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Soldier Boy

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खोया हुआ प्यार

2020 - लखनऊ का एक मेट्रो स्टेशन
‘‘एक्सक्यूज मी!’’ मैंने अपने आगे खड़ी महिला से कहा, ताकि वह थोड़ा साइड हो जाये और मैं आगे निकल कर टिकट खरीद सकूँ।
मेरी अवाज सुनकर उसने मुड़ कर मेरी तरफ देखा......और उसका चेहरा देखते ही जैसे मैं कहीं खो गया। ‘‘स्नेहा तुम....’’ मेरे मुंह से बस इतना ही निकल पाया।
2010 - लखनऊ का एक प्रतिष्ठित कालेज
मैं रोहन आज बेहद खुश था। आखिर शहर के इतने मशहूर कालेज में बीसीए में मेरा एडमिशन हुआ था। इस कालेज में एडमिशन की खुशी और भी इसलिये थी क्योंकि इसी कालेज में मेरी कजन यानी मौसेरी बहन और फ्रेण्ड स्नेहा भी पढ़ती थी। वह मुझसे 1 साल सीनियर थी। यानि की एक साल पहले से इस कालेज में पढ़ रही थी। वैसे तो हम दोनों सेम एज के थे लेकिन इस कालेज में उसे पहले एडमिशन मिल गया, जबकि अच्छे कालेज में एडमिशन न मिल पाने के कारण मुझे 12 के बाद का पहला साल ड्राप करना पड़ा था। लेकिन अब मुझे 1 साल ड्राप होने का कोई गम नहीं था। मैं बहुत खुश था कि मुझे एडमिशन मिल गया है। इस कालेज में काफी प्लेसमेण्ट होता था और यहाँ से डिग्री लेकर इण्डिया और अब्राॅड में आसानी से जाॅब मिल जाती थी। कालेज लोकल का था इसलिये हाॅस्टल में रहने की भी जरूरत नहीं थी। हम अपने-अपने घर से ही वहँा आते थे। स्नेहा और मैं एक ही शहर में रहते थे, यह कालेज भी उसी शहर में था। हाँलाकी स्नेहा और मेरे घर में 10 किमी0 की दूरी थी। इसलिये मैं और स्नेहा अलग-अलग ही कालेज आते थे।
आज मेरा पहला दिन था और खुशकिस्मती से मेरे एक दोस्त विनय का भी एडमिशन वहाँ मेरे साथ हुआ था। मैंने और विनय ने साथ में क्लासेज अटेंड की फिर लंच टाइम में हम कैण्टीन पहुँचे। मैं स्नेहा को ढूँढने की कोशिश कर रहा था। मैं जानता था लंच में वो भी कैण्टीना आयेगी। आज हमारा पहला दिन था इसलिये हम थोड़ा डर भी रहे थे कि हमारी रैगिंग न हो जाये। मैं और विनय खाने की प्लेट लेकर कैण्टीन की एक टेबल पर बैठे। तभी एक हट्टा कट्टा हैण्डसम नौजवान वहाँ आया और बोला ‘‘क्यों? फ्रेशर्स हो ना? पता नहीं कि यह टेबल सीट मेरे और मेरे फ्रेण्ड्ज के लिये रिजर्व रहती है? अभी बताता हूँ, खड़े हो’’
यह सुनकर हमारी तो सिट्टी पिट्टी ही गुम हो गयी। तभी आवाज सुनाई दी।
‘‘रुको अमित......’’
यह आवाज स्नेहा की थी।
‘‘अमित यह मेरा कजिन रोहन है, साॅरी बोलो’’
‘‘ओह साॅरी मुझे पता नहीं था तुम स्नेहा के कजिन हो।’’ अमित ने मुझसे और विनय से कहा।
‘‘कोई बात नहीं अमित।’’ मैंने जवाब दिया।
अमित: ‘‘आओ बैठो...हम भी साथ बैठते हैं।’’
अमित, स्नेहा, स्नेहा की एक फ्रेण्ड, मैं, विनय उस टेबल के चारों ओर बैठे। अमित भी जा के उन तीनों के लिये प्लेट्स ले आया और हम साथ में खाना खाने लगे और खाते खाते बाते करने लगे।
स्नेहा: ‘‘मुझे काफी खुशी है रोहन कि तुम्हे यहाँ एडमिशन मिल गया। अब अच्छे से स्टडी करना। और हाँ कोई परेशानी हो तो मुझे बताना’’
मैं (रोहन): ‘‘थैंक्स स्नेहा’’
स्नेहा: ‘‘बाई द वे ये मेरी फ्रेण्ड सोनम है और अमित से तुम मिल ही चुके हो। वैसे तो हमारे और भी फ्रेण्ड्स हैं पर हम तीनों ज्यादा पक्के दोस्त हैं।’’
‘‘नाइस टू मीट यू सोनम......मैं रोहन और ये मेरा दोस्त विनय। हम 10 से 12 क्लास तक क्लासमेट्स रहे हैं।’’ मैंने विनय का इन्ट्रोडक्शन उन तीनों से कराया।
जल्द ही हम पाँचों पक्के दोस्त बन गये। इधर विनय और सोनम में काफी पट रही थी। और स्नेहा और अमित की दोस्ती भी दोस्ती से कहीं ज्यादा थी। स्नेहा और अमित ब्वायफ्रेण्ड और गर्लफ्रेण्ड थे। पर पता नहीं क्यों मुझे अमित से जलन हो रही थी। पता नहीं क्यों मुझे स्नेहा की अमित से नजदीकियाँ पसन्द नहीं आ रही थी। स्नेहा मेरी कजन थी, मैं उसे बचपन से जानता था, पर मैंने उसे बहन नहीं बल्कि हमेशा से अपनी फ्रेण्ड माना था। लेकिन उसको अब उसके ब्वायफ्रेण्ड के साथ देखकर मुझे महसूस होने लगा था कि मैं उसको बहन या फ्रेण्ड नहीं बल्की प्रेमिका के रूप में देखना चाहता था।
मुझसे स्नेहा ने कई बार कहा भी कि तुम सिंगल हो, कहो तो अपनी किसी फ्रेण्ड्स से तुम्हारी दोस्ती करा दूँ। पर मुझे तो कोई पसंद ही नहीं थी स्नेहा के अलावा। स्नेहा अमित के साथ खुश थी, हालाँकि मैं जानता था कि अमित बहुत अच्छा लड़का नहीं है और कभी न कभी वो स्नेहा धोखा जरूर देगा, पर मैं कुछ कहने की हिम्मत न कर पातपा। और स्नेहा मुझे अपना भाई ही नहीं अपना अच्छा दोस्त भी मानती थी, वह मुझे मेरे नाम से ही बुलाती थी, न कि भाई या ब्रो कहकर क्योंकि हम हमउम्र थे। पर मैं जानता था कि वह मुझे एक भाई और दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं मानती है। मेरे अन्दर भी अपने दिल की बात स्नेहा या किसी और दोस्त से भी कहने की बिल्कुल हिम्मत नहीं थी। हमारा रिश्ता उस मंजिल तक नहीं पहुँच सकता था जिसके मैंने कभी सपने देख लिये थे। और समाज.....हमारे पैरेन्ट्स भी हमारे रिश्ते को कभी कबूल नहीं करेंगे।
मैंने अब अपने फ्रेण्ड ग्रुप से दूरी बनाना शुरु कर दी क्योंकि मुझे अब स्नेहा और अमित को साथ देखना अच्छा नहीं लगता था। मैं अलग-अलग रहने लगा था। वो मुझसे पूछते थे कि अब मैं अलग-अलग क्यों रहता हूँ तो मैं पढ़ाई का बहाना बना देता था। सब को लगता था शायद मैं पढ़ाई को झेल नहीं पा रहा हूँ मुझमे पढ़ाई का ही प्रेशर है। हाँलाकि ऐसा नहीं था कि मैं पढ़ाई को झेल नहीं सकता था बल्कि मैं पढ़ाई में भी दिल नहीं लगा पा रहा था। सेमेस्ट के एक्जाम में सिर्फ 1 महीना था। मैं अब उस काॅलेज को ही छोड़ना चाहता था जिसमें एडमिशन के लिये मैं कभी बेहद उत्सुक था। मैं फेल हो कर या कालेज छोड़ कर मैं अपने पेरेन्ट्स को भी दुखी नहीं करना चाहता था क्योंकि उन्हें मुझसे काफी उम्मीदें थीं मैं उनका एकलौता बेटा था। मैं बहोत परेशान था, मैं वो कालेज छोड़ना चाहता था पर पढ़ाई नहीं छोड़ना चाहता था। तभी मुझे एक उम्मीद की किरन नजर आयी, मैंने इस कालेज में एडमिशन लेने से पहले एक फाॅरेन यूनिवर्सिटी में एडमिशन और स्काॅलरशिप के लिये फार्म भरा था। उसकी एक्जाम डेट भी करीब आ रही थी। मेरे सेमेस्टर एक्जाम्स शुरु होने से 2-3 दिन पहले ही उसका एन्ट्रेन्स एक्जाम था। अगर मैं उस फाॅरेन यूनिवर्सिटी के एक्जाम को क्लियर कर लेता तो मुझे स्काॅलरशिप मिलती और आॅस्ट्रेलिया में जा कर पढ़ने का मौका मिलता। यही एक मौका था जब मैं अपने कालेज को छोड़ जा सकता था और अपनी लाईफ ‘मूव आॅन’ कर सकता था। स्काॅलरशिप का एक्जेम काफी टफ होना था और उसमें काफी काॅम्पेटीशन होना था क्योंकि सिर्फ 50 स्टूडेन्ट्स सेलेक्ट होने थे पर मैं जानता था कि असम्भव कुछ भी नहीं है। मेरे पास स्टडी के लिये 1 महीने से भी कम का समय था। स्काॅलरशिप के एक्जाम में 12 तक के लेवल के क्वेश्चन्स आने थे। मैंने 12 तक की पढ़ाई अच्छे से की थी, मैं रिवीजन में लग गया मैंने एक कोचिंग ज्वाइन कर ली और इंटरनेट की भी हेल्प लेने लगा। यहाँ तक की मैं काॅलेज की छुट्टी करके भी उसी एक्जाम की तैयारी करता। मेरे पैरेन्ट्स और फ्रेण्ड्स को लगता कि मैं सेमेस्टर एक्जाम्स की तैयारी कर रहा हूँ। आखिरकार मेरी मेहनता रंग लाई मैंने स्काॅलरशिप का एक्जाम दिया और बहुत अच्छा गया। मेरे पेरेन्ट्स का या किसी दोस्त को अभी भी नहीं पता था कि मैंने कोई स्काॅलरशिप का एक्जाम दिया है। अब मुझे बस रिजल्ट का इंतेजार था। इसी बीच मेरे सेमेस्टर के एक्जाम शुरु हो गये, स्काॅलरशिप के एक्जाम की तैयारी की वजह से मैं सेमेस्टर एक्जाम की बिल्कुल भी तैयारी नहीं कर पाया था और उसके पेपर बहुत खराब गये। बस मैं अब यह दुआ कर रहा था कि सेमेस्टर के एक्जाम के रिजल्ट से पहले मेरे स्काॅलरशिप के एक्जाम का रिजल्ट आ जाये। क्योंकि स्काॅलरशिप के एक्जाम में ही मैं पास हो सकता था, सेमेस्टर वालों में तो फेल होना पक्का था। खैर हुआ भी ऐसा ही।
सेमेस्टर के एक्जाम्स खतम होने के बाद कालेज में छुट्टियाँ हो गई और कुछ ही दिन में स्काॅलरशिप के एक्जाम का रिजल्ट आ गया। मेरे पैरेन्ट्स, दोस्त, और सब लोग खुश थे कि मुझे स्काॅलरशिप भी मिलेगी और आॅस्ट्रेलिया की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका मिलेगा।
विदेश में स्टडी पूरी करने के बाद मेरी वहीं विदेश में जाॅब लग गई। स्टडी पूरी करने के बाद मैं कुछ दिन के लिये छुट्टी पर इण्डिया आया था। मुझे पता चला स्नेहा और अमित की शादी हो गई है और स्नेहा अमित के साथ दिल्ली चली गई है क्योंकि अमित दिल्ली में जाॅब कर रहा था। स्नेहा की फैमिली वाले स्नेहा की अमित से शादी के पक्ष में नहीं थे। लेकिन उनकी मर्जी के खिलाफ स्नेहा ने अमित से शादी कर ली थी। मैंने भी स्नेहा से काॅन्टेक्ट करने की कोशिश नहीं की।
उसके बाद से मेरा भी दोबारा इण्डिया आना नहीं हुआ। मैं अपने पेरेन्ट्स को वहीं बुलवा लेता था। वो इसी बहाने विदेश घूम भी लेते थे। अब कई साल बाद जा कर मैं वापस इण्डिया आया था।
2020
‘‘रोहन....तुम’’ स्नेहा की आवाज सुनकर मैं फ्लैशबैक से वापस आया। 10 साल बाद उसे देख रहा था मैं। वो कालेज गोइंग 18-19 साल की गर्ल अब 28-29 साल की हो चुकी थी। अभी भी खूबसूरत थी वह। पर उसके चेहरे पर अब वो उत्साह नजर नहीं आ रहा था जो पहले दिखता था। एक उदासी दिखी मुझे उसके चेहरे और आँखों में। मेरी भी आँखों में आँसु थे और उसके भी।
‘‘स्नेहा तुम....यहाँ कैसे, तुम तो दिल्ली में थी न अमित के साथ और अमित कैसा है?’’ मैंने पूछा।
मेरे इतना पूछते ही स्नेहा फफक पड़ी। मैं उसको लेकर किनारे आया और पास रखी चेयर्स पर बैठ कर मैं उससे जानने की कोशिश करने लगा आखिर वह दुखी क्यों है।
‘‘क्या हुआ स्नेहा? सब ठीक तो है? अमित ठीक तो है?’’ मैंने उससे पूछा।
‘‘हाँ वह ठीक है पर अब हमारा रिश्ता खतम हो चुका है।’’ स्नेहा ने खुद को सम्भालते हुए मुझसे कहा।
‘‘आज से करीब 6 साल पहले कालेज खतम होने बाद ही, परिवार की मर्जी न होने के बावजूद मैंने उससे शादी की, तब तुम आस्ट्रेलिया में थे, उसके लिये अपने परिवार को छोड़ दिया, पर शादी के बाद वो एकदम बदल गया। अमित शादी बाद वो अमित नहीं रहा जिससे मैंने प्यार किया था। उसके दूसरी लड़कियों से सम्बन्ध थे। रात-रात भर गायब रहता था और तो और शराब के नशे में मुझ पर हाथ तक उठा देता था। शादी के 2 साल बाद मैं एक बेटे की माँ भी बनी। पर बेटे के पैदा होने के बाद भी वह नहीं सुधरा। मैंने बहुत सहा रोहन, पर अब सहा नहीं जाता। कुछ महीने पहले मैंने तलाक की अर्जी डाली थी जो कबूल हो गई और मुझे तलाक मिल गई है, बेटे की कस्टडी भी मुझे मिली है, और अमित को हर माह मुझे खर्चा देने का आर्डर दिया है अदालत नें।’’ स्नेहा ने अपनी आप बीती मुझे सुना दी।
‘‘तो....तुम कब आई यहाँ लखनऊ वापस दिल्ली से.....मौसी-मौसा जी ने........’’ मैंने जानने की कोशिश करते हुए पूछा कि अब स्नेहा क्या कर रही है, कहाँ रह रही है।
‘‘माँ-बाप तो माँ-बाप ही होते हैं रोहन, मैंने उनको नाराज करके, उनकी मर्जी के खिलाफ शादी की...पर जिस शख्स के लिये मैंने अपने माँ-बाप को छोड़ा था जब उसी ने कहीं का न छोड़ा तो माँ-बाप ने ही मुझे फिर से घर पर पनाह दी।’’ स्नेहा ने सिसकते हुए कहा।
‘‘कोई बात नहीं स्नेहा....अभी जिन्दगी खत्म नहीं हुई....जो हो गया उसे भूल जाओ, आगे का क्या प्लान है......अपने फ्यूचर की सोचो’’ मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा।
‘‘हाँ रोहन मैंने नौकरी ज्वाइन कर ली है यहीं लखनऊ में, ताकि अपने माँ-बाप पर बोझ न लगूँ, और अतीत भूलने में मदद मिले। ग्रेजुएशन के बाद मैंने कहीं नौकरी नहीं की थी और अब ग्रेजुएशन पूरी करने के 5-6 साल बाद नौकरी ढूँढने में थोड़ी दिक्कत तो हुई पर एक रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई है।’’ स्नेहा ने कहा।
‘‘तो अभी तो तुम यंग हो....और खूबसूरत भी हो....तुम्हे अभी भी कोई न कोई मिल जायेगा....शादी क्यों नहीं कर लेती।’’ मैंने मुस्कुरा कर उसकी तारीफ कर माहौल की गम्भीरता को कम करने की कोशिश की।
‘‘नहीं रोहन, एक बार धोखा खा चुकी हूँ, अब आगे अगर धोखा मिलेगा तो झेल नहीं पाऊँगी।’’
‘‘अरे स्नेहा...ऐसा नहीं है सब मर्द एक जैसे नहीं होते हैं।’’
‘‘हाँ रोहन जानती हूँ हर मर्द एक जैसा नहीं होता है। पर शायद सच्चा प्यार करने वाला मेरी किस्मत में नहीं है।’’
‘‘ऐसा नहीं है स्नेहा.....सच्चा प्यार करने वाला तुम्हारी किस्मत में है.....जो तुम्हें हमेशा सच्चा प्यार करेगा, बिना किसी लालच के।’’
‘‘अच्छा। कौन है वो जरा मुझे भी बताओ।’’
‘‘तुम्हारे सामने.....मैं हूँ स्नेहा......मैं तुमसे सच्चा प्यार करता हूँ। हमेशा से करता था और करता रहूँगा। कभी कहने की हिम्मत नहीं कर पाया पर आज कह रहा हूँ। शादी करोगी मुझसे? आस्ट्रेलिया चलोगी मेरे साथ?’’ मैंने दिल मजबूत करके स्नेहा से अपने दिल की बात का इजहार कर दिया।
‘‘क्या?....ओह गाॅड.....तुम मजाक तो नहीं कर रहे.......।’’
‘‘मेरी आँखों में देखो स्नेहा। क्या तुम्हे यह मजाक नजर आता है? क्या तुम्हे लगता है मैं तुम्हारे साथ ऐसा मजाक करूँगा।’’
‘‘पर तुम मेरे भाई हो रोहन।’’
‘‘भाई नहीं कजन हूँ स्नेहा, पर हमने हमेशा एक दूसरे को भाई-बहन से ज्यादा दोस्त माना है।’’
‘‘म...मुझे अभी कुछ समझ नहीं आ रहा है रोहन। मैं अभी जाती हूँ मैं आॅलरेडी लेट हो गयी हूँ आॅफिस के लिये। मैं तुमसे बाद में बात करूँगी।’’
‘‘ठीक है। मुझे इंतजार रहेगा। वेट मेरा नम्बर तो ले लो’’
मैंने स्नेहा को अपना मोबाइल नम्बर दे दिया। 2 दिन बीत गये फिर एक दिन उसमें मुझे काॅल करके एक पार्क में मिलने बुलाया।
पार्क में......
‘‘स्नेहा देखो....अगर उस दिन मेरी बात बुरी लग गई हो तो आई एम साॅरी.....शायद मुझे वह नहीं कहना चाहिए जो मैंने कह दिया।’’
‘‘साॅरी कहने की जरूरत नहीं है रोहन। साॅरी तो मुझे कहना चाहिए कि तुम्हारे प्यार को मैं महसूस ही नहीं कर पाई। उस दिन तुमने जो कहा अपने सच्चे दिल से कहा। पर आज मैं एक तलाकशुदा लड़की हूँ जो एक बच्चे की माँ भी है। अब मैं वो स्नेहा नहीं हूँ जिससे तुमने प्यार किया था। तुम्हे मुझसे बेहतर लड़की मिल जाएगी रोहन। मेरे और तुम्हारे माता-पिता भी शायद इस रिश्ते से खुश न हों।’’
‘‘स्नेहा....मेरे लिये कोई भी लड़की तुमसे बेहतर नहीं हो सकती। किसी और को मैं उतना खुश नहीं रख सकूँगा जितना मैं तुमको रखूँगा। और पैरेन्ट्स को मैं समझा लूँगा, वो मान जायेंगे।’’
‘‘ठीक है रोहन। मैं करूँगी तुमसे शादी। चलूँगी तुम्हारे साथ आॅस्ट्रेलिया।’’ आँखों में आँसूं लिये मुस्कुराते हुए स्नेहा ने कहा।
मिल चुका था अब मुझे मेरा......
खोया हुआ प्यार
 

Adirshi

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Agnipariksha


Wo ek asahay stri jab dus bara vasna main dube naradhamo ke beech main dabaye ja rahi thi tab uski wo vednapurn cheekhe, us karun asahay awaj main yachna ke sur un vasna ke andhe logo ke use bhogne ke attahas main vilin ho rahe the tab use apne pati aur bacche ki yaad aa rahi thi. Us samay use thodi der pehle apne pati ki aankhon main uske liye kuch kar gujarne wala josh use yaad aa raha tha. Un naradhamo ne uske pati ke garden par rakhe rampuri chaku ki dhar use baar baar yaad aa rahi thi aur jab uske pati ne chutne ki koshish ki to us jhatapat main uska khoon se sana hath bhi use yaad aa raha tha use apni aur apne pati ki paristithi apni aankhon ke samne dikh rahi thi.

Mahesh aur manisha apne shaadi ki teesri anniversary celebrate karne ke liye bahar gaye the. Dinner karke aur raat ka movie ka show dekh kar wo apne ghar ki or wapas ja rahe the lekin raste main hi kuch gundo ne unhe gher liya aur rampuri se unhe maarne ki dhamki di. Jab samne aur koi rasta najar nahi aaya to apne aur apni patni ki jaan bachane ke liye mahesh ne manisha ke sharir ke sare jevrat aur apne sharir par ki sari keemti cheeze nikal kar un gundo ke samne rakh di aur un sab chizo ko dekh kar un gundo main se ek bola

"Hume paise aur jevar to chahiye hi par usi ke sath hume ek raat ke liye teri biwi bhi chahiye hum use bhi apne sath le jayenge aur agar tune use bachane ki ya chillane ki koshish ki to use yahi tere samne maar dalenge"

Us gunde ki baat sun kar mahesh aur manisha ke man main ek hi sawal aa raha tha ke aaj maut kitni sasti ho gayi hai dono hi pati patni lachar najro se ekdusre ki aankhon main dekh rahe the

"Tum ab hamare sath aaogi ya yahi khatam kar de tere pati ko" un gundo main se ek manisha se bola jise sun kar manisha ke chehre par dar ke bhav ubharne lage apne bacche aur pati ka kya hoga isi soch main wo dubi huyi thi. Uska chota sa baccha ek panchi ke bacche ke saman ek kone main dubka sab dekh raha tha utne main mahesh ne un gundo main se ek muh pe 3-4 jordar ghuso ka prahar kiya lekin tabhi dusre gunde main rampuri ka ek waar mahesh ke hath par kiya jisse uski pancho ungliya khoon main naha gayi. Mahesh us dard se chatpata raha tha aur apne pati ki vedna dekhte huye manisha bhi dukh ke gehre sagar main dubti chali ja rahi thi lekin jald hi uske vedna yukt swar phut pade

"Please mahesh aap mujhe mere haal par chod kar chale jaiye aapko aur hamare bacche ko kuch ho gaya to mera sansar ugad jayega main aapke pair padti hu please mahesh aap ravi ko lekar ghar chale jaiye " manisha roye ja rahi thi

"Nahi mera kuch bhi ho jaye lekin main mere rehte ye nahi hone dunga "mahesh dard main chillate huye bola "e sala aisa nahi manega yaar abhi rampuri ghusa ke iski kahani yehich khatam kar dalta hu " ek gunda bola

"Nahi!! nahi.. aisa mat kijiye main aapne pair padti hu main aapke sath ek raat rukne ko tayar hu mere pati aur bacche ko kuch mat kijiye "manisha apne kaleje par patthar rakh kar bol rahi thi ye bolte huye uske hotho se shabd nahi nikal rahe the pura sharir thar thar kaap raha tha. Koi bhi stri apne pati ke samne aise shabd nahi bol sakti thi lekin manisha is waqt paristithi ki wajah lachar aur vivash thi. Use us paristithi ka ek ardhangini ke roop main samna karna tha. Manisha ko apni aage ki jindagi main andhere ke alawa kuch dikhai nahi de raha tha wo apne pati aur bacche ko bachane ke liye apne aap ko ek raat ke liye un shaitano ko kurbaan karne ko tayaar thi. Ek or to wo apna sharir unhe saup rahi thi dusri or uske man main santap bhara hua tha. Uski aankhon ke aage andhera chaya hua tha dhadkan tej ho gayi thi aur gala sukh raha tha.....

"Fir bol tere mard ko ki bacche ko leke ghar chala jaye chup chap" ek gunda bola

Manisha ne paristithi se hatash ho kar aakrosh aur yatna karte huye mahesh ko apne bacche ko lejane par vivash kar diya. Unke shabd khatam ho gaye the. Koi rasta najar nahi aa raha tha akhir main hatash aur nirash ho kar mahesh apni priya patni ko chod kar apne bacche ke sath ghar wapis ja raha tha manisha ne use apne sindur ki kasam di thi jisse mano mahesh ke pran hi nikal gaye the use laga mano manisha ne bacche ke bhavishya ki sari jimmedari us par daal di thi us kasam ki wajah se mahesh apni priya patni ke liye kuch nahi kar sakta tha manisha roti huyi apne pati aur bacche ko jate huye dekh rahi thi aur kahi door se us ilake main gane ke bol sunai de rahe the

'do hanso ka joda bichad gayo re
gajab bhayo raha julam bhayo re'

Us ek band room main jab wo vasna ke bhookhe manisha ke sharir ko noch rahe the tab manisha us pal ki yatnao main tadap rahi thi wo drishya kisi film ki bhati uski aankhon ke samne chal rahe the. Apne nishpap hatash lachar tadpate huye pati ki ghar wapas jati huyi akruti uski najro ke samne ghoom rahi thi. Apne pati ke kisi bhari patthar ke saman nirjiv pair use yaad aa rahe the.

wo naradham jab use apne sath le ja rahe the tab apne rote bilakhte bacche ko akhri baar dekh bhi nahi saki thi aur usko yaad karke wo nishpran ho gayi thi, uske jivan main uge huye suraj ko mano grahan lag gaya tha, wo apne bacche ke sar par ek baar pyaar se hath bhi nahi fer saki thi, apne pati ka akhri sparsh bhi anubhav na kar saki thi aur vasnadhin log kya wo ab use chhodenge?? manisha asankhya vicharo main ghum rahi thi aur har khayal ke sath uska man ghayal ho raha tha, us band kamre main uske muh se cheekhe nikal rahi thi, manvi nar usse jangli pashu jaisa bartav kar rahe the uske muh se cheekhe nikal rahi thi fir bhi dar ke mare wo waisi hi padi thi...

In naradhamo ki vasna ki bhukh agar aur badhi to ye fir uspar tut girenge aisa dar uske man main tha aur inhi vividh shanka ashankao main wo raat bhar tadap rahi thi, ek swatantra desh ki chinnvicchin samajvyastha aur khud ki haalat dekh ke uski aankhon main aag jal rahi thi....swatantra dekh ke swatantra nagrik ko hi is dekh main sanrakshan na milta dekh kar uska jalta hua man keh raha tha ki nishpran murda shashanvyastha ko aag laga di jaye.

Usne jis maa ke pet se janm liya uska garbhasgay use yaad aa raha tha jin mata pita ki god main wo chote se badi huyi thi wo godi manisha ko yaad aa rahi thi aur kaise shadi ke baad wo apne pati ke man ki swamini, uski ardhangini ban gayi thi ye sab kisi film ki tarah uski najro ke samne ghum raha tha aur dusri or mahesh ghar jane ke baad raat bhar tadap tadap kar jaag raha tha aur uske sath uska baccha ravi bhi jag raha tha... Apni kismat ko koste huye apne par aaye is dukh ke liye mahesh roye ja raha tha aur man hi man soch raha tha ki is duniya main jeena hi paap hai yaha hamesha chor ko chhod kar sanyasi ko hi fasi par chadhaya jata hai..

yaha koi gandhi ko maar deta hai koi yashu ko suli par latkata hai acche nishpaap logo ka ayushya aur astitva hamesha nakara gaya hai. kiske naseeb main kya likha hai kon jane?? yaha to jivan jeete huye jaha dekho waha aisa hi halat dikhta hai aise mai samanya insan jiye to kaise jiye?? he bhagwan main hi kyu?? mere sukh chinne main aapko kya milega?? jawab do bhagwan!!! aur wo ravi apne nishpaap najro se ektak apne pita ko dekh raha tha

college main mahesh aur manisha ki pehchan huyi. dono eksath padhte the. manisha mahesh ke vyaktitva se uski pratibha se prabhavit ho gayi aur akhir maa pita ki rajamandi se aur ashirwaad se dono jaat paat ka bandhan chhod kar shaadi ke bandhan main bandh gaye....dono ne pranay ke pal manmurad tarike se jiye aur thik samay main manisha ek bacche ki maa ban gayi aur matrutva ka sukh use prapt hua..us treta ke raavan ne sita ko ek hi samay do dukh nahi diye the lekin is kalyugi narpashuo ne manisha ko jo dukh diya jo uska chhal kiya wo mahabhayankar tha..ushone manisha ko apne pati se alag kiya fir uske bacche se bhi vanchit kar diya aise do dukh ramayan ki sita ko bhi ek samay par nahi jhelne pade the lekin undono dukho ka ghut manisha ne piya..ramayan ki sita bhi ek stri thi aur manisha bh ek stri hai aur ek mata bhi,,,ye sab dukh sehte huye us maa ke man ki kya avastha huyi hogi?? un kaam vasna ke adhin insano ne uske sharir par apni vasna ke nishan chhode the usne bachne ki jhatpat main manisha ke sharir ke kapdo ki chindhiya ho gayi thi...rote rote uska gala sukh gaya tha aur aisi haalat main usne karwat badli hi thi ke wo amanush ek baar fir uspar tut pade uske muh se ek bar fir wohi awaje nikal rahi thi..kisi hirni ko marte samay uske muh se jo vedna ke swar nikalte hai thik usi prakar ke swar manisha ke muh se nikal rahe the..uske man ke , uski bhavnao ke tukde tukde ho gaye the.....

uske baad jab manisha hosh main aati to uski aankhon ke samne wo kamra nahi tha nahi wo gunde the wo ek car main thi apni usi awastha main, car teji se daud rahi thi aur manisha ke kaan ke paas kisi ne bandook pakad rakhi thi....dheere dheere subah ho rahi thi ab bhi thoda andhera tha kyuki suraj abhi uga nahi tha.....car uske ghar se thodi dur ruki aur use raste par fek kar wo car andhere main gum ho gayi.

Manisha usi awastha main uth kar khadi rahi mano uske pair unlogo ne kaat diye hai aisa use laga usse thik se chala bhi nahi ja raha tha dheere dheere khud ko sambhalte huye wo footpath par se apne ghar ki or ja rahi thi...chalte chalte wo apne ghar ke samne aa pahuchi..jaha sabhi gharo ki light band thi wahi uske ghar ke drawing room ka light suru tha..usne ghar ka darwaja khola uske ghar ka har darwaja har khidki khuli thi mano usi ka intajar kar rahe ho aur apne ghar ki halat dekhte huye pata nahi usme kaha se shakti aa gayi uske ander ek alag hi sphurti ka sanchar hua aur kisi hawa ke jhoke ki tarah usne apne drawing room main pravesh kiya....

raat bhar apni maa ke liye jagta hua sukhe huye phul ke saman uska baccha laalsurkh aankhon se apni maa ki or dekh raha tha...use dekhte hi wo jakar apni maa se lipat kar rone laga aur manisha ki aankhon se bhi aansu bahe ja rahe the.....maa ke mamtamayi sparsh se bacche ko sukun mil raha tha aur wo maa apni akhari icha puri karte huye apne bacche ko chum rahi thi uske balo main se hath fira rahi thi.. pati nishpran lachar awastha main palang par baitha tha use dekhte hi mahesh ek jhatke main palang se uth khada hua....mahesh nishpran najro se ektak manisho ko dekh raha tha aur ek pal main wo fir se palang par gir gaya.....manisha apni suni aankhon se mahesh ki aankhon mai dekh rahi thi jisme use astha aur prem ka kewal marusthal dikhai de raha tha...uske dil ki dhadkan teji se badh rahi thi....

mahesh usi halat main himmat karke bola " aao mere paas baitho"

manisha ektak mahesh ke muh se nikle shabdo aur bhav ko samajh rahi thi aur uski or dekhte huye vicharmagna hogayi thi lekin jald hi uske muh se bhi shabd nikle "pehle naha ke kapde badal leti hu fir aapke paas aati hu"

manisha bathroom main gayi kuch pal bathroom se kapdo ka aur pani girne ka awaj aata raha lekin kuch hi palo main bathroom dhu dhu karke jalne laga...bathroom se dhua nikalne laga manisha ka sampurn sharir, uska astitva jal raha tha aur bathroom ka darwaja todne tak sab kuch jal gaya tha aur bache the kewal manisha ke awashesh!!

apne bacche ko god main liye rote bilakhte huye mahesh unhe jama kar raha tha.......


Bhartiya sanskriti ke itihas ki ye dusri 'AGNIPARIKSHA' thi...........
 

QUASAR

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Ek Adhuri Kahani

(Ek 22 Saal ka Ladka apni cycle bhagate hua college ja raha tha...Iska naam hai Aarush...vo aaj wapis late ho gaya tha cycle ko Parking mein laga kar vo sidha apni class ki aur bagha.. class ke door par pahunch kar...)


Aarush- May I Come In Sir..!!

Sir- ohh Mr. Letu a gaye tum...?


(Sir ki baat se puri class hasne lagi…)


Aarush- sorry Sir vo aaj thora kaam jada tha toh Late ho gaya...kal se jaldi ayunga…

Sir- assa karta kya hai tu...koi bahut bada business sambhal raha hai kya sath mein...tere kapdo ko dekh toh assa nahi lagta...chal beth jaa…


(Class ke kuch Ladke uska mazak banate hue dhire se bole..)


Ladka.1- yaar mujhe lagta hai bhai ki Bike traffic mein fas gayi hogi isliye bhai late ho gaya aane mein…

Ladka.2- lakin bhai ke pass toh bike hi nahi hai...bhai ke pass toh bicycle hai…

Ladka.1- oohh...bicycle...yeh toh ab kahi dikhti hi nahi hai..lakin bhai ke pass kaise ayi..?

Ladka.2- shayad bhai ne kisi kabad wale ke yaha se saste mein li hogi...

Ladka.1- hmmmm...yeh bhi ho sakta hai lakin bhai ke pass toh itne paise hi nahi hai, toh fhir kaise li..?

Ladka.2- (hasta hua)..shayad bhai ne apni pichli marwa ke li hogi...hahaahhaha…


(Uske sath jitne bhi ass-pass students the sab uski baat sun hasne lage...kuch ladkiyan bhi thi jo uss par has rahi thi…)


Ladka.1- hahahahhaha...ekdum sach bola tu...toh Aarush bhai yeh bata kitne dhako mein tune li apni cycle...hahaha…


(Jitne students ne uski baat suni sab hasne lage, lakin thori si duri par bethi ek Ladki sab sun rahi thi usse unn Ladko ki baato par bahut gussa a raha tha, vo wait kar rahi thi ki kab Aarush kuch bolega lakin Aarush kuch nahi bola aur sidha apni seat par jakar beth gaya, yeh dekh vo Ladki aur bhi gusse mein a gayi, vo utthi aur Sir se boli…)


Ladki- Excuse me Sir…

Sir- haan bolo TRISHA…

Trisha- (unn Ladko ki aur ishara kar)..Sir yeh teeno Ladke Aarush ko pareshan kar rahe hai, uska majak bana rahe hai…

Sir- Raj, Kamal, Deepak...khade ho jao tum teeno...


(Teeno Ladke muh latkaye khade ho jate hai…)


Sir- kya yeh sach hai...

Raj- hamne much nahi kiya Sir...(Trisha ko gusse se dekh)..Trisha jhuth bol rahi hai...chahe toh Aarush se puch lo…

Sir- Aarush kya tumhe inhone pareshan kiya, kuch bola kya…


(Raj usse gusse bhari najro se dekh raha tha…)


Aarush- nahi Sir...Raj ne aur kisi ne bhi mujhe kuch nahi bola…


(Raj uski baat sun muskura deta hai, lakin Trisha uski baat se herain ho jati hai, aur muh faade usse dekhti hai…)


Sir- thik hai betho sabhi...(Trisha ko dekh)..Trisha yeh kya mazak hai...tum idher padhne aati ho ya yeh sab ghatiya mazak karne…

Trisha- (muh latkaye)..Sorry Sir…

Sir- Sit Down…


(College khatam hone ke baad Aarush apna bag liye Parking ki aur gaya apni cycle li aur college ke ghate ki taraf jane laga ki piche se Trisha usko awaj lagati hui a rahi thi, lakin Aarush usse ignore karte hue sidha chalta gaya…)


Trisha- Aarush...Aarush..! Mujhe tumse kuch baat karni hai...ruko…(ekdum uske cycle ke samne hath phela ke khadi hoti hui)..behre ho kya tum..? Kab se bula rahi hu tumhe...sunte kyu nahi ho meri…

Arushi- bolo kya kaam hai…

Trisha- (uske cycle ke handle pe apne dono hath rakhti hui)..main waha tumhare liye unn Ladko ke khilaf bol rahi thi toh tumne unka sath kyu diya...bas haan hi toh bolna tha tumhe...tabhi vo class ke bahar hote aur aage se tumhe kabhi pareshan nahi karte...tab mujhe bahut gussa a raha tha tumpar, assa kyu kiya tumhne..?

Aarush- bas mera man kiya...aur mujhe unn Ladko ki baato se farak nahi padta…


(Trisha kuch nahi boli wahi apni kamar pe dono hath rakh uske cycle ke samne khadi rahi…)


Aarush- ab kya...hato ab samne se mujhe jane do…

Trisha- yeh mere sawal ka jawab nahi tha...aur tumhe farak nahi padta matlab, koi tumhe kuch bhi bole tum sun loge..?

Aarush- Okay...toh suno main Raj ko puri umer ka rona dena chahta hu…

Trisha- What...kya matlab hai tumhara..?

Aarush- yeh sab tumhare matlab ki baate nahi hai...(uske kandhe se pakad side hatata hua)...hato abhi mujhe jane do, mujhe der ho
rahi hai…


(Trisha waise hi usse jate hue dekh rahi thi...thori si herain bhi thi ki isne assa kyu bola ki vo Raj ko puri umer ka rona dena chahta hai...)



|Back To Aarush|

(Aarush ka iss Duniya mein apni Maa aur apni badi behan ke siwa koi nahi tha...Aarush ka ek chota sa ghar tha, Din Raat majdoori karke aur ek-ek rupe jodkar usne apni behan ki shaadi ek ache Ladke se karwayi thi, Lakin vo khud abhi padhna chahta tha taaki vo apni aur apni Maa ki zindagi behtar bana sake...apne College ki fees bhi vo roj din-raat majdori karke bharta tha...usse kabhi bhi kaam milta chahe vo khud kitna hi bimar kyu na ho lakin vo kaam ko kabhi naah nahi kehta...usse sirf apni padhai se matlab tha, koi kitna hi usse sunaye usse farak nahi padta tha, kyuki gali-galoch aur dhaka-mukki jab bhi vo majdoori karne jata toh sunta aur jhelta tha, usse ab aadat ho chukki thi, lakin ek aur wajhe thi ki vo Raj ko kuch nahi kehta tha...)


(Aaj subhe Aarush majdoori karne jaldi gaya tha, uski Maa aaj bimar thi, kuch paise jod kar usne apni Maa ke liye dawai li aur kuch paiso ka ghar ka rashan...ghar aakar usne apni Maa ko khud khana bana kar khilaya aur fhir usse dawai khilakar sone ko kaha...lakin uski Maa janti thi ki majdoori ki kamayi kitni hoti aur aaj toh uski dawai bhi ayi hai, toh paise bahut kam bache honge aur itne paiso mein bas itna hi rashan aya hoga ki ek admi ki bhukh mit sake, toh aaj uska beta bhuka hi college gaya hai…)


(Aarush apne ghar pahunch chuka tha...garmi mein cycle chala kar vo bilkul pasine se bhiga hua tha...cycle ko side mein laga kar usne darwaje ko kat-kataya…)

(Takk Takk Takk)


(Kuch der baad uski Maa ne aakar darwaja khola jo Aarush ko dekh kar khush ho gayi...lakin jaise hi usse yaad aya ki vo toh aaj bhukha hi ghar se chala gaya toh usse bada dukh hua aur aankho mein aasuon a gaye…)


Maa- (uske face par pyar se hath pherti hui)...a gaya beta...aaja…!

Aarush- (andar jata hua Maa ko side se gale laga ke)...kaisi ha Maa abhi apki tabiyat...Dawai li thi apne time par...

Maa- haan beta, main thik hu abhi, aur Dawai bhi maine time pe leli thi...(apne dupate se uske chehre par a raha pasina saaf karti hui)...kitna pasina a rakha.. beth tu main khana lekar aati hu…

Aarush- (herani se)...Maa khana..? Lakin rashan toh khatam ho gaya tha subhe hi, jo apne aur maine khana khaya...toh fhir abhi Rashan kaha se aya Maa..?

Maa- (muskurati hui)...teri Maa hu main, janti hu ki tune subhe bhi khana nahi khaya tha, yeh main kaise kar sakti ki mera beta bhukha hi ghar se jaye aur jab laut kar aye tab bhi mera pas tujhe khilane ko kuch na ho...hmm..? ab tu jada sawal-jawab mat kar aur Khana kha le main lekar aati hu…


(Aarush kuch soch raha tha ki jarur uski Maa ne kuch na kuch bech kar hi paiso ka intzam kiya hoga, vo soch raha tha ki aakhir uski Maa kya bech sakti hai...fhir kuch soch kar usne apna mobile nikala aur Apni Maa ke phone par Call lagaya...jiske jawab mein phone switch off aane laga, usne utth kar aas-pass dekha lakin usse uski Maa ka mobile kahi nahi mila toh vo samaj gaya ki uski Maa ne mobile bech kar paise jode the aur rashan layi thi, utne mein uski Maa bhi a gayi khana lekar aur usne Aarush ko pareshan sa dekha toh khud pareshan ho gayi…)


Maa- kya hua beta...tu pareshan kyu lag raha hai..?

Aarush- Maa apne mera diya hua toofha bech diya...Maa aap mobile se Didi se baat kar liya karti thi, aap ghar mein akeli gum-shum bethi rehti thi isliye maine vo mobile apko diya tha, Didi bhi apse baat karke kitna khush ho jati thi...assa kyu kiya apne…


Maa- beta...koi baat nahi...teri bhukh se jaruri nahi tha vo mobile, aur meri aur teri Didi ki baate bhi jaruri nahi hai...chal ab jada nahi bol aur khana kha le…


(Aarush bhi jada apni Maa ko tang nahi karta aur khana khane beth jata hai...Aarush khana kha raha tha aur uski Maa pankhi se usse hawa de rahi thi, jisse Aarush ko ek alag hi sakoon mil raha tha...Khana khane ke baad Aarush roj ki tarah apne kaam pe nikal gaya...)


|Agle Din College Mein|

(Aarush aaj waqt par college pahunch gaya tha, Parking mein vo apni cycle park karne ja raha tha ki raste mein usse Trisha mil gayi, uske sath uski dost ADITI bhi thi…)


Trisha- (usse dekh khush hoti hui) Hi...Aarush…

Aarush- Hello…

Trisha- kaise ho tum…

Aarush- main thik hu…

Trisha- Okay…

Aarush- (cycle ko stand laga uski aur dekhta hua)...hanji, main bilkul thik hu aur kuch…

Trisha- aur toh kuch nahi,...(ekdum se)...haan.. mujhe puchna tha ki apne kaha tha……

Aarush- (bich mein)..apne..?

Trisha- mera, mera matlab tune kaha tha ki Raj ko puri umer ka rona dena hai...

Aarush- haan maine kaha tha…

Trisha- lakin kyu...kya matlab hua iska...

Aarush- hhaasshh...tum aakhir chahti kya ho mujhse…

Aditi- (dhire se, muskurati hui)...tumhe chahti hai..!!

Aarush- kya..!!!

Trisha- (Aditi ke pair pe pair marti hui)...kuch nahi...(Aditi se)...tu ja na apni class mein, kyu mujhe pareshan kar rahi hai…


(Aditi waha se apna muh latkaye chali jati hai…)


Trisha- toh ab batao na…

Aarush- dekho aaj main bahut dino baad time pe college aya hu toh main nahi chahta ki aaj wapis teri wajhe se late ho jayu…

Trisha- toh college ke baad...kisi cafe mein..?

Aarush- (sochta hua)...aaahhh laki…..

Trisha- (uska hath pakad milati hui)...Okay done…


(Aur itna bol Trisha waha se bhag gayi...Aarush bhi kuch der sochta raha aur fhir apna bag pakad class mein chala gaya…)


(Sham 4 baje, Aarush aur Trisha dono ek café mein aamne-samne bethe the...Aarush toh pehli baar hi café mein aya tha…)


Trisha- toh batao abhi…

Aarush- bahut ziddi ho, mujhe yaha le hi ayi...toh suno ek din main ground mein betha book read kar raha tha ki waha Raj aur uske dost a gaye...meri thori hi duri par bethe mera mazak udhane lage...maine unhe kuch nahi kaha, lakin vo meri sharafat ka fyada uthane lage, aakhir unhe vo kar diya jo unhe nahi karna chahiye the...

Trisha- kya kiya unhone..?


|Few Days Back|

Raj- acha ek aur baat batata hu…

Kamal- kya baat bhai…

Raj- yeh jo hamare samne Ladka betha haina…

Deepak- kon yeh Aarush kya bhai…?

Raj- haan...iski Maa silayi ka kaam karti hai, aur pata hai maine suna hai iski Baap nahi hai toh Aurat ke ander ek khujli toh rehti hi haina, kyu mante hona…

Kamal- haan bhai yeh baat toh sahi kahi…

Raj- wahi toh ab jab iska Baap hi nahi hai toh bechari apni khujli door karne kisi na kisi ke pass toh jati hogi naa…hahahhahah…

Deepak- hahahahha, haan sahi kaha bhai...lakin iski Maa silayi ka kaam karti isse iska kya lena dena hua fhir…

Raj- jab iski Maa ki chut jada faad jati hai toh silayi hi kaam aati haina…hahahhahahhahahha…

Kamal- hahahahha...kya baat kahi bhai...hahahhahahhahahha…

Deepak- bhai kahi aap mat chale jana khujli shant karne warna silayi kahi kaam nahi ayegi...hahahahh...aaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh aahhh...mar gaya ohh behanchod…


(Yeh Aarush tha jo kab se apni Maa ke bare mein kitchad jaise word sun raha tha ab uska gussa asman faad ho chuka tha, usne pass mein pada ek pathar liya aur sidha Deepak ke sar pe de mara…)

Raj- utth ke uski taraf aata hua, oye sale yeh janta hai tune kya kiya...(achanak darta hua)...piche, piche phek usse, dekh lag jayegi…

Aarush- (apne hath mein pathar liye uske aage aata hua)...kya bola tu, meri Maa ke bare mein assa bolega, sale teri jaan le lunga aaj…


|Back To Aarush|

Trisha- (uska hath pakad hilati hui)...fhir, fhir kya hua Aarush..?

Aarush- fhir hamare bich kaafi ladai hui, maine unhe kaafi zakhmi kar diya tha lakin mujhe bhi kaafi lagi thi...Lakin uski agli subha....


|Next Morning|

(Raj ka Baap Gopal ek Police wala tha vo apne 4-5 hawaldaro ke sath Aarush ke ghar pahuncha...)


Gopal- (Aarush ki Maa se)...eeh Sali beta kaha hai tera, jaldi bata…

Aarush's Mom- kya hua sahab…

Gopal- jada jubaan mat chala, apne bete ko bula jaldi..


(Aarush ki Maa jaldi se Aarush bula ke bahar le aati hai…)


Gopal- toh tu sale vo jisne mere bete par hath uthaya usse mara…

Aarush’s Mom- (herani se)...yeh aap kya keh rahe ho Sahab, mera beta assa kabhi nahi kar sakta…

Gopal- eeh rand tu chap kar...aaj dekh main tere……aaaahhhh behanchod…


(Yeh Aarush ne Gopal ke muh par thappar mara tha jab usne uski Maa ko ganda shabad kaha…)


Aarush- tere bete ko bhi isliye mara tha, meri Maa ke bare mein kuch ulta-sidha bolega toh jaan le lunga teri…

Gopal- (gusse mein)...sale tu lega meri jaan, ruk abhi…


(aur Gopal ne apni lathi pakad itni jor se Aarush ki tango par mari ki Aarush ek jordar cheekh ke sath niche gir gaya…)


Gopal- sale mujhe thappar marne ki teri himmat bhi kaise hui...aur teri Maa ko toh aaj main chode bina nahi jayunga...dekhta hu kya kar lega tu...Hawaldar pakdo iss haramzade ko kas ke…)


(2 Hawaldaro ne Aarush ko pakad ke diwar ke sath laga liya…)


Aarush’s Mom- nahi sahab assa mat karo, mere bete ko chhod do…


(Gopal uski taraf dhayan na deta hua sidha Aarush ke samne aakar khada ho jata hai…)


Gopal- tu lega meri jaan...(aur ek aur kass kar laathi Aarush ki dusri tang par mardi….)...Haan bol tu lega meri jaan…

Aarush- (dard se tadapta hua)...ooooooaaahhhhhhhh Maaaaa…

Aarush’s Mom- (Gopal ke samne jakar haath jodti hui)...usse maaf kardo sahab, aage se vo apke bete ko hath bhi nahi lagayega…

Aarush- hath mat jodo Maa iss kutte admi ke samne...isko jaan se maar dunga, yeh wada hai mera…

Gopal- jaan se toh tab marega na jab tere mein jaan bachegi…


(Aur itna bol Gopal ne apni laathi ka war Aarush ke muh par kar diya, jisse uski gaal par gehra nishan aur kaan se khoon nikal gaya...Aarush bura tarah tadaph uttha...Gopal ne Aarush ko agle 10 minute tak bura tarah se mara.. uske sharer ke har hisse se khoon beh raha tha...Uski Maa ka roo-roo kar bura haal tha...vo Gopal ke pau pakad usse rok rahi thi lakin vo uski ek nahi sun raha tha…)


Aarush’s Mom- please Inspector shahab mera beta mar jayega...chhod dijiye usse…

Gopal- (usko uper se niche tak ghurta hua)...Sali maal hai tu toh abhi bhi...chal main tere bete ko chhod deta hu, lakin tujhe mera bistar garam karna padega…

Aarush- (gusse se apni ladkharati juban se bolta hua)...Nahi Maa...aahhh assa kuch mat karna...yeh, dekhta hu yeh behanchod mujhe kitni der mar lega …

Aarush’s Mom- (herani se Gopal ko dekh)...yeh aap kya keh rahe ho Sahab, main assa nahi kar sakti…


(Gopal ne gusse se aage badh apni laathi Aarush ke muh mein ghussa di…)


Gopal- (gusse se chilata hua)...behanchod Sali, ab bol, aukaat kya teri mere samne, Sali ko ek mokka de raha hu apne bete ko bachane ka lakin nahi, yeh le fhir uska mara hua muh dekh…


(Itna bol Gopal ne laathi ka jor Aarush ke muh mein dal diya, Aarush ki halat kharab ho chuki thi, Gopal thora aur jor lagata toh Aarush ki jaan chali jati…)


Aarush’s Mom- (roti hui Gopal ke pairo mein gir kar)...nahi nahi, chhod do usse chhod do, main main taiyar hu...aap jo chahe karlo mere sath.. (hath jod) mere bete ko chhod do, mar jayega vo...mar jayega…


Gopal- (hasta hua)...hahahahaha, yeh hui na baat...chal tu kamre mein, aata hu main…


(Aarush ki Maa apna muh latka ke apne bete ki aur dekhti hai toh vo usse najre nahi mili pa rahi thi...uska beta usse chilla-chilla kar rukne ke liye bol raha tha lakin vo nahi ruki aur roti hui apne kamre mein chali gayi...Aarush ko bahut jada gussa aya vo zakhmi halat mein hi uttha aur Daud kar Gopal ke uper chalang mardi, Gopal niche gir gaya aur Aarush uski chhati par beth usse ghusse marne laga, Itne mein ek hawaldar ne Aarush ke sar ke piche Laathi mardi jisse 2 pal mein hi Aarush sar ke bal piche gir gaya aur behosh ho gaya…)


Gopal- (apni naak se beh raha khoon saaf karta hua) behanchod kitna harami ladka hai...bahut hero ban raha hai, halat nahi dekh raha apni.. pade rehne do sale ko asse hi, agar hile toh ek aur lagana…


(Itna bol Gopal Aarush ki Maa ke kamre mein chala gaya…)


|Back To Aarush|

(Aarush batata-batata ruk gaya tha...uski aankho se aansoo jhad-jhad beh rahe the...aur udher Trisha ki halat bhi same hi thi, Aarush aur uski Maa ke bare mein sun usse Gussa aur aankho se aansoo ek-sath a rahe the...vo utth kar Aarush ke side wali chair par beth gayi aur uski aankho mein a rahe aansoo apne hath se saaf karne lagi…)


Trisha- mat roo Aarush, hum uss Inspector ko saja dilwakar rahenge...aage kya hua bataoge…

Aarush- Aage..? Aage kya sunna chahti ho tum...haan..? maine ussi din khud se wada kiya tha...(gusse se)...ki uss Gopal ko main jinda jala dunga...tabhi meri man ko shanti milegi...samjhi tum…

Trisha- (dar kar)...thh thik hai, lakin tum mujhpar gussa kyu ho rahe ho...maine kya kiya hai…

Aarush- (ek lambi saas lekar)...haaashhh, hmm sorry...mujhe thora gussa a gaya tha…

Trisha- koi baat nahi...lakin tum aage kya karna chahte ho...I mean tum uss Gopal ka kya karoge..?

Aarush- pata nahi...lakin abhi main bas shant hone ka dikhawa kar raha hu uss Raj ke samne, jis din mokka mila main uske baap Gopal ko thokk dunga…


(Kuch der tak dono chup rahe...thori der baad waha ek waiter aya aur bola..)


Waiter- Sir, Madam, aap kuch lenge nahi kya...bahut der se aap asse hi bethe hai...kuch lekar aayu apke liye…

Trisha- 2 cold coffee…

Aarush- par main toh coffee……

Trisha- (uske hath par hath rakh rokti hui)...2 cold coffee please…

Waiter- Sure Madam…


(Trisha ne apna hath abhi bhi Aarush ke hath ke uper rakha hua tha, Aarush usse dekhta hai aur fhir Trisha ko dekhta hai...)


Trisha- kya hua…

Aarush- abhi tum hata sakti ho apna hath…

Trisha- (muskurati hui) kyu jada bhari hai kya…

Aarush- nahi, bhari toh nahi hai lakin…..

Trisha- (bich mein)...lakin kya...(uska hath kas ke pakadti hui)...agar main tumhara hath asse kas ke pakad bhi lu toh kya ho jayega...


(Aarush usse muskura ke dekhne laga toh Trisha ko samaj aya ki vo kya kar rahi hai...usne jhat se uska hath chhod diya...thori der mein coffee a gayi dono coffee pine lage...issi bich dono ek-dusre ko najre chura-chura kar dekh rahe the...Trisha ko toh pata tha ki usse Aarush ko asse dekhna kitna pasand hai lakin Aarush ko samaj nahi a raha tha ki usse Trisha ko dekhna ka man baar-baar kyu ho raha hai...)


(Fhir Dono ek Sath bole)


Aarush, Trisha- acha tumhara Number kya hai…


(Aur dono ek sath hass pade...fhir dono ne Number exchange kiye aur dono apne-apne ghar chale gaye…)


(Agle din dono college ki parking mein dubara mile…)


Trisha- kaise ho tum…

Aarush- thik hu...

Trisha- acha kal se main tumhe lene a jaya karu...apni scooty par..?

Aarush- kyu main apne cycle par ayunga...roj aata hu…

Trisha- lakin tum iske sath late bhi toh hote ho...please mana mat karo, ab toh hum dost haina…

Aarush- (muskurata hua)...hmm yeh toh bilkul thik kaha, aaj dost ne pehli baar kuch manga hai mujhse toh…

Trisha- (muskurati hui)...toh dost ki baat man.ni chahye…

Aarush- haan bilkul man.ni chahiye...aap aa jana mujhe pick karne...ab toh khush ho…

Trisha- haan bahut...heheh…


(Asse hi wahi khade-khade dono mein baate hoti rahi, Aarush usse baat kam kar raha usse dekh jada raha tha...uska vo khil-khilta chehra uske sare dukh usse bhula raha tha...)


Trisha- haan ek aur jaruri baat...(usko yuu khud ko ghurte dekh, muskurati hui)...hello, Aarush sun rahe ho meri baat.. Aarush..!!

Aarush- (apne khayalo se bahar nikal)...haa haan, kya bola tumne, tumhe kuch jaruri kaam hai..? thik hai baad mein baat karte…

Trisha- (apni kamar par hath rakh)...maine kaha ki ek jaruri baat hai, jaruri kaam nahi...kaha khoye ho tum…

Aarush- nahi kahi nahi, batao tum kya baat hai jaruri…

Trisha- parso mera Birthday hai...aur uski party mere ghar par hai...toh….

Aarush- toh kya..?

Trisha- toh kya matlab, tumhe aana hai mere Birthday pe aur kya…

Aarush- Ohh...Birthday hai apka…

Trisha- Hanji...full taiyar-waiyar hokar anna…

Aarush- (sochta hua)...Okay…


(Class ka time ho gaya tha fhir dono jaldi se class mein chale gaye...college ke baad Trisha Aarush ke sath-sath uske ghar tak a gayi...uska chota sa ghar tha...Maa bahar lage phoolo mein pani dal rahi thi…)


Aarush- kya hua...aayo na…

Trisha- (muskurati hui)...haan chalo…

Aarush- Maa isse milo, yeh meri dost Trisha hai…

Maa- (khush hoti hui)...kaisi ho beti…


(Trisha ne jab uski Maa ko dekha toh Aarush ki kahi hui baate yaad anne lagi...Uski aankhen wapis gili ho gayi usne bhag ke uski Maa ko gale laga liya…)


Aarush’s Mom- kaisi ho beta tum…

Trisha- main thik hu Aunty, aap batao kaisi ho…

Aarush’s Mom- (uski gaal par pyar se hath pher)...main bhi bilkul thik hu…

Aarush- Maa, Trisha tum log ander chalo main bas thori der mein aata hu…

Aarush’s Mom- thik hai beta...chalo ayo beta tumhe apna gareeb khana dikhati hu…

Trisha- nahi Aunty assa mat boliye...apka ghar bahut sundar hai…

Aarush’s Mom- hmm jo bhi hai jaisa bhi hai isse Aarush ne apni mehnat se khada kiya hai…

Trisha- Aarush bahut mehnat karta haina…

Aarush’s Mom- haan beti...meri bhukh-pyass, dawa-daru ki hamesha chinta rehta hai, lakin khud ki koi chinta nahi karta chahe pura din bhuke pet nikal de...abhi bhi tu aayi haina toh kisi na kisi tarah paiso ka intzam karne gaya hoga, taaki tum hamare ghar se bina kuch kahaye na chali jayo…

Trisha- kya..!! Are Aunty apne mujhe yeh pehle kyu nahi bataya...main yaha khane thori aayi thi, bas apka ghar dekhne aur apse milne aayi thi...(darwaje ki aur dekh)...yeh dekho a gaya…

Aarush- kya hua…

Trisha- kaha gaye the tum…?

Aarush- vo, kuch kahne ko lane gaya tha...tum pehli baar mere ghar toh socha….

Trisha- socha iska pet bada karke yaha se bheju.. haina...?


(Aur itna bol Trisha ne Aarush ko side se gale laga liya...uske halke aansoo beh rahe the.. Aarush aur Uski Maa khamoshi se usse dekh rahe the, kuch der koi kuch nahi bola…)


Aarush- kya hua Trisha…

Trisha- kyu karte ho tum asse…

Aarush- are khane-pine ke hi toh cheeze laya hu.. isme kya badi baat hai…

Trisha- (usse alag hokar) lakin tum bahut mehnat se paise kamate ho.. Aunty bata rahi thi abhi tum log badi mushkil se apna pet bharte ho toh mere……

Aarush- (uske hontho par apni ungli rakh) ssssssshhhhh.. kuch mat bolo, pehli baar ghar aayi ho asse kaise jane du tumhe, haan.. (Khane ka saman apni Maa ko pakadta hua) Maa yeh lo banakar lao kuch Acha sa…

Aarush’s Mom- (muskurati hui) haan vo toh thik hai lakin tum dono itna chipak-chipak kar kyu khade ho.. kuch baat toh nahi chal rahi tum dono mein…?

Trisha- (sharmati hui) vo Aunty nahi assa kuch nahi hai…

Aarush- haan Maa, hum dost hai bas…

Aarush’s Mom- (hasti hui) acha thik hai…


(Fhir Trisha ne khana-wana khaya aur thori der baad apne ghar chali gayi.. kuch der baad Aarush bhi majdoori karne nikal gaya…)


|Raat 3 Baje|

(Aarush thori der pehle hi ghar aaya tha.. vo apne karme mein aaya hi tha ki usna mobile ring hone laga…)


Aarush- Hello Trisha…

Trisha- Hello Kaise ho…

Aarush- main thik, kya hua itni raat ko call, sab thik toh hai…

Trisha- haan sab thik hai baba, maine toh asse hi call kiya tha, kyu nahi kar sakti kya….

Aarush- nahi, kar sakti ho...

Trisha- (muskurati hui) hmmm.. acha main kehne wali thi ki mere Birthday pe koi gift mat lana.. Okay...

Aarush- kyu.. mere hath ka gift nahi chahiye apko...

Trisha- assa nahi hai main bas chahti hu ki…..

Aarush- (bich mein bolta hua) yeh gareeb Ladka mujhe kya hi acha gift de payega, isse acha bol du rehne do.. haina..?

Trisha- (gusse se) Aarrushh..!! Main assa soch bhi nahi sakti.. asse kaise keh diya apne yeh.. main bas chahti thi ki inn bekar ke gift aur dikhawe par paise kharch mat karo.. aap bas mere Birthday par a jao wahi mera sabse bada gift hoga.. lakin aap toh mujhe galat samaj rahe ulta mujhe hi suna rahe...

Aarush- ohh are sorry.. sorry sachme mujhe bura lag raha, assa nahi kehna chahiye tha mujhe…

Trisha- (Chup)

Aarush- Hello…

Trisha- (Chup)

Aarush- Hello Trisha..? kuch toh bolo.. acha naraj ho gayi ho.. hmmm.. maine suna hai Ladkiyan Chocolates se jaldi mann jati hai.. lekar ayunga apke liye dheer sari Chocolates.. thik hai…

Trisha- nahi mujhe nahi khani Chocolates…

Aarush- kyu apko nahi Pasand Chocolates…?

Trisha- Nahi Pasand…

Aarush- hmm lagta bachpan mein Chocolate kha-kha kar dant sadd kar toot gaye honge, ussi ka dar hoga.. hahaha…

Trisha- aap mera mazak udha rahe…

Aarush- nahi main toh apki tariff kar raha tha.. hahah.. acha sorry.. (pareshan karta hua) waise main puch raha tha ki apke dant kaise toote the..?

Trisha- vo toh chuha le jata Dant…

Aarush- acha Dant chuha le jata, assa bhi hota hai…

Trisha- haan apko nahi sikhaya apki Mumma ne.. jab mere Dant toot jate the toh meri Mumma kehti thi ab chuha ayega aur isse le jayega…

Aarush- waah.. nahi chuha apke itne bade Dant ka kya karega…

Trisha- vo mujhe kya pata.. vo lekar gaya usse pata…

Aarush- kya bolti ho.. kuch bhi matlab…

Trisha- hihihihi…

Aarush- chalo soo jao, bahut raat ho gayi hai…

Trisha- thik hai bye.. acha ek minute mujhe kuch kehna hai…

Aarush- haan kaho…

Trisha- Main Apni Yeh Zindgi Teri Giraft Mein Kaat Lu Toh Chalega Kya..
Tumhe Tumse Maang Lu Toh Chalega Kya..
Tumhare Dard Aadhe Baant Lu Toh Chalega Kya..
Bheed Mein Tumhe Apna Keh Kar Tumhe Chum Lu Chhaant Lu Toh Chalega Kya..
Tumhe Tumse Maang Lu Toh Chalega Kya…

OKAY BYE GOODNIGHT.. hihihihi…


(Aarush uski yeh baate sun muskurata hua kuch sochne laga...)


|NEXT DAY|

(Trisha ka kal Birthday tha Aarush aaj college nahi gaya tha usse Trisha ke liya mehnat kar ek acha sa gift lena tha.. subhe jaldi utth kar Aarush majdoori karne nikal gaya, sham tak pasina baha-baha kar usne 5,6 hazaar Rupee ekatha kar liya the, uski khud ki savings jo karib 10 hazar thi, jisse usne khud kabhi badi se badi jarurat padne par Use nahi kiya tha aaj usne vo paise Trisha ke liye nikal liye.. inn paiso se Aarush ne Trisha ke liye ek Gold Ring li.. jiske ander chota karte likha hua tha I LOVE YOU TRISHA…)


|NEXT DAY|

(Aarush aaj Trisha ki Birthday Party mein jane ke liye ready ho chuka tha, aaj vo bahut khush lag raha tha, vo ek baar apni Maa ke gale mila aur fhir kuch der baad vo Trisha ke ghar ke samne khada tha.. kaafi bada ghar Trisha ka.. Trisha ne dorr se Aarush ko dekha toh vo wahi se bhag ke uske pass aa gayi…)


Trisha- (muskurati hui) hmm.. toh a gaye Mr.

Aarush- haan anna hi tha, kisi ne itne pyar se bulaya tha toh naah kaise kar sakta tha…

Trisha- acha, toh gale nahi lagayoge…


(Aarush aage bagha aur Trisha ko gale laga liya..)


Aarush- Happy Birthday Trisha…

Trisha- (usse aur kasti hui) ThankYou.. (aur usne Aarush ki gal par ek kiss kar diya)

Aarush- yeh kiss kis liye…

Trisha- yeh main ThankYou asse hi bolti hu…


(Aarush muskuraya aur usne Trisha ko kamar se pakad side diwar se chipka liya, dono ek-dusre ki aankho mein dekh rahe the…)


Aarush- (uske samne gift ka box karta hua)...yeh apka Birthday Gift…

Trisha- Gift...lakin maine kaha tha na ki mere...liye…..

Aarush- (apna face uske aur najdek lakar)...ssssssshhhhh, yeh Gift shayad main na lata agar uss raat aap hume vo shayari na sunati toh…

Trisha- (Gift pakad ke, muskurati hui)...acha…


(Trisha apne honth Aarush ko hontho ki aur badha rahi thi ki ek Ladki waha aa gayi…)


Ladki- Didi...aap yaha kya kar rahi ho, Papa bula rahe apko…

Trisha- (hadbada ke)...haan choti tu chal main ayi abhi…

Ladki- Okay Didi…

Trisha- (Aarush ko dekh muskurati hui) chale.. waise yeh meri choti behan hai...Vanya..


(Dono asse hi baate karte hue ghar ke ander pahunch gaye, yaha ek bahut bada jhatka Aarush ka intzar kar raha tha...ander pahunchte hi Aarush ko thori duri par khada Gopal apne hawaldaro ke sath dikh gaya…)


Aarush- (gusse se)...tumne Isse bhi bula rakha hai, yeh kya kar raha hai yaha…

Trisha- (ghabhrati hui)...kya hua Aarush, kise bula rakha maine…

Aarush- Gopal ko,...(ishara kar)...wahi hai Gopal…

Trisha- (chonkti hui) what...kya yeh vo Gopal hai.. dekho Aarush tum gussa mat ho, maine isse nahi bulaya, yeh Papa ke khass dost hai.. mujhe nahi pata tha ki yahi vo Gopal hai, warna main isse ghar mein pair bhi nahi rakhne deti…

Aarush- (apna gussa control karta hua)...iske chehre ki muskan mujhse bardash nahi ho rahi...fikar mat karo party barbad nahi karunga main…


(Fhir kuch der baad Gopal ki najar bhi Aarush par padi, Aarush akela ek side mein drink pe raha tha, Gopal apne Hawaldaro ke sath muskurata hua uske pass aakar khada ho gaya..)


Gopal- Are Patel…

Patel- haan sir…

Gopal- yeh toh wahi haina, jiski Maa ki gehrai naapi thi uss din…

Patel- haan sir wahi hai...hahhahaha…


(Aarush ko bahut gussa aya uski iss baat par, usne bahut koshish ki, ki koi hungama na ho lakin…..)


Gopal- iske ghar mein aakar iski Maa chod ke chale gaye, aur bechare ko pata bhi toh agli subha laga hoga...haan beta ek aur baat teri Maa ne shayad tujhe nahi batai hogi, sharma rahi hogi na bechari kaise batati, chalo main batata hu vo baat yeh hai ki tere behosh hone ke baad yeh charo Hawaldar bhi teri Maa ke kamre mein aye the...aur teri Maa ke maze lekar gaye the...hahahhahhaha...kyu laga jhatka...hahahhaahhahahahaha…


(Gopal aur uske Hawaldar jor-jor se has rahe the baaki sab bhi unki aur dekh rahe the ki kya hua hai waha...lakin Aarush jo gusse se phat chuka tha uski baat sun usne apne hath mein padki beer ki botle ko gusse se itni jor se dabaya ki bottle aadhi uske hath mein toot gayi, Aarush piche Gopal ki taraf ghuma jo abhi dant faad ke hass raha tha...Ekdum se Aarush 2 kadam aage badha Gopal ki coller pakdi aur apne hath mein pakdi aadhi tooti bottle ko sidha Gopal ki garden mein ghusa diya…)

Aarush- (bottle uski garden mein aur ander ghussa ke ghumata hua)...Kyu laga jhatka...haan...


(Gopal mar chuka tha, Aarush ke hath main ab sirf uski lash thi, uski garden kisi jharne ki tarah khoon baha rahi thi...Aarush ki iss harkat ne ghar mein ekdum se mahol shant kar diya, sab Aarush ki aur herani se dekh rahe the, kuch ghabra chuke the, lakin sabse jada toh Trisha ki halat kharab thi, usne jaise hi yeh scene dekha vo apne ghutno par beth gayi, usse jaise koi hosh hi nahi tha...lakin ek aur awaj thi jisse sun sab uski aur dekhne lage…)


Raj- (chikhta hua)...Daaaaadddddd…


(Yeh Raj tha Gopal ka beta, jo abhi-abhi aaya tha aur aate hi usne dekha ki Aarush uske Dad ki garden mein bottle ghussa ke betha hai...vo rota hua uski aur gaya aur Aarush ko gale laga liya…)


Raj- (aansoo bahata hua)...tumhe mere Dad ko mar diya, Aarush tumne mere Dad ko mar diya...(gusse se)...tumne mere Dad ko maarr diyaaa Aarrrruusshhhh…


(Itni bol Raj ne apne piche se gun nikali aur Aarush ke pet pe rakh...Thhhhhaaarrrrrr, Thhhhhaaarrrrrr, Thhhhhaaarrrrrr, Thhhhhaaarrrrrr, Thhhhhaaarrrrrr...back to back 5 baar trigger daba diya…)


|BACK TO PRESENT|


Ladki- (Trisha ka hath hilati hui)...fhir kya hua Mumma…

Trisha- (apne aansoo ponch)...fhir kuch nahi beta, The End...yahi story ap likhana writing contest mein, Okay...jao abhi soo jao bahut raat ho chuki hai…

Ladki- (Trisha ko kiss karti hui)...Okay Mumma...Good Night…


(Vo Ladki apne room mein chali gayi, Pas bethi Vanya Trisha ke pass ayi uske aansoo saaf kiya aur usse gale se laga liya…)


Vanya- Didi...ab aur kitna yaad karogi usse, vo mar chuka hai abhi apki bhi ek life hai, uspar dhayan do, jitna usse yaad karogi utna hi apko aur dard hoga...bhul jao usse, ab toh itne saal ho gaye aur kitna royogi, abhi Bas Kriti par dhayan do aap...(uske sar par hath pherti hui, chonk ke)...apko toh bukhar hai Didi, let jao aap main medicine lekar aati hu…



(Vayna usse wahi bed par leta deti hai, Trisha apne hath mein pehani hui Aarush ki ring ko utar ke usme likhe I Love You dekh rahi thi aur apne mann mein soch rahi thi ki...pagal sa kuch dino mein hi mere dil mein bass gaya, itna pyar karne laga tha tu mujhe kuch hi din ki mulakaat mein..? yeh ring tere liye kharid pana bahut mushikl tha lakin fhir bhi lekar aya mere mana karne ke bavjood bhi.. teri Maa toh tere jane ke agle din hi tere pass a gayi, (ek diary se Aarush ki Tasveer nikal, usse dekhti hui) main bewafa nahi hu Aarush, maine bahut koshish ki tere pass aane ki lakin har baar mujhe koi na koi bacha leta, fhir meri jabardasti shaadi karwadi, aaj kitne saal ho gaye tujhe mujhe chhode, Kriti ne wapis aaj mujhe teri yaad diladi, badi ho chuki hai ab, kaafi samajdar bhi.. ab Kriti hi meri zindagi hai Aarush.. Log Kehte hai hamari Ek Adhuri Kahani Thi, Lakin Hamari kahani toh shuru bhi nahi hui thi na, toh Adhuri kaisi Hui... (Usne Aarush ki Tasveer ko apne sine se lagaya aur jor-jor se rone lagi...)

THE END

《5958 -words》
 

Rockstar_Rocky

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लॉकडाउन - एक सज़ा

"अरे मानु भैया गजब हो गया! सुपरवाइजर कह रहा है की सरकार ने फैक्ट्री, दुकानें, बसें, ट्रेनें..सब कुछ बंद कर दिया है!" हरिया घबराते हुए बोला| मैं उस समय फैक्ट्री जाने के लिए तैयार हो रहा था, लेकिन हरिया की बात सुन कर एकदम से रुक गया था|

"क्या बकवास कर रहा है?!" मैंने चौंकते हुए कहा और फ़ौरन सुपरवाइजर को फ़ोन मिलाया| सुपरवाइजर ने जब सच बताया तो मेरे पाँव तले जमीन खिसक गई, इसलिए अगला फ़ोन मैंने अपने घर मिलाया; "हेल्लो...." अभी बस इतना ही बोल पाया था की पत्नी की रोती हुई आवाज सुनाई दी; "स्तुति...." इतना कह कर वो बिलख-बिलख कर रोने लगी! "क्या हुआ स्तुति को?" मैंने डर से काँपते हुए पुछा|

“उसे...कल से बहुत...बुखार है!" मेरी पत्नी डर के मारे बोली| ये उसकी आदत थी, वो बहुत जल्द घबरा जाया करती थी|

"डॉक्टर के ले गई थी?" मैंने उसे डाँटते हुए पुछा|

"लेकर गई थी पर सब सड़कें बंद हैं, न कोई सवारी है न कुछ है! ऊपर से पुलिस वाले भी कहीं जाने नहीं देते...मैं क्या करूँ...कैसे सँभालूँ!" मेरी पत्नी ने हार मानते हुए कहा| अब अगर मैं उसपर बरसता तो वो और घबरा जाती, इसलिए मैंने उसे प्यार से समझाया|

"देख....घबरा मत! आंगनवाड़ी दीदी को फ़ोन कर और उनसे पूछ| मैं अभी यहाँ से निकल रहा हूँ!" मैंने उसे होंसला देते हुए कहा|

"पर आप आओगे कैसे? सब तो बंद कर दिया है?!" उसने घबराते हुए कहा|

"तू मेरी चिंता मत कर और जो मैने कहा है वो कर!" इतना कह कर मैंने फ़ोन काटा और अपने कपडे एक बैग में भरने लगा| हरिया ने मेरी सारी बात सुनी थी तो वो बोला; "भैया जाओगे कैसे, सब कुछ तो बंद है?"
"गरीब के पास भगवान् ने दो पैर दिए हैं बस उन्हीं के सहारे चल पडूँगा!" मैंने नकली मुस्कान के साथ कहा| मैं जानता था की ये इतना आसान काम नहीं, पर अपनी बेटी की चिंता मेरे सर पर सवार हो चुकी थी| "भैया पगला तो नहीं गए? जानते हो यहाँ से आपका गाँव कितना दूर है? पैदल-पैदल वहाँ पहुँचने में आपको कितना टाइम लगेगा जानते हो?!" हरिया ने चिंता जताते हुए कहा|

"मेरे जिगर का टुकड़ा बीमार है और मेरी पत्नी के बस की बात नहीं की वो उसे संभाल सके!" मैंने गंभीर होते हुए कहा|

"आजभर रुक जाओ, कल तक शायद कोई ट्रैन या बस आदि चल पड़े तो मैं भी आपके साथ चल पडूँगा|" हरिया ने मुझे समझना चाहा पर मेरे सर पर बेटी से मिलने का भूत सवार था|

"मेरे मन बहुत घबरा रहा है और मैं यहाँ रुक कर समय बर्बाद नहीं करने वाला|" इतना कह कर मैंने अपना बैग की ज़िप बंद की| मैंने अपना पर्स उठाया और हरिया से विदा ले कर घर से चल पड़ा| पहले मैं सीधा एटीएम पहुँचा और वहाँ से 7,000/- रुपये निकाले और सारे पैसे और ATM कार्ड मैंने अपने कच्छे के अंदर वाली जेब में रख लिए| बाहर कुछ 4-500/- पहले से थे, अब गाँव जाना था पर उसका कोई तय नक्शा नहीं था| मैंने फ़ोन निकाला और गूगल मैप्स खोला और अपना गंतव्य स्थान डाला| भले ही मैं दिल्ली में पिछले 5 साल से रह रहा था पर अब भी इसके रास्तों से अनजान था, ऐसे में मेरी बेटी ने मुझे गूगल मैप्स चलना सिखाया था जिसकी वजह से मुझे कभी कहीं आने-जाने में कोई दिक्कत नहीं होती थी|

पूरा रास्ता 600 किलोमीटर का था, पहले नॉएडा वहाँ से बुलंदशहर, बदायूँ, सीतापुर, रामनगर फिर घाघरा नदी पार कर के और 70 किलोमीटर के बाद मेरा घर आता| गूगल मैप्स तो 109 घंटे का रास्ता बता रहा था यानी करीब-करीब 5 दिन और वो भी तब जब मैं कहीं रुकूँ न तो?! दिमाग जानता था की ये रास्ता इतना आसान नहीं होगा पर बेटी की चिंता ने मुझे और कुछ सोचने ही नहीं दिया| गूगल वाली मैडम ने मुझे निर्देश देने शुरू किये और मैंने अपनी घर जाने की यात्रा शुरू की|



हमारे परिवार में ताऊ जी का बड़ा दबदबा था कारन था उनका पैसे वाला होना, मेरे चाचा जी उन्हीं के पास रहते और उनकी हर बात में हाँ में हाँ मिलाया करते थे| मेरे पिताजी शुरू से ही बहुत खुद्दार रहे और इस कारन उन्होंने ताऊ जी की छाया से निकल अपनी अलग गृहस्थी बसाई थी| मैं उनका इकलौता लड़का था, बारहवीं पढ़ा था और पिताजी कहते थे की मैं बहुत फ़रमाबरदार लड़का था| बारहवीं के बाद आगे पढ़ना मुश्किल था क्योंकि उन दिनों पिताजी कुछ आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे, उन्होंने कर्जा ले कर मुझे पढ़ाना चाहा पर मैंने उन्हें मना कर दिया| माँ उन दिनों बहुत बीमार थीं और उनकी ये दशा मुझसे देखि नहीं जा रही थी, इसलिए मैंने पिताजी से कहा की वो पहले माँ का इलाज कराएँ और तबतक मैं अपने लिए कुछ काम-धँधा ढूँढता हूँ| ये सुन कर पिताजी का मन तो बहुत दुखा पर मेरी इस जिद्द के आगे उन्होंने अपने घुटने टेक दिए! इधर ताऊ जी ने मदद रुपी एहसान का हाथ बढ़ाया, इससे पहले की पिताजी उस हाथ को थामते मैंने सामने आ कर साफ़ मना कर दिया और सारा इल्जाम अपने सर ले लिया; "ताऊ जी...अब पढ़ाई में मन नहीं लगता!" मैंने झूठ बोला ताकि पिताजी की गैरतमन्दी सलामत रहे| उस समय पिताजी के पास जमीन का छोटा सा टुकड़ा था जिस पर वो ही कुछ थोड़ा बहुत उगाते थे, मैंने पिताजी को माँ के पास रहने को बोला और खुद हल उठा लिया| क़िस्मत भी क्या अजब खेल खिलाती है, जो इंसान आगे पढ़ना चाहता था वो कलम न उठ के हल उठा रहा है! पर मैंने इसका दोष किसी को नहीं दिया और इसे नियति मान कर पूरी मेहनत से काम में लग गया| लेकिन सिर्फ हमारे खेत भर से तो गुजरा होता नहीं सो मैंने दूसरों के खेतों में मजदूरी शुरू कर दी, जिस दिन पहली कमाई के पैसे मिले मैं माँ के पास लौटा| मेरे हाथों में पैसे देख माँ की आँखों में आँसूँ आ गए और वो मुझसे लिपट कर रोने लगी! "माँ तू रोती क्यों है? देख तेरा लाल आज अपनी पहली कमाई लाया है, पूरे 500/- रुपये!" मैंने माँ के आँसूँ पोछते हुए कहा|

"बेटा...तुझे पढ़ा-लिखा कर अफसर बनाना था और तू ये....." माँ की आँखों में फिर आँसूँ आ गए|

"माँ मैं एक खुद्दार बाप का बेटा हूँ, मैं नहीं चाहता था की मेरे कारन व ताऊ जी का एहसान लें या किसी के आगे झुकें!" मैंने दुबारा माँ के आँसूँ पोछते हुए कहा|



अपनी जीवन की उस पहली कमाई को याद करके आज मेरे चेहरे पर फिर मुस्कान आ गई थी! खैर अभी चलते हुए करीब 2 घंटे हुए थे और रास्ते में कुछ लोग मिल गए जो मेरी ही तरह इस हालात के मारे थे| चलते-चलते बांतें शुरू हुईं तो पता चला की कोई कहीं का है तो कोई कहीं का, कुछ सामान सर पर लादे थे तो कुछ अपने सापरिवार सहित चल पड़े थे| ऐसे ही एक आदमी से जान-पहचान हुई जो बुलंदशहर के थे, उनका नाम राहुल सहाय था और दिल्ली में वो एक दूकान में कढ़ाई का काम करते थे| एकदम मस्त मौला सवभाव था उनका, उनके साथ बात करते-करते रास्ता आराम से कट रहा था| धीरे-धीरे और भी मजदूर भाई जुड़ने लगे और कारवाँ बढ़ने लगा, कोई मजदूरी करता था, कोई राजमिस्त्री था, कोई कारपेंटर तो कोई पेंटर| हैरानी की बात थी, जो शहर हमारे जीने का साहारा था, जिसकी रोटी हम खाते थे आज जब बुरा समय आया तो उसे ही छोड़कर अपने घर जा रहे हैं! पर हम भी मजबूर थे, वो गाँव ही हमारा घर है ये शहर तो बस रोजी देता था हमें!


खैर ये भीड़ धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी और आगे चल कर पुलिस का चेकपॉइंट था, पुलिस ने सारा रास्ता बैरिकेडिंग लगा कर जाम कर दिया था! "ठहर जाइये! आगे जाना मना है!" एक पुलिस वाला लाउड स्पीकर पर चिल्लाया, जिसे सुन सब लोग इकठ्ठा हो गए| "आप सभी अपने-अपने घर लौट जाइये, यहाँ से आगे आपको जाने नहीं दिया जाएगा!" पुलिस वाले ने हुक्म देते हुए कहा, ये सुन कर भीड़ ने शोर मचाना शुरू कर दिया| "हम सब अपने गाँव जाना चाहते हैं!" सभी मजदूर भाई एक साथ चिल्लाते हुए बोले| लेकिन पुलिस अपनी बात दोहराती रही और किसी को आगे नहीं जाने दिया| तभी मेरे फ़ोन की घंटी बजी और मैं भीड़ से कुछ दूर आ गया| "पा...पा...!" ये थरथराते हुए शब्द सुन मैं सर से पाँव तक काँप गया! ये आवाज मेरी बेटी की थी और उसकी दर्द भरी आवाज सुन मेरी आँखें छलक आईं; "मेरा बच्चा....बस...बस...घबराना नहीं...ठीक है?! मेरा बहादुर बच्चा है न?! मैं आ रहा हूँ बेटा...आप बस हिम्मत बाँधे रखो...और...अपने पापा का इंतजार...करो...बेटा..." आगे बात हो पाती उससे पहले ही मुझे मेरी पत्नी की आवाज सुनाई दी; "स्तुति का जिस्म बुखार से जल रहा है! मैंने दीदी (आंगनवाड़ी वाली) से पुछा था, तो वो बोलीं की मैं स्तुति को अस्पताल लेके आऊँ...वो वहीं मिलेंगी!"

"सुनील कहाँ है?" मैंने कुछ गुस्से से पुछा तो मेरी पत्नी ने फ़ोन सुनील मेरे साले को फ़ोन दे दिया| "बेटा...तू कुछ भी कर, बस मेरी बच्ची को अस्पताल ले जा! प्राइवेट अस्प्ताल ले जा और...और पैसे चाहिए तो...किसी से उधार ले ले...ब्याज पर ले ले...मैं आ कर सब चूका दूँगा! तू बस स्तुति को अस्पताल ले जा!" मैंने फ़ोन पर गिड़गिड़ाते हुए कहा|

"जीजा...तुम चिंता मत करो...मैं अभी लेके जा रहा हूँ...पैसे हैं मेरे पास...कम पड़े तो मैं कोई जुगाड़ कर लूँगा!" सुनील मुझे आश्वासन देते हुए बोलै और फ़ोन मेरी पत्नी को दे दिया|

"आप...कैसे आ रहे हो?" मेरी पत्नी घबराई हुई बोली|

"पैदल!" मैं बोला, लेकिन पैदल आने की सुन मेरी पत्नी घबरा गई और बोली; "नहीं...नहीं...इतनी दूर पैदल कैसे आओगे?!" वो रोते हुए बोली|

"तू मेरी चिंता मत कर और सुनील के साथ जल्दी से अस्पताल पहुँच!" इतना कह कर मैंने फ़ोन काटा| जैसे ही मैं पीछे पलटा तो मेरे पीछे राहुल भाई खड़े थे, उन्होंने मेरी सारी बात सुन ली थी और वो मेरा दर्द समझ पा रहे थे| "भैया चिंता न करो, बिटिया ठीक हो जाई!" उन्होंने मेरे कँधे पर हाथ रखते हुए मुझे ढाँढस बँधाया|

"देख भाई ये पुलिस वाले तो आगे जाने नहीं देंगे, मैं एक रास्ता जानता हूँ जो घूम कर सीधा हाईवे पर मिलेगा, अगर चलना चाहते हो तो चलो मेरे साथ|" राहुल भाई बोले| मैंने सेकंड नहीं लगाया और फ़ौरन हाँ कर दी, हम दोनों पुलिस चेकपॉइंट से उलटे हो लिए और एक कॉलोनी के अंदर से होते हुए दूसरी कॉलोनी में घुसे| ऐसा नहीं था की रास्ते सुनसान थे, क्योंकि काफी लोग घर का सामान आदि लेने निकले हुए थे| "राहुल भाई, आप ये रास्ता कैसे जानते हो?" मैंने पुछा तो वो बोले; "मेरे मालिक का एक दोस्त है उसकी दूकान का कुछ सामान बुलंदशहर से आता रहता है| टोल बचाने के लिए ड्राइवर थोड़ा गोल घुमा कर अपना टेम्पो लाता था, कई बार मैं उसी टेम्पो में दिल्ली आया था, इसलिए मैं ये रास्ता जानता हूँ| तुम बुलंदशहर तक तो बिलकुल चिंता मत करो, वहाँ तक के सब रास्ते मैं जानता हूँ लेकिन उसके आगे तुम्हें देखना पड़ेगा!”

"ठीक है भाई जी, आप बुलंदशहर तक साथ रहिये, आगे के रस्ते के लिए शायद कोई और साथी मिल जाए!" मैंने कहा| करीब 4 घंटे बाद मैंने घर फ़ोन मिलाया पर कॉल लगा ही नहीं, क्योंकि जहाँ हम लोग थे वहाँ नेटवर्क नहीं थे!

दोनों जन चलते-चलते ग़ाज़ियाबाद पहुँचे, घडी में बजे थे रात के 9 और अब चलने की बिलकुल हिम्मत नहीं थी| पाँव जवाब दे चुके थे, अब रात गुजारनी थी लेकिन सोएं कहाँ पर? हम उस वक़्त नेशनल हाईवे - 34 पर थे और यहाँ आस-पास कुछ नहीं था, पैर तो पहले ही जवाब दे चुके थे सो हम उसी हाईवे पर एक किनारे बैठ गए| आज दिनभर में करीब 12-13 किलोमीटर चलने के बाद पाँव सूज चुके थे, दोनों ने जूते पहने थे सो हमने फ़ौरन जूते उतारे और अपने पाँव मींजने शुरू किये| राहुल भाई के चेहरे पर थकावट दिख रही थी पर कोई चिंता नहीं थीं, वहीं मेरी शक्ल देख कर ही कोई भी बता सकता था की मैं कितना दुखी हूँ! मैंने घर फ़ोन मिलाया पर इस बार भी कॉल नहीं मिला क्योंकि ससुर नेटवर्क नहीं थे!


रास्ते में हम दोनों ने बिस्कुट के पैकेट लिए थे, तो हमने वही खाये और अपने-अपने बैग पकड़ कर सो गए| थकावट इतनी थी की लेटते ही नींद आ गई और फिर सुबह जब होश आया तो आस-पास कुछ लोगों का शोर सुनाई दिया| शोर सुन हम दोनों उठ कर बैठ गए, एक बार अपने पाँव अच्छे से मींजें और जूते पहन फिर चल पड़े| "आज बस इस हाईवे पर चलना है, शाम तक बुलंदशहर पहुँच जाएंगे|" राहुल भाई ने मुझे हिम्मत बँधाई, मैंने अपना फ़ोन निकाल कर देखा तो वो बंद हो चूका था| हम चलते हुए कुछ दूर आये तो मैंने राहुल भाई से उनका फ़ोन माँगा और घर फ़ोन किया, इस बार कॉल मिल गया तो पता चला की स्तुति को अस्पताल में भर्ती कर लिया गया है और फिलहाल वो बेहोश है! बिटिया की खबर पता चल कर मेरी जान सूख गई और मेरी आँखें छलछला गईं! "सुनो...भगवान् पर भरोसा रखो! सब ठीक हो जाएगा...मैं आ रहा हूँ....! मेरा...मेरा फ़ोन बंद हो गया है....ये नंबर एक भाईसाहब का है....मैं शाम तक कॉल करूँगा! तब तक भगवान से दुआ करो की स्तुति होश में आ जाये और जैसे ही वो होश में आये मुझे कॉल करना|" मैंने खुद को किसी तरह संभालते हुए कहा और फ़ोन काटा|

जब मैं राहुल भाई को फ़ोन दे रहा था तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख मुझे ढाँढस बँधाया और बोले; "क्या हुआ? सब ठीक तो है?" मैंने उन्हें सारी बात बताई तो वो मुझे हिम्मत बँधाते हुए बोले; "चिंता न करो भाई, भगवान पर भरोसा रखो! वैसे बिटिया है कितने साल की?" उनके इस सवाल से मेरा ध्यान बँट गया| "अठारह! वैसे तो मेरी बेटी बहुत बहादुर है, खाँसी-जुखाम तो आता-जाता रहता था| पर आज तक जब भी उसे बुखार चढ़ा मैं हमेशा उसके पास होता था और उसका सारा ध्यान मैं रखता था| लेकिन इस बार....." इतना कहते हुए मेरी आँखें फिर भर आईं| राहुल भाई ने मुझे पीने को पानी दिया और हम चुप-चाप आगे बढ़ चले| इतने में राहुल भाई के घर से फ़ोन आया और वो बातों में लग गए और मुझे मौका मिल गया अपनी प्यारी बेटी को याद करने का|


किसी ने सच ही कहा है की लड़कियाँ और जंगली बेल बहुत जल्दी बड़ी हो जातीं हैं, मेरी गुड़िया रानी मेरे बराबर ऊँची हो गई थी लेकिन उसका वो बचपना अब भी क़ायम था! जब कभी मैं छुट्टी में घर जाता तो वो दौड़ती हुई आती और मेरे गले लग जाती| जब तक मैं उसके सर को चूम न लूँ, तब तक वो मुझे छोड़ती नहीं थी| मेरे घर आने से ले कर जाने के दिन तक चूल्हा-चौका वो ही संभालती थी, जब उसकी माँ उसे टोकती तो कहती; 'मम्मी, पापा इतने दिन बाद आये हैं तो थोड़ा बहुत समय आप दोनों को भी मिलना चाहिए न?!' उसकी ये बात सुन मेरी पत्नी झेंप जाया करती और मैं मुस्कुरा दिया करता था| दरअसल वो अपने मम्मी-पापा का प्यार समझती थी और जब मैं घर होता था तो वो दोनों का बहुत ख्याल रखती थी| चूल्हा-चौका ही नहीं, पढ़ाई में भी अव्वल थी मेरे बेटी, इस साल उसने अपने कालेज के पहले साल के पेपर देने थे और हर बार की ही तरह उसने जम कर तैयारी की थी|

मुझे आज भी याद है वो दिन जब वो पहलीबार मेरे सामने रोइ थी| होली का दिन था और सारा परिवार आज इकठ्ठा हुआ था, सब जने आँगन में बैठे पकोड़े और चबेना खा रहे थे जब ताऊ जी स्तुति की शादी की बात ले कर मेरे सर पर चढ़ गए; “बहुत हो गया पढ़ना-लिखना, अब इस साल जून में अपने बेटी की शादी कर दे!" ताऊ जी अपना फरमान सुनाते हुए बोले| उनका ये फरमान सुन मेरे छोटे चाचा जी ने भी हाँ में हाँ मिला दी, वहीं मेरे माता-पिता अब भी शांत बैठे थे| "ताऊ जी अभी मेरी बिटिया और पढ़ेगी!" मैंने बड़े गर्व से कहा तो ताऊ जी की शक्ल देखने लायक थी! वो तुनक कर मुझ पर हुक्म चलाते हुए बोले; "क्या जर्रूरत है? फूँकना तो इसने चूल्हा ही है! मैंने इसके लिए लड़का देख लिया है और रिश्ता पक्का कर दिया है!"

"जी नहीं....मेरी बिटिया जितना पढ़ना चाहती है उतना पढ़ेगी और जब उसका शादी का मन होगा तब उसकी शादी होगी!" मैंने उनसे नजरें मिलाते हुए कहा|

"कहाँ से पढ़ायेगा उसे? आखिर ऐसा कौन सा ख़जाना गाड़ा है तेरे बाप ने?! जो कह रहा हूँ वो कर, वरना आज से सारे रिश्ते-नाते खत्म!" ताऊ जी ने खाने की प्लेट नीचे पटकते हुए कहा|

"खुद को बेच दूँगा, पर अपनी बेटी को जैसे भी होगा पढ़ाऊँगा! भले ही मेरे पिताजी ने कोई ख़जाना न गाड़ा हो पर आज तक उन्होंने या उनके लड़के ने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया और न ही किसी के तलवे चाटे!" मैंने ताऊजी को कड़वी बातें सुनाई और ये सुन उनका गुस्सा जवाब दे गया, वो उठ खड़े हुए और गुस्से में बड़बड़ाते हुए चले गए| मुझे लगा की माँ-पिताजी शायद मुझे डाटेंगे पर उन्होंने एक शब्द नहीं कहा, लेकिन मेरी बिटिया बहुत घबरा चुकी थी! वो चुप-चाप मेरे कमरे में चली गई और चारपाई पर बैठ कर रोने लगी| मैं उठा और स्तुति का हाथ पकड़ कर उसे बाहर आँगन में लाया| माँ-पिताजी और मेरी पत्नी सबकी नजरें हम बाप-बेटी पर थीं| स्तुति ने बड़ी हिम्मत बटोरी और रोते हुए बोली; "पापा...मैं आगे नहीं पढूँगी!"

"क्यों नहीं पढ़ेगी मेरी लाड़ली? ताऊ जी ने जो कहा उसे सुन कर न?! पगली उनको कहने दे जो कहना है, तू बस मन लगा कर पढ़ और खूब पढ़!" मैंने उसके सर को चूमते हुए कहा| माँ-पिताजी ने जब ये सुना तो उनकी आँखों में आँसूँ आ गए, पिताजी ने स्तुति को अपने पास बुलाया और उसके माथे को चूमते हुए बोले; "बेटा जब तेरे पापा लगभग तेरी उम्र का था न तब उसने भी यही कहा था जो आज तू कह रही है, उस वक़्त मैं मजबूर था और चाहते हुए भी उसे आगे नहीं पढ़ा सकता था| लेकिन तुझे अभी और पढ़ना है, तेरे पापा और मेरे सपने पूरे करने हैं! कोई चाहे कुछ भी कहे, तू सिर्फ पढ़ाई में अपना मन लगा और बहुत बड़ी अफसर बनना!"



"मानु भाई... कहाँ खो गए?!" राहुल भाई के ये शब्द कान में पड़े तो मैं अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आया| "कुछ नहीं भाई जी, बस अपनी बेटी को याद कर रहा था|" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ये मुस्कान मेरी बेटी को याद कर के आई थी| "वैसे ये तो बताओ की तुम शहर में करते क्या हो?" राहुल भाई ने सवाल पुछा और मेरा मन वापस दुःख की ओर भटकने नहीं दिया|

"जी जूते के कारखाने में काम करता हूँ|" मैं बोला और फिर उन्हें अपने बारे में बताने लगा| भले ही हम दोनों एक ही शहर में रहते थे पर फिर भी अपने-अपने काम धंधे में मशरूफ रहते थे, ये तो एक दुःख-दर्द था जो दो अनजान लोगों को साथ ले आया था| बातें करते-करते समय बीतने लगा, जब दोनों थक जाते तो 10-15 मिनट आराम करते और फिर चल पड़ते| शाम 6 बजे हम बुलंदशहर में दाखिल हुए, राहुल भाई को तो अपने घर जाना था पर मेरा रास्ता उनसे अलग और बहुत लम्बा था! अब वो जिद्द करने लगे की मैं उनके घर चलूँ और आज रात उन्हें के यहाँ ठहर जाऊँ, पर मेरा मन मेरी बेटी की चिंता से व्याकुल था! "अरे मानु भाई मान जाओ, रात को कहाँ जाओगे? कहाँ रुकोगे? आजकी रात मेरे यहाँ रुक जाओ और कल तड़के निकल जाना| फिर मेरा यहाँ रुकोगे तो फ़ोन भी चार्ज कर लेना वरना घर में बात कैसे करोगे?" उनकी अंतिम बात सुनकर मैं सोच में पड़ गया और उनकी बात मानते हुए उनके घर चल दिया| उन्होंने एक अनजान आदमी को अपने परिवार के सदस्यों से मिलवाया और मेरे रात ठहरने का इंतजाम किया| मैंने उनसे फ़ोन माँगा तो पता चला की उनका फ़ोन भी बंद हो चूका था, इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी का फ़ोन मुझे दिया| मैंने घर फ़ोन मिलाया तो खबर और भी भयानक निकली; "डॉक्टर साहब...कह रहे हैं की स्तुति को ‘को...करना’ (कोरोना) हो सकता है! हम लोगों को यहाँ ठहरने भी नहीं देते...कहते हैं हमें भी हो जाएगा....!" मेरी पत्नी घबड़ाते हुए बोली| इस बिमारी का नाम मैं पिछले कुछ दिनों से फैक्ट्री में सुन रहा था, कोई कहता था की ये छूने से फैलती है तो कोई कहता की ये खाने-पीने से! "पर स्तुति को ये बिमारी हुई कैसे? कहीं बाहर गई थी क्या?' मैंने परेशान होते हुए पुछा| पर इसका जवाब किसी को नहीं पता था, मेरी बेटी तो बस घर से कालेज जाती थी और कालेज से वापस घर, हो न हो इसी दौरान कुछ हुआ है| पर उस वक़्त सिवाए घर पहुँचने के मेरे पास और कोई चारा नहीं था, मैंने फ़ोन काटा और सर झुका कर मन ही मन प्रार्थना करने लगा| ये सारी बात राहुल भाई के सामने हुई थी और जब फ़ोन कटा तो उन्होंने उन जाहिलों को खूब गालियाँ दी जिनके कारन हम गरीबों को ये दिन देखना पड़ रहा है! तभी राहुल भाई की पत्नी खाना ले कर आ गईं, मेरा खाने का कतई मन नहीं था पर उन्होंने समझाया की अगर खाऊँगा नहीं तो घर कैसे पहुँचूँगा? जैसे-तैसे मैंने खाना अपने गले के नीचे उतारा और जल्दी सो गया|


अगली सुबह मैंने बैग उठाया और चलने को हुआ तो राहुल भाई मेरा चार्ज किया हुआ फ़ोन, रास्ते के लिए भोजन और एक लूना मोटरसाइकिल लेकर आ गए| "चलो मैं तुम्हें कुछ दूर छोड़ देता हूँ, अगर रास्ते में कोई सवारी मिल जाए तो चले जाना|" वो मुस्कुराते हुए बोले| मैंने उन्हें बहुत मना किया पर वो नहीं माने, उन्होंने मुझे करीब 20 किलोमीटर तक लिफ्ट दी| चूँकि आगे पुलिस चौकी थी इसलिए वो आगे नहीं जा सकते थे, उन्होंने मुझे एक कच्चा रास्ता दिखाते हुए कहा की उस रास्ते से मैं बच कर निकल सकता हूँ| चलने से पहले मैंने उन्हें हाथ जोड़कर धन्यवाद दिया और धन्यवाद देते हुए मेरी आँखें नम हो गईं, उन्होंने तुरंत मुझे अपने गले लगाया और बोले; "घर पहुँच कर फ़ोन करना और अपना ख्याल रखना!" उनसे विदा ले कर मैं घर की ओर चल पड़ा और मेरा अगला पड़ाव था बदायूँ| बदायूँ पहुँचने में मुझे 4 घंटे लगे, सारा रास्ता सुनसान था न बंदा न बन्दे की ज़ात! चूँकि ये शहर का इलाका था तो पीछे से जब भी पुलिस की जीप का साईरन सुनाई देता तो मैं किसी जगह दुपक जाता, अपने ही देश में बिना किसी दोष के एक अपराधी जैसा महसूस हो रहा था| जिंदगी में आज पहली बार दिल कोसना चाहता था, सरकारों को, नियम कानूनों को जो सिर्फ एक गरीब के लिए सख्त होते हैं, इंसान की घटिया और गिरी हुई सोच को जिसने ये बिमारी इस कदर फैलाई थी की बेक़सूर लोग उसकी सजा भुगत रहे थे!

दोपहर के बारह बजे थे और मैं सड़क के एक किनारे पेड़ की छाओं में सुस्ता रहा था, की तभी घर से फ़ोन आया| "आप कहाँ पर हो? ठीक तो हो?" मेरी पत्नी ने घबड़ाते हुए कहा| फिर मैंने उसे राहुल भाई से मिलने से ले कर बदायूँ पहुँचने की बात बताई तो वो रो पड़ी| "अरे पगली, रो मत! और 2-3 दिन का सब्र रख बस, अच्छा ये बता की स्तुति कैसी है?" मैंने पुछा तो उसने बताया की सुबह वो और सुनील अस्पताल गए थे पर किसी ने उन्हें अंदर तक जाने नहीं दिया| बड़ी मुश्किल से सुनील ने जुगाड़ बिठाया और स्तुति के बारे में पुछा तो पता चला की वो होश में आ गई है और परिवार को न पाकर बहुत बेचैन थी! उसने बस 'पापा...पापा' की रट लगा राखी थी! डॉक्टर साहब ने उसका सैंपल बैंगलोर भेजा है और तब तक कोई उससे नहीं मिल सकता, बस नर्स ने एक बार फ़ोन पर बात करवाई थी| अपनी बिटिया की ये हालत सुन कर बाप का कलेजा फ़ट पड़ा और मैं चीखते हुए रोने लगा| आधे घंटे तक मैं बस रोता ही रहा और मेरी पत्नी बेबस बस मुझे रोते हुए सुनती रही| "देखो...आप ही ऐसे हार मान जाओगे तो मैं...कैसे जियूँगी!" मेरी पत्नी रोते हुए बोली| उसकी बात सही थी, मैंने अपने आँसूँ पोछे और उसे ढाँढस बंधा कर फिर से चल पड़ा| दो दिन से चलने के कारन जिस्म अब जवाब दे चूका था पर बेटी की चिंता थी जो इस शरीर को खींचे जा रही थी|


रात होने को आई थी, पैर अब आगे और नहीं बढ़ सकते थे इसलिए घुटने टेक कर मैं सड़क किनारे बैठ गया| राहुल भाई ने जो खाना दिया था उसे बेमन से खा कर मैं सड़क किनारे ही किसी लाश की तरह फ़ैल गया| सुबह की पहली किरण के साथ ही मैं जाग गया और फ़ौरन उठ कर चल दिया, फ़ोन निकाला तो पाया की बैटरी आधी हो चुकी है| भगवान् का नाम लेते हुए मैंने अपनी पत्नी को फ़ोन मिलाया तो उसने कुछ अच्छी खबर सुनाई, स्तुति ने बड़ी हिम्मत दिखाई है और धीरे-धीरे खाना खा रही है| ये सुन कर दिल को जैसे ताक़त मिल गई और मैं बड़े-बड़े क़दमों से चलने लगा| मेरा अगला पड़ाव सीतापुर था और मेरा उद्देश्य था की वहाँ तक मैं बिना रुके ही चलता जाऊँ, पर ऐसा कर पाना असंभव था| लेकिन भगवान् की कृपा थी जो उन्होंने अपने एक नेक बंदे को मेरी मदद के लिए भेज दिया| एक ट्रक जो की नानपारा जा रहा था वो मुझे आधे रास्ते में मिल गया, मैंने ट्रक ड्राइवर साहब से मदद माँगीं तो उन्होंने बैठ जाने को कहा| पर उनके साथ में बैठा मालिक लोभी था और उसने किराए की माँग की, मेरे पास पैसे थे तो मैंने उसे बिना कुछ कहे ही पैसे दे दिए| ट्रक ड्राइवर साहब ने मुझे सीतापुर छोड़ा और फिर वहाँ से वो अपने अलग रास्ते चल दिए| घडी में बजे थे 4 और भगवान् की फिर एकबार कृपा हुई जो मुझे पीने को पानी और खाने के लिए बिस्कुट देने वाला एक नेक बंदा मिला| उसने बिना कोई पैसे लिए मुझे समान दिया और मैं उसे हाथ जोड़ कर शुक्रिया कर आगे चल दिया|

सीतापुर से आगे मुझे रस्ते का चुनाव करना था, या तो मैं बहराइच का रास्ता पकड़ूँ या फिर रामनगर का| बहराइच वाला रास्ता लम्बा था और रामनगर वाला सीधा तो मैंने उसे ही चुना और रामनगर की तरफ चल पड़ा| रात के 8 बज गए थे और अब चलने की हिम्मत कतई नहीं थी, जिस्म बस कहीं रुक कर आराम करने को कर रहा था| मैं सड़क किनारे रुका और फ़ौरन घर फ़ोन मिलाया, मेरी आवाज सुन मेरी पत्नी को चैन आया| उसने मेरा हाल-चाल पुछा और इस बार बड़ी हिम्मत दिखाते हुए बोली; "माँ-पिताजी का फ़ोन आया था, मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया वरना वो भी परेशान होते!" ये सुन कर मुझे याद आया की माँ-पिताजी तो तीरथ पर गए थे और वो भी वहीँ फँस गए होंगे! "सुन अगर कल फ़ोन आये तो ये ही झूठ बरकरार रखना और कहना की वो वहीं रहे!" मैंने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा, फ़ोन की बैटरी खत्म हो गई थी सो मैंने उसे कहा की मैं कल फ़ोन करूँगा| बिस्कुट खा, पानी पीकर मैंने एक बार भगवान को बहुत-बहुत शुक्रिया किया और सो गया|!


अगली सुबह उठ कर मैं फिर चल दिया पर अब मुझे पैदल चलने से कोफ़्त होने लगी थी! रह-रह कर गुस्सा बाहर आने लगा था, अपनी बेटी को न देख पाने का दुःख अब गुस्से में बदलने लगा था| 10 बजे तो पत्नी का फ़ोन आया और उसने बताया की स्तुति पूरी रात नहीं सोइ और 'पापा..पापा' की रट लगा कर रोती रही! अपनी बेटी की ये हालत सुन कर दिल फिर रोने लगा और मैं फूट-फूट कर रोने लगा, इतने में फ़ोन बंद हो गया| उधर मेरी पत्नी परेशान हो गई और इधर मेरे सर पर घर जल्दी पहुँचने का जूनून सवार हो गया| तेजी से चलता हुआ मैं तारकोल की सड़क पर अपनी एड़ियाँ घिस रहा था| पाँव दुःख रहे थे और अब तेज चल पाना मेरे लिए मुश्किल था, कमर पर हाथ रखे हुए मैं बीच सड़क पर रुक गया और भगवान से मदद मांगने लगा; "भगवान् आपके आगे हाथ जोड़ता हूँ! मेरी मदद करो, मेरी बेटी बीमार है और मैं बस अपने घर पहुँचना चाहता हूँ! रहम करो मुझ पर और मेरे परिवार पर, कल जैसे आपने एक के बाद एक अपने नेक बंदे भेजे थे मेरी मदद को, आज फिर एक बार अपना चमत्कार दिखा दो!" मैं रोते हुए बोला और बीच सड़क पर घुटने टेक कर बैठ गया! तभी एक करिश्मा हुआ और भगवान ने मेरा ध्यान साइकिल की एक बंद पड़ी दूकान की तरफ खींचा! मैं उस दूकान की तरफ चल पड़ा, शटर बंद था तो अंदर जाने का कोई रास्ता नहीं दिखा| मैं घूम कर पीछे की तरफ गया तो वहाँ मुझे एक दरवाजा दिखा, जिस पर ताला लगा था| मैंने फ़ौरन एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उससे ताला तोड़ने लगा! जिंदगी में पहली बार आज मैं चोरी करने का गुनाह करने जा रहा था, पर उस वक़्त मुझे बस अपनी बेटी की जान प्यारी थी सो मैंने बिना देर लगाए दरवाजा तोडा| अंदर मुझे एकदम चमचमाती हुई साइकिल दिखी और मेरी आंखें चमकने लगीं| मैंने वो साइकिल पीछे के रास्ते निकाली और दूकान में एक पर्ची और पैसे छोड़ दिए| पर्ची में लिखा था; "मेरा नाम मानु मौर्या है, मेरी बेटी की तबियत बहुत ख़राब है और लॉकडाउन होने के कारन मेरे पास घर जाने का कोई साधन नहीं है| मैं आपकी दूकान से एक साइकिल ले रहा हूँ और बदले में 1,000/- रुपये छोड़ रहा हूँ! यदि ये पैसे कम लगें तो मेरे इस नंबर पर कॉल कीजियेगा!" दूकान के दरवाजे पर मैंने अपने बैग का ताला लगा दिया और तेजी से साइकिल को पेडल मारते हुए चल पड़ा| 6 घंटे लगे मुझे रामनगर पहुँचने में, घडी में शाम के 8 बजे थे और मेरी हालत अब बाद से बदतर थी| रामनगर से मेरा घर यही कोई 70 किलोमीटर दूर था और दिल को चैन नहीं मिल रहा था पर हालत बहुत पतली थी! मैंने भगवान को एक बार और शुक्रिया किया और सड़क किनारे लेट गया, वो रात मैं सो न सका और मैंने रात का हर एक पहर आँखों से देखते हुए गुजारा|

सुबह के चार बजे थे की मैं घर की ओर चल पड़ा, अपनी बेटी को आज देखने की लालसा मन में जाएगी हुई थी और आत्मा बेटी को गले लगाने को बेचैन थी! थकते, रुकते, चलते, पैडल मारते, पुलिस से बचते हुए मैं ठीक 4 बजे घर पहुँचा| आँगन में मेरी पत्नी रास्ते की तरफ मुँह करके बैठी थी, मुझे कुछ दूर से देखते ही वो दौड़ी हुई मेरी तरफ आने लगी| मुझसे करीब 20 कदम पर मैंने उसे रोक दिया और अपनी फूली हुई साँसों को बिना काबू किये स्तुति के बारे में पुछा| "उसे कोई करना-फरना (कोरोना) नहीं हुआ, आज दोपहर को हम उसे घर ले आये!" मेरी पत्नी मुस्कुराते हुए बोली| ये सुन कर मेरी जान में जान आई, मैंने साइकिल स्टैंड पर खड़ी की और नहाने का पानी माँगा| ठंडे-ठंडे पानी से नाहा कर, एक धोती लपेट कर मैं अंदर की ओर दौड़ा, मुझे देखते ही स्तुति के चेहरे पर मुस्कान आ गई| उसने उठना चाहा पर मैंने उसे उठने नहीं दिया और उसे अपने सीने से लगा कर रो पड़ा| "मेरा बच्चा! आप ठीक तो हो न?" मैंने रोते हुए कहा, स्तुति से भी रोना नहीं रुका और वो भी मुझसे लिपटे हुए फफक कर रो पड़ी| वो पल इतना भावुक था जिसे व्यक्त कर पाना नामुमकिन है, एक बेटी जो अपने पापा को याद कर के तड़प रही थी, एक बाप जो 600 किलोमीटर की यात्रा कर के थक के चूर हो चूका था और एक पत्नी जो लगभग अपना सब कुछ खो चुकी थी! मेरे प्यार-दुलार से मेरी बेटी धीरे-धीरे ठीक होने लगी, सुनील ने जो पैसे खर्च किये थे मैंने वो सब उसे लौटाए और अंत में राहुल भाई को फ़ोन करके उनका धन्यवाद दिया!



इन चाँद लाइनों के जरिये मैंने एक गरीब मजदूर की व्यथा बताने की कोशिश की है, समय और नियम कानूनों से बँधा होने के कारन मैं ज्यादा लिख नहीं पाया परन्तु जितना भी लिख पाया उससे आप सभी को मजदूर के दर्द का एहसास जर्रूर हुआ होगा| इस लॉकडाउन के लिए चाहे जो जिम्मेदार हो, पर पिसा केवल और केवल मजदूर है! खाने को रोटी नहीं, रहने को मकान नहीं आने-जाने को साधन नहीं…ऐसे ही हालातों से अकेला जूझा है ये गरीब! भला हो उन लोगों का जिन्होंने दिल से इनकी सेवा की और आग लगे उन जल्लादों को जिन्होंने एक गरीब की मजदूरी का फायदा उठाया!


समाप्त
 

TheBlackBlood

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RITU-RAJ (Ek Naya Sansaar)
Hello dosto, sabki tarah main bhi ek story usc ke liye haazir kar raha hu. Halaki mere paas wakt ki kami thi, phir bhi maine apne ek dost bhai ke kahne par wakt nikala aur story ko likha. Iske pahle maine kabhi bhi short stroy nahi likhi thi is liye mumkin hai ki main is short story me aap sabki tarah wo sab kuch daalne me kaamyab na ho paya hou jo short story ke liye zaruri hota hai. Khair shabdo ko zyada na bharte huye main seedha story shuru karta hu,,,, :thank_you:


Kismat bhi badi ajeeb chiz hoti hai, ya phir ye kahe ki bhagwan ki maya badi ajeeb hoti hai. Aksar aisa hota hai ki ham jis chiz ki kalpana tak nahi kar sakte wahi ho jata hai. Kuch baate aisi hoti hain jinhe ham swikaar nahi kar sakte aur na hi unhe apna sakte hain. Kuch rishte bhi aise hote hain jinhe ham kabool nahi kar sakte, kyo ki har rishte ki apni ek alag pahchaan aur ek maryada hoti hai aur sath hi un rishto ke liye samaaj me bade khaas aur shakht niyam kanoon bane hote hain. Hame har rishte ki maryada aur uske niyam kanoon ka paalan karna hota hai, agar ham aisa nahi karte to samaaj me rahne wale dharm guru hame charitra heen ki sangya de kar samaaj aur biraadari se baahar kar dete hain.

Suna hai prem pavitra hone ke sath sath andha bhi hota hai aur ye bhi ki wo rishte naate kuch bhi nahi dekhta, balki jab jisse hona hota hai ho hi jata hai. Halaaki log aise prem ko alag alag nazariye se dekhte hain aur uske bare me tappadi karte hain. Khair jo bhi ho magar ye sach hai ki uske baad bhale hi aise prem ki vajah se ruswaayi aur jalaalat sahni pade magar diwane to har saza aur har jalaalat ko sahna gawara kar lete hain.

Main ritu singh baghel aaj barsho baad aalmari me badi hi hifazat se rakhi apni personal diary ko khole baithi hu. Diary me likhi lambi chaudi daastaan ko dekh kar phir se meri pichhli zindagi ki yaade taaza ho gayi hain. Aisa mahsus ho raha hai jaise sab kuch bas kal ki hi beeti baate hain.

Meri is personal diary ka naam "RITU-RAJ (Ek Naya Sansaar) rakha hai maine. Kahaniya padhne ka shauk to bahut hai mujhe magar kabhi likhne ke bare me nahi socha. Net par kayi aise forum hain jaha par tarah tarah ki kahaniya ek se badh kar ek writers ke dwara likhi huyi maujud hain, aur main unhe free time me padhti bhi hu.

Mere man me khayaal aaya ki kyo na main bhi apni is aap beeti ko ya ye kahu ki apni mohabbat ki daastaan ko aap sabke bich prastut karu. Dil me ye khayaal bhi aaya ki aap log ise padh kar mere bare me jane kya sochenge magar phir ye soch kar likhne ka man bana hi liya ki kisi ke sochne se bhala ab kya fark pad jayega.

Khair apni personal diary me chhupi huyi us sachchaayi ko main aap sabke saamne haazir kar rahi hu jiske bare me na to maine pahle kabhi socha tha aur na hi maine waisa hone ki kalpana ki thi, magar jaisa ki main pahle hi bata chuki hu ki kismat badi ajeeb chiz hoti hai ya ye kahe hi bhagwan ki maya badi ajeeb hoti hai.

Mere pariwar me meri maa ke alawa meri ek chhoti bahan aur ek chhota bhai hai. Pita ka kuch saalo pahle swargwaas ho chuka hai, balki ye kahu to zyada behtar hoga ki mere apne hi chhote bhai ne goli maar kar unki hatya kar di thi aur khushi khushi us hatya ka ilzaam apne sir le kar khud ko kanoon ke hawale kar diya tha. Adaalat me use umar kaid ki saza huyi aur wo jail chala gaya. Uske kuch time baad ek din meri maa bhi ghar se gayab ho gayi aur aaj tak unka kahi pata nahi chala. Samajh nahi aaya ki unhe ye zameen kha gayi ya aasman nigal gaya. Khair ye to alag kissa hai, jabki yaha par main jis kisse ka zikra karna chaahti hu wo hai mere aur mere chachere bhai viraj ke prem ka kissa.

Mere sage chacha ka ladka Viraj singh baghel, umar me mujhse chhota magar kisi hero se kam nahi tha. Main use behad pasand karti thi aur pyaar bhi bahut karti thi use, magar ek bahen ki tarah. Jabki wo mujhe bhai ki tarah nahi balki ek premi ki tarah prem karta tha jiska mujhe ilm hi nahi tha, magar hakikat ka pata ek din chal hi gaya aur us hakikat ne hamare rishte ko ek naya naam de diya tha. Shuru me kayi saal usne dar ki vajah se apne dil ka haal mujhse nahi kaha magar wo kab tak bhala apne dil ko samjha pata ya kaabu kar pata.? Kahne ka matlab ye ki usne apne dil ke hatho majbur ho kar aur badi himmat karke mujhse kah hi diya ki wo mujhse behad pyaar karta hai...ek bhai ki tarah nahi balki ek premi ki tarah. Uske is tarah izhaar-e-wafa karne se main ekdam se sann rah gayi thi. Main use is tarah dekhne lagi thi jaise achanak hi uska sir uske dhad se alag ho kar upar hawa me katthak karne laga ho. Jab mujhe hosh aaya to maine mahsus kiya ki mere andar zabardast tufaan khada ho chuka hai. Tabhi mujhe ekdam se khayaal aaya ki is maamle ko thande dimaag se samhaalna hoga. Is liye maine usse baat ki aur use samjhaya ki use aisa nahi sochna chahiye. Use ye khayaal hona chahiye ki main uski badi bahan hu aur bhai bahen ke bich aisa rishta rakhna har tarah se galat hai.

Meri baato se wo bas halke se muskuraya tha, uski aankho me paani tairta nazar aaya mujhe. Uske baad usne bade ajeeb andaaz me kaha tha.

"Aapko kya lagta hai didi mujhe rishte naato ka khayaal nahi hai.?" Viraj ne apne ghutno par baith kar aur meri taraf kaatar bhaav se dekhte huye kaha___"Aree mujhe bhi pata hai ki bhai bahan ke beech aisa rishta har tarah se galat kahlata hai magar prem to pavitra hota hai na...wo to bhagwan ka banaya hua ek khaas ahsaas hai jisme doob kar insaan duniya ki har chiz ko bhool jata hai. Maine is bare me bahut socha didi...magar har baar dil ne yahi kaha ki use aapse behad pyaar hai aur wo sirf aapke liye hi dhadakta hai. Agar aapko mera ye prem swikaar nahi hai to koi baat nahi..aap saaf mana kar sakti hain. Mujhe achhi tarah pata hai ki ye prem hota hi usse hai jo hame kabhi mil hi nahi sakta."

Viraj ke kahe huye ek ek shabd mere dilo dimaag me utarte chale gaye the aur palat jhapakte hi meri haalat ko kharaab kar diye the. Maine badi mushkil se khud ko samhala aur uski taraf dekhte huye uski kahi huyi baato ke bare me sochna shuru kar diya. Maine bahut socha magar main bhala kaise uske prem ko swikaar kar leti, jabki wo mera chhota bhai tha. Mere liye koi bhi faisla karna asaan nahi tha. Dilo dimaag ne kaam hi karna band kar diya tha. Khair aise hi kuch din guzar gaye. In kuch dino me ek badlaav ye aa gaya tha ki jaha wo mujhe dekh kar halke se muskura deta aur uski aankho me mujhe apne liye bepanaah prem nazar aata wahi main uske saamne jane se hi katrane lagi thi. Main usse khud baat nahi karti thi aur na hi uske samne jati thi, jabki wo mujhe dekhne ke bahane talaash karta tha.

Main chaahti to use is sabke liye kathorta se mana kar sakti thi ya phir uske bare me uski maa ko bata sakti thi magar maine aisa nahi kiya tha. Kyo ki wo mera bhai tha aur main use bachpan se hi bahut pyaar karti thi. Wo har chiz me tez tha aur sabse badi baat use rishto ki kadra thi. Wo apne se bado ka aadar sammaan karta tha aur sabse badi shaleenta se pesh aata tha. Ghar me use sab koi pasand karta tha. Main nahi chaahti thi ki mere kathorta se pesh aane ki vajah se wo kuch galat kadam utha le ya ghar wale use ghar se nikaal de.

Ek din usne phir se mujhse is bare me baat ki. Jab maine use samjhana shuru kiya to usne dukhi bhaav se phir se wahi sab kahna shuru kar diya. Maine is baar zara shakht lahje me use daat sa diya to wo chupchaap mere kamre se chala gaya. Uske is tarah chale jane se mujhe achha to nahi laga magar main jaanti thi ki is wakt us par taras khana ya use bhaav dena mumkin hai ki uski un ummido ko badha de jise wo paale baitha hai.

Us raat main usi ke bare me sochte sochte so gayi. Subah jab aankh khuli aur main bistar se uthi to maine mahsus kiya ki mere hath me kuch hai. Maine apne daahine hath me dekha to mere hath ki mutthi halka band thi aur us mutthi ke andar koi kaagaj ka tukda daba hua tha. Ye dekh kar main hairaan rah gayi ki bhala ye meri mutthi me kaha se aa gaya. Khair maine mutthi khol kar us kaagaj ko nikala aur use khol kar dekha to usme kuch likha nazar aaya. Upar ki lines padhte hi main chaunki. Asal me wo kaagaj ek khat tha jise viraj ne mere liye likha tha aur raat me ya subah hi kisi wakt wo meri mutthi me daba kar chala gaya tha. Main uske khat ko dekh rahi thi aur sath hi mere dil ki dhadkane bhi badh gayi thi. Maine us khat ko padhna shuru kiya.

Meri sabse pyaari didi, sabse pahle to mujhe maaf karna ki maine sote wakt aapke hath me ye kaagaj rakha aur shayad aapke dil ko dukhaya bhi, magar yakeen maaniye aapka dil dukha kar main zinda rahu ye to main khwaab me bhi nahi soch sakta.
Ye kaisi vidambana hai ki mujhe us ladki se prem hua jo is sansaar ki sabse khubsurat aur sabse haseen to hai...magar durbhaagya se wo meri bahan hai. Apne dil ki agar sunu to lagta hai ki aaj hi saari duniya se bagawat karke aapko apne sath ek aisi jagah le jaau jaha ham dono ke siva koi bhi na ho magar main bhala wo kaam kaise kar sakta hu jisse aapko zara bhi aitraaz ho. Maine aapse apne dil ka haal kaha aur aapne mujhe wahi samjhaya jo is duniya ki har bahan samjhati. Khair mujhe aapse koi shikayat nahi hai..shikayat to us parwardigaar se hai jisne mere dil me aapke liye bepanaah mohabbat to paida kar di magar usne aapko mera na banaya. Kitne saal guzar gaye aapki hasrat kiye huye magar ab sahan nahi hota mujhse. Agar aapke paas raha to apna kam aur aapka dil zyada dukhaauga, is liye main hamesha ke liye aapse door ja raha hu. Shayad aapse door rah kar apne dil se us mohabbat ko nikaal saku jo aapse huyi hai. Ghar se jane ki ek vajah ye bhi hai ki main nahi chaahta ki kisi din ghar walo ko mere is prem ka pata chal jaye aur wo dukhi ho kar aap par bhi sawaal khada kare.
Mujhe maaf kar dena didi...Main jaanta hu ki meri is harkat se aapko taklif hogi magar yakeen maaniye aapko ye taklif de kar main bhi kabhi khush nahi rahuga. Apna khayaal rakhna...mere liye aanshu mat bahana. Ye haseen chehra gulaab ki maanind khila hua hi zyada achha lagta hai. Aapki yaade aur aapke khubsurat chehre ki tasveer aankho me aur dil me basaye ja raha hu. Itna kafi hai mujhe zinda rakhne ke liye.
Achha....Ab Alvida,
Aapka, aur sirf aapka,,
*Viraj*

Is lambe chaude majmoon ke sath khat ke dusri taraf ek ghazal bhi likhi nazar aayi mujhe, jise maine apne dhaad dhaad bajte huye dil ke sath padhna shuru kiya.

Koi ummid koi khwaab kya rakhna,
Gam to musalsal hai hisaab kya rakhna,

Har ek cheez khaak kar di maine,
Kisi sawaal ka ab jawaab kya rakhna,

Shikaste zindagi hai raza kuch bhi nahi,
Yu dikhawe ka ab ruaab kya rakhna,

Kaante hi mayassar hain raahe wafa me,
Ab gali kooche me gulaab kya rakhna,

Raaze dile khamoshi sare aam karo,
Kisi bhi baat par naqaab kya rakhna,

Apni barbaadi ka jashn manayege ham,
Khushi ke aalam me hijaab kya rakhna,

Khat padhne ke baad kaafi der tak main awaak si baithi rahi. Mujhe samajh nahi aa raha tha ki ye sab kya hai.? Baar baar mere zahen me khat me likhi ek ek baat goonj rahi thi. Ekdam se mujhe jaise situation ka bodh hua aur main hadbada kar bistar se niche uthri. Uske baad lagbhag bhaagte huye viraj ke kamre me pahuchi. Kamre me har jagah maine dekha, yaha tak ki bathroom me bhi magar viraj na dikha mujhe. Maine kamre se nikal kar puri haweli ko chhaan mara magar viraj kahi nazar na aaya. Mere zahen me khat me likhi viraj ki baat goonj gayi 'Agar aapke paas raha to apna kam aur aapka dil zyada dukhaauga is liye main hamesha ke liye aapse door ja raha hu.'

Mere dilo dimaag me jaise koi bomb tezi se phoota aur mera samucha vajood jaise buri tarah hil gaya. Main palak jhapakte hi paagal si nazar aane lagi. Mujhe pahli baar mahsus hua ki mera bhai mere prem me kitna serious tha. Mujhe to laga tha ki shayad wo mujhe ek aam ladki samajh kar mujh par aakarshit tha magar nahi...wo to sach me mujhse prem karta tha. Mere dimaag me ek hi baat goonjne lagi ki viraj hamesha ke liye mujhse door chala gaya hai. Hey bhagwan ye kya kar liya usne.?

Main ghar me kisi se kuch kah bhi nahi sakti thi ki viraj ghar se kaha chala gaya tha aur kyo chala gaya tha.? Ghar walo ko jab pata chala ki viraj ghar se gayab hai to sab uski khoj me nikal pade. Din maheene saal aise hi guzar gaye magar viraj ka kahi bhi pata na chala. Viraj ki maa yaani ki meri gauri chachi aur unki beti nidhi ka ro ro kar bura haal tha aur phir guzarte wakt ke sath dhire dhire unke chehro par maano khamoshi chha gayi thi. Sabse zyada bura haal to mera tha kyo ki main to aakhir jaanti hi thi ki viraj kyo ham sabse door chala gaya tha aur meri bivasta ye thi ki main kisi se is bare me bata bhi nahi sakti thi..kyo ki usse mere charitra par bhi sawaal khade ho jate. Akele me apne kamre me bistar par pade main viraj ko yaad karke roti aur khayaalo me hi usse baate karti, usse hazaaro sawaal karti ki kyo kiya usne aisa.? Magar jawaab dene wala meri pahuch se hi nahi balki meri kalpanaao se bhi door tha.

Aise hi saat saal guzar gaye. Viraj ke bare me kahi se bhi kuch pata na chala tha. Main police inspector thi aur ab SP ban gayi thi. Maine apne istar par bhi viraj ke bare me bahut khoj ki thi magar nakaam hi rahi thi. Ghar me meri shadi ki baat hoti magar main shadi se ye kah kar inkaar kar deti ki jab tak mera bhai viraj nahi aayega main shadi nahi karugi.

Upar baitha bhagwan sabka naseeb likhta hai magar us naseeb tak pahuchane ke liye jo raaste aur halaat paida karta hai wo bade ajeeb aur hamari kalpanaao se pare hote hain. In saat saalo me maine viraj ke siva kisi aur ke bare me socha tak nahi tha. Mere zahen me tarah tarah ke khayaal aate rahte the, jinme kuch khayaal aise bhi the ki kya hota agar main viraj ke prem ko swikaar kar leti.? Prem to sach me pavitra hi hota hai to phir agar bhai bahan ke bich prem ho gaya to ye galat kaise ho gaya.? Kya sahi aur galat ka naap taul aise hi hota hai.? Aaj ka har insaan har roz kuch na kuch galat karm karta hi hai. Kabhi soch ke dwara to kabhi karm ke dwara. Maine police ki naukrari me aise bhi case dekhe the jisme ye maamla hota tha ki 'Sasur aur bahu ke bich prem hua aur dono ke bich najayaz sambandh bane.' To kya ye galat nahi tha. Aise bahut se maamle duniya me mil jayege jo aise rishto ke hain jinhe har tarah se galat kaha jata hai. Phir bhi aise log isi samaaj me rahte hain aur log sab kuch bhula kar unse waasta rakhte hain.

Apne bhai ke liye main itna dukhi aur pareshaan ho chuki thi ki ab mere dil me yahi tha ki wo kahi se aa jaye aur main uske seene se lipat kar khoob rou. Uske baad use khud se door kabhi na jane du. Main usse khud kahugi ki mujhe uska prem swikaar hai. Main uski ban jana chaahti hu...phir bhale hi chaahe ye duniya kuch bhi kahe. Mujhe sach me ab kisi ki bhi parwaah nahi thi. Mujhe to bas apne us bhai ke seene se lipat kar rona tha jo mujhe bepanaah pyar karta tha aur jiske liye usne apna ghar baar chhod diya tha. Jane kis duniya me aur jane kis haal me tha wo...kabhi kabhi to ye soch kar hi meri rooh kaamp jati ki wo is duniya me hai bhi ya nahi. Din raat bhagwan ji se uski salamati ki dua karti thi.

Akele me ab main aksar aise khayaal bhi bunne lagi thi jisme main aur mera bhai ek premi jode ke roop me hota aur ek dusre se aalingan ho kar pyaar kar raha hota. Aise khayaalo ko bunte hi mere samuche jism me ek ajeeb si jhurjhuri hoti aur mera man mayoor jaise jhoom sa jata. Magar jaise hi hakikat ke rishte ka dhyaan aata to main laaj aur sharm se pataal tak samaati chali jati.

Mujhe bhi shayad apne us bhai se prem ho gaya tha. Uske virah me tadapte tadapte aur uske prem ka sochte sochte pata nahi kab mere dil me uske liye waisa hi prem jaag gaya tha. Shuru shuru me mujhe is baat se bahut ajeeb laga aur sabke bare me soch kar aatmglaani bhi huyi magar dhire dhire ye baate bhi zahen se nikalti gayi.

Duniya me har insaan koi na koi paap karta hai...mere bhai ne prem hi to kiya tha aur ab mujhe bhi usse prem ho gaya tha. Mujhe bhi ab apne bhai ki hasrat thi. Main bhi ab uski hona chaahti thi. Main har roz bhagwan ji se dua karti ki wo mere bhai ko ya ye kahu ki mere priyatam ko mere paas bhej de, taaki main uski aur wo mera ho jaye. Samaaj ke niyam kanoon ki parwaah nahi thi ab...balki ab to bas ek hi khayaal tha ki ham dono is samaaj se door kahi chale jayege aur wahi apna ek naya sansaar basayege.

Kahte hain ki agar kisi chiz ko badi shiddat se chaaho to puri kaaynaat use milane me lag jati hai. Wahi hua tha hamere sath. Bhagwan ji ko shayad mujh par ya phir mere bhai par taras aa gaya tha. Is liye unhone hame milane ka soch liya tha.

Ek case ko solve karne ke baad maine department se kuch dino ke liye chhutti le li thi aur kahi baahar apne man ko bahlane ke liye jane ka socha tha. Department ne meri chhutti manjur ki aur main ghar walo ko bata kar akele hi nikal gayi thi. Baahar ke desho me mujhe switzerland pasand tha is liye main wahi gayi. Switzerland me mujhe aaye huye chaar din ho gaye the. Magar viraj ki yaado ne yaha bhi mera pichha nahi chhoda tha. Har wakt yahi sochti ki kaash wo is wakt mere paas hota to main khushi khushi uska hath pakde uske sath har pal ko enjoy karti.

Ek din shaam ko main waapas apne hotel ki taraf cab me baithi ja rahi thi ki achanak cab ko ek tez jhatka laga. Main kinhi khayaalo me gum thi is liye jhatka lagte hi main hakikat ki duniya me aa gayi. Maine driver se jhatke se cab ko rokne ke bare me puchha to wo jawaab diye bina hi driving door khol kar tezi se baahar ki taraf badh gaya. Uski is harkat se main ekdam se chaunki. Maine dekha ki wo cab ke saamne ki taraf gaya aur niche ki taraf jhuk gaya. Mujhe samajhte der na lagi ki kisi ka accident hua hai. Ye dekh kar main bhi tezi se baahar nikli aur us taraf badh gayi. Cab ke saamne aayi to dekha cab ka driver sadak par giri ek ladki ko utha raha tha aur baar baar sorry bhi bolta ja raha tha.

Shukar tha ki ye main road nahi thi warna accident zor ka hota aur shayad badi musibat bhi ho sakti thi. Khair maine dekha ki ladki cab ke driver ke sahare sadak se uthi aur jaise hi seedhi khadi huyi to ekdam se wo chihuk gayi. Shayad uske takhne me chot lagi thi jiski vajah se wo barabar khadi nahi ho paayi thi.

Wo ek simple si ladki thi magar uske nain naksh bahut achhe the. Uske chehre par masumiyat thi. Accident hone ke baad bhi usne cab ke driver ko kuch nahi kaha tha. Jabki aam taur par aisa hota nahi hai. Maine bhi aage badh kar usse puchha ki wo thik to hai na aur sath hi cab ke driver ko daata bhi. Mere puchne par usne bataya ki wo hospital jane ke liye nikli thi. Uska dhyaan hospital me admit uske chaahne wale par tha is liye wo cab ke saamne aa gayi thi. Maine dekha ki Uske hath me jo ek chhota sa pursh tha wo sadak par hi gira pada tha. Main aage badh kar use uthane ke liye jhuki to ekdam se thithak gayi.

Sadak par pade huye pursh ki ek chain khuli huyi thi aur usme jo samaan tha wo usse nikal kar sadak par fail gaya tha. Samaan me kuch kaagaj, ek chaabi ka guchchha aur ek keypad mobile sadak par faila tha. Magar mere thithakne ki vajah ye thi ki sadak par pade us mobile par jis naam se call aa rahi thi wo naam viraj ka tha. Switzerland jaise desh me kisi ladki ke mobile par viraj ka naam ye mere liye bahut hi zyada shocking baat thi. Mere dilo dimaag me jaise dhamaka sa ho gaya tha.

Maine ek jhatke se mobile uthaya aur jaise hi mobile utha kar use thik se dekhne lagi to call cut ho gayi. Mere dil ki dhadkane jaise ruk si gayi. Palak jhapakte hi meri haalat ajeeb si ho gayi. Man me hazaaro sawaal ek sath maano taandav sa kar uthe. Abhi main man me taandav kar uthe sawaalo par uljhi hi thi ki mere hath se kisi ne mobile le liya. Jisse mera dhyaan us taraf gaya. Maine dekha wo ladki mobile par kuch kar rahi thi. Mujhe samajh na aaya ki main usse kya kahu ya phir khud kya karu.? Dimaag jaise jaam sa ho gaya tha.

Tabhi cab ke driver ne mujhse chalne ko kaha to maine uski taraf dhyaan na dete huye us ladki se kaha.

"Ye viraj kaun hai.?" Mera dil buri tarah se dhadke ja raha tha. mere puchne par usne bataya ki viraj uska dost hai aur is wakt wo hospital me hai.

Us ladki ki ye baat sun kar mujhe mere pairo ke neeche se zameen khisakti huyi mahsoos huyi aur sath hi ye jaan kar meri haalat bhi kharaab ho gayi ki viraj hospital me hai. Matlab viraj ko kuch ho gaya hai isi liye wo hoapital me hai. Hey bhagwan ye kya ho gaya.? Nahi nahi...mere viraj ko kuch nahi ho sakta.

Main ekdam se paagal si nazar aane lagi. Maine us ladki se kaha ki wo mere sath cab me baith kar hospital chale. Mere is tarah kahne par wo ladki meri taraf aise dekhne lagi jaise main koi vichitra praani hu. Usne kaha ki wo akeli chali jayegi. Magar main na maani, balki usse minnate karte huye use cab me baithaya aur cab ke driver ko hospital chalne ko kaha. Ladki ne hospital ka naam bataya to driver chal diya.

Badi ajeeb baat thi. Duniya me sirf ek hi insaan to aisa nahi ho sakta tha na ki jiska naam viraj ho aur wo mera bhai ho. Magar kyo ki mere zahen me sirf viraj tha is liye mujhe yahi laga ki ye wahi viraj hai jo rishte me mera bhai lagta hai aur premi bhi.

Saare raaste wo ladki mujhse sawaal jawaab karti rahi ki maine usse hospital chalne ki zid aur minnate kyo ki.? Maine bhi usse viraj ke bare me bahut kuch puchha magar usne viraj ke bare me sirf itna hi bataya ki wo pichhle teen mahine se uski dost hai. Use nahi pata ki viraj ka apni family me kaun hai aur wo kaha se hai. Ladki ki baato se mujhe yakeen ho chuka tha ki wo viraj mera bhai hi hai.

Aakhir cab hospital pahuchi aur main us ladki ke sath tezi se haspital ke andar ki taraf badh chali. Mere dil ki dhadkane rail ki patariyo par daudte pahiyo ki speed se chal rahi thi. Main man hi man bhagwan ji se prarthna kar rahi thi ki ye viraj mera bhai mera priyatam hi ho.

Kuch hi der me main us ladki ke sath hospital ke andar ek kamre me daakhil huyi. Kamre ke andar aate hi mere kadam ekdam se ruk gaye. Dhadkane jaise tham si gayi. Meri aankho ke saamne hospital ke ek bed par ek shakhs leta hua tha. Uska chehra dusri taraf tha is liye main pahchaan nahi sakti thi ki wo kaun hai magar mera dil aur meri aatma ki awaaz mujhe sunaayi de rahi thi. Jo ki cheekh cheekh kar kah rahi thi yahi hai..yahi wo.

Us ladki ki awaaz par meri tandra tuti. Maine dekha wo ladki us insaan ke paas ja kar khadi ho gayi thi aur shayad usne use awaaz diya tha. Tabhi to us insaan ke jism me harkat huyi thi. Idhar maine bhi apne kadam haule se badha diye the. Dhaad dhaad bajti huyi dhadkano ke sath main bed ki taraf badhti chali gayi.

Jaise hi main bed ke paas ja kar khadi huyi waise hi bed par us taraf chehra kiye lete us insaan ne is taraf ko karwat li aur us par nazar padte hi jaise meri dhadkane dhakk se rah gayi. Wakt jaise thahar sa gaya. Meri aankho ke samne bed par mera bhai mera priyatam leta hua tha. Use dekhte hi meri haalat buri ho gayi. Mere dilo dimaag me tez dard utha aur aankho ne jaise aanshuo ka sailaab la diya.

Bed par leta hua viraj aplak meri taraf hi dekhe ja raha tha. Uske chehre par pahle aashcharya aur phir karun bhaav ubhar aaye. Kitna dubla ho gaya tha wo. Mera bhai jo kisi hero se kam nahi tha aur jiski body chust durust raha karti thi wo ab jane kaha gayab ho gayi thi. Main use is haalat me dekh kar buri tarah tadap uthi thi. Mere andar bhaavnao aur jazbaato ka tez tufaan maano qayamat dhane laga. Main ek jhatke se usse lipat gayi aur foot foot kar rone lagi.

Main apne priyatam se lipti bas roye ja rahi thi. Mere mukh se kuch aur nahi nikal raha tha jabki bed par lete huye viraj ne sahsa meri peeth par hath rakh kar sahlane laga aur tabhi mere kaano me uski dard me dubi huyi awaaz padi.

Tu aa gayi to kisi aur ki raza na karuga,
Aree ab maut bhi aaye to gila na karuga,,

Bezaar thi ye zindagi meri jaan ab talak,
Ab bahaar aayi hai to khiza na karuga,,

Tujhe toot kar chaahu aur phir mar jaau,
Socha tha kisi mod par mila na karuga,,

Ek din teri hi aarzu liye main fana ho jaau,
Tere bagair khush rahu, dua na karuga,,

Mere charagar mere dil ki shifa kar de,
Warna is dard e dil ki dawa na karuga,,

"Bas kar, plz chup ho ja raj." Main apne kaano par goonjte viraj ke un lafzo ko sun kar buri tarah tadap uthi jo mera kaleja cheer gaye the__"Main tere ye lafz nahi sun sakugi. Mujhme itni himmat nahi hai ki main tere dard se bujhe huye in lafzo ko sun kar unhe sah paau."

"To phir aap bhi is tarah mat roiye na. Aap janti hain na ki main aapko is tarah rote huye nahi dekh sakta." Viraj ne kaha.
"Kaise na rou.? Tu mujhe chhod kar kyo chala gaya tha.?" Maine uske seene se sir utha kar uski aankho me dekhte huye magar rote huye kaha___"Kya tujhe itna bhi ahsaas nahi tha ki tere bina main kaise jiyugi.?"

Mere aisa kahne par viraj mujhe feeki si muskaan ke sath dekhne laga. Chehre par nasamajhne wale bhaav ubhar aaye. Shayad wo samajhne ki koshish kar raha tha ki mere aisa kahne ka kya matlab ho sakta hai. Mujhe uske chehre par ubhre bhaav padhne me zara bhi mushkil na huyi. Aakhir police wali thi aur chehre padhna achhi tarah aata tha mujhe. Maine ek jhatke se faisla kiya aur phir uske chehre par jhukti chali gayi. Maine aankhe band karke viraj ke hotho par apne thartharaate huye labo ko rakh diya. Jaha viraj ko mere aisa karne par yakinan jhatka laga hoga wahi mere jism me bhi ek ajeeb si jhurjhuri hoti chali gayi.

Do minute baad jab maine apna chehra uthaya to maine dekha viraj ki aankho se aanshu bah rahe the. Uski aankho me aanshu dekh kar main ek baar fir se tadap uthi. Tabhi viraj ne muskurate huye kaha.

"Iska matlab..." Maine uski baat puri nahi hone di.
"Haan meri jaan." Maine apne aanshu ponchhte huye kaha___"Ab main kuch nahi sochna chaahti. Saari duniya is rishte ke khilaaf ho jaye magar mujhe koi parwaah nahi hai. Prem to pavitra hota hai na...jab dil mil gaye aur aatma jud gayi to phir aur kya sochna.?"

Kahne sunne ko to baate bahut thi magar wakt sahi nahi tha. Wo ladki ham dono ko chakit bhaav se dekh rahi thi. Maine aur viraj ne use apne bare me sab kuch bataya. Jise sun kar wo buri tarah hairaan rah gayi thi.

Viraj ko sharaab ki buri lat padi huyi thi isi vajah se wo hospital me tha. Doctor ne sharaab pine se use kayi baar mana kiya tha magar wo nahi maanta tha. Khair ab sab thik tha. Viraj ne khud hi kaha ki ab se wo sharaab ki taraf dekhega bhi nahi.

Main pandrah din ki chhutti par gayi thi is liye hospital se viraj ko discharge karwane ke baad main use apne sath hotel hi le aayi thi. Hotel me ham dono khushi khushi rahe. Duniya bhar ki baate ki. Viraj ke thik hone ke baad ham dono sath me waha ghoome. Ham dono ka rishta badal gaya tha. Ab ham dono bhai bahan nahi the balki premi the aur ek dusre ke sath sari zindagi bitane wale the.

Hamne faisla kiya ki ham ghar walo se saaf saaf bata denge ki ham dono ek dusre se pyaar karte hain aur shadi bhi karna chaahte hain. Agar ghar wale raazi nahi bhi hote hain to ham dono kahi door ja kar apna ek naya sansaar bana lege. Mere puchhne par viraj ne bataya ki wo hapte das din ke liye india aata tha aur fir kisi na kisi desh ki taraf nikal jata tha.

Switzerland se ham dono sath hi ghar aaye. Ghar me viraj ko dekh kar sab behad khush huye. Gauri chachi aur nidhi to use chhod hi nahi rahi thi. Sab koi mujhe shabashi de raha tha, kyo ki main sabke chahete viraj ko khoj kar ghar laayi thi. Kuch din aise hi guzre uske baad ham dono ne plan ke anusaar ghar walo ko sab kuch bata diya. Hamari baat sun kar sab behad naraaz aur gussa huye. Ham dono ko na jane kya kya kaha sabne magar hamne yahi kaha ki ham ek dusre ke bina ab nahi rah sakte. Agar aisa na hua to ham dono me se koi khush nahi rahega aur mumkin hai ki viraj phir se ghar chhod kar chala jaye.

Aakhir badi mushkil se sab raazi huye magar is shart par ki ham dono is desh me nahi rahenge. Aakhir unhe bhi apni aan baan aur shaan ka khayaal tha. Bas phir kya tha, maine police department ko apna isteefa saump diya. Uske baad ek mahine ke andar hi ham dono ki gup chup tarike se shadi ho gayi aur ham dono switzerland chale gaye.

Zindagi me khushiya hi khushiya bhar gayi thi. Ham dono bhai bahan ab pati patni ban chuke the aur dusre desh me apna ek naya sansaar basa chuke the. Ghar walo se phone par baat hoti thi. Saal chhah mahine me koi na koi hamse milne aata rahta tha. Magar ek shakhs aisa tha jo hamare is rishte se khush nahi tha aur na hi wo kabhi hamse baat karta tha. Wo shakhs koi aur nahi balki viraj ki bahan aur meri nanad thi....Nidhi singh baghel.

______*The End*______
 

Mr.raj1100

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.... ADHURA BANDHAN ....

Mohan 23 sal ka nojawan
dekhne mei kisi body bilder se kam nahi tha...

apne ganv bilaspur se 1500 km door yaha rajnagar mei ek company mei job kiya karta tha...
Ganv mei uske budhe ma bap or ek choti behan renuka 18 sal rehte the...
mohan apne ma baap or behan renuka se beinteha pyar karta tha..
mohan ma baap ke sath rehna chahta tha magar gareebi ne usko sehar jane par majboor kar diya tha..
mohan apne parivaar ko bhi sehar lana chahta tha isiliye raat din mehnat kar pesa kama raha tha....
Aise hi waqt gujar raha tha ki achanak ek din mohan ko khabar milti hai ek hadse mei uske ma baap hamesha ke liye duniya chod kar chale jate hai...
mohan ko jese hi ye khabar milti hai uske pero tale zameen khisak jati hai...
uski aankho se selaab beh nikalta hai..
aaj use apna sehar aane ka fesla galat lag raha tha... itni door hone ki wajah se mohan
apne ma baap ke aakhri darshan bhi nahi kar paya tha...
mohan apna bag lekar ganv jane ke liye railway station par pahuchta hai...
Apne ma baap ko yaad karte hue mohan ki aankho se ansoo ruk nahi rahe the...
kafi der se pass ki bench par bethi ek ladki mohan ko aise rota dekh rahi thi...
aise hi adha ghanta gujar jata hai is adhe ghante mei ladki ki nazar mohan par 50 bar pad chuki thi..
woh lagatar roy ja raha hai...mohan ko aise rota dekhkar ladki apni bench se uthti hai or mohan ke pass pahuch jati hai
ladki.. Hello
magar mohan apne hi khayalo mei khoya tha uske kano tak ladki ki aawaz nahi pahuchti...
achanak ladki apna hath mohan ke kandhe par rakh deti hai...
mohan apne khayalo se bahar aate hue ladki ki taraf dekhta hai..
mohan ki aankho se aansoo ki barish ho rahi thi...
Ladki.. excuse me kya mei yaha beth sakti hu..
mohan bina kuch kahe sarakte hue ladki ko bethne ki jagah deta hai...

Ladki bejhijhak mohan ke barabar mei banch par beth jati hai or apne bag se pani ki botal nikalkar mohan ki taraf karti hai ..
ladki..hello mera name savitri hai..
mohan palat kar ladki ki taraf dekhta hai jo muskurati hui usko pani ki botal de rahi thi..

rote rote mohan ka gala shukh chuka tha isliye bina kuch kahe mohan ladki ke hath se pani ki botal le leta hai..

savitri ke chehre par muskurahat aa jati hai...savitri ek tuk mohan ko pani pete hue dekhti rehti hai...
mohan khali botal savitri ko pakda deta hai..
mohan... Thank you
savitri.. Koi baat nahi aap kaha ja rahe hai
mohan.. mei apne ganv bilaspur ja raha hu kal raat tufaan mei mere ma baap is duniya ko chodkar chale gay..
or ye kehte kehte mohan ki aankho mei phir se pani aa jata hai..
savitri apne pars se rumal nikalkar mohan ke aanso pochti hai...
tabhi mohan ki train station par aa jati hai.. or mohan apna saman utha kar train mei chadne lagta hai..
Savitri mohan ko jate hue aise dekh rahi thi jese uska apna koi juda ho raha ho..
achanak banch se uthkar savitri ke kadam apne aap train ki taraf badhne lagte hai or savitri anjani train mei chad jati hai...
mohan ko talashte hue savitri dabbe mei aage badh rahi thi...
jese hi savitri ki nazar windows sheet par bethe mohan par padti hai use bada sakoon milta hai...
savitri bina kuch kahe mohan ki bagal mei aakar beth jati hai.. jese woh mohan ko barso se janti ho..
mohan bhi savitri ko dekhkar apne pass bethne ke liye jagah deta hai...
1500km ka lamba safar savitri Or mohan ke dil mei jagah bana leta hai..
is safar mei dono kafi kareeb aa chuke the.... Agle din mohan ka ganv bilaspur aa jata hai magar Mohan ko abhi tak savitri ke bare mei kuch maloom nahi hai..
aakhir savitri uske sath kis rishte se chali aai thi... mohan ke piche piche savitri uske ghar tak pahuch jati hai...
Ghar mei renuka apne bhaiya ko dekhkar lipat jati hai or foot foot kar rone lagti hai....
mohan bhi apni behan ke gale lag jar rone lagta hai...
kafi der bad renuka ka dhyan savitri ki taraf
jata hai.. ranuka apne bhaiya se savitri ke bare mei puchti hai..
mohan ki samajh mei nahi aata woh apni behan se savitri ke bare mei kya kahe
mohan.. Yyyy hamari mehman hai or kuch din hamare sath yehi rahigi....
mohan ki baat sunkar savitri ke chehre par muskurahat aa jati hai...
renuka bhi savitri uper se niche tak dekhti hai or sochne lagti hai bhaiya to ladkiyon se baat tak karne mei jhijakte the phir ye kon ladki mehman bankar uske ghar aai hai...
tabhi savitri renuka se bolti hai...
savitri... renuka mujhe bathroom jana hai..
renuka.. . G chaliye
renuka savitri ko bathroom tak chodne chali jati hai..
renuka.. aap fresh ho jaiye mei aapke liye khana lagati hu....

Udhar mohan bhi savitri ke bare mei sochne lagta hai... Aakhir kon hai ye savitri jo bina kisi rishte ke uske ghar tak aa gai...
mohan savitri ke bare mei janna chah raha tha.. raat ko khana khane ke bad jab renuka
So jati hai.. tab mohan savitri se uske baare mei puchta hai.. tum kon ho or mere sath yaha kyu chali aai...
savitri... mei mumbai mei apne bhai ajay ke sath rehti hu tumhari tarha mere bhi ma baap is duniya mei nahi hai...
mohan.. . Ohhhh
Savitri...tumhe dekhkar mujhe aisa laga jese tumhara mera dard ek jesa hai.. or pata nahi kyu mere kadam apne aap tumhare piche piche chal pade...
savitri ki baat sunkar mohan ki aankho mei phir se pani aa jata hai.. ek dusre ko sambhalte hue kab dono ek duje ki banho mei aa jate hai pata hi nahi chalta....
savitri or mohan ki nazdikiyan badhti chali jati hai.. agle din renuka bhi savitri ko apne bhaiya se lipttay hue dekh leti hai....
bas phir kya tha renuka sham ko khane ke waqt savitri ko bhabhi kehkar bulane lagti hai..
renuka ke muh se savitri ko bhabhi kehte hue mohan bhi chunk jata hai...
mohan.. yyyy ye tum kya keh rahi ho renuka
renuka... mujhe sab pata hai bhaiya aap bhale hi mujhe kuch na batao meine aap dono ko pyar karte dekh liya hai...
bade bhole pan se renuka ye baat keh deti hai..
renuka ki baat sunkar dono saram se pani pani ho jate hai..
or renuka muskurati hui khali bartan uthakar kichin mei chali jati hai.....
renuka ke baat se mohan savitri se nazre nahi mila pa raha tha...
mohan... savitri mei renuka ki taraf se mei bahut sharminda hu use aise nahi kehna chahiye tha...
savitri apni nazre utha kar mohan ki aankho mei jhankte hue kehti hai...
savitri...kya mei renuka ki bhabhi banne ke layak nahi hu...
savitri ki baat sunkar mohan ek dum chonk jata hai...
mohan.. kesi baat kar rahi ho savitri tumhe patni ke roop mei pakar to mera jiwan dhanye ho jaiyga.magar
savitri.. Magar kya
mohan.. mei apni shadi se pehle renuka ko doly mei bitha dekhna chahta hu...
Savitri...uski chinta mat karo meri nanad to
lakho mei ek hai uske liye rajkumar mei dhond kar laungi.....
savitri ki baato se mohan ke chehre par muskurahat aa jati hai...
Or savitri apni banho ka haar mohan ke gale mei dal deti hai dekhte hi dekhte savitri ka pyar parvaan chadne lagta hai...
do din bad savitri mohan se mumbai chalne ke liye bolti hai...
mohan.. magar mei mumbai jakar kya karunga
savitri...mei tumhe apne bhaiya se milwana chahti hu or phir apni renuka ke liye bhi to rajkumaar dekhna hai ki nahi...
savitri ki chikni chupdi baato mei mohan fisal jata hai. . Or mohan apni behan renuka ko lekar savitri ke sath mumbai pahuch jata hai...
mumbai mei savitri ka makan kafi bada jise dekhkar dono bhai behan ki ankhe khuli ki khuli reh jati hai.. mohan ne to sapne mei bhi nahi socha tha uske sath rehne wali savitri itne bade ghar ki beti niklegi...
savitri apne bhai se dono ka Introduce karati hai or phir mohan or renuka ko lekar ek kamre mei pahuchti hai ..
Savitri..aap dono yaha aaram kar lo tab tak mei apne bhaiya se tumhare baare mei baat karti hu..
or ye kehkar savitri muskurate hue kamre se bahar chali jati hai..
dono bhai behan safar se kafi thak chuke the or lettay hi dono nind aa jati hai.....

udhar savitri apne bhai ke kamre mei pahuchti hai or apne bhai se gale se lipatti hui bister par gir jati hai. Ajay bhi apni behan ko banho mei bhar leta hai...
ajay... meri jaan bada kadak maal lekar aai ho..
savitri.. ha bhaiya aapka khayal to mujhe rakhna padta hai.. magar jara sambhal kar piuor virgin maal hai jaldbazi mei kuch gadbad mat kar dena....
Ajay.. tumhare hote hue gadbad kese ho sakti hai.. wese tumne to khoob maze le liye honge..
savitri.. kaha bhaiya bada bhola hai apni tak ladki ki tarha hi shel peck hai...
Ajay.. yaqeen nahi hota tumhare sath rehne ke bad bhi ab tak virgin hai...
apne bhai ki baat sunkar savitri khulkhila kar has padti hai...
savitri.. koshish to bahut ki magar kehta hai jab tak behan ki doly nahi uthegi kunwara hi rahega...

ajay sararat mei apni behan savitri ki chuchiyon ko masalte hue
ajay.. to aaj raat mei uski behan ki doly uthata hu tum ladke ka kunwarapan loot lo ...
savitri.. lagta hai aapka hatiyar kuch jyada hi kulache marne laga hai magar jaldbzi mei aisa koi kadam mat utha lena jisse sab gud gobar ho jay...
ajay.. to Jaldi kuch karo behana sabar nahi hota ...
savitri.. thik hai bhai mei koshish karti hu jald hi renuka tumhari banho mei khud aa giregi...
savitri ki baat sunkar ajay ko josh chad jata hai or savitri ko apne niche kichte hue uski sawari karne lagta hai...
Raat ko savitri mohan ko lekar ek kamre mei pahuchti hai..or mohan ke gale se lipattay hue
savitri...pata hai aaj mei bahut khush hu bhaiya ne hamara rishta kabool kar liya hai..or apni renuka ke liye bhi rajkumaar mil gaya hai...
savitri ki baat sunkar mohan chonk jata hai..
mohan.. kya keh rahi ho savitri kon hai woh rajkumaar
savitri.. mere ajay bhaiya
mohan.. kya keh rahi ho savitri
mohan.. ha mere bhaiya to renuka ki khubsurti dekhar khud hi tumhari behan se shadi karne ko kehne lage....
mohan ko savitri ki baato par yaqeen nahi aa raha tta
mohan..tum sach keh rahi ho savitri mujhe yaqeen nahi ho raha meri behan itne bade ghar rajkumari banegi...
savitri.. ha mei sach keh rahi hu.ab to khush ho tum. ..
mohan.. ha mei bahut khush hu savitri mei zindagi bhar tumhara ye ahsan nahi chuka paunga...
savitri.. kesi baat kar rahe ho meri jaan mei tumse bahut pyar karti hu mujhe bas tumhara pyar chahiye. . bolo doge na mujhe apna pyar

mohan savitri ki baat sunkar abki bar khud savitri ko apni banho mei bhar leta hai..or uske raseele honto par apne hont rakh deta hai...
savitri bhi apni banhe kholkar mohan ki banho mei aa jati hai..
mohan savitri ko pyar karne lagta hai dekhte hi dekhte savitri apne jism se kapde nikal fenkti hai... Or mohan ka hath pakadkar apne sine par rakh deti hai....
mohan savitri ke uper aate hue uske andar samane ki koshish karne lagta hai.
magar savitri is khel ki purani khiladi thi use pata tha mohan abhi is khel ka naya khiladi hai thoda dheere dheere aage badhna padega....
savitri mohan ke niche se nikal uski tango se kapdo ko aazad karti hai..mohan ka anchua kunwara land angdai leta hua bahar aa jata hai...savitri mohan ke hathiyaar ko apne hatho mei pakad leti hai...
mohan ki siskari nikal jati hai..
mohan... aaaahhhhh savitri ye kya kar rahi ho
mohan ne kabhi apne land ko chua tak nahi tha or savitri agle pal apne hont kholkar mohan ke land ko muh mei le leti hai. ...
ufffff mohan to jese swarg mei pahuch jata hai...
mohan ne kabhi iski kalpana bhi nahi ki thi woh to shidha sadha bhola bhala aaj savitri ke jaal mei fas chuka tha.....
savitri bade maze se mohan ki lollypop ko chush chuskar sara ras chat leti hai...
mohan zindagi mei pehli bar tarapt hua tha
swarg jesa anad pakar mohan ki aankhe band hoti chali jati hai..
kuch der bad savitri mohan ko apni handiya ke darsan karati hai...or mohan bhi handiya se makkhan chatne lagta hai....
or kuch der bad mohan ka roket chandaryaan ki ser karne ko tyyar ho jata hai....
savitri khud postion banate hue mohan ke roket ko apne chandaryaan par set karti hai or mohan se roket chodne ko kehti hai.... or mohan savitri ka ishara milte hi jhatka maar deta hai ek hi jhatkey mei roket shidha chand par pahuch jata hai...
Savitri sari raat mohan se apne jism ki aag bujhati rehti hai.....

Subah mohan apni behan renuka se ajay ke bare mei batata hai.. apni shadi ki baat sunkar renuka sarma jati hai...
mohan.. meri behan kya tu is rishte se khush hai
renuka.. bhaiya jesa aapko thik lage
mohan renuka ka fesla sunkar bahut khush hota hai. ..
dono bhai behan savitri ko devi samjhne lage the jisne unke jiwan mei aakar roshni hi roshni kar di thi...
magar savitri to apne bhai ke sath milkar kuch or hi khel khel rahi thi..
savitri renuka se market chalne ko bolti hai...
renuka.. bhabhi mei market jakar kya karungi
savitri.. Arre meri nanad rani ab tum meri bhabhi bhi banne wali ho to thoda tumko badalna to padega. ..
renuka market jane mei bada jhijhak rahi thi or renuka apne bhai mohan ki aankho mei dekhkar mana karne ki koshish karti hai..
magar mohan aankho hi aankho mei ishare se renuka se jane ke liye bol deta hai..
apne bhai ka ishara milkar renuka market jane ko tyyar ho jati hai...
savitri renuka ko lekar ek mall mei pahuchti hai or renuka ke liye chote chote kapde dekhne lagti hai...
renuka.. bhabhi ye aap kese kapde dekh rahi hai..
savitri.. inhe pehnkar tum bilkul rajkumaari lagogi
renuka.. bhabhi tum inhe pehanne ki baat kar rahi ho mujhe to dekhne mei bhi saram aa rahi hai...
savitri... meri bholi nanad ab tum ganv mei nahi sehar mei rehne wali ho or sehar mei to sehar jesa bankar rehna padega.
chalo mujhe ye dresss pehan kar dikhao
savitri renuka ko ek net ki short dress pakdati hai jao tryroom mei pehan kar aao
renuka.. Bhabhi
Savitri.. mei keh rahi hu na
savitri bade haq se renuka se bolti hai
is bar mana karne ki renuka mei himmat nahi hoti..
or renuka kapde lekar try room mei chali jati hai kuch der bad renuka try room se bahar nikal ti hai savitri to dekhti ki dekhti reh jati hai..
ufffff kya kayamat lag rahi thi renuka savitri to sochne lagti hai agar uske bhai ne is haal mei renuka ko dekh liya to aaj hi suhagraat mana lenge...
savitri... Woooowwwweee renuka tum bahut khubsurat lag rahi ho is dress mei
renuka.. bhabhi mujhe bahut saram aa rahi hai..
savitri.. kesi baat kar rahi ho yaha sehar mei ye sab chalta hai..
savitri dress ke pese dekar shop se bahar nikalti hai..
renuka khud ko badi uncomfortable mehsoos kar rahi aisa lag raha tha jese woh bina kapdo ke nangi chal rahi ho...
magar savitri ki wajah se kuch keh nahi pati
Phir savitri renuka ko lekar ek beautyparlor mei le jati hai or renuka ka aisa meckup karwati hai ki khud renuka apne aap ko nahi pahchanti...
Sham ko renuka jab ghar pahuchti hai to ek baar mohan bhi apni behan ko pehchan nahi pata....
Or jab ajay ki nazar renuka par padti hai woh to palke jhapkana bhool jata hai
chote chote kapdo mei jhankta yowan ajay ko ghayal kar raha tha renuka ki khubsurati ka dewaana ho jata hai..
ajay se ab or sabar nahi ho raha tha dil chah raha tha abhi renuka ko banho mei bhar lu..
savitri bhi apne bhai ki halat samjh jati hai...

raat ko khana khane ke bad savitri renuka ke kamre mei pahuchti hai..
renuka kapde badal kar bister par let chuki thi
savitri renuka ke pass bethti hui
savitri.. mere bhai to tumhari khubsurati ke dewaane ho gaye hai ab bhaiya se or sabar hone wala woh tumse jald hi shadi karna chahte hai..
renuka bhabhi ki baat sunkar sarma jati hai
savitri.. ab saram karna chodo Or sexy banna shikho
renuka.. kesi baate karti ho bhabhi aap bhi
Savitri.. Arre meri bholi nanad ab tum jawan ho gai ho ye bhaola pan chod kar apni jawani ka jalwa dikhao
renuka.. mujhe ye sab nahi aata bhabhi
Savitri.. Arre mei hu na tumhe sab shikha dungi ...
or savitri renuka ko apna mobile pakdati hai..
Savitri... tum mobile mei ye video dekho tab tak mei tumhare bhai ko pyar shikhati hu
Or savitri khilkhilate hue kamre se bahar chali jati hai...
renuka apni bhabhi ka itna khulapan dekhkar herran thi or jese hi renuka ki nazar mobile par
chalti video par padti hai renuka ke hosh udd jate hai...
zindagi mei pehli bar renuka ne aisa nazara dekha tha mobile mei ek ladka or ek ladki apne jism se kapde utar rahe the...
renuka to ye sab dekhkar kanp si jati hai.
or uske hath se mobile chot kar niche gir jata hai....
udhar savitri renuka ke kamre se nikal kar mohan ko dekhti jo bister par leta so raha tha
savitri kamre ki light off karke waha se shidha apne bhaiya ke kamre mei pahuch jati hai. . .
savitri.. kya kar rahe ho bhaiya
ajay... savitri began tune to meri nind ho uda di aaj kya gajab ki kayamat lag rahi thi renuka
mera to aisa man kar raha hai aaj raat hi suhagraat mana lu...
savitri.. . bas thoda sa sabr rakkho bhaiya meine dana dal diya hai chidaya khud hi tumhari banho mei aane wali hai...
savitri ki baat sunkar ajay ko josh chad jata hai or ajay apni behan ko banho mei rasleela khelne lagta hai. . .
idhar renuka mobile mei video dekhkar itni garam ho jati hai ki uska pani nikal jata hai...
renuka bathroom jane ke liye jese hi apne kamre se bahar nikalti hai to use apni bhabhi ki dabi dabi siskariyan sunai deti hai ..
renuka ke kadam apne aap siskariyan ki taraf badh jate hai or jis kamre se aawaz aa rahi thi renuka ko usmei khidki khuli nazar aa jati hai..
renuka jese hi khidki se andar jhankti hai uske pero tale zameen khisak jati hai...
jiski abhi tak renuka devi samajh kar puja kar rahi thi .. uska aisa roop bhi ho sakta hai..
andar savitri or ajay bilkul nagan avasta mei ek dusre se sex kar rahe the...
renuka ki aankho se jhar jhar aansoo beh nikalte kitna bada fareb kiya tha savitri ne unke sath...
renuka ye sab dekhkar apne bhaiya ke kamre mei pahuchti hai jaha mohan gehri nind mei soya tha...
renuka apne bhaiya ko jhanjhod kar uthati hai
renuka.. Bhaiya utho
mohan hadbada kar apni aankhe kholta hai..
mohan.. kya baat hai renuka itni raat ko kya hua
renuka.. bhaiya mere sath chaliye aapko kuch dikhana hai
renuka apne bhaiya ka hath pakadkar bahar ajay ke room tak le aati hai
or jese hi mohan ki nazar kamre mei ajay or savitri ko is haal mei dekhti hai uske bhi pero tale zameen khisak jati hai. . .
ye sab dekhkar mohan ko bada sadma pahuchta hai...
renuka.. bhaiya please mujhe yaha se lekar chalo mera yaha dum ghut raha hai..
mohan.. ha behan ab hum yaha nahi rahenge
...
dono bhai behan apna saman utha kar chupkese raat ko hi waha se nikal jate hai.. .

renuka.. bhaiya ye duniya bahut kharab hai jise hum devi samjh rahe the wo to chudail nikli.. .
mohan.. ha behan tum thik keh rahi ho kisi par bharosa nahi karna chahiye
renuka.. ab hum kaha jaiynge
mohan.. raj nagar jaha mei kaam karta hu
hum dono wahi sath rehkar rukhi sukhi kha lenge
Renuka.. thik hai bhaiya
...
or dono bhai behan raj nagar pahuch jate hai
waqt gujarta chala jata hai.. mohan ko phir se apni behan ki shadi ki chinta hone lagti hai..
renuka.. bhaiya kya mei aap par bojh ban rahi hu jo aap meri shadi karna chahte hai..
mohan.. Kesi baat kar rahi hai behan bhala koi behan apne bhai par bojh kese ban sakti hai..
renuka.. to phir kabhi mujhse shadi ki baat mat karna
mohan.. thik hai meri behan agar tu shadi nahi karegi to phir mei bhi shadi nahi karunga...


.......The end......
 

Sweet_Sinner

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~~~~~ गहरा राज ~~~~~

"साली कुतिया कहां भाग रही है, तुझे मेरे हाथों से कोई भी नहीं बचा सकता है।"

"मौत तेरा इंतज़ार कर रही है। बहुत तड़पाया है तूने अब तेरी बारी है, तड़प-तड़प के मरने की। कब तक भागेगी ? साली, हरामजादी, छीनाल।"

एक घने जंगल में एक लड़की के पीछे भागते हुए एक आदमी यह बोले जा रहा था। लड़की भी अपनी जान बचाने के लिए दौड़े जा रही थी, तभी उसका एक पैर छोटे गड्डे में पड़ा और वह लड़खड़ा गई। लड़खड़ा कर वो औंधे मुंह जा गिरी और उसके मुंह से एक ज़ोरदार दर्द भरी चीख निकल गई, क्योंकि जब वो लड़खड़ा कर गिरी थी तो ज़मीन पर एक नुकीला पत्थर पड़ा था और वो उसके ऊपर ही गिरी थी। जो उसके पेट में थोड़ा सा घुस गया था।

"साली, अब कहां बचके जायेगी, बहुत भाग रही थी।" कहते हुए वो आदमी उसके पास आया।

लड़की दर्द से कहराते हुए पलटी और डरते हुए बोली, "मुझे छोड़ दो, मैंने कुछ भी नहीं किया। तुम मुझे क्यों मारने पर तुले हो ?"

आदमी झुककर उसके बालों से पकड़ते हुए कहता, "कुतिया, बहुत नाटक करती है, लेकिन आज तेरा खेल खत्म समझी।" और वह अपने हाथ में पकड़ा एक तेज धार चाकू उसकी गर्दन पर रख चलाने ही वाला था कि...।

तभी एक आवाज आई "कट!"

बहुत बढ़िया शॉट दिया, अब बाकी की शूटिंग कल करेंगे।

लड़की खड़ी होती है और मेकअप वैन की ओर जाने लगती है।

तभी एक लड़का उसके पास आता है और कहता है कि "शानदार अभिनय मैं तो तुम्हारी अदाकारी का कायल हो गया हूं, मेरी जान।"

लड़की : शुक्रिया!, लेकिन तुम आज यहां कैसे आ गए ?

लड़का : बस, आज काम से जल्दी फ्री हो गया तो सोचा कि चलकर मेरी जान की शूटिंग ही देख लेता हूं।

लड़की : अच्छा जी, यहीं बात है या फिर कुछ और ही चल रहा है मेरे भाई के दिमाग़ में। (मुस्कराते हुए...!)

लड़का : दीदी, आपको हमेशा कहा कि जब में किसी किरदार में होता हूं तो मुझे भाई मत बोला करो। सारा मजा किरकिरा कर दिया आपने। (थोड़ा मायूस होकर)

लड़की : वो मुझे याद ही नहीं रहा कि मेरा भाई अभी एक किरदार में है। भूल हो गई, माफ कर दे! (मुस्कान के साथ)

लड़का : कोई बात नहीं, मैं तो यहां इसलिए आया था कि आपने ही कहा था कि यहां आ जाना। फिर साथ में खरीदी करने चलेंगे।

लड़की : मैं भी भुलकड़ होती जा रही हूं। (अपने माथे पर एक चपत लगाते हुए)

लड़की : अच्छा, तू अभी यहीं रुक, मैं कपड़े बदलकर आती हूं। फिर हम खरीदी करने चलेंगे।

कुछ देर बाद दोनों भाई-बहन एक मार्केट में अपने लिए कपड़े और दूसरी चीजें खरीदते हैं और थोड़ा बहुत घूम फिरकर घर आ जाते हैं।

घर आकर दोनों अपने रूम में जाते है। दोनों का रूम एक ही था, क्योंकि ये लड़की कोई बड़ी अभिनेत्री नहीं थी, बल्कि नाटकों, छोटी फिल्मों और वेब सीरीज में छोटे-मोटे अभिनय करती थी। उनका घर बड़ा नहीं था, एक 1 बेडरूम का फ्लैट था। जिसमें वो अपने मम्मी-पापा के साथ रहते थे, लेकिन एक साल पहले घर में घुसकर किसी चोर ने उनकी हत्या कर दी थी। उनका कोई भी रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि इनके मम्मी-पापा ने भाग कर शादी की थी। भाई की उम्र 21 साल और बहन की उम्र 24 साल की थी।

दोनों रूम में अपना सामान रखकर पलंग पर लेट जाते हैं।
थोड़ी देर लेटने के बाद लड़की बोलती है कि "अंकुर तू आराम कर मैं रात के खाने की तैयारी करती हूं।"

कुछ देर बाद लड़की किचन में खाना बना रही थी, तभी पीछे से दो हाथों ने उसकी कमर को कसकर जकड़ लिया और उसकी गर्दन पर जीभ फेरने लगा।

"तुम ये क्या कर रहे हो ?"

"मैं तो अपनी बीवी रिया को प्यार कर रहा हूं।"

"अच्छा, ये कोई समय है, अपनी बीवी से प्यार करने का यदि खाना नहीं बना तो भूखे मर जाओगे।"

"अरे!, तुम्हारे जैसी बीवी प्यार करने को पास हो तो भूखा भी मर जाऊं।"

ये बोलकर वो रिया को घूमाता है और उसके होंठो को अपने होंठो में भरकर चूसने लगता है। दोनों कुछ देर दोनों होंठ चूसते रहे हैं।

"अब मैं खाना बना लुं।" (एक मुस्कान के साथ)

"ठीक है।"

"अंकुर, अब तुम बाहर जाओ, मैं खाना बनाकर आती हूं।"

कुछ देर बाद दोनों भाई-बहन खाना खाते और फिर टीवी देखते हैं।

"दीदी, ये अभिनेता अपने किरदार में जान डाल देता है, ऐसा लगता है कि ये सचमुच ऐसा ही रहता होगा।"

"भाई, इसे ही तो अभिनय कहते है कि आप जिस किरदार को निभा रहे हैं उसे ऐसे निभाया जाएं कि देखने वाला सोचने पर मजबुर हो जाएं कि ये सब सच होगा।"

"दीदी, आप भी अच्छा अभिनय कर लेती हैं।"

"तू भी तो आजकल नया किरदार बड़ी शिद्दत से निभा रहा।"

"दीदी, वो तो आपने ही कहा था, "किसी किरदार को जीवंत रूप देने के लिए, उसे पूर्ण रूप से निभाना चाहिए। जैसे कि तुम सच में वहीं हो।"

"अच्छा जी, अब तुम्हारा ये किरदार कबतक चलेगा ?"

"बस, आज की रात। फिर कल से कोई नया किरदार का सोचूंगा और उसका किरदार निभाऊंगा। उसमें भी आपको मेरा साथ देना होगा।" (मुस्कान के साथ)

"भाई, अब तो मैं तुम्हें किसी बात के लिए मना ही नहीं करती हूं।"

फिर दोनों सोने चले जाते है और एक बार फिर अंकुर अपने किरदार में आ जाता हैं और दोनों के बीच एक जोरदार चुदाई शुरू हो जाती है। चुदाई के बाद दोनों सो जाते हैं।

ये दोनों भाई-बहन ये सब क्यों करते हैं जाने के लिए हमें एक साल पीछे जाना होगा।

एक साल पहले एक दिन इनके घर कोई चोर घुस गया था और उसने अंकुर और रिया के मम्मी-पापा को मार डाला था।

अंकुर अपने मम्मी-पापा की मौत के गम में उदास और दुःखी रहने लगा था। इसे रिया भी परेशान रहती थी, क्योंकि उसे अपने काम पर भी ध्यान लगाना था। उसने अंकुर को भी अपने साथ ही काम पर ले जाने की सोची, लेकिन अंकुर नहीं माना।

अब रिया सोचने लगी कि उसे कैसे भी इस समस्या का समाधान निकालना ही होगा, इसलिए उसने बहुत सोचा तब उसे एक उपाय सूझा। वो यह था कि रिया कि तरह अंकुर को भी अभिनय करने की आदत थी तो क्यों ना अंकुर को किसी किरदार का अभिनय करने को कहा जाए। यदि वो किरदार निभाने लगा तो उसका ध्यान मम्मी-पापा की मौत से हट जाएगा।

कुछ दिनों तक रिया ने अंकुर को बहुत बार कहा कि वो उसकी बात मान ले, किन्तु अंकुर नहीं माना और अपने रूम में ही रहता था, लेकिन एक रात रिया रूम में अपने एक किरदार को निभाने के लिए उसकी रिहर्सल कर रही थी तो अंकुर भी उसे देख रहा था। उसे देख उसके मन में भी अभिनय करने की इच्छा हुई।

तो उसने अपनी दीदी से कहा कि "दीदी, क्या में भी अभिनय कर सकता हूं ?"

अंकुर का सवाल सुन रिया खुश होते हुए बोली, "मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था।"

"दीदी, मुझे कौनसा किरदार का अभिनय करना चाहिए ?"

"भाई, तुम्हें जो अच्छा लगता हो और जो तुम अच्छे से निभा सकते हो उसका अभिनय कर लो।"

"दीदी, आप भी मेरा साथ देंगे या नहीं।"

"भाई, मैं तो तुम्हारी खुशी के लिए कुछ भी कर सकती हूं।"

फिर अंकुर उसे एक किरदार का अभिनय का बोलता है तो रिया मान जाती है, लेकिन उसे कहती है कि काम से फ्री होकर ही वो ये करेगी। फिर कुछ दिन बाद जब रिया और अंकुर घर में उस किरदार को निभाने लगते हैं, लेकिन अंकुर कई बार गड़बड़ी कर देता हैं। तब रिया उसे कहती है कि पहले तुम्हें अभिनय के बारे में कुछ खास बातें बतानी होगी। फिर तुम अच्छे से अभिनय कर सकोगे।

रिया अभिनय की कुछ खास बातें उसे बता देती है और कहती है कि "किसी किरदार को जीवंत रूप देने के लिए, उसे पूर्ण रूप से निभाना चाहिए। जैसे कि तुम सच में वहीं हो।"

कुछ महीनों में ही अंकुर पर अलग-अलग किरदार निभाने का भूत सवार हो गया।

अब वो कोई ना कोई किरदार में रहता ही था और रिया भी उसका पूरा साथ देती थी, लेकिन एक दिन अंकुर ने रिया को ऐसे किरदार का अभिनय करने को बोला जिसे सुनकर रिया घबरा गई, क्योंकि अंकुर ने उसे एक ऐसे व्यक्ति का बोला जो लड़की और औरत के साथ जबरदस्ती सेक्स करता है और उन्हें टॉर्चर करता है।

अब वो दोनों साथ ही रहते थे, इसलिए सेक्स जैसी बात भी आसानी से एक-दूसरे से बोल देते थे। रिया भी खुले विचारों वाली थी।

रिया ने अंकुर से पूछा कि ये ख्याल तुम्हारे दिमाग़ में कैसे आया। तब अंकुर बोला उसने कल मोबाइल में एक इंग्लिश मूवी देखी थी तो उसमें इसी तरह का किरदार था।

रिया उसे मना कर देती है और कोई दूसरा किरदार निभा ने का बोलती है, किन्तु अंकुर नहीं मानता है। रिया भी अपनी बात पर कायम रहती है तो अंकुर उसे नाराज हो जाता है। उस दिन वह रिया से बात भी नहीं करता है और ना ही कुछ खाता पीता है।

अब रिया के सामने फिर से एक समस्या उत्पन्न हो जाती है।
कि अब वो क्या करें ?

फिर वो सोचती है कि अंकुर को किसी भी तरह से एक बार समझाने की कोशिश करेंगी। क्या पता वो मान जाएं।

फिर वो रात को अंकुर से बात करती हैं, लेकिन अंकुर नहीं मानता है तब वो उसे कहती कि "ये किरदार बेकार है। तुम कोई अच्छा सा किरदार निभा लो, उसके लिए में तुम्हें मना नहीं करूंगी।"

"दीदी, इसमें क्या बुरा हैं। हम केवल अभिनय ही तो करने वाले है, जैसे आजतक दूसरे किरदार निभा रहे थे। वैसे ही यह भी कर लेंगे।"

"अंकुर, तुम मेरी बात समझ नहीं पा रहे हो।"

"दीदी, तो आप ही समझा दो।"

"अंकुर, उस मूवी का किरदार बुरा है, इसलिए मैं तुम्हें मना कर रही हूं।"

"दीदी, हमें सब तरीके के अभिनय आना चाहिए। ये आपने ही कहा था। अब में केवल अच्छा ही किरदार निभाऊंगा तो बुरे किरदार कैसे निभा पाऊंगा ?"

"अंकुर, लेकिन उसमें और भी बहुत सी बुरी बात है।"

"दीदी, क्या आप सेक्स के कारण ये किरदार नहीं निभाने दे रही हैं ?"

अंकुर के सीधे सवाल पर रिया हैरान! रह जाती हैं और कुछ नहीं बोलती है।

"दीदी, मैं समझ गया। आप इसलिए ही मुझे ये किरदार नहीं करने दे रही हैं।"

"दीदी, मैं आपके साथ सेक्स कैसे कर सकता हूं, आपने ये सोचा भी कैसे ? मैं तो सिर्फ किरदार का अभिनय करूंगा और आप भी।"

अंकुर की बात पर रिया विचार करती है और राजी हो जाती है। अंकुर भी खुश हो जाता है।

फिर जब उनको समय मिलता है वो उस किरदार को निभाने की शुरुआत करते हैं, लेकिन दोनों को ही कुछ समझ नहीं आता कि ये किरदार कैसे निभाया जाए।

अंकुर अपनी दीदी से बोलता है कि "इस किरदार में क्या करना है कुछ समझ ही नहीं आ रहा और बिना जबरदस्ती के तो ये किरदार निभाया ही नहीं जा सकता है।"

"तुम सही बोल रहे हो और समझ में भी कुछ नहीं आ रहा है कि क्या करें ?"

"दीदी, मूवी में जबरदस्ती वाला दृश्य देखते है, फिर वैसे करके देखेंगे।"

"क्या मतलब तुम्हारा है ?"

"मतलब है कि हम कोई मूवी देखते हैं फिर वैसा ही हम दोनों करेंगे।"

"लेकिन अभी ऐसी कोई मूवी थोड़ी आ रही होगी।"

"दीदी, मैं उस रोज वाली मूवी मोबाइल में फिर से डाउनलोड कर लेता हूं फिर हम दोनों देख लेंगे और एक बार फिर किरदार निभा के देखेंगे।"

"ठीक है, तुम डाउनलोड करके रखो। तब तक में घर के दूसरे काम निपटा लेती हूं और रात को आराम से देखेंगे।"

रात को खाना खाने के बाद वो मूवी देखने के लिए कमरे में आ जाते है। दोनों मूवी देखते हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद ही रिया उसे कहती कि तुम देख लो फिर में देख लूंगी। (रिया को मूवी में दिखाए जाने वाले दृश्य अपने भाई के साथ देखने में थोड़ा अजीब लग रहा था, क्योंकि मूवी ज्यादा ही एडल्ट थी।)

"दीदी, क्या हुआ।"

"कुछ नहीं, पहले तुम देख लो यूं मोबाइल में ठीक से दो लोग साथ में देख नहीं सकते है।"

"मैं इसे टीवी पर लगा देता हूं। फिर साथ में बैठकर देखते हैं।"

रिया को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बोले। फिर कहती है कि "हम मोबाइल में ही देख लेते हैं।"

अंकुर भी उसे कहता है कि "दीदी पलंग पर लेट कर देखते जिससे हम दोनों को देखने में आसानी होगी।"

फिर दोनों मूवी देखने लग जाते है अंकुर तो मूवी किरदार के लिए देख रहा था, लेकिन रिया की हालत ख़राब हो रही थी, क्योंकि उसमें कुछ ज्यादा ही सेक्स दिखाया जा रहा था।

रिया को अपने भाई के साथ ऐसी मूवी देखना थोड़ा अजीब सा भी लग रहा था। अब उसे अपने बदन में अजीब सा लगा वो उत्तेजित हो रही थी।

फिर भी अपने आप पर काबू रखा और पूरी मूवी देखी।

रिया ने पहले भी कई बार एडल्ट मूवी देखी थी और कुछ वेब सीरीज में किसिंग सीन्स भी किए थे, लेकिन आज वो कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो गई। उसने सोचा की बाथरूम में जाकर चूत सहला लेती हूं। फिर सोचा कि भाई समझ जायेगा कि दीदी अभी बाथरूम क्यों गई है, इसलिए वो वहीं लेटी रही।

"दीदी, आपको मूवी कैसी लगी ?"

"अच्छी थी।"

"दीदी, चलो अभी ये किरदार निभा के देखते हैं।"

"हम कल करके देखेंगे, अभी मुझे नींद आ रही हैं।"

"ठीक है।"

फिर दोनों सो जाते है। रात को रिया को एक अजीब सा सपना आता है। वो देखती है कि उसका भाई उसका बलात्कार कर रहा है, जैसा उसने मूवी में देखा था। फिर वो देखती है कि वो भी अपने भाई का पूरा साथ देने लगी, थोड़ी देर और यह सपना देखती है। फिर एकदम से उसकी नींद खुल जाती है तो उसे अपनी पैंटी भीगी हुई महसूस होती है, सपने की वजह से वह झड़ गई थी। जिससे उसकी पैंटी और सलवार भी कुछ भीग गई थी।

वो अंकुर की तरफ देखती है जो अपनी गान्ड छत की तरफ करके सोया था।

रिया सोचती है कि ये सब सच ना हो जाए। मुझे ये किरदार वाला विचार अंकुर के दिमाग़ से निकालना ही होगा। वरना ये मेरे लिए मुसीबत बन सकता है। फिर कुछ देर सोचकर दोबारा सो जाती है।

अगली सुबह अंकुर उसे किरदार निभाने का बोलता है तो रिया उसे बोलती है कि "अभी वह कुछ दिन अपने काम में व्यस्त हैं, जैसे ही समय मिलेगा हम किरदार निभा लेंगे।

कुछ दिन बाद अंकुर भी उस किरदार को भूल जाता है और दूसरे किरदार पर ध्यान देने लगता है। जब रिया को यह बात पता चली तो वह खुश हो जाती है।

ऐसे ही आठ महीने गुजर जाते है, अब अंकुर और रिया दोनों ही काम में व्यस्त रहते थे, लेकिन कभी-कभी रिया को कोई किरदार निभाने के लिए अंकुर बोल देता था।

एक दिन दोनों साथ में बैठकर टीवी पर एक क्राइम शो देख रहे थे, जिसमें देवर-भाभी का अफेयर दिखाया गया था।

"दीदी, ये किरदार भी मस्त है। क्यों ना हम कुछ दिन ये किरदार निभा कर देखते।"

"तुम पगला गए हो! ये किरदार में क्या मजा आयेगा ?"

"दीदी, कुछ दिन करते हैं, यदि मजा नहीं आया तो कोई दूसरा किरदार देखेंगे।"

"ठीक है।"

"दीदी, आपको इस किरदार के लिए साड़ी पहन कर रहना पड़ेगा।"

"वो क्यों ?"

"तभी तो भाभी वाला किरदार का मजा मिलेगा।"

दोनों ही अगले दिन उस किरदार में नजर आने लगे।

"भाभी, कहां हो ?"

"देवर जी, किचन में हूं।"

"भाभी, आज क्या बना रही हो ? अपने प्यारे देवर के लिए।
(किचन में पीछे से कमर पकड़ कर।)

"आपके पसंद के पराठे"

"भाभी, भैय्या कब आ रहे है।"

"उनको तो अपने काम से फुर्सत कहां है, अधिकतर शहर के बाहर ही रहते हैं, मेरा तो ख्याल ही नहीं रखते हैं।"

"अरे! भाभी, मैं हूं ना आपका ख्याल रखने के लिए।" (कमर सहलाते हुए और कंधे पर चूमते हुए)

"देवर जी, ये क्या करें है ?"

"मेरी भाभी का ख्याल! रख रहा हूं।"

"अभी आप बाहर जाए, मैं खाना लेकर आती हूं।"

"ठीक है।"

थोड़ी देर बाद.....

"भाभी, आपके हाथ में तो जादू है क्या पराठे बनाएं है।"

"ये बात है तो और लीजिए।"

जैसे ही रिया पराठा देने के लिए आगे झुकी उसके स्तन अंकुर की नजरों के सामने आ गए। आज पहली बार अंकुर अपनी दीदी के सामने से उभार देख रहा था, इसके पहले भी देखे है, लेकिन आज कुछ अलग ही अहसास हुआ।

रिया नहीं देख पाई थी कि उसके भाई की नज़र किधर है और कुछ पलों बाद ही अंकुर ने भी अपनी नज़र हटा ली थी।

"भाभी, आप भी खा लीजिए।"

"देवर जी, पहले आप खा लीजिए।"

"भाभी, मेरा तो हो गया है।"

थोड़ी देर बाद.....

"देवर जी, कहां हो ?"

"भाभी, बाथरूम में हूं। भाभी कुछ काम था।"

"वो बोर हो रही थी तो सोचा अपने देवर से बात कर लेती हूं।"

"अच्छा, तो ये बात है। बस दो मिनट दीजिए।"

"ठीक है।"

थोड़ी देर बाद.....

"भाभी, आप भी कुछ भी पूछ लेती है ?"

"देवर जी, आप तो ऐसे शर्मा रहे हैं, जैसे कोई लड़की शर्माती है।"

"अब बता दीजिए वो कौन है जो आपको पसंद है।"

"भाभी, आप बुरा मान जाओगी।"

"देवर जी, मैं बुरा क्यों मानूंगी ?"

"पहले आप वादा करो कि आप बुरा नहीं मानेगी।"

"ठीक है, मैं बुरा नहीं मानूंगी। अब बताओ कि वो कौन है ?"

"वो आप है।"

"तुम पागल हो, क्या कोई अपनी भाभी से प्यार करता है क्या ?"

"भाभी, मुझे आप बहुत अच्छी लगती है, आपके बिना तो कहीं दिल भी नहीं लगता है ऐसा लगता है कि दिनभर आपको बाहों में भरकर प्यार करूं।"

"देवर जी, आप सचमुच पागल हो गए है, मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी।"

अगले दिन

"देवर जी, उठ जाओ। तब तक मैं नाश्ता तैयार करती हूं।"

"भाभी, आपने कल की बात का जवाब नहीं दिया।"
( खड़े होकर भाभी की कमर में हाथ डाल कर सहलाते हुए।)

"देवर जी, यदि मैं ना कहूं तो ?"

"भाभी, मैं जानता हूं कि आप ना नहीं कह सकती है।"

"अच्छा!, ये कैसे बोल सकते हो ?"

"मुझे नहीं पता, लेकिन आप मुझे ना नहीं कह सकती हैं।"
(पेट सहलाते हुए..और गर्दन पर जीभ फेरते हुए)

"देवर जी, आप ये क्या कर रहे हैं ?"

"भाभी, आपको अच्छा नहीं लग रहा क्या ?"
(पेट सहलाते हुए..और गर्दन पर जीभ फेरते हुए)

"ये सब ठीक नहीं है, मैं तुम्हारी भाभी हूं।"

"तो क्या हुआ ? मैं आपसे प्यार करता हूं।"
(रिया को अंकुर अपनी और घुमा लेता है।)

"देवर जी, छोड़िए ये सब ठीक नहीं है।"

अंकुर अपने होंठ रिया के होंठो पर रख देता है और थोड़ा सा चूस लेता है।

"अंकुर, ये क्या है ?"

"दीदी, अंकुर नहीं देवर जी कहो!"

"अंकुर, तुमने मेरे होंठ क्यों चूसे।"

"दीदी, मैंने आपके होंठ नहीं, बल्कि भाभी के चूसे है।"

"क्या मतलब है तुम्हारा ?"

जैसे मूवी में हीरो-हीरोइन जब चुम्बन करते हैं तो क्या वो सच में करते हैं। वे उसके किरदार के हिसाब से ही एक दूसरे को चूमते हैं बस।

लेकिन वो भाई-बहन नहीं होते हैं, इसलिए कर लेते है।

आप ये क्यों सोच रही है कि मैं आपका भाई हूं। आप ये सोचिए कि मैं आपका देवर हूं या प्रेमी।

एक बार आप करके देखिऐ।

"नहीं, ये गलत है।"

मेरी खातिर आप एक बार करके देखिए। फिर मैं आप पर दबाव नहीं बनाऊंगा।

अंकुर फिर से रिया के होंठो को चूसने लगता है थोड़ी देर बाद रिया भी उसका साथ देने लगी।

अंकुर अगले दिन रिया को इस किरदार को निभाने से मना कर देता है, क्योंकि चुम्बन करने से वह उत्तेजित हो गया था और नहीं चाहता था कि रिया के साथ कुछ गलत हो जाए।

रिया उसे प्यार से समझा देती है, क्योंकि उसे अब इन सब में बहुत मजा आ रहा था और शायद वो अब पूरा मज़ा भी लेना चाहती थी।

कुछ दिन तक ऐसा ही चलता है, लेकिन फिर एक रात को जब दोनों देवर भाभी का किरदार निभा रहे थे तो रिया ने अंकुर से कहा कि "देवर जी, आप अपनी भाभी से कितना प्यार करते हो ?"

"भाभी, आप क्या कहना चाहती है मैं कुछ समझा नहीं ?"

"यहीं कि मेरा देवर मुझे कितना प्यार करता है, यह मैं देखना चाहती हूं।"

"भाभी, आप बोलो तो सही आप के लिए कुछ भी कर सकता हूं।"

"अच्छा, तो आज अपनी भाभी के साथ सेक्स कर सकते हो क्या ?"

अंकुर : दीदी, आप ये क्या बोल रही हैं ?

रिया : भाई, मैं तो किरदार निभा रही हूं। क्या हुआ तुम्हें नहीं निभाना है ?

अंकुर : दीदी, आपने अभी कहा कि मेरे साथ सेक्स कर सकते हो क्या ?

रिया : भाई, मैंने तुम्हें नहीं, बल्कि मेरे देवर को कहा था।

अंकुर : मैं ये नहीं कर सकता हूं।

रिया : तुम्हें किरदार नहीं निभाना है तो ठीक है, लेकिन आज के बाद मैं कोई भी किरदार में तुम्हारा साथ नहीं दूंगी।

अंकुर : ये आप क्यों बोल रही हैं ?

रिया : यदि तुम अपना किरदार ठीक से नहीं निभा सकते है तो मैं अपना समय क्यों बर्बाद करूं। जब तुमने इस किरदार के लिए मेरे होंठो को चूसा था तो मैंने तुम्हें मना किया था। तब तुमने ही कहा था कि मैं अपनी दीदी को नहीं, बल्कि अपनी भाभी को चूम रहा हूं। तो अब क्या दिक्कत है ?

अंकुर : दीदी, आप समझ नहीं रही है, चुम्बन और सेक्स में अंतर है।

रिया : जब मुझे कोई दिक्कत नहीं है तो तुम क्यों नाटक कर रहे हो ?

अंकुर : ठीक है, यदि आपको कोई दिक्कत नहीं है तो मुझे भी कोई दिक्कत नहीं है।

रिया खुश होते हुए बोली,

"देवर जी, आओ आज अपनी भाभी को आज पूरा मज़ा दो कि मैं तुम्हारे भैय्या को भूल जाऊं।"

"भाभी, आज तो आपको जन्नत की सैर करवाऊंगा।"

फिर उस रात अंकुर ने रिया कि सील तोड़ी और पूरी रात दोनों ने जमकर चुदाई का मज़ा लिया।

अगले दिन दोनों ने तय किया कि अब वो सब किरदार पूरी शिद्दत के साथ निभायेंगे। चाहे जैसा भी किरदार हो, तब से दोनों भाई-बहन अलग-अलग किरदार निभा रहे हैं और जिसमें कुछ किरदार कुछ घंटे चलते थे तो कुछ कई दिनों तक। उन्होंने इस दौरान वो किरदार भी निभाया जो अंकुर ने मूवी में देखा था, उस किरदार को निभाने में रिया को बहुत मजा आया था, क्योंकि उसने पहली बार जबरदस्ती वाला सेक्स का अनुभव मिला था।

वर्तमान समय में

अगली सुबह दोनों उठकर अपने काम से चले जाते हैं। रिया शूटिंग पर और अंकुर अपनी मार्केटिंग की नौकरी पर।

ऐसे ही कुछ महीने गुजर जाते है एक दिन रिया ने अंकुर से कहा कि "मैं तुम्हें किसी से मिलवाना चाहती हूं।" (खुश होते हुए)

अंकुर : दीदी, आप किसे मिलवाना चाहती है मुझे ? (हैरान! होते हुए।)

रिया : आज रात 9 बजे तुम सेवन स्टार नाइट क्लब में आ जाना। वहीं पर जिससे मिलवाना है उससे मिलवा दूंगी।

अंकुर : ठीक है।

रात को अंकुर क्लब पहुंच जाता है और रिया को फोन करता है। बात होने के बाद उनका इंतज़ार करता है। थोड़ी देर में रिया एक आदमी के साथ आती है और अंकुर को लेकर अंदर क्लब में चली जाती हैं।

आधी रात को दोनों भाई-बहन को वो आदमी घर छोड़ता है रिया उसके गले मिलकर उसे शुभ रात्रि! बोलती है। अंकुर भी उसे शुभ रात्रि! कहता है। वो दोनों को शुभ रात्रि! बोलकर अपनी कार से चला जाता है।

दोनों अपने रूम में बातें कर रहे थे।

अंकुर : दीदी, मुझे वो ज्यादा पसंद नहीं आया, आपके लिए तो बिल्कुल भी नहीं।

रिया : मैं उसे पसंद करती हूं और शादी करना चाहती हूं।

अंकुर : आप उससे शादी क्यों करना चाहती है ?

रिया : वो पैसे वाला है और मुझे बड़ी अभिनेत्री बनने में मदद भी करेगा।

अंकुर : लेकिन आप मुझसे दूर हो जाएगी। जो मैं नहीं चाहता हूं।

रिया : भाई, मेरी बात समझने की कोशिश करो।

अंकुर : ठीक है, जैसी आपकी मर्जी वो करो और जो मुझे करना होगा, वो मैं करूंगा। शभु रात्रि! (दुःखी मन से)


रिया : शुभ रात्रि! (दुःखी मन से)


दो हफ्ते बाद जिस आदमी को रिया ने अंकुर को मिलवाया था। उसकी किसी ने उसके फॉर्महाउस पर बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी। पुलिस को उसके फॉर्महाउस से ऐसा कोई भी सुराग नहीं मिला। जिससे कातिल का पता चले।


जब ये बात जब रिया को पता चली तो वह बहुत दुःखी रहने लगी। अंकुर भी रिया को दुःखी देख उदास रहता है।


लेकिन फिर अंकुर ने उसे अपनी कसम और प्यार दिखाकर उसे खुश रहने के लिए मना लिया।


थोड़े दिन बाद सब ठीक हो गया। दोनों भाई-बहन फिर से वैसे ही रहने लगे, लेकिन इस बार रिया के दिल में अंकुर के लिए बहुत सारा प्यार उमड़ आया था। वो उसे दिल से चाहने लगीं थीं। अब तो वो बिल्कुल पति और पत्नी जैसे ही रहते थे।


करीब डेढ़ साल बाद अंकुर को एक लड़की से प्यार हो गया।


ये कैसे हुआ ये थोड़ा सा जान लेते हैं।


( दोनों कि मुलाकात एक ऑफिस में हुई थी। एक दिन अंकुर अपने काम के सिलसिले में एक ऑफिस में गया था। वहीं पर उसने लड़की को देखा था जो उसी ऑफिस में काम करती थी। अंकुर को उसे देखते ही प्यार हो गया था।


धीरे-धीरे दोनों में बातचीत शुरू हुई, क्योंकि अंकुर का अब उस ऑफिस में अधिकतर आना-जाना होने लगा था।


कुछ ही हफ्तों में दोनों की दोस्ती भी हो गई और वो एक दूसरे से मिलने भी लगे।


फिर ये दोस्ती प्यार में बदल गई। )


अंकुर ने सोचा कि वो अब रिया दीदी को उस लड़की से मिलवा देता है, इसलिए उसने रात को रिया से इस बारे में बात करने का तय किया।


रात को अंकुर ने रिया की गांड़ की दमदार ठुकाई की और फिर उसे बात करने लगा।


अंकुर : दीदी, क्या अब मैं आपसे कुछ कह सकता हूं ?


रिया : कहो!


अंकुर : वो मैं एक लड़की से प्यार करता हूं उसे आपसे मिलवाना था। तो क्या कल सुबह उसे घर पर बुला लूं ? ( थोड़ा घबराते! हुए...)


रिया : ये क्या बोल रहे हो, तुम जानते हो कि मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकती हूं। मैंने तुम्हें अपना सबकुछ सौंप दिया। (थोड़ा गुस्से! से)


अंकुर : दीदी, मैं आपसे दूर थोड़ी जा रहा हूं, बस मैं तो अपने दिल की बात आपसे कहीं है।


रिया : बात तो वहीं है। तुम उस लड़की से शादी करोगे तो मुझसे तो दूर हो ही जाओगे। क्या फिर तुम मेरे साथ इस तरह रह सकोगें ? (थोड़ा और गुस्से में आकर कहा)


अंकुर : दीदी, आप एक बार उससे मिल लीजिए। यदि आपको पसंद नहीं आयेगी तो मैं शादी नहीं करूंगा।


रिया : मुझे किसी से नहीं मिलना है और आज के बाद में इस बारे में कोई भी बात नहीं करूंगी।


उस रात के बाद रिया और अंकुर के बीच कुछ दिन तक बातचीत नहीं हुई। दोनों अपने काम में व्यस्त रहते और घर पर भी दोनों अलग ही रहते थे।


फिर एक दिन रिया ने अंकुर से कहा कि "वो उस लड़की से मिलना चाहती हैं।" अंकुर भी दीदी की बात सुनकर खुश हो जाता है और उसे अगले ही दिन घर पर बुलाकर दीदी से मिलवाने की बात कहता है।


अगले दिन अंकुर उस लड़की को अपने घर लाता है और दीदी और लड़की का परिचय एक दूसरे से करवाता है।


अंकुर : दीदी, ये प्राची है। जिसके बारे में आपको बताया था।


अंकुर : प्राची, ये मेरी रिया दीदी हैं।


प्राची : नमस्ते दीदी!


रिया : नमस्ते!


रिया : प्राची, तुम्हारे परिवार में कौन कौन है ?


रिया के सवाल पर प्राची उदास हो जाती है तो रिया को थोड़ी हैरानी! होती हैं कि इसे क्या हुआ।


रिया : प्राची, क्या हुआ तुम उदास क्यों हो गई ?


अंकुर : दीदी, दरसअल बात यह है कि प्राची बचपन से हमारी तरह अनाथ हैं और सारा बचपन इसका अनाथालय में बीता है।


रिया : माफ करना, मुझे मालूम नहीं था।


प्राची : दीदी, आपको माफ़ी मांगी की जररूत नहीं है।


थोड़ी देर घर में शांति छा जाती है।


रिया : अच्छा, तुम लोग बैठकर बातें करो, मैं सबके लिए चाय बनाकर लाती हूं।


फिर रिया सबके लिए चाय बनाकर लाती है और सभी लोग चाय की चुस्की लेते हुए बता करने लगते हैं।


रिया : क्या करती हो और अभी तुम कहां रहती हो ?


अंकुर : दीदी, प्राची...।


उसे बीच में ही रोकते हुए बोली।


रिया : मैंने प्राची से सवाल किया है तुमसे नहीं।


प्राची : दीदी, मैं फिलहाल तो कॉलेज की पढ़ाई कर रही हूं। पढ़ाई के साथ एक ऑफिस में रिसेप्शनिस्ट का काम भी करती हूं और एक छोटी सी चाल (रहने की जगह) में रहती हूं।


रिया : ये तो बहुत अच्छी बात है कि तुम किसी पर निर्भर नहीं हो और स्वयं ही अपना ख्याल रखती हो। (खुश होते हुए...)


प्राची : शुक्रिया!


रिया : तुम मेरे भाई से शादी क्यों करना चाहती हो ?


प्राची : दीदी, वो हम एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं, इसलिए बाकी की ज़िंदगी साथ में रहने का फैसला किया है हमनें।


रिया : अगर, मैं इस शादी के लिए तुम्हें मना कर दूं तो ?


प्राची : दीदी, प्लीज़ आप ऐसा ना करें, मेरा अंकुर के बिना जीना मुश्किल हो जायेगा। ( विनती भरे स्वर में)


रिया : ठीक है, लेकिन मेरी एक शर्त है।


रिया की बात सुनकर अंकुर हैरान! होते हुए रिया कि तरफ देखता है तभी प्राची बोल पड़ती है।


प्राची : दीदी, मुझे आपकी हर शर्त मंजूर है। ( खुश होते हुए..)


रिया : मेरी शर्त यह है कि तुम्हें मेरी सौतन बनकर रहना पड़ेगा।


रिया की शर्त सुनकर अंकुर और प्राची दोनों ही आश्चर्यचकित! रह जाते हैं।


रिया : क्या हुआ तुम्हें मेरी शर्त मंजूर नहीं है ?


प्राची अपने आपको संभालते हुए।


प्राची : दीदी, मैं आपकी बात समझ नहीं पाई कि आपकी सौतन बनकर रहना पड़ेगा। आपने ऐसा क्यों कहा ? (उलझन में)


रिया : वो इसलिए कि मैं भी अंकुर से प्यार करती हूं।


प्राची : दीदी, वो तो हर बहन अपने भाई से करती हैं, लेकिन आपने ये क्यों कहा कि मुझे आपकी सौतन बनकर रहना पड़ेगा ? (थोड़ा हैरान! होते)


रिया : वो इसलिए कि मैं और अंकुर भाई-बहन कम पति और पत्नी ज्यादा है। ( शैतानी मुस्कान के साथ...)


रिया की बात सुनकर प्राची को तो मानो एक करंट का झटका सा लगा और वो वहीं अपनी जगह पर स्तब्ध बैठी रह गई।


अंकुर ने उसे हिलाया तो वह अपने होश में आई और अंकुर की तरफ देखा।


कुछ देर तक घर में शांति छा गई।


अंकुर : प्राची, कुछ तो बोलो क्या हुआ तुम्हें ? ( घबराते! हुए)


प्राची : ये...दीदी...क्या बोल...रही हैं ? (रोते हुए...और अटकते हुए बोली)


अंकुर कुछ नहीं बोल पाता है उसने सोचा भी नहीं था कि दीदी ये बात प्राची से ऐसे बोल देगी। उसने जब सौतन वाली शर्त सुनी थी तो सोचा कि दीदी प्राची के साथ कोई मजाक कर रही हैं।


प्राची : अंकुर, तुम कुछ बोल क्यों नहीं रहे हो ?


अंकुर : प्राची, दीदी मजाक कर रही हैं।


रिया : ये कोई मजाक नहीं, सच है। हम डेढ़ साल से पति और पत्नी जैसे रह रहें। (थोड़ा गुस्से में आकर)


प्राची : अंकुर, क्या ये सच है ?


अंकुर कुछ नहीं बोल पाता है प्राची वहां से चली जाती हैं।


अंकुर : दीदी, आपने ऐसा क्यों किया ?


रिया : मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती हूं फिर भी तुम्हारी खुशी के लिए उसी मिली और उसे अपनी सौतन बनाने को तैयार हुई।


अंकुर : दीदी, आपकी बात से उसे कितना दुःख पहुंचा है वो तो अब कभी मुझसे बात भी नहीं करेंगी।


रिया : यदि वो तुमसे प्यार करती तो मेरी बात मान लेती।
अब इस बारे में मुझे कुछ बात नहीं करनी है।


अंकुर घर से चला जाता है और रात को भी वापस घर नहीं आता है। रिया उसे फोन करती हैं तो वह फोन पर कह देता है कि "वो उसने और प्राची ने मंदिर में शादी कर ली है अब उसके साथ अलग ही रहेगा।" रिया को उसकी बात पर बहुत गुस्सा आता है।


कुछ दिन बाद अंकुर को रिया फोन करती हैं और कहती है कि "तुम दोनों मेरे साथ इस घर में ही रहो। मैं यहां अकेली नहीं रह सकती हूं।" अंकुर भी उसकी बात मान लेता है और प्राची को भी अंकुर प्यार से समझा देता है।


दोनों रिया के घर आकर रहने लगते हैं सब ही प्यार और खुशी से रहते हैं।


एक महिने बाद, रविवार के दिन अंकुर अपने रूम में सोया था, तभी उसे प्राची के चिलाने कि आवाज आई, "अंकुर, अंकुर बचा ..।"


अंकुर जल्दी से अपने रूम से बाहर निकलता है तो उसके होश ही उड़ जाते हैं, क्योंकि सामने एक कुर्सी पर प्राची थोड़ी ज़ख्मी हालात में बंधी थी और उसके मुंह पर एक पट्टी भी बंधी।


रिया उसके सामने एक चाकू लिए खड़ी थी। अंकुर उसे देख दीदी आप ये क्या कर रही हैं ?


रिया उसकी तरफ देखती हैं और मुस्करा कर बोली, "अपने रास्ते का कांटा हटा रहीं हूं।"


अंकुर : दीदी, आप पागल हो गई है क्या ? आप प्राची की जान क्यों लेना चाहती ?


रिया : ये मेरे और तुम्हारे बीच की दीवार है इसके कारण में तुम्हारे साथ सेक्स तक नहीं कर पा रही हूं।


अंकुर : दीदी, इसके लिए प्राची को मारने की क्या जरूरत है ?


रिया : इसके रहते हुए, तुम मेरे साथ सेक्स नहीं कर सकते हो, इसलिए इसका मरना जरूरी है।


अंकुर : दीदी, आप प्राची को छोड़ दीजिए। मैं आपके साथ सेक्स करने को तैयार हूं। बस, आप प्राची को कुछ भी मत करिए, प्लीज़!


रिया : लेकिन ये लड़की नहीं मानेगी।


अंकुर : दीदी, प्राची को मैं समझा दूंगा। वो कुछ नहीं बोलेगी। बस, आप उसे कुछ नहीं करना।


रिया : ठीक है, तुम्हारी खुशी के लिए इसे जिंदा छोड़ रही हूं।

प्राची के पास जाता है और उसके मुंह से पट्टी निकलता है और उसे रूम में ले जाता है थोड़ी देर बाद रिया उसके लिए दवाई और दूसरी जरूरी चीज ले आती है। अंकुर उसकी मरहम पट्टी कर देता है। प्राची सो जाती है, क्योंकि उसे नींद की गोली दी थी। अंकुर उसके पास ही बैठा रहता है।


दोपहर को प्राची की नींद खुलती हैं वो डर के मारे अंकुर से चिपक जाती हैं और कहती हैं, "अब मैं यहां नहीं रह सकती हूं। तुम मुझे कहीं और ले चलो।"


अंकुर : प्राची, तुम डरो मत। दीदी, तुम्हें कुछ नहीं करेंगी। बस, उनकी एक इच्छा पूरी करनी पड़ेगी।


प्राची : लेकिन तुम ये कैसे कह सकते हो कि वो उसके बाद कुछ नहीं करेंगी।


अंकुर : मैं अपनी दीदी को अच्छे से जानता हूं। वो बस अभी गुस्से में हैं, इसलिए उसने तुम्हारे साथ ऐसा किया है। वह दिल की बहुत अच्छी है।


प्राची : लेकिन...।


अंकुर उसके मुंह पर ऊंगली रख देता है और बोलता है, "बस, हमें दीदी को गुस्सा नहीं दिलाना है कभी भी।" फिर देखना तुम वो तुम्हें कितना प्यार और खुशी देती हैं।


प्राची : ठीक है, आपको यदि यह ठीक लगता है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है।


रिया भी गेट पर खड़े ही उनकी बात सुन लेती है।


फिर कुछ महीनों तक अंकुर दोनों के साथ अलग-अलग सेक्स करता हैं फिर तीनों मिलकर साथ में करने लगते हैं। बड़े ही प्यार और खुशी से सब रहने लगते है। प्राची एक लड़के को जन्म देती हैं। रिया ने कभी शादी नहीं करने का फैसला कर लिया था। सभी लोगों बहुत खुश थे अब रिया भी थोड़ी बड़ी एक्टर बन गई थी और अंकुर भी अब वेब सीरीज में अभिनय करने लगा था।


रिया एक दिन प्राची के लड़के को अपनी गोदी में लेकर खिला रही थी।


तभी उसके मन में ख्याल आया कि यदि मैं उस दिन गुस्से में एक और खून कर देती तो क्या मुझे इतनी अच्छी जिंदगी मिल पाती। अब यह "गहरा राज" मेरे साथ ही चला जाएगा कि मैंने ही अपने मम्मी-पापा को मारा था, क्योंकि उनको मेरे अभिनय से दिक्कत थीं और जयेश को भी मैंने ही मारा था, क्योंकि उसने मेरे साथ सेक्स करने के बाद शादी करने से मना कर दिया था।


फिर वह बच्चे की तरफ देखती हैं और मुस्कुरा कर उसे प्यार से कहती है, "मेरा प्यारा बेटा!"


- समाप्त -
 

Mr Sexy Webee

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कहानी
रंगीन रातों का हसीन सफर
लेखक: @mrsexywebee

नमस्कार दोस्तो ,नाम है मेरा विष्णु।उम्र है मेरी 25 साल।एक बिजनेसमैन हु।चिंता न कीजिये कोई भाषण नही देने नही आया हु की सक्सेसफुल बिजनेसमैन कैसे बने,क्योकि मेरे सक्सेसफुल बिजनेसमैन बनने के पीछे बहोत बड़ी कहानी है।जिसको हर एक कोई नही जी सकता।

क्या कहा?!!आपको सुननी है।उम्मम ,चलो ठीक है।आपको मेरी ये कहानी थोड़े ही शब्दो में बया करने की कोशिश करूँगा।ध्यान से सुनियेगा बहोत ही दिलचस्प है।

ये सिलसिला तब शुरू हुआ जब मैं 18 साल का था।हमारा परिवार एक मजदूर परिवार था।कुछ बड़े लोग बंजारों का काफिला भी बोलते थे।असलियत में मेरे माता पिता मजदूर थे।गाँव के इलाके में जहा भी किसी का खेतीबाड़ी या शहर की जगह बिल्डर का कुछ काम होता तो हम वही अपना बस्ता डाल देते थे। कुछ 1 से 2 साल पहले हमें एक काफिला मिला 3 से 4 परिवार थे,वो भी हमारे जैसे ही मजदूरी कर पेट पालते थे।हम उनके साथ ही मिलजुल के रहने लगे थे।

कुछ समय के बाद हमे एक शहर के और गाँव के बीचों बीच एक बिल्डर का बिल्डिंग बंधने के यहां काम मिला।तब हमारे यहां बच्चो को 18 साल के बाद काम पे ले जाया जाता है।एक जगह टिकते नही थे तो पढ़ाई होती नही थी।

हमारे काफिले में एक शम्मो चाची थी। मा मुझे हमेशा उनसे दूर रहने के लिए कहती।उस वक्त मुझे मालूम नही था की उसके पीछे क्या कारण था पर एक दिन उसका अनुभव जरूर हुआ।

हमे 2 से 3 दिन की छुट्टी मिली थी ,क्योकि कुछ सरकारी काम से काम रुकाया गया था।काफिले के बाकी मर्द हमेशा कु तरह दारू की लुफ्त उठाने में मस्त थे।सब दिनभर बेहोश।

दोपहर को मा बाजार गयी थी और मैं अइसे ही बाजू के नदी पर घूम रहा था।वह पर मुझे शम्मो दिखी।

शम्मो-उम्र करीब 37 से 40,गदराया बदन,पूरी हवस से भरी हुई औरत,शादीशुदा।

शम्मो बरर्तन और कपड़े लेके नदी पर आई थी।मुझे टहलता देख अपने पास बुलाया।पहले तो मैंने न नकुर की पर उन्होंने दबाव डालकर मुझे बुला ही लिया।

शम्मो:अरे विष्णु,मेरे से इतना दूर क्यो भागता है,मैं क्या तुझे खा जाऊंगी।

मैं:मा ने मना किया है,आपसे बात करने से।

शम्मो:क्यो?मैंने कुछ किया तुम्हारे साथ।

मै:नही,पर मा बोली है न।नही मानूंगा और आपके साथ यहां देख लेगी तो पिटेगी मुझे।

शम्मो:तू बैठ यहाँ

मैं शम्मो के बिल्कुल सामने बैठ गया पत्थर पर।

शम्मो मन में: ये जमुनिया बहोत ज्यादा अकड़ती है,बदनाम कर रखा है मुझे।अइसे होता रहेगा टी इसकी वजह से कोईनौजवान मेरे पास भी नही भटकेगा।एक काम करती हु इसके बेटे को ही फुसलाती हु।साली का घमंड चूरचूर हो जाएगा।

मैं:चाची,किस विचार में पड़ गयी!!??

शम्मो:कुछ नही।बस सोच रही थी की तू बड़ा ही गया है।फलफूल गया है।

मैं शर्मा गया।

शम्मो चाची जो पत्थर पे बैठ कर नही में पैर छोड़ी थी उनको थोड़ा फैलाया और साड़ी का पल्लु भी हटाया।मैं तो देखते ही रह गया।क्या जांगे थी एकदम दूध जैसी सफेद।उनके आधे नंगे चुचे।मेरे लंड में हलचल सी होने लगी।मैं कैसे वैसे हाथ से दबाकर छुपाने लगा।

शम्मो चाची मेरी परेशानी समझ गयी और खुश भी हो गयी की उनकी योजना रंग ला रही थी।

शम्मो:अरे क्या हुआ विष्णु,कुछ परेशानी है??

मैं:नही चाची!!??

शम्मो ने जान भुज कर अपने छाती पर पानी गिराया,जिससे उसका ब्लाउज चुचो से चिपक गया।अभी वो और ज्यादा नशीली लग रही थी और लंड और ज्यादा भड़क रहा था।

शम्मो:कुछ तो बात है विष्णु?बता मुझे,नही तो मैं चिल्ला कर सबको बुला लुंगी।

विष्णु:नही नही,बताता हु।

मैंने अपने पैर फैला दिए।मेरे पेंट में लंड तंबू बनके खडा था।

शम्मो:हाये दैया,मेरे बदन को देख तेरे अरमान जाग रहे है क्या?

मैं:माफ करना चाची,मैन कुछ नही किया,बस हो गया।

शम्मो:अइसे कैसे हो गया,मुझे चोदना चाहता है क्या?

मैं:ये चोदना क्या होता है?!!

शम्मो:हाये रे दैया तुझे मालूम नही क्या?

मै:नही,मा ने कभी बताया नही।

शम्मो:वो क्यो बताएगी,तुम्हारी मा तुमसे प्यार नही करती लगता है!!?

मैं:नही मेरी मा मुझसे बहोत प्यार करती है,आप अइसे मत बोलो।

शम्मो:फिर तुझे चोदना क्यो नही सिखाया,अगर सिखाया होता तो तेरा ये हाल नही होता।

मैं:अरे उसमे इतना क्या हुआ,समय आने पर सीखा देगी।

शम्मो:अरे और कितना समय बाकी है।18साल पूरे हो गए,कुछ दिन बाद तेरी शादी हो जाएगी तब भी जोरू को यही बोलेगा क्या?फिर नाक कटेगी वो अलग जोरू के सामने,छि छि!!

मैं थोड़ा सोच में पड़ गया-ये तो सही बात है,मा बापूजी के बीच मेरे शादी की बात चल तो रही है।बिवि के सामने मेरी नाक कट जाएगी और मा को भी मैं ये बात नही कह सकता सामने से!!

शम्मो:तुम्हारी शम्मो चाची है न!अगर तुम्हारी तैयारी है तो मैं सीखा दूंगी।

मैं:आपसे?!पर मा?!!!!!

शम्मो:तुझे नाक कटवानी है बिवि के सामने,वो कहेगी की मेरे पति को कुछ नही आता।

मैं:हरगिज नही,मुझे मेरी इज्जत प्यारी है,पर कैसे करे?कहा करे?और करना क्या है!??

शम्मो:आज रात बाजू के गाँव में मेला है,सभी औरते ही जाएंगी,और मर्द सारे बस नशे में है।तुम यहां पिछली ओर जो झाड़ी है वही आ जाना।

मैं:कितने बजे?

शम्मो:तुम्हारी मा जैसे ही घर से निकल जाएगी तुम आ जाना।

तभी मुझे मा पुकारती है।मुझे नदी से आते हुए देख वो थोड़ा आगे आती है।उसे शम्मो दिख जाती है।

मा:तुझे बोला था न उससे दूर रहे?!!!

मैं:वो मा मैं नदी के उसपार घूमने गया था।नदी का बहाव उधर कम है इसलिए वहां से आ गया।

मा:अच्छा ठीक है।चलो घर खाना खाने।

मेरा नसीब अच्छा था की मा ने मेरे खड़े लण्ड को नही देखा था नही तो शामत आ जाती।

शम्मो चाची का कहा सही था।सभी औरते मेले के लिए खाने के बाद निकल गयी।कोई जागरण था इसलिए वो देर रात गयी।काफिले से दूर जाते ही मैं उस झाड़ियो में पहोंच गया।बिल्डिंग का जो काम चल रहा था उसकी रोशनी वहां आ रही थी।पर फायदा यह था की वहां कोई देख नही सकता था क्योकि एक बाजू झड़ी और दूसरी बाजु ट्रक था।

कुछ देर बाद शम्मो चाची आ गयी।

शम्मो:अरे विष्णु,एकदम समय पर आ गया रे तू।

मैं:आपकी कही बात से परेशानी बढ़ गयी है।उपर से ये दोपहर से नीचे ही नही हो रहा।मा के सामने कैसे उसको संभाला मुझे मालुम,बस आप कोई उपाय कर लो,मेहरबानी होगी।

शम्मो:अरे उसी के लिए आयी हु।और चाची हु तेरी फर्ज है मेरा,मेहरबानी कैसी!!!चलो पूरे कपड़े उतारो।

मैं:कपड़े????

शम्मो:तुझे इस परेशानी से बाहर आना है तो कपड़े निकालने पड़ेंगे सारे के सारे।और अब से जो बोलूंगी करना पड़ेगा ,बिना कोई सवाल।तैयार हो तो बोलो,नही तो मैं चली।

मैं:नही नही,आपकी सब बात मानूंगा।(मैंने झट से कपड़े उतार दिए)

मेरा लंड काफी ज्यादा तन कर मोटा और लम्बा हो गया था।शम्मो चाची मन में-उई मा क्या मस्त तगड़ा लंड मिला है।ये था कहा अभी तक।मेरे तो मजे होने है आज।

शम्मो ने मेरे पास आकर मेरे लंड को पकड़ा।आआह उसके बदन की गर्मी मुझे और भड़का रही थी।उसके हाथो का लंड पर हुआ स्पर्श बहोत सुखदायक था।

शम्मो चाची ने लंड को मुट्ठी में पकड़ कर ऊपर नीचे करना चालू किया।उनका हस्थमैथुन नीचे चल रहा था पर मुह मेरे मुह के सामने था।उनके दांत ओंठो को चबा रहे थे।गर्म सांसे मेरे सासों से भीड़ रही थी।

लंड की चमड़ी टोपे से नीचे खिसक गयी थी।मुझे थोड़ा दर्द हुआ।पर हवस में मुझे उतना महसूस नही हुआ।शम्मो चाची ने अपना मुह एकदम से मेरे करीब लाया,अगर नाक न होती तो उनके ओंठ और मेरे ओंठ चिपक गए होते।पर वो भी इच्छा पूरी करदी चाची ने।अचानक से मेरे चेहरे को ताड़ते हुए बीच में उसने मेरे ओंठोंके ऊपर ओंठ चिपका दिए और थोड़े पल रख कर वो नीचे घुटनो के बल बैठ गयी।

मैं उन्हें नीचे मुंडी किये बस ताड़ रहा था।उन्होंने मेरे आंखों में देखा और वैसे ही देखते हुए उन्होंने जीभ निकाली और लंड के टोपे पर घुमाने लगी।आआह पूरे शरीर में सिहरन हुई,एक करन्ट सा दौड़ गया।

टोपे से अंडों तक और अंडों से लंड के टोपे तक चाटने लगी जैसेवो कोई कुल्फी या चॉकलेट का डंडा हो।काफी देर चाटने के बाद शम्मो चाची ने अचानक से पूरा लंड मुह में ले लिया।"उम्म उम्म म मममम उम्ममाः"आवाज में वो लंड हिला हिला कर चुसाई कराने लगी।

शम्मो:उम्म साले विष्णु क्या तगड़ा लंड है तेरा,किधर छुपा के रखे थे इतने दिन,मस्त स्वाद है आम्म्म उम्मम"

मैं:चाची इसे चुदाई कहते है!!?

शम्मो:रुक तो साले कुत्ते अभी तो शुरू हुआ है ,तुझे आखरी तक सब सीखा दूंगी।

शम्मो ने साड़ी का पल्लु नीचे कर कमर को घुमाया और ब्लाउज खोल कर चुचे एक साथ लेके दबाए।

शम्मो:ले रंडी के लाल चूस ले इसे,निचोड़ दे चुचो को मेरे।

मै पहली बार किसी औरत के नंगे चुचे देख रहा था। मैं तो आंखे फाड़ के शम्मो चाची के बड़े बड़े चुचे ताड रहा था।पर शम्मो को सबर नही हुआ,उसने मेरे सर को पकड़ के खींच लिया और दो चुचो में घुसा के सर घिसाने घुमाने लगी।

शम्मो मेरा मुह चुचे के ऊपर रखकर रगड़ते हुए:अबे रंडिके आंखों से क्या ताड़ता है रे मुह से चूस भड़बे की औलाद।

मैंने बारी बारी उनके चुचे चुसने लगा।उनके निपल्स मसलने लगा।कुछ देर बाद उन्होंने ही मुह हटा दिया।और वो साड़ी को ऊपर करके झाड़ी के अंदर पत्तो के ऊपर बैठ गयी। थोड़ा पीछे झुक कर पैर फैला दी।अचानक से कुछ काली चीज चमकी।मैंने गौर के साथ देखा तो कोई बालो वाली चीज थी।शम्मो की चुत के ऊपर के बाल चुत रस से गीले हो कर चमक रहे थे।उसने चुत के अंदर बाहर उंगलियां की और थोड़ा ऊपर से मसल कर मुझे पास आने बोला।मैं तो बस चुत को ताड़ते हुए पूरी तरह से निहार रहा था।

शम्मो:क्यो बे चुतये कभी चुत नही देखी तूने,जो अइसे ताड़ रहा है भोसडीके,लवड़े आ मुह से चाट इसको।

मैं नीचे बैठ कर उसकी चुत में मुह घुसाया,आआह क्या मस्त सुगन्ध आ रहा था।मैंने जीभ निकाली और उसके चुत के छेद पर रगड़ी तो मुझे खट्टी मीठी स्वाद आई।मैंने झट से मुह हटाया।

शम्मो:क्यो साले रंडिके,स्वाद पसन्द नही आया लवड़े,जल्दी मुह डाल,आग लगी है चुत में।

इतना बोल के उन्होंने चुत के पंखुड़ियों को खोला और मेरा मुह उसमें घुसेड़कर मेरे ऊपर पैर से कैची बनाई।मैंने पूरी जीभ चुत में डाल के घुमाना चालू किया।

शम्मो:भड़वे चूस और अंदर डाल तेरी आआह मा की चूत आआह उम्मम साले भोसडीके आआह रंडी का बच्चा आआह मममम आआह अम्मा आआह आहहहहम्म।

कुछ देर बाद मुझे सांस लेने में तकलीफ होने लगी।मैंने कैसे वैसे खुदको छुड़ा लिया।फिर शम्मो ने मुझे खुद पर खींच लिया और पूरे मुह को चुम्मे से भरने लगी।फिर मेरे दोनो पैर फैला कर थोड़ा नीचे हो गयी।अभी मेरा लन्ड उसकी चुत पर टच होने लगा।

शम्मो ने लण्ड पर थूक लगाकर रगड़ा फिर थोड़ा थूक चुत पर लगाकर उसके अंदर उंगली घुमाकर मसला और मेरा लण्ड उसपर लगाया और मुझे धक्का मारने बोला।मैं एक तो नया उसपे शरीर की गर्माहट मुझे सहन नही हो रही थी।गर्माहट से सारा शरीर कांटे की तरह हो गया था।शम्मो चाची गुस्सा न हो इसलिए कैसे वैसे मैंने लंड से धक्का मारा और उसके नतीजन वो फिसल गया।शम्मो चाची ने गांड पे चपटी मारी।

शम्मो:साले भड़बे मा चोदने जाना है,(मैं गर्दन से ना में सर हिलाया)फिर रंडिके जल्दी किस बात की,सीधे से घुसा न,रुक मैं ही कुछ करती हु।

उसने मेरे दोनो गांड के उभारों को पकड़ा और उससे पहले लंड को चुत के छेद पर सेट किया।और मेरे गांड को दबा के धक्का दिया और खुद भी नीचे से ऊपर हो गयी।उनकी मुह से "आआह आम्म्म मर गयी आआह ऊईई'सिसकारी निकली।

शम्मो:साले इतना लम्बा तगड़ा लंड नसीब हुआ है और इस्कू औरत लड़कियों को तब्बेत से चोदना ही नही मज़लूम भोसडीका।अभी गांड को तकलीफ दे और जोर से आगे पीछे कर लन्ड को मादरचोद।

मैंने उनके कहे अनुसार आगे पीछे करके लण्ड हिलाने लगा और उनकी चुत चोदने लगा।जैसे ही लंड पूरा अंदर गया,उन्होंने मुझे स्पीड बढ़ाने बोला और मुझे कस के लिपट गयी।

शम्मो:आआह आआह हाये आआह मादरचोद आआह जोर से चोद रंडी के भोसडे आआह आआह लवड़े बहनचोद आआह उम्मम आआह आआह चोद अंदर तक मेरी चुत को आआह आआह।

मैं उनकी गालियों से और रोमांचित हो रहा था।काफी देर तक उनकी चुत चोदता रहा वो भी बेधुन्द होकर सिसकती,चिलाती रही,और एकदम से अकड़ कर नीचे सो गयी।मैं वैसे ही लगा रहा और कुछ देर बाद मुझे भी वैसी ही अकड़न आयी और मैं अकड़न आते ही बाजू में गिर गया।पहली बार था तो सहन नही हुई और मेरे लंड से सफेद गाढ़ा पानी पिचकारी से उड़ा।मैंने शम्मो चाची को उठाया।

शम्मो हैरान होकर:साले मेरे चुत में कुछ छोड़ा तो नही न।

मै:क्या!???

मेरे लंड से गिरता पानी देख वो:कुछ नही,ये बात कभी किसीको नही बोलना।चलो अभी।सो जाओ घर जाके।

उस दिन के बाद कई दिन रात को हम ये चुदाई का खेल खेलते।पर अचानक एक दिन बिल्डर ने उसको कोई और काम दिया जिससे वो सुबह जल्दी जाती और रात को मेरे सोने के बाद आती।फिर हमारा मिलना जुलना कम हुआ।

जिंदगी फिर से पहले जैसी चलने लगी। एक दिन खाना खाने के बाद हम सो गए।बापू हमेशा की तरह दारू के गुत्थे पर गया बाकी लोगो के साथ। कुछ देर बाद मुझे उस दिन के शम्मो चाची के जैसा सिसकने का आवाज आने लगा।मैंने फके उसपे ध्यान नही दिया पर आवाज बढ़ने लगी।सोचा मा को पुकारूं ,और इस सोच में मैं पलटा।पलटते ही मुझे जो बोलना था,पुकारना था वो मैं भूल गया।झोपड़े में उड़ती हुई बाहर के रोशनी में मुझे साफ़ साफ नही पर कुछ धुंधला धुंधला दिखाई दिया।

मा ने साड़ी ऊपर कर के चुत मसलना चालू किया था ।ब्लाउज के ऊपर से चुचे मसल रही थी।मा का बदन ज्यादा भरा नही था पर सुड़ौल था।और चुदाई की जरूरत हर एक को होती है।उसको बापू से नही मिली होगी कई दिन से और मुझे शम्मो चाची से।मेरे अंदर की हवस जग गयी।मुझे सामने मा है इसका कोई इल्म न था ,बस मुझे दिख रही थी एक औरत जिसे लण्ड की जरूरत थी और यहां मेरा भूखा लंड जिसे चुत की जरूरत थी।

मैं मा के करीब गया।मैने हल्के से मेरे हाथ को मा के चुचो के ऊपर रख हल्का सा दबाया।मा अचानक से उठ के बैठ गयी।उसके चुचे और चुत दोनो वैसे ही खुले थे।

मा:क्या कर रहा है विष्णु,बत्तमीज मा हु तेरी।शोभा देता है तुझे ये।

विष्णु:गुस्सा क्यो हो रही हो।तुम्हे तकलीफ में देखा इसलिए मदद करने आया।

मा:इसमे तेरी कोई जरूरत नही है।

विष्णु:मा जिसकी जरूरत है वो ये है(मैंने पेंट नीचे खिसका दिया।

थोड़ी देर लंड को ताड़ते हुए मा होश में आके फिरसे डांट दी:बत्तमीज,ये क्या गई शर्म करो थोड़ा ,मा के सामने करते हुए थोड़ी भी लज्जा नही आती।

मैं:लज्जा की क्या बात।मा के हर जरूरत को पूरा करना बेटे का फर्ज होता है ये तुमने ही बोला था और अभी खुद...

मा:वो अलग है पर,ये गलत होगा!!!

मैं:क्यो गलत होगा।दुनिया को पता चला तो गलत होगा।मैं तुम्हे तड़पते नही देख सकता।

मेरे प्यार को देख मा मुझसे लिपट गयी।और रोने लगी।

मै:अभी रो मत,मैं हु ना।हमेशा तुम्हारा खयाल रखूँगा।

इतना बोल कर मैं मा को नीचे सुलाते हुए उनपर झुक गया।

मा:पर विष्णु,तेरे बापू....

मा के ओंठो पर ओंठ चिपकाकर दो मिनट चुम्मा दिया औऱ बोला:बापू को आने में बहोत देर है,आया तो भी बाहर सोएगा नशे में।तू बस मजे ले।

मैंने मा को पूरा नंगा किया और उनके चुचे चुसने लगा।

मा:आआह उफ्फ विष्णु उम्म

काफी देर चुचो की चुसाई होने के बाद मैं चुत पर आया।चुत पर झांट का जंगल था।उसको हटाकर गुम्फा को ढूंढ उसमे मेरे जीभ को घुसाया।जीभ अंदर जाते ही मा सिसक पड़ी"आआह शऊऊ आमम आहम्म आआह"।

खूब देर मैंने मा के चुत का आस्वाद उठाया।जैसे ही मा के चुत में लंड घुसाने का समय आया हमे दरवाजे पर किसीकी आहट आयी।बापू नशे में लड़खड़ाता आ रहा था।हम दोनो चद्दर ओढ़ कर सो गए।

बापू:वा रे मा बेटे का प्यार,एक ही चद्दर में..

इतना बोल कर बापू अपनी जगह पर जाके गिर गया और सो गया।मैं कसम से खुद को कोस रहा था की ऊपर की मरम्मद में बहोत समय गवाया यार अभी मा को कैसे खुश करूँगा।मेरा दिल नही मान रहा था तो मैने बापू का मुआयना कर मा के चुचो पर हाथ रख उन्हें मसला।मा बड़ी आंखे कर मुझे मना करने लगी।पर मैं तो मनाने वाला था नही।मैं चद्दर में ही मा के ऊपर चढ़ा।

मा कान में:विष्णु बापू जग गया तो हम दोनो को समशान पहुंचा देगा।तू सही होकर सो जा,कई ओर दिन कर लेंगे।

मैं:तू चिंता मत कर बापू नही उठेगा,मैं तुझे आज पूरा संतुष्ट करके ही सोउंगा।

मैंने माँको लम्बा वाला होंठ का चुम्मा दिया और चुत ओर लंड लगा कर चुत पर धक्का मारा।

मा:आआह मममम...

मा की सिसकारी बाहर आते ही हम दोनो के पासिने छूट गए।हमे लगा अभी खैर नही पर बापू उठा नही।दोनो ने राहत की सांस छोड़ दी और थोड़ी देर रुक मैंने धक्का देना चालू किया।मा बस मेरे चेहरे को घूरते हुए सिस्कारिया मुह में दबाते हुए प्यार से देखने लगी।

अभी पछ पछ की आवाज आने लगी।मुझे समझ आया की मा छोड़ रही है।मैंने भी थोड़ा जोर लगाया और जैसे ही छूटने वाला था तभी बाजू होकर गिर गया।

थोड़ी देर बाद मेरे छाती को सहलाते हुए मा:मेरा बच्चा बड़ा हो गया है वो मालूम ही नही मुझे,आज उसने मा की चुत चोद ली और संतुस्ट किया।

मा ने गाल पे एक चुम्मा जड़ दिया।

मैं:हा बड़ा तो हो गया हु और आज से तुझे कोई भी तकलीफ हो बता देना मैं हु तेरे लिए।

फिर हम लोग सो गए।कई रातों तक मैंने मा की चुत आग को शांत किया।

एक दिन काम के दोपहर खाने के समय मुझे शम्मो ने पेड़ के पीछे बुलाया।मैं उसे देख हैरान ही रह गया।

मैं:अज्जि शम्मो महारानी,याद आ गयी हमारी।

शम्मो:अभी ताने मत मार,बस एक मदद चाहिए,कर दे ना।

मैं:मेरी मदद?कहा?"

शम्मो:तुझे क्या बताऊ,बड़े साहब ने अपने बंगले पर काम करने के लिए मुझे लगाया ,अभी उसके घर उसकी बिवि को लड़का चाहिए काम के लिए!!

मैं:अच्छा,तो मैं आ जाऊ अइसे लगता है तुझे।

शम्मो:क्यो तेरी शम्मो चाची के लिए इतना नही करेगा!??

मैं कुछ सोचकर:ठीक है,पैसा कितना मिलेगा।

शम्मो:वो मेमसाब बता देगी।

मैं हस कर:वो मालूम है मुझे,तुम्हे लड़का लगाने का कूटना मिलेगा।

शम्मो हस के:सब सिख गए हो बेटा,तू बस अपना काम कर,मेरे धंधे पे नजर मत रख,जा।

मैं:आना कब है?

शम्मो:कल सुबह आ जाना।

मैं:ठीक है।

दूसरे दिन सुबह मा को बताके मैं शम्मो चाची के साथ सुबह बिल्डर के बंगले में गया।वहा पर एक औरत डायनिंग पर चाय पी रही थी साथ में हमारे बिल्डर साब भी थे।

बिल्डर:आओ विष्णु तुम हो ओ नए लड़के,सविता मेरा सबसे भरोसे वाला लड़का है।विष्णु,मेमसाब की सारी बाते सुनना,कोई कम्प्लेंट नही चाहिए मुझे।

उनकी बिवि थी लगता है।उनकी बिवि सविता ने मुझे ऊपर से नीचे तक ताड़ा और फिर बोला:देखते है,पहले आजमा तो लू ।पहले वाले सब भाग खड़े हुए।शम्मो बोली है इसलिए बुलाया है।

बिल्डर साब:देखो तुम्हारा तुम अभी मैं चलता हु।पैसे चाहिए थे वो अंदर टेबल पर हैं।मैं दो दिन में आ जाऊंगा।बाय बाय।

सविता:शम्मो इसको गेस्ट रूम में लेके जाओ और तैयार कर के रखो और अपने काम में लग जाओ।

मुझे शम्मो एक कोने के रूम में लेकर गयी।वहां जाते ही मैंने पहला सवाल किया।

मैं:मुझे यहां किस लिए लाया है?वो किस बात का तैयार होने बोली।

शम्मो कुछ न बोली,मुझे बाथरूम में लेके गयी।मुझे पूरा नंगा करने तक यही सवाल मैं दोहरा रहा था।उसने अपने कपड़े निकाले और अचानक से मेरे ओंठ पर ओंठ चिपका दिए।

शम्मो:शूऊऊऊऊ कितना सवाल करता है तू भोसडीके,तुझे कुछ बड़ा तीर नही मारना है।बस जो मैंने सिखाया है वही मेमसाब के साथ करना है।

मैं:पर अइसे कैसे,बड़े साब को...

शम्मो:तुझे क्या करना है उससे।बड़े साब खुद बोलके गए है न की वो दो दिन बाद आएंगे।और वो खुद तुझे पैसा देकर बुला रही है।तुभी कमा मुझे भी कमाने दे।चल बदन पोंछ ले और ये जो रखा है उसे पहन और बाहर आ।

शम्मो कपड़े पहन कर बाहर निकल गयी।मैंने वो रेनकोट जैसा बड़ा वाला कुछ था वो पहन कर बाहर बाल्कनी में खड़ा हुआ।

कुछ देर बाद वो सविता मेमसाब हाथ में एक दारू का ग्लास और सिगार फूंकते हुए कमरे में आई।उसने ट्रांसप्लांट नाइटी पहनी थी।अंदर आते ही ऊपर की नाइटी खोल सिर्फ ब्रा और पेंटी में बेड पर कुशन को टिक कर सिगार के कश्त लेते हुए लेट गयी।

मैं थोड़ा घबराते हुए उनके सामने खड़ा हुआ।शम्मो के स्पर्श से मेरा लंड तो खड़ा हो गया था।मैं सिर झुकाके खड़ा था।तभी वो बोल पड़ी।

सविता: गर्मी रही है??!

मैं कंपते हुए:नही मेमसाब!!

सविता:फिर ठंड लग रही है?!!

मैं:नही!!

सविता:फिर तुम्हे पसीना क्यो आ रहा है और इतने कपड़े क्यो पहने है,चल निकाल सब।

मैं:जी सब!!!!?

सविता:एकबार बोला समझ नही आया?

उनका गुस्से का पारा चढ़ते देख मै झट से नंगा हो गया।
वो बस मेरे लंड को देख काफी देर तक दारू के लुफ्त लेते हुए सिगार के कश्त लगाती रही।फिर ग्लास बाजू रख उसमे सिगरेट बुझा कर मुझे पास बुलाया।

सविता:शम्मो सही बोलती है,बड़ा तगड़ा माल है तेरा।मजा बहोत आता होगा तेरे लण्ड का लुफ्त लेके।

मैं:जी!!!

उन्होंने मेरे लण्ड को मुह में ले लिया और रगड़ रगड़ के चुसना चालू किया।काफी देर तक वो मेरे लण्ड का लुफ्त लेती रही।आज पहली बार मैं बिना चुत मर लण्ड डाले झडा था।वो भी पूरा मेमसाब की मुह में।

मैं तो डर से कांपने लगा था की आज तो मेरी खैर नही पर मेमसाब ने कुछ नही कहा।बस जो मुह में था वो गटक लिया।और जो शरीर और मुह के बाहर था उसे टिश्यू से पोंछ लिया।

सविता :लण्ड जितना तगड़ा है उसका स्वाद भी उतना ही मस्त है।चल आजा थोड़ा चुचो को रगड़ दे।

मैं उनके ऊपर लेट गया।उनके शरीर से बहोत मस्त गन्ध आ रहा था।मैंने उनके एक चुचे को हाथ से दबोचा और दूसरे को मुह में लेके निप्पल्स चुसने लगा।।उनके मुह से आआह निकल गयी।कुछ देर पहले इतना घमंड दिखाने वाली औरत अभी एकदम तिथरपीथर गयी थी।ये हवस शेरनी को भी कुत्ती बना देता है उसका ज्ञान मुझे उस वक्त हो गया।

मैंने उनके दोनो चुचे बारी बारी चूस मसल दबोच के उनको बहोत मजे दिए।पर अभी उनका संयम छूट रहा था ।उन्होंने मुझे सर पर दबाव दे कर नीचे खिसकाया और अपनी पेंटी नीचे निकाल कर चुत पे सर दबाया।मैं समझ गया की उनकी चुत का अग्नि जल रहा है।मैन चुत पर जीभ घुमाई फिर अंदर थोड़ा उंगली डाल के घुमाई।

आज पहली बार बिना बाल की चुत मिली थी तो पहले मैंने बाहर का हिस्सा की चाटना पसन्द किया फिर उनकी हालत देख जीभ को चुत में घुसाया और अंदर घुमाने लगा।

सविता:आआह उम्म ओहो विष्णु आआह ओहो माह गॉशहद आआह आआह वो फक आआह आआह

बहोत देर तक चुत को जीभ से चोदने के बाद मेरा झड गया लन्द फिर उसी स्फूर्ति में खड़ा हो गया।मेमसाब का संयम देख मुझे नही लग रहा था की वो ज्यादा देर टिक पाएगी।

मैंने लंड को चुत पर लगाया और धक्का मारा।
सविता':आआह आआह निकालो आआह फाड़ दी साले आआह।

मैं थोड़ा लंड बाहर निकाला।उनका चुत का छेद इतना छोटा था की वो सहन नही कर पाई।कुछ देर बाद शांत रहने के बाद उनकी चुत की मची हुई जलन बन्द हो गयी।तो खुद ही चोदने बोली।

मै फिर से चालू हो गया।इसबार वो मजे लेने लगी।

सविता:आआह आआह आआह फक मि हार्ड विष्णु आआह औए मा आआह आआह फक हार्ड फक फक फक आआह आआह आआह

मेरे हिसाब से बाहर जाके ये बहोत ज्यादा स्टेमिना वाली निकली।कुछ देर बाद ओ मुझे बाथरूम लेके गयी।उधर टब पर पर पैर रख मुझे पीछे से लंड घुसवाने बोली।मैन बराबर लंड छेद पर लगाके चुत मारनी चालू की।बहोत देर की स्टैंडिंग सेक्स के बाद वो झड गयी और वही बाथटब में सो गयी।

सविता:तू हिला के लण्ड खाली कर और नीचे मेरी राह देख।

मैं कहा का हिलाने वाला था।मैं नीचे आया और शम्मो को ढूंढते हुए किचन में गया।वो ओटे पर सब्जी काट रही थी।मैं उसके पास गया और साड़ी उठा के उसके चुत में पीछे से लंड घुसा कर चोदने लगा।

शम्मो:आओऊ आहदआआह अरे भोसडीके आआह धीरे से आआह सच वाली आआह घोड़ी नही हु मादरचोद आआह आहिस्ता कर ले आआह बहनचोद आआह.

मेरा झड़ने तक उसके चुत की धज्जियां उड़ा दी।मेरे में इतना जोश भर गया था की वो झड़ने के बाद मै झडा।

मैं कपड़े पहन कर आया और डायनिंग पर बैठ गया।
शम्मो:इतना जोश,आज चुत फाड़कर रख देता,आआह कितना दुख रही हैं रंडी के।

मैं कुछ बोलता तभी सविता मेमसाब आ गयी।

सविता:शम्मो सही में बड़ा तगड़ा बंदा है ,काम का है अपने।

शम्मो:मैं बोली थी न,शम्मो की नजर कभी नही चूकती।

उसने दोनो के आगे नोटों की गड्डियां फेंकी और बोली:विष्णु कल रात को ठीक 9 बजे आ जाना,ठीक है।

इसबार भी मैं कुछ बोलता उससे पहले शम्मो बोल पड़ी:वो आ जाएगा।उसकी जिम्मेदारी मेरी।

मैं और शम्मो एकसाथ घर आये।मा न देखे इसलिए हम काफिले के पहले अलग हुए।

दूसरे दिन सुबह से मैं सोच में था की शाम को क्या होने वाला है।उस सोच में शाम भी हुई,और रात भी।शम्मो मुझे 8.30 को लेने आई।हम 9.00 तक पहोंच गए।

फिरसे मुझे उसी कपड़े में लपेट कर नहा धुला कर बेड पर बिठा दिया।कुछ देर अइसे ही बैठा रहा।तभी एक नशे में धुत एक औरत मेरे कमरे में आयी।

वो:हाय हैंडसम,हाऊ आर यु?

मैं सिर्फ मुस्कराया!!

उसने जो साड़ी पहनी थी वो उतार दी।देखते देखते वो नंगी होने लगी।और बेड पर चढ़ कर मेरे ऊपर गिर गयी।कुछ देर तक अइसे ही गिरी रही।फिर खुद उठ कर बाजू में सो गयी।

मुझे समझ आया की मुझे क्या करना था।मैं सब कपड़े निकाल उसके ऊपर चढ़ गया।

वो नशे में:तुम मुझे अच्छे से चोदना ह मेरी चुत के अंदर तक डालना तेरा लंड आ

मैं:जी!!!

वो :आज चुत का पानी निकाल ही देना,बहोत दिन की भूखी है।

मैं:जी जरूर!!!

वो फिरसे आगे कुछ बोले उससे पहले उसके ओंठो पर कब्जा किया और उसके रसीले ओंठ का रसपान किया।35 से 40 के उम्र की शादीशुदा औरत थी।कुछ पल तक उसके ओंठ का रसपान कर के उसके चुचो को रगड़ने लगा।

वो बस मुझे कस के लिपट सिसक रही थी।वो करीब करीब नशे में बेहोश होते देख उसके चुत पर मुह लगाया पर उसने हटा दिया।लगता है उसे पसन्द नही था तो मैं चुत में उंगली डाल के चोदने लगा और फिरसे ओंठो को स्मूच करने लगा।वो बहोत मजे ले रही थी।फिर उसने मेरे लंड को पकड़ा और नीचे होकर मुह में ले लिया और मैं पीठ के बल सो गया।मेरे लंड को एक चॉकलेट के डंडी की तरह ऊपर से नीचे रगड़ के चाट रही थी।पूरे लण्ड को मुह में लेके लंड से मुह चोद रही थी।

उसका जैसे ही मन भरा वो घुटनो ओर खड़ी हुई और चुत पर थूक डाल के लंड पे बैठ गयी।और खिसक कर पूरा लण्ड अंदर लिया।उसके मुह से उह तक नही निकली,पर कुछ देर रुक वो उछलने लगी।जोर जोर से गांड उठा उठा कर।

वो:आआह चोद आआह आआह रंडवे भड़वे रवि चुद गयी तेरी रंडी आआह उसके यार से आआह फक मि यंग बॉय आआह रवि भड़वे तेरे मा की चुत आआह साले छके आआह देख चुत में मेरे यार का लंड कैसे ठोक रहा है आआह तेरे जानू की चुत की आज धज्जियां उड़ेगी इस के तगड़े लन्द से आआह आआह चोद भोसडीके आआह फक हर्फ हार्ड आआह

वो क्या बोल रही थी मुझे मालूम नही पर उनके चिलाती हुए सिसकिया मुझे और जोश दे रही थी।आखिर में वो झड के बाजू हो गयी।थोड़ी देर बाद जब होश में आयी तब मैंने उनको पूछ लिया।

मैं:आपको बुरा न लगे तो तो एक बात पूछ लू?!!

वो:हा हैंडसम पूंछ!

मै:ये रवि कोन है?!!

वो हस्ते हुए:वो मेरा पति है,साला बस पैसे के पीछे।बिवि की परवाह नही उसको।

वो औरत जाने के बाद बारी बारी और भी औरते अंदर आयी।सब 35 से 42 के उम्र की शादीशुदा।सबको चुत की आग मिटानी थी।

सब जाने के बाद मैं तक गया था।मैं जेक बाथरूम में फ्रेश हुआ।बाहर आया तो शम्मो और सविता मेमसाब खड़ी थी।

सविता सिगरेट का कश्ट मारते हुए:मजा आया विष्णु।

मैं:चुदने चूदाने में किसको मजा नही आता,पर इतना भी रस मत निकालो की 2 3 दिन उठे ही ना।

सविता:ठीक है,2 4 दिन आराम कर लो।तेरे पैसे शम्मो के पास है।इसके पास नियोता भेज दूंगी तब आ जाना।अभी चले जाओ घर।आराम करो।

मैं:जी,जैसा आप कहे।

उस दिन के बाद कुछ साल तक मैं सविता मेमसाब के लिए चुदाई के मशीन काम करने लगा।अच्छा खासा पैसा कमाने के बाद मैंने अपना ह्यूमन रिसोर्स का बिज़नेस खोला।जीससे उनके ही काम पर मैं आदमी लोग का अरेंजमेंट करता था।मेरी तरक्की देख बिल्डर साब ने अपने बेटी का निगाह मेरे से किया।

आज सविता मेमसाब मतलब मेरी सास 70 के ऊपर गयी है।पिछले साल बिल्डर साब का हार्ट अटैक से देहांत हुआ।अभी मै और उनकी बेटी मतलब मेरी बिवि सारा बिजनेस देखते है।शम्मो को बेटी हुई।शम्मो और वो भी अभी हमारी नौकरानी है।बापू भी दारू के नशे से गुजर गए।मा अभी बंगले में रानी की तरह रह रही है।


ये थी मेरे सफर की कहानी,पसन्द आयी तो लाइक करो कमेंट करो और एक रिवीव जरूर देना।


धन्यवाद❣
आपका
मिस्टर सेक्सी वेबी?
 

Fighter

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Mere Humsafar (Aawara)

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By ~ Fighter


Humsafar matlab safar m sath chalne wala , ab y safar koyi b ho sakta h... Jivan ka safar b or Jivan k safar m sath chalne wale ko jivansathi humsafar kahte h

आप जैसा हँसी हमसफ़र हो अगर,
जा रहे हैं कहाँ सोचता कौन है ?
एक ही मंजिल है उनकी‚ एक ही है रास्ता
क्या सबब फिर हमसफ़र से हमसफ़र लड़ने लगे
जो ब-जाहिर हमसे सदियों की मुसाफ़त-बर रहे,
हम उन्हें हर शाम अपना हमसफ़र देखा किये
फिरते हैं कब से दरबदर अब इस नगर अब उस नगर
एक दूसरे के हमसफ़र, मैं और मेरी आवारगी …

Dekh Alia tera aawara majnu fir aa gya

Tu chup rhke chl pta nhi har bar ise mai kaha hu kese pta chl jata h aawara kahika

Tbi ek ladka jo dikhne m koyi 21-22 ka chikna londa , jiske bal bikhre huye shart k niche ka ek sira jens k andr to dusra bahar , pero m lofar dale un 2 ladkiyo k piche piche kuch gaate huye aa rha tha .

"Kya khub lagati ho, badi sundar dikhati ho Tum pyaar se pyaari ho
tum jaan hamaari ho"

Y gana gate huye unke piche aa rha tha jisse alia irreted ho rhi thi pr sath chl rhi sana ise enjoy kr rhi thi .

Kyo ab y mujhe aap sbi ko btane ki jarurat nhi kyoki sana hi vo sakas thi jo har bar Prince ko alia kaha h y btati thi kyoki use pta tha Prince aawara jarur tha lekin bura bilkul nhi or vo sach m alia se bahut pyaar krta y b vo achhi tarh se janti thi .

Jab Prince dekhta h ki har bar ki tarh aaj b alia ja rhi h to teji se dono k aage aakar khada ho jata h to alia sana ka hath pakad side hokar aage jane ko hoti h to Prince fir usk samne aa jata ...

Alia - kya h tume , kyo preshan kr rhe ho

Prince - are madam aap to esa gussa ho rhi h mai to bas aapse thodi baat krne aaya tha

Alia - mai tum jese aawara se baat krna to dur dekhti b nhi

Prince - are madam vese to is duniya m mai ek hi piace hu , or aap mujhe aaram se dekh sakti h sirf naam Prince h sach m Prince nhi ki aapke dekhte hi mai aapke dil m utar jaunga (smile)

Alia - tum ho b nhi sakte samjhe bada aaya mai Prince hu , sakal dekhi apni bandar b tumse achha dikhta h

Sana dono ka y pyaar bhara jhagda dekh khub enjoy kr rhi thi

Prince - vo to dikhega hi na madam vo aapki catagory m jo aata h bas male - female ka fark h pr mujhe bahut pasand h

Alia - hhmm ab aayi dimag tikhane.... 1 mint kya bola tumne mai bandriya hu U m tumhe chhodungi nhi

Lekin tb tk to Prince bhag chuka tha fir wo dono chali jati h pr Prince nhi jata kyoki vo alia ko or presan nhi krna chahta tha bas apna pyaar jatana chahata tha ki vo uska humsafar banna chahta h


2 din bad

Alia - sana aaj b vo kahi nhi dikh rha

(Aaj alia Prince ko miss kr rhi thi kyoki vo roj k uska pichha krne or usse jhagde ki ek aadat si ho gyi thi ab ise kya samjhe y aap sb samjhe frnds)

Sana (samjhte huye) - kon

Alia - are wohi aawara pure 2 din se bilkul nhi dikha na hi mujhe preshan kiya bada ajib hna

Sana - pr tujhe usse kya tere liye to acha hi hna teri to bala tali or uski kismat futi

Alia - kyo ?

Sana - 2 din pahle uska accident ho gya jisse us bechare k hath or per m bahut chot aayi

Alia (khus huye) - kahe ka bechara hamesha to aawaragardi , mar pit krta rehta h eso k sath esa hi hona chahiye

Sana (serious) - tujhe esa lgta h janti b h usk jyadatar jhagde ki wajah tu hoti h

Alia (sock) - maiii mai kyo hone lgi usk jhagde ki wajah mai to kabi usse baat krna to dur uski tarf dekhti b nhi

Sana - tbi to tujhe uski achhyi nhi dikhi kbi sbi aawara bure nhi hote kuch halat ki wajah se aawara ban to jate h pr unki acchhyi unse dur nhi hoti yaad h jb tu is shahar m aayi thi tb us aawara ravi ki najar tujhpe padi thi jisne tere sath badtamiji ki thi .

Alia - ha to mene b usko ek kas k thappad mara tha or vese b in sb se uska ka connection h

Sana - connection h yr ravi ne use apni insult samjhi jisse iska badla lene k liye apne chamcho ko tujhe uthane k liye bheja rehta tha taki vo teri izzat lut k apni insult ka badla le sake lekin aaj tk koyi tere tk nhi pahunch saka janti h kyo .

Alia y sb sun k sock ho gyi thi ek aawara jo usk sath badtamiji kr rha tha jiske jawab m jab usne thappad mara to uska badla usk sath jabardasti krk pura krna chahta tha

Y sb sun alia na m sir hilati h

Sana - jis waqt us aawara(ravi) ki najar tujhpe padi to usi waqt ek or aawara
(Prince) mandir se apne liye kuch khushiyan maang jab bahar aaya tb uski najar tujhpe ja ruki or vo bas tujhme uparwale ko uski life m khushiyan k roop m mili ho esa samjh betha , tujhse pyaar kr betha fir vo hamesha tera pichha krna suru kr diya lekin jb teri uspe najar nhi padi to to usne tujhe satna suru kr diya lekin usk sbi gano m tere liye kitna pyaar hota h vo tu nhi jan payi kyoki vo tere liye sirf ek aawara tha lekin sach to y h ki vo tera jivanbhar sath nibhane wala , teri hifajat krne wala tera jivansathi safar h koi yaata ka humsafar nhi ab y tujhpe h ki tu kya chahati h bas ek achi dost k nate mai yahi kahugi yahi tera humsafar h

Alia - tujhe y sb kese pta ?

Sana - jb tera birthday tha us din hum mandir m gye the pooja k liye vo b hamare piche aaya tha fir jab apan wapas ja rhe the tb mene use hatho m pooja ka saman dekha tha isliye tujhe kuch chhut gya bol k jb wapas mandir m aayi tb dekha vo tere naam se pooja kra rha tha fir mene usse baat to use mujhe shaam 4 baje aane bol diya use din us mandir m teri kasam khakar usne mujhe sb bta diya or y b kaha ki mai tumhe na btau . Jab mene usse pichha ki esa kyo to janti ho usne kya kaha " mere pyaar m kiye gye farz ko janke usne mujhe pyaar kiya to vo pyaar nhi hoga vo ehsan utarna ya dariyadili jo mujhe nhi chahiye , mujhe sirf pyaar chahiye " .
Mai hi usk pyaar ko dekh uski help krti thi ki hum kaha ja rhe h

Alia (nam aankho se) - kaha h vo ?

Sana - tu bol rhi thi na y sb usk jhagde ki wajah se usk sath esa huwa h lekin esa nhi ek aurat ko ek car se bachte huye use vo chot aayi jisse abi hospital m h .

Ravi bhai abi vo ladki yaha ***** cafe m apni dost k sath h or vo Prince b 2 din se nhi dikh rha h .

Ravi - tik h mai aa rha hu

Kuch 30 min bad ravi apne 5 chamcho k sath waha aata h jaha us ladke ne phone krk btaya tha vo alia & sana ki table k pas hi betha tha jese hi use ravi aata huaa dikha .

Jese hi alia apni kursi uthati h usk samne phone wala ladka khada ho jata h itne m ravi b aa jata h apne chamcho k sath or aate hi us ladke ko ek thappad marta h .

Ravi - salo bh****di k 2 din se vo sala hospital m h or tum logo ko iski bhank tk na lgi , kya g***d mara rhe the 2 din se
(Alia se) ab kya karogi bulbul us vo apna area nhi tha us sale Prince ka tha is liye apan ne kuch nhi kiya lekin sali r***d y apna area h ab kya kregi .

Alia apne liye itna sunte hi ek thappad marti h lekin ravi use pakad leta h .

Ravi - aaj nhi rani aaj to sirf mai krunga jo b krunga

Tbi Prince ki entry hoti h jiske hath or per m patti bandhi huyi thi .
Avi itni jaldi b kya h pahle mujhe to mil le

Prince ki aawaj sunke sb najar Pichhe khade Prince pe chali jati h jo ab tk alia or ravi pr thi esa nhi tha vo or log nhi the lekin aawara logo k kon muh lge isliye koi bich m nhi aaya pr seen dekh pura dekh rhe the or yahi to hota aaya h .

Ravi - are dekho kon aaya Prince apni princess ko bachane
(Prince halat dekh uska dar khatam ho gya tha vo Prince ko dekh k hone lga tha lekin bechara y nhi janta tha ghayal sher or b khatarnak hota h)

Prince (smile) - wah yr tune to dil khush kr diya kya bola tha "Prince apni Princess k liye aaya h"
Y bol Prince alia ki tarf smile k sath dekhta jo use dekh sharma jati jisse Prince bahut khush ho jata h

Ravi - dekh kya rhe ho maro sale ko

Y total 7 lod the jese pahla apna panch Prince ko marta h Prince niche jhukkr dusre k main point pe ek panch mar deta h jisse vo wahi chillate huye beth jata h fir 3re k muh pe niche se upr ki tarf ek powerful panch jad deta h jisse uska jabda tut jata h itne me 1 wapas aa jata h sath 4tho b aa jata h Prince ko panch marne to Prince hawa m uchhal k dono k muh pe kick marta h jisse dono muh se khoon aa jata h syd 2-3 dant tut hye the .

Prince ki esi halat m b uski maar dekh sb sock the ab ravi k alawa 2 or bache the lekin unki fati padi thi fir dono ek dusre ko isara kr Prince ko aage - pichhe se gher liya samne wale ne panch or pichhe wale Prince k pichhe kich marni chahi vese hi Prince teji side ho jata jisse dono ek dusre ko marte h fir kick wale ko ek kich mar use b uske sathi k upr gira deta h or Prince jese hi pichhe ghoomne wala hota h tbi alia ki aawaj aati h Princeee or Prince ko ravi ek kursi ki padti h jisse Prince table gir jata h use hotho se thoda khoon b nikal jata h .

Alia ki aankho m aasu the vo ro rhi thi fir jese hi ravi Prince k pas aata h uske muh pe ek panch fir panch panch panch panch jisse ravi ka muh khoon se laal ho jata h isi k sath vo gir padta h .

Fir jese hi Prince ghoomta h uski Princess (alia) aakar uske gale lag jati h I love you Prince Mere Jivansathi HumSafar Banoge ●

तुम ख़्वाब हो या नींद या कि
मखमली गुलाब हो
तुम बहम हो या तेज़ तीखी
गुदगुदी शराब हो
पानी की छींटी बूंद हो या
फिर भभकती आग हो
अब तुम कहो कि क्या कहूं तुमको मैं जानेमन मेरी...



The End


Note - ab y sawal mat krna ki Prince waha kese pahucha are yr sirf chot aayi thi tuta futa nhi tha or vese b kuch bande to usk b honge na hahahaha
 

Lucky lerka

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Tital---------- Apna Naseeb

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lucky larka


Hello dosto Ma ak aur short story laker aya hun Shayad apko passand ai bolna zaror kasy he ok ye ak larki ki story he aur shyad khai suna ho ap logo ne per ma thora apne tarike se bhi likho ga ok


lets start

Angli Ak simpal sy larki jo ak middel class family se he us ke ghar ma sirf uski ma he aur koi nhi angli ke papa ki heart atteck se moot ho gay thi do mahine pla angli study karti thi collage ma abi 23 saal ki thi per

us ke papa ke jane ke bad ghar ki zimadari us per a gay thi us ne study chor di job dundne lagi per aj kal middal class walo ko job kha milti he bhot dundne ke baad angli ko job nhi mili to wo thak haar kar ghar ai

maa..... Kiya howa beta tuu itni udass q he

angli..... Mummy dekho na middal class wali family ki koi value hy nhi he jha job ke liya jao interview dena to paise mante job ke liya

maa..... Ase udass na ho beta tere papa ke jane ke ghar ke halat bhot bure he per tere papa ne itni bachat ki le 2 mahine tak ghar chal sakta he abi bhi tab tak tuu koi bhi job dund le beta werna ma khai kam karne chali jao

Angli...... Nhii maa apko kam karne ki zerwat nhi he ma koi na koi job zaror dund lungi

Maa..... Meri pyari bachi chalo khana kha le

phir angli khana kha kar apni dost ke pass a gay

a dost..... Angli tum kha ho Kiya howa yar tum collage bhi nhi a rahi kiya howa he 1 mahine se nazer hy nhi a rahi ho

angli..... Mere papa ab is duniya ma nhi rahe

us ke age kuch bol nhi pay aur apni dosto ke gale lag gay aur rone lagi

A dost...... Angli ase nhi rote na wo uper wale ki amnat thi to us ne lali ab har kisi ko jana to he na is duniya see


Angli.... Per Ghar ke halat bhi kuch thik nhi he is liya ma collage chor diya aur job dund rahi hun per mil hy nhi rahi

A Dost...... Tune mujhe call q nhi kiya mujhe bata na tha na yaar

Angli..... Halat hy asy thi

A dost...... Koi nhi ab ma hun na sath mil kar dunde ge

phir ase hy kuch din nikal gay angli phir finali angli ko ak job mil ready made kapron ki shop ma angli maze se apni job ma lagi howi thi

do mahine nikal gay angli khushi se apni job per jha rahi thi per ak din shop ke maneger ne use apne pass bula ya

angli...... Sir apne bula ya

maneger...... Han

angli..... Jii bolo sir

Maneger...... Mujhe tumara kam dekh kar bhot khushi howi per

angli..... Per kiya sir

maneger...... Per ye shop tume chorni pare gi

Angli...... Q sir mujhe se koi galti ho gay kiyaa

maneger...... Nhi tume jis ki jga kam per rakha tha wo mera banjhi he ab wo a rahi he to tume cborni pare gi job

Angli..... Sir plzzz mera asa asa na karo ma bhot gareeb ma ghar ma mara koi nhi he maa ke elwa unhe bhi mujhe sambal na he asa na kari

mmanege...... Sorry

Angli..... Plzz sir reaquest hee koi bhi kam hogama kar lungi sir per plzzz mujhe job se na nikalo

maneger kuch soch kar phir uth kar anglike pass aya

maneger...... Koi bhi kam bolo kare gi

angli..... Han sir karo gi

Maneger...... To Meri Rakhel ban jaa sath ma teri maa ko bhi mari rakhel bna dunga phir Zindagi ber ash hy ash

Maneger pla se therki tha aur shuro se angli per nazer thi ab moka ka faida bhi utha rha tha

Angli..... Sir ye kiya bola rahe ho ap kisi gareeb ki majboori ka faida utha rahe ho ap ye ma nhi kar sakti

maneger...... Ab tumare pass yahi rasta he

angli..... Sorry sir ye ma nho kar sakti aur ma shop se kam chor rahi hun

angli wah se rote howe ghar aj aur ate hy apni maa ke gale lag kar rone lagi

maa...... Kiya howa bati ase q ro rahi he

angli na apni maa ko sab kuch bata diya aur maa bhi sath rone lagi

maa..... Kiya kare beta apna naseeb he asa he to koi nhi ab rona band kar kpi air job mil jay gi uper wala he na

angli...... Thik he maa

phir angli job dundne ma lag gay us ke dost ke sath angli ko ak restaurant ma job mili waiter ki majboori thi karni pari

per angli ka naseeb us ko wo table mila jha ak gosa wala 50 saal ka admi ata tha jis ko is hotal ka khana bhot passand tha per wo kisi se pyar se bat nhi karta tha her kisi se gosa ma herkisi ko kuch na luch bolta rahta tha

ab angli ka naseeb hy asa nikla to kiya kar sakti thi angli ne himmat kar khana srev kiya per wahi howa gosa ma angli ko bhot bate suna dii per angli bhi majboor thi kiya karti

wi admi roz ata roz angli use khana serve karti. Roz bate sunta tha ase hh time bita gya angli ko mano adat hy ho gay us admi ki bate sune kii angli na berdasht ki us admi ko aur apne kam ma itni masroof howi ke us ne apni her tenshan door kar di

Ase hy 4 saal nikal gay in 4 salo ma angli ki life ma bhot change aya per siwa ak bat ke wo thi wo admi jo aj bhi bate sunta 4 saal ho gay angli ko mano us admi ki batao se pyar ho gya use sunti nhi to din nikal ta nhi

ase hy ak din wo admi nhi aya angli us time dekha to wo admi nhi tha us table per angli ko pata nhi q ajeeb sy bechaini howi is bat ki khushi nhi thi ke aj use bate nhi suni pare gi per dukha tha ke wo admi aya q nhi

Kuch din beet gay per wo admi aya nhi angli bhi us ke liya pareshan hone lagi angli ka pass us ka koi addrees na koi khaber thi jo pata lage

ak hafta nikal gya per wo admi na aya phir angli na ak din ka rest liya aur ghar bath ker aram kar rahi thi tabi us ke ghar koi aya

angli.... Ji ap kon

admi...... Ji pla ap ye lattter pariye phir bat karte he

angli ne nikala aur perna start ki

angli ma wahi jo jha tum kam karti ho wah ma khana khane ata tha roz jo her kisi per gosa karta tha per koi mera pass nhi ata tha per tum ne himmat ki aur meri itni bate sunne ke bad bhi tumne himmat nhi hari 4 saal ma na jane maine tume kiya kiya sunya mera is duniya ma koi nhi he ma ak retired army officer hun aur maine apne paiso se ak buissnas start kiya tha jo aj bhot kamiyab ho gya he per mera koi nhi he is duniya ma jo sambal sake is liya main aona pura buissnas tere name karta hun aur umeed he tum ise aur kamiyab karo gi ok bati apna khayal rakhna ok

angli.... Per wo admi he kha

admi.....wo ab is duniya ma nhi rahe to ab sir ke mutabik ye pura buissnasapka he is liya ma kuch paper per sine kerwane aya hun

angli ne apni maa ko bulya apni ma ko sab bata ya phir angli ki maa ne ijzat de di angli ne sine kar di aur angli na pura buissnas apna name ker liya

Ye hota he ak a insan ka naseeb jisne life ma itni mushkile dakhi per kabi haar nhi mana samna kiya aur aj us ka inam mila

Aj kal is duniya ma gareeb admio ka galat faida utha ya jata he larkio aur aurto ke sath galat kam hota he un ki majboori ka faida utha te he is liya ak gareeb admi ya to chori karta he ya galat kamo ma lag jata he

kabi insano no ma ameer greeb ma koi farak na dundo insan ak jasa hote he sab her kisi ka diyan rakho

umeed he ye story passand ai apko aur ager koi galti ho gay ho to maaf karna
 
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