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Fantasy देवत्व - एक संघर्ष गाथा

jaggi57

Abhinav
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Bahot behtareen shaandar update bhai
बहुत-बहुत धन्यवाद मित्र आपके साथ के लिए🙏🌹🌹

Itna kuch Kamran ke saath hone ke baad bhi woh nahi badla jab tak uske paas kuch nahi tha bada achcha ban gaya tha lekin jaise hi dheere dheere fir se Raaj that aaya apna rang dikhane laga ab dekhte yeh gajendr kia kerta h jisse Kamran ki bhuddhi sahi hoti h
Badhiya shaandar update bhai
आपने सही कहा मित्र कुछ लोग होते ही कुत्ते की दुम की तरह है जो कभी सीधे नहीं होते देखते हैं आगे क्या होता है ।
इस प्रकार अपना साथ बनाए रखें बहुत बहुत धन्यवाद🙏🌹🌹
 
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jaggi57

Abhinav
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Bahut hi sunder update he jaggi57 Abhinav Bhai,

Gajender aur virupaksh ke is vartalap se kamran ki parviti ka to pata chal hi gaya...............vo ek dhokebaz he........kabhi kisi ka ahsan nahi manta.................ab uska bhi ant gajender ke hatho hi hoga..................

Mujhe lagta he Kamran ki beti Amrita hi Gajender ki ardhangini banegi............

Keep posting Bhai
बहुत-बहुत धन्यवाद भाई , आपके यह बेहतरिन रिव्यु के लिए 🙏🌹🌹
आपने बिल्कुल सही पकड़ा है अमृता के बारे में --
देखते हैं आगे किस प्रकार उसकी भेंट होती है ।
बस ऐसे ही अपना साथ बनाए रखें धन्यवाद 🌹🌹🌹
 
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jaggi57

Abhinav
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अध्याय - 18

अब तक आपने देखा अनलासुर का कामरान के प्रति विश्वासघात , कामरान की पत्नी और पुत्र की हत्या, विरुपाक्ष द्वारा कामरान और राजकुमारी भाद्रा की रक्षा , और कुबेर जी की सहायता से इस भूखंड में अपना नगर बसना ।
अपने सैनिकों को पूर्ववत देखकर विरुपाक्ष बड़ा प्रसन्न हुआ । उन सैनिकों को द्वार पर तैनात करके गजेंद्र को लेकर पथरीले रास्ते से होता हुआ नगर की ओर चल पड़ा ।

अब आगे ------


विरुपाक्ष और गजेंद्र दोनों यक्षपुर के रास्ते पर चलते हुए आगे बढ़े , चलते-चलते गजेंद्र ने अपने बारे में सब कुछ विरुपाक्ष को बता दिया ।
अनलासुर के वध के लिए ही गजेंद्र की उत्पत्ति हुई है यह सुनकर विरुपाक्ष अत्यधिक प्रसन्न हुआ । और साथ ही साथ गजेंद्र के मित्र बनने पर गर्व की अनुभूति हुई

नगर अभी निकट ही था नगर का विशाल मुख्य प्रवेश द्वार दिखना भी शुरू हो गया था । द्वार तक पहुँचने के रास्ते के दोनों तरफ बड़े ही सुंदर उद्यान सुगंधित पुष्पों एवं फलों से सुसज्जित बडे ही मनोरम लग रहे थे और साथ ही उद्यानों के अंत में पर्वत श्रृंखला ।

प्रकृति की गोद में स्थित वह क्षेत्र अत्यंत सुंदर प्रतीत हो रहा था चलते-चलते दोनों नगर के मुख्य प्रवेश द्वार तक पहुंचे ।

मुख्य द्वार की रक्षा कर रहे प्रहरी और सैनिकों ने विरुपाक्ष के साथ जब गजेंद्र को देखा तो उनके नेत्रों में अनेक प्रश्न उभर आए , खासकर वहाँ का मुख्य प्रहरी शंकु जो दिखने में ही अत्यंत धूर्त नजर आ रहा था ।

वह द्वार के मध्य खड़ा होकर विरुपाक्ष और गजेंद्र को घूरने लगा , उसे देखकर विरुपाक्ष समझ गया कि वह सब क्या सोच रहे हैं इसलिए उनके पूछने से पहले ही ---

विरुपाक्ष - क्या बात है शंकु ! इस प्रकार द्वार के मध्य खड़े होकर , हमारा मार्ग अवरोध करने का क्या कारण है ।

शंकु - क्षमा कीजिए विरुपाक्ष जी ! मैं तो केवल अपना कार्य कर रहा हूं । आपके साथ यह जो युवक दिखाई दे रहा है वह कौन है , पहले उनका परिचय दीजिए तत्पश्चात उन्हे भीतर ले जाइए ।

विरुपाक्ष - तुम्हारा इतना साहस की तुम मुझसे प्रश्न करो बस इतना जान लो यह मेरे मित्र है इनका इतना परिचय ही पर्याप्त है तुम्हारे लिए ।
प्रहरी - क्षमा करें श्रीमान जी , परंतु यह दिखने में तो यक्ष प्रतीत नहीं हो रहा है , तो यह आपका मित्र कैसे हुआ । आप शायद भूल रहे हो के किसी भी बाहरी व्यक्ति को इस नगर में प्रवेश करने से पूर्व महाराज से अनुमति लेनी पड़ती है ।
विरुपाक्ष - मर्यादा में रहो शंकु , मत भूलो कि तुम केवल एक प्रहरी हो और मैं तुम्हारा अधिकारी । मुझे क्या करना है और क्या नहीं इसकी शिक्षा तुमसे लेने की आवश्यकता नही । महाराज से क्या कहना है वह मैं देख लूंगा अब द्वार खोलो ।

( वह प्रहरी था शंकु जो इस समय के महामंत्री सतपाल का खास सेवक था इसके बारे में आगे कहानी में पता चलेगा )

शंकु ने अनमाने ढंग से द्वारपालो को द्वार खोलने का आदेश दिया । द्वार खुलते हैं दोनों नगर के भीतर प्रवेश कर गए ।

गजेंद्र ने देखा के वह नगर बड़ा ही भव्य एवं सुंदर था प्रत्येक भवन सुंदर कलाकृति द्वारा बनाए गए थे ।

यह प्रथम बार था कि गजेंद्र कोई नगर देख रहा था । इसलिए वह बड़े गौर से नगर की संरचना और वहां के मार्गों को देखने लगा ।

प्रातः काल का समय था नगर में बहुत चहल-पहल थी । जो भी रास्ते में मिलता वह विरूपाक्ष को प्रणाम करता । जिससे पता चलता है के भले ही षड्यंत्रकारो द्वारा विरुपाक्ष का पद चला गया हो परंतु वहां की प्रजा के हृदय में उसका बड़ा आदर और मान सम्मान था ।

नगर से होते हुए विरुपाक्ष एक भवन के आगे रुका और और गहरी सांस छोड़ते हुए बड़े प्रेम से उसे भवन को देखते हुए प्रवेश द्वार की और आगे बढ़ गया , भवन के प्रवेश द्वार की ओर बढ़ते हुए जब उसने पीछे की ओर देखा तो गजेंद्र को वहीं खड़ा पाया

विरुपाक्ष - क्या बात है मित्र रुक क्यों गये आओ भीतर आओ ।

गजेंद्र - हमें तो राज भवन जाना था ना फिर हम यहां क्यों आए, देखने में यह तो कोई राजभवन नहीं लगता ।

विरुपाक्ष - सही कहाँ मित्र ! राज भवन भी चलेंगे और राजा से भी भेंट हो जाएगी । परंतु पहले स्नान नित्य कर्म आदि और बाल भोग ( नाश्ता ) पश्चात , यह मेरा घर हैं । अब नगर के भीतर आ गया हूं तो अपने परिवार से भी मिल लूं साथ ही आपका भी परिचय कर दू , तो चले भीतर ।

गजेंद्र - ठीक है मित्र ! जैसा आप उचित समझो ,चलो भीतर चलते हैं ।

तत्पश्चात दोनों ने घर में प्रवेश किया । घर के भीतर प्रवेश करते ही सामने से एक बड़ी सी गेंद आकर सीधा विरूपाक्ष के सर से टकराई ।
सामने दो बच्चे थे एक बालक जिसकी उम्र लगभग 12 वर्ष के बालक के समान थी , और कन्या जिसकी उम्र लगभग 10 वर्ष की कन्या के बराबर थी जो शायद वहां खेल रहे थे ।
जब उन्होंने गेंद की दिशा की ओर देखा तो

विरूपाक्ष को देखते ही शोर मचाते हुए दौड़कर - पिता श्री पिता श्री -- कहते हुए आकर लिपट गए विरुपाक्ष ने भी उन दोनों को उठाकर अपनी गोदी में ले लिया । बच्चों की आवाज सुनकर भीतर से एक स्त्री भी कुछ बोलते हुए बाहर की और आई । यह थी विरुपाक्ष की पत्नी चंचला ।

विरुपाक्ष को गोदी में बच्चों को उठाए हुए देखकर वह बोली

चंचला - अब समय प्राप्त हुआ है आपको इतने दिनों के पश्चात , अभी भी घर क्यों आए हो , हमारी तो कुछ पड़ी ही नहीं है आपको बस आपका राजा और आपका काम , अपने राजा के पास ही जाओ , तुम्हें तो बस अपने राजा की पड़ी है कुछ हमारी भी चिंता है ।

विरुपाक्ष - अरे अरे अरे भागवान , शांत हो जाओ प्रिये , पहले देख तो लो साथ में कोई और भी आया है । हमेशा की तरह घर में प्रवेश करते ही तुम फिर शुरू हो गई वैसे क्रोध में तुम्हारी सुंदरता और बढ़ जाती है ।

चंचला ने जब द्वार पर गजेंद्र को उन्ही की तरफ मुस्कुराते हुए देखा तो , शर्मा के मुख नीचे की ओर कर लिया और मुह बनाकर भीतर की ओर चली गई ।

गोदी में लिए हुए बच्चों को नीचे उतारते हुए विरुपाक्ष - आओ मित्र आओ भीतर आओ , इनसे मिलो यह मेरा पुत्र शुभम और कन्या शामली है ।

बच्चों यह तुम्हारे काका श्री है मैं प्रणाम करो , विरुपाक्ष के कहने पर दोनों बच्चों ने गजेंद्र को प्रणाम किया उन दोनों के सिर पर हाथ रखकर उनको आशीर्वाद दिया । अब दोनों भीतर आकर बैठक में बैठ गए ।

अभी बैठे हुए थे कि भीतर से चंचला जल और गुड़ लेकर आई

विरुपाक्ष - मित्र इनसे मिलो यह है मेरी अर्धांगिनी मेरी प्रिय चंचला और चंचला यह है मेरे मित्र गजेंद्र।

चंचला - आपके मित्र क्या वास्तव मे , इतने वर्षो मे पहली बार है के आपका कोई मित्र देखा । वैसे इन्हें पहले तो यहां कभी नहीं देखा ।

चंचला की बात सुनकर गजेंद्र ने चंचल को प्रणाम किया

गजेंद्र - प्रणाम भाभी श्री ! मै गजेंद्र आज ही इनसे मित्रता हुई है और मैं आपके नगर का भी नहीं हूं इसी कारण आपने पहले मुझे नहीं देखा ।

गजेंद्र के मुख से भाभी श्री सुनकर चंचला बड़ी प्रसन्न हुई क्योंकि यह पहली बार था कि किसी के मुंह से उसने इस प्रकार का संबंध जोड़कर संबोधन सुना था क्योंकि परिवार के नाम पर विरुपाक्ष का और कोई नहीं था और ना ही कोई मित्र ।
उसके पश्चात विरुपाक्ष में अपने परिवार से गजेंद्र का परिचय कराया । कुछ देर बाते और हास परिहास चला

विरुपाक्ष ने गजेंद्र की अतिथि कक्ष में व्यवस्था की , नित्य कर्म स्नान आदि के पश्चात गजेंद्र ध्यान में बैठा गजेंद्र के मन में कई प्रश्न थे ।

उसका जन्म एक उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था । इसलिए उसका विरुपाक्ष से मिलना और यक्षपुर आना किसी लक्ष्य की और इंगित कर रहा था ।

इन्हीं प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए उसने आज्ञा चक्र में अपना ध्यान केंद्रित किया , तो उसे ध्यान में कई ऐसे दृश्य दिखाई देने लगे , जिससे नियति ने उसे इस जगह पर क्यों भेजा इसका उद्देश्य स्पष्ट हो गया ।

ध्यान पूर्ण करने पर , एक लंबी गहरी सांस छोड़ते हुए ध्यान में देखे हुए दृश्य को पुनः एक बार स्मरण करते हुए गजेंद्र अतिथि कक्ष से बैठक की ओर चल पड़ा , जहाँ विरूपाक्ष अपने बच्चों पर स्नेह लूटा रहा था ।

विरुपाक्ष को अपने बच्चों के साथ खेलते हुए देखते हुए गजेंद्र वहीं बैठक में एक आसन पर बैठ गया । गजेन्द्र को देखकर विरुपाक्ष ने बच्चों को अपनी माता के पास भेज दिया और गजेंद्र के पास आकर बैठ गया । दोनों में वहां के राज्य व्यवस्था के बारे में चर्चा होने लगे ।

तब तक भोजन भी बन चुका था तो दोनों ने भोजन किया । गजेंद्र पहली बार पके हुए पकवान खा रहा था जोर से बड़े स्वादिष्ट लगे भोजन के पश्चात

गजेंद्र - वैसे मित्र मेरा तो कोई परिवार नहीं है तुम्हारा यह छोटा सा परिवार देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा , और यहां के भोजन की तो बात ही क्या ( चंचला की और देखते हुए ) भाभी श्री के हाथों में तो जादू है ।
तुम सच में बड़े सौभाग्यशाली हो जो मेरी भाभी श्री जैसी पत्नी मिली ।

चंचला - क्या देवर जी आप भी ! व्यर्थ में मेरी प्रशंसा कर रहे हो आपने मुझे भाभी कहा तो इस नाते आप मेरे देवर हुए । आप चिंता मत करो आपको उत्तम सुयोग्य पत्नी प्राप्त हो , मै ईश्वर से प्रार्थना करूँगी ।
थोड़ी देर ऐसे ही हंसी ठिठोली होती रही उसके पश्चात ---

गजेन्द्र - मित्र ! अब तो हमारा बाल भोग भी हो गया है , अब हमें राजभवन की ओर चलना चाहिए ।

विरुपाक्ष - प्रतीक्षा करो मित्र राजमहल से अभी बुलावा आता ही होगा ।

गजेंद्र - मैं तुम्हारा आशय नहीं समझा मित्र ! तुमने राजा तक कब संदेश भिजवाया ।

विरुपाक्ष - मुझे संदेश भिजवाने की कोई आवश्यकता नहीं मित्र द्वार पर वह प्रहरी याद है शंकु वह राजा के प्रिय मंत्री सतपाल का प्रिय है उसके द्वारा हमारे आने की खबर महामंत्री तक पहुंच गई होगी महामंत्री से राजा की तक ।

दोनों अभी बात कर ही रहे थे के गजेंद्र को ऐसा आभास हुआ के बैठक की खिड़की के बाहर कोई है , इसलिए उसने विरुपाक्ष की और इशारा किया और चुपके से उठकर दरवाजे से होता हुआ बाहर निकल गया ।

विरुपाक्ष भी पीछे-पीछे द्वार तक पहुंचा तो गजेंद्र ने उसे वही इशारे से रोक दिया और बाहर चला गया । थोड़ी देर बाद गजेंद्र ने गरदन पकड़कर किसी को घसीटते हुए भीतर प्रवेश किया और विरुपाक्ष के सामने धरती पर पटक दिया।

विरुपाक्ष - अरे मित्र यह तो वही है , यह तुम्हें कहां मिला ।

गजेंद्र - काफी समय से मुझे लग रहा था के हमारी बातें कोई सुन रहा है , जब मेरा ध्यान खिड़की की ओर गया और इसकी एक झलक दिखाई दी , तब मैं सब कुछ समझ गया और यह अब तूम्हारे सामने है ।

विरुपाक्ष और गजेंद्र दोनों उसे पकड़ कर अतिथि कक्ष में ले गए और उसके हाथ पैर बांधकर उसका अच्छे से सेवा सत्कार किया , कुछ बातें पूछी कुछ उत्तर प्राप्त किये ।

चंचला भी सारी बातें सुनकर और देखकर बड़ी आवाक थी , जैसे-जैसे बातें खुलने लगी चंचला के चेहरे के भाव बदलने लगे ।
अभी यहाँ यह सब हो ही रहा के बाहर से जोर-जोर से द्वारा खटखटाने की आवाज आने लगी ।

विरुपाक्ष - लो आ गया संदेश राजा का । अब तक मैं अकेला था इसलिए मैं सारे षडयन्त्रो को जानते हुए भी उनका सामना नहीं कर पाया । परंतु अब आप मेरे साथ हो और अब तो हमारे हाथ आपके ही कारण उनके सारे षडयंत्रों को जानने वाला भी लग गया है । बहुत सारे षडयंत्रों से पर्दा उठने का समय आ गया है ।

गजेंद्र - तुम चिंता मत करो मित्र ! आवशाय ऐसा ही होगा , बस तूम देखते जाओ , चलो बाहर चलकर देखते है ।

विरूपाक्ष ने अपनी पत्नी को सारी बातें समझा दी और उसे क्या करना है और किस संपर्क करना है सब कुछ बता दिया ।

तत्पश्चात् गजेंद्र को साथ में लिए भवन से बाहर आ गया । बाहर आकर देखा कि महल का ही एक अधिकारी कुछ सैनिकों के साथ वहां खड़ा था ।

अधिकारी - क्षमा कीजिए विरुपाक्ष जी परंतु मैं राजा के आदेश के अधीन हो आपने राजा की अनुमति के बिना बाहरी व्यक्ति को नगर के भीतर प्रवेश कराया है , उसी कारण राजा ने आदेश दिया आपको यह और इस आगंतुक को दरबार में लाया जाए ।

विरुपाक्ष - क्षमा मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है वैसे भी हम राज भवन ही जा रहे थे चलिए ।

विरुपाक्ष के इतना कहने पर सैनिकों ने विरुपाक्ष और गजेंद्र को घेर लिया जैसे उन्हें बंदी बनाकर ले जाया जा रहा हो जिसे देखकर विरुपाक्ष को क्रोध आया देख गजेंद्र ने उसे अपने नेत्रों के इशारे से उसे शांत रहने को कहा ।
अधिकारी आगे आगे और पीछे पीछे सैनिकों के घेरे में कैद विरुपाक्ष और गजेंद्र राज भवन की ओर चल पड़े ।

यहाँ राजमहल के भीतर राजा कामरान का भव्य दरबार लगा हुआ था दोनों ओर राजा के अधिकारी गण बैठे हुए थे और मध्य में ऊँचे स्वर्ण सिंहासन पर राजा कामरान बैठा हुआ था ।
राजा के सिंहासन के निकट ही थोड़े नीचे दोनों ओर दो सिंहासन थे । एक पर विराजमान था महामंत्री सतपाल और दूसरे पर सेनापति कंक यह दोनों के दोनों ही महाकपटी धूर्त और एक नंबर के चापलूस थे। नगर मे चल रहे सभी षडयंत्रो का यही दोनो मूल थे ।

वहां विरुपाक्ष और गजेंद्र के बारे में ही चर्चा हो रही थी ।

राजा कामरान - कहिए महामंत्री इस बारे में आपका क्या विचार है ।

महामंत्री - महाराज मुझे लगता है की विरुपाक्ष आपके नियंत्रण से बाहर जा रहा है । वह अपने आप को श्रेष्ठ समझने लगा है तभी आपकी अनुमति के बिना एक अनजान व्यक्ति को नगर के भीतर ले आया । यदि इस पर कुछ नहीं किया गया नगर में बाकी लोग भी ऐसा करना शुरू कर देंगे , इस प्रकार तो हमारे नगर की सुरक्षा ही संकट में पड़ जाएगी ।

राजा कामरान - बात तो तुम्हारी ठीक है महामंत्री, हमें भी कुछ ऐसा ही लग रहा है । पद से हटाने के पश्चात भी लगता है विरुपाक्ष के अकल ठिकाने नहीं आई । अब तक मैं उसे क्षमा करता आया हूं परंतु अब लगता है कोई कठोर निर्णय लेना ही पड़ेगा ।
परंतु जहां तक मैं वीरूपाक्ष को जानता हूं उसका बाहर कोई भी मित्र नहीं है । फिर जिसे मित्र बताकर हमारे नगर में लाया है वह कौन हो सकता है सेनापति जी आपको क्या लगता है ।

सेनापति कंक - महाराज आपका कहना उचित है , परंतु क्षमा कीजिए महाराज कोई कठोर निर्णय लेने से पूर्व हमें यह ध्यान रखना होगा के विरुपाक्ष कुबेर जी का विश्वासपात्र है ।

अभी यहाँ ये बातें हो ही रही थी के द्वारपाल ने आकर विरुपाक्ष और गजेंद्र के आने की सूचना दी

द्वारपाल - महाराज की जय हो ! महाराज आपके आदेश के अनुसार अधिकारी जी विरुपाक्ष और उस आगंतुक को अपने साथ लेकर आए है ।

कामरान - जाओ उन्हें शीघ्र ही मेरे सम्मुख प्रस्तुत करो ।

कामरान के कहने पर द्वारपाल वहां से राजा को प्रणाम कर चला गया ।

उसके जाते ही वह अधिकारी वीरूपाक्ष और गजेंद्र को लेकर राजा के सम्मुख प्रस्तुत हुआ ।

आज के लिए इतना ही ---------

अगला अध्याय दिवाली के बाद -------------

सभी पाठकों से निबंध निवेदन है की कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें ।
सभी को शुभ दीपावली 🌹🌹🌹🌹🌹
इसी प्रकार अपना साथ बनाए रखें ,
धन्यवाद 🙏🌹🌹

स्वस्थ रहे ----प्रसन्न रहे


आपका मित्र अभिनव
 

Ajju Landwalia

Well-Known Member
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159
अध्याय - 18

अब तक आपने देखा अनलासुर का कामरान के प्रति विश्वासघात , कामरान की पत्नी और पुत्र की हत्या, विरुपाक्ष द्वारा कामरान और राजकुमारी भाद्रा की रक्षा , और कुबेर जी की सहायता से इस भूखंड में अपना नगर बसना ।
अपने सैनिकों को पूर्ववत देखकर विरुपाक्ष बड़ा प्रसन्न हुआ । उन सैनिकों को द्वार पर तैनात करके गजेंद्र को लेकर पथरीले रास्ते से होता हुआ नगर की ओर चल पड़ा ।

अब आगे ------


विरुपाक्ष और गजेंद्र दोनों यक्षपुर के रास्ते पर चलते हुए आगे बढ़े , चलते-चलते गजेंद्र ने अपने बारे में सब कुछ विरुपाक्ष को बता दिया ।
अनलासुर के वध के लिए ही गजेंद्र की उत्पत्ति हुई है यह सुनकर विरुपाक्ष अत्यधिक प्रसन्न हुआ । और साथ ही साथ गजेंद्र के मित्र बनने पर गर्व की अनुभूति हुई

नगर अभी निकट ही था नगर का विशाल मुख्य प्रवेश द्वार दिखना भी शुरू हो गया था । द्वार तक पहुँचने के रास्ते के दोनों तरफ बड़े ही सुंदर उद्यान सुगंधित पुष्पों एवं फलों से सुसज्जित बडे ही मनोरम लग रहे थे और साथ ही उद्यानों के अंत में पर्वत श्रृंखला ।


प्रकृति की गोद में स्थित वह क्षेत्र अत्यंत सुंदर प्रतीत हो रहा था चलते-चलते दोनों नगर के मुख्य प्रवेश द्वार तक पहुंचे ।

मुख्य द्वार की रक्षा कर रहे प्रहरी और सैनिकों ने विरुपाक्ष के साथ जब गजेंद्र को देखा तो उनके नेत्रों में अनेक प्रश्न उभर आए , खासकर वहाँ का मुख्य प्रहरी शंकु जो दिखने में ही अत्यंत धूर्त नजर आ रहा था ।

वह द्वार के मध्य खड़ा होकर विरुपाक्ष और गजेंद्र को घूरने लगा , उसे देखकर विरुपाक्ष समझ गया कि वह सब क्या सोच रहे हैं इसलिए उनके पूछने से पहले ही ---

विरुपाक्ष - क्या बात है शंकु ! इस प्रकार द्वार के मध्य खड़े होकर , हमारा मार्ग अवरोध करने का क्या कारण है ।

शंकु - क्षमा कीजिए विरुपाक्ष जी ! मैं तो केवल अपना कार्य कर रहा हूं । आपके साथ यह जो युवक दिखाई दे रहा है वह कौन है , पहले उनका परिचय दीजिए तत्पश्चात उन्हे भीतर ले जाइए ।

विरुपाक्ष - तुम्हारा इतना साहस की तुम मुझसे प्रश्न करो बस इतना जान लो यह मेरे मित्र है इनका इतना परिचय ही पर्याप्त है तुम्हारे लिए ।
प्रहरी - क्षमा करें श्रीमान जी , परंतु यह दिखने में तो यक्ष प्रतीत नहीं हो रहा है , तो यह आपका मित्र कैसे हुआ । आप शायद भूल रहे हो के किसी भी बाहरी व्यक्ति को इस नगर में प्रवेश करने से पूर्व महाराज से अनुमति लेनी पड़ती है ।
विरुपाक्ष - मर्यादा में रहो शंकु , मत भूलो कि तुम केवल एक प्रहरी हो और मैं तुम्हारा अधिकारी । मुझे क्या करना है और क्या नहीं इसकी शिक्षा तुमसे लेने की आवश्यकता नही । महाराज से क्या कहना है वह मैं देख लूंगा अब द्वार खोलो ।

( वह प्रहरी था शंकु जो इस समय के महामंत्री सतपाल का खास सेवक था इसके बारे में आगे कहानी में पता चलेगा )


शंकु ने अनमाने ढंग से द्वारपालो को द्वार खोलने का आदेश दिया । द्वार खुलते हैं दोनों नगर के भीतर प्रवेश कर गए ।

गजेंद्र ने देखा के वह नगर बड़ा ही भव्य एवं सुंदर था प्रत्येक भवन सुंदर कलाकृति द्वारा बनाए गए थे ।

यह प्रथम बार था कि गजेंद्र कोई नगर देख रहा था । इसलिए वह बड़े गौर से नगर की संरचना और वहां के मार्गों को देखने लगा ।

प्रातः काल का समय था नगर में बहुत चहल-पहल थी । जो भी रास्ते में मिलता वह विरूपाक्ष को प्रणाम करता । जिससे पता चलता है के भले ही षड्यंत्रकारो द्वारा विरुपाक्ष का पद चला गया हो परंतु वहां की प्रजा के हृदय में उसका बड़ा आदर और मान सम्मान था ।

नगर से होते हुए विरुपाक्ष एक भवन के आगे रुका और और गहरी सांस छोड़ते हुए बड़े प्रेम से उसे भवन को देखते हुए प्रवेश द्वार की और आगे बढ़ गया , भवन के प्रवेश द्वार की ओर बढ़ते हुए जब उसने पीछे की ओर देखा तो गजेंद्र को वहीं खड़ा पाया


विरुपाक्ष - क्या बात है मित्र रुक क्यों गये आओ भीतर आओ ।

गजेंद्र - हमें तो राज भवन जाना था ना फिर हम यहां क्यों आए, देखने में यह तो कोई राजभवन नहीं लगता ।

विरुपाक्ष - सही कहाँ मित्र ! राज भवन भी चलेंगे और राजा से भी भेंट हो जाएगी । परंतु पहले स्नान नित्य कर्म आदि और बाल भोग ( नाश्ता ) पश्चात , यह मेरा घर हैं । अब नगर के भीतर आ गया हूं तो अपने परिवार से भी मिल लूं साथ ही आपका भी परिचय कर दू , तो चले भीतर ।

गजेंद्र - ठीक है मित्र ! जैसा आप उचित समझो ,चलो भीतर चलते हैं ।

तत्पश्चात दोनों ने घर में प्रवेश किया । घर के भीतर प्रवेश करते ही सामने से एक बड़ी सी गेंद आकर सीधा विरूपाक्ष के सर से टकराई ।
सामने दो बच्चे थे एक बालक जिसकी उम्र लगभग 12 वर्ष के बालक के समान थी , और कन्या जिसकी उम्र लगभग 10 वर्ष की कन्या के बराबर थी जो शायद वहां खेल रहे थे ।
जब उन्होंने गेंद की दिशा की ओर देखा तो

विरूपाक्ष को देखते ही शोर मचाते हुए दौड़कर - पिता श्री पिता श्री -- कहते हुए आकर लिपट गए विरुपाक्ष ने भी उन दोनों को उठाकर अपनी गोदी में ले लिया । बच्चों की आवाज सुनकर भीतर से एक स्त्री भी कुछ बोलते हुए बाहर की और आई । यह थी विरुपाक्ष की पत्नी चंचला ।


विरुपाक्ष को गोदी में बच्चों को उठाए हुए देखकर वह बोली

चंचला - अब समय प्राप्त हुआ है आपको इतने दिनों के पश्चात , अभी भी घर क्यों आए हो , हमारी तो कुछ पड़ी ही नहीं है आपको बस आपका राजा और आपका काम , अपने राजा के पास ही जाओ , तुम्हें तो बस अपने राजा की पड़ी है कुछ हमारी भी चिंता है ।

विरुपाक्ष - अरे अरे अरे भागवान , शांत हो जाओ प्रिये , पहले देख तो लो साथ में कोई और भी आया है । हमेशा की तरह घर में प्रवेश करते ही तुम फिर शुरू हो गई वैसे क्रोध में तुम्हारी सुंदरता और बढ़ जाती है ।

चंचला ने जब द्वार पर गजेंद्र को उन्ही की तरफ मुस्कुराते हुए देखा तो , शर्मा के मुख नीचे की ओर कर लिया और मुह बनाकर भीतर की ओर चली गई ।

गोदी में लिए हुए बच्चों को नीचे उतारते हुए विरुपाक्ष - आओ मित्र आओ भीतर आओ , इनसे मिलो यह मेरा पुत्र शुभम और कन्या शामली है ।

बच्चों यह तुम्हारे काका श्री है मैं प्रणाम करो , विरुपाक्ष के कहने पर दोनों बच्चों ने गजेंद्र को प्रणाम किया उन दोनों के सिर पर हाथ रखकर उनको आशीर्वाद दिया । अब दोनों भीतर आकर बैठक में बैठ गए ।


अभी बैठे हुए थे कि भीतर से चंचला जल और गुड़ लेकर आई

विरुपाक्ष - मित्र इनसे मिलो यह है मेरी अर्धांगिनी मेरी प्रिय चंचला और चंचला यह है मेरे मित्र गजेंद्र।

चंचला - आपके मित्र क्या वास्तव मे , इतने वर्षो मे पहली बार है के आपका कोई मित्र देखा । वैसे इन्हें पहले तो यहां कभी नहीं देखा ।

चंचला की बात सुनकर गजेंद्र ने चंचल को प्रणाम किया

गजेंद्र - प्रणाम भाभी श्री ! मै गजेंद्र आज ही इनसे मित्रता हुई है और मैं आपके नगर का भी नहीं हूं इसी कारण आपने पहले मुझे नहीं देखा ।

गजेंद्र के मुख से भाभी श्री सुनकर चंचला बड़ी प्रसन्न हुई क्योंकि यह पहली बार था कि किसी के मुंह से उसने इस प्रकार का संबंध जोड़कर संबोधन सुना था क्योंकि परिवार के नाम पर विरुपाक्ष का और कोई नहीं था और ना ही कोई मित्र ।
उसके पश्चात विरुपाक्ष में अपने परिवार से गजेंद्र का परिचय कराया । कुछ देर बाते और हास परिहास चला

विरुपाक्ष ने गजेंद्र की अतिथि कक्ष में व्यवस्था की , नित्य कर्म स्नान आदि के पश्चात गजेंद्र ध्यान में बैठा गजेंद्र के मन में कई प्रश्न थे ।

उसका जन्म एक उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था । इसलिए उसका विरुपाक्ष से मिलना और यक्षपुर आना किसी लक्ष्य की और इंगित कर रहा था ।

इन्हीं प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए उसने आज्ञा चक्र में अपना ध्यान केंद्रित किया , तो उसे ध्यान में कई ऐसे दृश्य दिखाई देने लगे , जिससे नियति ने उसे इस जगह पर क्यों भेजा इसका उद्देश्य स्पष्ट हो गया ।

ध्यान पूर्ण करने पर , एक लंबी गहरी सांस छोड़ते हुए ध्यान में देखे हुए दृश्य को पुनः एक बार स्मरण करते हुए गजेंद्र अतिथि कक्ष से बैठक की ओर चल पड़ा , जहाँ विरूपाक्ष अपने बच्चों पर स्नेह लूटा रहा था ।


विरुपाक्ष को अपने बच्चों के साथ खेलते हुए देखते हुए गजेंद्र वहीं बैठक में एक आसन पर बैठ गया । गजेन्द्र को देखकर विरुपाक्ष ने बच्चों को अपनी माता के पास भेज दिया और गजेंद्र के पास आकर बैठ गया । दोनों में वहां के राज्य व्यवस्था के बारे में चर्चा होने लगे ।

तब तक भोजन भी बन चुका था तो दोनों ने भोजन किया । गजेंद्र पहली बार पके हुए पकवान खा रहा था जोर से बड़े स्वादिष्ट लगे भोजन के पश्चात

गजेंद्र - वैसे मित्र मेरा तो कोई परिवार नहीं है तुम्हारा यह छोटा सा परिवार देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा , और यहां के भोजन की तो बात ही क्या ( चंचला की और देखते हुए ) भाभी श्री के हाथों में तो जादू है ।
तुम सच में बड़े सौभाग्यशाली हो जो मेरी भाभी श्री जैसी पत्नी मिली ।


चंचला - क्या देवर जी आप भी ! व्यर्थ में मेरी प्रशंसा कर रहे हो आपने मुझे भाभी कहा तो इस नाते आप मेरे देवर हुए । आप चिंता मत करो आपको उत्तम सुयोग्य पत्नी प्राप्त हो , मै ईश्वर से प्रार्थना करूँगी ।
थोड़ी देर ऐसे ही हंसी ठिठोली होती रही उसके पश्चात ---

गजेन्द्र - मित्र ! अब तो हमारा बाल भोग भी हो गया है , अब हमें राजभवन की ओर चलना चाहिए ।


विरुपाक्ष - प्रतीक्षा करो मित्र राजमहल से अभी बुलावा आता ही होगा ।

गजेंद्र - मैं तुम्हारा आशय नहीं समझा मित्र ! तुमने राजा तक कब संदेश भिजवाया ।


विरुपाक्ष - मुझे संदेश भिजवाने की कोई आवश्यकता नहीं मित्र द्वार पर वह प्रहरी याद है शंकु वह राजा के प्रिय मंत्री सतपाल का प्रिय है उसके द्वारा हमारे आने की खबर महामंत्री तक पहुंच गई होगी महामंत्री से राजा की तक ।

दोनों अभी बात कर ही रहे थे के गजेंद्र को ऐसा आभास हुआ के बैठक की खिड़की के बाहर कोई है , इसलिए उसने विरुपाक्ष की और इशारा किया और चुपके से उठकर दरवाजे से होता हुआ बाहर निकल गया ।

विरुपाक्ष भी पीछे-पीछे द्वार तक पहुंचा तो गजेंद्र ने उसे वही इशारे से रोक दिया और बाहर चला गया । थोड़ी देर बाद गजेंद्र ने गरदन पकड़कर किसी को घसीटते हुए भीतर प्रवेश किया और विरुपाक्ष के सामने धरती पर पटक दिया।

विरुपाक्ष - अरे मित्र यह तो वही है , यह तुम्हें कहां मिला ।

गजेंद्र - काफी समय से मुझे लग रहा था के हमारी बातें कोई सुन रहा है , जब मेरा ध्यान खिड़की की ओर गया और इसकी एक झलक दिखाई दी , तब मैं सब कुछ समझ गया और यह अब तूम्हारे सामने है ।

विरुपाक्ष और गजेंद्र दोनों उसे पकड़ कर अतिथि कक्ष में ले गए और उसके हाथ पैर बांधकर उसका अच्छे से सेवा सत्कार किया , कुछ बातें पूछी कुछ उत्तर प्राप्त किये ।

चंचला भी सारी बातें सुनकर और देखकर बड़ी आवाक थी , जैसे-जैसे बातें खुलने लगी चंचला के चेहरे के भाव बदलने लगे ।
अभी यहाँ यह सब हो ही रहा के बाहर से जोर-जोर से द्वारा खटखटाने की आवाज आने लगी ।


विरुपाक्ष - लो आ गया संदेश राजा का । अब तक मैं अकेला था इसलिए मैं सारे षडयन्त्रो को जानते हुए भी उनका सामना नहीं कर पाया । परंतु अब आप मेरे साथ हो और अब तो हमारे हाथ आपके ही कारण उनके सारे षडयंत्रों को जानने वाला भी लग गया है । बहुत सारे षडयंत्रों से पर्दा उठने का समय आ गया है ।

गजेंद्र - तुम चिंता मत करो मित्र ! आवशाय ऐसा ही होगा , बस तूम देखते जाओ , चलो बाहर चलकर देखते है ।

विरूपाक्ष ने अपनी पत्नी को सारी बातें समझा दी और उसे क्या करना है और किस संपर्क करना है सब कुछ बता दिया ।

तत्पश्चात् गजेंद्र को साथ में लिए भवन से बाहर आ गया । बाहर आकर देखा कि महल का ही एक अधिकारी कुछ सैनिकों के साथ वहां खड़ा था ।


अधिकारी - क्षमा कीजिए विरुपाक्ष जी परंतु मैं राजा के आदेश के अधीन हो आपने राजा की अनुमति के बिना बाहरी व्यक्ति को नगर के भीतर प्रवेश कराया है , उसी कारण राजा ने आदेश दिया आपको यह और इस आगंतुक को दरबार में लाया जाए ।

विरुपाक्ष - क्षमा मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है वैसे भी हम राज भवन ही जा रहे थे चलिए ।

विरुपाक्ष के इतना कहने पर सैनिकों ने विरुपाक्ष और गजेंद्र को घेर लिया जैसे उन्हें बंदी बनाकर ले जाया जा रहा हो जिसे देखकर विरुपाक्ष को क्रोध आया देख गजेंद्र ने उसे अपने नेत्रों के इशारे से उसे शांत रहने को कहा ।
अधिकारी आगे आगे और पीछे पीछे सैनिकों के घेरे में कैद विरुपाक्ष और गजेंद्र राज भवन की ओर चल पड़े ।

यहाँ राजमहल के भीतर राजा कामरान का भव्य दरबार लगा हुआ था दोनों ओर राजा के अधिकारी गण बैठे हुए थे और मध्य में ऊँचे स्वर्ण सिंहासन पर राजा कामरान बैठा हुआ था ।
राजा के सिंहासन के निकट ही थोड़े नीचे दोनों ओर दो सिंहासन थे । एक पर विराजमान था महामंत्री सतपाल और दूसरे पर सेनापति कंक यह दोनों के दोनों ही महाकपटी धूर्त और एक नंबर के चापलूस थे। नगर मे चल रहे सभी षडयंत्रो का यही दोनो मूल थे ।


वहां विरुपाक्ष और गजेंद्र के बारे में ही चर्चा हो रही थी ।

राजा कामरान - कहिए महामंत्री इस बारे में आपका क्या विचार है ।

महामंत्री - महाराज मुझे लगता है की विरुपाक्ष आपके नियंत्रण से बाहर जा रहा है । वह अपने आप को श्रेष्ठ समझने लगा है तभी आपकी अनुमति के बिना एक अनजान व्यक्ति को नगर के भीतर ले आया । यदि इस पर कुछ नहीं किया गया नगर में बाकी लोग भी ऐसा करना शुरू कर देंगे , इस प्रकार तो हमारे नगर की सुरक्षा ही संकट में पड़ जाएगी ।

राजा कामरान - बात तो तुम्हारी ठीक है महामंत्री, हमें भी कुछ ऐसा ही लग रहा है । पद से हटाने के पश्चात भी लगता है विरुपाक्ष के अकल ठिकाने नहीं आई । अब तक मैं उसे क्षमा करता आया हूं परंतु अब लगता है कोई कठोर निर्णय लेना ही पड़ेगा ।
परंतु जहां तक मैं वीरूपाक्ष को जानता हूं उसका बाहर कोई भी मित्र नहीं है । फिर जिसे मित्र बताकर हमारे नगर में लाया है वह कौन हो सकता है सेनापति जी आपको क्या लगता है ।

सेनापति कंक - महाराज आपका कहना उचित है , परंतु क्षमा कीजिए महाराज कोई कठोर निर्णय लेने से पूर्व हमें यह ध्यान रखना होगा के विरुपाक्ष कुबेर जी का विश्वासपात्र है ।

अभी यहाँ ये बातें हो ही रही थी के द्वारपाल ने आकर विरुपाक्ष और गजेंद्र के आने की सूचना दी


द्वारपाल - महाराज की जय हो ! महाराज आपके आदेश के अनुसार अधिकारी जी विरुपाक्ष और उस आगंतुक को अपने साथ लेकर आए है ।

कामरान - जाओ उन्हें शीघ्र ही मेरे सम्मुख प्रस्तुत करो ।


कामरान के कहने पर द्वारपाल वहां से राजा को प्रणाम कर चला गया ।

उसके जाते ही वह अधिकारी वीरूपाक्ष और गजेंद्र को लेकर राजा के सम्मुख प्रस्तुत हुआ ।


आज के लिए इतना ही ---------

अगला अध्याय दिवाली के बाद -------------


सभी पाठकों से निबंध निवेदन है की कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें ।
सभी को शुभ दीपावली 🌹🌹🌹🌹🌹
इसी प्रकार अपना साथ बनाए रखें ,
धन्यवाद 🙏🌹🌹

स्वस्थ रहे ----प्रसन्न रहे


आपका मित्र अभिनव

Behad shandar update he jaggi57 Bhai,

Gajender ne nagar me pravesh kar to liya virupaksh ke sahayata se..............aur virupakash ke sunder se parivar se bhi milna ho gaya............

Kamran to dhurt he hi.....lekin uske darbari bhi mahadhurt hi lag rahe he...................Gajender ab kamrana aur uske chamchcho ko sahi sabak sikhayega............lekin abhi tak uska samna Amrita se nahi hua he...................

Diwali ki agreem shubhmanaye Abhinav Bhai
 
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Behad shandar update he jaggi57 Bhai,

Gajender ne nagar me pravesh kar to liya virupaksh ke sahayata se..............aur virupakash ke sunder se parivar se bhi milna ho gaya............

Kamran to dhurt he hi.....lekin uske darbari bhi mahadhurt hi lag rahe he...................Gajender ab kamrana aur uske chamchcho ko sahi sabak sikhayega............lekin abhi tak uska samna Amrita se nahi hua he...................

Diwali ki agreem shubhmanaye Abhinav Bhai
बहुत-बहुत धन्यवाद Ajju Landwalia भाई आपकी शानदार रिव्यू के लिए

कामरान के दरबारी का इलाज शीघ्र ही होने वाला है
राजकुमारी अमृत से भी शीघ्र ही भेंट होने वाली है
बस ऐसे ही अपना साथ बनाए रखें धन्यवाद

Ajju bhai आपको भी दीपावली की आनंत आनंत शुभकामनाएं , यह प्रकाश पर्व आपके जीवन में नया प्रकाश लाए 🙏🌹🌹
 
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अध्याय - 19

अभी यहाँ ये बातें हो ही रही थी के द्वारपाल ने आकर विरुपाक्ष और गजेंद्र के आने की सूचना दी
द्वारपाल - महाराज की जय हो ! महाराज आपके आदेश के अनुसार अधिकारी जी विरुपाक्ष और उस आगंतुक को अपने साथ लेकर आए है ।
अधिकारी - महाराज की जय हो ! महाराज मैं आपके आदेश अनुसार इन दोनों को यहां ले आया हूं अब मेरे लिए और क्या आदेश है ।

अब आगे -------

कामरान - ठीक है अब तुम जा सकते , अब आजसे तूम विरूपाक्ष का पद सम्भालोगे ।
मनचाहा नया पद पाकर वह अधिकारी अपने राजा को प्रणाम कर वहाँ से चला गया ।

उसके जाने के पश्चात विरूपाक्ष ने राजा को प्रणाम किया ।

राजा ने विरुपाक्ष और गजेंद्र को पहले तो घूर कर देखा , तत्पश्चात महामंत्री की ओर इशारा किया ।
अपने का इशारा समझ कर प्रधानमंत्री राजा को प्रणाम कर खड़ा हुआ ।

महामंत्री - महाराज ! विरुपाक्ष जी ने अब तक कई बार आपकी अवज्ञा की है उस के पश्चात भी अपने दया भाव दिखाते हुए उन्हें कोई दंड नहीं दिया , जिसका अनुचित लाभ उठाते हुए विरुपाक्ष जी ने आपकी आज्ञा की अवहेलना की है ।

आपकी आज्ञा के अनुसार नगर में किसी भी अपरिचित का प्रवेश निषिध है , परंतु फिर भी यह आपकी अनुमति के बिना इस युवक को नगर के भीतर ले आए । द्वार के प्रहरी ने जब अपना कर्तव्य निभाने के लिए इनका रास्ता रोका तो उन्होंने आपके प्रति अपशब्द कहकर उसे द्वार से हटा दिया ।

राजा कामरान - कहो विरुपाक्ष इस बारे में क्या कहना है । मैं अब तक की तुम्हारे कई अपराध क्षमा कीये है , जिसका तूम सदैव ही अनुचित लाभ उठाते आए हो । इस विषय में तुम क्या कहना चाहते हो ।

विरुपाक्ष - महाराज अब तक मुझ पर जितने भी आरोप लगे हैं वह सब असत्य और झूठे है । आप भलीभांति जानते हो कि मैंने कभी भी कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिससे आपका या इस नगर का कोई अहित हो ।

मैंने सदैव ही आपकी तथा इस नगर की सेवा की है । मुझे साक्षात कुबेर जी का अनुचर बनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ था , परंतु मैंने उसे भी अस्वीकार करके आपको और अपने लोगों को चुना और इस नगर को बसाने में आपकी सहायता की । कुछ दिन पूर्व जब कूबेर जी यहाँ आए थे सीमा सुरक्षा अधिकारी के रूप मे देखकर और मेरे प्रति आपका व्यवहार देखकर ,उन्होने मुझसे कारण पूछा तब भी मैने उन्हे कुछ भी नही बताया ।

आपने इन चाटुकरो और षडयंत्रों के प्रभाव में मेरा पद भी छीन लिया , मुझे भरे दरबार मे अपमानित किया , परंतु तब भी मैं चुप रहा ।
मेरी निष्ठा और सेवा का यह प्रतिफल दे रहे हो आप कि मुझे अपराधियों की भांति बंदी बनाकर यहां दरबार में प्रस्तूत किया जा रहा है ।

राजा कामरान - अपनी मर्यादा में रहो विरुपाक्ष तुम भूल रहे हो कि मैं यहां का राजा हूं ।
मैंने अब तक जो भी निर्णय लीए है साक्ष और प्रमाण को देखकर ही लिए हैं ।

तुम्हारे कथन से मुझे तो लग रहा है कि तुम मुझे मूर्ख समझ रहे हो जो किसी के भी बहकवे में आकर निर्णय ले । मैंने तुम्हें कई अवसर दिए है , परंतु अब और नही ।

अपने अपराध छुपाने के लिए तूम कूबेर जी का नाम लेकर मुझे भय दिखा रहे हो , मै सब जानता हू उनकी सहायता से तूम क्या करना चाहते हो । यहाँ का मै स्वतंत्र राजा हू , मेरी न्याय व्यवस्था मे वे भी यहा हस्तक्षेप नही कर सकते ।

तुमने बाहरी व्यक्ति को मेरी अनुमति के बिना नगर के भीतर प्रवेश कराया है अब तुम्हें मेरी अनुमति भी लेने की आवश्यकता नहीं समझी । तुम अपने आप को क्या समझते हो ।

विरुपाक्ष - महाराज ! मैंने किसी शत्रु को या अपरिचित को नगर के भीतर प्रवेश नहीं कराया है । यह मेरे मित्र है और नगर व्यवस्था के अनुसार हर अधिकारी को यह अधिकार होता है कि वह अपने परिचित को नगर के भीतर ला सकता है और बाद में राज्य अधिकारी को उसका परिचय दे सकता है । मैं इन्हे महल लेकर ही आने वाला था परंतु उसके पहले ही अपने सैनिक भेज दिए ।

गजेंद्र जो अब तक चुपचाप खड़ा होकर सब कुछ देख और सुन रहा था , उसने देखा के उसके कारण इतनी सी बात का बतंगड़ बनते हुए उसके मित्र व्यर्थ आरोप लग रहे हैं । वह अब और देख ना सका ।

गजेंद्र - क्षमा करें राजन ! मुझे आप सबके बीच में बोलने के लिए बाध्य होना पड़ा ।
आप व्यर्थ में इतनी सी बात का बड़ा मुद्दा बना रहे हो जो की बिल्कुल भी ठीक नहीं है । विरुपाक्ष मेरा मित्र है , और मित्रतावश ये मुझे नगर के भीतर ले आए , इसलिए इन पर व्यर्थ दोष लगाने के बजाय आपको इनसे मेरे बारे में जानना चाहिए मेरा परिचय पूछना चाहिए कि मैं कौन हूं नगर में आने का मेरा उद्देश्य क्या है ? परंतु यह सब बातें छोड़कर आप व्यर्थ ही मेरे मित्र पर आरोप लगाए जा रहे हो यह उचित नहीं है ।

राजा कामरान - अपनी मर्यादा में रहो युवक हमारे दरबार के न्याय व्यवस्था के मध्य में तुम्हें बोलने का कोई अधिकार नहीं है ।

गजेंद्र - न्याय व्यवस्था ! किस प्रकार की न्याय व्यवस्था ? जहाँ कुछ चाटुकार एवं चापलूसों की बात में आकर किसी पर भी आरोप लगाकर उसे दंड का अधिकारी बना दिया जाता है ।
आपने मेरे मित्र विरुपाक्ष जिसने आपके प्राणों की रक्षा की आपकी पुत्री के प्राण बचाए उसकी बातों पर विश्वास ना रख कर महामंत्री सतपाल और सेनापति कंक जैसे धूर्त और स्वार्थी लोगों बातों में आ गए ।

गजेंद्र के इतना कहने पर राजा कामरान अत्यंत क्रोध में भरकर गरजता हुआ उठ खड़ा हुआ ।

राजा कामरान - चुप हो जाओ युवक ! अन्यथा यहीं पर तुम मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे । तुम्हारा इतना साहस , प्रथम तो मेरे दरबार में आकर तुमने मुझे प्रणाम नहीं किया और अपना परिचय भी नहीं दिया और अब मेरे ही सामने मेरे अधिकारियों पर और मुझ पर आरोप लगा रहे हो तुम्हारी इतनी धृष्टता पर भी मैंने अब तक संयम से काम लिया । अब सीधे-सीधे बता दो कि तुम कौन हो और नगर में आने का तुम्हारा उद्देश्य क्या है ?

गजेंद्र भी कुछ ठान चुका था , इसलिए उसने अब अपना परिचय देना आवश्यक नहीं समझा ।

गजेंद्र - प्रणाम उसे किया जाता है जो श्रेष्ठ हो , तुम जैसा लोभी और दुष्ट मेरे प्रणाम के योग्य नहीं हैं और रही बात परिचय की तो अब परिचय नहीं न्याय होगा न्याय ।

गजेंद्र के इतना कहते ही महामंत्री , सेनापति सहित सभी दरबारी क्रोधीत हो उठ खड़े हुए । सबके जबडे कस गये मुठ्ठियाँ भींच गई ।

सेनापति कंक - क्षमा करें महाराज परंतु अब इसने आपका अपमान करके सारी सीमाएं लांघ दी , हमारे अपमान पर भी अब तक हम चुप बैठे रहे बात अब आपकी है , हम अपने राजा का और अपमान नही सह सकते ।
आज्ञा दीजिए महाराज मैं अभी इस दुष्ट का सर धड़ से अलग कर देता हूं और इस अधम का अंत कर देता हू ,

राजा के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने के लिए सभी दरबारी भी सेनापति एक कंक की आवाज में आवाज मिलकर गजेन्द्र के लिए मृत्यु दंड की माँग करने लगे और मृत्यु दंड , मृत्यु दंड कहकर चिल्लाने लगे ।

दरबारीयों को आपे ऐसे बाहर होता देखकर कामरान ने हाथ उठाकर सबको शांत करते हुए कहा ----

कामरान - शांत हो जाओ - सेनापति जी इसे मृत्यु मिलेगी अवश्य मिलेगी । परंतु केवल इसे ही नहीं जो इसे लाया है उस द्रोही विरुपाक्ष को भी मृत्यु दंड प्राप्त होगा ।

परंतु ऐसे नहीं सभी नगर वासियों के सम्मुख होगा मौत का तांडव ताकि फिर कोई हमारे भी विरुद्ध विद्रोह करने का विचार भी ना ला सके ।
( फिर सैनिकों की तरफ देखते हुए ) पकड़ लो इन दोनों को और ले चलो नगर के मध्य बली स्थान पर ।
अपने राजा का आदेश पाते ही दरबार में स्थित सैनिकों ने अपने शस्त्र निकालकर विरुपाक्ष और गजेंद्र को घेर लिया विरुपाक्ष मायावी था , कहीं अपनी माया का सहारा लेकर वह भाग न जाए इसी कारण सारे दरबारी भी अपने-अपने शस्त्र लेकर साज्ज हो गए ।

इस प्रकार अपने को और गजेंद्र को शत्रुओं से घिरा हुआ देखकर विरुपाक्ष के मन में कुछ भय उत्पन्न हुआ क्योंकि वहाँ दरबारीयों में से कई ऐसे दरबारी भी थे जो उससे भी अधिक शक्तिशाली योद्धा थे , उसने गजेंद्र की ओर देखा जो उसने चहरे पर आ रहे भावो को देखकर मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा था ।

विरूपाक्ष ( मन में ) - हे महादेव रक्षा करना , आज ही पहली बार किसी को मित्र बनाया और आज ही प्राणो पर संकट , आपका ही अंश देखा था मैने इनमें इसलिए अपने इस नये मित्र की योजना से सहमत हो गया , कही ये योजना हमपर भारी ना पड जाए , हे प्रभु रक्षा करना हम दोनो कि
और फिर धीरे से गजेन्द्र से कहाँ ---

विरुपाक्ष - अब हम क्या करेंगे मित्र ? हम घोर संकट में घिर चुके हैं , हमें किसी भी तरह यहाँ निकलना होगा ।

गजेंद्र - शांत हो जाओ मित्र ! क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है ? आज भगाने का समय नहीं , न्याय करने का समय है बस मुझ भरोसा रखो और देखते जाओ ।

गजेंद्र के आश्वासन देने के पश्चात विरुपाक्ष शांत हो गया । उसे विश्वास हो गया कि गजेंद्र ने जरूर कुछ ना कुछ आवश्य सोचा होगा ।

यहां दरबार में इतना कुछ हो रहा था , वही द्वार पर खड़े चार द्वारपालो में से एक द्वारपाल अपनी दृष्टि बराबर भीतर क्या हो रहा है उसे पर बनाए रखे हुए था । जब दरबार में सैनिकों ने विरुपाक्ष और गजेंद्र को घेर लिया तब वह तुरंत अपने साथियों को कुछ बहाना बनाकर वहाँ से निकल गया ।

कामरान के आदेश पर महायक्षिणी देवी के मंदिर प्रांगण में बली स्थल के निकट नगर वासियों को एकत्रित होने का पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवाया गया ।

महायक्षिणी देवी यक्षों की मुख्य देवी थी । उनका मंदिर नगर के मध्य में स्थित था । उनका भव्य और विशाल मंदिर संपूर्ण स्वर्ण का बना हुआ था , जिसके ऊंचे कलश और ध्वजा दूर से ही शोभायमान हो रही थी । मंदिर की कलाकृति भी बड़ी अद्भुत थी । मंदिर के विशाल द्वार के समीप एक बड़ा सा मैदान था वही था बली मंडप जहां यक्ष अपनी देवी की प्रसन्नता के लिए बली दिया करते थे ।

मंदिर का भव्य मुख्य प्रवेश द्वार पार करते हैं एक बड़ा सा विशाल मंडप था जो देवी के दर्शनार्थी आए हुए प्रजाजन के लिए था । मंडप पार करते ही सामने था गर्भगृह जहाँ महायक्षिणी की बड़ी भव्य लाल पत्थर से बनी हुई प्रतीमा थी उस देवी का स्वरूप बाडा ही भयावह था बड़े-बड़े लाल नेत्र और खुला हुआ मुख , विकराल दांत , नाना अलंकारों से युक्त वह मूर्ति बिलकुल सजग लग रही थी ।

महायक्षिणी देवी कि प्रतीमा के सन्मुख एक यज्ञ कुंड था , जिसमें अग्नि प्रज्वलित थी । यज्ञ कुंड के समीप पूजा सामग्री और हवन सामग्री के थाल रखे हुए थे और वही आसन पर विराजमान थी एक सुन्दर युवती ।

उस युवती की सुंदरता ऐसी थी कि स्वर्ग की अप्सराएं भी लज्जित हो जाए ।
काले घने मेघ के समान लंबे केश , दूध में केसर मिले हुए रंग के समान गौर वर्ण , धनुष के समान सुंदर भौंए , गुलाब की पंखुड़ियां से भी कोमल और मधुर रस से पूर्ण अधर ( होंठ) , सुरहीदार गारदन , उन्नत वक्षस्थल , ना ज्यादा बड़े ना छोटे ,पतली कमर और गहरी नाभि ।

कुल मिलाकर अंग प्रत्यंग यौवन रस से भरपूर , जिसे पाने के लिए कई महायुद्ध हो जाए ।
ऐसे यौवन रस से भरपूर वह युवती गहन ध्यान में निमग्न थी । उसके चेहरे का तेज और शरीर से निकलता हुआ प्रकाश उसके दिव्य और अलौकिक होने की गवाही दे रहा था ।
किसी योगिनी की भांति वह युवती ध्यान में निमग्न थी ।

यहां दूसरी और बाली स्थल तक राजा कामरान और उसके दरबारी उसके सैनिक विरुपाक्ष और गजेंद्र सभी उपस्थित हो गए थे बाली मंडप के सामने का प्रांगण प्रजाजन से खचाखच भर गया था ।

सभी एक दूसरे से पूछने में लगे हुए थे कैसे अचानक यहां राजा ने उन्हें क्यों एकत्रित किया है किसी को भी कोई कारण पता नहीं था केवल राजा उसके और उसके अधिकारियों को छोड़कर

राजा कामरान के इशारे से महामंत्री सतपाल सभी को सम्बोधित करने के लिए आगे आया

महामंत्री - शांत हो जाइए सभी शांत हो जाइए ! आप सभी नगर वासियों को यहां महाराज के आदेश से एकत्रित किया गया है । हमारा यह नगर महाराज ने हम सभी यक्षों की रक्षा के लिए बसाया है , हमारे दयावान महाराज के विरुद्ध षड्यंत्र का न्याय करने के लिए हम सब यहां आज एकत्रित हुए हैं

यह है विरुपाक्ष जिन्होंने पहले तो महाराज की सहायता करने का ढोंग किया और विश्वास प्राप्त किया । तत्पश्चात गुप्त रीति से महाराज को हटाकर स्वयं यहां का राजा बनने के लिए कई प्रकार के षडयंत्र किये ,

यह नगर बसाने में विरुपाक्ष ने सहायता की थी इस कारण महाराज सब कुछ जानते हुए भी आज तक दया दिखाते आए हैं ।
परंतु आज जो इसके साथ में खड़ा है जिसे यह अपना मित्र बता रहे हैं , उस बाहरी व्यक्ति को न जाने किस उद्देश्य से महाराज की अनुमति के बिना नगर के भीतर प्रवेश कराया है ।

विरुपाक्ष के साथ नगर सीमा पर पहरा देने वाले सैनिकों ने इस युवक के और विरुपाक्ष तथा सभी सैनिकों के मध्य हुए युद्ध के बारे में बताया । जिससे यह ज्ञात हुआ के यह साधारण सा दिखने वाला युवक कोई साधारण नहीं है एक योद्धा है ।

सोचने वाली बात है जिसके साथ युद्ध हुआ हो कुछ क्षण बाद उसी के साथ मित्रता ऐसा कैसे संभव है ।
हमारे गुप्तचरों के अनुसार विरुपाक्ष इस योद्धा को महाराज के विरुद्ध षड्यंत्र मे अपने साथ के लिए नगर के भीतर लाया है ।
जब प्रहरी ने रोका महाराज के विरुद्ध अनेको अपशब्द कहे ।

हमारी न्याय व्यवस्था में राजद्रोह का केवल एक ही दंड है और वह है मृत्यु दंड महाराज के आदेश पर विरुपाक्ष और उसके साथी को आप सभी प्राजजनों के सामने मृत्यु दंड दिया जाएगा ।

प्रजा के मन में विरुपाक्ष जी का बड़ा आदर था उन्हें विरुपाक्ष के योगदान के बारे में सब कुछ ज्ञात था । इस प्रकार विरूपाक्ष को मृत्युदंड सुनकर सभी आवाक हो गये ।

परंतु महाराज कामरान और उसके दरबारी की शक्ति क्या आगे प्रजाजन कुछ भी कहने का साहस ना कर सके ।

तभी वहां यक्षो का एक दल उस भीड़ को चीरते हुए आगे आया । उनका नेतृत्व कर रहे उनके सरदार जिनका नाम था विश्वकसेन उन्होने मर्यादावश प्रथम महाराज को प्रणाम किया तत्पश्चात सभा की ओर देखकर बोले ।

विश्वकसेन - क्षमा करें महाराज ! न्याय व्यवस्था में इस प्रकार बिना साक्ष्य के दंड देना उचित नहीं । हमने अब तक महामंत्री तथा आपका पक्ष सुना । जब तक दोनों पक्षों की बातें सामने ना हो तब तक न्याय नहीं होता । इसलिए अब हम विरुपाक्ष जी का भी पक्ष सुनना चाहेंगे उन्हें भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए ( फिर प्रजा की ओर देखकर ) कहिए प्रजाजन आप क्या कहते हो ।

विश्वक सेन एक प्रभावशाली व्यक्तित्व था जिनका यक्षो के मध्य बड़ा मान सम्मान था सेनापति कंक के पूर्व वह इस नगर की सेनापति भी थे विश्वक सेन की बात सुनकर प्रजा भी शोर मचाने लगी --- हाँ हाँ अवसर मिलना चाहिए ।

प्रथम तो विश्वास सेन को देखकर महामंत्री और सेनापति और राजा कामरान तीनों में से कोई भी प्रसन्न नहीं था । तीनों विरुपाक्ष को कोई भी अवसर नहीं देना चाहते थे , परंतु प्रजा में विरोध शुरू हो गया था । अब तक उन्होंने विरुपाक्ष पर कई प्रकार के आरोप लगाये थे ( जो आगे कथा में पता चलेगा ) , जिससे उनका यह विचार था की प्रजा के मध्य विरुपाक्ष का आदर समाप्त हो गया होगा । परंतु यही उनकी बहुत बड़ी भूल थी जिस कारण उनकी योजना उन्हें उल्टी पड़ती हुई नजर आने लगी ।

इसलिए राजा कामरान ने बागडोर अपने हाथ में लेने की ठानी और खड़े होते हुए पहले प्रजा की ओर देखा और दोनों हाथ ऊपर उठकर प्रजा को संबोधित करते हुए कहने लगे ---
कामरान शांत हो जाइए सब ! यहां वही होगा जो न्याय व्यवस्था और हमारे नगर की सुरक्षा के हित में होगा ।

( फिर विश्व का सेन की तरफ देखकर ) विश्वक सेन जी आपका विरुपाक्ष का पक्ष लेना तो स्वाभाविक ही है आप उनके ससुर जो ठहरे ( जी हां यह विश्वकसेन और कोई नहीं वारूपाक्ष की पत्नी चंचला के पिता हैं )

परंतु फिर भी हम आपको केवल एक अवसर देंगे है कोई आपके पास ऐसा साक्ष्य जो विरुपाक्ष को निरपराध सिद्ध करें ।

कामरान की बात सुनकर विश्वक सेन

विश्वकसेन - महाराज साक्ष्य तो हम अपने साथ ही लाए हैं ( फिर अपने सहायकों की तरफ देखते हुए इशारा किया , इशारा पाते ही उन्होंने अपने दल के मध्य दो बंदीयों की गर्दन पड़कर घसीटते हुए सामने ले आए )
जिन में से एक तो वही था जिसे गजेंद्र ने विरुपाक्ष के घर के जासूसी करते हुए पकडा था और दूसरा था राजवैद्य ।

आज के लिए इतना ही -----
अगला अध्याय शीघ्र ही -------
सभी पाठकों से अनुरोध है के इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें ।
धन्यवाद 🙏🌹🌹🌹
स्वस्थ रहे -----प्रसन्न रहे

आपका मित्र - अभिनव
 

Ajju Landwalia

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अध्याय - 19

अभी यहाँ ये बातें हो ही रही थी के द्वारपाल ने आकर विरुपाक्ष और गजेंद्र के आने की सूचना दी
द्वारपाल - महाराज की जय हो ! महाराज आपके आदेश के अनुसार अधिकारी जी विरुपाक्ष और उस आगंतुक को अपने साथ लेकर आए है ।

अधिकारी - महाराज की जय हो ! महाराज मैं आपके आदेश अनुसार इन दोनों को यहां ले आया हूं अब मेरे लिए और क्या आदेश है ।

अब आगे -------


कामरान - ठीक है अब तुम जा सकते , अब आजसे तूम विरूपाक्ष का पद सम्भालोगे ।
मनचाहा नया पद पाकर वह अधिकारी अपने राजा को प्रणाम कर वहाँ से चला गया ।

उसके जाने के पश्चात विरूपाक्ष ने राजा को प्रणाम किया ।


राजा ने विरुपाक्ष और गजेंद्र को पहले तो घूर कर देखा , तत्पश्चात महामंत्री की ओर इशारा किया ।
अपने का इशारा समझ कर प्रधानमंत्री राजा को प्रणाम कर खड़ा हुआ ।


महामंत्री - महाराज ! विरुपाक्ष जी ने अब तक कई बार आपकी अवज्ञा की है उस के पश्चात भी अपने दया भाव दिखाते हुए उन्हें कोई दंड नहीं दिया , जिसका अनुचित लाभ उठाते हुए विरुपाक्ष जी ने आपकी आज्ञा की अवहेलना की है ।

आपकी आज्ञा के अनुसार नगर में किसी भी अपरिचित का प्रवेश निषिध है , परंतु फिर भी यह आपकी अनुमति के बिना इस युवक को नगर के भीतर ले आए । द्वार के प्रहरी ने जब अपना कर्तव्य निभाने के लिए इनका रास्ता रोका तो उन्होंने आपके प्रति अपशब्द कहकर उसे द्वार से हटा दिया ।


राजा कामरान - कहो विरुपाक्ष इस बारे में क्या कहना है । मैं अब तक की तुम्हारे कई अपराध क्षमा कीये है , जिसका तूम सदैव ही अनुचित लाभ उठाते आए हो । इस विषय में तुम क्या कहना चाहते हो ।

विरुपाक्ष - महाराज अब तक मुझ पर जितने भी आरोप लगे हैं वह सब असत्य और झूठे है । आप भलीभांति जानते हो कि मैंने कभी भी कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिससे आपका या इस नगर का कोई अहित हो ।

मैंने सदैव ही आपकी तथा इस नगर की सेवा की है । मुझे साक्षात कुबेर जी का अनुचर बनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ था , परंतु मैंने उसे भी अस्वीकार करके आपको और अपने लोगों को चुना और इस नगर को बसाने में आपकी सहायता की । कुछ दिन पूर्व जब कूबेर जी यहाँ आए थे सीमा सुरक्षा अधिकारी के रूप मे देखकर और मेरे प्रति आपका व्यवहार देखकर ,उन्होने मुझसे कारण पूछा तब भी मैने उन्हे कुछ भी नही बताया ।

आपने इन चाटुकरो और षडयंत्रों के प्रभाव में मेरा पद भी छीन लिया , मुझे भरे दरबार मे अपमानित किया , परंतु तब भी मैं चुप रहा ।
मेरी निष्ठा और सेवा का यह प्रतिफल दे रहे हो आप कि मुझे अपराधियों की भांति बंदी बनाकर यहां दरबार में प्रस्तूत किया जा रहा है ।


राजा कामरान - अपनी मर्यादा में रहो विरुपाक्ष तुम भूल रहे हो कि मैं यहां का राजा हूं ।
मैंने अब तक जो भी निर्णय लीए है साक्ष और प्रमाण को देखकर ही लिए हैं ।

तुम्हारे कथन से मुझे तो लग रहा है कि तुम मुझे मूर्ख समझ रहे हो जो किसी के भी बहकवे में आकर निर्णय ले । मैंने तुम्हें कई अवसर दिए है , परंतु अब और नही ।

अपने अपराध छुपाने के लिए तूम कूबेर जी का नाम लेकर मुझे भय दिखा रहे हो , मै सब जानता हू उनकी सहायता से तूम क्या करना चाहते हो । यहाँ का मै स्वतंत्र राजा हू , मेरी न्याय व्यवस्था मे वे भी यहा हस्तक्षेप नही कर सकते ।

तुमने बाहरी व्यक्ति को मेरी अनुमति के बिना नगर के भीतर प्रवेश कराया है अब तुम्हें मेरी अनुमति भी लेने की आवश्यकता नहीं समझी । तुम अपने आप को क्या समझते हो ।


विरुपाक्ष - महाराज ! मैंने किसी शत्रु को या अपरिचित को नगर के भीतर प्रवेश नहीं कराया है । यह मेरे मित्र है और नगर व्यवस्था के अनुसार हर अधिकारी को यह अधिकार होता है कि वह अपने परिचित को नगर के भीतर ला सकता है और बाद में राज्य अधिकारी को उसका परिचय दे सकता है । मैं इन्हे महल लेकर ही आने वाला था परंतु उसके पहले ही अपने सैनिक भेज दिए ।

गजेंद्र जो अब तक चुपचाप खड़ा होकर सब कुछ देख और सुन रहा था , उसने देखा के उसके कारण इतनी सी बात का बतंगड़ बनते हुए उसके मित्र व्यर्थ आरोप लग रहे हैं । वह अब और देख ना सका ।

गजेंद्र - क्षमा करें राजन ! मुझे आप सबके बीच में बोलने के लिए बाध्य होना पड़ा ।
आप व्यर्थ में इतनी सी बात का बड़ा मुद्दा बना रहे हो जो की बिल्कुल भी ठीक नहीं है । विरुपाक्ष मेरा मित्र है , और मित्रतावश ये मुझे नगर के भीतर ले आए , इसलिए इन पर व्यर्थ दोष लगाने के बजाय आपको इनसे मेरे बारे में जानना चाहिए मेरा परिचय पूछना चाहिए कि मैं कौन हूं नगर में आने का मेरा उद्देश्य क्या है ? परंतु यह सब बातें छोड़कर आप व्यर्थ ही मेरे मित्र पर आरोप लगाए जा रहे हो यह उचित नहीं है ।


राजा कामरान - अपनी मर्यादा में रहो युवक हमारे दरबार के न्याय व्यवस्था के मध्य में तुम्हें बोलने का कोई अधिकार नहीं है ।

गजेंद्र - न्याय व्यवस्था ! किस प्रकार की न्याय व्यवस्था ? जहाँ कुछ चाटुकार एवं चापलूसों की बात में आकर किसी पर भी आरोप लगाकर उसे दंड का अधिकारी बना दिया जाता है ।
आपने मेरे मित्र विरुपाक्ष जिसने आपके प्राणों की रक्षा की आपकी पुत्री के प्राण बचाए उसकी बातों पर विश्वास ना रख कर महामंत्री सतपाल और सेनापति कंक जैसे धूर्त और स्वार्थी लोगों बातों में आ गए ।


गजेंद्र के इतना कहने पर राजा कामरान अत्यंत क्रोध में भरकर गरजता हुआ उठ खड़ा हुआ ।

राजा कामरान - चुप हो जाओ युवक ! अन्यथा यहीं पर तुम मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे । तुम्हारा इतना साहस , प्रथम तो मेरे दरबार में आकर तुमने मुझे प्रणाम नहीं किया और अपना परिचय भी नहीं दिया और अब मेरे ही सामने मेरे अधिकारियों पर और मुझ पर आरोप लगा रहे हो तुम्हारी इतनी धृष्टता पर भी मैंने अब तक संयम से काम लिया । अब सीधे-सीधे बता दो कि तुम कौन हो और नगर में आने का तुम्हारा उद्देश्य क्या है ?

गजेंद्र भी कुछ ठान चुका था , इसलिए उसने अब अपना परिचय देना आवश्यक नहीं समझा ।

गजेंद्र - प्रणाम उसे किया जाता है जो श्रेष्ठ हो , तुम जैसा लोभी और दुष्ट मेरे प्रणाम के योग्य नहीं हैं और रही बात परिचय की तो अब परिचय नहीं न्याय होगा न्याय ।

गजेंद्र के इतना कहते ही महामंत्री , सेनापति सहित सभी दरबारी क्रोधीत हो उठ खड़े हुए । सबके जबडे कस गये मुठ्ठियाँ भींच गई ।

सेनापति कंक - क्षमा करें महाराज परंतु अब इसने आपका अपमान करके सारी सीमाएं लांघ दी , हमारे अपमान पर भी अब तक हम चुप बैठे रहे बात अब आपकी है , हम अपने राजा का और अपमान नही सह सकते ।
आज्ञा दीजिए महाराज मैं अभी इस दुष्ट का सर धड़ से अलग कर देता हूं और इस अधम का अंत कर देता हू ,


राजा के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने के लिए सभी दरबारी भी सेनापति एक कंक की आवाज में आवाज मिलकर गजेन्द्र के लिए मृत्यु दंड की माँग करने लगे और मृत्यु दंड , मृत्यु दंड कहकर चिल्लाने लगे ।

दरबारीयों को आपे ऐसे बाहर होता देखकर कामरान ने हाथ उठाकर सबको शांत करते हुए कहा ----

कामरान - शांत हो जाओ - सेनापति जी इसे मृत्यु मिलेगी अवश्य मिलेगी । परंतु केवल इसे ही नहीं जो इसे लाया है उस द्रोही विरुपाक्ष को भी मृत्यु दंड प्राप्त होगा ।

परंतु ऐसे नहीं सभी नगर वासियों के सम्मुख होगा मौत का तांडव ताकि फिर कोई हमारे भी विरुद्ध विद्रोह करने का विचार भी ना ला सके ।
( फिर सैनिकों की तरफ देखते हुए ) पकड़ लो इन दोनों को और ले चलो नगर के मध्य बली स्थान पर ।

अपने राजा का आदेश पाते ही दरबार में स्थित सैनिकों ने अपने शस्त्र निकालकर विरुपाक्ष और गजेंद्र को घेर लिया विरुपाक्ष मायावी था , कहीं अपनी माया का सहारा लेकर वह भाग न जाए इसी कारण सारे दरबारी भी अपने-अपने शस्त्र लेकर साज्ज हो गए ।

इस प्रकार अपने को और गजेंद्र को शत्रुओं से घिरा हुआ देखकर विरुपाक्ष के मन में कुछ भय उत्पन्न हुआ क्योंकि वहाँ दरबारीयों में से कई ऐसे दरबारी भी थे जो उससे भी अधिक शक्तिशाली योद्धा थे , उसने गजेंद्र की ओर देखा जो उसने चहरे पर आ रहे भावो को देखकर मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा था ।

विरूपाक्ष ( मन में ) - हे महादेव रक्षा करना , आज ही पहली बार किसी को मित्र बनाया और आज ही प्राणो पर संकट , आपका ही अंश देखा था मैने इनमें इसलिए अपने इस नये मित्र की योजना से सहमत हो गया , कही ये योजना हमपर भारी ना पड जाए , हे प्रभु रक्षा करना हम दोनो कि
और फिर धीरे से गजेन्द्र से कहाँ ---


विरुपाक्ष - अब हम क्या करेंगे मित्र ? हम घोर संकट में घिर चुके हैं , हमें किसी भी तरह यहाँ निकलना होगा ।

गजेंद्र - शांत हो जाओ मित्र ! क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है ? आज भगाने का समय नहीं , न्याय करने का समय है बस मुझ भरोसा रखो और देखते जाओ ।

गजेंद्र के आश्वासन देने के पश्चात विरुपाक्ष शांत हो गया । उसे विश्वास हो गया कि गजेंद्र ने जरूर कुछ ना कुछ आवश्य सोचा होगा ।

यहां दरबार में इतना कुछ हो रहा था , वही द्वार पर खड़े चार द्वारपालो में से एक द्वारपाल अपनी दृष्टि बराबर भीतर क्या हो रहा है उसे पर बनाए रखे हुए था । जब दरबार में सैनिकों ने विरुपाक्ष और गजेंद्र को घेर लिया तब वह तुरंत अपने साथियों को कुछ बहाना बनाकर वहाँ से निकल गया ।

कामरान के आदेश पर महायक्षिणी देवी के मंदिर प्रांगण में बली स्थल के निकट नगर वासियों को एकत्रित होने का पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवाया गया ।

महायक्षिणी देवी यक्षों की मुख्य देवी थी । उनका मंदिर नगर के मध्य में स्थित था । उनका भव्य और विशाल मंदिर संपूर्ण स्वर्ण का बना हुआ था , जिसके ऊंचे कलश और ध्वजा दूर से ही शोभायमान हो रही थी । मंदिर की कलाकृति भी बड़ी अद्भुत थी । मंदिर के विशाल द्वार के समीप एक बड़ा सा मैदान था वही था बली मंडप जहां यक्ष अपनी देवी की प्रसन्नता के लिए बली दिया करते थे ।


मंदिर का भव्य मुख्य प्रवेश द्वार पार करते हैं एक बड़ा सा विशाल मंडप था जो देवी के दर्शनार्थी आए हुए प्रजाजन के लिए था । मंडप पार करते ही सामने था गर्भगृह जहाँ महायक्षिणी की बड़ी भव्य लाल पत्थर से बनी हुई प्रतीमा थी उस देवी का स्वरूप बाडा ही भयावह था बड़े-बड़े लाल नेत्र और खुला हुआ मुख , विकराल दांत , नाना अलंकारों से युक्त वह मूर्ति बिलकुल सजग लग रही थी ।

महायक्षिणी देवी कि प्रतीमा के सन्मुख एक यज्ञ कुंड था , जिसमें अग्नि प्रज्वलित थी । यज्ञ कुंड के समीप पूजा सामग्री और हवन सामग्री के थाल रखे हुए थे और वही आसन पर विराजमान थी एक सुन्दर युवती ।

उस युवती की सुंदरता ऐसी थी कि स्वर्ग की अप्सराएं भी लज्जित हो जाए ।
काले घने मेघ के समान लंबे केश , दूध में केसर मिले हुए रंग के समान गौर वर्ण , धनुष के समान सुंदर भौंए , गुलाब की पंखुड़ियां से भी कोमल और मधुर रस से पूर्ण अधर ( होंठ) , सुरहीदार गारदन , उन्नत वक्षस्थल , ना ज्यादा बड़े ना छोटे ,पतली कमर और गहरी नाभि ।

कुल मिलाकर अंग प्रत्यंग यौवन रस से भरपूर , जिसे पाने के लिए कई महायुद्ध हो जाए ।
ऐसे यौवन रस से भरपूर वह युवती गहन ध्यान में निमग्न थी । उसके चेहरे का तेज और शरीर से निकलता हुआ प्रकाश उसके दिव्य और अलौकिक होने की गवाही दे रहा था ।

किसी योगिनी की भांति वह युवती ध्यान में निमग्न थी ।

यहां दूसरी और बाली स्थल तक राजा कामरान और उसके दरबारी उसके सैनिक विरुपाक्ष और गजेंद्र सभी उपस्थित हो गए थे बाली मंडप के सामने का प्रांगण प्रजाजन से खचाखच भर गया था ।

सभी एक दूसरे से पूछने में लगे हुए थे कैसे अचानक यहां राजा ने उन्हें क्यों एकत्रित किया है किसी को भी कोई कारण पता नहीं था केवल राजा उसके और उसके अधिकारियों को छोड़कर

राजा कामरान के इशारे से महामंत्री सतपाल सभी को सम्बोधित करने के लिए आगे आया

महामंत्री - शांत हो जाइए सभी शांत हो जाइए ! आप सभी नगर वासियों को यहां महाराज के आदेश से एकत्रित किया गया है । हमारा यह नगर महाराज ने हम सभी यक्षों की रक्षा के लिए बसाया है , हमारे दयावान महाराज के विरुद्ध षड्यंत्र का न्याय करने के लिए हम सब यहां आज एकत्रित हुए हैं


यह है विरुपाक्ष जिन्होंने पहले तो महाराज की सहायता करने का ढोंग किया और विश्वास प्राप्त किया । तत्पश्चात गुप्त रीति से महाराज को हटाकर स्वयं यहां का राजा बनने के लिए कई प्रकार के षडयंत्र किये ,

यह नगर बसाने में विरुपाक्ष ने सहायता की थी इस कारण महाराज सब कुछ जानते हुए भी आज तक दया दिखाते आए हैं ।
परंतु आज जो इसके साथ में खड़ा है जिसे यह अपना मित्र बता रहे हैं , उस बाहरी व्यक्ति को न जाने किस उद्देश्य से महाराज की अनुमति के बिना नगर के भीतर प्रवेश कराया है ।


विरुपाक्ष के साथ नगर सीमा पर पहरा देने वाले सैनिकों ने इस युवक के और विरुपाक्ष तथा सभी सैनिकों के मध्य हुए युद्ध के बारे में बताया । जिससे यह ज्ञात हुआ के यह साधारण सा दिखने वाला युवक कोई साधारण नहीं है एक योद्धा है ।

सोचने वाली बात है जिसके साथ युद्ध हुआ हो कुछ क्षण बाद उसी के साथ मित्रता ऐसा कैसे संभव है ।
हमारे गुप्तचरों के अनुसार विरुपाक्ष इस योद्धा को महाराज के विरुद्ध षड्यंत्र मे अपने साथ के लिए नगर के भीतर लाया है ।
जब प्रहरी ने रोका महाराज के विरुद्ध अनेको अपशब्द कहे ।


हमारी न्याय व्यवस्था में राजद्रोह का केवल एक ही दंड है और वह है मृत्यु दंड महाराज के आदेश पर विरुपाक्ष और उसके साथी को आप सभी प्राजजनों के सामने मृत्यु दंड दिया जाएगा ।

प्रजा के मन में विरुपाक्ष जी का बड़ा आदर था उन्हें विरुपाक्ष के योगदान के बारे में सब कुछ ज्ञात था । इस प्रकार विरूपाक्ष को मृत्युदंड सुनकर सभी आवाक हो गये ।

परंतु महाराज कामरान और उसके दरबारी की शक्ति क्या आगे प्रजाजन कुछ भी कहने का साहस ना कर सके ।


तभी वहां यक्षो का एक दल उस भीड़ को चीरते हुए आगे आया । उनका नेतृत्व कर रहे उनके सरदार जिनका नाम था विश्वकसेन उन्होने मर्यादावश प्रथम महाराज को प्रणाम किया तत्पश्चात सभा की ओर देखकर बोले ।

विश्वकसेन - क्षमा करें महाराज ! न्याय व्यवस्था में इस प्रकार बिना साक्ष्य के दंड देना उचित नहीं । हमने अब तक महामंत्री तथा आपका पक्ष सुना । जब तक दोनों पक्षों की बातें सामने ना हो तब तक न्याय नहीं होता । इसलिए अब हम विरुपाक्ष जी का भी पक्ष सुनना चाहेंगे उन्हें भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए ( फिर प्रजा की ओर देखकर ) कहिए प्रजाजन आप क्या कहते हो ।

विश्वक सेन एक प्रभावशाली व्यक्तित्व था जिनका यक्षो के मध्य बड़ा मान सम्मान था सेनापति कंक के पूर्व वह इस नगर की सेनापति भी थे विश्वक सेन की बात सुनकर प्रजा भी शोर मचाने लगी --- हाँ हाँ अवसर मिलना चाहिए ।

प्रथम तो विश्वास सेन को देखकर महामंत्री और सेनापति और राजा कामरान तीनों में से कोई भी प्रसन्न नहीं था । तीनों विरुपाक्ष को कोई भी अवसर नहीं देना चाहते थे , परंतु प्रजा में विरोध शुरू हो गया था । अब तक उन्होंने विरुपाक्ष पर कई प्रकार के आरोप लगाये थे ( जो आगे कथा में पता चलेगा ) , जिससे उनका यह विचार था की प्रजा के मध्य विरुपाक्ष का आदर समाप्त हो गया होगा । परंतु यही उनकी बहुत बड़ी भूल थी जिस कारण उनकी योजना उन्हें उल्टी पड़ती हुई नजर आने लगी ।

इसलिए राजा कामरान ने बागडोर अपने हाथ में लेने की ठानी और खड़े होते हुए पहले प्रजा की ओर देखा और दोनों हाथ ऊपर उठकर प्रजा को संबोधित करते हुए कहने लगे ---
कामरान शांत हो जाइए सब ! यहां वही होगा जो न्याय व्यवस्था और हमारे नगर की सुरक्षा के हित में होगा ।

( फिर विश्व का सेन की तरफ देखकर ) विश्वक सेन जी आपका विरुपाक्ष का पक्ष लेना तो स्वाभाविक ही है आप उनके ससुर जो ठहरे ( जी हां यह विश्वकसेन और कोई नहीं वारूपाक्ष की पत्नी चंचला के पिता हैं )


परंतु फिर भी हम आपको केवल एक अवसर देंगे है कोई आपके पास ऐसा साक्ष्य जो विरुपाक्ष को निरपराध सिद्ध करें ।

कामरान की बात सुनकर विश्वक सेन

विश्वकसेन - महाराज साक्ष्य तो हम अपने साथ ही लाए हैं ( फिर अपने सहायकों की तरफ देखते हुए इशारा किया , इशारा पाते ही उन्होंने अपने दल के मध्य दो बंदीयों की गर्दन पड़कर घसीटते हुए सामने ले आए )
जिन में से एक तो वही था जिसे गजेंद्र ने विरुपाक्ष के घर के जासूसी करते हुए पकडा था और दूसरा था राजवैद्य ।


आज के लिए इतना ही -----
अगला अध्याय शीघ्र ही -------
सभी पाठकों से अनुरोध है के इस कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें ।
धन्यवाद 🙏🌹🌹🌹
स्वस्थ रहे -----प्रसन्न रहे

आपका मित्र - अभिनव

Bahut hi behtareen update he jaggi57 Abhinav Bhai,

Kamran ki budhdhi par pathar pad gaye he......uska ant samay ab nikat aa gya he............

Sadhna me rat yuvti hi mujhe gajender ki bhavi ardhangani lag rahi he...............

Agle update ki pratiksha rahegi Bhai
 
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jaggi57

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Bahut hi behtareen update he jaggi57 Abhinav Bhai,

Kamran ki budhdhi par pathar pad gaye he......uska ant samay ab nikat aa gya he............

Sadhna me rat yuvti hi mujhe gajender ki bhavi ardhangani lag rahi he...............

Agle update ki pratiksha rahegi Bhai
बहुत-बहुत धन्यवाद Ajju Landwalia भाई आपके इस बेहतरीन रिव्यू के लिए 🌹🌹🌹

आपने बिल्कुल सही कहा उसे युवती के बारे में देखते हैं आगे कैसे दोनों के मध्य प्रेम उत्पन्न होता है ।

बस ऐसे ही अपना साथ बनाए रखें धन्यवाद 🙏🌹🌹
 
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