ग्यारहवाँ अध्याय : एक ही भूल!
भाग - 6
अब तक आपने पढ़ा:
भौजी: इसी बात का तो दुःख है, जो भी हमें साथ देखता है वो यही समझता है की हम दोनों पति-पत्नी हैं! ...काश मैं आपकी पत्नी होती! काश हमारी शादी असल में हुई होती!
भौजी बड़े जोश से बोलीं|
मैंने भौजी का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया और उनकी आँखों में देखते हुए बोला;
मैं: हमारे मुकद्दर में देर से मिलना लिखा था!
ये सुन भौजी भावुक हो गईं, तो मैंने माहौल को हल्का करते हुए कहा;
मैं: फिर मैंने तो आपको पहले ही कहा था की भाग चलो मेरे साथ, पर आप ही नहीं माने!
ये सुन भौजी मुस्कुराईं और मेरे गले लग गईं| मेरे सीने से लग कर उनका मन अब हल्का हो गया था, इधर मैं उनकी पीठ सहलाता हुआ सोच रहा था की क्या मैं उन्हें सबकुछ बता दूँ? मेरा दिल इस बोझ तले दब चूका था और भौजी मेरे दिल में छुपी ये बात महसूस कर पा रहीं थीं|
अब आगे:
भौजी: आप कुछ कहना चाहते हो?
भौजी ने मेरे सीने से लगे हुए पुछा|
मैं: नहीं तो|
मैंने झूठ बोला, पर ये झूठ अपने आप ही निकला था! लेकिन अब मेरे दिल में दर्द अपनी चरम सीमा पर पहुँच चूका था!
भौजी: आपकी दिल की धड़कनें बहुत तेज होती जा रही हैं!
भौजी ने आलिंगन तोडा और मेरी तरफ हैरानी से देखने लगीं| वो जान गईं थीं की मैं उनसे झूठ बोल रहा हूँ और वो मूक भाषा में मुझसे कारन जानना चाहती थीं! उनका वो चेहरा देख मुझसे खुद को रोका न गया और मेरी आँखों से आँसूँ बाह निकले;
मैं: मुझे माफ़ कर दो!
मैंने भौजी के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा| भौजी ने तुरंत मेरे दोनों हाथ अपने हाथ में पकड़ लिए और मेरे आँसूँ पोछते हुए बोलीं;
भौजी: क्या बात है बोलो?
मैं: उसने...अपनी जिद्द के कारन खाना-पीना बंद कर दिया था! तीन दिन से वो भूखी-प्यासी थी और बहुत ज्यादा कमजोर हो गई थी! लगभग मरने की कगार पर थी, उसने मेरे आगे दो ही रास्ते छोड़े थे या तो मैं उसकी बात मान जाऊँ या फिर उसे मरने के लिए जहर ला कर दे दूँ!
मैंने रोते हुए कहा, ये सुन भौजी स्तब्ध हो गईं! भौजी ने आज जिंदगी में पहलीबार मेरे आँसुओं को नजरअंदाज किया क्योंकि इस समय भौजी का ध्यान सिर्फ और सिर्फ मेरा जवाब सुनने पर था और इधर मैं खामोश हो गया था!
भौजी: तो आप उसकी बात मान रहे हो?
भौजी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए अपना सवाल पुछा|
मैं: मैं मजबूर हूँ! मेरे पास और कोई चारा नहीं! अगर उसे कुछ हो गया, तो मैं कभी भी इस इल्जाम के साथ जी नहीं पाउँगा|
ये सुन भौजी ने अपना हाथ मेरे कंधे पर से हटा लिया और गुस्से में घूर कर मुझे देखने लगीं| अब तक तो मैं माधुरी की इस हालत का दोषी को मान रहा था पर जब भौजी ने मुझे ऐसे देखा तो मैं मन ही मन खुद को उनका दोषी भी बना बैठा! मन ने कहा की मुझे अपना पहलु भौजी के सामने रखना चाहिए, इसलिए मैंने भौजी की कोख पर हाथ रखते हुए कहा;
मैं: मैं अपने होने वाले बच्चे की कसम खता हूँ, मेरा इसमें कोई स्वार्थ नहीं है! ये सब मैं बस खुद को बचाने के लिए कर रहा हूँ!
पर भौजी को मेरी बात का जरा भी विश्वास नहीं हुआ, उन्होंने मेरा हाथ गुस्से से झटक दिया और आँखों में आँसूँ लिए बाहर चली गईं| मैं उनका गुस्सा समझ सकता था और मैंने इसके लिए उन्हें जरा भी दोष नहीं दिया, यही कारन था की मैंने उन्हें नहीं रोका! शायद अब उन्हें छूने तक का अधिकार मैं खो चूका था!
मैं कुछ देर बैठा रहा और सर खुका कर रोता रहा, आज मैंने भौजी का दिल जो तोडा था! इस हालात का मैं ही दोषी था और भौजी जो भी मुझे सजा देंगी वो मैं सर झुका कर मानने को तैयार था! मैंने अपने आँसू पोछे और बाहर आंगन में आगया| बाहर आते ही मुझे रसिका भाभी नजर आईं, मैं उनके पास गया और उनसे हमारे बड़े घर के पीछे बने घर के बारे में पूछने लगा| उन्होंने बताया की वो घर पिताजी के मित्र चौबे जी का है| वो अपने परिवार सहित अम्बाला में रहते हैं, सर्दियों में यहाँ कुछ दिन के लिए आते हैं| बातों बातों में मैंने ये भी पता लगाया की उनके घर की चाबी हमारे पास ही है, क्योंकि उनके आने से पहले घरवाले घर की सफाई करवा देते हैं| मैंने रसिका भाभी से कहा की मेरा वो घर देखने का मन है पर वो मना करने लगीं; "सांझ हो गई, कउनो भूत-प्रेत चिपट गवा तो?!" रसिका भाभी ने घबराते हुए कहा| "कुछ नहीं होगा!" मैंने कहा और उन्हें साथ इस घर के सामने ले आया| घर का ताला खोला तो वो मकड़ी के जालों का घर निकला! तभी वहाँ से एक छिपकली निकल के भागी, जिसे देख रसिका भाभी एक दम से डर के मारे चिलाईन; "हे बाबा!" और मुझसे चिपक गईं| मैंने भाभी के हाथों को अपने जिस्म से अलग किया और कहा; "गई छिपकली|" रसिका भाभी कुछ दूर हुईं और बोलीं; "एहि खातिर हम कहत रहे की हम ना जाबे!"
मैंने भाभी की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और गौर से घर का जायजा लिया| घर की दीवारें कुछ दस-बारह फुट ऊँची थी, आँगन में एक चारपाई थी जिस पर बहुत धुल-मिटटी जमी हुई थी| मैं बाहर आया और घर को चारों ओर से देखने लगा, दरअसल मुझे Exit Plan की भी तैयारी करनी थी ताकि आपात्कालीन स्थिति में मैं भाग सकूँ! अब मैं कोई कूदने मैं एक्सपर्ट तो नहीं था पर फिर भी मजबूरी में कुछ भी कर सकता था| आंगन में पड़ी चारपाई से मुझे कुछ तो सहारा था और बाकी का सहारा मुझे अपने जिस्म की ऊँचाई का था! आंगन की दिवार फाँदना टेढ़ी खीर था पर सिवाए उसके कोई और रास्ता नहीं था! मैंने घर के भीतर थोड़ी और जाँच-पड़ताल की तो मुझे वहाँ कुछ समान मिला जिसकी मदद से मैं आंग के एक छज्जे पर चढ़ सकता था और वहाँ से बाहर कूदना थोड़ा आसान हो जाता! जगह का जायजा लेने के बाद अब ये तो पक्का था की ये ही सबसे अच्छी जगह है, स्कूल में फिर भी खतरा था क्योंकि वो सड़क के किनारे था और तीन बजे के बाद वहाँ ताला लगा होता, वहीँ इस घर की तरफ कोई आता-जाता नहीं था! भौजी मुझे ऐसे चहल-कदमी करते हुए देख रहीं थीं, उन्होंने मुझे छेड़ते हुए पुछा; "बड़ा गौर से देखत हो?!" मेरी चोरी पकड़ी न जाए इसलिए मैंने उन्हें बड़ी चालाकी से झूठ बोला; "भाभी मैंने पिताजी को बात करते हुए सुना था की बड़े घर में कमरे कम पड़ रहे हैं, तो मैंने सोचा की अगर हम लोग ये घर खरीद लें तो?" रसिका भाभी मेरी बातों में आ गईं और वो मन ही मन इस घर को अपना मानने लगीं! उनके चेहरे पर आये लालच के भाव उनके मन की दशा साफ़ बता रहे थे| "अच्छा चलो, घर चलते हैं!" मैंने उनके ख्वाबों को तोड़ते हुए बोला| उस घर को ताला लगा कर हम दोनों बड़े घर लौट आये, मैं जानबूझ आकर उनके पीछे-पीछे रसिका भाभी के कमरे में घुसा ताकि ये देख सकूँ की ये चाभी रखी कहाँ जाती है, ताकि मैं समय आने पर मैं वो चाभी वहाँ से चाबी चुरा सकूँ|
दो ही दिनों में मैंने धोकेबाजी, जालसाजी, फरेबी और चोरी सब सीख ली थी! हलांकि मेरा मन जानता था की मैं ये सब कितनी मजबूरी में कर रहा हूँ! खैर रसिका भाभी ने चाभी मेरे सामने की दिवार पर टाँग दी, चाभी रखने की जगह मैं जान गया था पर भाभी को कोई शक न हो उसके लिए मैं कुछ देर के लिए उनके पास बैठ के इधर-उधर की बातें करने लगा| इतने में नेहा कूदती हुई आई और मेरी पीठ पर चढ़ गई| मुझे वहाँ से निकलने का मौका मिल गया और मैं उसे पीठ पर लादे वहाँ से चल दिया| कल स्कूल जाने को लेकर नेहा बहुत उत्साहित थी, मैं उसे अपनी पीठ पर लादे हुए आंगन में घूमने लगा| रात का खाना हुआ और नेहा मेरी छाती से लिपट कर सो गई| भौजी शाम से ले कर अब तक मुझसे दूर थीं, न कुछ बोल रहीं थीं और न ही मेरे आस-पास आ रहीं थीं! खैर इसमें उनकी गलती नहीं थी, मुझ जैसे धोकेबाज के पास कौन ही आना चाहेगा! कुछ ही पल में दिमाग में फिर से माधुरी की शक्ल आ गई और नाचाहते हुए भी दिमाग मेरा ध्यान उधर खींच कर ले गया| मैं चाहता था की ये काम जल्द से जल्द खत्म हो, पर मैं अपना ये उतावलापन माधुरी को नहीं दिखाना चाहता था, वरना वो सोचती की मैं उससे प्यार करता हूँ! इधर मेरी लाड़ली उठ गई थी क्योंकि उसे बाथरूम जाना था, मैं उसे कल की ही तरह ले गया और बाथरूम करवा कर हाथ-पाँव धुला कर ले आया| कुछ कल रात से ना सोने के कारण जिस्म थका हुआ था और कुछ माधुरी के बारे में सोचने से सर दर्द करने लगा था, इसलिए मुझे नींद आ गई, लेकिन चैन से ना सो सका, क्योंकि तीन बजे मेरी आँख खुल गई| मैंने उठ कर बैठना चाहा पर नेहा मेरी छाती पर ही चढ़ कर सो रही थी सो उठ नहीं पाया| सुबह 5 बजे मैं उठा और मेरे उठते ही नेहा उठी, उसने उठते ही मुझे बड़े प्यार से देखा और फिर मेरे दाहिने गाल पर पप्पी की| इतने में भौजी घर से निकलीं और जब मैंने उन्हें देखा तो उनकी आँखों ने उनका दर्द ब्यान कर दिया| उनकी दोनों आँखें लाल थीं, मतलब वो रात भर रो रहीं थीं! उन्हें देखते ही मुझे खुद से नफरत होने लगी, उस पल मेरी अंतरात्मा ने मुझे सैकड़ों गालियाँ दी! यहाँ तक की एक बार को तो मन ने कहा की जाके आत्महत्या कर ले! पर कुछ तो था जिसने मुझे वो कदम उठाने नहीं दिया! मेरी बुजदिली या भौजी का प्यार?
"अरे बेटा नेहा को तैयार होने दे!" पिताजी बोले तो मैं अपने ख्यालों से बाहर आया और नेहा को नीचे उतारा| उसने सीधा भौजी के घर तक दौड़ लगाई और अपने स्कूल के पहले दिन के लिए तैयार होने लगी| नेहा के तैयार होने तक मैं भी नाहा-धो कर आ गया| भौजी ने नेहा को तैयार किया और नेहा आ कर मेरी गोद में फिर से चढ़ गई| मैं अपनी सड़ी हुई शक्ल से नेहा का पहला दिन बर्बाद नहीं करना चाहता था, इसलिए मैंने अपने चेहरे पर मुस्कान चिपकाई और उससे बात करते हुए स्कूल पहुँचा| स्कूल पहुँचते ही मुझे हेडमास्टर साहब मिले और उनसे कुछ बात कर मैंने नेहा को उसकी क्लास में छोड़ा| जैसे ही मैं बाहर जाने को पलटा की नेहा ने मेरा हाथ पकड़ लिया| उसका स्कूल जाने का सारा जोश ठंडा पड़ गया था और अपने सामने दूसरे गाँव के अनजान बच्चे देख वो घबरा गई थी! आजतक नेहा बीएस हमारे घर के आंगन में खेली-कूदि थी और उस आंगन के बाहर वो आज तक कभी नहीं गई थी, यही कारन था की आज जब उसे अनजान चेहरे देखने पड़े तो वो घबरा गई| "क्या हुआ बेटा?" मैंने पुछा तो नेहा ने मेरी गोद में आने को अपने हाथ खोल दिए| मैंने नेहा को गोद में लिया तो वो रोने लगी; "नहीं..नहीं...नहीं...रोते नहीं!" मैंने नेहा को चुप कराना चाहा तो वो किसी तरह चुप हुई| इतने में मास्टर जी भी आ गए और मुझे नेहा को गोद में ले कर खड़ा देखने लगे| वो कुछ कहते उसके पहले ही मैंने उनसे विनती की; "सर आज नेहा का पहला दिन है तो वो थोड़ी घबराई हुई है| क्या मैं थोड़ी देर के लिए यहीं बैठ जाऊँ? उसका डर खत्म होते ही चला जाऊँगा!" ये सुन कर मास्टर जी हँस पड़े और सर हाँ में हिला कर मुझे बैठने की इजाजत दी| मैंने नेहा को गोद में ले कर बैठ गया; "बेटा ये स्कूल है यहाँ गोदी में नहीं जमीन पर बैठते हैं!" मैंने कहा तो नेहा मेरी गोद से उत्तर कर मेरी बगल में बैठ गई| फिर मास्टर जी ने अपना एक रजिस्टर निकाला और नेहा से बोले; "गुड़िया, तोहार नाम का है?" ये सुन नेहा मेरी ओर देखने लगी ताकि मैं उन्हीं नाम बताऊँ| मैंने नेहा की पीठ पर हाथ रख आकर उसे होंसला दिया तो वो बोली; "नेहा मौर्या"! उसके मुँह से ये सुनकर आज पता नहीं क्या हुआ की मेरे जिस्म के सारे रोएं खड़े हो गए, दिल में एक अजीब से हलचल हुई जो मेरे लिए व्यक्त कर पाना मुश्किल था|
मैं अपने अंदर की इन तरंगों को समझने में लगा था और उधर मास्टर जी ने बड़ी होशियारी से नेहा को बीच में उनके सामने बैठने को कहा| नेहा डरने लगी और मेरी तरफ देखने लगी पर मैं तो अपने ख्यालों में गुम था| उसने अपने नन्हे हाथों से मुझे छुआ तो मैं अपने ख्यालों से बाहर आया| "नेहा हियाँ हमरे लगे बैठो!" मास्टर जी दुबारा बोले तो मैंने गर्दन हाँ में हिलाकर उसे जाने को कहा| डरी-सहमी नेहा जा कर उनके सामने आलथी-पालथी मारकर बैठ गई| मास्टर जी ने अपनी किताब उठाई और 'मछली जल की रानी है' पढ़ने लगे| बाकी बच्चे ये पाठ अच्छे से पढ़ कर आये थे तो वो मास्टर जी के साथ बोलने लगे, बेचारी नेहा अपनी आँखें बड़ी करके उन्हें देखने लगी| जब मास्टर जी ने कहा; 'हाथ लगाओगे तो डर जायेगी!' तो नेहा के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई| ये देख मैं चुप-चाप उठ कर जाने लगा तो वो एकदम से उठी और आ कर मेरी टांगों से लिपट कर रोने लगी| वो समझ गई थी की मैं उसे छोड़कर घर जा रहा हूँ, मैं उसके सामने घुटने मोड़ कर खड़ा हुआ और बोला; "बेटा रोना नहीं! आप कितने बहादुर हो? आप यहाँ बैठ कर पढ़ाई करो और मैं आपको लेने दोपहर को आऊँगा|" पर नेहा नहीं मानी और न में गर्दन हिलाने लगी| "अच्छा ठीक है मैं कहीं नहीं जा रहा, पर यहाँ सिर्फ बच्चे बैठते हैं तो मैं बाहर बैठता हूँ वर्ण मास्टर जी मुझे डाटेंगे! आप यहाँ पढ़ो और जब छुट्टी होगी तब हम दोनों चिप्स खाएंगे! ठीक है?" मैंने नेहा को प्रलोभन दिया तो वो किसी तरह मान गई| मैं उठ कर क्लास से बाहर गया और पेड़ के नीचे बैठ गया, नेहा क्लास में खड़ी मुझे देखती रही की कहीं मैं झूठ तो नहीं बोला रहा! जब उसे इत्मीनान हुआ की मैं कहीं नहीं जा रहा तब जा कर वो अपनी जगह बैठी| अंदर मास्टर जी ने फिर से पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया, मैं 10 मिनट वहाँ बैठा और फिर उठ कर घर लौट आया| घर आ कर मैंने पिताजी को सब बताया तो उन्हें वो दिन याद आ गया जब वो मुझे स्कूल छोड़ने पहली बार गए थे! "मानु की माँ याद है ये कितना रोया था!" पिताजी बोले|
"रोयेगा ही, आपने जो डाँट दिया था!" माँ बोलीं| स्कूल का मेरा पहला दिन बड़ा डरावना था, अपनी माँ की गोद से उतार कर पिताजी ने 20 अनजान बच्चों के बीच छोड़ दिया था ऊपर से जब मैंने स्कूल नहीं जाने को बोला तो और डाँट दिया था! खैर माँ की बात सुन सब हँस पड़े थे सिवाए मेरे और भौजी के! मेरा बड़ा मन था भौजी को कुछ देर पहली हुई वो बात बताने का पर मौका ही नहीं मिल रहा था और जब मौका मिला भी तो भौजी मुँह फेर कर चली गईं| मैं खामोश रहा और सर झुका कर छप्पर के नीचे अकेला बैठा रहा| जैसे ही साढ़े ग्यारह बजे मैं नेहा को लेने स्कूल पहुँच गया और वापस उस पेड़ के नीचे बैठ गया, घर रह कर भौजी का दिल दुखाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था| बारह बजे और नेहा क्लास से बाहर दौड़ती हुई आई और मेरे गले ऐसे लग गई मानो जैसे मुझे कई सालों बाद देखा हो! मैंने भी उसे कस कर अपने गले लगाया और फिर उसे दूकान पर ले आया, वहाँ उसके मनपसंद 'अंकल चिप्स' दिलाये और खाते-खाते हम घर लौटे| घर आ कर नेहा मुझे आज सब बताने लगी की उसने आज स्कूल में कौन-कौन सी कवितायें सीखीं| उसकी मन पसंद कविता थी 'मछली जल की रानी है!' माँ छप्पर के नीचे बैठी नेहा की कविता सुन रही थी और फिर अम्मा से बोलीं; "दीदी मानु जब छोट रहा तब ऊ भी ई कविता गात रहा!" ये सुन अम्मा और माँ दोनों हँस पड़े| भौजी उस समय रसोई में थीं पर वो अब भी खामोश थीं!
दोपहर खाना खाने के बाद नेहा मेरी गोद में चढ़ कर सो गई और मैं उसके पीठ सहलाता रहा| शाम को उठते ही वो बात-बॉल ले आई और हम दोनों खेलने लगे| खेलते-खेलते 6 बजे और मुझे स्कूल के पास कोई खड़ा हुआ दिखाई दिया जो हमारे घर की तरफ देखते हुए हाथ हिला रहा था| मैं जानता था की ये शक़्स कौन है पर मैं वहाँ जाना नहीं चाहता था| इधर माधुरी बार-बार अपना हाथ हिला रही थी और मुझे बुला रही थी| मजबूरन मुझे जाना पड़ा और मैं सर झुका कर स्कूल की ओर चल दिया| वहाँ पहुँच कर मैं उससे 5 कदम की दूरी पर खड़ा हो गया|
माधुरी: मैंने आपकी पहली शर्त पूरी कर दी, मैं शारीरिक रूप से स्वस्थ हो गई हूँ| आप खुद ही देख लो, तो आप कब कर रहे हो मेरी इच्छा पूरी?
माधुरी ने उस्तुकता से पुछा| अचानक मुझे सूझा की क्यों न मैं एक चाँस ले कर देखूँ और माधुरी को मना कर दूँ, शायद वो मान जाए और वैसे भी अब वो तंदुरुस्त हो गई है तो वो अब इतनी जल्दी बीमार तो पड़ नहीं पाएगी! मैं कल ही पिताजी से शहर जाने की बात करके उन्हें मना लूँगा, इससे कम से कम भौजी का दिल तो नहीं टूटेगा!
मैं: देखो...मैंने बहुत सोचा पर मैं तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर सकता, मुझे माफ़ कर दो!!!
मैंने बहुत गंभीर होते हुए कहा|
माधुरी: मुझे पता था की आप कुछ ऐसा ही कहेंगे इसलिए मैं अपने साथ ये लाई हूँ|
ये कहते हुए उसने अपने पीछे से चाक़ू निकाल कर दिखाया| चाक़ू देखते ही मैं हड़बड़ा गया!
माधुरी: मैं आपके सामने, अभी आत्महत्या कर लूँगी!
माधुरी ने मुझे धमकाया तो मेरी बुरी तरह फ़टी! इस वक्त सिर्फ मैं ही इसके पास हूँ और अगर इसे कुछ हो गया तो मैं कहीं का नहीं रहूँगा! इसलिए मैंने अपनी होशियारी छोड़ दी और उससे बोला;
मैं: रुको.. रुको.. रुको... मैं मजाक कर रहा था!
मैंने हड़बड़ी में अपनी चालाकी को मजाक का नाम दे दिया|
माधुरी: नहीं! मैं जानती हूँ आप मजाक नहीं कर रहे थे|
ये कहते हुए माधुरी ने अब चाक़ू अपनी पेट की तरफ मोड़ लिया!
माधुरी: आप मुझे धोका देने वाले हो!
मैं: नहीं..नहीं...ठीक है.... कल... कल करेंगे ... अब प्लीज इसे फेंक दो!
मैंने उसके आगे हाथ जोड़ते हुए कहा| माधुरी ने चाक़ू अपने पेट की तरफ से हटा लिया और ख़ुशी से भरते हुए बोली;
माधुरी: कल कब?
अब मुझे उस वक़्त कुछ नहीं सूझ रहा था, तो मन में जो आया वो बोल दिया;
मैं: शाम को चार बजे, तुम मुझे बड़े घर के पीछे जो घर है वहाँ मिलना|
ये सुनते ही माधुरी की बाछें खिल गईं;
माधुरी: थैंक यू!
मैंने एक लम्बी सांस ली और धीरे-धीरे उसके पास पहुँचा और उसके हाथ से चाक़ू छीन कर दूर फेंक दिया|
मैं: दुबारा कभी भी ऐसी हरकत मत करना!
मैंने माधुरी को गुस्से से चेतावनी देते हुए कहा|
माधुरी: सॉरी आइन्दा ऐसी गलती कभी नहीं करुँगी|
माधुरी हँसते हुए अपने कान पकड़ कर बोली|
मैं उसे अपनी बेरुखी दिखाते हुए बिना कुछ बोले घर लौट आया| जैसे ही आंगन में घुसा तो भौजी मिलीं और मुझे देखते ही वो समझ गईं की मैं माधुरी से मिलकर आया हूँ| चेहरे पर गुस्सा लिए वो मुझसे मुँह फेर कर चली गईं! ऐसा इंसान जिसे आप दिलों जान से चाहते हो, वो आपसे बात करना बंद कर दे तो क्या गुजरती है ये मुझे इन दिनों पता चल रहा था, पर इसमें उनका कोई दोष नहीं था, दोषी तो मैं था! तभी नेहा मेरे पास बॉल ले कर आ गए और खुद बैटिंग करने लगी| मैंने उसे धीरे-धीरे बॉल करानी शुरू कर दी और वो बॉल इधर-उधर मारने लगी| एक-एक कर सभी घरवाले लौट आये और आंगन में चारपाई बिछा कर बैठ गए| पड़ोस के गाँव के जमींदार घर आये थे तो पिताजी ने मुझे उनसे मिलने को अपने पास बुला लिया| वहाँ बातों-बातों में खाने का समय हुआ और सब खाना खाने बैठ गए, पर मैं पेट दर्द का बहाना कर के अपने बिस्तर पर लेट गया| सब को लगा की सच में मेरे पेट में दर्द है, बीएस एक भौजी जानती थीं की बात क्या है पर वो चुप रहीं! नेहा खाना खा कर मेरे पास आई और मेरे से लिपट कर कहानी सुनते-सुनते सो गई| रात जैसे-तैसे कटी और सुबह हुई, अपने दैनिक कार्य निपटा कर मैं नेहा को स्कूल छोड़ने चल दिया| आज सुबह स्कूल जाते समय नेहा उत्साहित थी, उसका स्कूल का डर आज खत्म हो चूका था| नेहा को स्कूल छोड़ कर घर आया तो सवा सात हुए थे और मैं मन ही मन ये मनाने लगा की आज ये समय रुक जाए और घडी में कभी चार बजे ही न! इतने में आसमान से एक बड़ी जोरदार आवाज आई, मैंने सर ऊपर कर के देखा तो पाया की आज तो मौसम का भी मिजाज खराब है! ऐसा लगा मानो आज तो मौसम भी मुझ पर गुस्सा निकालने को तैयार है! अचानक ही पूरे आसमान और हम दोनों (भौजी और मेरे) के रिश्तों पर काले बादल छा चुके थे!
कुछ कटाई का काम रह गया था तो घर के सब लोग वहीं चल दिए थे ताकि बारिश होने से पहले कटाई हो जाए| इधर घर पर सिर्फ मैं और भौजी ही रह गए थे, भौजी रसोई में थीं और मैं कुएं की मुंडेर पर सर झुका कर बैठा था| जैसे ही घडी में साढ़े ग्यारह बजे मैं नेहा को लेने उसके स्कूल चल दिया| बारह बजे उसकी छुट्टी हुई और नेहा को अपनी पीठ पर लादे हुए मैं घर लौटा| भोजन का समय हुआ तो मैंने खाने से मन कर दिया और चुप-चाप आंगन में लेट गया| नेहा मुझे फिर से बुलाने आई पर मैंने उसे प्यार से मना कर दिया| "अब क्या हुआ? खाना क्यों नहीं खा रहा?" पिताजी ने खाना खाते हुए पुछा| "जी वो सुबह से पेट में मरोड़ें उठ रहीं हैं!" मैंने झूठ बोला और दूसरी तरफ करवट ले कर लेटा रहा| "हजार बार मना किया है की बाहर से कुछ मत खाया कर पर ये लड़का बाज नहीं आता!" माँ गुस्से में चिल्लाईं! मैं कुछ नहीं बोला और चुप-चाप माँ की झिड़कियाँ सुनता रहा| खाना खा कर नेहा मेरे पास आ कर लेट गई और सारे घर वाले खेत पर चले गए| नेहा को थपकी देते हुए मैंने सुला दिया और इधर घडी की सुइयाँ टिक..टिक..टिक...टिक..टिक करते-करते तीन की डंडी पर पहुँच गईं!| मैं उठा और सबसे पहले रसिका भाभी के कमरे की ओर चल दिया| किस्मत से वो सो रहीं थीं, मैंने चुप-चाप दिवार से चाभी उठाई और खेतों की ओर चला गया| जल्दी से खेत पहुँच मैं वहीं टहलने लगा ताकि खेत में मौजूद सब को लगे की मैं बोर हो रहा हूँ| इससे पहले कोई कुछ कहे मैं खुद ही बोला; "बहुत बोर हो गया हूँ, मैं जरा नजदीक के गाँव तक टहल के आता हूँ|" किसी ने कुछ नहीं कहा और मैं चुप चाप वहाँ से निकल लिया और सीधा बड़े घर के पीछे वाले घर की तरफ चल पड़ा| घडी में अभी साढ़े तीन हुए थे और जैसे ही वहाँ पहुँचा तो देखा वहाँ माधुरी पहले से ही खड़ी थी!
जारी रहेगा भाग - 7 में.....
वाह गुरु जी क्या अपडेट दिया शब्द नहीं है, ,इस अपडेट के लिए ,बहुत ही उम्दा अपडेट था | आखिरकार मानू ने भौजी को सच बता ही दिया |भौजी मानु की पूरी बात को समझे बिना ही मानु से नाराज हो गई | लेकिन इसमें पूरी गलती मानु की नहीं थी ,,,,मानु की भी अपनी ही मजबूरी थी|
"माधुरी: मैं आपके सामने, अभी आत्महत्या कर लूँगी!
माधुरी ने मुझे धमकाया तो मेरी बुरी तरह फ़टी! इस वक्त सिर्फ मैं ही इसके पास हूँ और अगर इसे कुछ हो गया तो मैं कहीं का नहीं रहूँगा! इसलिए मैंने अपनी होशियारी छोड़ दी और उससे बोला;
मैं: रुको.. रुको.. रुको... मैं मजाक कर रहा था!"




"वो बोली; "नेहा मौर्या"! उसके मुँह से ये सुनकर आज पता नहीं क्या हुआ की मेरे जिस्म के सारे रोएं खड़े हो गए, दिल में एक अजीब से हलचल हुई जो मेरे लिए व्यक्त कर पाना मुश्किल था|"
और यह क्या था गुरु जी यह कुछ समझ में नहीं आया
