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Fantasy देवत्व - एक संघर्ष गाथा

sunoanuj

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Bahut hi behtarin updates…
 
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jaggi57

Abhinav
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अध्याय - 20

विश्वकसेन - महाराज साक्ष्य तो हम अपने साथ ही लाए हैं ( फिर अपने सहायकों की तरफ देखते हुए इशारा किया , इशारा पाते ही उन्होंने अपने दल के मध्य दो बंदीयों की गर्दन पड़कर घसीटते हुए सामने ले आए )
जिन में से एक तो वही था जिसे गजेंद्र ने विरुपाक्ष के घर के जासूसी करते हुए पकडा था और दूसरा था राजवैद्य ।

अब आगे ------


उन दोनों को विश्वकसेन की कैद में देखकर महामंत्री और सेनापति के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी क्योंकि दोनों में से एक था शंकु महामंत्री का विश्वासपात्र के प्रत्येक षड्यंत्र का साक्षी था ।


जब विरुपाक्ष के साथ गजेंद्र ने नगर में प्रवेश किया तब शंकु ने इसकी सूचना महामंत्री तक पहुंचाई । तो महामंत्री ने उसे उन दोनों पर अपनी नजर बनाए रखने के लिए कहा और गुप्त रूप से गजेंद्र के बारे में पता करने के लिए कहा । गजेन्द्र के बारे में पता करने के लिए शंकु विरुपाक्ष के घर में तांक झांक कर रहा था , जिसे गजेंद्र ने पकड़ लिया ।

जब गजेंद्र ने उसकी अच्छी तरह से धुनाई की तब उसने महामंत्री और सेनापती सारे राज खोल दिए।


अब विरुपाक्ष के और गजेंद्र के सामने सारी बात थी के षड्यंत्र की शुरुआत किस प्रकार हुई , इसका कारण क्या था , सारी बातें समझने के पश्चात गजेंद्र ने अपनी योजना बनाई और विरुपाक्ष की पत्नी चंचला को उसके पिता विश्वक्सेन और विरुपाक्ष के सभी सहयोगियों को साथ लेकर योजना पर कार्य करने के लिए कहा और साथ ही साथ उन्हें किसी भी प्रकार की स्थिति के लिए सज्ज होने का निर्देश दिया ।

विरुपाक्ष के सहयोगियों में से एक राज दरबार का द्वारपाल भी था । जैसे ही दरबार में विरुपाक्ष और गजेंद्र को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई , वह तुरंत वहां से निकल गया और जाकर इसकी सूचना चंचला और विश्वकसेन को दी ।
सूचना पाते हैं विश्वक सेन ने अपने सहयोगियों और विश्वास पत्रों को संगठित किया और साथ ही साथ राजवैद्य जो महामंत्री के षड्यंत्र में शामिल था और जिसके बारे में शंकु हो के द्वारा ज्ञात हुआ था उसे भी पकड़ लिया गया । द्वारपाल द्वारा उन्हें बलि स्थान की सूचना प्राप्त हो गई थी ।


इसलिए विश्वकसेन शंकु और राजवैद्य को लेकर अपने दल के साथ बली स्थान पर पहुंचे ।
विश्वकसेन के साथियों द्वारा उन दोनों को इस प्रकार बंदी बनाकर पकड़े हुए देखकर

राजा कामरान - विश्वकसेन ! सब क्या है इन दोनों को इस प्रकार क्यों पकड़ रखा है । लगता है अब आप भी मेरी दी हुई छुठ गलत फायदा उठाने लगे हो ।

विश्वकसेन - महाराज आप मुझे अच्छी तरह से जानते हो मैं ऐसा कोई भी कार्य नहीं करूंगा जो राज्य के और आपके हित में ना हो । इन दोनों को पकड़ने का कारण यह दोनों ही बताएंगे । महाराज ! यह है शंकु महामंत्री सतपाल का अत्यन्त प्रिय एवं विश्वासपात्र ।
( फिर शंकु की तरफ देखते हुए ) कहो शंकु कहो , निर्भय होकर , सत्य कहो ।


शंकु ने एक नजर विश्वकसेन की ओर देखा फिर महामंत्री की ओर देखा वह । आज वह सत्य कहने के लिए बाध्य था क्योंकि विश्वकसेन से ने शंकु की पत्नी एवं पुत्र के साथ पूरे परिवार को अपना बंदी बना लिया था ।

शंकु ने पहले महाराज कामरान को प्रणाम किया फिर बोलना शुरू किया । जिसे देखकर सतपाल और सेनापति के पसीने छूटने लगे ।
दोनों ही नेत्र ही नेत्रों में एक दूसरे से कुछ ईशारों में बात करने लगे ।

शंकु को चुप कराने के लिए महामंत्री ने उसे बडे नेत्र करके घूर कर भी देखा , परंतु अपने परिवार के कारण शंकु सत्य बोलने के लिए आज बाध्य था । उसने महामंत्री की ओर ध्यान ना देते हुए बो,ना शुरू किया ।


शंकु - महाराज की जय हो ! महाराज विरुपाक्ष जी सर्वथा निर्दोष है । अब तक इन पर जो भी आरोप लगे हैं वह सब मिथ्या आरोप है । केवल विरुपाक्ष जी ही नहीं आपके विरुद्ध भी षड्यंत्र रचा गया है इन सारे षडयंत्रों शुरुआत कई वर्ष पहले हुई थी जिस समय आपने विरुपाक्ष जी को महामंत्री बनाया था ।

इन सारे षडयंत्रों के पीछे महामंत्री सतपाल और सेनापति कंक है , आ ऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ आऽऽऽऽऽऽआऽऽऽऽऽऽ

आगे शंकु और कुछ बोल ना सका क्योंकि एक खंजर तीव्रगति से आकर सीधा उसके गले आर-पार हो गया था , जो सेनापति कंक ने चलाया था । जिससे शंकु आगे एक शब्द भी बोल ना पाया और देखते ही देखते भूमि पर लुढ़क गया । उसके गर्दन से निकलता हुआ लाल रक्त वहां फैलने लगा , बली वेदी ने अपनी प्रथम बली ले ली थी ।

सेनापति कंक के द्वारा इस प्रकार अचानक शंकु के मारे जाने पर सभी आवाक थे , राजा कामरान के लिए तो यह सब अप्रत्याशित था ।

शंकु के मारे जाने पर क्रोध में भरकर विश्वकसेन अपने दल को लेकर सेनापति की तरफ बढा ही था के कामरान के सभी सैनिको ने सेनापति के चारों ओर सुरक्षा घेरा बनाकर अपने-अपने शस्त्र निकाल कर सज्ज हो गए ।

शंकु के कथन पर कामरान विचार कर ही रहा था तभी यह सब अचानक घटित हो गया , यह सब क्या हो रहा था कामरान को अभी भी समझ में नहीं आ रहा था ।


कामरान - सेनापति ! यह सब क्या हो रहा है , इस प्रकार तुमने शंकु की हत्या क्यों की इसका क्या अर्थ है , के जो कुछ शंकु ने कहाँ है वो सत्य है ।

सेनापति कंक - कामरान ! सच में तुम बड़े ही मुर्ख हो , अभी तक नहीं समझे , तुम जैसा मुर्ख राजा बनने के सर्वथा अयोग्य है ।

कामरान - सेनापति ! तुम्हारा यह दूस्सहस कि तुम मेरे सामने ही मेरे प्रति इस प्रकार के अपशब्दों का प्रयोग करो , तूमने अपने कथन से ही यह सिद्ध कर दिया है के सारे षडयंत्रो की जड तूम ही हो , दंड विरूपाक्ष को नही तूम्हे और महामंत्री को मिलना चाहिए । सैनीकों पकड़ लो इस दुष्ट को ।

परंतु आश्चर्य कामरान का आदेश पाकर भी सैनिक तनिक भी अपनी जगह से नहीं हिले । अपने आदेश ईस प्रकार अवेह्लना होते हुए देखकर कामरान को बडा ही आश्चर्य हुआ ।

सेनापति कंक -( जोर से अट्टाहास लगाते हुए ) हा हा हा हा ! ये अब तुम्हारा आदेश नही मानेंगे कामरान । तुम्हारे आदेश पर अभी ये कुछ नहीं करने वाले । आदेश कैसे दिया जाता है अब वह देखो , सैनिकों को पकड़ लो इस राजा को , महामंत्री को और इसके सारे विश्वास पात्रो को ।

यहां इतनी जल्दी-जल्दी इतना कुछ हो रहा था की प्रजाजन को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था । जब तक उन्हें कुछ समझ में आता तब तक सेनापती का आदेश पाते ही भीड़ में छीपे सेनापति कंक के सैकड़ो सैनिक शस्त्र लेकर बाहर आए और पूरे बली मंडप को घेर लिया ।
जहाँ यह सब कुछ चल रहा था तो वही गजेंद्र शांति से सब कुछ देख रहा था और मुस्कुरा रहा था । अपने मित्र को इस प्रकार शांत खड़ा देखकर विरुपाक्ष भी शांति से खड़ा होकर सब कुछ देख रहा था ।

इतने सारे सशस्त्र योद्धाओं को देखकर वहां खड़ी प्रजा को यहां होने वाले घमासान के बारे में अंदेशा हो गया था । इसलिए जो भयभीत हो रहे थे वह सब वहां से धीरे-धीरे करके निकलने लगे ।

अब वहां प्रांगण में केवल वही लोग बचे थे जो दोनों पक्षों के समर्थक और हर प्रकार से
अपने दल का साथ देने के लिए तत्पर हो उपस्थित थे ।


अब दोनों दलों के बीच में वाकयुद्ध शुरू हो गया था जिस कारण वहां बहुत शोर होने लगा था ।

महामंत्री सतपाल को भी सेनापति के सैनिकों ने अपने शस्त्रों के नोक पर बंदी बना लिया था । जिससे पहले तो अपने सहायक शंकु की हत्या और तत्पश्चात सेनापति के आदेश पर उसका कैद होना इन सब बातों से महामंत्री भी स्तब्ध रह गया था । अब तक वह जिसका साथ देता आया था , वही उसके विरुद्ध हो गया था । भय के कारण उसके पैर कांपने लगे थे ,उसे अपनीमृत्यू दिखाई देने लगी थी ।

फिर भी अपने बचने का प्रयास करते हुए

महामंत्री सतपाल - यह क्या है सेनापति जी मैंने सदैव आपकी हर योजना में सहायता की है , आपने जो जो कहा वह सब मैं मैं अब तक करता रहा और आगे भी करता रहूंगा । मुझे कोई राज पाठ नहीं चाहिए , मैं तो बस केवल आपकी शरण में रहना चाहता हूं । कृपया कीजिए मुझ पर , इस प्रकार मुझे दंड का भागी ना बनाएं ।

सेनापति कंक - सतपाल ! तुम दो मुंह वाले सर्प की भांति हो ,जो पलटकर कभी भी डस सकता है ।

तुम जैसे दो मुंह वाले सांप को रखना का अर्थ है अपने लिए संकट अपने निकट रखना तुम महा लालची , कपटी और धूर्त हो कभी भी विश्वासघात कर सकते हो , चिंता मत करो अब तक तुमने मेरी बड़ी सहायता की है इसलिए तुम्हें सबसे आसान मृत्यु मिलेगी ।


इतना कहकर कंक ने उस सैनीक की ओर इशारा किया जो अपनी तलवार की नोक पर महामंत्री को बंदी बनाकर खड़ा था । सेनापति का इशारा पाते ही उस सैनीक की तलवार आकाश तलवार चमकी और एक ही झटके में महामंत्री सतपाल का सिर उसके धड़ से अलग हो गया । उसके सिर कटे धड़ से रक्त का फवारा सा निकलने लगा और धडाम से उसका शरीर नीचे गिर पड़ा ।

महामंत्री की दर्दनाक मृत्यु ने जैसे वहाँ जैसे आग में घी डालने का काम किया । सारी जनता दो भागों में बट चुकी थी महामंत्री की मृत्यु के साथ ही दरबारी ने भी अपने शस्त्र निकाल लिए और सेनापति कंक का इशारा पाते ही राजा कामरान की ओर बढ़ गए ।


विश्वकसेन ने जब उनको कामरान की ओर बढ़ते हुए देखा तो अपने दल के योद्धाओं के साथ आगे आकर उन दरबारियों का मार्ग रोका , अब दोनों में भिड़ंत शुरू हो गई , दोनों तरफ से अस्त्र-शस्त्र टकराने लगे ।
प्रजा का भी वाकयुद्ध अब तक आपसी भिड़ंत में बदल गया था दोनों दल आपस में भिड़ गए थे ।

कामरान एक महा शक्तिशाली और मायावी यक्ष था , कोई भी यक्ष या देवता भी सीधे तौर पर उससे भीडने का साहस नहीं रखते थे , परंतु आज उसका ही सहायक ,
जिसपर उसे पूर्ण विश्वास था आज वही उसके उसके सामने इतना उत्पात मचा रहा था ये वो कैसे देख लेता ।

कामरान - सेनापति कंक तुम क्या समझते हो मेरे सैनीक को अधिकारियों को अपने वश में करके तुम मेरा सामना करोगे कामरान हूं मैं कामरान मेरी शक्तियों के आगे तुम कुछ नहीं कर सकते । ततमपर विश्वास करके मैने जो गलती की है उसे अब तूम्हे अपने हाथो से मारकर मै ही सुधारूंगा , अब अपनी मृत्यु के लिए सज्ज हो जाओ ।

कामरान ने अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाकर अपनी मारक ऊर्जा का आवहन किया । परंतु उसे घोर आश्चर्य हुआ उसके आवाहन करने के पश्चात भी उसके हाथ में मारक शक्ति प्रकट नहीं हुई । बारम्बार प्रयास करने पर भी कामरान विफल रहा । उसे ऐसा लगने लगा जैसे उसकी सारी सिद्धियाँ समाप्त हो गई हो ।

जब उसे कुछ और नही सूझा तो वही एक सैनिक से उसका भाला छिनकर सेनापति पर तीव्रगति से चलाया । कामरान का आन्तरिक बल भले ही समाप्त हो गया हो , परंतु शारिरीक बल बहुत था ।


अपनी तरफ तीव्र गति से आते हुए भाले को देखकर सेनापति कंक तुरंत अपनी जगह से हट गया , जिससे वह भाला कंक के ही साथी सैनिक जो उसके पीछे खड़ा था , उसकी छाती से आर पार होता हुआ भूमि में धँस गया । अपने वार से सेनापति के बचने पर राजा कामरान अत्यंत क्रोधित हुआ ।

जिसे देखकर सेनापति का कंक जोर-जोर से अट्ठाहास करने लगा

सेनापति कंक - हा हा हा हा हा ! तुम चाहे जितने भी प्रयास कर लो कामरान , परंतु अब तुम शक्तिहीन हो , तुम्हारी सारी शक्तियां समाप्त हो गई है ।

अब तुम एक साधारण व्यक्ति के सिवा कुछ नहीं हो । मेरी मृत्यु की इच्छा रखने वाले कामरान अब मरोगे तुम ।

इतना कहकर सेनापति कांकने अपने हाथ में एक ऊर्जा का बड़ा सा गोला बनाया और उसका वार तीव्रगति से कामरान की ओर कर दिया । कामरान को अपनी मृत्यु दिखाई देने लगी उसके पैर मानों धरती से चिपक गए थे । वह चाहकर भी वहाँ से हिल नही पा रहा था ।

वह उर्जा गोला कामरान से टकराता के तभी एक और ऊर्जा किरण उस गोले से टकराई , और एक धमाके के साथ वह गोला समाप्त हो गया । अपने किए हुए प्रहार को नष्ट होता हुआ देखकर सेनापति कंक ने जब किरण की दिशा में देखा तो उसे वहाँ गजेंद्र नजर आया । ऊर्जा किरण चलाकर कामरान के प्राण बचाने वाला गजेंद्र ही था ।

कामरान और सेनापति के मध्य गजेंद्र खड़ा था।

जहां एक ओर यह सब हो रहा था तो वहीं दूसरी ओर विश्वकसेन और दरबारीयों के मध्य बड़ा ही भीषण युद्ध चल रहा था । विश्वकसेन के साथी भी सैनिकों और उन दरबारियो का सामना डटकर कर रहे थे ।

कामरान के दरबार के दरबारी भी कुछ काम नहीं थे , एक एक दरबारी दस-दस यक्षो के बराबर बल रखता था । ऐसे कुल मिलाकर बीस दरबारी थे , जो एक से बढकर एक थे ।

विश्वक सेन और उसके साथियों का पक्ष उन दरबारीयों और सैनीकों के आगे कमजोर पड़ रहा था । जिसे देखकर विरुपाक्ष भी अब अपना खड़क लेकर युद्ध भूमि में उतर आया ।
आठ योद्धाओं ने विश्वकसेन को घेर रखा था । वह सभी एक साथ विश्वकसेन पर प्राण घातक वार करने ही वाले थे , के तभी खड़क लेकर किसी चक्रवात की भांति तेजी से घूमते हुए , विरूपाक्ष उन दरबारियों से टकराया ।

किसी को कुछ भी समझ आने से पूर्व ही दो योद्धा बीच में से कटकर भूमि पर गिर पडे थे ।
कमर से नीचे का भाग अलग पड़ा था और कमर से ऊपर का भाग अलग , जिससे उनकी आंतड़िया और रक्त वहां फैल गया । अपने साथियों की इस प्रकार मृत्यु देखकर बाकी योद्धा भयभीत हो गए , उनकी नजर जब सामने पड़ी तो उन्हें विरुपाक्ष के रूप में खड़क लेकर साक्षात काल के दर्शन हुए ।


विरुपाक्ष के आने से विश्वकसेन को भी सहायता प्राप्त हुई अब दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और अपने शस्त्र लेकर से दरबारीयों पर टूट पड़े । वह योद्धा भी विरूपाक्ष द्वारा उनके साथियों की विभत्स तरीके से हत्या देखकर पहले तो भयभीत हुए थे । परंतु अब वे भी अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर उन दोनों से भिड़ गए ।

वहीं दूसरी ओर गजेंद्र को अपने और राजा के मध्य देखकर सेनापति कंक ,अत्यन्त क्रोधित हुआ ।

सेनापति कंक - यह तुमने अच्छा नहीं किया युवक मेरे और कामरान के मध्य में आकर । तुम इस कामरान के प्राण बचा रहे हो जिसने तुम्हें मृत्युदंड दिया । हट जाओ जो सामने से अन्यथा तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा ।

गजेंद्र - मेरे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा इसका पाठ तुम मुझे ना ही पढाओ सेनापति कंक । ओह , तुम्हें तो सेनापति भी कहना सेनापती पद की गरिमा को धूमिल करना होगा । कंक अभी भी मैं तुम्हें एक अवसर दे रहा हूं अपने सारे अपराध स्वीकार कर लो और शरण आ जाओ , तो शायद तूम्हे जीवन दान मिल जाए ।

कंक - मेरा एक छोटा सा वार रोककर तुम अपने आप को क्या समझने लगे जो मुझे शरण में आने को कह रहे हो ,

इतना कह कर कंक ने गजेंद्र की ओर अपना दाहिना हाथ जोर से झटका और देखते ही देखते हवा में से अनेको भाले तीव्रगति से गजेंद्र की ओर बढ़ने लगे ।

उस वार के प्रत्युत्तर में गजेंद्र ने हवा में हाथ लहरा कर तलवार प्रगट की , वो तलवार तीव्रगति से आगे बढ़ते हुए कंक के द्वारा भेजे गए भांलो को कटने लगी ,परंतु जैसे-जैसे जितने भाले वह कटती , उतना ही और अधिक उनकी संख्या और बढ़ने लगती ।

कई भाले तो गजेंद्र को छूकर भी निकल गए । उन से बचते हुए गजेंद्र ने एक विद्युत पाश का निर्माण किया और उसे कंक द्वारा भेजे गए भालों पर छोड़ दिया ।

देखते-देखते उस विद्युत पाश ने सारे शुलों को एकत्रित करके बांध लिया । उस पाश का दूसरा सिरा गजेंद्र के हाथ में था , जिसे उसने जोरों का झटका देते हुए उन सभी शुलों द्वारा कंक पर प्रहार किया ।

कंक अपनी तरफ आते हुए उन शूलों को रोकने में व्यस्त था के तभी गजेंद्र ने अपने विद्युत पाश में कंक को बांध लिया ।

आज के लिए इतना ही -----
अगला अध्याय शिघ्र ही --------
स्वस्थ रहे ----- प्रसन्न रहे
आपका मित्र ---- अभिनव 🙏🌹🌹
 
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jaggi57

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अध्याय - 21

देखते-देखते उस विद्युत पाश ने सारे शुलों को एकत्रित करके बांध लिया । उस पाश का दूसरा सीरा गजेंद्र के हाथ में था , जिसे उसने जोरों का झटका देते हुए उन सभी शुलों द्वारा कंक पर प्रहार किया ।
कंक अपनी तरफ आते हुए उन शूलों को रोकने में व्यस्त था के यह तभी गजेंद्र ने अपने विद्युत पाश में कंक को बांध लिया

अब आगे ----------


गजेंद्र के विद्युत पाश में बंधा हुआ कंक घुटने टेक कर भूमि पर बैठ गया था । कंक को अपने पाश में बंधा हुआ देखकर गजेंद्र उसे पकडने आगे बढा ही था के , कंक के शरीर से वह विद्युत पाश अदृश्य होने लगा , जिसे देखकर गजेंद्र को भी कंक की शक्ति का आभास हो गया ।

एक दहाड़ मार कर गरजता हुआ कंक फिर से खड़ा हो गया । इस समय उसकी आंखें लाल रोशनी से चमक रही थी । अपने लाल नेत्रों से गजेन्द्र को घूरते हुए , उसने ताबड़तोड़ अग्नि तत्व का प्रयोग करते हुए , कई अग्नि पिंडो का प्रहार गजेंद्र पर किया ।

सैकड़ो अग्नि पिंड एक साथ अपनी तरफ आते हुए देखकर गजेंद्र ने भी जल तत्व का प्रयोग करते हुए उन अग्नि पिंडों को रोकना शुरू किया ।

गजेंद्र जल तत्व का प्रयोग कर ही रहा था कि तभी कंक ने गजेन्द्र पर एक जोरदार विद्युत ऊर्जा का प्रहार किया , जल तत्व के कारण , विद्युत ऊर्जा के टकराने से एक विस्फोट हुआ जिससे गजेंद्र कुछ दूर जाकर गिरा ।


गजेन्द्र को इस प्रकार भूमि पर गिरा हुआ देखकर कंक -

कंक - हा हा हा हा , मैंने कहा था ना युवक तुम मेरा सामना नहीं कर सकते , लो अब संभालो मेरा अगला वार ।


इतना कहते ही कंक के हाथ से लेजर बीम जैसी तेज किरने निकली जो इतनी तीव्र थी के एक पल में ही सब भस्म कर दे । गजेंद्र तुरंत हवा में कलाबाजिया खाता हुआ उस स्थान से हट गया । जिस जगह वह किरण टकराई विस्फोट के साथ वहां गहरा गड्ढा हो गया ।

कंक अभी अपना अगला वार कर पता कि उसके पहले ही गजेंद्र हवा में उछला और अपने पैरों का एक जोरदार प्रहार कंक के सीने पर किया , जिसके प्रभाव से कंक बड़ी दूर जाकर गिरा । प्रहार इतना जोरदार था के उसके मुख से रक्त निकलने लगा ।

कंक उठने का प्रयास कर ही रहा था कि गजेंद्र तुरंत उसके ऊपर पहुंच कर उसके चेहरे पर मुक्कों की मानो बरसात कर दी जिससे उसके नाक टूट गया , होंठ फट गए उसका पूरा चेहरा रक्त रंजीत हो गया था ।

परंतु कंक भी कुछ कम नहीं था उसने अपनी पूरी शक्ति लगाकर , गजेंद्र को धक्का देकर अपने ऊपर से हटाया , मुख में आ रहे रक्त को थूंकते हुए वह लड़खड़ाते कदमों के साथ उठ खड़ा हुआ ।

जहां एक तरफ कंक की हालत बड़ी बुरी हो गई थी , तो वही दूसरी ओर उसके सहयोगियों पर भी विश्वकसेन के दल के लोग और विरुपाक्ष के पक्ष के लोग भारी पड़ने लगे थे ।

विरुपाक्ष , गजेंद्र और विश्वकसेन को अपने पक्ष में युद्ध करते हुए देखकर कामरान को भी अब अपने किये पर पश्चाताप होने लगा था । कुछ सैनिकों ने जब कामरान को विचारों में निमग्न देखा तो अच्छा मौका जानकर कामरान को घेर लिया । क्यों कि कि वह जानते थे के यदी राजा को वश मे किया जाए तो युद्ध जीतना सरल हो जाएगा ।
इसी आशय के साथ वो कामरान को घेरकर आगे बढे ।

कामरान की आंतरिक ऊर्जा तथा कोई भी शक्ति भले ही कार्य नहीं कर रही थी , परंतु उसमे शारिरीक बल बहुत अधिक था अपने आप को सैनिकों द्वारा घिरा हुआ देखकर वह भी निहत्था ही उनसे भिड़ गया ।

कामरान का हाथ जहां भी सैनिकों पर पड़ता हड्डियों का चूरा हो जाता । वह किसी खिलौने की भांति उन सैनिकों को उठा - उठाकर जमीन पर पटकने लगा और अपने पैरों से उनकों रौंदने लगा ।

जिसे देखकर अब सैनिकों ने कामरान पर दूरी बनाकर अपनी ऊर्जा के वार करना शुरू कर दिये , क्योकि उसके निकट जाना अर्थात स्वयं मृत्यु के मुख मे जाना ।


सैनिकों की ऊर्जा प्रहारों का प्रभाव कामरान पर ज्यादा तो नहीं पडा , परंतु शरीर पर छोटे-छोटे कई जगह घांव दे गए थे । परंतु कामरान भी पीछे नहीं हटाने वाला था , जो भी सैनिक उसके मजबूत पंजे में आता वह सीधा नरक सिधार जाता ।

वहीं दूसरी ओर कंक अपनी पूरी शक्ति लगाकर उठ खड़ा हुआ ही था के गजेंद्र ने उसे फिर से उठाकर पटकने के लिए पकड़ लिया । तो उसने तुरंत अपने हाथ गजेंद्र के आगे जोड़ दिए और घुटनों के बल भूमि पर बैठकर -----

कंक - क्षमा कर दीजिए मुझे ! हे महावीर ! क्षमा कर दीजिए ! मै अब आपका और सामना नहीं कर सकता मैं अपनी हार मानता हूं , कृपया मुझे अपनी शरण में ले लीजिए , मैं अपने किए के लिए दंड भुगतने के लिए तैयार हूं ।


इस प्रकार हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए और घुटने टेक कर याचना करते हुए जब गजेंद्र ने कंक को देखा तो उसे उसकी नीयत पर थोड़ा संदेह हुआ ।

परंतु शास्त्र मर्यादा कहती है के शरणागत की रक्षा करना योद्धा का धर्म है । इसलिए वह कंक के आगे शांत खड़ा रहा , जिसे देखकर कंक दोनों हाथ जोड़कर उसकी ओर बढा , उसके चरणों में प्रणाम करने के लिए झुका ।

अपने चरणों में प्रणाम करते हुए कंक को देखकर गजेंद्र उसको उठाने के लिए नीचे झुका ही था के कंक ने अपने कमर में छुपा हुआ खंजर निकालकर गजेंद्र के सीने पर प्रहार किया ।

परंतु गजेंद्र जानता था एक अंक महा धुर्त हैं इसलिए वह सजग था , इससे पहले के वो खंजर उसके सीने को चीरता उसने कंक के हाथ को जोरदार झटका दिया और धोबी पछाड देते हुए भूमि पर पटक दिया ।

परंतु इस सब में वह खंजर कंक से के हाथ से छूटकर थोड़ी ही दूर पर सैनिकों से लड़ रहे कामरान के पेट में जाकर धंस गया । कामरान पहले ही सैनिकों के ऊर्जा प्रहारों से और बहुत अधिक बल का प्रयोग करने से बहुत थक चुका था और घायल भी हो गया था । वही खंजर पेट में धंसने से वह भूमि पर गिर पड़ा , उस खंजर पर लगे हुए द्रव्य के कारण उसके सारे शरीर में भयंकर पीड़ा होने लगी जिसके कारण वह तड़पता हुआ चिखता चिल्लाता हुआ मूर्छित हो गया ।

गजेंद्र कंक को अब और अवसर नहीं देना चाहता था इसलिए उसने पृथ्वी तत्व की ऊर्जा का प्रयोग किया । उसके भूमि पर हाथ रखते हैं भूमि से निकली काँटेदार बेलें निकालकर कंक को जकड़ने लगी । देखते ही देखते कंक अब पूरी तरह से उन बेलों की कैद में था । उन बेलों के नुकीले काटे उसके शरीर में धंस , भयंकर पीडा से वह तडपने लगा । उन बेलों से मुक्त होने का प्रयास करने लगा ।

गजेंद्र - मुझे पता था कि तुम जैसा धूर्त विश्वास के योग्य नहीं है , अब तुम्हारे सारे दाँव समाप्त हो गये है । कर लो जितने प्रयास करने है ।

जैसे-जैसे बेलों से छूटने का प्रयास करता वह पहले से और अधिक उसके शरीर पर कस जाती ।

एक यक्ष होने के साथ-साथ वह काली शक्तियों का भी उपासक था उन बेलों में बंधे-बंधे ही , उसने काली शक्तियों का आव्हान किया ।
अपनी सारी तामसिक शक्तियों की ऊर्जा को अपने हाथ में एकत्रित करने लगा , गहरे नीले रंग के प्रकाश से बना हुआ वह ऊर्जा गोला जैसे ही प्रकट हुआ चारों तरफ तेज बर्फीली हवाएं चलने लगी , आकाश में घने काले बादल छा गये जिस कारण असमय ही अंधेरा छाने लगा । अनेक प्रकार की भीषण ध्वनीयाँ वहां गुंजने लगी ।


उस ऊर्जा का वार करने से पूर्व ही उसका इस प्रकार का प्रभाव देखकर गजेंद्र ने उसे नष्ट करने के लिए , प्रकाश किरणो का प्रहार किया परंतु वह तामसिक ऊर्जा पर कोई प्रभाव ना डाल सका ।

उस ऊर्जा के प्रभाव से कंक के सभी सहायकों के भीतर तामसिक ऊर्जा का संचार हो गया और वह पहले से और अधिक शक्तिशाली हो गए , जिस कारण विश्वकसेन और विरुपाक्ष सहित उनके दल के सारे योद्धा कमजोर पड़ने लगे ।


विरुपाक्ष और विश्वकसेन 6 योद्धाओं के साथ लड़ रहे थे । उन में से दो को उन्होंने और समाप्त कर दिया था । अब चार बचे हुए योद्धायों मे से सामने आते हुए दो योद्धाओं का छलांग लगाकर विरुपाक्ष ने दोनों की गर्दन दबोच ली और भूमी पर पटक दिया ।

एक-एक करके अपने दोनों घुटने हम दोनों के सीने पर दबाकर अपने मजबूत पंजों से उन दोनो का गला दबाने लगा । वो दोनो अपने प्राण बचाने के लिए छटपटाने लगे , उनकी सांसे उखड़ने लगी थी । किसी भि क्षण वो दोनो अपने प्राण त्यागने वाले थे ।

विश्वकसेन ने भी दो योद्धाओं की गर्दन को अपने कांख में दबाकर जकड़ लिया था ।

यह पल वही था जब कंक ने तामसिक शक्ति की ऊर्जा को प्रकट किया था । उस ऊर्जा के प्रभाव से विरूपाक्ष के नीचे दबे हुए दो योद्धा और विश्वकसेन की कांख में दबे दो योद्धाओं के अंदर उर्जा का संचार हुआ । जिस कारण जहां विरुपाक्ष के नीचे दबे पड़े दो योद्धायों ने तुरंत नेत्र खोले विरूपाक्ष को एक जबरदस्त धक्का देकर उठ से खडे हो गये ।

अभी विरुपाक्ष उन्हे आश्चर्य से देख ही रहा था कि उन दोनों ने उसे उठाकर जमीन पर जोर से पटक दिया , जिसके कारण उसे असहनीय पीड़ा होने लगी तो वहीं दूसरी ओर विश्वाकसेन का भी यही हाल था उसके साथ भिड़े हुए दोनों योद्धाओं ने उसे जमीन पर अपने पैरों के नीचे दबा रखा था ।

गजेंद्र ने अग्नि , वायु और शस्त्रो का प्रयोग करते हुए अनेक प्रहार किये , परंतु उस तामसिक ऊर्जा के सामने कोई भी प्रहार नहीं टिक पाया । उस उर्जा ने कंक के चारों तरफ एक कवच सा बना दिया था , जिस कारण गजेंद्र का कोई भी वार उस तक पहुंच नहीं पा रहा था ।

उस उर्जा के प्रभाव से वह अब बेलों के बंधन से भी मुक्त हो गया था । परंतु बहुत अधिक रक्त बहने के कारण और अपनी सम्पूर्ण उर्जा प्रयोग करने के किरण वह अपनी मृत्यु के समीप था और ये उसे ज्ञात भी था के इस वार के पश्चात उसका जीवित रहना असम्भव है । अपनी मृत्यु के बारे मे पता होने पर भी वह तनीक भी भयभीत नही था ।

कंक जैसे अपराधी प्रवृति के लोग ऐसे ही होते हैं , यदि वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के साधनों को न प्राप्त कर पाए , तो सब कुछ नष्ट करने पर उतारू हो जाते हैं चाहे उसमें उनके प्राण ही क्यों ना चले जाए ।


गजेंद्र के सारे प्रयासों को असफल होता हुआ देखकर ---
कंक - तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ है युवक ! अब यहां मृत्यु का तांडव होगा तांडव । यह नगर यहां का और यहाँ का प्रत्येक जीव कोई भी नहीं बचेगा , सब के सब मारे जाएंगे । यदि यह मेरा ना हुआ तो मैं इसका अस्तित्व ही समाप्त कर दूंगा ।

गजेंद्र चाहता तो एक पल में शिव द्वारा प्रदत्त शूल द्वारा कंक का वध कर सकता था , परंतु भगवान शिव ने इसका प्रयोग केवल उस समय करने को कहा जब और कोई मार्ग शेष ना हो ।
उस शूल का दो प्रकार से प्रयोग हो सकता था एक तो वह सारी तामसिक ऊर्जा को अपने भीतर में सोख सकता था परंतु ऐसा करने से वह शूल भी दूषित हो जाता । दूसरा कंक का वध परंतु ध्यान मे देखे गये दृश्य के कारण उसे किसी की प्रतीक्षा थी जो अब पुरी होने वाली थी ।

उसी समय आकाश में भयंकर गर्जना करते हुए बिजली कड़की और भयंकर काले मेघ वहाँ से छटने लगे । वहां छाया अंधेरा हटने लगा , और चारों ओर प्रकाश फैलने लगा । बर्फीली हवाएं भी चलानी बंद हो गई ।
तभी एक स्वर सुनाई दिया ----- पिताश्री ऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ


यह स्वर था राजकुमारी अमृता का , जो मंदिर में बैठकर साधनारत थी , वह और कोई नहीं राजकुमारी अमृता ही थी । बाहर हो रहे शोर और विस्फोट के कारण उसका ध्यान टूट गया । जब वह उसने बाहर आकर देखा तो वहां एक घमासान छिड़ा हुआ था ।

उस घमासान को देखकर उसका मन व्याकुल होने लगा जैसे उसके किसी अपने पर प्राणों का संकट बन आया हो ।


राजकुमारी अमृता तीव्र गति से बली मंडप की ओर बढी जहां एक युद्ध सा चल रहा था जैसे ही उसने वहां प्रवेश किया उसके तेज से तामसिक शक्तियां कमजोर पड़ने लगी जब उसने दूर से ही अपने पिता को घायल अवस्था में भूमि पर पड़े हुए देखा तो वह अपने पिता को पुकारती हुई दौडी , उसको अपने पिता के सिवा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था ।

भागते हुए अमृता रास्ते में खड़े गजेंद्र से टकराई , टकराव के कारण दोनों भूमि पर गिरने ही वाले थे परंतु गजेंद्र ने संयम रखते हुए अपने आप को संभाल अमृता को गिरने से बचा लिया और अनजाने मे ही अमृता को अपनी बाहों में जकड़ लिया ।

जैसे ही अमृता का स्पर्श हुआ गजेंद्र की भीतर की ऊर्जा सक्रिय होने लगी , उसे अपने भीतर एक नई ऊर्जा का आभास होने लगा । क्षणभर के लिए जैसे समय थम गया हो , गजेंद्र अपलक उसके अश्रुपूरित नेत्रों में देखे जा रहा था यही वह चेहरा , यही वह रूप था जो उसे ध्यान में दिखाई दिया था और जिसकी प्रतिक्षा वह कर रहा था , उसकी प्रतीक्षा अब पूर्ण हुई थी ।
वही अमृता विपरीत परिस्थिति में होते हुए भी उसका मन न जाने क्यों इस अंजाने युवक के प्रति आकर्षित हो रहा था ।

परंतु शीघ्र ही उसे इस समय की परिस्थिति का भान हुआ , इस समय उसकी प्राथमिकता उसके पिता थे अपने मन में आ रहे विचारों को हटाकर वह गजेंद्र को धक्का देकर अपने से छुड़ाते हुए अपने पिता की ओर बढ़ गई ।
भूमि पर पड़े हुए अपने पिता को देखकर उसका हृदय भय से कांपने लगा । तुरंत नीचे बैठकर अपने पिता को पुकारती हुई राजकुमारी अमृता अपने पिता कामरान को उठाने का प्रयत्न करने लगी ।


पहले ही उसने अपने परिवार को खो दिया था , अब अपने पिता को नहीं खोना चाहती थी । उसने अपने कांपते हुए हाथों द्वारा अपने पिता के हृदय गति का परीक्षण किया , कामरान की हृदय गति चल रही थी परंतु बहुत ही धीमी गति से ।

अमृता के मन में अपने पिता को बचाने की आशा जगी , उसने अपनी भावनाओं को नियंत्रित करके सर्वप्रथम कामरान के पेट में धंसा हुए खंजर को निकाला और अपनी चुनरी से रक्त रोकने का प्रयास करते हुए पेट पर बांध दिया ।

तत्पश्चात् कामरान का सर अपनी गोदी में लेकर अपने हाथों का स्पर्श उसके मस्तक पर करके जीवनदायनी ऊर्जा का प्रयोग करके अपने पिता को होश में लाने का प्रयत्न करने लगी ।

गजेंद्र को ध्यान के द्वारा युद्ध भूमि का यह दृश्य पहले ही दिखाई दे गया था । इसलिए वह अमृता के बारे में भी जान चुका था । उसकी प्रतीक्षा अब पूर्ण हो गई थी ।

अब और ज्यादा विलम्ब ना करते हुए गजेंद्र ने सात्विक ऊर्जा को एक ऊर्जा पिंड में परिवर्तित करना शुरू कर दिया था । वहीं दूसरी ओर कंक तामसिक ऊर्जा के प्रभाव को कम होता हुआ देखकर हथप्रभ हो गया था जितनी ऊर्जा उसके हाथ में अभी बची थी , उसने उसी का प्रहार गजेंद्र की ओर कर दिया ।


गजेंद्र ने भी सातवींक उर्जा पिंड का प्रहार उस दिशा में कर दिया । जब दोनों ऊर्जा पिंड आपस में टकराये तो भयंकर विस्फोट हुआ और तामसिक ऊर्जा समाप्त हो गई । तामसीक उर्जा के समाप्त होते ही कंक भूमि पर मूर्छित होकर गिर पड़ा ।

कंक के सभी साथियों का बलहीन हो गये थे । जिस कारण विरूपाक्ष और विश्वकसेन जो योद्धाओ की पकड मे थे वे छूट गये और उन दोनो ने दो दो करके उनका सिर झटके से घुमा करके समाप्त कर दिया ।

कंक के बचे हुए साथियों ने जब उसे धराशायी होते हुए देखा तो वे वहा से भागने लगे , जिन्हे विश्वकसेन और उसके साथियो ने पकड लिया ।

विरुपाक्ष का ध्यान अब कामरान की ओर गया तो उसने देखा की राजकुमारी अमृता कामरान को होश में लाने का प्रयास कर रही है
जब उसने राजकुमारी अमृत के प्राण बचाए थे तभी उसने अमृता को अपनी पुत्री के रूप मे ही ही माना था , अमृता का बचपन विरुपाक्ष की गोद में ही ज्यादा बीता था ।

स्थिति के समझते हुए वह तूरंत वहा पहुँचा विरूपाक्ष को अपने समीप देखकर उसका दुख जो उसने दबाकर रखा था वो फूट पडा ,
अमृता - काकाश्री देखो ना ये क्या हो गया मेरे बाबा को ।

इतना कहकर वो फूट फूटकर रोने लगी । उसे यूँ रोता हुआ देखकर विरूपाक्ष उसके सर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए

विरूपाक्ष - शांत हो जाओ पुत्री ! शांत हो जाओ ! कुछ नहीं होगा तुम्हारे पिता को तुम्हारा प्रेम तुम्हारे पिता की रक्षा करेगा ।

तभी कामरान के शरीर मे भी कुछ हलचल हुई जीवनदायी उर्जा के कारण उसकी हृदय गती ठीक हो गई थी । और उसने अपने नेत्र खोल दिये , नेत्र खोलते ही अपनी लाडली पुत्री पर दृष्टी पडते ही उसके नेत्रो से अविरल अश्रुधारा बहने लगी । उसने प्रेम से अपनी लाडली के अश्रु पोंछने के लिए हाथ बढाया ही था कि वो हाथ अमृता के गालों तक पहुंच कर नीचे गिर गया । खंजर मे लगे विष के प्रभाव के कारण सारा शरीर निष्क्रिय सा हो गया था ।

अपने पिता को होश मे आया हुआ देखकर और अपनी तरफ देखते हुए पाकर अमृता पिताश्री ---- पिताश्री --- कहते हुए अपने अपने पिता के नेत्रों से बहते हुए अश्रुओं को साफ करने लगी और ईश्वर को धन्यवाद देने लगी ।

उसी समय गजेंद्र राजवैद्य को जो बली स्थान के पीछे छुपा हुआ था , पकड़कर वहां ले आया , एक बार फिर अमृता से नजरें मिली । गजेंद्र को देखकर अमृता के मन में कई प्रश्न उत्पन्न हुए के यह युवक कौन है ? क्या यह वही है जो बहुत दिनों से उसे ध्यान में दिखाई दे रहा था ? और यदि यह वही है तो किस कारण हैं ? इतना भयंकर संग्राम किस कारण हुआ ? आदि

परंतु अभी उसकी प्राथमिकता उसके पिता का उपचार था । राजवैद्य ने कामरान की नाडी का परीक्षण किया और शरीर में विष फैलने के बारे में बताया ।


कामरान के उपचार के लिए राजवैद्य को लेकर सभी शीघ्र राजमहल पहुंचे । कंक और उसके साथियों को भी बेडियो में जकड़ कर कारागृह में डाल दिया गया ।

आज के लिए इतना ही ------
अगला अध्याय शिघ्र ही -------

सभी पाठकों से अनुरोध है कि इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें ।

स्वस्थ रहे ----- प्रसन्न रहे
आपका मित्र ---- अभिनव

धन्यवाद 🙏🌹🌹
 
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अध्याय - 22

परंतु अभी उसकी प्राथमिकता उसके पिता का उपचार था । राजवैद्य ने कामरान की नाडी का परीक्षण किया और शरीर में विश्व फैलने के बारे में बताया ।
कामरान के उपचार के लिए राजवैद्य को लेकर सभी शीघ्र राजमहल पहुंचे । कंक और उसके साथियों को भी बेडियो में जकड़ कर कारागृह में डाल दिया गया ।

अब आगे -------


कामरान का उपचार दो दिनों से चल रहा था , राज वैद्य अपनी सारी विद्या का उपयोग करके कामरान को स्वस्थ करने का प्रार्थना कर रहे थे , क्योंकि कंक द्वारा रचे गये षडयंत्र मे वह भी सहभागी था , एक तरफ तो ग्लानि तो दूसरी ओर मृत्यु दंड का भय । विरूपाक्ष भी रजवैद्य पर अपनी कडी नजर बनाए हुए था ।

इन दो दिनों में विरुपाक्ष द्वारा राजकुमारी अमृता को सब कुछ ज्ञात हुआ और साथ ही साथ यह भी के किस प्रकार सारे षड्यंत्र को उजागर करने में गजेंद्र ने सहायता की हैं ।
जिस प्रकार ध्यान में गजेंद्र को राजकुमारी अमृता की छवि दिखाई दी थी । उसी प्रकार कई दिनों से राजकुमारी अमृता को भी गजेंद्र की छवि दिखाई दे रही थी ।

युद्ध भूमि में जब वह गजेंद्र से टकराई थी , उस समय अपने पिता की चिंता के कारण वह उसे सही तरह से देख नहीं पाई थी ।
परंतु जब दोनो के नेत्र मिले थे तब से ही एक प्रकार का आकर्षण का उसे
आभास हो रहा था ।

कामरान के जीवन पर छाया संकट समाप्त हुआ और उसका उपचार शुरू हुआ । उस समय गजेंद्र भी उसी कक्ष में था ।

उसने ध्यान से देखा कि यह युवक कौन हैं , तब वह पहचान गई के यह युवक वही है , जिसे वह कई दिन से स्वप्न में तथा ध्यान में देख रही थी ।

उसका मन गजेंद्र की ओर आकर्षित हो रहा था , उसकी नज़रें सदैव गजेन्द्र को ढूंढती रहती । गजेंद्र की ओर देखते ही हृदय गति तीव्र हो जाती थी । यह सब क्यों हो रहा है , वह अब भी इस बात को समझ नहीं पा रही थी । बारंबार उसके मन में केवल गजेंद्र को देखने की इच्छा प्रकट होने लगी थी ।

यहां जो भाव कुमारी अमृत के मन में चल रहे थे वही भावनाएं गजेंद्र के मन में भी उत्पन्न होने लगी थी । दोनों और प्रेम का अंकुर फूट चुका था ।
और जब से विरुपाक्ष से उसने यह सुना था किस प्रकार गजेंद्र ने इस नगर में चल रहे षड्यंत्र को समाप्त करने की योजना बनाई तो उसके मन में गजेंद्र के प्रति आदर भाव भी बढ़ गया । राजकुमारी के आग्रह करने पर
गजेंद्र की भी व्यवस्था महल में ही एक कक्ष में कर दी गई थी ।

इन दो दिनों में अपने पिता की देखभाल के साथ-साथ राजकुमारी अमृता गजेंद्र के
भी कक्षा में भोजन देने जाया करती थी , जिस कारण अब दोनों में थोड़ी बहुत बात चीत भी शुरू हो गयी थी ।

कंक और उसके साथियों को कारागृह में कड़ी सुरक्षा में रखा गया था ।

दो दिनों के पश्चात प्रातः काल जब सभी कक्षा में उपस्थित थे , उसी समय कामरान ने अपने नेत्र खोले राजवैद्य ने नाडी परीक्षण करते हुए घोषणा की के महाराज अब बिल्कुल स्वस्थ है उनके शरीर से सारा विष निकाल दिया गया है । एक-दो दिन में यह पूर्ण रूप से अपनी शक्ति को प्राप्त कर लेंगे ।

अपने पिता को होश में आया हुआ देखकर और स्वस्थ का समाचार सुनकर राजकुमारी अमृता अत्यंत प्रसन्न हो गई , और अपने पिता को पुकारती हुई कामरान के गले लग गई , कामरान ने भी स्नेह से अपनी पुत्री के सिर पर हाथ फेरते हुए कहाँ ।

कामरान - रो मत पुत्री ! रो मत ! मैं तुम्हारे अश्रु नहीं देख सकता , तुम्हें पता है , देखो अब मैं बिल्कुल स्वस्थ हूं । और अमृता के अश्रु पोंछते हुए मेरी पुत्री के नेत्रों में अश्रु नहीं प्रसन्नता ही अच्छी लगती है ।

कामरान स्वयं तो अपनी पुत्री के अश्रु पोंछ रहा था , परंतु उसके स्वयं के नेत्र से भी अश्रु धारा बह रही थी ।
जिसे देखकर राजकुमार अमृता अपने पिता के अश्रु पोंछते हुए ।

राजकुमारी अमृता - यह क्या पिता श्री ! आप तो स्वयं रो रहे हो और मुझे चुप करा रहे हो । जिस प्रकार मेरे नेत्रों में अश्रु शोभा नहीं देते , उसी प्रकार आपको भी रोना शोभा नहीं देता ।
पता है मैं कितनी भयभीत हो गई थी , जब मैंने आपको भूमि पर उस अवस्था में पड़े हुए देखा । ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद जो उन्होंने मेरी मेरी प्रार्थना सुन ली और आप स्वस्थ हो गए ।

अपने निकट खड़े विरुपाक्ष पर जब कामरान की दृष्टि पड़ी , तो उसकी ओर देखकर दोनों हाथ जोड़कर कामरान उठने का प्रयत्न करने लगा ।

यह देखकर विरूपाक्ष ने दौड़कर कामरान को सहारा देकर फिर से बिस्तर पर लिटा दिया ।

विरुपाक्ष - अरे !अरे ! महाराज ! यह क्या कर रहे हो आप । मेरे जैसे एक छोटे से सेवक के सम्मुख आप इस प्रकार हाथ क्यों जोड़ रहे हो , ऐसा करना आपको शोभा नहीं देता महाराज ।

कामरान - ऐसा मत कहो मेरे भाई ! मुझे क्षमा कर दो ! मैने तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं किया तुमने सदैव एक छोटे भाई बनकर मेरी सहायता की है , तथा मेरी और मेरी पुत्री की रक्षा की है ।
यह राज्य भी तूम्हारे द्वारा कुबेर जी की प्रार्थना करने के कारण ही प्राप्त हुआ है । तुम्हारे उपकार को भूलकर केवल उसे देखा जो मुझे उन षडयंत्रकारीयो द्वारा दिखाया गया ।
तुम्हारे संपूर्ण उपकारों को भूलकर मैंने उन पर विश्वास करके तुम्हें दंड दिया और तुम्हारा अपमान किया , फिर भी तुमने अपने मुख से एक शब्द भी मेरी विरुद्ध नहीं कहा ,
चुपचाप राज्य की सेवा करते रहे । मैं निरंतर तुम्हें भरे दरबार में कई बार अपमानित करता रहा , परंतु तुम चुपचाप सहते रहे , क्षमा कर दो मेरे मित्र ! मेरे भाई ।

विरुपाक्ष - महाराज इस प्रकार आप क्षमा मत मांगिये । मैनै सदैव आपको अपने बड़े भाई के रूप में ही देखा है और राजकुमारी अमृता को अपनी पुत्री के रूप में ।
आपको अपनी भूल का एहसास हो गया मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है , आप इस प्रकार मेरे सामने हाथ जोड़कर मुझे लज्जित ना कीजिए ।

गजेंद्र - थोड़ी दूरी पर खड़े रहकर यह सब देख रहा था और सोच रहा था की मन की भावनाएं व्यक्ति को कितना नचाती हैं । यदि जीवन में सफल होना है इस मन को वश में रखना होगा यदि मन वश में होगा तभी सही और गलत का निर्णय करने में विवेक सक्षम होगा और भविष्य में इस प्रकार की परिस्थिति जीवन में कभी नहीं आएगी ।

कामरान - क्षमा तो मुझे तुम्हारे इस मित्र से भी मांगनी है जिसे मैंने बिना जाने ही मृत्यु दंड की सजा सुना दी थी । परंतु फिर भी उसी ने मेरी रक्षा की ।
( फिर गजेंद्र कि ओर देखकर दोनों हाथ जोड़कर )
मुझे क्षमा कर दो युवक ! मैंने तुम्हें दंड दिया और तुमने मेरे राज्य के षड्यंत्रकारी द्वारा रक्षा की उसके लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद ।

कामरान के ऐसा कहने पर गजेंद्र आगे आता हुआ कामरान के निकट पहुंचकर --

गजेंद्र - क्षमा मांगने की कोई आवश्यकता नहीं महाराज ! बस आगे से आप इतना ध्यान रखिए के न्याय केवल एक पक्ष का सुनकर नहीं होता , दोनों पक्षों को और साक्षी को भली भांति परख कर और स्थिति समझकर किया जाता है । आप राजा है आपके ऊपर इस संपूर्ण राज्य की जिम्मेदारी है , आपको इतना ध्यान रखना चाहिए यदि कोई बिना कारण आपकी चापलूसी करता है और आपको भोग विलास की ओर लगता है तो वह सर्वथा आपका मित्र नहीं हो सकता।

कामरान - तुम उचित कह रहे हो युवक! मैं अब आगे से इस बात का अवश्य ध्यान रखूंगा । परंतु अब तक आपने अपना परिचय नहीं दिया है । यदि आपको कोई आपत्ती ना हो तो कृपया आप अपने बारे में बताइए ।

कामरान के इस प्रकार नम्रता पूर्वक पूछने पर गजेंद्र ने अपनी उत्पत्ति और साथ में अपने लक्ष्य के बारे में सब कुछ बता दिया ।
साक्षात महादेव तथा संपूर्ण देवताओं की तपो ऊर्जा तथा प्रकृति संयोग से गजेंद्र की उत्पत्ति सुनकर सभी के मस्तक अपने आप गजेंद्र के प्रति श्रद्धा भाव से झुक गए ।

अनलासुर के अंत के लिए गजेंद्र की उत्पत्ति की बात सुनकर कामरान , विरुपाक्ष तथा राजकुमारी अमृता अत्यधिक प्रसन्न हुई क्योंकि वह अनलासुर ही था जिसने उनके परिवार को समाप्त किया था ।

कामरान - हमें क्षमा कर दीजिए गजेंद्र जी ! अनजाने में हमसे आपके प्रति जो धृष्टता हुई है उसके लिए । आप जैसे दिव्य पुरुष का हमारे नगर में आना हमारे लिए अत्यन्त गौरव की बात है , हम भी आपके लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए आपका संपूर्ण साथ देंगे ।

जितना दोषी अनलासुर है उतने ही दोषी हम भी हैं । हम ने हीं उसका पूर्व में साथ दिया था , अब प्रायश्चित के तौर पर भी हम उसके अंत के लिए आपका हर प्रकार से सहयोग करने के लिए तत्पर है ।

गजेंद्र - बहुत-बहुत धन्यवाद महाराज ! मुझे प्रसन्नता हुई यह देखकर के आपको अपने किए हुए अपराधों का बोध है तथा आप उसके प्रायश्चित के लिए तत्पर है ।
( फिर राजकुमारी अमृत की ओर देखते हुए ) मुझे लगता है के आपकी सहायता के बिना मै अपने लक्ष तक न पहुँच पाऊँगा , इसलिए , आपसे मुझे जो सहायता चाहिए वो मै आवश्य माँगूगा ।

राजकुमारी अमृता गजेंद्र की बात का अर्थ समझ चुकी थी इसलिए लज्जावाश उसका चेहरा एकदम लाल हो गया था । शर्म के मारे उसकी पालकें नीचे झुक गई थी , उसका हृदय तीव्र गति से धड़कने लगा था ।

कामरान - मुझे बहुत प्रसन्नता होगी गजेंद्र जी ! आदेश दिजीए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ ।

गजेंद्र - महाराज अनलासुर का सामना करने से पूर्व , मुझे कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करना है । इस नगर में आकर मुझे लगता है कि मेरी एक लक्ष्य की खोज यहाँ पूरी हो गई है । आपसके पास कुछ ऐसा है जिसे प्राप्त कर मै पूर्णता को प्राप्त हो जाऊंगा ।
सो तो मै आपसे आवश्य माँगुगा ।
अभी मुझे अपने अगले लक्ष्य की ओर जाना है । लक्ष्य को प्राप्त करने के पश्चात मैं फिर से वापसी में आपके इस नगरी मे आऊंगा , और उसे बारे में आपसे वार्ता करूंगा ।

गजेंद्र की पहली बात सुनकर राजकुमारी अमृता अती प्रसन्न हो गई , लज्जावश सर झुका कर ही मुस्कुराते हुए अपनी चुनरी को अपनी उंगलियों में फंसा कर घूमने लगी ।
परंतु जब उसने गजेन्द्र से जाने की बात सुनी तो उसके शरीर की हलचल एकदम से रुक गई । चेहरे पर उदासी के भाव आ गए तथा नेत्रों में अश्रु आ गए । अमृता के इन सब भावों को विरूपाक्ष खड़े-खड़े सब देख रहा था और परख रहा था

गजेंद्र और राजकुमारी के मध्य नेत्र ही नेत्रों में जो बातें हो रही थी तथा राजकुमारी अमृत के चेहरे के बदलते भावों को देखकर विरुपाक्ष सब समझ गया था ।

कामरान - मैं अभी भी नहीं समझा मेरा पास ऐसा क्या है जिसे आपका लक्ष्य पूर्ण हो सके कृपया स्पष्ट रूप से कहिए ।

विरुपाक्ष - मैं समझ गया महाराज यह किस विषय में बात कर रहे हैं ! अब आप उत्सव की तैयारिया शुरू करवा दिजिए । क्यों बेटा अमृता ! क्यों मित्र ! मैं सही कह रहा हूं ना ?

कामरान - विरुपाक्ष अब तुम भी पहेलियां में बात कर रहे हो यदि और कैसा उत्सव , तुम समझ ही चुके हो तुम मुझे भी समझा दो ।

विरुपाक्ष - महाराज आप अभी भी नहीं समझे ? मेरा मित्र गजेंद्र राजकुमारी अमृत के वाषय में बात कर रहे हैं ।
ये दो लक्ष्य प्राप्त करने के लिए यात्रा में निकले हैं , एक जीवन संगिनी और दूसरा वहान । इन्होने यह कहा कि उनकी एक खोज यहां पर आकर पूरी हो गई । वहान तो यहां इन्हें प्राप्त नहीं , हुआ परंतु अमृता को देखकर लगता है इन्हें अपने जीवन संगिनी आवश्य प्राप्त हो गई और जहां तक मैं देख रहा हूं राजकुमारी अमृता को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं है । क्यों बेटा अमृता में सही कह रहा हूं ना ।

विरुपाक्ष के ऐसा कहने पर कामरान ने राजकुमार अमृता की तरफ देखा जो विरुपाक्ष और कामरान की बातें सुन रही थी जब विरुपाक्ष ने सारी बातें स्पष्ट कर दी तो उसने फिर से लज्जावश सर झुका लिया ।

विरुपाक्ष की बात करने पर गजेंद्र भी लज्जावश सर झुका कर खड़ा हो गया दोनों को इस प्रकार सर झुका कर खड़े हुए देखकर कामरान सब समझ गया ।

कामरान - परंतु विरुपाक्ष दोनों को देखकर मुझे तो नहीं लगता यह दोनों को इस विषय में कोई रुचि है देखो दोनों कैसे सर झुकाए खड़े हुए हैं मुझे नहीं लगता की राजकुमारी अमृता और गजेंद्र जी एक दूसरे को पसंद करते हो ।

कामरान की बात सुनकर गजेंद्र और राजकुमारी अमृता दोनों के मुख से एक साथ निकाला - नहीं ! नहीं ! ऐसी कोई बात नहीं है ।

एक साथ दोनों बोल उठे फिर एक दूसरे की तरफ देखकर फिर चुप हो गए
दोनों को इस प्रकार देखकर कामरान और विरुपाक्ष ठहाके लगाकर हंसने लगे।

विरुपाक्ष - देखा महाराज आपने , हमारी बिटिया अब बड़ी हो गई है ।

कामरान - हां हां भाई देख भी लिया और सब समझ भी लिया । गजेंद्र जी को अपने जामाता के रूप में पाकर मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी । मुझे सतत चिंता सताती रहती थी मेरी अमृता के योग्य वर कहां प्राप्त होगा अब मेरी भी खोज संपूर्ण हुई । अब मेरी बेटी के विरह की वेला भी आ गयी , मै किस प्रकार इसके बिना रह पाऊंगा ।

राजकुमारी अमृता - नहीं पिता श्री ! मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी , मुझे नही करना कोई विवाह , यदि मैं चली गई तो आप अकेले रह जाओगे ।

कामरान - ऐसा नहीं कहते पुत्री ! हर पिता की यही इच्छा होती है उसकी पुत्री को योग्यवर प्राप्त हो । अपनी पुत्री को दुल्हन के जोड़े में देखें उसका कन्यादान कर सके , अपनी आंखों के सामने अपने बच्चों का घर बसते हुए देखें ।
वारूपाक्ष मुझे उठकर बिठाओ मैं दोनों को अपने सीने से लगाना चाहता हूं ।

विरुपाक्ष ने सहारा देकर कामरान को बिठा दिया , कामरान के इशारे पर राजकुमारी अमृता और गजेंद्र दोनों कामरान के गले मिले । कामरान ने उन दोनों के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया ।

उसके पश्चात कई बातों पर वहां चर्चा हुई जहां यह तय हुआ गजेंद्र के वापस आने पर दोनों का विवाह संपन्न कराया जाएगा । अभी अपराधियों को दंड देने का कार्य भी रह गया था , सो गजेंद्र को कामरान ने 1 दिन के लिए रुकने का आग्रह किया ।
तो यह तय हुआ कि कल दरबार में सारी बातें स्पष्ट होने के पश्चात गजेंद्र अपनी अगली यात्रा पर निकलेगा , थोड़ी देर यूं ही बातें चलती रही उसके पश्चात गजेंद्र अपने कक्ष में चला गया ।

आज के लिए इतना ही -------

अगला अध्याय शीघ्र ही --------

सभी पाठकों से अनुरोध है के इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें ।
धन्यवाद 🙏🌹🌹

स्वस्थ रहे ------प्रसन्न रहे

आपका मित्र --- अभिनव🌹🌹
 

Jay66

New Member
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दोस्तों मैं आपका मित्र अभिनव आया हूं एक और नई कहानी लेकर अपनी नई आईडी से----
आशा करता हूं कि जिस प्रकार मेरी पहले की दोनों कहानियों ,ABHI - THE WARRIOR 1& 2 को आप सब का भरपूर प्यार मिला उसी प्रकार इस कहानी को भी मिलेगा

वैसे मैं कोई लेखक नहीं हूं परंतु कुछ किरदार मेरे मस्तिष्क में हलचल मचा रहे थे तो बस उन्हें ही यहां उतारने का प्रयत्न कर रहा हूं जैसे पहले की दोनों कहानियां पूरी हुई उसी प्रकार यह कहानी भी पूरी होगी प्रयत्न करूंगा कि रोज कम से कम एक अपडेट तो दे सकूं।


यह कहानी देवत्व प्राप्त करने के संघर्ष की है हर महत्वकांक्षी व्यक्ति इस समाज में अपने आप को देव तुल्य स्थापित करना चाहता है आने को शक्तियां और भौतिक वैभव से वह अपने आप को देवतुल्य बनाना चाहता है और इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उचित अनुचित है जो चाहे कर्म करने लग जाता है फलस्वरूप वह देवत्व हो तो प्राप्त कर नहीं पाता परंतु ही कसूर जरूर बन जाता है।
वहीं दूसरी ओर बिना किसी महत्वकांक्षा के समाज के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण करता है अपने जन्म के उद्देश्य को समझ कर निस्वार्थ भाव से कर्म करता है वह अनायास ही देवत्व को प्राप्त कर जाता है।
ज्यादा बातें ना करते हुए तो चलो चलते हैं कहानी की ओर----- धन्यवाद🙏🙏

INDEX




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Code:
देवत्व -- एक संघर्ष गाथा

Update 1

काली घनी अंधेरी रात गगनचुंबी बड़े-बड़े वृक्षों से भरे हुए वन के मध्य में कल-कल बहती हुई नदी के किनारे एक गुफा के आहते में टिमटिमाती हुई कुछ मशाले जल रही थी और साथ ही खड़े थे कुछ लोग जो हाथ जोड़कर ना जाने क्या प्रार्थना कर रहे थे।
गुफा के भीतर का भी दृश्य कुछ इस प्रकार था वहां भी कुछ लोग हाथ जोड़े कुछ प्रार्थना कर रहे थे ।

गुफा के मध्य भाग में कुछ काले लबादा पहने लोग एक घेरा बनाकर खड़े थे वहां फैले सन्नाटे को चीरते हुए एक आवाज उभरी----

"क्या आप समझते हैं कि क्या होना चाहिए?" आचार्य यग्नेश ने गंभीर स्वर में पूछा।


उसके सामने एक बड़े पत्थर की पटिया पर एक आदमी लेटा था। उसकी नीली कमीज कभी महंगे कपडे हुआ करती थी, लेकिन अब वह फटी और गंदी हो गई है।

उसके माथे से पसीना बह रहा था, पत्थर पर टपक रहा था।
उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे और उसकी आँखें घबराकर कमरे में घूम रही थीं।

"हाँ-हाँ।
मेरा बलिदान आपको मेरी बेटी को ठीक करने की शक्ति देगा। कृपया, उसकी मदद करें। मैं अपना जीवन अपने बेटी के प्राण बचाने के लिए आपके सुपुर्द करता हु ।"

उसके शब्द सुनकर आचार्य के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान उभर आई उसने गुफा के मध्य में वेदी के चारों ओर खड़े अपने शिष्यों को देखा जो कुछ मंत्रो का उच्चारण कर रहे थे।


उनके चेहरे केवल गुफा की कच्ची दीवारों के साथ लटकी हुई मशालों के तरफ थी। आचार्य ने एक गहरी साँस ली और अपना हाथ उस आदमी के नम माथे पर रख दिया।
याग्नेश-- "मैं आपकी बेटी को बचाऊंगा और उसे वह दूंगा जो मेरे परिवार को कभी नहीं मिला - जीवन का उपहार।" वह

आदमी मुश्किल से थूक निगल कर बोला । "धन्यवाद आचार्य----
आचार्य के चेहरे पर

एक खोखली मुस्कान उभर आई । वह फिर से असफल होने का जोखिम नहीं उठा सकते थे।
जितने भी लोगो का उसने अब तक बलिदान दिया था उन सबकी पवित्र आत्माओं की आँखें मुक्ति के लिए हर रात सताती थी।

आचार्य ने अपने वस्त्र में एक गहरी जेब से दो चीजें निकालीं - एक बैंगनी क्रिस्टल और एक पिच-काले गोमेद जिसे उसने अपने हाथ में बांध लिया था।
पत्थर की पटिया से उसने एक छोटा सा चाकू उठाया और अपने चारों ओर घेरे में खड़े पुरुषों और महिलाओं को देखा।और उस आदमी की तरफ बढा जो खुद को बलिदान करने वाला था,

आचार्य के शिष्यों ने मार्गदर्शन के लिए उसकी ओर देखा।
उनमें से प्रत्येक ऐसा था जिसने अपने जीवन मे बहुत कुछ खोया था और बहुत कुछ सहा था, आचार्य ने उन्हे संगठीत किया था ।
आचार्य ने उनके लिए बहुत कुछ किया था, इसलिए वह समझ जानते थे कि कितनी दूर वे उसके पीछे चलेंगे। उनकी निष्ठा निर्विवाद थी।
उन सब की तरफ देखकर

आचार्य ने बोलना शुरू किया -- "मेरे साथियों हम यहा आज कुछ ठोस फैसला लेने के लिए इकत्रीत हुए हैं।
हमने हमेशा से सदियों से देवताओं से प्रार्थना की है,इसी आस मे के वे हमारी सहायता के लिए आएंगे। लेकिन हमारी पुजा का और श्रद्धा के बदले मे क्या मिला

"गरीबी और हताशा !" पुरुषों में से एक चिल्लाया।

“जब मेरे पति की मृत्यु हो गई तो मुझे वेश्यालय में काम करने के लिए मजबूर किया गया। क्यों
क्या उन्होंने मेरी प्रार्थना नहीं सुनी?” एक औरत ने कहा


आचार्य ने फिर सिर हिलाया और कहा --- "हम सभी तथाकथित देवताओं के कारण पीड़ित हैं। कल्पना कीजिए कि हम उनकी जैसी शक्तियों के साथ क्या कर सकते हैं!”

अब समय आ गया है के हम स्वयं देवत्व को प्राप्त करें, और ये तभी हो सकता है जब हम उनकी शक्तिया प्राप्त कर ले और इसका एक ही मार्ग है बलिदान ।"

इतना कहकर आचार्य ने एक धारदार
चाकू को ऊपर उठा दिया, और पत्थर की पटिया पर बैठे आदमी की तरफ अपने कदम बढा दिये और शुरू हो गया मौत का नंगा नाच, पहला हलका वार उसके सीने पर करके उसके खून से सने चाकू को उपर उठाते हुए
और उसके सीने की ओर इशारा करते हुए------
"इस आदमी की सबसे गहरी इच्छा अपनी बेटी को बचाने की है"
कई अन्य लोगों की तरह, वह अपना बलिदान देने को तैयार है अपनी बेटी के लिए अपना जीवन। ”

आचार्य ने नीचे आदमी की आँखों में देखा।

"सभी एक साथ प्रार्थना करो। प्रार्थना करें कि हम सबके मालीक मुझे दवताओ की सारी ऊर्जा उपहार में दें। जिससे मैं आप सबको जीवन शक्ति प्रदान करने मे समर्थ हो सकता हूं । उस ऊर्जा से मैं आपकी मदद कर सकूंगा।"

उस जखमी आदमी ने अपनी बेटी को याद किया फिर अपनी आंखे बन्द करके प्रार्थना करने लगा
" हे देवताओ मेरा बलीदान स्वीकार करो , मेरी सहायता करो ! मैं अपनी जान अपनी बेटी को बचाने के लिए देता हूं
मेरी फरियाद सुनो। मेरी जान उसके लिए।"

उसके इतना कहते ही आचार्य का चाकू उसकी छाती में घूस गया, और उसकी जोरदार चीख वहा फैले सन्नाटे को चीरते हुए गूंजने लगी।

उसके सीने में बार-बार छुरा घोंपते हुए याग्नेश ने एक बडा सा छेद बना दिया , जिसमे हाथ आसानी से जा सकें,
उस व्यक्ति के सीने से लाल रक्त का फव्वारा सा बहकर पत्थर के नीचे बहकर फर्श पर गुफा की कच्ची फर्श पर फैल रहा था।


उसका सिर एक ओर लूढक गया और उसने आखिरी बार सांस ली। आचार्य ने बिना किसी हिचकिचाहट के उसके सीने में हाथ डाला, और उस का हृदय काटकर उसके सीने से बाहर निकाल दिया ।

उसने उसे अपने दोनों हाथों में एक साथ पकड़ रखा था वही पास रखे ऊचे आसन पर रखे क्रिस्टल और गोमेद के सामने आचार्य ने वो हृदय चढाया और अपने खून से सने दोनो हाथ जोडकर ----, "हे मेरे मालिक मेरे ईश्वर "मेरे भगवान,
हमारी प्रार्थना सुनो।

इस बलिदान को स्वीकार करो और हमें अपनी शक्तियां प्रदान करें। हमें की अपना चमत्कार दिखाओ",

उसके बाद उसने रक्त रीसते हुए हृदय को और सफेद और काले क्रिसटलो को अपनी दोनो हथेलीयों के बीच दबाकर निचोड़ने लगा और , साथ साथ कुछ मंत्र भी बुदबुदाने लगा , वह एक सेकंड के लिए रुक गया और फिर अपना मंत्र जारी रखा।
हृदय को और सिकोड़ते हुए उसकी हथेलीयों से खून बहने लगा।

धीरे-धीरे काला रत्न सक्रिय होने लगा और वहां एक काला घना साया फैलने लगा उसकी ऊर्जा को आचार्य स्पष्ट रूप से महसूस कर सकता था।

काले रत्न के सक्रिय होने पर आचार्य ने सफेद रत्न को सक्रिय करने के लिए देवताओं के मंत्र का उच्चारण शुरू किया बड़ी देर तक ऐसा करने पर भी वह श्वेत रत्न सक्रिय नहीं हुआ।

आज के इस बलिदान को भी व्यर्थ जाते हुए देख कर आचार्य की आंखें क्रोध में लाल हो गई।
उसने ऐसा कई बार कीया था, लेकिन हत्यायो के इस घोर अन्धकार मे उसे कभी भी सफलता नही मीली ।

गुफा के ऊपर एक भयानक सन्नाटा छा गया। गरजती हवा और मशालों की टिमटिमाती लपटें ही सुनाई देने वाली आवाजें थीं।
जब अंधेरा धीरे-धीरे काले गोमेद में घुस गया, तो सभी शिष्यों ने उसे देखा, लेकिन किसी ने बोलने की हिम्मत नहीं की। आचार्य ने धीरे से हाथ खोले। हृदय, क्रिस्टल और गोमेद अभी भी वहीं थे। कुछ भी नहीं बदला था।

हृदय को फर्श पर फेंकते ही वह दहाड़ उठा, उसके बूट पर खून का आखिरी छिड़काव। "झूठे देवता!" वह गुफा की छत को देखते हुए चिल्लाया। "कब सुनोगे ? और कितने जीवन लगेंगे?”

वहा उपस्थित- सभी के चेहरे पर निराशा थी। आचार्य गुस्से में था। वह उन्हें फिर से विफल कर दिया था।
देवताओं की शक्तियों का केवल एक अंश प्राप्त करने के अपने प्रयासों में उसने कितने लोगों की बलि दी थी? बीस? पच्चीस? रास्ते में उसने गिनती खो दी थी।

आचार्य ने दोनों रत्नों को अपनी जेब में भर लिया और गुफा से बाहर सर्द रात में चला गया।
गुफा से बाहर निकल कर आचार्य एक जगह बैठ गए आंखों में क्रोध और चेहरे पर कठोरता लिए उन्होंने एक बार आसमान को घूरा और फिर आंखें बंद करके ना जाने किन ख्यालों में गुम हो गए कि उनकी आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदे धरती पर गिर पड़ी गहरी सांस लेकर वही लेट गए और अपने बीते कल और आने वाले कल के बारे में सोचने लगे।

ये थे आचार्य याग्नेश जो किसी समय सब की सहायता और निस्वार्थ सेवा को महत्व देते थे। इनके लिए मानवता ही परम धर्म अपनी पत्नी और बच्चो के साथ एक खुशहाल जीवन बीताते थे। जाने उनके जीवन में ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें एक नेक दिल आचार्य से हैवान बना दिया देखेंगे हम अगले अपडेट में।

आज के लिए इतना ही, अगला अपडेट जल्द ही______
सभी पाठको से निवेदन है के इस कहानी पर अपने बहुमुल्य सुझाव और प्रतिक्रीया आवश्य दे।🙏🙏


आपका मित्र - अभिनव 🔥
Waa waa kya baat hai bhai bahut hi behtareen shuruwat hai kahani ki , new plot
Best writing skills bro yagnesh jabardast cracter lagta hai 👏👏👏👏👏
 
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Jay66

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अध्याय- 2

ये थे आचार्य यग्नेश जो किसी समय सब की सहायता और निस्वार्थ सेवा को महत्व देते थे।
इनके लिए मानवता ही परम धर्म अपनी पत्नी और बच्चो के साथ एक खुशहाल जीवन बीताते थे। जाने उनके जीवन में ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें एक नेक दिल आचार्य से हैवान बना दिया देखेंगे हम अगले अपडेट में।

अब आगे ---

कोई एक घंटे बाद, आचार्य अपनी घोड़े पर पूर्व की ओर दौड़ते हुए, पहाडी रस्तो से होते हुए मैदानी इलाकों में पहुचे, अब तक उनका क्रोध थोडा ठंडा हो गया था।

परंतु एक प्रश्न उनके मन में अभी भी चल रहा था की, आखिर क्यों उनके साथ ऐसा हुआ उनके परिवार ने पीढीयो से देवताओं की पूजा की थी , अपना सारा जीवन लोक कल्याण और लोगों की भलाई में लगाया था , फिर भी उन्हें क्या प्राप्त हुआ ।

अपने बीते जीवन के बारे में सोचते सोचते उनके मन में देवताओं के प्रति घृणा और प्रबल हो गई।

दूर आगे ऐसे ही चलते चलते वो उस जगह पहुंचे जहां कभी बचपन में अपनी छोटी बहन के साथ बैठकर पूरे शहर को देखते थे वह एक टीला था जहां से पूरा नगर दिखाई देता ,

इस समय देवनगर की ऊंची-ऊंची दीवारों के ऊपर सैकड़ों मशाले जल रही थी , जो आकाश मे चमकने वाले तारों की भांती लग रहे थे। इस शहर को देखते देखते ही यग्नेश बडा हुआ था ।

आचार्य वही उस टीले पर आंख बंद करके लेट गए और अपने बीते जीवन के बारे में सोचने लगे।


यह रहा देव नगर शहर जो भौगोलिक दृष्टि से उसका क्षेत्रफल किसी बडे राज्य से कम नहीं था ऐसे ही 5 और शहर मिलाकर बनती है यहां की सभ्यता , जो आज भी आधुनिक समाज और सभ्यता से कटी हुई है , या यु कहो के कोई अदृश्य आयाम इसे बाकी पृथ्वी से अलग बनाए हुए हैं ।

पृथ्वी पर रहते हुए भी इनकी अपनी एक अलग ही दुनिया है जो इसी पृथ्वी पर मौजूद किसी अलग आयाम में स्थित हैं।
चारों ओर से पर्वतों से घिरे हरे भरे बाग बगीचे झरने तलाब और अद्भुत जड़ी बूटी से सुसज्जित यहां के घने वन, अद्भुत शिल्पकला, इस जगह को धरती का स्वर्ग बनाती है।

यह नगर देवनगर के नाम से विख्यात था। यह नगर चारों ओर से छोटे छोटे मंदिरों से सुसज्जित था और नगर के मध्य में यहां के मुख्य देवता गजेंद्र का विशाल मंदिर था और साथ ही एक बड़ा आश्रम था।

इस मंदिर और आश्रम के आचार्य की बड़ी गरिमा थी यहां आचार्य देवता का प्रतिनिधि मानकर देव तुल्य ही सम्मान देते थे उनका हर आदेश यहां की प्रजा के लिए देवता का ही आदेश माना जाता था।

तीन पीढ़ियों से आचार्य याग्नेश के परिवार के सदस्य ही यहां के आचार्य पद का निर्वाह कर रहे थे पहले याग्नेश के दादा अग्निवेश यहां के आचार्य बने और उनके बाद याग्नेश के पिता आचार्य विग्नेश ने यहां का पदभार संभाला

जब याग्नेश के दादा की मृत्यु हुई थी तभी याग्नेश बहुत छोटा था परंतु आज भी वह वो दिन नहीं भूल पाया था जिस दिन उसके दादा की मृत्यु हुई थी।

यग्नेश अपने दादा से बहुत प्रेम करता था बिना दादा से मिले उसके दिन की शुरुआत ही नहीं हो पाती थी रोज की तरह इस दिन भी प्रातः वह अपने दादा से मिलने उनके कक्ष में गया

अपने दादा के कक्ष में प्रवेश करते ही जैसे वह दो चार कदम आगे बढ़ा तो सामने का दृश्य देखकर वह स्तंभित हो गया उसकी आंखें फटी की फटी रह गई सांसे तेज चलने लगी दिल जोरो से धड़कने लगा सामने उसके दादा का क्षत-विक्षत शव पड़ा हुआ था, उनके शरीर पर जगह-जगह गहरे घाव से रिस्ता लाल रक्त और सीने में गड़ा हुआ एक बड़ा सा खंजर उस दृश्य को और भी भयावह बना रहा था।

अपने प्यारे दादा को ऐसी स्थिति में देखकर याग्नेश को गहरा सदमा लगा उसके मुख से एक जोरदार चीख निकली और वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा , उसकी आवाज सुनकर कक्ष के बाहर मौजूद आश्रम के शिष्य कक्ष के भीतर आए कक्ष के भीतर का भयावह दृश्य देखकर सबकी आंखें फटी की फटी रह गई ।

अपने प्यारे आचार्य को इस स्थिति में देखकर सबकी आंखों में आंसू आ गए सब क्रंदन करने लगे इस दुखद घटना की सूचना जब विग्नेश तक पहुंची तब वह तुरंत वहां पहुंचा ।

एक तरफ अपने पिता का क्षत-विक्षत शव और दूसरी तरफ नन्हा याग्नेश बेहोश स्तिथी में विग्नेश के नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगे उसने अपने पिता को कई बार पुकारा परंतु उस पुकार का कोई प्रतिउत्तर नहीं मिला।


अपने पिता के बाद उसके कंधे पर आने वाली आश्रम की जिम्मेदारियों को वह जानता था , इसलिए उसने अपने ह्रदय को कठोर किया और अपने पिता के शव को उठाकर उनके आसन पर लिटा दिया ।

तभी वहां कोलाहल शुरू हुआ जब आश्रम के शिष्यों ने वहां मौजूद ऊंचे आसन की तरफ देखा जहां उनका दिव्य क्रिस्टल रखा हुआ होता था उस क्रिस्टल को वहां ना पाकर सभी भयभीत हो गए क्योंकि क्रिस्टल के वहां ना होने का अर्थ था उनके नगर का विनाश।

विग्नेश अभी अपने पिता की मृत्यु के बारे में ही विचार कर रहा था के नगर के विनाश के भय ने भी उसके हृदय को घेर लिया उसने वहां मौजूद सभी को शांत रहने का परामर्श दिया और क्रिस्टल वापस लाने का आश्वासन दिया।

आश्रम के बाकी शिष्य विग्नेश का बड़ा आदर करते थे , इसलिए उसकी बात मानकर सब शांत हो गए विग्नेश ने उन सब को अपने पिता की अंतिम क्रिया की तैयारी करने को कहां और सभी को कक्ष से बाहर भेज दिया।

सभी के कक्ष के बाहर जाने के बाद विग्नेश उस पक्ष में कुछ ढूंढने लगा, वह अपने पिता को अच्छी तरह जानता था ,उसे पता था कि मृत्यु से पूर्व का उसके पिता ने कुछ ना कुछ क्रिस्टल के बारे में निशान छोड़े होंगे।

ढूंढते ढूंढते उससे एक जगह रक्त से बने हुए कुछ चिन्ह मिले जिन्हें देखकर वह समझ गया कि उसके पिता ने वह क्रिस्टल कहां रखा हुआ है शायद उसके पिता को इस स्थिति का पूर्व अंदेशा था इसलिए उन्होंने विग्नेश को कई तरह के गुप्त चिन्हों और आश्रम में पदासीन आचार्यों के रहस्य के बारे में सब कुछ बता दिया था।


वह अपने पुत्र की योग्यता को जानते थे और यह भी जानते थे, कि उनके बाद उनका पुत्र विग्नेश ही आचार्य के पद को संभालेगा
विग्नेश सबकी नजर बचाते हुए कक्ष में मौजूद पत्थर के चबूतरे के पास पहुंचा जहां उनके प्रमुख देवता गजेंद्र की प्रतिमा रखी हुई थी ।

उसने उस प्रतिमा को पहले प्रणाम किया फिर तीन बार उस प्रतिमा को घुमाया तभी उस पत्थर के चबूतरे के पीछे एक छोटा सा द्वार प्रगट हुआ विग्नेश उस द्वार में प्रवेश कर गया और नीचे की सीढ़ियां उतरते हुए वह वहां के गुप्त कक्ष में पहुंचा।


यह एक ऐसा गुप्त कक्ष था जिसके बारे में केवल आश्रम के पदासीन आचार्य को पता होता था , इस कक्ष में आश्रम का गुप्त खजाना और भी कई तरह की दिव्य जड़ी बूटियां और अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे ।

विग्नेश ने उस कक्ष में एक आसन पर रखे दिव्य क्रिस्टल की तरफ देखा उसने उस क्रिस्टल को लाल कपड़े में लपेटा और वापस उसी रास्ते से होकर अपने पिता के कक्ष में आया और क्रिस्टल को उसके यथा योग्य स्थान पर स्थापित कर दिया।

क्रिस्टल के वहां स्थापित होते वहां एक अदृश्य सुरक्षा घेरा प्रकट हुआ ।

विग्नेश ने क्रिस्टल के मिलने की सूचना आश्रम के बाकी शिष्यों तक पहुंचाई क्रिस्टल की मिलने की सूचना पाकर सभी का भय दूर हो गया उसके बाद ही था योग्य रीति से विग्नेश के पिता का अंतिम संस्कार किया गया।


जब तक याग्नेश को होश आया तब तक उसके दादा राख में बदल चुके थे अगले कई दिनों तक याग्नेश की स्थिति बड़ी विकट थी रोज रात को वह अपने दादा को पुकारता हुआ चीखता हुआ उठ जाता था , अपनी दादा की वह खुली आंखें और रक्तरंजित शव का दृश्य उसकी आंखों से ओझल होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।

परंतु कहते हैं ना कि समय गहरे से गहरे घावो को भर देता है याग्नेश के साथ भी ऐसी हुआ ।

परंतु उसके घाव पूरी तरह तो नहीं भर पाए , कभी-कभी आज तक ईतने वर्षो बाद , भी उसे उसके दादा के मृत्यु का वह दृश्य सपनों में उसे डराते है।

समय आगे बढता गया , वहा के राजा और आश्रम के अनुयायियो ने सर्वसम्मति से विग्नेश को वहां के आचार्य पद पर नियुक्त किया गया।।

अपने अतीत के बारे मे सोचते हुए याग्नेश उस टीले पर लेटा हुआ था के तभी आकाश में बादलों की गर्जना की आवाज के कारण वह अपने अतीत से बाहर आया, उसने एक नजर नगर में टिमटिमाते हुए मशालों पर डाली और एक गहरी सांस छोड़ी।

उस नगर का राजा और कुटिल मंत्री राजगुरु शायद इस समय अपने महंगे घरों में सुरक्षित और गर्म होकर सोए थे।
गजेन्द्र के अनुयायिओं के कुलपतियों की कमी नहीं थी।

नगर के मध्य में स्थित वहां के देवता के मुख्य मंदिर के शिखर पर जब उसकी नजर पड़ी तो उसके जबड़े क्रोध के कारण भी कि गए आंखें लाल हो गई जिस गजेंद्र को उसकी कई पीढ़ियां और नगर के सभी लोग सदियों से देवता मानकर पूजते थे क्या वह सही में कोई देवता है या कोई शैतान

आखिर उसकी पूजा करके उन्हें क्या मिला दुख दर्द अपनों से जुदाई और हृदय पर गहरे घाव।

याग्नेश जानता था कि देवता उसी को कहते हैं जो सबको निस्वार्थ भाव से अपनी करुणा देता है , उसे नही जो अपने मानने वालो को ही दुःख दे ।

उसका मानना था के यहां का देवता जिसने नगर वासियों की और उसकी खुशियां छीनी है वो कोई देवता नही हो सकता ।

उसने देवता गजेन्द्र के विरुद्ध युद्ध का मानो बिगुल फुंक दिया था और इस राह पर चलते चलते कब वह मानव से दानव बन गया था उसे पता ही नही चला, आज वह शक्तिया प्राप्त करने के लिए ना जाने कितने अपने ही लोगो की बलीया चढा चूका था ।

याग्नेश के पिता आचार्य विघ्नेश जिन्होंने सदैव ही अपने ज्ञान अपनी शक्तियों का उपयोग जनकल्याण और पीड़ितों रोगियों और असहाय लोगों की सेवा में जीवन समर्पित किया, उन्हें भी अपने परिवार को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा अपने परिवार की रक्षा करते करते स्वयं भी अनजाने बीमारी का शिकार हो गए थे ।

उनके पिता अजीब बीमारी से मरने वाले पहले व्यक्ति थे। पिता की मृत्यु के पश्चात अपनी बीमार मां के प्राणों की रक्षा के लिए याग्नेश ने पिता से प्राप्त आयुर्वेद के ज्ञान का प्रयोग किया परंतु सभी प्रयास उसके विफल रहे उसने देवताओं के कई अनुष्ठान किए प्रार्थनाये कि , देवताओं ने भी उनके जीवन के कई वर्ष ले लिए ।

शुरुआत में, लगा यह सब प्रार्थनाये काम कर रही हैं , और वह कुछ स्वस्थ भी हो गई थी । परंतु पुनः बीमारी वापस आ गई और याग्नेश के माता को निगल गई ।


जीवन में इतना कुछ सहने के पश्चात भी याग्नेश की धर्म के प्रति श्रद्धा आस्था कम नहीं हुयी , वो अपना कार्य निरंतर करता रहा और इसी के फलस्वरूप अपने पिता के पश्चात वहां के अनुयायियों ने याग्नेश को वहा के आचार्य के पद पर नियुक्त कर दिया।
जीवन चक्र का पहिया एक बार फिर घुमा, इस बार याग्नेश की बहने उस अनजाने रोग से ग्रसित हो गई थी।


वह किसी भी प्रकार अपने माता पिता की तरह अपनी बहनों को खोना नहीं चाहता था, चाहे उसे इसके लिए कुछ भी करना पड़े ।
याग्नेश इस रोग का समूल नाश करना चाहता था उसे भय था के कही उसकी पत्नी नीरजा और उसका नन्ना सा पुत्र देव भी कहीं इस रोग की चपेट में ना आ जाए।

आचार्य के पद पर रहते हुए आचार्य याग्नेश ने देवताओं की शक्तियां प्राप्त करने के शीघ्र उपायों के बारे में अध्ययन किया जहां उसे देवताओं के प्रति किए गए बलिदान विधि की एक प्राचीन प्रतिलीपी कीसी के द्वारा प्राप्त हुई ।

प्राचीन प्रतिलिपि में जीव बली के द्वारा देवताओं की शक्ति प्राप्त करने के कई अनुष्ठानों की विधियां लिखी हुई थी,
याग्नेश ने जब उसे पढ़ा तब उसे प्रथम उस बात पर विश्वास नहीं हुआ देवता कैसे किसी की बलि से प्रसन्न हो सकते हैं ।

परंतु प्रतिलिपि देने वाला भी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था वह क्यों उसे इस प्रकार की प्रतिलिपि देगा जिसका कोई उपयोग ना हो इस प्रतिलिपि में लिखे गए अनुष्ठानों को पढकर उसे एक आशा की किरण नजर आई जिससे वह इस अनजाने रोग के भय से निजात पा सकता था।

बहुत सोच समझ कर उसने इस रास्ते पर चलने का निर्णय लिया परंतु वह इस बात को भूल गया कि बलिदान अपने किसी प्रिय वस्तु का त्याग करने को कहते हैं।

याग्नेश ने पहला मानव बलिदान एक महिला का किया जो बेघर थी और प्रार्थना करने के लिए उसके मंदीर में आई थी।

उसने अपने निजी कक्ष में उस महिला को भोजन की पेशकश की और अपनी बहनों के लिए प्रार्थना की उसके पश्चात् उसने महिला को सम्मोहीत करके गला रेत कर उसकी बली चढा दी , इस उम्मीद में कि एक जीवन दूसरे को बहाल कर सकता है।


देवताओं ने इस दिए गए बलिदान को स्वीकार नहीं किया। उस दिन से, साधारण प्रार्थनाओं ने भी उनके लिए काम करना बंद कर दिया था।

वह अब दिव्य दृष्टि का उपयोग नहीं कर सकता था या अपनी जीवन शक्ति का उपयोग करके चोटों को ठीक नहीं कर सकता था।


आचार्य याग्नेश के द्वारा एक असहाय महिला की हत्या का समाचार अब आश्रम के ही किसी कर्मचारी के द्वारा जिसने यह कृत्य चुपके से देख लिया था पूरे नगर में फैल गया था।
आचार्य याग्नेश के बलिदान के फल स्वरुप वहां के अनुयाई और सारी प्रजा अब उसके विरुद्ध हो गई थी, उसे वहां आचार्य के पद से निष्काशित कर दिया गया था, और यहीं से शुरू हुआ था उसके मानो से दान हो बनने का चक्र


सभी पाठकों से निवेदन है कि उन्हें यह कहानी कैसी लग रही है यह बताएं और साथ ही साथ अपने अनमोल सुझाव दे ---
धन्यवाद 🙏🙏

अगला अपडेट जल्द ही कृपया प्रतीक्षा करें--

आपका अपना मित्र ------अभिनव🔥
बहुत ही बेहतरीन jaggi57 भाई अपडेट याग्नेश ने अपने जीवन में बहुत कुछ सहा है और उसी के कारण उसने गलत रास्ता चुना बहुत अच्छे लिख रहे हो आप ऐसे ही लिखते रहिए 👏👏👏👏🌹🌹🌹🌹👏👏
 
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