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Shayari शायरी और गजल™

vihan27

“मृत्योः भयम् सर्वदुःखस्य मूलम्।”
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मुँह ज़बानी न बताता कि मोहब्बत क्या है,
मैं तुझे करके बताता कि मोहब्बत क्या है।

कैसे सीने से लगाऊँ कि किसी और के हो,
मेरे होते तो बताता कि मोहब्बत क्या है।

ख़ूब समझाता तुझे तेरी मिसालें देकर,

काश तू पूछने आता कि मोहब्बत क्या है।
 
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मुँह ज़बानी न बताता कि मोहब्बत क्या है,
मैं तुझे करके बताता कि मोहब्बत क्या है।

कैसे सीने से लगाऊँ कि किसी और के हो,
मेरे होते तो बताता कि मोहब्बत क्या है।

ख़ूब समझाता तुझे तेरी मिसालें देकर,

काश तू पूछने आता कि मोहब्बत क्या है।
Waah! Zabardast :claps:
 
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जहां जाके चैन से मर सकूं कभी लौट के भी ना आ सकूं।
मुझे कोई ऐसी जगह बता जहां तुझको दिल से भुला सकूं।।

जो तुझे पता हो तो ये बता गम-ए-इश्क़ का इलाज़ है क्या,
मुझे तूने दर्द दिया है वो न बता सकूं न छुपा सकूं।।

जो समझ मे कुछ भी न आ सके तो नतीजे वक्त पे छोड़ दे,
मुझे कुछ न दे ये दुवा ही दे तेरे नक्श दिल से मिटा सकूं।।

कोई राज़दार मिले कहीं कोई गमगुजार मिले कहीं,
कहीं साहिल ऐसा रफीक हो जिसे दाग दिल के दिखा सकू।।
 

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जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो।
ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है कि तुम हो।।

ये ख़्वाब है ख़ुशबू है कि झोंका है कि पल है,
ये धुँद है बादल है कि साया है कि तुम हो।।

इस दीद की साअत में कई रंग हैं लर्ज़ां,
मैं हूँ कि कोई और है दुनिया है कि तुम हो।।

देखो ये किसी और की आँखें हैं कि मेरी,
देखूँ ये किसी और का चेहरा है कि तुम हो।।

ये उम्र-ए-गुरेज़ाँ कहीं ठहरे तो ये जानूँ,
हर साँस में मुझ को यही लगता है कि तुम हो।।

हर बज़्म में मौज़ू-ए-सुख़न दिल-ज़दगाँ का,
अब कौन है शीरीं है कि लैला है कि तुम हो।।

इक दर्द का फैला हुआ सहरा है कि मैं हूँ,
इक मौज में आया हुआ दरिया है कि तुम हो।।

वो वक़्त न आए कि दिल-ए-ज़ार भी सोचे,
इस शहर में तन्हा कोई हम सा है कि तुम हो।।

आबाद हम आशुफ़्ता-सरों से नहीं मक़्तल,
ये रस्म अभी शहर में ज़िंदा है कि तुम हो।।

ऐ जान-ए-'फ़राज़' इतनी भी तौफ़ीक़ किसे थी,
हम को ग़म-ए-हस्ती भी गवारा है कि तुम हो।।


______अहमद फ़राज़
 

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तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है।
तेरे साथ तिरी याद आई क्या तू सच-मुच आई है।।

शायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझल होने का,
मुझ को देखते ही जब उस की अंगड़ाई शर्माई है।।

उस दिन पहली बार हुआ था मुझ को रिफ़ाक़त का एहसास,
जब उस के मल्बूस की ख़ुश्बू घर पहुँचाने आई है।।

हुस्न से अर्ज़-ए-शौक़ न करना हुस्न को ज़क पहुँचाना है,
हम ने अर्ज़-ए-शौक़ न कर के हुस्न को ज़क पहुँचाई है।।

हम को और तो कुछ नहीं सूझा अलबत्ता उस के दिल में,
सोज़-ए-रक़ाबत पैदा कर के उस की नींद उड़ाई है।।

हम दोनों मिल कर भी दिलों की तन्हाई में भटकेंगे,
पागल कुछ तो सोच ये तू ने कैसी शक्ल बनाई है।।

इशक़-ए-पेचाँ की संदल पर जाने किस दिन बेल चढ़े,
क्यारी में पानी ठहरा है दीवारों पर काई है।।

हुस्न के जाने कितने चेहरे हुस्न के जाने कितने नाम,
इश्क़ का पेशा हुस्न-परस्ती इश्क़ बड़ा हरजाई है।।

आज बहुत दिन बा'द मैं अपने कमरे तक आ निकला था,
जूँ ही दरवाज़ा खोला है उस की ख़ुश्बू आई है।।

एक तो इतना हब्स है फिर मैं साँसें रोके बैठा हूँ,
वीरानी ने झाड़ू दे के घर में धूल उड़ाई है।।


______जौन एलिया
 

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हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।। :verysad:
 

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दूर से शहर-ए-फ़िक्र सुहाना लगता है।
दाख़िल होते ही हर्जाना लगता है।।

साँस की हर आमद लौटानी पड़ती है,
जीना भी महसूल चुकाना लगता है।।

रोज़ पलट आता है लहू में डूबा तीर,
रोज़ फ़लक पर एक निशाना लगता है।।

बीच नगर दिन चढ़ते वहशत बढ़ती है,
शाम तलक हर-सू वीराना लगता है।।

उम्र ज़माना शहर समुंदर घर आकाश,
ज़ेहन को एक झटका रोज़ाना लगता है।।

बे-हासिल चलते रहना भी सहल नहीं,
क़दम क़दम पर एक बहाना लगता है।।

क्या उस्लूब चुनें किस ढब इज़हार करें,
टीस नई है दर्द पुराना लगता है।।

होंट के ख़म से दिल के पेच मिलाना 'साज़',
कहते कहते बात ज़माना लगता है।।

_________अब्दुल अहद 'साज़'
 

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हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं
मैं मुंतज़िर हूँ मगर तेरा इंतिज़ार नहीं

हमीं से रंग-ए-गुलिस्ताँ हमीं से रंग-ए-बहार
हमीं को नज़्म-ए-गुलिस्ताँ पे इख़्तियार नहीं

अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब
अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं

तुम्हारे अहद-ए-वफ़ा को मैं अहद क्या समझूँ
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत पे ए'तिबार नहीं

न जाने कितने गिले इस में मुज़्तरिब हैं नदीम
वो एक दिल जो किसी का गिला-गुज़ार नहीं

गुरेज़ का नहीं क़ाइल हयात से लेकिन
जो सच कहूँ कि मुझे मौत नागवार नहीं

ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया ज़माने ने
कि अब हयात पे तेरा भी इख़्तियार नहीं

_____साहिर लुधियानवी
 

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हवाएँ तेज़ थीं ये तो फ़क़त बहाने थे।
सफ़ीने यूँ भी किनारे पे कब लगाने थे।।

ख़याल आता है रह रह के लौट जाने का,
सफ़र से पहले हमें अपने घर जलाने थे।।

गुमान था कि समझ लेंगे मौसमों का मिज़ाज,
खुली जो आँख तो ज़द पे सभी ठिकाने थे।।

हमें भी आज ही करना था इंतिज़ार उस का,
उसे भी आज ही सब वादे भूल जाने थे।।

तलाश जिन को हमेशा बुज़ुर्ग करते रहे,
न जाने कौन सी दुनिया में वो ख़ज़ाने थे।।

चलन था सब के ग़मों में शरीक रहने का,
अजीब दिन थे अजब सर-फिरे ज़माने थे।।


आशुफ़्ता चंगेज़ी
 
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