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Incest माँ बेटा इक दूजे के सहारे (completed)

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Ting ting

Ting Ting
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दोस्तों आप के प्यार और मेरी कहानिओ को पसंद करने के लिए शुक्रिया.
मैं एक नयी कहानी शुरू करने जा रहा हु, आशा है कि आपको पसंद आएगी. यह कहानी एक गरीब परिवार में रहने वाले माँ और बेटे की है. जो मजबूरी के कारन एक दूजे के सहारे से अपनी जिंदगी काटने को मजबूर है. यह मजबूरी उन्हें कैसे शारीरिक रूप से भी पास ले आती है. यह ही सब इस कहानी का सार है.
जल्दी ही कहानी शुरू करने जा रहा हूँ.
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Motaland2468

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दोस्तों आप के प्यार और मेरी कहानिओ को पसंद करने के लिए शुक्रिया.
मैं एक नयी कहानी शुरू करने जा रहा हु, आशा है कि आपको पसंद आएगी. यह कहानी एक गरीब परिवार में रहने वाले माँ और बेटे की है. जो मजबूरी के कारन एक दूजे के सहारे से अपनी जिंदगी काटने को मजबूर है. यह मजबूरी उन्हें कैसे शारीरिक रूप से भी पास ले आती है. यह ही सब इस कहानी का सार है.
जल्दी ही कहानी शुरू करने जा रहा हूँ.
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Congratulations for new story plz continue
 
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Ting ting

Ting Ting
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मेरा नाम समीर है. और मेरे घर में सिर्फ मैं और मेरी माँ सुजाता है. घर में हम दोनों माँ बेटा ही है.

हमारा घर उत्तर प्रदेश में बलिआ के पास एक छोटे से गाओं में है.

पहले हमारे घर में तीन लोग थे. मैं,
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मेरी माँ सुजाता
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और मेरे पिता लीलाधर जी.
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हम बहुत अमीर तो नहीं थे पर हम मध्यम उच्च वर्गीय स्तर के लोग थे. मेरे पिता जी की एक किराने की छोटी सी दूकान थी और हमारे पास लगभग १० एकड़ जमीन भी थी. इसलिए हमारा गुजरा आराम से हो जाता था.

घर में खुशहाली थी और हर तरह की सुख सुविधा का सामान भी घर में था.

हमारे रिश्तेदार हम से कुछ काम अमीर थे. तो शायद इसलिए वो हमसे जलते भी थे. पर मेरे पिता जी दिल के बहुत ही अच्छे इंसान थे तो इसलिए तो टाइम बे टाइम जरूरत पड़ने पर अपने रिश्तेदारों की मदद भी कर देते थे. इसलिए हमारे घर में रिश्तेदारों का आना जाना लगा ही रहता था.

पर जैसे की आप सब जानते हैं की बुरा वक़्त आते किसी को भी पता नहीं चलता.

एक दिन अचानक मेरे पिता को लकवे का अटैक आ गया। इस से पिता जी की दाईं टांग और बांह बिलकुल काम करने से हट

गयी.

हम तुरंत पिता जी को उठा कर पास के शहर में हॉस्पिटल में ले गए और उन्हें दाखिल करवा दिया.

आप तो जानते ही हैं की कैसे ये प्राइवेट हॉस्पिटल वाले इंसान की खून की आखिरी बूँद तक निचोड़ लेते है.

पिता जी की हालत में कुछ भी सुधार नहीं हो रहा था पर ऊपर से हॉस्पिटल का बिल भी बढ़ता ही जा रहा था.

पिता जी को २ महीने हॉस्पिटल में रहना पड़ा. इन दो महीनों में हमारी साड़ी जमा पूँजी ख़तम हो गयी. स्थिति यह आ गयी थी की हमारी दूकान भी बिक गयी और सर पर कर्जा भी बहुत चढ़ गया.

आखिर दो महीनो के बाद पिता जी की मौत हो गयी. पर तब तक घर के हालात बहुत बिगड़ चुके थे. हमारी दूकान बिक चुकी थी और खेत भी लाला के पास गिरवी रखे थे.

हमने अपने रिश्तेदारों से कुछ पैसे की मदद मांगी पर वो तो सरे रिश्तेदार ऐसे गायब हो गए थे जैसे गधे के सर से सींग..

सब रिश्तेदारों ने हमसे मुँह मोड़ लिया और उन्होंने तो हमारा फ़ोन भी उठाना बंद कर दिया कि कहीं हम उनसे कोई उधर न मांग लें.

खैर हम कर भी क्या सकते थे. आखिर दोस्त और रिश्तेदार की पहचान बुरे समय में ही तो होती है.

और कोई चारा न देख कर हमने अपने खेत को भी बेच दिया और कर्ज चूका दिया.

अब हमारे घर के हालात बहुत खराब हो चुके थे.

घर में खाने को भी लाले पद गए थे. और कोई साधन न देख कर मैंने खेतों में मजदूरी करना शुरू कर दिया. जिन खेतों के कभी हम मालिक थे अब मैं उन्ही खेतों में मजदूर था.

वक़्त का ऐसा ही चक्कर होता है. हमारे सब रिश्तेदार हम से मुँह मोड़ चुके थे. और हम घर में सिर्फ माँ बीटा ही रह गए थे जो किसी तरह अपना समय पास कर रहे थे.
 

Game888

Hum hai rahi pyar ke
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Interesting start :thumbup:
 
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मेरा नाम समीर है. और मेरे घर में सिर्फ मैं और मेरी माँ सुजाता है. घर में हम दोनों माँ बेटा ही है.

हमारा घर उत्तर प्रदेश में बलिआ के पास एक छोटे से गाओं में है.

पहले हमारे घर में तीन लोग थे. मैं,
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मेरी माँ सुजाता
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और मेरे पिता लीलाधर जी.
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हम बहुत अमीर तो नहीं थे पर हम मध्यम उच्च वर्गीय स्तर के लोग थे. मेरे पिता जी की एक किराने की छोटी सी दूकान थी और हमारे पास लगभग १० एकड़ जमीन भी थी. इसलिए हमारा गुजरा आराम से हो जाता था.

घर में खुशहाली थी और हर तरह की सुख सुविधा का सामान भी घर में था.

हमारे रिश्तेदार हम से कुछ काम अमीर थे. तो शायद इसलिए वो हमसे जलते भी थे. पर मेरे पिता जी दिल के बहुत ही अच्छे इंसान थे तो इसलिए तो टाइम बे टाइम जरूरत पड़ने पर अपने रिश्तेदारों की मदद भी कर देते थे. इसलिए हमारे घर में रिश्तेदारों का आना जाना लगा ही रहता था.

पर जैसे की आप सब जानते हैं की बुरा वक़्त आते किसी को भी पता नहीं चलता.

एक दिन अचानक मेरे पिता को लकवे का अटैक आ गया। इस से पिता जी की दाईं टांग और बांह बिलकुल काम करने से हट

गयी.

हम तुरंत पिता जी को उठा कर पास के शहर में हॉस्पिटल में ले गए और उन्हें दाखिल करवा दिया.

आप तो जानते ही हैं की कैसे ये प्राइवेट हॉस्पिटल वाले इंसान की खून की आखिरी बूँद तक निचोड़ लेते है.

पिता जी की हालत में कुछ भी सुधार नहीं हो रहा था पर ऊपर से हॉस्पिटल का बिल भी बढ़ता ही जा रहा था.

पिता जी को २ महीने हॉस्पिटल में रहना पड़ा. इन दो महीनों में हमारी साड़ी जमा पूँजी ख़तम हो गयी. स्थिति यह आ गयी थी की हमारी दूकान भी बिक गयी और सर पर कर्जा भी बहुत चढ़ गया.

आखिर दो महीनो के बाद पिता जी की मौत हो गयी. पर तब तक घर के हालात बहुत बिगड़ चुके थे. हमारी दूकान बिक चुकी थी और खेत भी लाला के पास गिरवी रखे थे.

हमने अपने रिश्तेदारों से कुछ पैसे की मदद मांगी पर वो तो सरे रिश्तेदार ऐसे गायब हो गए थे जैसे गधे के सर से सींग..

सब रिश्तेदारों ने हमसे मुँह मोड़ लिया और उन्होंने तो हमारा फ़ोन भी उठाना बंद कर दिया कि कहीं हम उनसे कोई उधर न मांग लें.

खैर हम कर भी क्या सकते थे. आखिर दोस्त और रिश्तेदार की पहचान बुरे समय में ही तो होती है.

और कोई चारा न देख कर हमने अपने खेत को भी बेच दिया और कर्ज चूका दिया.

अब हमारे घर के हालात बहुत खराब हो चुके थे.

घर में खाने को भी लाले पद गए थे. और कोई साधन न देख कर मैंने खेतों में मजदूरी करना शुरू कर दिया. जिन खेतों के कभी हम मालिक थे अब मैं उन्ही खेतों में मजदूर था.


वक़्त का ऐसा ही चक्कर होता है. हमारे सब रिश्तेदार हम से मुँह मोड़ चुके थे. और हम घर में सिर्फ माँ बीटा ही रह गए थे जो किसी तरह अपना समय पास कर रहे थे.
Bhadhaai💐💐💐. Sahi suruvaat hai. Sachai se bharpoor.
 
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Game888

Hum hai rahi pyar ke
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