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Incest एक अनोखा बंधन - पुन: प्रारंभ (Completed)

Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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Chaliye aaj writer sahab ki prashansa mein do bol likhi jaaye...
Kahani jaise lage ki Garmiyon ke mausam ke baad baarish ka mausam aa gaya ho.. ek suhana ehsaas ke sath... jaise Saawan jo shuru ho chuka hai. Jaise is khushnuma shaam mein meghon ne apni hunkar lagani shuru kardi. barish ke sath sath Dilon dimag mein ek shaanti cha gai ho...aur wo bearish bundo jaise shabd jaise mitti se mil khushboo is kadar faila di ki maahol ek traha romanchit ho uthta ho..
kahani har pehlu jaise hare bhare paido ke hare patton se paani ki bunde athkeliyan karte huye zameen mein samahit ho raha ho .
Aapki lekhni jaise ek anokha karishma hai..... ki likhe gaye shabdo mein jaane kitne rang jindagi ke dikhaate hai, padhte waqt lage ki kirdaar aur unki gatividhiya jaise kabhi aasmaani barf ban kar to kabhi aasmani aag ban kar, kabhi jhadte patton ka khel, to kabhi aag aur paani ka mel, kabhi pyar aur apnapan, kabhi ruthna to kabhi manana, to kabhi baarish barsati hai to kahi bijuri kadkaati hai, kahin aag barsaati hai, to kahi.... gaon ke wo mann moh dene wale drishya... Kitna batau aapko Rockstar_Rocky sahab ki aapki lekhni hai aisi nirali.... jaise saralata ke sath varnan ki gayi koi Kavita ho...
ek reader ke liye isse badi baat kya ho sakti hai ki lekhak jo pathako ke saamne apbiti ko shabdo ke roop me, apne vichaaro ko lekhan ke maadhyam se itne manoram aur uttam tarike se aise vyaakhya karne ek koshish ki hai... ki padhte waqt har ek shabd dil ko chu jaaye... bahut kam aise writer hote hai jo ek kahaani ke mool saar ko aise vyaakhya kar paate hai .. kirdaaro ke baatcheet, gatividhiyo ke vivaran ke alawa bhi lekhak ki apni vyakigat bhaavanaye nihit hoti hai... jaise maanu parchayi ho lekhak sahab ki (Waise jo ki sach hai :D) . Write sahab... aapne lay vadh tarike ke bakhoobi kahani ko badha rahe hai.... Har mod, pehlu ko ek details ke sath explaining bhi kiye hai....

kuch rishte janm ke saath hi milate hain un rishto mein ek alag aatmeeyata hoti hai aur kuchh rishte apne jindagi mein kirdaar khud saamne wale se banate... rishta bhauji aur maanu ka, rishta neha aur maanu ka..एक अनोखा बंधन.. Ek rishta jaha aatmeeyata, ahmiyat, pavitrata se paripoorn hai ... ek achhe writer ke gun, lakshan yeh ki kahani ki jariye, kahani ke kirdaaro ke jariye kahani ke naam ko sarthak kar de.... jisme aap pure tarike se kamyab rahe... :yourock: :yourock:
 

Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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Bdiya update gurujii, bhabhi ji :love:

images-3
:surprised:apne bde bhai ke sath aisa bartaav


ye to Rasika lite hai:D Naina ji
Rachika Bhabhi ko jaisi koi nahi.... wo great great great great great great great great great great great great great great great great great great great great great great great..... greater, greatest hai...
Sachhayi aur achhayi ki raah par hamesha chalne wali..
apne ghar ko mamta may roop mein sambhalne wali.. Jo ek achhi bahu ke sath sath ek achhi beti hai... :adore:
 

Rockstar_Rocky

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तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल
भाग - 4 (1)




अब तक आपने पढ़ा:


उधर बाहर आँगन में लेटे हुए इन्हें भी नींद नहीं आ रही थी, इनके दिल ने मेरे तड़पते दिल के दर्द को महसूस कर लिया था इसलिए ये मुझे अपने प्यार से सँभालने के लिए दबे पाँव घर के भीतर आये| मुझे जागते हुए देख, ये आ कर सीधा मेरे सिरहाने बैठ गए और प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरने लगे| इनके हाथ के उस प्यार भरे स्पर्श ने मेरे तड़पते दिल को शांत कर दिया और करीब दस मिनट बाद ही मेरी आँख लग गई!



अब आगे:

अगली
सुबह, सोनी और जानकी के पति अपने घर लौट गए| हाँ जानकी और सोनी कुछ दिनों के लिए माँ के पास रूक गई थीं| हम दोनों मियाँ-बीवी से तो वैसे भी कोई बात नहीं कर रहा था, हम तो यहाँ बस माँ को सँभालने के लिए रुके थे| वहीं सारा घर अब लगभग खाली हो चूका था और मुझे फिर से मेरे पिताजी की कमी महसूस होने लगी थी| न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता था की पिताजी अभी घर के भीतर से आवाज देंगे और मुझे अपने सीने से लगा लेंगे! लेकिन मेरी ये इच्छा अब कभी पूरी नहीं होने वाली थी!

इधर मेरे भाईसाहब, चरण काका, अनिल और इन्हें श्मशान फूल चुगने जाना था, जिसके बाद ये सभी सीधा अस्ति विसर्जन के लिए हरिद्वार जाने वाले थे| लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था, उसे तो इन्हें घर पर रोके रखना था इसलिए नियति ने अपनी चाल चलते हुए इन्हें छींकें शुरू करवा दी!



दरअसल मार्च के महीने का पहला हफ्ता था ओर ठंड में रात को बाहर खुले आसमान के तले सोने से ही इनकी छींकें शुरू हुई थीं| जब इनकी छींकें शुरू हुई तो इनकी तबियत खराब होने लगी, एक के बाद एक छींकें आने से इनका बदन ठंडा पड़ने लगा था| इन्हें यूँ छींकते देख मैं बहुत घबरा गई थी, मैंने तुरंत जानकी से कहा की वो चरण काका के यहाँ से पानी गर्म कर लाये ताकि ये भाँप ले सकें| जब तक पानी गर्म हो कर आया तब तक लगातार छींकने से इनकी आँखों से पानी आने लगा था! इन्हें यूँ बीमार देख हम सभी चिंतित थे, माँ तो कह रहीं थीं की इनको डॉक्टर के ले जाया जाए मगर ये थे की कहीं जाने के लिए मान ही नहीं रहे थे!

आखिर जानकी गर्म पानी लाइ और इन्होने दस मिनट भाँप ली, तब जा कर इनकी छींकों की रफ़्तार कुछ कम हुई| छींकों की रफ़्तार कम होते ही ये भाईसाहब के साथ जाने को तैयार हो गए मगर मेरे भाईसाहब ने अक्लमंदी दिखाते हुए इन्हें आराम करने को कहा; "तू आराम कर मानु, हम श्मशान से पिताजी की अस्तियाँ ले कर सीधा घर आएंगे फिर हम सब एक साथ यहीं से हरिद्वार निकलेंगे|" ये इतनी जल्दी तो मानने वाले थे नहीं इसलिए मैंने थोड़ी चपलता दिखाई; "थोड़ी देर आराम कर लोगे तो आपकी छींकें बंद हो जाएंगी और आप आराम से हरिद्वार जा पाओगे वरना इसी तरह छींकते रहोगे तो सफर में आपका ध्यान कौन रखेगा?" इन्हें मेरी बात जचि इसलिए ये घर रुकने के लिए मान गए| तब मुझे क्या पता था की मेरी ये दिखाई गई चपलता मुझ पर और मेरे परिवार पर कितनी भारी पड़ने वाली है?!



आखिर भाईसाहब, अनिल और चरण काका फूल चुगने के लिए चले गए| इधर घर पर मैं, माँ, ये, सोनी, जानकी और जानकी की बेटी रह गए थे| "जानकी, आपन जीजा खतिर काली मिर्ची की चाय बनाये लैहौ?! काली मिर्ची की चाय पीहें तभायें आयुष के पापा की छींक बंद होइ!" आज मैंने पहलीबार इन्हें सब के सामने 'आयुष के पापा' कह कर सम्बोधित किया था जिसकी ख़ुशी इनके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान बन कर छलक रही थी!

जानकी चाय बनाने गई और ठीक तभी बच्चों का फ़ोन आ गया| बच्चे थोड़ा उदास थे क्योंकि एक तो उन्हें अपने पापा जी से वीडियो कॉल पर बात करनी थी जो की यहाँ इंटरनेट न होने के कारण नामुमकिन था, दूसरा बच्चों को अपनी नानी जी से मिलने के लिए एक और दिन रुकना था! इन्होने अपनी छींक-छींक कर खराब हुई हालत को सँभाला और बच्चों से अच्छे से बात कर उन्हें प्यार से समझाया|



कुछ देर बाद जानकी चाय बना कर ले आई, गरमा-गर्म चाय पीने से धीरे-धीरे इनकी छींकें काबू में आईं और मैंने रहत की साँस ली| मैं, मेरी माँ और ये बाहर आंगन में बैठे बात कर रहे थे| चूँकि हमारे घर में चूल्हा नहीं जल सकता था इसलिए मेरी दोनों बहनें चरण काका के घर में दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थीं| मैं और मेरी माँ एक चारपाई पर बैठे थे तथा हमारी पीठ सड़क की ओर थी, जबकि ये हमारे सामने यानी सड़क की ओर मुँह कर के बैठे थे जिससे की हमारे घर की ओर कौन आ रहा है ये साफ़ देख सकते थे|



नियति ने अपने सारे पासे फेंक दिए थे, हमें तो बस नियति के इस खेल में अपना-अपना किरदार अदा करना था!


जारी रहेगा भाग 4(2) में...
 

Rockstar_Rocky

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मेरे प्रिय पाठकों,

ये छोटी सी update आप सभी के सामने प्रस्तुत है| इस update के बाद से कहानी मेरे नजरिये से आगे बढ़ेगी|
 

Lib am

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Rachika Bhabhi ko jaisi koi nahi.... wo great great great great great great great great great great great great great great great great great great great great great great great..... greater, greatest hai...
Sachhayi aur achhayi ki raah par hamesha chalne wali..
apne ghar ko mamta may roop mein sambhalne wali.. Jo ek achhi bahu ke sath sath ek achhi beti hai... :adore:
Lagta hai Rachika bhabhi ko sachchai aur achchai aapse hi mili hai Naina ji. Aapko sat sat naman. 🙏🙏🙏
 

Lib am

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तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल
भाग - 4 (1)




अब तक आपने पढ़ा:


उधर बाहर आँगन में लेटे हुए इन्हें भी नींद नहीं आ रही थी, इनके दिल ने मेरे तड़पते दिल के दर्द को महसूस कर लिया था इसलिए ये मुझे अपने प्यार से सँभालने के लिए दबे पाँव घर के भीतर आये| मुझे जागते हुए देख, ये आ कर सीधा मेरे सिरहाने बैठ गए और प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरने लगे| इनके हाथ के उस प्यार भरे स्पर्श ने मेरे तड़पते दिल को शांत कर दिया और करीब दस मिनट बाद ही मेरी आँख लग गई!



अब आगे:

अगली
सुबह, सोनी और जानकी के पति अपने घर लौट गए| हाँ जानकी और सोनी कुछ दिनों के लिए माँ के पास रूक गई थीं| हम दोनों मियाँ-बीवी से तो वैसे भी कोई बात नहीं कर रहा था, हम तो यहाँ बस माँ को सँभालने के लिए रुके थे| वहीं सारा घर अब लगभग खाली हो चूका था और मुझे फिर से मेरे पिताजी की कमी महसूस होने लगी थी| न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता था की पिताजी अभी घर के भीतर से आवाज देंगे और मुझे अपने सीने से लगा लेंगे! लेकिन मेरी ये इच्छा अब कभी पूरी नहीं होने वाली थी!

इधर मेरे भाईसाहब, चरण काका, अनिल और इन्हें श्मशान फूल चुगने जाना था, जिसके बाद ये सभी सीधा अस्ति विसर्जन के लिए हरिद्वार जाने वाले थे| लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था, उसे तो इन्हें घर पर रोके रखना था इसलिए नियति ने अपनी चाल चलते हुए इन्हें छींकें शुरू करवा दी!



दरअसल मार्च के महीने का पहला हफ्ता था ओर ठंड में रात को बाहर खुले आसमान के तले सोने से ही इनकी छींकें शुरू हुई थीं| जब इनकी छींकें शुरू हुई तो इनकी तबियत खराब होने लगी, एक के बाद एक छींकें आने से इनका बदन ठंडा पड़ने लगा था| इन्हें यूँ छींकते देख मैं बहुत घबरा गई थी, मैंने तुरंत जानकी से कहा की वो चरण काका के यहाँ से पानी गर्म कर लाये ताकि ये भाँप ले सकें| जब तक पानी गर्म हो कर आया तब तक लगातार छींकने से इनकी आँखों से पानी आने लगा था! इन्हें यूँ बीमार देख हम सभी चिंतित थे, माँ तो कह रहीं थीं की इनको डॉक्टर के ले जाया जाए मगर ये थे की कहीं जाने के लिए मान ही नहीं रहे थे!

आखिर जानकी गर्म पानी लाइ और इन्होने दस मिनट भाँप ली, तब जा कर इनकी छींकों की रफ़्तार कुछ कम हुई| छींकों की रफ़्तार कम होते ही ये भाईसाहब के साथ जाने को तैयार हो गए मगर मेरे भाईसाहब ने अक्लमंदी दिखाते हुए इन्हें आराम करने को कहा; "तू आराम कर मानु, हम श्मशान से पिताजी की अस्तियाँ ले कर सीधा घर आएंगे फिर हम सब एक साथ यहीं से हरिद्वार निकलेंगे|" ये इतनी जल्दी तो मानने वाले थे नहीं इसलिए मैंने थोड़ी चपलता दिखाई; "थोड़ी देर आराम कर लोगे तो आपकी छींकें बंद हो जाएंगी और आप आराम से हरिद्वार जा पाओगे वरना इसी तरह छींकते रहोगे तो सफर में आपका ध्यान कौन रखेगा?" इन्हें मेरी बात जचि इसलिए ये घर रुकने के लिए मान गए| तब मुझे क्या पता था की मेरी ये दिखाई गई चपलता मुझ पर और मेरे परिवार पर कितनी भारी पड़ने वाली है?!



आखिर भाईसाहब, अनिल और चरण काका फूल चुगने के लिए चले गए| इधर घर पर मैं, माँ, ये, सोनी, जानकी और जानकी की बेटी रह गए थे| "जानकी, आपन जीजा खतिर काली मिर्ची की चाय बनाये लैहौ?! काली मिर्ची की चाय पीहें तभायें आयुष के पापा की छींक बंद होइ!" आज मैंने पहलीबार इन्हें सब के सामने 'आयुष के पापा' कह कर सम्बोधित किया था जिसकी ख़ुशी इनके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान बन कर छलक रही थी!

जानकी चाय बनाने गई और ठीक तभी बच्चों का फ़ोन आ गया| बच्चे थोड़ा उदास थे क्योंकि एक तो उन्हें अपने पापा जी से वीडियो कॉल पर बात करनी थी जो की यहाँ इंटरनेट न होने के कारण नामुमकिन था, दूसरा बच्चों को अपनी नानी जी से मिलने के लिए एक और दिन रुकना था! इन्होने अपनी छींक-छींक कर खराब हुई हालत को सँभाला और बच्चों से अच्छे से बात कर उन्हें प्यार से समझाया|



कुछ देर बाद जानकी चाय बना कर ले आई, गरमा-गर्म चाय पीने से धीरे-धीरे इनकी छींकें काबू में आईं और मैंने रहत की साँस ली| मैं, मेरी माँ और ये बाहर आंगन में बैठे बात कर रहे थे| चूँकि हमारे घर में चूल्हा नहीं जल सकता था इसलिए मेरी दोनों बहनें चरण काका के घर में दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थीं| मैं और मेरी माँ एक चारपाई पर बैठे थे तथा हमारी पीठ सड़क की ओर थी, जबकि ये हमारे सामने यानी सड़क की ओर मुँह कर के बैठे थे जिससे की हमारे घर की ओर कौन आ रहा है ये साफ़ देख सकते थे|



नियति ने अपने सारे पासे फेंक दिए थे, हमें तो बस नियति के इस खेल में अपना-अपना किरदार अदा करना था!


जारी रहेगा भाग 4(2) में...
Sweet and short update.

वक़्त तो गुज़रा मगर कुछ इस तरह
हम चराग़ों की तरह जलते रहे

कैसे कैसे हादसे सहते रहे
फिर भी हम जीते रहे हँसते रहे
 

Sanju@

Well-Known Member
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तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल
भाग - 3


अब तक आपने पढ़ा:


कुछ देर बाद सभी लोग घर लौट आये थे, चरण काका के यहाँ जो कुआँ था वहीं सबने एक-एक कर नहाना शुरू किया| मैंने इनके कपड़े अपनी मझली बहन जानकी के हाथ भेज दिए थे| आज ये पहलीबार मेरी बहन जानकी से मिले थे, दोनों ही शर्मीले थे इसलिए न मेरी बहन कुछ बोली और न ही ये कुछ बोले!



अब आगे:


कपड़े बदलकर ये मुझे ढूँढ़ते हुए घर के भीतर पहुँचे तथा मुझे आंगन की चारपाई पर लेटा हुआ देख, माँ मेरे सिरहाने बैठीं मेरे बालों में हाथ फेर रहीं थीं, ये दृश्य देख तो एकदम से इनके प्राण सूख गए और ये तेजी से मेरे पास आये| मेरी कमर के पास बैठते हुए ये मुझे चिंतित नजरों से देखने लगे, इन्होने माँ से मेरा हाल-चाल पुछा तो माँ ने इन्हें सब बताया;

माँ: बेटा, कउनो घबड़ाये का बात नाहीं है! तोहार जाए का बाद, मुन्नी (मैं) रोवत-रोवत बेहोश होइ गई रही! हम तुरंते वैद जी का बुलाये दिहिन, ऊ आये के मुन्नी की नाड़ी देखिन और कहिन की कउनो घबड़ाये का बात नहीं है! एक तो मुन्नी माँ बने वाली है और फिर ई सब दृश्य देख ऊ (मैं) रोये-रोये के कमजोरी से बेहोश हो गई रही, आज भर आराम करे का है और कलिहाँ से मुन्नी ठीक हुई जाई!

माँ की बात सुन इनकी जान में जान आई|

ये: जान, अपना ख्याल रखा करो, तुम्हें कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगा?!

इन्होने मेरे बाएँ गाल पर हाथ फेरते हुए कहा| इनके इस छोटे से स्पर्श मात्र से ही मेरे चेहरे पर हलकी सी मुस्कराहट आ गई थी! आज सुबह से ये पहला मौका था जब मेरे चेहरे पर थोड़ी सी मुस्कान आई थी और इस मुस्कान को देख कर इनके दिल को करार आ रहा था|

ये: कुछ खाया?

इन्होने प्यार से पुछा तो मैंने अपनी गर्दन न में हिलाई| मेरे सुबह से भूखे रहने की बात सुन ये पुनः चिंतित हो गए;

ये: रुको, मैं सबके लिए कुछ खाने के लिए लाता हूँ|

इतना कह ये उठने को हुए थे की मेरी माँ ने इन्हें रोक दिया;

मेरी माँ: रहे दिहो बेटा, तोहार चरण काका के घरे से आभायें चाय आवत है|

मेरी माँ ने इनके कँधे पर हाथ रखते हुए कहा|



हमारे बीच ये प्यार देख माँ का दिल भर आया था और उनकी आँखें फिर नम हो गई थीं, ये उठ कर खड़े हुए तथ माँ के गले लगते हुए माँ को सँभालते हुए बोले;

ये: माँ आप चिंता मत करो, आपका बेटा है न यहाँ?!

इनकी बात सुन माँ को हिम्मत मिली और वो सर हाँ में हिलने लगीं और इनके माथे को चूमने लगी| अब मुझे कुछ और बात करनी थी ताकि माँ का मन भटका सकूँ;

मैं: माँ-पिताजी (मेरे सास-ससुर) का फ़ोन आया था, आपका फ़ोन तो बंद था इसलिए उन्होंने अनिल के नंबर पर किया| अनिल का फ़ोन माँ के पास था इसलिए माँ ने उनसे बात की, आयुष और नेहा ने भी माँ से बात की तथा दोनों रोये भी बहुत| दोनों (आयुष और नेहा) आपसे बात करना चाह रहे थे तो ज़रा उनको फ़ोन कर लो|

मेरी बात सुन इन्होने तुरंत माँ (मेरी सासु माँ) के नंबर पर कॉल मिलाया, नेहा माँ का फ़ोन पकड़े बैठी थी इसलिए एक घंटी बजते ही उसने फ़ोन उठा लिया;

नेहा: हेल्लो पापा जी?!

ये: मेरा बच्चा कैसा है?

इन्होने नेहा से प्यार से बात शुरू करते हुए पुछा|

नेहा: पापा जी...नाना जी...अब नहीं रहे?

नेहा एकदम से भावुक होते हुए भारी गले से बोली| नेहा का सवाल सुन इनकी आँखें भर आईं मगर फिर भी इन्होने खुद को सँभाला और हम माँ-बेटी से थोड़ा दूर जा कर बोले;

ये: हाँ जी बेटा! आपके नाना जी हमें छोड़ कर भगवान के पास चले गए|

ये जानबूझ कर उठ कर कुछ दूर गए थे ताकि मेरे पिताजी का दुबारा जिक्र होने से मेरी माँ फिर से दुखी न हो जाएँ|

उधर, इनकी बात सुनते ही नेहा रोने लगी, एक बाप अपनी बेटी को कैसे रोता हुआ देखता इसलिए इन्होने नेहा को फ़ोन पर ही हिम्मत बँधानी शुरू कर दी;

ये: बेटा...देखो...आपको strong बनना होगा! अगर आप इस तरह रोओगे तो आयुष को कौन सँभालेगा? फिर आप दोनों भाई-बहन (आयुष और नेहा) रोओगे तो आपके दादा-दादीजी को कितना दुःख होगा और फिर उन्हें कौन सँभालेगा? आप तो मेरा सबसे बहादुर बच्चा हो न?! तो अब रोना नहीं और मेरी गैरहाजरी में आप ही को सबका ख्याल रखना है...ओके?

इन्हें बच्चों को सँभालना अच्छे से आता था, जब भी बच्चे रोते तो ये उन्हें थोड़ी सी जिम्मेदारी दे कर जिम्मेदार बना देते, जिससे की बच्चों का ध्यान खुद पर से हट कर अपने इर्द-गिर्द मौजूद अपने परिवार पर लग जाता| वही अभी भी हुआ, इनकी दी हुई जिम्मेदारी से नेहा ने रोना बंद किया और अपने आँसूँ पोछे| तभी वहाँ आयुष आ गया और उसने इनसे बात की;

ये: मेरा प्यारा बेटा क्या कर रहा है?

इन्होने बड़े प्यार से आयुष से बात शुरू की जिससे आयुष का ध्यान थोड़ा भटक गया|

आयुष: आई मिच्छ यू पापा जी! (I miss you!)

आयुष थोड़ा तुतलाते हुए बोला| इन्होने आयुष के भीतर मौजूद अपने नानाजी को खोने का दुःख महसूस कर लिया था, वो तो आयुष इन पर गया है इसलिए खुद को रोने से रोक रहा था|

ये: बेटा आई मिस यू टू! (I miss you too!)

इनकी बात सुन आयुष भावुक हो गया और रोने लगा| नेहा उसकी बगल में बैठी थी इसलिए नेहा अपनी बड़ी बहन होने का फ़र्ज़ निभाते हुए आयुष को चुप करवा रही थी|

ये: बेटा रोते नहीं! आप रोओगे तो आपकी नानी जी को कौन सँभालेगा?

इन्होने मेरी माँ का यानी आयुष की नानी जी को सँभालने की जिम्मेदारी आयुष को दी तो आयुष ने खुद को सँभाला और अपने आँसूँ पोछते हुए अपने पापा जी से बोला;

आयुष: पापा जी…मुझे नानी जी से बात करनी है!

ये तुरंत हम माँ-बेटी के पास लौटे और फ़ोन स्पीकर पर डालते हुए आयुष से बोले;

ये: बेटा मैं आपकी नानी जी के पास बैठा हूँ और फ़ोन स्पीकर पर है|

आयुष: नानी जी...मैं है न...कल आ रहा हूँ...फिर है न...मैं आपको बहुत सारी पप्पी दूँगा! आपके लिए चॉकलेट...लाऊँगा....और आपको रोज़ कहानी सुनाऊँगा!

आयुष की भोलेपन से भरी बातें सुन मेरी माँ के चेहरे पर गर्वपूर्ण मुस्कान आ गई क्योंकि एक छोटा सा बच्चा उन्हें अपना प्यार दे कर सँभालना जो चाहता था|

मेरी माँ: ठीक है हमार बेटा, हम तोहार रस्ता देखित है!

इतने में पीछे से नेहा भी बोली;

नेहा: नानी जी, मेरा इंतज़ार भी करोगे न?

नेहा का बचपना देख माँ के चेहरे पर मुस्कान आ गई और वो बोलीं;

मेरी माँ: अरे ई कहे वाली बात थोड़े ही है मुन्नी! तू दुनों को ही तो देखे खतिर हम बैठी हन!

अपनी नानी जी की बात सुन दोनों बच्चों ने फ़ोन पर ही माँ को पप्पी दी तथा फ़ोन पिताजी (मेरे ससुर जी) को दे कर चले गए|



पिताजी: बेटा कैसा है तू? समधन जी से बात हुई थी और उन्होंने बताया था की बहु की तबियत गड़बड़ा गई थी, अब बहु की तबियत कैसी है?

पिताजी चिंता करते हुए पूछने लगे| इन्होने फ़ोन स्पीकर से हटाया और हमारे पास बैठे ही बात करने लगे;

ये: माफ़ करना पिताजी, मैं आपको यहाँ पहुँच कर फ़ोन नहीं कर पाया!

इन्होने माफ़ी माँगते हुए बात शुरू की|

पिताजी: कोई बात नहीं बेटा, मैं समझ सकता हूँ की वहाँ पहुँच कर तू बहुत दुखी था और फिर सभी कुछ तुझे सँभालना भी था!

ये तो पहले से ही बहुत भावुक थे और फिर यहाँ पहुँच कर मेरे पिताजी को देख इन पर क्या बीती होगी इसका पिताजी को अंदाजा था इसीलिए वो गुस्सा नहीं थे|

ये: जी संगीता अब ठीक है, हम बस चाय ही पीने जा रहे थे| आप और माँ कैसे हैं? बच्चे बहुत रो रहे होंगे न?!

पिताजी: आयुष तुम्हारे जाने के बाद जगा था और तुझे घर पर न पाकर उदास हो गया था| फिर मैंने उसे उसके नाना जी के देहांत के बारे में बताया तो आयुष बहुत रोया| जब नेहा आई तो उसे तेरी माँ ने सब बात बताई तो वो भी बहुत रोई| दोनों बच्चों को तुझसे बात करनी थी मगर तेरा फ़ोन बंद था, इसलिए मैंने उन्हें समझा-बुझा दिया की शाम को तेरे से बात होगी|

पिताजी की बात सुन ये उन्हें आश्वस्त करते हुए बोले;

ये: पिताजी, अब मेरे से बात हो गई दोनों बच्चों की तो अब आयुष और नेहा आपको तंग नहीं करेंगे| रात की लखनऊ मेल की टिकट मिल गई न आपको?

जब इन्होने ट्रैन के बारे में पुछा तो पिताजी थोड़ा चिंतित होते हुए बोले;

पिताजी: बेटा आज रात की टिकट तो नहीं मिली, कल रात की मिली है! अकेला आना होता तो मैं रात की रोडवेज की बस पकड़ कर आ जाता मगर बच्चों के साथ इस तरह आना मुश्किल है|

ये: कोई बात नहीं पिताजी, आप कल रात की गाडी (ट्रैन) से आ जाइये|

इन्होने पिताजी को निश्चिंत करते हुए कहा| पिताजी के परसों आने की बात सुन मैं और माँ खामोश रहे क्योंकि हम जानते थे की पिताजी के लिए माँ तथा दोनों बच्चों को अकेला सँभालना आसान नहीं होगा|

पिताजी से बात खत्म हुई ही थी की अनिल हम सबके लिए चाय ले आया| हमें चाय दे कर अनिल बाहर चला गया, चाय पीते हुए मेरी माँ इनसे बोलीं;

मेरी माँ: समधी जी और समधन जी परसों सुबह आवत हैं?

ये: जी माँ, पिताजी को आज रात की टिकट नहीं मिली| शाम हो चुकी है और उत्तर प्रदेश परिवहन की आखरी वॉल्वो (Volvo) भी निकल चुकी थी इसलिए सबा परसों सुबह पहुँचेंगे| तब तक आपका ये बेटा है आपके पास!

इनकी बात सुन माँ ने इनके सर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया और बोलीं;

मेरी माँ: तोहार ई बचपने पर ही तो हम और अनिल के बापू मोहात रहे! जानत हो कलिहाँ शाम एहि समय तोहार ससुर जी कतना खुस रहे? हम आभायें तक उनका कभौं अतना खुस नाहीं देखेन| कलिहाँ ऊ (मेरे पिताजी) तोहार बहुत बड़ाई करत रहे, कहत रहे की मानु हमार सभय दुःख-तकलीफ दूर कर दिहिस, अइसन आज्ञाकारी मुन्ना पाइके तो हर माँ-बाप धन्य हो जाए!

इन्हें अपनी बड़ाई सुनने का कभी शौक नहीं था इसलिए ये सर झुकाये बैठे थे, तभी मेरी माँ ने पिताजी की अंतिम इच्छा का ज़िक्र किया;

मेरी माँ: तोहार ससुर जी का सर पर कउनो कर्ज़ा, कउनो ग़म नाहीं रहा और एहि से ऊ कल कहत रहे की 'अनिल का कोर्स पूर हुई जाए तो ऊ अच्छी नौकरी पकड़ लेइ, फिर मानु से कहेऊ की ऊ ही अनिल खतिर कउनो अच्छी लड़की पसंद करि के ओकर (अनिल का) ब्याहव कराये देइ!'

माँ की बात सुन मुझे ऐसा लगने लगा जैसे पिताजी को पहले ही अंदेशा था की वो हम सबको छोड़ कर जाने वाले हैं|

मेरी माँ: जब हम तोहार ससुर जी से कहिन की अइसन काहे कहत हो तो कहे लागे; 'अब हमार सभाएं फ़र्ज़ पूर हुई गए! हमार मुन्ना से कहेऊ की हमार एक आखरी इच्छा जरूर पूरी करी, कल का अगर हमका कछु हुई जाए तो ओहि का हमार चिता का आग देय का है!'

इतना कह माँ भाव-विभोर हो उठीं और इन्होने माँ को सँभालते हुए अपने गले लगा लिया|

मेरी माँ: हम नहीं जानित कैसे...लेकिन तोहार ससुर जी का....कलिहाँ अंदेसा हुई गवा रहा की ऊ हम सभाएं का छोड़ कर जावत हैं!

मेरी माँ ने सिसकते हुए इनके सीने से लगे हुए कहा|

ये: माँ...जो दिल के पाक-साफ़ लोग होते हैं पुण्यात्मा होते हैं…उन्हें पहले से ही ऐसा अंदेसा हो जाता है...फिर पिताजी (इनके ससुर) ने अपने पिता होने का दायित्व अच्छी तरह से निभाया था| अपनी तीन बेटियों की अच्छे से शादी की, अनिल को पढ़ाया... और उनकी जो ख्वाइशें अधूरी रह गई हैं उन्हें हम...उनके बच्चे मिलकर पूरा करेंगे!

इन्होने मेरी माँ को ढाँढस बँधाते हुए कहा|



हम दोनों मियाँ-बीवी, माँ से बातें करते हुए माँ को सँभाल रहे थे की तभी वो शक़्स मेरे सामने आया जिसके आने की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी… मेरे भाईसाहब!

मैं: आपकी हिम्मत कैसे हुई इस घर में आने की?

मैं चीखती हुई एकदम से उठी और अपने भाईसाहब की गर्दन पकड़ने को लपकी, लेकिन तभी इन्होने मुझे अपनी बाहों में कैद कर आगे बढ़ने से रोक लिया| दरअसल भाईसाहब, माँ और इनसे विदा लेने आये थे, परन्तु उन्हें क्या पता था की यहाँ उनका सामना मुझसे होगा?! इधर इनके द्वारा मुझे पकड़ लेने से मैं छटपटाने लगी थी;

मैं: आप (ये) छोड़ दो मुझे, मैं इन्हें (मेरे भाईसाहब को) नहीं छोडूंगी!

मैंने खुद को इनकी पकड़ से छुड़ाने का प्रयास करते हुए कहा, मगर इनकी पकड़ मज़बूत थी इसलिए मैं खुद को इनकी पकड़ से छुड़ा न सकी|

ये: संगीता होश में आओ, क्या बकवास कर रही हो!

इन्होने मुझे डाँटते हुए कहा और तब मुझे होश आया की मैंने आजतक इन्हें अपने भाईसाहब के बारे में कुछ नहीं बताया तो ये मेरा गुस्सा कैसे समझते इसलिए इनका मुझे डाँटना जायज लगा|

मैं: आप नहीं जानते इन्होने...

मैं अपनी बात अभी आधी ही कह पाई थी की ये मेरी बात काटते हुए बोले;

ये: मैं सब जानता हूँ! अब होश में आओ!

इन्होने मुझे पीछे खींचा और मेरे दोनों कँधे पकड़ कर मेरी आँखों में देखते हुए कहा;

ये: भाईसाहब अपने किये पर बहुत शर्मिंदा हैं, उनकी आँखों में बस आत्मग्लानि है! Look at him...he...he's broken!

मेरे गुस्से में आ कर कहे शब्दों को सुन कर इनकी आँखों में मुझे गुस्सा नजर आया जिसे देख मैं घबरा गई और शांत हो गई| इनका दिल साफ़ था इसलिए इन्होने भाईसाहब को माफ़ कर दिया था मगर मैं अपने भाईसाहब पर विश्वास नहीं कर रही थी!

ये: भाईसाहब, संगीता की तरफ से मैं माफ़ी माँगता हूँ!

इन्होने भाईसाहब के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा| भाईसाहब ने एकदम से इनके हाथ पकड़ लिए और आँखों में आँसूँ लिए बोले;

भाईसाहब: ऐसा न कहो मानु! संगीता सही कहती है, मैं इस लायक ही नहीं की इस घर में एक पल भी रुक सकूँ! मैं तो बस आप सब से विदा लेने आया था!

ये कहते हुए मेरे भाईसाहब का सर शर्म से झुक गया| बचपन से ले कर आज तक मैंने अपने भाईसाहब को किसी के आगे यूँ सर झुकाते हुए नहीं देखा था, वो इतने बलिष्ट थे के सभी उनके आगे सर झुकाते थे इसलिए ये दृश्य देख कर मैं अवाक रह गई| हाँ वो बात अलग है की मुझे अब भी उन पर रत्तीभर विश्वास नहीं था!

ये: भाईसाहब इस मुश्किल घडी में आप भी इस घर को छोड़ कर चले जायेंगे तो माँ को कौन सँभालेगा?

इन्होने भाईसाहब को माँ का वास्ता दे कर रोकना चाहा| मुझे ये न मंजूर था मगर इनके डर के मारे मेरी घिघ्घी बँध गई थी!

भाईसाहब: तुम्हारे होते हुए मुझे अब कोई चिंता नहीं!

भाईसाहब ने इनके कँधे पर हाथ रख अपना विश्वास जताया| मुझे लगा था की ये मान जायेंगे, परन्तु इन्हें तो जैसे भाईसाहब को घर में रोकने का भूत सवार हो गया था?! :girlmad:

ये: मैं आपको कहीं नहीं जाने दूँगा!

इन्होने अपना हक़ जताते हुए कहा और भाईसाहब का हाथ पकड़ उन्हें बाहर ले आये तथा बैठ कर मनाने लगे| आखिर भाईसाहब इनकी बात मान गए और पंद्रह दिन के लिए रुकने को मान गए| इधर माँ मेरे पास खामोश खड़ीं थीं, वो मेरा भाईसाहब के लिए गुस्सा जानती थीं इसीलिए उन्होंने भाईसाहब की ज़रा भी पैरवी नहीं की|



कुछ समय बाद ये भाईसाहब से बात कर के मेरे पास लौटे तथा माँ को भाईसाहब के पास जाने के लिए बोला| माँ बाहर गईं तो ये मेरे सामने चारपाई पर बैठ गए, इन्हें अपने सामने देख डर के मारे मेरा सर अपने आप झुक गया| लेकिन इस बार इन्होने मुझे नहीं डाँटा बल्कि बड़े ही प्यार से मुझसे बात शुरू की;

ये: मेला बाबू... इस तरह गुच्छा (गुस्सा) नहीं करते!

इन्होने मुझे बच्चों की तरह लाड करते हुए तुतला कर समझाते हुआ कहा| इनका प्यार देख मेरा डर खत्म हुआ और मैंने हिम्मत करते हुए कहा;

मैं: जानू, आप ने आजतक जो फैसला लिया मैंने आपका साथ दिया क्योंकि मैं जानती थी की आप कभी कोई गलत फैसला नहीं ले सकते| लेकिन आज मुझे आपका यूँ भाईसाहब का पक्ष लेना अच्छा नहीं लगा!

ये: जानता हूँ जान, लेकिन हर बार सिर्फ हमें अपने स्वार्थ के बारे में ही नहीं सोचना चाहिए! भाईसाहब ने जो किया वो पाप था, लेकिन उन्हें इसकी सजा तुम नहीं भगवान देगा| फिर ये भी तो सोचो की इस वक़्त माँ को उनके बड़े बेटे की कितनी जर्रूरत है?! तुम जानती हो न की माँ भाईसाहब से कितना प्यार करती हैं?! भले ही घर में सब भाईसाहब को भूल गए हों मगर आजतक माँ कभी अपने बड़े बेटे को नहीं भूल पाईं!

इनकी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी की मैं बीच में बोल पड़ी;

मैं: मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ की माँ भाईसाहब से कितना प्यार करती हूँ, पिताजी ने जब भाईसाहब को घर से निकला था तो माँ आधी-आधी रात को भाईसाहब को याद कर रोया करती थीं मगर इस घर को अपने बड़े बेटे की नहीं आपकी जर्रूरत है! आपके होते हुए माँ को किसी बड़े बेटे की जर्रूरत नहीं!

मैं इनसे बहस करते हुए बोली|

ये: जान मेरी बात को समझने की कोशिश करो, मैं अपनी जिम्मेदारियों से पीछा नहीं छुड़ा रहा बस व्यवहारिक हो कर सोच रहा हूँ| मैं यहाँ गाँव में नहीं रह सकता क्योंकि वहाँ शहर में काम कौन सँभालेगा? अनिल इस वक़्त मुंबई में पढ़ रहा है, माँ यहाँ गाँव में अकेली नहीं रह सकतीं और न ही वो हमारे साथ दिल्ली जाएँगी क्योंकि यहाँ घर कौन देखेगा फिर? अब तुम बताओ की क्या हम माँ को यहाँ अकेला रहने दें?

इनकी बात सुन मैं सोच में पड़ गई, क्योंकि मैंने अभी तक नहीं सोचा था की माँ यहाँ अकेली कैसे रहेंगी?! इधर मैं सोच में पड़ी तो ये मुझे समझाते हुए बोले;

ये: एक बस भाईसाहब हैं जो यहाँ माँ के पास अपने परिवार सहित रह सकते हैं, जिससे इस घर की भी देखभाल होगी और माँ को अपने बड़े बेटे तथा उसके परिवार के साथ हँसी-ख़ुशी रहने का मौका भी मिलेगा|

इनकी बात सही थी, मेरी माँ मेरे साथ दिल्ली में रहने के लिए कभी नहीं मानती और यहाँ मैं उन्हें अकेला भी नहीं छोड़ सकती थी| भाईसाहब का सपरिवार यहाँ रहना मुझे माँ की भलाई के लिए एक समझौता लग रहा था, कोई और दिन होता तो मैं ये समझौता कभी नहीं करती मगर इस समय मैं इस समझौते को करने के लिए तैयार थी|

ये: देखो जान, समय के साथ इंसान बदल जाता है| भाईसाहब में भी बहुत बदलाव आया है, लखनऊ में उनका अपना मसालों का कारोबार है| फिर ये भी देखो की माँ ने उन्हें (भाईसाहब को) माफ़ आकर दिया, अनिल ने माफ़ कर दिया, जानकी ने भी उन्हें माफ़ कर दिया और मुझे पूरा यक़ीन है की अगर पिताजी आज ज़िंदा होते तो वो भी भाईसाहब को जर्रूर माफ़ कर देते, आखिर हमें भी पिताजी ने माफ़ किया था न?!

इनकी कही अंतिम बात मुझे बहुत चुभी क्योंकि इन्होने अनजाने में हमारे प्यार की तुलना भाईसाहब के पाप से कर दी थी!

मैं: हमने कौनसा पाप किया था जो पिताजी ने हमें माफ़ कर दिया?! हमने तो सच्चा प्यार किया था जिसे पिताजी ने आदरपूर्वक स्वीकारा था|

मैंने थोड़ा गुस्से से कहा|

ये: जान, मेरा वो मतलब नहीं था! मेरा मतलब था की माँ-बाप अपने बच्चों की हर गलती माफ़ कर देते हैं, जर्रूरत होती है तो बस बच्चों को उनकी गलती का एहसास होने की! आज जब मैं भाईसाहब से मिला तो मैंने उनकी आँखों में पश्चाताप के आँसूँ देखे, उनके भीतर मौजूद ग्लानि उन्हें खाये जा रही है! इंसान को उसकी गलती सुधारने का एक मौका तो मिलना ही चाहिए न?

इनकी ये बात सुन कर मैं खामोश हो गई क्योंकि इनकी इस बात के आगे मेरा कोई तर्क काम नहीं आता| हाँ इतना तय था की मैं भाईसाहब को माफ़ नहीं करने वाली!

ये: अब गुस्सा छोड़ दो और भाईसाहब को माफ़ कर दो!

इन्होने मुस्कुराते हुए कहा|

मैं: नहीं! मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं कर सकती!

मैंने बड़ी सख्ती से कहा, जिसे सुन कर ये खामोश हो गए| मेरे मन में बैठा भाईसाहब के लिए क्रोध इतनी जल्दी ठंडा नहीं होने वाला था| लेकिन फिर अगले ही पल मुझे एहसास हुआ की मैं अपने भाईसाहब का गुसा अपने पति पर निकाल रही हूँ इसलिए शर्म से मेरा सर झुक गया| मुझे यूँ सर झुकाये बैठा देख ये मुझसे प्यार से बोले;

ये: अच्छा बाबा, आपको जो ठीक लगता है वो करो पर मेरे लिए अपना ये गुस्सा तो छोडो!

इन्होने मुस्कुराते हुए इतने प्यार से कहा की मेरे दिल को आराम मिला की मैंने इनके दिल को नहीं दुखाया है| मैंने इन्हें अपनी बगल में बैठने को कहा तथा इनके कँधे पर सर रख कर बैठ गई|



जब से हमलोग आये थे तब से मेरी दोनों बहनों के ससुराल वालों ने हम दोनों मियाँ-बीवी से दूरी बनाई हुई थी| मेरी दोनों बहनों में से बस जानकी ही थी जो मेरे से बात कर रही थी, सोनी से न तो मेरी बात करने की इच्छा थी और न ही उसने मुझसे बात करने में कोई इच्छा जाहिर की थी| जैसे ही रात ढलने लगी तो मेरी दोनों बहनों के ससुराल वाले अपने-अपने घर चले गए, रह गए तो बस अनिल के दोनों जीजा| एक गौर करने वाली बात ये थी की घर में चन्दर के साथ हुई इनकी हाथापाई की खबर किसी को नहीं थी, यहाँ तक की इन्होने मुझे भी ये बात बताना जर्रूरी नहीं समझा था|

खैर, चरण काका के घर से हम सबके लिए खाना बन कर आ चूका था| मेरे भाईसाहब, अनिल, चरण काका और मेरी दोनों बहनों के पति सब बाहर आंगन में बैठे खाना खा रहे थे| जबकि ये बाहर सब मर्दों के साथ न बैठकर मेरे पास बैठे हुए थे इसलिए इनका खाना परोस कर मेरी बहन जानकी घर के भीतर ही ले आई थी| इन्होने खाने की थाली ली और माँ की बगल में बैठ गए तथा उन्हें खाना शुरू करने को कहा;

मेरी माँ: तू खाओ मुन्ना, हम खा लेब!

मेरी माँ इनके गाल पर हाथ फेरते हुए बोलीं|

ये: हम पाहिले काहे खाई? हम तो आप सभी के संगे खाब!

इनकी ये टूटी-फूटी देहाती सुन माँ हँस पड़ीं और उन्हीं के साथ मैं तथा मेरी दोनों बहनें भी हँसने लगी! इनका ये भोलापन सभी को भा गया था और घर में ग़म का माहौल हँसी-ख़ुशी भरा हो गया था| माँ ने मुस्कुराते हुए जानकी से कहा की वो हम सभी स्त्रियों का खाना परोस कर घर के भीतर ही ले आये| जानकी और उसकी बेटी एक-एक कर सबकी थालियाँ परोस लाईं तथा हम सभी ने खाना शुरू किया| खाना खाते हुए मैंने इनका तार्रुफ़ जानकी से कराया;

मैं: मेरी छोटी बहन जानकी से मिले की नहीं आप?

ये कुछ जवाब देते उससे पहले ही जानकी बोल पड़ी;

जानकी: हम कपड़ा लेके गयन रहन पर जीजा, कछु बोलतेय नाहीं!

जानकी ने इन्हें साली की तरह प्यारभरा उल्हाना दिया|

ये: गीले बदन खड़ा था, ठंड ऊपर से लग रही थी! पहले कपड़े पहनता या आप से बात करता? फिर आप भी कहाँ मेरे कपड़े पहनने तक रुके, आप भी तो कपड़े दे कर भाग गए!

इन्होने थोड़े मजाकिया ढंग से जानकी के उलहाने का जवाब दिया| दोनों जीजा-साली का ये प्यारा सा मज़ाक देख कर मैं और माँ मुस्कुराये जा रहे थे क्योंकि इस मज़ाक में कहीं से भी कुछ गंदापन नहीं था| उधर अब तक खामोश बैठी सोनी बीच में अपनी टाँग अड़ाते हुए बोल पड़ी;

सोनी: चलो दीदी का तो नाहीं चीनहत रहेओ मगर हमका तो चीन्हत रहेओ, हमसे कौन सा बात कर लिहो?!

सोनी की बात में गन्दी शरारत छुपी थी, उसकी ये दोमुही बात सुन मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं बीच में बोल पड़ी;

मैं: कुछ लोगो से बात करने से पहले उनका चरित्र देखा जाता है!

मेरी कही ये बात सोनी को बहुत बुरी लगी और वो अपना सड़ा हुआ मुँह ले कर मुझे देखने लगी, वहीं मैंने भी भोयें सिकोड़ कर उसे देखना शुरू किया| हम दोनों बहनों की ये तकरार सिवाए इनके और मेरी बहन जानकी के कोई नहीं जानता था इसीलिए दोनों जीजा-साली खामोश बैठे थे| उधर माँ को मेरी बात अच्छी नहीं लगी और वो मुझसे पूछने ही वाली हुई थीं की तभी जानकी ने बात शुरू करते हुए माँ का ध्यान भटका दिया|



खाना खा कर सभी आदमी बाहर आंगन में लेट चुके थे, हम सभी स्त्रियाँ यहाँ घर के भीतर लेटी हुई थीं| माँ और मेरी दोनों बहनें तो सो चुकी थीं मगर मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी| इस सन्नाटे में मुझे मेरे पिताजी की मौजूदगी का एहसास हो रहा था, बार-बार लगता था की अभी पिताजी घर के भीतर आएंगे और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए मुझे जगायेंगे!

उधर बाहर आँगन में लेटे हुए इन्हें भी नींद नहीं आ रही थी, इनके दिल ने मेरे तड़पते दिल के दर्द को महसूस कर लिया था इसलिए ये मुझे अपने प्यार से सँभालने के लिए दबे पाँव घर के भीतर आये| मुझे जागते हुए देख, ये आ कर सीधा मेरे सिरहाने बैठ गए और प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरने लगे| इनके हाथ के उस प्यार भरे स्पर्श ने मेरे तड़पते दिल को शांत कर दिया और करीब दस मिनट बाद ही मेरी आँख लग गई!


जारी रहेगा भाग 4 में...
बहुत ही शानदार अपडेट है बहुत ही गम भरा अपडेट है बड़े भाईसाहब का मिलना उनका इस अपडेट में जिक्र करना मानू भाई का बड़े भाईसाहब का हक दिलाना very interesting
 

Akki ❸❸❸

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तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल
भाग - 4 (1)




अब तक आपने पढ़ा:


उधर बाहर आँगन में लेटे हुए इन्हें भी नींद नहीं आ रही थी, इनके दिल ने मेरे तड़पते दिल के दर्द को महसूस कर लिया था इसलिए ये मुझे अपने प्यार से सँभालने के लिए दबे पाँव घर के भीतर आये| मुझे जागते हुए देख, ये आ कर सीधा मेरे सिरहाने बैठ गए और प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरने लगे| इनके हाथ के उस प्यार भरे स्पर्श ने मेरे तड़पते दिल को शांत कर दिया और करीब दस मिनट बाद ही मेरी आँख लग गई!



अब आगे:

अगली
सुबह, सोनी और जानकी के पति अपने घर लौट गए| हाँ जानकी और सोनी कुछ दिनों के लिए माँ के पास रूक गई थीं| हम दोनों मियाँ-बीवी से तो वैसे भी कोई बात नहीं कर रहा था, हम तो यहाँ बस माँ को सँभालने के लिए रुके थे| वहीं सारा घर अब लगभग खाली हो चूका था और मुझे फिर से मेरे पिताजी की कमी महसूस होने लगी थी| न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता था की पिताजी अभी घर के भीतर से आवाज देंगे और मुझे अपने सीने से लगा लेंगे! लेकिन मेरी ये इच्छा अब कभी पूरी नहीं होने वाली थी!

इधर मेरे भाईसाहब, चरण काका, अनिल और इन्हें श्मशान फूल चुगने जाना था, जिसके बाद ये सभी सीधा अस्ति विसर्जन के लिए हरिद्वार जाने वाले थे| लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था, उसे तो इन्हें घर पर रोके रखना था इसलिए नियति ने अपनी चाल चलते हुए इन्हें छींकें शुरू करवा दी!



दरअसल मार्च के महीने का पहला हफ्ता था ओर ठंड में रात को बाहर खुले आसमान के तले सोने से ही इनकी छींकें शुरू हुई थीं| जब इनकी छींकें शुरू हुई तो इनकी तबियत खराब होने लगी, एक के बाद एक छींकें आने से इनका बदन ठंडा पड़ने लगा था| इन्हें यूँ छींकते देख मैं बहुत घबरा गई थी, मैंने तुरंत जानकी से कहा की वो चरण काका के यहाँ से पानी गर्म कर लाये ताकि ये भाँप ले सकें| जब तक पानी गर्म हो कर आया तब तक लगातार छींकने से इनकी आँखों से पानी आने लगा था! इन्हें यूँ बीमार देख हम सभी चिंतित थे, माँ तो कह रहीं थीं की इनको डॉक्टर के ले जाया जाए मगर ये थे की कहीं जाने के लिए मान ही नहीं रहे थे!

आखिर जानकी गर्म पानी लाइ और इन्होने दस मिनट भाँप ली, तब जा कर इनकी छींकों की रफ़्तार कुछ कम हुई| छींकों की रफ़्तार कम होते ही ये भाईसाहब के साथ जाने को तैयार हो गए मगर मेरे भाईसाहब ने अक्लमंदी दिखाते हुए इन्हें आराम करने को कहा; "तू आराम कर मानु, हम श्मशान से पिताजी की अस्तियाँ ले कर सीधा घर आएंगे फिर हम सब एक साथ यहीं से हरिद्वार निकलेंगे|" ये इतनी जल्दी तो मानने वाले थे नहीं इसलिए मैंने थोड़ी चपलता दिखाई; "थोड़ी देर आराम कर लोगे तो आपकी छींकें बंद हो जाएंगी और आप आराम से हरिद्वार जा पाओगे वरना इसी तरह छींकते रहोगे तो सफर में आपका ध्यान कौन रखेगा?" इन्हें मेरी बात जचि इसलिए ये घर रुकने के लिए मान गए| तब मुझे क्या पता था की मेरी ये दिखाई गई चपलता मुझ पर और मेरे परिवार पर कितनी भारी पड़ने वाली है?!



आखिर भाईसाहब, अनिल और चरण काका फूल चुगने के लिए चले गए| इधर घर पर मैं, माँ, ये, सोनी, जानकी और जानकी की बेटी रह गए थे| "जानकी, आपन जीजा खतिर काली मिर्ची की चाय बनाये लैहौ?! काली मिर्ची की चाय पीहें तभायें आयुष के पापा की छींक बंद होइ!" आज मैंने पहलीबार इन्हें सब के सामने 'आयुष के पापा' कह कर सम्बोधित किया था जिसकी ख़ुशी इनके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान बन कर छलक रही थी!

जानकी चाय बनाने गई और ठीक तभी बच्चों का फ़ोन आ गया| बच्चे थोड़ा उदास थे क्योंकि एक तो उन्हें अपने पापा जी से वीडियो कॉल पर बात करनी थी जो की यहाँ इंटरनेट न होने के कारण नामुमकिन था, दूसरा बच्चों को अपनी नानी जी से मिलने के लिए एक और दिन रुकना था! इन्होने अपनी छींक-छींक कर खराब हुई हालत को सँभाला और बच्चों से अच्छे से बात कर उन्हें प्यार से समझाया|



कुछ देर बाद जानकी चाय बना कर ले आई, गरमा-गर्म चाय पीने से धीरे-धीरे इनकी छींकें काबू में आईं और मैंने रहत की साँस ली| मैं, मेरी माँ और ये बाहर आंगन में बैठे बात कर रहे थे| चूँकि हमारे घर में चूल्हा नहीं जल सकता था इसलिए मेरी दोनों बहनें चरण काका के घर में दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थीं| मैं और मेरी माँ एक चारपाई पर बैठे थे तथा हमारी पीठ सड़क की ओर थी, जबकि ये हमारे सामने यानी सड़क की ओर मुँह कर के बैठे थे जिससे की हमारे घर की ओर कौन आ रहा है ये साफ़ देख सकते थे|



नियति ने अपने सारे पासे फेंक दिए थे, हमें तो बस नियति के इस खेल में अपना-अपना किरदार अदा करना था!


जारी रहेगा भाग 4(2) में...
Bdiya update gurujii, bhabhi ji :claps:
 
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