और पैदल ही चलते हुए उस तरफ आ गया था जहां से एक रास्ता नदी की तरफ जाता था। यहां पर रुक कर अभी मैं इधर उधर देखने ही लगा था कि तभी मेरी नज़र एक साए पर पड़ी। साए को देख कर मेरे जबड़े भिंच गए और साथ ही मेरे अंदर गुस्से में इज़ाफा होने लगा। मैं अपनी जगह पर बेख़ौफ खड़ा उस साए को देख ही रहा था कि तभी मैं हल्के से चौंका। ऐसा इस लिए क्योंकि साया मुझे देखने के बाद भी नहीं रुका था और मेरी ही तरफ बढ़ा चला आ रहा था। अंधेरा इतना भी नहीं था कि कुछ दूरी का दिखे ही नहीं। जल्दी ही वो साया मेरे क़रीब आ गया।

"नमस्ते छोटे कुंवर।" वो साया मेरे पास आते ही अदब से बोला तो मैं उसे पहचान गया। वो मेरा ही ख़बरी था। उसके नमस्ते कहने पर मैंने हल्के से सिर हिलाया और फिर कहा____"इस तरह कहां घूमते फिर रहे हो तुम?"

"आपके ही काम में लगा हुआ था कुंवर।" उस व्यक्ति ने कहा जिसका नाम मंगू था____"और एक अच्छी ख़बर देने के लिए आपके ही पास हवेली आ रहा था कि आप यहीं मिल गए मुझे।"

"कैसी ख़बर की बात कर रहे हो तुम?" मैंने सपाट लहजे में उससे पूछा तो उसने कहा____"आपके कहने पर हम लोग मुरारी के छोटे भाई जगन की खोजबीन में लगे हुए थे।"

"तो क्या मिल गया वो?" मैं उत्सुकता और उत्तेजना के चलते पूछ बैठा।
"हां कुंवर।" मंगू ने गर्मजोशी से कहा____"अभी कुछ देर पहले ही हमने उसे पकड़ा है। हालाकि ये बड़े ही इत्तेफ़ाक से हुआ है लेकिन आख़िर वो मिल ही गया हमें।"

"तो कहां हैं वो?" जगन मिल ही नहीं गया है बल्कि पकड़ में भी आ गया है इस बात ने मेरे अंदर एक अलग ही जोश भर दिया था और गुस्सा भी। मैं अपनी मुट्ठी में उसकी गर्दन दबोचने के लिए जैसे मचल ही उठा।

"आपके आमों वाले बाग़ में जो मकान है न।" मंगू ने जवाब दिया____"हमने उसे वहीं पर पकड़ कर रखा है। संपत और दयाल उसके पास वहीं पर हैं जबकि मैं इस बात की सूचना देने के लिए हवेली जा रहा था कि आप यहीं मिल गए मुझे।"

मंगू की बात सुन कर मेरे होठों पर ज़हरीली मुस्कान उभर आई। मैंने उसे चलने का इशारा किया तो वो मुझे रास्ता दे कर मेरे पीछे पीछे चलने लगा। जल्दी ही मैं मंगू के साथ अपने बाग़ वाले मकान में पहुंच गया। मैंने मंगू को रोक कर उसे एक काम सौंपा और जल्द से जल्द आने को कहा तो वो फ़ौरन ही पलट कर चला गया। उसके जाने के बाद मैं मकान के अंदर दाखिल हो गया। अंदर मुझे हल्का उजाला नज़र आया। मैं समझ गया कि संपत और दयाल ने शायद चिमनी जला रखी है।

कुछ ही पलों में मैं उस कमरे में दाखिल हुआ जिसमें संपत और दयाल जगन को कैद किए मौजूद थे। जगन की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी तो भय से उसका चेहरा पीला पड़ गया। मारे ख़ौफ के वो जूड़ी के मरीज़ की तरह कांपने लगा। संपत और दयाल ने उसे रस्सियों में बांध दिया था जिसके चलते वो कहीं भाग नहीं सकता था। उसे देखते ही मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी सा धधक उठा जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से शांत करने की कोशिश की।

"म..मुझे म..माफ़ कर दो वैभव।" मैं जैसे ही उसके क़रीब पहुंचा तो जगन ने भयभीत हो कर ये कहा। उसके मुख से जैसे ही मैंने ये सुना तो मुझे एकदम से गुस्सा आ गया और मैंने खींच के एक थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिया जिससे वो वहीं उलट गया।

"वैभव नहीं।" मैंने उसको गिरेबान से पकड़ कर उठाते हुए गुस्से में कहा____"छोटे ठाकुर बोल, छोटे ठाकुर। वैभव कहने का अधिकार खो दिया है तूने।"

मेरे ख़तरनाक तेवर देख जगन की हालत और भी ख़राब हो गई। उसके मुख से कोई आवाज़ न निकली। तभी मैंने देखा कि मारे दहशत के उसका पेशाब छूट गया। कमरे के फर्श पर उसका पेशाब फैलता जा रहा था। ये देख मुझे उसके ऊपर और भी गुस्सा आ गया।

"अभी तो पेशाब ही निकला है तेरा।" मैं उसे छोड़ कर उससे दूर हटते हुए बोला____"जल्दी ही तेरी गांड़ से टट्टी भी इसी तरह निकलेगी। मन तो करता है कि इसी वक्त तेरी जान ले लूं मगर नहीं उससे पहले तू किसी रट्टू तोते की तरह वो सब बताएगा जो जो तूने कुकर्म किए हैं।"

इससे पहले कि वो कुछ बोलता मैं पलटा और संपत तथा दयाल की तरफ देखते हुए कहा___"मंगू के आने के बाद इसे घसीटते हुए इसके गांव ले चलना और हां इस बात की ज़रा भी परवाह मत करना कि घसीटने की वजह से इसकी क्या दुर्गति हो जाएगी।"

ये कह कर मैं बाहर आ गया। असल में मुझे इतना गुस्सा आया हुआ था कि मैं जगन के साथ कुछ भी बुरा कर सकता था जबकि फिलहाल उसका ज़िंदा रहना ज़रूरी था। बाहर आ कर मैं लकड़ी के एक छोटे से तख्त पर बैठ गया और मंगू के आने का इंतजार करने लगा। क़रीब बीस मिनट बाद मंगू आया जोकि भुवन के साथ उसकी मोटर साईकिल पर ही था। भुवन ने मुझे अदब से सलाम किया तो मैंने उसे चलने का इशारा किया और मंगू को पीछे आने को कहा।

✮✮✮✮

सरोज काकी गुमसुम सी बैठी हुई थी। उसके मन मस्तिष्क में हवेली में हुई घटना से संबंधित ही बातें चल रहीं थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि हवेली में इतनी बड़ी घटना घट गई है। जब से उसने इस घटना के बारे में सुना था तब से उसके मन में सोच विचार चालू था। यही हाल उसकी बेटी अनुराधा का भी था, बल्कि अगर ये कहा जाए तो ज़्यादा बेहतर होगा कि उसका तो बुरा ही हाल था। ये अलग बात है कि वो अपने हाल को दिल के हाल की ही तरह अपनी मां को ज़ाहिर नहीं होने दे रही थी।

"ऐसे कब तक बैठी रहेगी मां?" अनुराधा ने उदास भाव से अपनी मां की तरफ देखते हुए पूछा____"खाना नहीं बनाएगी क्या? अनूप कई बार कह चुका है कि उसे भूख लगी है।"

"उसके लिए तू ही कुछ बना दे अनु।" सरोज ने बुझे बन से कहा____"और अपने लिए भी। मुझे तो बिल्कुल ही भूख नहीं है।"

अपनी मां की बात सुन कर अनुराधा ने मन ही मन कहा____'भूख तो मुझे भी नहीं है मां।' और फिर वो अनमने भाव से रसोई की तरफ बढ़ गई। एक चिमनी आंगन में उजाला करने के लिए जल रही थी जबकि दूसरी चिमनी ले कर अनुराधा रसोई में चली गई। उसका छोटा भाई अनूप अपनी मां के पास ही एक खिलौना लिए बैठा था।

सरोज के ज़हन से हवेली की घटना जा ही नहीं रही थी। बार बार उसके ख़्यालों में वैभव भी आ जाता था जिसके बारे में सोच कर उसे बड़ा दुख हो रह था। अभी वो ये सब सोच ही रही थी कि तभी घर के बाहर किसी वाहन की आवाज़ उसे सुनाई दी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कोई वाहन उसके घर के बाहर ही आ कर रुक गया है। शाम के वक्त किसी वाहन के बारे में सोच सरोज को थोड़ा अजीब सा लगा क्योंकि उसके मन में हवेली की घटना भी चल रही थी। सरोज के अंदर एक भय सा पैदा हो गया। एक तो वैसे भी उसका घर गांव से बाहर एकांत में बना हुआ था इस लिए अगर कोई ऐसी वैसी बात हो जाती तो उसकी मदद के लिए कोई आ भी नहीं सकता था।

सरोज फ़ौरन ही उठ कर खड़ी हो गई और बाहर वाले किवाड़ को देखने लगी। उसके मन में तरह तरह के ख़याल आने लगे थे। तभी किसी ने बाहर वाला किवाड़ बजाया तो सरोज एकदम से घबरा गई। उसे समझ न आया कि शाम के इस वक्त कौन आया होगा? किवाड़ बजाने की आवाज़ रसोई तक भी गई थी जिसे अनुराधा ने भी सुन लिया था।

"बाहर कोई आया है क्या मां?" अनुराधा ने रसोई के अंदर से ही पूछा।
"लगता तो ऐसा ही है अनु।" सरोज ने अपनी घबराहट को छुपाते हुए कहा____"रुक देखती हूं कौन है बाहर। तू रसोई में ही रह।"

कहने के साथ ही सरोज दरवाज़े की तरफ बढ़ चली। धड़कते दिल के साथ अभी वो कुछ ही क़दम चली थी कि किवाड़ फिर से बजाया गया और साथ ही एक मर्दाना आवाज़ भी आई। सरोज ने महसूस किया कि आवाज़ जानी पहचानी है लेकिन किसकी है ये उसे ध्यान में नहीं आ रहा था। ख़ैर कुछ ही देर में उसने जा कर दरवाज़ा खोला तो देखा बाहर भुवन खड़ा था और साथ ही उसके पीछे कुछ और भी लोग थे।

"तुम भुवन हो ना?" सरोज ने भुवन को देखते हुए पूछा तो भुवन ने हां में सिर हिलाते हुए कहा____"हां काकी मैं भुवन ही हूं। वो बात ये है कि छोटे ठाकुर आए हैं।"

"क..क्या तुम वैभव की बात कर रहे हो बेटा?" सरोज को जैसे यकीन ही न हुआ था। उसके पूछने पर भुवन ने एक बार फिर से हां में सिर हिलाया और एक तरफ हट गया। वो जैसे ही हटा तो सरोज की नज़र कुछ ही दूरी पर खड़ी मोटर साईकिल पर पड़ी जिसमें मैं बैठा हुआ था।

"तुम वहां क्यों बैठे हो वैभव बेटा?" सरोज ने व्याकुल भाव से कहा____"अंदर आओ न।"
"नहीं काकी।" मैंने कहा____"मैं यहीं पर ठीक हूं। असल में इस वक्त मेरे यहां आने की एक ख़ास वजह है।"

"कोई भी वजह हो।" सरोज ने कहा____"मुझे इससे मतलब नहीं है। तुम बस अंदर आओ।"
"ज़िद मत करो काकी।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"मैंने कहा न कि मैं यहीं पर ठीक हूं। ख़ैर मैं तुम्हें ये बताने आया हूं कि जिसने मुरारी काका की हत्या की थी उसे पकड़ लिया है मैंने और उसको ले कर आया हूं।"

मेरी बात सुनते ही सरोज काकी एकदम बुत सी बनी खड़ी रह गई। मैं समझ सकता था कि ये बात सुनते ही उसके अंदर भीषण हलचल सी मच गई होगी। अभी मैं उसके मुख से कुछ सुनने का इंतज़ार ही कर रहा था कि तभी मेरी नज़र उसके पीछे अभी अभी आई अनुराधा पर पड़ी। अपनी मां के पीछे खड़ी वो एकटक मुझे ही देखने लगी थी। इधर उसको देखते ही मेरे दिल की धड़कनें एकाएक ही तेज़ हो गईं। मैंने महसूस किया कि वो मुझसे अपनी नज़रें नहीं हटा रही है। आम तौर पर पहले ऐसा नहीं होता था। यानि इसके पहले जब भी हमारी नज़रें आपस में मिलती थीं तो वो अपनी नज़रें झुका लेती थी जबकि इस वक्त वो बिना पलकें झपकाए मुझे ही देखे जा रही थी। उसके चेहरे पर ज़माने भर की उदासी और दुख संताप नज़र आया मुझे।

"य..ये तुम क्या कह रहे हो बेटा?" तभी सरोज ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा____"क्या सच में तुम मेरे मरद के हत्यारे को पकड़ कर साथ ले आए हो?"

"मैंने तुमसे वादा किया था न काकी कि मुरारी काका के हत्यारे को एक दिन ज़रूर तुम्हारे सामने ले कर आऊंगा।" मैंने अनुराधा से नज़र हटा कर कहा____"इस लिए आज मैं उसे ले कर आया हूं। मुझे यकीन है कि हत्यारे की शकल देखने के बाद तुम्हें उसके द्वारा की गई जघन्य हत्या पर भरोसा नहीं होगा लेकिन सच तो सच ही होता है न। एक और बात, ये वो हत्यारा है जिसने मुरारी काका की हत्या तो की ही साथ में इसने हवेली के साथ भी गद्दारी की है। ऐसे व्यक्ति को ज़िंदा रहने का अब कोई हक़ नहीं है।"

मेरी बातें सुन कर सरोज काकी हैरत से देखती रह गई मेरी तरफ। मेरी नज़र एक बार फिर से उसके पीछे खड़ी अनुराधा पर पड़ी। वो अब भी मुझे ही देखे जा रही थी। ऐसा लग रहा था मानों उसने मुझे कभी देखा ही न रहा हो।

तभी वातावरण में कुछ आवाज़ें सुनाई दी तो हम सबका ध्यान उस तरफ गया। संपत, दयाल और मंगू घसीटते हुए जगन को लाते नज़र आए। जब वो क़रीब आ गए तो मैने देखा जगन के कपड़े जगह जगह से फट गए थे। मैं समझ गया कि उसकी हालत ख़राब है।

"रहम छोटे ठाकुर रहम।" जगन की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी तो वो हांफते हुए और दर्द से कराहते हुए बोल पड़ा।

"क्या तुम्हें लगता है कि तुम रहम के क़ाबिल हो?" मैंने कहने के साथ ही सरोज की तरफ देखा और फिर कहा____"काकी, मिलो अपने पति के हत्यारे से। इसी ने अपने बड़े भाई की हत्या की थी, और जानती हो क्यों? क्योंकि इसे अपने भाई की ज़मीन जायदाद को हड़पना था।"

मेरी बात सुनते ही सरोज काकी को मानो होश आया। अनुराधा भी बुरी तरह सन्नाटे में आ गई थी। दोनों मां बेटी जगन को ऐसे देखने लगीं थी मानो वो कोई भूत हो। तभी अचानक सरोज काकी को जाने क्या हुआ कि वो तेज़ी से बाहर निकली और जगन के क़रीब आ कर उसे मारते हुए चीख पड़ी_____"तुमने मेरे मरद की जान ली कमीने? अपने भाई की हत्या करते हुए क्या तेरे हाथ नही कांपे? हत्यारे पापी, मेरी मांग का सिंदूर मिटाने वाले मैं तुझे जिंदा नहीं छोडूंगी।"

सरोज काकी जाने क्या क्या कहते हुए जगन को मारे जा रही थी। उधर जगन जो पहले से ही बुरी हालत में था वो और भी दर्द से कराहने लगा था। अनुराधा अपनी जगह पर खड़ी आंसू बहा रही थी। मैंने भुवन को इशारा किया तो भुवन ने आगे बढ़ कर सरोज काकी को जगन से दूर कर दिया। भुवन के दूर कर देने पर भी सरोज काकी मचलती रही।

"मुझे छोड़ दो भुवन।" काकी रोते हुए चीखी____"मैं इस हत्यारे की जान लेना चाहती हूं। इसने मेरे मासूम से बच्चों को अनाथ कर दिया है। मैं भी इसकी हत्या कर के इसके बच्चों को अनाथ कर देना चाहती हूं। फिर देखूंगी कि इसकी बीवी पर क्या गुज़रती है?"

"शांत हो जाओ काकी।" मैंने कहा____"इसने जो किया है उसकी सज़ा तो इसे ज़रूर मिलेगी लेकिन यहां नहीं बल्कि हवेली में। इसने हमारे दुश्मनों के साथ मिल कर हमारे साथ भी खेल खेला है। इस लिए इसके कुकर्मों का हिसाब हवेली में ही होगा।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भौजी।" जगन ने रोते हुए कहा____"मैं वो सब करने के लिए मजबूर हो गया था। कर्ज़ के चलते मेरी सारी ज़मीनें गिरवी हो गईं थी। एक एक पाई के लिए मोहताज हो गया था मैं। चार चार बच्चों के साथ अपना पेट भरना बहुत मुश्किल हो गया था। भैया को बता भी नहीं सकता था कि कर्ज़ के चलते सारी ज़मीनें मैंने गिरवी रख दी हैं। अगर भैया को पता चलता तो वो बहुत गुस्सा होते। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं? फिर एक दिन एक अजीब सा आदमी मिला जिसने मुझे इन सारी परेशानियों से मुक्त होने का उपाय बताया। मैं अपनी परेशानियों से मुक्त तो होना चाहता था लेकिन अपने भाई की जान की कीमत पर नहीं। मैंने बहुत सोचा लेकिन इसके अलावा दूसरा कोई चारा नज़र नहीं आया। कहीं और से कोई कर्ज़ भी नहीं मिल रहा था। गांव के बड़े लोग कर्ज़ देने से मना कर चुके थे, देते भी कैसे? मेरे पास तो अब ज़मीनें भी नहीं बची थीं जिससे वो अपनी वसूली कर लेते। मजबूर हो कर मुझे उस अजीब आदमी की बात माननी ही पड़ी। उसने बताया कि ऐसा करने से मेरे सारे दुख दूर हो जाएंगे और साथ ही अपने भाई की हत्या करने से भी मुझे कुछ नहीं होगा। क्योंकि भैया की हत्या का इल्ज़ाम छोटे ठाकुर पर लगा दिया जाता।"

"नीच इंसान।" सरोज काकी जगन को मारने के लिए झपटी ही थी कि भुवन ने उसे पकड़ लिया, जबकि वो मचलते हुए बोली____"मुझे छोड़ो भुवन, मैं इस हत्यारे की जान ले लेना चाहती हूं। इसने अपने भले के लिए मेरा सब कुछ बर्बाद कर दिया है।"

"इसके गंदे खून से अपने हाथ मैले मत करो काकी।" मैंने कठोरता से कहा____"इसने जो किया है उसकी सज़ा इसे हवेली में मिलेगी। ख़ैर, मैंने अपना वादा पूरा कर दिया है काकी। तुमसे बस इतना ही कहूंगा कि आज कल हालात बहुत ख़राब हैं इस लिए बेवक्त घर से बाहर मत निकलना। बाकी तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करने के लिए भुवन है। ये तुम सबका ध्यान रखेगा। अच्छा अब चलता हूं, अपना ख़याल रखना।"

कहने के साथ ही मैंने अनुराधा की तरफ देखा तो पाया कि वो मुझे ही देख रही थी। उसकी आंखों में आसूं थे और चेहरे पर ज़माने भर का दर्द। ऐसा लगा जैसे वो मुझसे बहुत कुछ कहना चाहती है मगर अपनी बेबसी के चलते वो चुप थी। मैंने उससे नज़रें हटा ली और भुवन को चलने का इशारा किया।

कुछ ही पलों में हमारा काफ़िला फिर से चल पड़ा लेकिन इस बार ये काफ़िला हवेली की तरफ चल पड़ा था। संपत, दयाल और मंगू जगन को घसीटते हुए फिर से ले चले थे। जगन की हालत बेहद ख़राब थी। उसके पैरों में अब मानों जान ही नहीं थी। वो लड़खड़ाते हुए चल रहा था। कभी कभी वो गिर भी जाता था जिससे तीनों उसे घसीटने लगते थे। कच्ची मिट्टी पर जब शरीर रगड़ खाता तो वो दर्द से चिल्लाने लगता था और फिर जल्दी ही उठने की कोशिश करता। मैंने मंगू से कह दिया था कि अब उसे ज़्यादा मत घसीटे क्योंकि ऐसे में उसकी जान भी जा सकती थी। फिलहाल उसका ज़िंदा रहना ज़रूरी था। उससे बहुत कुछ जानना शेष था।


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मुरारी की हत्या उसके छोटे भाई जगन ने ही की है ये कोई नई बात नहीं है पहले राज करने के लिए और अब जमीन जायदाद के लिए अपनो का खून कर देते हैं
जगन पकड़ा गया है लेकिन हमे नही लगता कि वह नकाबपोश के बारे में ज्यादा कुछ जानता है ना तो वह उसका ठिकाना जानता है ना ही उसकी शक्ल देखी है?
वैभव और अनुराधा अपने मन में हजारों सवाल लिए एक दूसरे के सामने होते हुए भी अनकहे रह गए
 

avsji

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Supreme
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गर कुल्हाड़ी में लकड़ी का दस्ता न होता, तो लकड़ी के कटने का रस्ता न होता!
भीतरघात से बच पाना बड़ा कठिन होता है - इसीलिए पहले मैं भी यही सोच रहा था कि इस पूरे षड्यंत्र में घर कर ही कोई होगा।
लेकिन फिर चाचा की हत्या से वो थ्योरी बिखर गई! बढ़िया रहस्य बनाया है TheBlackBlood भाई!
अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा! :)
 

Sanju@

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अध्याय - 66
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अब तक....

कुछ ही पलों में हमारा काफ़िला फिर से चल पड़ा लेकिन इस बार ये काफ़िला हवेली की तरफ चल पड़ा था। संपत, दयाल और मंगू जगन को घसीटते हुए फिर से ले चले थे। जगन की हालत बेहद ख़राब थी। उसके पैरों में अब मानों जान ही नहीं थी। वो लड़खड़ाते हुए चल रहा था। कभी कभी वो गिर भी जाता था जिससे तीनों उसे घसीटने लगते थे। कच्ची मिट्टी पर जब शरीर रगड़ खाता तो वो दर्द से चिल्लाने लगता था और फिर जल्दी ही उठने की कोशिश करता। मैंने मंगू से कह दिया था कि अब उसे ज़्यादा मत घसीटे क्योंकि ऐसे में उसकी जान भी जा सकती थी। फिलहाल उसका ज़िंदा रहना ज़रूरी था। उससे बहुत कुछ जानना शेष था।

अब आगे....

हवेली में उस वक्त सन्नाटा सा गया जब पता चला कि वैभव अपने कमरे में नहीं है। सब के सब बदहवास से हो कर पूरी हवेली में वैभव को खोजने लगे। जब वो कहीं न मिला तो सबके सब सन्नाटे में आ गए। एक तो वैसे ही घर के दो दो अज़ीज़ व्यक्तियों की दुश्मनों ने हत्या कर दी थी जिसका दुख और ज़ख्म अभी पूरी तरह ताज़ा ही था दूसरे अब वैभव का इस तरह से ग़ायब हो जाना मानों सबकी जान हलक में अटका देने के लिए काफी था।

बात दादा ठाकुर के संज्ञान में आई तो वो भी सदमे जैसी हालत में आ गए। उनका मित्र अर्जुन सिंह और समधी बलभद्र सिंह उनके साथ ही बैठक में बैठे हुए थे। वो तीनों भी वैभव के इस तरह हवेली से ग़ायब होने की बात सुन कर सकते में आ गए थे। हवेली की औरतों का एक बार फिर से रोना धोना शुरू हो गया था। हवेली की ठकुराईन सुगंधा देवी रोते बिलखते हुए बैठक में आईं और दादा ठाकुर के सामने आ कर उन्हें इस तरह से देखने लगीं जैसे पल भर वो उन्हें भस्म कर देंगी।

"आप यहां अपने ऊंचे सिंहासन पर बैठे हुए हैं और मेरा बेटा हवेली से ग़ायब है।" सुगंधा देवी गुस्से में चीख ही पड़ीं____"एक बात कान खोल कर सुन लीजिए ठाकुर साहब अगर मेरे बेटे को कुछ हुआ तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। आपकी इस हवेली को आग लगा दूंगी मैं और उसी आग में खुद भी जल कर ख़ाक हो जाऊंगी। उसके बाद आप शान से जीते रहना।"

"शांत हो जाएं ठकुराईन।" अर्जुन सिंह ने बड़ी नम्रता से कहा____"आपके बेटे को कुछ नहीं होगा। दुनिया का कोई भी माई का लाल आपके बेटे को हानि नहीं पहुंचा सकता। अरे! आपका बेटा शेर है शेर। वो ज़रूर यहीं कहीं आस पास ही होगा। थोड़ी देर में आ जाएगा। बस आप धीरज से काम लीजिए और ठाकुर साहब को कुछ मत कहिए। ये वैसे ही बहुत दुखी हैं।"

"अगर ये सच में दुखी होते।" सुगंधा देवी ने उसी तरह चीखते हुए कहा____"तो इस वक्त ये अपने बेटे की ग़ायब होने वाली बात सुन कर यूं चुप चाप बैठे न होते। दुश्मनों ने इनके भाई और इनके बेटे को मार डाला और ये ख़ामोशी से अपने सिंहासन पर बैठे हुए हैं। मैं हमेशा ये सोच कर खुश हुआ करती थी कि ये अपने पिता की तरह गुस्सैल और खूंखार स्वभाव के नहीं हैं लेकिन आज प्रतीत होता है कि इन्हें अपने पिता की तरह ही होना चाहिए था। आज मुझे महसूस हो रहा है कि ठाकुर खानदान का खून इनकी तरह ठंडा नहीं होना चाहिए जो अपने घर के दो दो सदस्यों की हत्या होने के बाद भी न खौले और अपने दुश्मनों का नामो निशान मिटा देने की क्षमता भी न रखे।"

"ये आप क्या कह रही हैं ठकुराईन?" अर्जुन सिंह सुगंधा देवी के तेवर देख पहले ही हैरान परेशान था और अब ऐसी बातें सुन कर आश्चर्य में भी पड़ गया था, बोला____"कृपया शांत हो जाइए और भगवान के लिए ऐसी बातें मत कीजिए।"

"कैसे मित्र हैं आप?" सुगंधा देवी अर्जुन सिंह से मुखातिब हुईं_____"कि इतना कुछ होने के बाद भी आप शांति की बातें कर रहे हैं। शायद आपका खून भी इनकी तरह ही ठंडा पड़ चुका है। अपने आपको दादा ठाकुर और ठाकुर साहब कहलवाने वाले दो ऐसे कायरों को देख रही हूं जो दुश्मनों के ख़ौफ से औरतों की तरह घर में दुबके हुए बैठे हैं। धिक्कार है ठाकुरों के ऐसे ठंडे खून पर।"

"समधन जी।" बलभद्र सिंह ने हिचकिचाते हुए कहा____"हम आपकी मनोदशा को अच्छी तरह समझते हैं किंतु ठाकुर साहब के लिए आपका ये सब कहना बिल्कुल भी उचित नहीं है। आवेश और गुस्से में आप क्या क्या बोले जा रही हैं इसका आपको ख़ुद ही अंदाज़ा नहीं है। देखिए, हम आपकी बेहद इज्ज़त करते हैं और यही चाहते हैं कि ऐसे अवसर पर आप संयम से काम लें। एक बात आप अच्छी तरह जान लीजिए कि ये जो कुछ भी हुआ है उसका बदला ज़रूर लिया जाएगा। हत्यारे ज़्यादा दिनों तक इस दुनिया में जी नहीं पाएंगे।"

"क्या कर लेंगे ये?" सुगंधा देवी का गुस्सा मानों अभी भी शांत नहीं हुआ था, बोलीं____"सच तो ये है कि ये हत्यारों का कुछ बिगाड़ ही नहीं पाएंगे समधी जी। अरे! इन्हें तो ये तक पता नहीं है कि इनके अपनों की हत्या करने वाले आख़िर हैं कौन? आपको अभी यहां के हालातों के बारे में पता नहीं है। ये जो आस पास के गावों का फ़ैसला करते हैं न इन्हें खुद नहीं पता कि हवेली और हवेली में रहने वालों पर इस तरह का संकट पैदा करने वाला कौन है? आप खुद सोचिए कि जब इन्हें कुछ पता ही नहीं है तो ये आख़िर क्या कर लेंगे किसी का? अभी दो लोगों की हत्या की है हत्यारों ने आगे बाकियों की भी ऐसे ही हत्या कर देंगे और ये कुछ नहीं कर सकेंगे। क्या इनके पास इस बात का कोई जवाब है कि इनके यहां बैठे रहने के बाद भी मेरा बेटा हवेली से कैसे ग़ायब हो गया? और इनके पास ही क्यों बल्कि आप दोनों के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं है।"

सुगंधा देवी की इन बातों को सुन कर बलभद्र सिंह को समझ ही न आया कि अब वो क्या कहें? ये सच था कि उन्हें यहां के हालातों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी किंतु जितनी भी अभी हुई थी और जो कुछ ठकुराईन द्वारा अभी उन्होंने सुना था उससे वो अवाक से रह गए थे।

"अर्जुन सिंह।" एकदम से छा गए सन्नाटे को चीरते हुए दादा ठाकुर ने अजीब भाव से कहा____"अब हम और सहन नहीं कर सकते। हम इसी वक्त अपने दुश्मनों को मिट्टी में मिलाने के लिए यहां से जाना चाहते हैं।"

"य...ये आप क्या कह रहे हैं ठाकुर साहब?" दादा ठाकुर को सिघासन से उठ गया देख अर्जुन सिंह चौंके, फिर बोले____"देखिए आवेश में आ कर आप ऐसा कोई भी क़दम उठाने के बारे में मत सोचिए। ठकुराईन की बातों से आहत हो कर आप बिना सोचे समझे कुछ भी ऐसा नहीं करेंगे जिससे कि बाद में आपको खुद ही पछताना पड़े।"

"हमें पछताना मंज़ूर है अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर ने सख़्त भाव से कहा____"लेकिन अब दुश्मनों को ज़िंदा रखना मंज़ूर नहीं है। आपकी ठकुराईन ने सच ही तो कहा है कि इतना कुछ होने के बाद भी हमारा खून नहीं खौला बल्कि बर्फ़ की मानिंद ठंडा ही पड़ा हुआ है। ऊपर से हमारे छोटे भाई और बेटे की आत्मा भी ये देख कर दुखी ही होंगी कि हम उनकी हत्या का बदला नहीं ले रहे। वो दोनों हमें माफ़ नहीं करेंगे। हमें अब मर जाना मंज़ूर है लेकिन कायरों की तरह यहां बैठे रहना हर्गिज़ मंज़ूर नहीं है।"

दादा ठाकुर की बातें सुन कर अर्जुन सिंह अभी कुछ बोलने ही वाले थे कि तभी बाहर से किसी के आने की आहट हुई और फिर चंद ही पलों में मैं बैठक के सामने आ कर खड़ा हो गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही मां भागते हुए मेरे पास आईं और मुझे अपने सीने से छुपका कर रो पड़ीं।

"कहां चला गया था तू?" मुझे अपने कलेजे से लगाए वो रोते हुए कह रहीं थी____"तुझे हवेली में न पर कर मेरी तो जान ही निकल गई थी। तू इस तरह अपनी मां को छोड़ कर क्यों चला गया था? तुझे कुछ हुआ तो नहीं न?"

कहने के साथ ही मां ने मुझे खुद से अलग किया और फिर पागलों की तरह मेरे जिस्म के हर हिस्से को छू छू कर देखने लगीं। मां की इस हालत को देख कर मेरे दिल में बेहद पीड़ा हुई लेकिन फिर मैंने किसी तरह खुद को सम्हाला और मां से कहा____"मुझे कुछ नहीं हुआ है मां। मैं एकदम ठीक हूं, और मुझे माफ़ कर दीजिए जो मैं बिना किसी को कुछ बताए हवेली से यूं चला गया था।"

"अपने दो बेटों को खो चुकी हूं मैं।" मां की आंखें छलक पड़ीं, मेरे चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों के बीच ले कर करुण स्वर में बोलीं____"अब तुझे नहीं खोना चाहती। मुझे वचन दे कि आज के बाद तू कभी भी इस तरह कहीं नहीं जाएगा।"

"ठीक है मां।" मैंने कहा____"मैं आपको वचन देता हूं। अब शांत हो जाइए और अंदर जाइए।"
"पर तू इस तरह कहां चला गया था?" मां ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"और किसी को बताया क्यों नहीं?"

मैंने मां को किसी तरह बहलाया और उन्हें अंदर भेज दिया। असल में मैं उन्हें सच नहीं बताना चाहता था वरना वो परेशान भी हो जातीं और मुझ पर गुस्सा भी करतीं।

"वैभव बेटा आख़िर ये सब क्या है?" मां के जाने के बाद अर्जुन सिंह ने मुझसे कहा____"तुम बिना किसी को कुछ बताए इस तरह कहां चले गए थे? क्या तुम्हें मौजूदा हालातों की गंभीरता का ज़रा भी एहसास नहीं है? अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो जानते हो कितना गज़ब हो जाता?"

"माफ़ कीजिए चाचा जी।" मैंने शांत भाव से कहा और फिर पिता जी से मुखातिब हुआ____"आप भी मुझे माफ़ कर दीजिए पिता जी। मैं जानता हूं कि मुझे इस तरह हवेली से बाहर नहीं जाना चाहिए था लेकिन मैं ऐसी मानसिक अवस्था में था कि खुद को रोक ही नहीं पाया। हालाकि एक तरह से ये अच्छा ही हुआ क्योंकि मेरा इस तरह से बाहर जाना बेकार नहीं गया।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" पिता जी ने नाराज़गी से मेरी तरफ देखा।
"असल में बात ये है कि मेरे आदमियों ने मुरारी के भाई जगन को पकड़ लिया है।" मैंने कहा____"और इस वक्त वो बाहर ही है। मेरे आदमियों के कब्जे में।"

मेरी बात सुन कर सबके चेहरों पर हैरत के भाव उभर आए। उधर पिता जी ने कहा____"उसे फ़ौरन हमारे सामने ले कर आओ।"

पिता जी के कहने पर मैंने एक दरबान को भेज कर जगन को बुला लिया। जगन बुरी तरह डरा हुआ था और साथ ही उसकी हालत भी बेहद खस्ता थी। जैसे ही वो दादा ठाकुर के सामने आया तो वो और भी ज़्यादा खौफ़जदा हो गया। पिता जी ने क़हर भरी नज़रों से उसकी तरफ देखा।

"मुझे माफ़ कर दीजिए दादा ठाकुर।" जगन आगे बढ़ कर पिता जी के पैरों में ही लोट गया, फिर बोला____"मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं हर तरह से मजबूर हो गया था ये सब करने के लिए।"

"तुमने जो किया है उसके लिए तुम्हें कोई माफ़ी नहीं मिल सकती।" पिता जी ने कठोर भाव से कहा____"तुम्हें सज़ा तो यकीनन मिलेगी लेकिन उससे पहले हम तुमसे ये जानना चाहते हैं कि तुमने ये सब क्यों किया? किसके कहने पर किया और कैसे किया? हम सब कुछ विस्तार से जानना चाहते हैं।"

"सब मेरी बदकिस्मती का ही नतीजा है दादा ठाकुर।" जगन ने दुखी हो कर कहा____"कर्ज़ में ऐसा डूबा कि फिर कभी उबर ही नहीं सका उससे। खेत पात सब गिरवी हो गए इसके बावजूद क़र्ज़ न चुका। हालात इतने ख़राब हो गए कि परिवार का भरण पोषण करना भी मुश्किल पड़ गया। अपनी ख़राब हालत के बारे में मुरारी भैया को बता भी नहीं सकता था क्योंकि वो नाराज़ हो जाते। उनसे न जाने कितनी ही बार मदद ले चुका था मैं, इस लिए अब उनसे सहायता लेने में बेहद शर्म आ रही थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं किस तरह से अपने सिर पर से कर्ज़ का बोझ हटाऊं और किस तरह से अपने परिवार का भरण पोषण करूं? दूसरी तरफ मेरा बड़ा भाई था जिसके सिर पर कर्ज़ का बोझ तो था लेकिन मेरी तरह उसकी हालत ख़राब नहीं थी। उसके पास खेत पात थे जिनसे वो अपना परिवार अच्छे से चला रहा था। सच कहूं तो ये देख कर अब मैं अपने ही भाई से ईर्ष्या के साथ साथ घृणा भी करने लगा था।"

"तो क्या इसी ईर्ष्या और घृणा की वजह से तुमने अपने भाई की हत्या कर दी थी?" पिता जी बीच में ही उसकी तरफ गुस्से से देखते हुए बोल पड़े थे।

"नहीं दादा ठाकुर।" जगन ने इंकार में सिर हिलाते हुए कहा____"ये सच है कि मैं अपने भाई से ईर्ष्या और घृणा करने लगा था लेकिन उसे जान से मार डालने के बारे में कभी नहीं सोचा था, बल्कि यही दुआ करता रहता था कि किसी वजह से उसे कुछ हो जाए ताकि उसका सब कुछ मेरा हो जाए। पर भला चमार के मनाए पड़वा थोड़ी ना मरता है, बस वही हाल था।"

"अगर ऐसी बात है।" अर्जुन सिंह ने कहा____"तो फिर अचानक से तुम्हारे मन में अपने भाई की हत्या करने का ख़याल कैसे आ गया था?"

"ये तब की बात है जब छोटे ठाकुर दादा ठाकुर के द्वारा गांव से निष्कासित किए जाने पर हमारे गांव के पास अपनी बंज़र पड़ी ज़मीन में रहते थे।" जगन ने गंभीर भाव से कहा____"इन्हें वहां पर रहते हुए काफी समय हो गया था। मैं ये भी जानता था कि मेरा भाई इनकी मदद करता था और मेरे भाई से इनके बेहतर संबंध थे जिसके चलते ये मेरे भाई के घर भी जाते रहते थे। मुझे ये देख कर भी अपने भाई से जलन होती थी कि उसके संबंध दादा ठाकुर के लड़के से थे। मैं जानता था कि उस समय भले ही छोटे ठाकुर निष्कासित किए जाने पर अपने घर से बेघर थे लेकिन एक न एक दिन तो वापस हवेली लौटेंगे ही और तब वो मेरे भाई के एहसानों का क़र्ज़ भी बेहतर तरीके से चुकाएंगे। ज़ाहिर है ऐसे में मेरे भाई की स्थिति पहले से और भी बेहतर हो जाती और मैं और भी बदतर हालत में पहुंच जाता। ये सब ऐसी बातें थी जिसके चलते मेरे मन में अपने भाई के प्रति और भी ज़्यादा जलन और नफ़रत पैदा होने लगी थी लेकिन इसके लिए मैं कुछ कर नहीं सकता था। बस अंदर ही अंदर घुट रहा था। फिर एक दिन वो हुआ जिसकी मैंने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी।"

"ऐसा क्या हुआ था?" जगन एकदम से चुप हो गया तो अर्जुन सिंह ने पूछ ही लिया____"जिसकी तुमने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी?"

"मैं बहुत ज़्यादा परेशान था।" जगन ने फिर से कहना शुरू किया____"अपने बच्चों को भूखा देख मैं उनके लिए बहुत चिंतित हो गया था। एक शाम मैं इसी परेशानी और चिंता में अपने उन खेतों में बैठा था जो गिरवी रखे हुए थे। शाम पूरी तरह से घिर चुकी थी और चारो तरफ अंधेरा फैल गया था। मैं सोचो में इतना खोया हुआ था कि मुझे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि एक रहस्यमय साया मेरे क़रीब जाने कहां से आ कर खड़ा हो गया था? जब उसने अपनी अजीब सी आवाज़ में मुझे पुकारा तो मैं एकदम से हड़बड़ा गया और जब उस पर मेरी नज़र पड़ी तो मैं बुरी तरह डर गया। मुझे समझ न आया कि आख़िर उसके जैसा व्यक्ति कौन हो सकता है और मेरे पास किस लिए आया है? मुझे लगा वो ज़रूर कोई ऐसा व्यक्ति है जिससे मैंने कर्ज़ ले रखा है और कर्ज़ न चुकाने की वजह से अब वो मेरी जान लेने आया है। ये सोच कर मैं बेहद खौफ़जदा हो गया और फ़ौरन ही उसके पैरों में पड़ कर उससे रहम की भीख मांगने लगा। तब उसने जो कहा उसे सुन कर मैं एकदम से हैरान रह गया। उसने कहा कि मुझे उससे न तो डरने की ज़रूरत है और ना ही इस तरह रहम की भीख मांगने की। बल्कि वो तो मेरे पास इस लिए आया है ताकि मेरी परेशानियों के साथ साथ मेरे हर दुख का निवारण भी कर सके। मैं सच कहता हूं दादा ठाकुर, सफ़ेद कपड़ों में ढंके उस रहस्यमय व्यक्ति की बातें सुन कर मैं बुत सा बन गया था। फिर मैंने खुद को सम्हाला और उससे पूछा कि क्या सच में वो मेरी समस्याओं का निवारण कर देगा तो जवाब में उसने कहा कि वो एक पल में मेरी हर समस्या को दूर कर देगा लेकिन बदले में मुझे भी कुछ करना पड़ेगा। इतना तो मैं भी समझ गया था कि अगर कोई व्यक्ति इस रूप में आ कर मेरी समस्याओं को दूर करने को बोल रहा है तो वो ये सब मुफ्त में तो करेगा नहीं। यानि बदले में उसे भी मुझसे कुछ न कुछ चाहिए ही था। मैं अब यही जानना चाहता था उससे कि बदले में आख़िर मुझे क्या करना होगा? तब उसने मुझसे कहा कि बदले में मुझे अपने भाई मुरारी की हत्या करनी होगी और उस हत्या का इल्ज़ाम छोटे ठाकुर पर लगाना होगा।"

जगन सांस लेने के लिए रुका तो बैठक में सन्नाटा सा छा गया। पिता जी, अर्जुन सिंह और भैया के चाचा ससुर यानि बलभद्र सिंह उसी की तरफ अपलक देखे जा रहे थे। पिता जी और अर्जुन सिंह के चेहरे पर तो सामान्य भाव ही थे किंतु बलभद्र सिंह के चेहरे कर आश्चर्य के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे। ज़ाहिर है ये सब उनके लिए नई और हैरतअंगेज बात थी।

"उस सफ़ेदपोश आदमी के मुख से ये सुन कर तो मैं सकते में ही आ गया था।" इधर जगन ने फिर से बोलना शुरू किया____"मेरी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के मेरी कनपटियों में बजती महसूस हो रहीं थी। मेरे मुंह से कोई लफ्ज़ नहीं निकल रहे थे। फिर जैसे मुझे होश आया तो मैंने उससे कहा कि ये क्या कह रहे हैं आप? आप होश में तो हैं? तो उसने कहा कि होश में तो मुझे रहना चाहिए। सच तो ये था कि उसकी बातों से मेरे मन में तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे। उसने मुझे समझाया कि ऐसा करने से मुझ पर कभी कोई बात नहीं आएगी। जब मैंने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है तो उसने मुझे कुछ ऐसा बताया जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। उसने कहा कि छोटे ठाकुर के नाजायज संबंध मेरे भाई की बीवी से हैं।"


जगन, मादरचोद ने सबके सामने मेरी इज्ज़त का जनाजा निकाल दिया था। चाचा ससुर ने जब उसके मुख से ये सुन कर मेरी तरफ हैरानी से देखा तो मेरा सिर शर्म से झुकता चला गया। ख़ैर, अब क्या ही हो सकता था।

"उस रहस्यमय व्यक्ति ने कहा कि छोटे ठाकुर के ऐसे नाजायज़ संबंध के आधार पर मुरारी की हत्या का इल्ज़ाम इन पर आसानी से लगाया जा सकता है।" उधर जगन मानों अभी भी मेरी इज्ज़त उतारने पर अमादा था, बोला____"यानि सबको ये कहानी बताई जाएगी कि छोटे ठाकुर ने मेरे भाई की हत्या इस लिए की है क्योंकि मेरे भाई को इनकी काली करतूत का पता चल गया था और वो दादा ठाकुर के पास जा कर इनकी करतूत बता कर उनसे इंसाफ़ मांगने की बात कहने लगा था। छोटे ठाकुर इस बात से डर गए और फिर इन्होंने ये सोच कर मेरे भाई की हत्या कर दी कि जब मुरारी ही नहीं रहेगा तो किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा। अपने मरद की हत्या होने के बाद सरोज भौजी को अगर ये पता भी हो जाता कि छोटे ठाकुर ने ही उसके मरद की हत्या की है तो वो इनसे कुछ कह ही नहीं सकती थी। ऐसा इस लिए क्योंकि उसके मरद की हत्या हो जाने के लिए वो खुद भी ज़िम्मेदारी ही होती और बदनामी के डर से किसी से कुछ कहती ही नहीं। सफ़ेदपोश आदमी ने जब मुझे ये सब समझाया तो मेरे कुंद पड़े ज़हन के मानों सारे कपाट एकदम से खुल गए और मुझे अच्छी तरह ये एहसास हो गया कि अगर सच में मैं अपने भाई की हत्या कर के हत्या का इल्ज़ाम छोटे ठाकुर पर लगा दूं तो यकीनन मुझ पर कभी कोई बात ही नहीं आएगी। सबसे बड़ी बात ये कि ऐसा करने से मेरी हर समस्या भी दूर हो जाएगी। ख़ैर, समझ तो मुझे उसी वक्त आ गया था लेकिन तभी मुझे ये भी आभास हुआ कि ऐसा करना कहीं मुझ पर ही न भारी पड़ जाए क्योंकि जिसके कहने पर मैं अपने भाई की हत्या करूंगा वो बाद में मुझे ही फंसा सकता था। मुझे तो पता भी नहीं है कि सफ़ेद कपड़ों में लिपटा वो व्यक्ति आख़िर है कौन और ये सब करवा कर वो छोटे ठाकुर को क्यों फंसाना चाहता है? मैंने उससे सोचने के लिए कुछ दिन का समय मांगा तो उसने कहा ठीक है। फिर वो ये कह कर चला गया कि मेरे पास सोचने के लिए दो दिन का वक्त है। दो दिन बाद मैं दादा ठाकुर के आमों वाले बाग में आ जाऊं क्योंकि वो मुझे वहीं मिलेगा। उसके जाने के बाद मैं घर आया और खा पी कर बिस्तर में लेट गया। बिस्तर में लेटे हुए मैं उसी के बारे में सोचे जा रहा था। रात भर मुझे नींद नहीं आई। मैंने बहुत सोचा कि वो रहस्यमय आदमी मुझसे ऐसा क्यों करवाना चाहता है लेकिन कुछ समझ में नहीं आया। ऐसे ही दो दिन गुज़र गए।"

"मेरे भाई की हत्या में छोटे ठाकुर को फंसाने का मुझे एक ही मतलब समझ आया था।" कुछ पल रुकने के बाद जगन ने फिर से कहा____"मतलब कि वो रहस्यमय आदमी छोटे ठाकुर से या तो नफ़रत करता था या फिर वो इन्हें अपना दुश्मन समझता था। मुझे उस पर यकीन नहीं था इस लिए दो दिन बाद जब मैं आपके आमों वाले बाग़ में उस व्यक्ति से मिला तो मैंने उससे साफ कह दिया कि पहले वो मेरी समस्याएं दूर करे, उसके बाद ही मैं उसका काम करूंगा। हालाकि मेरे पास उसका काम करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था, क्योंकि मैं ये भी समझ रहा था कि उसका काम अगर मैं नहीं करूंगा तो वो किसी और से करवा लेगा। यानि मेरे भाई का मरना तो अब निश्चित ही हो चुका था और यदि कोई दूसरा मेरे भाई की हत्या करेगा तो इससे मेरा ही सबसे बड़ा नुकसान होना था। मैंने यही सब सोच कर फ़ैसला कर लिया था कि जब मेरे भाई की मौत निश्चित ही हो चुकी है तो मैं ये काम करने से क्यों मना करूं? अगर मेरे ऐसा करने से मेरी सारी समस्याओं का अंत हो जाना है तो शायद यही बेहतर है मेरे और मेरे परिवार की भलाई के लिए। मेरी उम्मीद के विपरीत दूसरे ही दिन उस रहस्यमय व्यक्ति ने मेरे हाथ में नोटों की एक गड्डी थमा दी। मैं समझ गया कि नोटों की उस गड्डी से मेरा सारा कर्ज़ चुकता हो जाना था और साथ ही गिरवी पड़े मेरे खेत भी मुक्त हो जाने थे। इस बात से मैं बड़ा खुश हुआ और फिर मैंने एक बार भी ये नहीं सोचना चाहा कि अपने ही भाई की हत्या करना कितना बड़ा गुनाह होगा, पाप होगा।"

"मुरारी काका की हत्या कैसे की थी तुमने?" जगन के चुप होते ही मैंने उससे पूछा____"वो तो उस रात आंगन में सो रहे थे न फिर तुमने कैसे उनकी हत्या की और उनकी लाश को बाहर पेड़ के पास छोड़ दिया?"

"सब कुछ बड़ा आसान सा हो गया था छोटे ठाकुर।" जगन ने फीकी मुस्कान के साथ कहा____"मैं जानता था कि मेरा भाई लगभग रोज़ ही देशी पीता था और इतनी पी लेता था कि फिर उसे किसी चीज़ का होश ही नहीं रहता था। उस रात मैं आप दोनों पर नज़र रखे हुए था। मेरा भाई देशी पी कर आंगन में चारपाई पर लेटा हुआ था। इधर मैं सोचने लगा कि उसे बाहर कैसे लाऊं? हालाकि मैं घर के अंदर दीवार फांद कर आसानी से जा सकता था और फिर आंगन में ही उसकी हत्या कर सकता था लेकिन मुझे इस बात का भी एहसास था कि अगर थोड़ी सी भी आहट या आवाज़ हुई तो भौजी या फिर अनुराधा की नींद खुल सकती थी और तब मैं पकड़ा जा सकता था। इस लिए मैंने यही सोचा था कि मुरारी को बाहर बुला कर ही उसकी हत्या की जाए। उसे बाहर बुलाने का मेरे पास फिलहाल कोई उपाय नहीं था। इधर धीरे धीरे रात भी गुज़रती जा रही थी। वक्त के गुज़रने से मेरी परेशानी भी बढ़ती जा रही थी। समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्या करूं जिससे मेरा भाई बाहर आ जाए? उस वक्त शायद भोर का समय था जब मैंने अचानक ही किवाड़ खुलने की आवाज़ सुनी। मैं फ़ौरन ही छुप गया और देखने लगा कि बाहर कौन आता है? कुछ ही देर में मैं ये देख कर खुश हो गया कि किवाड़ खोल कर मेरा भाई बाहर आ गया है और पेड़ की तरफ जा रहा है। मैं समझ गया कि उसे पेशाब लगा था इसी लिए उसकी नींद खुली थी उस वक्त। सच कहूं तो ये मेरे लिए जैसे ऊपर वाले ने ही सुनहरा मौका प्रदान कर दिया था और मैं इस मौके को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता था। मैंने देखा मेरा भाई पेड़ के पास खड़ा पेशाब कर रहा है तो मैं बहुत ही सावधानी से उसकी तरफ बढ़ा। मेरे हाथ में कुल्हाड़ी थी और मैंने उसी कुल्हाड़ी से अपने भाई की जीवन लीला को समाप्त कर देने का सोच लिया था। मेरा समूचा जिस्म ये सोच कर बुरी तरह कांपने लगा था कि मैं अपने भाई को जान से मार देने वाला हूं। इससे पहले कि मैं उसके पास पहुंच कर कुछ करता मेरा भाई पेशाब कर के फारिग़ हो गया और मेरी तरफ पलटा। अंधेरे में मुझ पर नज़र पड़ते ही वो बुरी तरह चौंका और साथ ही डर भी गया। होश तो मेरे भी उड़ गए थे लेकिन फिर मैंने खुद को सम्हाला और फिर तेज़ी से उसकी तरफ झपटा। मैंने तेज़ी से कुल्हाड़ी का वार उस पर किया तो वो ऐन मौके पर झुक गया जिससे मेरा वार खाली चला गया। उधर मैं सम्हल भी न पाया था कि मुरारी ने मुझे दबोच लिया। उसके मुख से अभी भी देशी की दुर्गंध आ रही थी। जब उसने मुझे दबोच लिया तो मैं ये सोच कर बुरी तरह घबरा गया कि शायद उसने मुझे और मेरी नीयत को पहचान लिया है और अब वो मुझे छोड़ने वाला नहीं है। मरता क्या न करता वाली हालत हो गई थी मेरी। मेरा भाई शरीर से और ताक़त से मुझसे ज़्यादा ही था इस लिए मुझे लगा कि कहीं मैं खुद ही न मारा जाऊं। ज़हन में इस ख़याल के आते ही मैंने पूरा जोर लगा कर उसे धक्का दे दिया जिससे वो धड़ाम से ज़मीन पर गिर गया। मैं अवसर देख कर फ़ौरन ही उसके ऊपर सवार हो गया और कुल्हाड़ी को उसके गले में लगा कर उसके गले को चीर दिया। खून का फव्वारा सा निकला जो उछल कर मेरे ऊपर ही आ गिरा। उधर मेरा भाई जल बिन मछली की तरह तड़पने लगा था और इससे पहले की वो दर्द से तड़पते हुए चीखता मैंने जल्दी से उसे दबोच कर उसके मुख को बंद कर दिया। कुछ ही देर में उसका तड़पना बंद हो गया और मेरा भाई मर गया। कुछ देर तक मैं अपनी तेज़ चलती सांसों को नियंत्रित करता रहा और फिर उठ कर खड़ा हो गया। नज़र भाई के मृत शरीर पर पड़ी तो मैं ये सोच कर एकदम से घबरा गया कि ये क्या कर डाला मैंने किंतु फिर जल्दी ही मुझे समझ में आया कि अब इस बारे में कुछ भी सोचने का कोई मतलब नहीं है। बस, ये सोच कर मैं कुल्हाड़ी लेकर वहां से भाग गया।"

"और फिर जब सुबह हुई।" जगन के चुप होते ही मैंने कहा____"तो तुम अपने गांव के लोगों को ले कर मेरे झोपड़े में आ गए। मकसद था सबके सामने मुझे अपने भाई का हत्यारा साबित करना। मेरे चरित्र के बारे में सभी जानते थे इस लिए हर कोई इस बात को मान ही लेता कि अपने आपको बचाने के लिए मैंने ही मुरारी काका की हत्या की है।"

जगन ने मेरी बात सुन कर सिर झुका लिया। बैठक में एक बार फिर से ख़ामोशी छा गई थी। सभी के चेहरों पर कई तरह के भावों का आवा गमन चालू था।


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जगन को नकाबपोश कब और कैसे मिला और उसने वैभव को बदनाम करने के लिए जो जाल बुना था वो बता दिया है लेकिन जगन के पास और कोई जानकारी नहीं है नकाबपोश की
जगन ने सबके सामने वैभव की इज्जत का तो जनाजा निकाल दिया अब देखते हैं दादा ठाकुर क्या सजा देते हैं
 

ASR

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Supreme
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अध्याय - 63
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अब तक....

"अब तो नर संघार होगा अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर के हलक से एकाएक गुर्राहट निकली____"अभी तक हम चुप थे लेकिन अब हमारे दुश्मन हमारा वो रूप देखेंगे जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी न की होगी। एक एक को अपनी जान दे कर इस सबकी कीमत चुकानी होगी।"

कहने के साथ ही दादा ठाकुर ने शेरा को वापस चलने का हुकुम दिया। इस वक्त उनके चेहरे पर बड़े ही खूंखार भाव नज़र आ रहे थे। दादा ठाकुर को अपने जलाल पर आया देख अर्जुन सिंह पहले तो सहम सा गया लेकिन फिर राहत की सांस ली। जीप वापस हवेली की तरफ चल पड़ी थी। वातावरण में एक अजीब सी सनसनी जैसे माहौल का आभास होने लगा था। ऊपर वाला ही जाने कि आने वाले समय में अब क्या होने वाला था?


अब आगे....


दादा ठाकुर के पहुंचने से पहले ही हवेली तक ये ख़बर जंगल में फैलती आग की तरह पहुंच गई थी कि जगताप और अभिनव को हवेली के दुश्मनों ने जान से मार डाला है। बस फिर क्या था, पलक झपकते ही हवेली में मानों कोहराम मच गया था। नारी कंठों से दुख-दर्द और करुणा से मिश्रित चीखें पूरी हवेली को मानों दहलाने लगीं थी। हवेली की ठकुराईन सुगंधा देवी, मझली ठकुराईन मेनका देवी, और हवेली की लाडली बेटी कुसुम इन सबका मानों बुरा हाल हो गया था। जगताप के दोनों बेटे विभोर और अजीत भी रो रहे थे और सबको सम्हालने की कोशिश कर रहे थे। हवेली में काम करने वाली नौकरानियां और नौकर सब के सब इस घटना के चलते दुखी हो कर रो रहे थे।

उस वक्त तो हवेली में और भी ज़्यादा हाहाकार सा मच गया जब दादा ठाकुर हवेली पहुंचे। उन्हें बखूबी एहसास था कि जब वो हवेली पहुंचेंगे तो उन्हें बद से बद्तर हालात का सामना करना पड़ेगा और साथ ही ऐसे ऐसे सवालों का भी जिनका जवाब दे पाना उनके लिए बेहद मुश्किल होगा। अंदर से तो अब भी उनका जी चाह रहा था कि औरतों की तरह दहाड़ें मार मार कर रोएं मगर बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपने जज़्बातों को कुचल कर खुद को जैसे पत्थर का बना लिया था। पूरा नरसिंहपुर हवेली के बाहर जमा था, जिनमें मर्द और औरतें तो थीं ही साथ में बच्चे भी शामिल थे। सबके सब रो रहे थे। जैसे जैसे ये ख़बर फैलती हुई लोगों के कानों तक पहुंच रही थी वैसे वैसे हवेली के चाहने वाले हवेली की तरफ दौड़े चले आ रहे थे।

"कहां है हमारा बेटा जगताप और अभिनव?" दादा ठाकुर अभी बैठक में दाखिल ही हुए थे कि अचानक उनके सामने सुगंधा देवी किसी जिन्न की तरह आ गईं और रोते हुए उनसे मानों चीख पड़ीं____"आप उन दोनों को सही सलामत अपने साथ क्यों नहीं ले आए?"

दादा ठाकुर ने कोई जवाब नहीं दिया। असल में वो जवाब देने की मानसिकता में थे ही नहीं। उनके अंदर तो इस वक्त भयानक चक्रवात सा चल रहा था जिसे वो किसी तरह सम्हाले हुए थे। उनके साथ दूसरे गांव का उनका मित्र अर्जुन सिंह भी था और साथ ही कुछ और भी लोग जिनसे उनके घनिष्ट सम्बन्ध थे।

"आप चुप क्यों हैं?" जब दादा ठाकुर कुछ न बोले तो ठकुराईन सुगंधा देवी बिफरे हुए अंदाज़ में चीख पड़ीं_____"आप बोलते क्यों नहीं कि हमारे बेटे कहां हैं? क्या हमें इतना भी हक़ नहीं है कि अपने बेटों के मुर्दा जिस्मों से लिपट कर रो सकें? आप इतने पत्थर दिल कैसे हो सकते हैं दादा ठाकुर? क्या उनके लहू लुहान जिस्मों को देख कर भी आपका कलेजा नहीं फटा?"

"खुद को सम्हालिए ठकुराईन।" अर्जुन सिंह ने बड़े धैर्य से कहा_____"ठाकुर साहब पर ऐसे शब्दों के वार मत कीजिए। वो अंदर से बहुत दुखी हैं।"

"नहीं, हर्गिज़ नहीं।" सुगंधा देवी इस बार गुस्से से चीख ही पड़ीं_____"ये किसी बात से दुखी नहीं हो सकते क्योंकि इनके सीने में जज़्बातों से भरा दिल है ही नहीं। ये भी अपने बाप पर ग‌ए हैं जिन्हें लोगों को दुख और कष्ट देने में ही खुशी मिलती थी। हमने न जाने कितनी बार इनसे पूछा था कि हवेली के बाहर आख़िर ऐसा क्या चल रहा है जिसके चलते हमारे अपनों के साथ ऐसी घटनाएं हो रहीं हैं लेकिन ये हमेशा हमसे सच को छुपाते रहे। अगर हम कहें कि जगताप और अभिनव की मौत के सिर्फ और सिर्फ आपके ये ठाकुर साहब ही जिम्मेदार हैं तो ग़लत न होगा। इनकी चुप्पी और बुजदिली के चलते आज हमने अपने शेर जैसे दोनों बेटों को खो दिया है।"

कहने के साथ ही सुगंधा देवी फूट फूट कर रो पड़ीं। उनके जैसा ही हाल मेनका और कुसुम का भी था। दोनों के मन में कहने के लिए तो बहुत कुछ था मगर दादा ठाकुर से कभी जुबान नहीं लड़ाया था इस लिए ऐसे वक्त में भी कुछ न कह सकीं थी। बस अंदर ही अंदर घुटती रहीं। इधर सुगंधा देवी की बातों से दादा ठाकुर के अंदर जो पहले से ही भयंकर चक्रवात चल रहा था वो और भी भड़क उठा। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता वो तेज़ी से अंदर की तरफ बढ़ते चले गए। कुछ देर में जब वो लौटे तो उनके हाथ में बंदूक थी और आंखों में धधकते शोले। उनके तेवर देख सबके सब दहल से गए। अर्जुन सिंह फ़ौरन ही उनके पास गए।

"नहीं ठाकुर साहब, ऐसा मत कीजिए।" अर्जुन सिंह ने कहा_____"अभी ऐसा करना कतई उचित नहीं है। हमें सबसे पहले ये पता करना होगा कि मझले ठाकुर जगताप और बड़े कुंवर अभिनव पर किसने हमला किया था?"

"अब किसी बात का पता करने का वक्त नहीं रहा अर्जुन सिंह।" दादा ठाकुर गुस्से में गुर्राए____"अब तो सिर्फ एक ही बात होगी और वो है_____नर संघार। हमें अच्छी तरह पता है कि ये सब किसने किया है, इस लिए अब उनमें से किसी को भी इस दुनिया में जीने का हक नहीं रहा।"

"माना कि आपको सब पता है ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने कहा_____"लेकिन इसके बावजूद इस वक्त आपको ऐसा रुख अख्तियार करना उचित नहीं है। इस वक्त हवेली में आपका रहना बेहद ज़रूरी है और इस सबकी वजह से जो दुखी हैं उनको सांत्वना देना आपका सबसे पहला कर्तव्य है। एक और बात, हवेली के बाहर इस वक्त सैकड़ों लोग जमा हैं, वो सब आपके चाहने वाले हैं और इस सबकी वजह से वो सब भी दुखी हैं। उन सबको शांत कीजिए, समझाइए और उन्हें वापस घर लौटने को कहिए। इसके बाद ही आपको कोई क़दम उठाने के बारे में सोचना चाहिए।"

अर्जुन सिंह की बातों ने दादा ठाकुर के अंदर मानों असर डाला। जिसके चलते उनके अंदर का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ और फिर वो बैठक से बाहर आ गए। हवेली के सामने विसाल मैदान पर लोगों की भीड़ को देखते हुए उन्होंने बड़े ही शांत भाव का परिचय देते हुए उन सबका पहले तो अभिवादन किया और फिर सबको लौट जाने का आग्रह किया। आख़िर दादा ठाकुर के ज़ोर देने पर सब एक एक कर के जाने लगे किंतु बहुत से ऐसे अपनी जगह पर ही मौजूद रहे जो दादा ठाकुर के कहने पर भी नहीं गए। उनका कहना था कि जब तक हवेली के दुश्मनों को ख़त्म नहीं कर दिया जाएगा तब तक वो कहीं नहीं जाएंगे और खुद भी दुश्मनों को ख़त्म करने के लिए दादा ठाकुर के साथ रहेंगे।

वक्त और हालात की गंभीरता को देखते हुए अर्जुन सिंह ने बहुत ही होशियारी से दादा ठाकुर को कोई भी ग़लत क़दम उठाने से रोक लिया था और साथ ही हवेली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए आदमियों को लगा दिया था। अपने एक दो आदमियों को उन्होंने अपने गांव से और भी कुछ आदमियों को यहां लाने का आदेश दे दिया था।

गांव के जो लोग रह गए थे उन्हें ये कह कर वापस भेज दिया गया था कि जल्दी ही उन्हें दुश्मनों को ख़त्म करने का अवसर दिया जाएगा। सब कुछ व्यवस्थित करने के बाद अर्जुन सिंह दादा ठाकुर को बैठक में ले आए। इस वक्त बैठक में कई लोग थे जो गंभीर सोच के साथ बैठे हुए थे। इधर दादा ठाकुर के चेहरे पर रह रह कर कई तरह के भाव उभरते और फिर लोप हो जाते। उनकी आंखों के सामने बार बार अपने छोटे भाई जगताप और उनके बेटे अभिनव का चेहरा उजागर हो जाता था जिसके चलते उनकी आंखें नम हो जाती थीं। ये वो ही जानते थे कि इस वक्त उनके दिल पर क्या बीत रही थी।

शहर से पुलिस विभाग के कुछ आला अधिकारी भी आए हुए थे जो ऐसे अवसर पर दादा ठाकुर को यही सलाह दे रहे थे कि खुद को नियंत्रित रखें। असल में कानून के इन नुमाइंदों को अंदेशा ही नहीं बल्कि पूरा यकीन था कि जो कुछ भी हुआ है उसके बाद बहुत कुछ अनिष्ट हो सकता है जोकि ज़ाहिर है दादा ठाकुर के द्वारा ही होगा इस लिए वो चाहते थे कि किसी भी तरह का अनिष्ट न हो। जगताप और अभिनव के मृत शरीरों की जांच करने के लिए उन्होंने अपने कुछ पुलिस वालों के साथ शहर भेज दिया था। हालाकि दादा ठाकुर ऐसा बिलकुल भी नहीं चाहते थे किंतु आला अधिकारियों के अनुनय विनय करने से उन्हें मानना ही पड़ा था।


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"नहीं, ये नहीं हो सकता।" शेरा के मुख से सारी बातें सुनते ही मैं हलक फाड़ कर चीख पड़ा था और साथ ही शेरा का गिरेबान पकड़ कर गुस्से से बोल पड़ा_____"कह दो कि ये सब झूठ है। कह दो कि मेरे चाचा जी और मेरे भैया को कुछ नहीं हुआ है।"

बेचारा शेरा, आंखों में आसूं लिए कुछ बोल ना सका। उसे यूं चुप देख मेरा खून खौल उठा। दिलो दिमाग़ में बुरी तरह भूचाल सा आ गया। मारे गुस्से के मैंने शेरा को ज़ोर का धक्का दिया तो वो फिसलते हुए पीछे जा गिरा। उसने उठने की कोई कोशिश नहीं की। इधर मैं उसी गुस्से में आगे बढ़ा और झुक कर उसे उसका गिरेबान पकड़ कर उठा लिया।

"तुम्हारी ज़ुबान ख़ामोश क्यों है?" मैं ज़ोर से चीखा____"बताते क्यों नहीं कि किसी को कुछ नहीं हुआ है?"

घर के बाहर इस तरह का शोर शराबा सुन कर अंदर से सब भागते हुए बाहर आ गए। मुझे किसी आदमी के साथ इस तरह पेश आते देख सबके सब बुरी तरह चौंक पड़े थे।

"रुक जाइए वैभव महाराज।" वीरेंद्र फौरन ही मेरे क़रीब आ कर बोला____"ये क्या कर रहे हैं आप और ये आदमी कौंन है? इसने ऐसा क्या कर दिया है जिसके लिए आप इसके साथ इस तरह से पेश आ रहे हैं?"

वीरेंद्र के सवालों से आश्चर्यजनक रूप से मुझ पर प्रतिक्रिया हुई। मेरी हरकतों में एकदम से विराम सा लग गया। आसमान से गिरी बिजली जो कहीं ऊपर ही अटक गई थी वो अब जा कर मेरे सिर पर पूरे वेग से गिर पड़ी थी। ऐसा लगा जैसे जिस जगह पर मैं खड़ा था उस जगह की ज़मीन अचानक से धंस गई है और मैं उसमें एकदम से समा गया हूं। आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया और इससे पहले कि चक्कर खा कर मैं वहीं गिर पड़ता वीरेंद्र ने जल्दी से मुझे सम्हाल लिया।

मेरी हालत देख कर सब के सब सन्नाटे में आ गए। हर कोई समझ चुका था कि कुछ तो ऐसा हुआ है जिसकी वजह से मेरी ऐसी हालत हो गई है। मुझे फ़ौरन ही बैठक में रखे लकड़ी के तख्त पर लेटा दिया गया और मुझ पर पंखा किया जाने लगा। मेरी हालत देख कर सब के सब चिंतित हो उठे थे। वहीं दूसरी तरफ घर के कुछ लोग शेरा से पूछ रहे थे कि आख़िर ऐसा क्या हुआ है जिसकी वजह से मेरी ये हालत हो गई है? उन लोगों के पूछने पर शेरा कुछ बोल नहीं रहा था। शायद वो समझता था कि सच जानने के बाद कोई भी इस सच को सहन नहीं कर पाएगा और यहां जिस चीज़ की वो सब खुशियां मना रहे थे उसमें विघ्न पड़ जाएगा।

जल्दी ही मेरी हालत में थोड़ा सुधार हुआ तो मुझे होश आया। मैं एकदम से उठ बैठा और बदहवास सा सबकी तरफ देखने लगा। हर चेहरे से होती हुई मेरी नज़र रागिनी भाभी पर जा कर ठहर गई। वो चिंतित और परेशान अवस्था में मुझे ही देखे जा रहीं थी। उन्हें देखते ही मेरे अंदर बुरी तरह मानों कोई मरोड़ सी उठी और मैं फफक फफक कर रो पड़ा। मुझे यूं रोते देख भाभी चौंकी और एकदम से घबरा ग‌ईं। वो फ़ौरन ही मेरे पास आईं और मुझे खुद से छुपका लिया।

"क्या हुआ वैभव?" वो मेरे चेहरे पर अपने कोमल हाथ फेरते हुए बड़े घबराए भाव से बोलीं_____"तुम इस तरह रो क्यों रहे हो? तुम तो मेरे बहादुर देवर हो, फिर इस तरह बच्चों की तरह क्यों रो रहे हो?"

भाभी की बातें सुनकर मैं और भी उनसे छुपक कर रोने लगा। मेरे अंदर के जज़्बात मेरे काबू में नहीं थे। सहसा मैं ये सोच कर कांप उठा कि भाभी को जब सच का पता चलेगा तो उन पर क्या गुज़रेगी? नहीं नहीं, उन्हें सच का पता नहीं चलना चाहिए वरना वो तो मर ही जाएंगी। एकाएक ही मेरे अंदर विचारों का और जज़्बातों का ऐसा तूफान उठा कि मैं उसे सम्हाल न सका। भाभी से लिपटा मैं बस रोए जा रहा था। मुझे रोता देख भाभी भी रोने लगीं। बाकी सबकी भी आंखें नम हो उठीं। किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते मैं इस तरह रोए जा रहा हूं। सबको किसी भारी अनिष्ट के होने की आशंका होने लगी थी। सबके ज़हन में तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे।

"तुम्हें मेरी क़सम है वैभव।" भाभी ने रूंधे हुए गले से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"मुझे सच सच बताओ कि आख़िर क्या हुआ है? बाहर मौजूद शेरा ने तुमसे ऐसा क्या कहा है जिसे सुन कर तुम इस तरह रोने लगे हो?"

"सब कुछ ख़त्म हो गया भाभी।" भाभी की क़सम से मजबूर हो कर मैंने रोते हुए कहा तो भाभी को झटका सा लगा, बोली____"स..सब कुछ ख़त्म हो गया, क्या मतलब है तुम्हारा?"

"बस इससे आगे कुछ नहीं बता सकता भाभी।" मैंने उनसे अलग हो कर तथा खुद को सम्हालते हुए कहा____"क्योंकि ना तो मुझमें कुछ बताने की हिम्मत है और ना ही आप में से किसी में सुनने की।"

मेरी बात सुन कर जहां भाभी एकदम से अवाक सी रह गईं वहीं बाकी लोगों के चेहरे भी फक्क से पड़ गए। मैंने बड़ी मुस्किल से अपने जज़्बातों को काबू किया और तख्त से उठ कर खड़ा हो गया। मेरे लिए अब यहां पर रुकना मुश्किल पड़ रहा था। मैं जल्द से जल्द हवेली पहुंच जाना चाहता था। मैं अच्छी तरह समझ सकता था कि इस समय हवेली में मेरे अपनों का क्या हाल हो रहा होगा।

"मुझे सच जानना है वैभव।" भाभी ने कठोर भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"आख़िर क्या छुपा रहे हो मुझसे?"
"बस इतना ही कहूंगा भाभी।" मैंने उनसे नज़रें चुराते हुए गंभीरता से कहा____"कि जितना जल्दी हो सके यहां से वापस हवेली चलिए। मैं बाहर आपके आने का इंतजार करूंगा।"

कहने के साथ ही मैं तेज़ क़दमों के साथ बाहर आ गया। मेरे पीछे बैठक में सब के सब भौचक्के से खड़े रह गए थे। उधर मेरी बात सुनते ही भाभी ने बाकी सबकी तरफ देखा और फिर बिना कुछ कहे अंदर की तरफ चली गईं। उन्हें भी समझ आ गया था कि बात जो भी है बहुत ही गंभीर है और अगर मैंने वापस हवेली चलने को कहा है तो यकीनन उनका जाना ज़रूरी है।

बाहर आया तो देखा भाभी के पिता और उनके भाई शेरा के पास ही अजीब हालत में खड़े थे। उनकी आंखों में आसूं देख मैं समझ गया कि शेरा ने उन्हें सच बता दिया है। मुझे देखते ही वीरेंद्र मेरी तरफ लपका और मुझसे लिपट कर रोने लगा।

"ये सब क्या हो गया वैभव जी?" वीरेंद्र रोते हुए बोला_____"एक झटके में मेरी बहन विधवा हो गई। इतना बड़ा झटका कैसे बर्दास्त कर सकेगी वो?"

"चुप हो जाइए वीरेंद्र भैया।" मैंने उन्हें खुद से अलग करते हुए कहा____"भाभी को अभी इस बात का पता नहीं चलना चाहिए, वरना वो ये सदमा बर्दास्त नहीं कर पाएंगी। मैं इसी वक्त उन्हें ले कर गांव जा रहा हूं।"

"मैं भी आपके साथ चलूंगा।" वीरेंद्र अपने आंसू पोंछते हुए बोला____"ऐसे वक्त में हम आपको अकेला यूं नहीं जाने दे सकते।"

"सही कहा तुमने बेटे।" भाभी के पिता जी ने दुखी भाव से कहा_____"इस दुख की घड़ी में हम सबका वहां जाना आवश्यक है। एक काम करो तुम अपने भाइयों को ले कर जल्द ही इनके साथ यहां से निकलो।"

"नहीं बाबू जी।" मैंने कहा____"इन्हें मेरे साथ मत भेजिए। ऐसे में भाभी को शक हो जाएगा कि कोई बात ज़रूर है इस लिए आप इन्हें हमारे जाने के बाद आने को कहिए।"

मेरी बात सुन कर उन्होंने सिर हिलाया। अभी हम बात ही कर रहे थे कि तभी भाभी अपना थैला लिए हमारी तरफ ही आती दिखीं। उन्हें देख कर एक बार फिर से मेरे दिल पर मानों बरछियां चल गईं। मैं सोचने लगा कि इस मासूम सी औरत के साथ ऊपर वाले ने ऐसा ज़ुल्म क्यों कर दिया? बड़ी मुश्किल से तो उनकी जिंदगी में खुशियों के पल आए थे और अब तो ऐसा हो गया है कि चाह कर भी कोई उनके दामन में खुशियां नहीं डाल सकता था। मुझे समझ न आया कि मैं ऐसा क्या करूं जिससे मेरी भाभी को कोई दुख तकलीफ छू भी न सके। अपनी बेबसी और लाचारी के चलते मेरी आंखें छलक पड़ीं जिन्हें फ़ौरन ही पलट कर मैंने उनसे छुपा लिया।

कुछ ही देर में मैं जीप में भाभी को बैठा कर शेरा और अपने कुछ आदमियों के साथ अपने गांव नरसिंहपुर की तरफ चल पड़ा। मेरे बगल से भाभी बैठी हुईं थी। वो गुमसुम सी नज़र आ रहीं थी, ये देख मेरा हृदय ये सोच कर हाहाकार कर उठा कि क्या होगा उस वक्त जब उन्हें सच का पता चलेगा? आख़िर कैसे उस अहसहनीय दुख को सह पाएंगी वो? मैंने मन ही मन ऊपर वाले से उन्हें हिम्मत देने की फरियाद की।

गांव से निकल कर जब हम काफी दूर आ गए तो भाभी ने मुझसे फिर से पूछना शुरू कर दिया कि आख़िर क्या बात हो गई है? उनके पूछने पर मैंने बस यही कहा कि हवेली पहुंचने पर उन्हें खुद ही पता चल जाएगा। मैं भला कैसे उन्हें सच बता देता और उन्हें उस सच के बाद मिलने वाले दुख से दुखी होते देखता? जीवन में कभी ऐसा भी वक्त आएगा इसकी कल्पना भी नहीं की थी मैंने। आंखों के सामने बार बार अभिनव भैया का चेहरा दिखने लगता था और न चाहते हुए भी मेरी आंखें भर आती थीं। अपने आंसुओं को भाभी से छुपाने के लिए मैं जल्दी से दूसरी तरफ देखने लगता था। मेरा बस चलता तो किसी जादू की तरह सब कुछ ठीक कर देता और अपनी मासूम सी भाभी के पास किसी तरह की तकलीफ़ न आने देता मगर मेरे बस में अब कुछ भी नहीं रह गया था।

मुझे याद आया कि जो लोग मुझे चंदनपुर में जान से मारने के इरादे से आए थे उनमें से एक ने मुझे बताया था कि वो लोग किसके कहने पर मेरी जान लेने आए थे? साहूकारों पर तो मुझे पहले से ही कोई भरोसा नहीं था लेकिन वो इस हद तक भी जा सकते हैं इसकी उम्मीद नहीं की थी मैंने। मुझ पर उनका कोई बस नहीं चल पाया तो उन्होंने मेरे चाचा और मेरे बड़े भाई को मार दिया। मुझे समझ में नहीं आया कि ये सब कैसे संभव हुआ होगा उनके लिए? मेरे चाचा और भैया उन लोगों को कहीं अकेले तो नहीं मिल गए होंगे जिसके चलते वो उन्हें मार देने में सफल हो गए होंगे। ज़ाहिर है वो लोग पहले से ही इस सबकी तैयारी कर चुके थे और मौका देख कर वो लोग उन पर झपट पड़े होंगे।

सोचते सोचते मेरे अंदर दुख तकलीफ़ के साथ साथ अब भयंकर गुस्सा भी भरता जा रहा था। मैं तो पहले ही ऐसे हरामखोरों को ख़ाक में मिला देना चाहता था मगर पिता जी के चलते मुझे रुकना पड़ गया था मगर अब, अब मैं किसी के भी रोके रुकने वाला नहीं था। जिन लोगों ने चाचा जगताप और मेरे भाई की जान ली है उन्हें ऐसी मौत मारुंगा कि किसी भी जन्म में वो ऐसा करने की हिमाकत न कर सकेंगे।

क़रीब सवा घंटे बाद मैं हवेली पहुंचा। इस एहसास ने ही मुझे थर्रा कर रख दिया कि अब क्या होगा? मेरी भाभी कैसे इतने भयानक और इतने असहनीय झटके को बर्दास्त कर पाएंगी? मेरी नज़रें हवेली के विशाल मैदान के चारो तरफ घूमने लगीं जहां पर कई हथियारबंद लोग मुस्तैदी से खड़े थे। ज़ाहिर है वो किसी भी खतरे का सामना करने के लिए तैयार थे। वातावरण में बड़ी अजीब सी शान्ति छाई हुई थी किंतु हवेली के अंदर किस तरह का हड़कंप मचा हुआ है इसका एहसास और आभास मुझे बाहर से ही हो रहा था।

हवेली के मुख्य दरवाज़े के क़रीब जीप को मैंने रोका और फिर उतर कर मैं दूसरी तरफ आया। मैंने देखा भाभी मुख्य दरवाज़े की तरफ ही देखे जा रहीं थी। उनके मासूम से चेहरे पर अजीब से भाव थे। उन्हें देख कर एक बार फिर से मेरा हृदय हाहाकार कर उठा। मैंने बड़ी मुश्किल से अपने अंदर उठे तूफान को काबू किया और भाभी की तरफ का दरवाज़ा खोल दिया जिससे भाभी ने एक नज़र मुझे देखा और फिर सावधानी से नीचे उतर आईं।

अपने सिर पर साड़ी का पल्लू डाले वो अंदर की तरफ बढ़ गईं तो मैंने जीप से उनका थैला लिया और शेरा को जीप ले जाने का इशारा कर के भाभी के पीछे हो लिया। जैसे जैसे भाभी अंदर की तरफ बढ़ती जा रहीं थी वैसे वैसे मेरी सांसें मानों रुकती जा रहीं थी। जल्दी ही भाभी बैठक को पार करते हुए अंदर की तरफ बढ़ गईं जबकि मैं बैठक में ही रुक गया। मेरी नज़र जब कुछ लोगों से घिरे पिता जी पर पड़ी तो मैं खुद को सम्हाल न सका। बैठक में बैठे लोगों को भी पता चल चुका था कि मैं आ गया हूं और साथ ही मेरे साथ भाभी भी आ गईं हैं। मैं बिजली की सी तेज़ी से पिता जी के पास पहुंचा और रोते हुए उनसे लिपट गया। मुझे यूं अपने से लिपट कर रोता देख पिता जी भी खुद को सम्हाल न सके। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे और उनके अंदर का गुबार मानों एक ही झटके में फूट गया। मुझे अपने सीने से यूं जकड़ लिया उन्होंने जैसे उन्हें डर हो कि मैं भी उनसे वैसे ही दूर चला जाऊंगा जैसे चाचा जगताप और बड़े भैया चले गए हैं।

जाने कितनी ही देर तक मैं उनसे लिपटा रोता रहा और पिता जी मुझे खुद से छुपकाए रहे। उसके बाद मैं अलग हुआ तो अर्जुन सिंह ने मुझे एक कुर्सी पर बैठा दिया। तभी मेरे कानों में अंदर से आता रूदन सुनाई दिया। हवेली के अंदर एक बार फिर से चीखो पुकार मच गया था। मां, चाची, कुसुम के साथ अब भाभी का भी रूदन शुरू हो गया था। ये सब सुनते ही मेरा कलेजा फटने को आ गया। मेरी आंखें एक बार फिर से बरस पड़ीं थी।


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TheBlackBlood मित्र बहुत ही धमाकेदार रहा है ये अंक पूरी तरह से झिंझोड कर रख दिया है.. कई महिनों की अटकी हुई भावनायें है पूरी तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए समय लगेगा.. अद्भुत
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ASR

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TheBlackBlood मित्र तूसी दी लिखने दी कला बेमिसाल है.. समय बदलता है व रात के बाद दिन आता ही है.. खुशियो को मेहसूस दर्द के उपरान्त ही किया जाता है.. खाने का अप्रतिम आनंद भूखे रहने के उपरान्त ही लिया जा सकता है...
यहि जीवन में होता है...
विगत सभी अध्याय अद्भुत रहे भावनाओं को आहत होते हुए षड्यंत्ररो की कई कहानियां व ठाकुरों पर साहूकारों की ढेरो भयंकर रूप किए गए प्रहार पीठ मे छुरा मरना व विभिन्न परिस्थितियों को बनाना.. कई हत्याएं... अपनों का खोना....
देखते हैं अब क्या होता है कसे वैभव In षडयंत्रों का सामना कर इनको उत्तर देता है..
💗 😍 अगले अंक के प्रेक्षण के इंतजार में..
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