aman rathore
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Intezar rahega bhaiअपडेट कल आएगा मित्र!
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Intezar rahega bhai
Waiting![]()
सर हिलाना देख कर मुझे थोड़ी हैरानी हुई और मेरा दिल एकदम से पिघल गया; 
तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन
भाग - 10
अब तक आपने पढ़ा:
मैं: कितने पैसे?
मैंने गंभीर होते हुए पुछा|
अनिल: जी....पाँच...पाँच हजार... मुझे PG के पैसे भरने थे...उसके लिए|
अनिल ने सँकुचाते हुए कहा|
मैं: अच्छा...वो...आपकी दीदी ने कुछ पैसे दिए हैं आपको भेजने को! तो मैं NEFT कर दूँ, थोड़ी देर में पहुँच जायेंगे|
मैंने जान बूझ कर झूठ बोला क्योंकि मैं जानता था की अनिल कभी मुझसे पैसे नहीं लेगा|
अनिल मेरे पैसे भेजने की बात को सुन कर खुश हो गया और ख़ुशी से चहकते हुए बोला;
अनिल: जी!
अनिल ने मुझे अपनी सारी bank detail sms की और मैंने उसी वक़्त उसे NEFT कर दिया तथा अपने घर लौट आया|
अब आगे:
मैंने अनिल को पैसे भेजने की बात भौजी से छुपाई थी क्योंकि मैं नहीं चाहता था की उनके मन में मेरे प्यार के अलावा कोई और जज़्बात पैदा हों, वो बस मुझे प्यार करें न की मेरा एहसानमंद बन कर दबने लगें! करीब दो घंटों बाद मुझे अनिल का फोन आया की उसे पैसे मिल गए हैं और उसने मुझे पैसे भेजने के लिए thank you भी कहा| उसे अभी तक नहीं पता था की ये पैसे उसकी दीदी ने नहीं बल्कि मैंने भेजे हैं| उधर बच्चों के स्कूल से आने का समय हो रहा था तो मैं उन्हें लेने चल दिया, जैसे ही बच्चों ने school van में से मुझे देखा दोनों ख़ुशी से चहकने लगे| ड्राइवर साहब ने मुझे दोनों बच्चों के school bag दिए, इधर दोनों बच्चे मेरे से कस कर लिपट गए|
माँ का गुस्सा अभी तक कम नहीं हुआ था इसलिए सुबह से मैं जानकार उनके सामने नहीं आ रहा था, बच्चों को घर ला कर मैं माँ से नजरें चुराते हुए अपने कमरे में घुस गया| भौजी जान गईं थीं की मैं माँ से छुप रहा हूँ इसलिए उन्होंने मेरा और बच्चों का खाना एक थाली में परोस कर मेरे कमरे में ही भिजवा दिया| पिताजी और चन्दर दोपहर को साइट पर रुके थे और उनका खाना वहीं होना था, इसलिए भौजी तथा माँ बाहर बैठक में टी.वी देखते हुए खाना खा रहे थे|
मैंने दोनों बच्चों को खाना खिलाया, खाना खाते समय दोनों ने बारी-बारी अपनी आज की दिनचर्या बताई| नेहा की दिनचर्या बड़ी सामन्य होती थी, वो सारा टाइम अपना पिछले काम निपटाने में लगी रहती, दूसरी तरफ आयुष की दिनचर्या बस मस्ती से भरी होती थी| कभी arts class में clay के साथ clay modelling तो कभी games period में खेलना! एक बस lunchtime था जो दोनों भाई-बहन खाना खाते हुए बिताते थे, उस समय भी आयुष नेहा को अपनी class में की गई मस्तियों के बारे में बताने लगता था|
खैर खाना खा कर हम तीनों बाप-बेटा-बेटी लिपट कर सो गए, बच्चों के संग इतनी प्यारी नींद आई की मैं सीधा शाम को 5 बजे उठा, मुँह-हाथ धो कर मैं अपना फ़ोन देख रहा था जब भौजी चुपचाप चाय का गिलास लिए मेरे सामने खड़ी हो गईं! मेरी नजरें फ़ोन में घुसी थीं और उधर भौजी टकटकी बाँधे मुझे देख रहीं थीं| जब मैंने नजरें उठा कर भौजी को देखा तो मैं हैरान हो गया, भौजी की आँखों में आँसूँ थे और वो किसी तरह अपना रोना रोके हुए खड़ीं थीं| मैं फ़ौरन उठा और उनका हाथ पकड़ कर अपने पास बिठाया| चाय का गिलास टेबल पर रखा और उनके आँसूँ पोछते हुए उनसे बोला;
मैं: Hey क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा आपसे?
मैंने घबराते हुए पुछा| मेरा सवाल सुन भौजी बिना कुछ कहे मुझसे लिपट गईं और रोने लगीं|
मैं: क्या हुआ? कुछ बताओ तो सही?
मैंने भौजी के सर पर हाथ फेरते हुए पुछा तो भौजी सुबकते हुए बोलीं;
भौजी: अनिल का फोन आया था....
इतना कह भौजी साँस लेने को रुकीं, मुझे लगा की जर्रूर उसके साथ कोई अनहोनी हुई है, यही सोच कर मैं चिंतित हो गया और बीच में बोल पड़ा;
मैं: वो ठीक तो है न?
मेरा सवाल सुन भौजी ने हाँ में सर हिलाया और फिर से सुबकते हुए बोलीं;
भौजी: आपने....उसे पैसे....भेजे थे न?
मैं भौजी से जूठ नहीं बोल सकता था, इसलिए मैंने बड़े संक्षेप में जवाब दिया;
मैं: हाँ!
इतना सुन भौजी ने अपनी बाँहों को मेरी पीठ के इर्द-गिर्द कस लिया|
भौजी: Thank...you!
भौजी मेरे सीने से लगे हुए सुबकती हुई बोलीं|
मैं: किस लिए thank you? अब अगर आप मुझे अपनी समस्याओं के बारे में बताओगे नहीं तो मुझे खुद ही पता करना पड़ेगा न?
मैने भौजी के सर पर हाथ फेरते हुए कहा|
भौजी: नहीं ऐसा नहीं है! अनिल मुंबई में MBA कर रहा है, अब आपको तो पता ही होगा की इसमें कितना खर्च होता है?! मेरे पिताजी उम्र के चलते कोई काम-धँधा कर नहीं पाते, जमीन का छोटा सा टुकड़ा है जिसे उन्होंने किराए पर दे रखा है, उस छोटे से टुकड़े से ही थोड़ी-बहुत आमदनी होती है| जो कुछ जमा-पूँजी थी उससे अनिल का दाखिला मुंबई में हो गया, मगर आगे का खर्चा सँभालना मुश्किल हो रहा था, इसलिए पिताजी जमीन को गिरवी रख कर बैंक से लोन लेने के लिए apply किया है, loan approve होने में देर लग रही है! अनिल के exams नजदीक हैं और साथ ही उसकी hostel की फीस भी भरनी थी तो मैंने उसे अपनी पायल और दो चूड़ियाँ दे दी थीं!
भौजी ने मुझे सारी बात बताई तो उनका मन हल्का हो गया| भौजी का रोना अब थम चूका था, मगर वो फिर भी मुझे अपनी बाहों में भरे हुए थीं|
मैं: जान बस अब और मत गले लगो मेरे, माँ घर में ही हैं अगर आ गईं तो?
मन भौजी से जुदा नहीं होना चाहता था मगर माँ का डर भी था!
भौजी: जानू माँ घर पर हैं ही नहीं, वरना मैं ऐसे थोड़े ही आपसे लिपटी रहती!
भौजी मेरे सीने को चूमते हुए बोलीं| माँ का डर नहीं था तो मैंने भी भौजी को कस कर अपनी बाहों में भर लिया, लेकिन हमारा ये प्यारभरा संगम आगे बढ़ता उससे पहले ही अनिल का फ़ोन आ गया;
मैं: हेल्लो!
अनिल: Thank you जीजू!
अनिल खुश होते हुए बोला|
मैं: अरे यार thank you वाली formality बाहर वालों के साथ होती है, अपनों के साथ नहीं! आगे से कभी भी कोई जर्रूरत हो तो मुझे फोन किया कर, अपनी दीदी को नहीं!
मैंने बड़े हक़ से अनिल को कहा जैसे की मैं उसका असल का जीजा हूँ|
अनिल: पर जीजू, दीदी ने तो आपको कुछ बताया नहीं था फिर आपको कैसे पता चला की मुझे पैसों की जर्रूरत है?
अनिल ने जिज्ञासु बनते हुए सवाल पुछा|
मैं: आज मैंने तुम्हारी दीदी को बिना पायल के देख तो उनसे पायल के बारे में पूछा, तब उन्होंने मुझे बताया की तुम्हारी exam fees भरने के लिए उन्होंने अपनी पायल और कुछ चूड़ियाँ तुम्हें दी हैं| मैं समझ गया की चाँदी के पायल के मिलते ही कितने हैं?! चूड़ियों के फिर भी शायद कुछ मिले होंगे, इसलिए मैंने तुम्हारा नंबर निकाला और तुमसे बात की| खैर तुम इन बातों को सोचना छोड़ो और अपनी पढ़ाई में मन लगाओ|
मैंने ये पूरी बात भौजी की ओर देखते हुए कही| मेरी बात सुन कर भौजी मुस्कुराने लगी थीं|
अनिल: जी जीजू!
अनिल बड़े अदब से बोला|
मैं: Bye and take care!
मैंने बात खत्म करते हुए कहा|
अनिल: Bye जीजू!
अनिल ने bye कह कर फ़ोन रखा| भौजी जो अभी तक ख़ामोशी से मेरी और अनिल की बातें सुन रहीं थीं वो कुछ बोलने को हुई थीं की मैंने उन्हें प्यार से धमका दिया;
मैं: और आप, अगर आपने दुबारा मुझसे कोई बात छुपाई न तो देख लेना, ढूँढने से भी नहीं मिलूँगा!
मेरी प्यारभरी धमकी से भौजी डर गईं और एकदम से न में सर हिलाते हुए बोलीं;
भौजी: आज के बाद आपको सब बताऊँगी!
इतना कह वो फिर से मेरे सीने से लग गईं| भौजी थोड़ा सी भावुक हो गईं थीं तो मैंने उन्हें पुचकारते हुए चुप कराया| भौजी जो मेरे लिए चाय बना कर लाईं थीं वो हम ने आधी-आधी पी| भौजी smartphone चलाना नहीं जानतीं थीं तो मैं उन्हें अपने फ़ोन में मौजूद सारे features उन्हें समझाने लगा| जैसे ही मैंने उन्हें कैमरा on कर के दिखाया और हमारी फोटो खींच कर दिखाई तो भौजी का चहेरा ख़ुशी से खिल गया;
भौजी: जानू please इस picture को कागज़ में print कर के मुझे दे दो, मैं इसे हमेशा अपने सीने से लगाए रखूँगी!
मैं: जान अब तो हमेशा आपके सामने रहता हूँ, तो picture का क्या करोगे?
मेरी बात सुन भौजी शर्मा गईं और अपनी नजरें झुका लीं| हम आगे बात करते उससे पहले ही बच्चे उठ गए, नेहा उठ कर मेरी पीठ पर चढ़ गई और आयुष मेरी गोद में बैठ गया| मैंने दोनों बच्चों को लाड-प्यार करना शुरू किया और उनके साथ खेलने में व्यस्त हो गया, भौजी भी उठीं और रात का खाना बनाने में लग गईं| थोड़े खेल-कूद के बाद बारी थी पढ़ाई की, नेहा तो अपने notes copy करने में लग गई और मैंने आयुष को पढ़ाना शुरू कर दिया|
कुछ देर बाद माँ घर आ गईं और मेरे बारे में भौजी से पूछने लगीं, मैं बच्चों को ले कर आने के बाद से अपने कमरे में छुपा हुआ था| भौजी ने मेरी हिमायत करते हुए माँ को समझाना शुरू कर दिया था, जिसका असर इतनी जल्दी होने वाला नहीं था! पिताजी और चन्दर रात को देर से आने वाले थे, खाना तैयार था तो मैंने दोनों बच्चों को अपने कमरे में ही खाना खिला दिया और कहानी सुनाते हुए सुला दिया| मैंने खाना नहीं खाया था, वो इसलिए क्योंकि अगर मैं पिताजी के आने से पहले खा लेता तो चार गालियाँ और पड़तीं! रात साढ़े नौ बजे पिताजी घर आये और तब माँ मुझे खाने के लिए बोलने आईं;
माँ: खाना खा ले!
माँ ने उखड़े हुए स्वर में कहा| मैं सर झुका कर कमरे से बाहर आया, सब लोग डाइनिंग टेबल पर खाने के लिए बैठ गए थे और अब बारी थी फिर से पिताजी के ताने सुनने की;
पिताजी: तो क्या किया सारा दिन?
पिताजी ने सख्त आवाज में पुछा|
मैं कुछ जवाब देता उससे पहले ही माँ बोल पड़ीं;
माँ: सारा दिन पलंग तोड़ रहा था और क्या?
पिताजी: हम्म्म्म!
पिताजी की ये आवाज मुझे नजाने क्यों शेर की गुर्राहट जैसी लगी, मुझे लगा जर्रूर पिताजी अब डाँटेंगे;
पिताजी: कल साइट पर आजइओ!!
पिताजी ने कड़क आवाज में कहा और खाना खाने लगे|
मैं: जी!
मैंने सर झुकाये हुए कहा| मैं हैरान था की बस इतनी ही डाँट पड़नी थी? लेकिन फिर तभी चन्दर ने चुटकी ली;
चन्दर भैया: मानु भैया, चाचा अभयें अच्छे मूड म हैं एहि से बच गयो!
चन्दर ने आग लगाते हुए कहा| मुझे गुस्सा तो बहुत आया की यहाँ आग ठंडी पड़ रही है और ये साला उसमें घांसलेट डाल रहा है| पिताजी के डर के मारे मैं कुछ नहीं बोल सकता था इसलिए सर झुका कर चुपचाप खाना खाने लगा, मगर चन्दर की बात का जवाब पिताजी ने खुद दिया;
पिताजी: ऐसा नाहीं है बेटा! क़िलास तो हम अभयें लगाई देई, मगर मानु आज तक कउनो गलत काम नाहीं किहिस है! आज जिंदगी म पहली और आखरी बार गलती करिस है और ऊ के लिए मानु शर्मिंदाओ है, अब अगर हम ई का कूट-पीट देई तो ई सुधरी न, बल्कि और बिगड़ जाई! फिर है भी गरम खून, कल को कछु उलट-सीध कर देई तो हम का करब? हमरे लिए एहि बड़ा है की सुबह हमसे वादा कर दिहिस है की अब ई (मैं) सराब का हाथ न लगाई!
पिताजी की बात सुन चन्दर का मुँह बंद हो गया|
मैं: I promise पिताजी, आज के बाद कभी शराब को हाथ नहीं लगाउँगा|
मैंने लगे हाथ एक और बार अपनी बात दोहरा दी, जिसे सुन पिताजी के चेहरे पर आखिरकर मुस्कान आ गई तथा उन्होंने प्यार से मेरे सर पर हाथ फेर दिया|
खाना खा कर पिताजी अपने कमरे में सोने चले गए, इधर चन्दर ने भौजी से घर की चाभी ली और वो भी सोने चला गया| अब चूँकि मैं दिनभर पलंग तोड़ चूका था तो मुझे नींद आ नहीं रही थी, मैं आज टी.वी. देखने के लिए माँ और भौजी के साथ बैठ गया| शुक्रवार का दिन था और रात दस बजे CID आता था, माँ उसकी बहुत बड़ी fan है तथा ये आदत भौजी को भी लग चुकी थी| मुझे ये program बिलकुल पसंद नहीं था, अब अगर मैं channel बदलने की गुस्ताखी करता तो माँ से डाँट पड़ती इसलिए मैं चुपचाप बैठा देखने लगा| CID खत्म हुआ तो माँ सोने चली गई और मुझे कह गई;
माँ: अगर देर तक टी.वी देखना हो तो अपनी भौजी को घर अकेले मत जाने दिओ उसे घर छोड़ कर आइयो!
माँ की आवाज में गुस्सा नहीं था. मतलब पिताजी के साथ-साथ उनका गुस्सा भी शांत हो रहा था|
मैं: जी!
मैंने बड़े प्यार से कहा|
अब बैठक में बस मैं और भौजी बचे थे, टी.वी. पर Crime Patrol चल रहा था| मैं भौजी से दूर दूसरी कुर्सी पर बैठा था और भौजी सोफे पर बैठीं थीं| भौजी ने इशारे से मुझे अपने पास बैठने के लिए बुलाया, मैंने एक बार चेक कर लिया की माँ-पिताजी के कमरे का दरवाजा बंद हुआ की नहीं और फिर मैं जाके भौजी के पास बैठ गया|
भौजी: एक बात पूछूँ, आप बुरा तो नहीं मानोगे?
भौजी ने हिचकते हुए कहा|
मैं: हाँ जी पूछो?
मैंने बड़े प्यार से कहा|
भौजी: आपने अनिल को वो पैसे कहाँ से भेजे थे? मेरा मतलब आपके पास वो पैसे कहाँ से आये?
भौजी ने थोड़ा घबराते हुए पुछा| दरअसल भौजी को चिंता हो रही थी की कहीं मैंने ये पैसे पिताजी के चोरी तो नहीं दिए?
मैं: मेरे अकाउंट से|
मैंने बड़ी सरलता से जवाब दिया क्योंकि मैं अभी तक भौजी की बात का मतलब समझ नहीं पाया था|
भौजी: और आपके पास पैसे कहाँ से आये?
भौजी ने थोड़ी हिम्मत और करते हुए सवाल पुछा|
मैं: Graduation के दौरान और Graduation पूरी होने के बाद मैंने कुछ डेढ़-दो साल जॉब की थी| अब घर तो पिताजी के पैसों से चल जाया करता था, तो मैं अपनी salary से घर के लिए appliances खरीदा करता था| कभी washing machine तो कभी desktop computer, उसी salary की savings से मैंने अनिल को पैसे भेजे थे|
मैंने बड़े इत्मीनान से भौजी को जवाब दिया| मेरी बात सुन कर भौजी एकदम से खामोश हो गईं और गर्दन झुका कर बैठ गईं| मैं जान गया की उन्हें मेरे पैसे खर्च होने पर दुःख हो रहा है;
मैं: Hey? क्या हुआ? बुरा लग रहा है?
मैंने बात शुरू करते हुए कहा पर भौजी ने कोई जवाब नहीं दिया|
मैं: अच्छा ये बताओ की अगर अनिल आपका भाई है तो क्या मेरा कुछ नहीं? भई आपने ही तो उसे मेरा साला बनाया था न?
मैंने भौजी को गाँव में उनकी कही बात याद दिलाई|
मैं: अब दुनिया में ऐसा कौन सा जीजा है जिसे साले की मदद करने में दुःख होता हो? I mean जेठा लाल को छोड़ के!
मेरी जेठा लाल वाली बात सुन भौजी मुस्कुरा दीं, चलो तारक मेहता का उल्टा चश्मा के जरिये ही सही वो हँसी तो!
मैं: चलो रात बहुत हो रही है, मैं आपको घर छोड़ देता हूँ|
मैंने मुस्कुरा कर उठते हुए कहा| हम दोनों घर से निकले, रात का सन्नाटा था तो भौजी ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया| हम दोनों बिना बात किये भौजी के घर पहुँचे, भौजी ने अपनी चाभी से घर का ताला खोला और अंदर घुसीं मैंने उन्हें मुस्कुरा कर; "good night" कहा|
भौजी: ऐसे कैसे good night?!
भौजी खुसफुसा कर बोलीं और अपने दाहिने गाल पर kiss करने का इशारा किया| मैंने न में सर हिलाया क्योंकि इस वक़्त चन्दर घर पर मौजूद था|
मैं: कल!
मैंने मुस्कुराते हुए कहा| भौजी जान गईं की मेरा उन्हें kiss न करने का कारन क्या है और उन्होंने इसका बुरा नहीं लगाया| उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे; "good night" कहा और दरवाजा बंद कर दिया|
जब मैं घर लौटा तो देखा की आयुष जाग रहा है और अपने हवाई जहाज वाले खिलोने से अकेला खेल रहा है|
मैं: आयुष बेटा, नींद नहीं आ रही?
मैंने अपने कमरे का दरवाजा चिपकाते हुए पुछा|
आयुष: नहीं पापा!
आयुष खुश होते हुए बोला|
मैं: बेटा कल स्कूल जाना है, जल्दी सोओगे नहीं तो सुबह जल्दी कैसे उठोगे?
मैंने पलंग पर बैठते हुए कहा|
आयुष: पापा जी मुझे गेम खेलनी है|
आयुष ने ख़ुशी से अपना सर हाँ में हिलाते हुए कहा| उसका यूँसर हिलाना देख कर मुझे थोड़ी हैरानी हुई और मेरा दिल एकदम से पिघल गया;
मैं: ठीक है बेटा मगर शोर नहीं करना वरना आपकी दीदी जाग जाएगी|
मेरी बात सुन आयुष फिर से मुस्कुरा कर अपना सर हाँ में हिलाने लगा|
नटखट बालक तो मैं हुँ ही, बेटे का साथ मिला तो मैं भी बच्चा बन गया| कमरे की लाइट बंद कर मैंने desktop पर गेम लगा दी, मैं कुर्सी पर बैठा और आयुष को अपनी गोद में बिठा लिया| दोनों बाप-बेटा बारी-बारी से NFS खेलने लगे, जब गाडी पलट जाती या किसी दूसरी गाडी से ठुक जाती तो आयुष ख़ुशी से अपने दोनों हाथ उठा कर खुश हो जाता! कुछ देर बाद keyboard के buttons की टप-टप सुन कर नेहा भी उठ गई और मेरी बगल वाली कुर्सी पर आ कर बैठ गई|
नेहा: पापा जी मैं भी खेलूँगी!
नेहा बोली मगर आयुष अपनी बारी छोड़ने को तैयार नहीं था|
आयुष: दीदी आप सो जाओ, गेम खेलने का idea मेरा था!
आयुष की बात सुन नेहा जोर जबरदस्ती करने लगी;
नेहा: हट जा, मैं खेलूँगी!
नेहा ने बड़ी बहन का हक़ जताते हुए कहा और keyboard अपनी तरफ खींच लिया|
आयुष: नहीं मैं खेलूँगा!
आयुष ने keyboard खींचना चाहा मगर नेहा ने वो कस कर पकड़ रखा था| अब बड़ी बहन के आगे आयुष का जोर कहाँ चलता तो उसने मुझसे अपनी बहन की शिकायत कर दी;
आयुष: देखो न पापा, दीदी मुझे खेलने नहीं देती!!
आयुष मुँह फुलाते हुए बोला| अब मुझे मामला सुलझाना था;
मैं: बेटा आप दोनों आज रात बारी-बारी से खेलो, कल मैं आप दोनों के लिए दो game controllers ला दूँगा फिर आप दोनों एक साथ खेल पाओगे!
बच्चे मान गए और बारी-बारी से गाडी चलाने लगे, इस तरह गेम खेलते-खेलते बारह बज गए| कंप्यूटर बंद कर के हम तीनों लिपट कर सोये, अब देर से सोये थे तो बच्चों को सुबह उठने में देरी हो गई| मैं जल्दी उठ गया था मगर बच्चों को उठाने का मन नहीं किया, इसलिए उनके सर पर हाथ फेरता रहा| सवा 6 बजे भौजी गुस्से में बड़बड़ाती हुई कमरे में बच्चों को उठाने आईं;
भौजी: कितनी बार कहा की जल्दी सोया करो, ताकि सुबह जल्दी उठो, लेकिन तुम दोनों दिन पर दिन बदमाश होते जा रहे हो!
मैं: Relax यार! गलती मेरी है, रात को हम तीनों कंप्यूटर पर गेम खेल रहे थे! बारह बजे तो सोये हैं इसलिए थोड़ा सा सो लेने दो!
मैंने गलती अपने सर लेते हुए कहा|
भौजी: हम्म्म्म तो सजा आपको मिलेगी!
भौजी अपना झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं|
मैं: बताइये मालिक क्या सजा मुक़र्रर की है आपने|
मैंने किसी गुलाम की तरह सर झुका कर कहा|
भौजी: आप ने लेट सुलाया है तो आप ही इन्हें तैयार करोगे|
भौजी मुस्कुरा कर बोलीं|
मैं: वो तो मैं रोज करता हूँ|
मैंने मुस्कुरा कर कहा| बच्चों को सुबह स्कूल के लिए तैयार करने का काम ज्यादातर मैं ही किया करता था तो मेरे लिए कोई सजा नहीं थी, मगर भौजी की बात अभी पूरी कहाँ हुई थी!
भौजी: और आज मेरे साथ shopping चलोगे!
भौजी ने पत्नी की तरह इठला कर कहा|
मैं: Done लेकिन शाम को, सुबह पिताजी के साथ site पर जाना है|
मैंने सर झुका कर उनका हुक्म मानते हुए कहा|
भौजी: Done!
भौजी खुश होते हुए बोलीं!
अब बारी थी बच्चों को उठाने की, मैंने बस एक बार प्यार से दोनों बच्चों को पुकारा तो दोनों एकदम से उठ बैठे और मेरे गले लग गए|
भौजी: अरे वाह! मैं इतनी देर से गुस्से में उबल रही थी तब तो नहीं उठे और पापा की एक आवाज में उठ गए?
भौजी अपनी कमर पर दोनों हाथ रखते हुए बोलीं|
मैं: वो क्या है न, मेरे बच्चे मुझसे इतना प्यार करते हैं की मेरी हर बात मानते हैं|
मैंने दोनों बच्चों के सर चूमते हुए कहा| दोनों बच्चों ने अपनी मम्मी को जीभ चिढ़ाई और मुझसे लिपट कर खिलखिलाकर हँसने लगे| भौजी ने मुस्कुरा कर बाप-बेटा-बेटी को देखा और बच्चों का नाश्ता बनाने चली गईं| बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर मैं उन्हें उनकी school van में बिठा आया| वापस आ कर मैं नहा-धो कर तैयार हुआ और नाश्ता कर के पिताजी के साथ निकलने वाला था की भौजी ने सबसे नजर बचाते हुए घूँघट हटाया तथा मुझे अपनी नशीली आँखों से इशारा कर कमरे में आने को कहा| मैंने पिताजी से पर्स भूलने का बहाना किया और पर्स लेने के लिए अपने कमरे में आ गया| मेरे पीछे-पीछे भौजी भी सबसे नजरें बचातीं हुई आ गईं|
भौजी: आप कुछ भूल नहीं रहे?
भौजी ने घूँघट हटाते हुए कहा| मैंने फ़ौरन अपना पर्स, रुम्माल और फोन चेक किया और बोला;
मैं: नहीं तो|
भौजी: अच्छा? कल रात से आपकी एक kiss due है?
भौजी शिकायत करते हुए बोलीं|
मैं: ओह याद आया! लेकिन अभी नहीं, शाम को! ठीक है?
मैंने भौजी को प्यार से समझाते हुए कहा| Kissi करने का मन तो मेरा भी था मगर घर में सब मौजूद थे और भौजी को गाल पर kiss जमती नहीं थी तथा दूसरी वाली kiss के लिए अभी सही समय नहीं था|
भौजी: ठीक है!
भौजी ने कुछ सोचते हुए कहा| मुझे लगा की भौजी मान गईं, लेकिन भौजी बिना kiss लिए कहाँ मानने वालीं थीं?! वो एकदम से उचकीं और अचानक से मेरे होठों को चूम कर बाहर भाग गईं!
मैं: बदमाश! अगर करना ही था तो ढँग से करते!
मैं पीछे से बोला मगर तब तक भौजी बाहर भाग चुकी थीं|
पिताजी ने मुझे नॉएडा वाली साइट का काम संभालने को कहा था, तथा चन्दर को ले कर वो गुडगाँव चले गए| आज मैं बहुत जोश में था, इतना जोश में की लेबर भी पूछ रही थी की; "क्या बात है भैया, आज बड़े मूड में हो?" अब मैं उन्हें क्या कहता की मैं मूड में इसलिए हूँ क्योंकि आज दिन की शुरुआत बड़ी मीठी हुई है! मैं अपने जोश में इतना मग्न था की दोपहर में खाना भी नहीं खाया, 4 बजे मैंने पिताजी को फोन कर के झूठ कह दिया की; "माँ ने बुलाया है, मैं घर जा रहा हूँ|" पिताजी ने कोई सवाल-जवाब नहीं किया, मैं ख़ुशी से नाचता हुआ दिषु के ऑफिस पहुँचा| मेरे चेहरे पर ख़ुशी देख कर दिषु थोड़ा हैरान था, उसे लगा था की कल पिताजी की डाँट से मेरा मुँह उतरा होगा|
दिषु: अबे साले तू तो हवा में उड़ रहा है? लगता है अंकल जी ने बेल्ट से सूता नहीं तुझे?!
दिषु हँसते हुए बोला|
मैं: वो सब बाद में, फिलहाल मुझे तेरी Nano की चाभी चाहिए! आज उनको (भौजी को) और बच्चों को घुमाने ले जा रहा हूँ!
मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा|
दिषु: ओये-होये! शर्म तो देखो लड़के की!
दिषु ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा| उसने अपनी गाडी की चाभी मुझे निकाल कर दी और बोला;
दिषु: भाई अपना ध्यान रखिओ!
उसने ये बात थोड़ा गंभीर होते हुए कही| मैं उसकी बात का मतलब समझ गया था, दरअसल वो मुझे आगाह कर रहा था की मैं फिर से कहीं प्यार में न बह जाऊँ और एक बार फिर अपना दिल तुड़वा लूँ! अब मैं उस वक़्त भौजी के प्यार में इस कदर डूब चूका था की मैंने दिषु की बात को तवज्जो नहीं दी! मैंने बस दिषु का दिल रखने के लिए हाँ में सर हिलाया और गाडी भगाता हुआ घर पहुँचा| मैंने घर के बाहर से ही भौजी को फ़ोन किया और उन्हें तथा बच्चों को बाहर आने को कहा| भौजी और बच्चे बन ठन कर तैयार होकर गली से बाहर आये, मैंने गाडी से बाहर निकल अपना हाथ हिला कर तीनों को अपने पास बुलाया| मुझे गाडी के साथ देख दोनों बच्चे ख़ुशी से उछल पड़े और दौड़ते हुए मेरी तरफ आये|
आयुष: पापा जी ये हमारी गाडी है?
आयुष ने खुश होते हुए पुछा|
मैं: नहीं बेटा ये आपके दिषु चाचा की गाडी है, मैंने उनसे गाडी थोड़ी देर के लिए ली है|
अब आयुष दिषु के बारे में कुछ नहीं जानता था, मेरे दिषु को उसका चाचा बताने से वो थोड़ा हैरान था|
नेहा: दिषु चाचा पापा के bestfriend हैं, तो हमारे चाचा जी हुए न?
नेहा ने आयुष को समझाते हुए कहा| आयुष नेहा की बात सुन हाँ में सर हिलाने लगा और उत्साह से भरते हुए बोला;
आयुष: मैं आगे बैठूँगा!
लेकिन नेहा एकदम से बड़ी बहन का हक़ जताते हुए बोली;
नेहा: नहीं! छोटे बच्चे आगे नहीं बैठते!
नेहा की बात सुन कर आयुष का दिल टूट गया और उसका मुँह बन गया| अब मैं चाहता था की भौजी आगे बैठें मगर उनके आगे बैठने से दोनों बच्चों का दिल टूट जाता इसलिए मुझे कूटनीति अपनानी थी ताकि दोनों बच्चे नाराज न हों!
मैं: आयुष बेटा ऐसा करते हैं की आपकी दीदी आपसे बड़ीं हैं न तो अभी उनको आगे बैठने दो और आप पीछे अपनी मम्मी के साथ बैठो ताकि उनको पीछे डर न लगे| आज पहलीबार मम्मी गाडी में बैठ रहीं हैं न इसलिए आप उनका अच्छे से ख्याल रखना|
मेरी बात सुन कर भौजी मेरी होशियारी समझ गईं, लेकिन फिर भी उन्हें मेरी टाँग खींचनी थी इसलिए वो अपनी चाल चलते हुए बोलीं;
भौजी: मैं नहीं डरती गाडी में बैठने से! मैं कोई छोटी बच्ची थोड़े ही हूँ?!
मैं भौजी की होशियारी जान गया था इसलिए मैंने उन्हें आँख दिखा कर थोड़ा डराया और फिर आयुष को समझाने में लग गया;
मैं: मम्मी को बहुत डर लगता है, वो बस आपसे कहने में डरतीं हैं| आप अभी पीछे बैठ जाओ वापसी में आप आगे बैठ जाना और आपकी दीदी मम्मी के साथ बैठ जाएँगी|
आयुष अच्छा बच्चा था इसलिए वो मेरी बात मान गया, लेकिन भौजी को चुटकी लेने का फिर मौका मिल गया;
भौजी: और मैं? मैं कब आगे बैठूँगी?!
भौजी ने प्यारभरा गुस्सा दिखाते हुए कहा|
मैं: जान आप अगलीबार बैठ जाना!
मैंने प्यार से कहा| भौजी कुछ कहें उससे पहले ही नेहा ने फट से आगे का दरवाजा खोला और आगे बैठ गई, भौजी उसे हैरानी से देखती रहीं की नेहा को गाडी का दरवाजा खोलना कैसे आता है? फिर मैंने पीछे का दरवाजा खोला और भौजी को बैठने को कहा, पर भौजी बैठतीं उससे पहले आयुष घुस गया और पहले बैठ कर ऐसे खुश हुआ मानो उसने कोई खेल जीत लिया हो! उसे यूँ हँसता हुआ देख हम तीनों भी हँसने लगे! भौजी बैठीं और मैंने दरवाजा बंद किया, फिर मैं भी आगे बैठ गया तथा पहले नेहा की seat belt लगाई और फिर अपनी| नेहा की seat belt देख आयुष पीछे seat belt ढूँढने लगा;
मैं: बेटा पीछे seat belt लगाना जर्रूरी नहीं होता, आप बस अपनी मम्मी का हाथ पकड़ कर बैठो कहीं वो डर से रोने न लगे!
मैंने भौजी को छेड़ते हुए कहा|
भौजी: अच्छा जी?!
भौजी ने गाल फुलाते हुए कहा| गाडी चल पड़ी और नेहा ने आगे बैठे हुए अपनी मम्मी को गाडी के बारे में बताना शुरू कर दिया| AC, Radio, खिड़की ऊपर-नीचे करना और गाडी अंदर से lock-unlock करना, ये सब नेहा ने मेरे साथ cab में सीखा था| रास्ते में पड़ने वाली दुकानें, लोग और घरों को देख कर दोनों बच्चे अपनी मम्मी का ध्यान उस ओर खींचते रहते जिससे भौजी का मन लगा हुआ था|
हम Saket Select City Mall पहुँचे, गाडी parking में लगा कर हम तीनों mall की तरफ चल दिए| Entry होते समय security checking होनी थी, अब नेहा ने चौधरी बनते हुए अपनी मम्मी का हाथ पकड़ा और जहाँ महिलाओं की checking होती है वहाँ चली गई| मैंने आयुष का हाथ पकड़ा और security checking करवाने लगा| जब मेरी security checking हो रही थी तो आयुष ये सब बड़े गौर से देख रहा था| जब आयुष की बारी आई तो उसने भी मेरी तरह अपने दोनों हाथ उठा लिए, security guard ने जब ये देखा तो वो झुक गए और आयुष की checking बस दिखावे के तौर पर की, checking के बाद आयुष ने मुस्कुरा कर उनको bye कहा और मेरे पास दौड़ आया, एक छोटे से बच्चे के bye कहने भर से एक इंसान के चेहरे पर जो ख़ुशी आती है वही ख़ुशी security guard के चेहरे पर आ गई थी| उधर नेहा और भौजी अपनी security checking करवा कर बाहर आ गए, भौजी को आज अपनी बेटी पर बहुत गर्व हो रहा था क्योंकि नेहा ने उन्हें security check के बारे में सब समझा दिया था|
खैर mall के अंदर आ कर भौजी, नेहा और आयुष वहाँ की चकाचौंध में खो गए! इतने सारे लोग और सब tiptop कपडे पहने, इतनी खूबसूरत दुकानें जिन्हें देख कर ही उनके महँगे होने का अंदाजा लगाया जा सकता था, Mall में बजता music, escalators पर ऊपर-नीचे जाते लोग! ये दृश्य देख कर तीनों खामोश हो गए थे, बच्चों ने और भौजी ने कभी इस सब की कल्पना नहीं की थी इसलिए उनका चकित होना लाज़मी था|
मैं: बच्चों इस जगह को Mall कहते है| यहाँ बहुत सारी दुकानें होती हैं, कपड़ों की, खाने-पीने की और यहाँ पर फिल्म भी दिखाई जाती है!
फिल्म देखने के नाम से दोनों बच्चे खुश हो गए और कूदने लगे| भौजी ने उन्हें आँख दिखा कर डराया और कूदने से मना करने लगीं|
मैं: यार बच्चे हैं, थोड़ी मस्ती कर लेने दो!
मैंने बच्चों की हिमायत करते हुए कहा|
भौजी: ये तो बहुत महँगी जगह है!
भौजी घबराते हुए बोलीं!
मैं: मेरे परिवार से महँगा कुछ नहीं!
मैंने बिना डरे उनका हाथ पकड़ा और बच्चों के साथ theatre की ओर चल पड़ा| Theatre first floor पर था, मैं भौजी को ले कर escalators की ओर मुड़ गया| Escalators देख कर भौजी डर गईं;
भौजी: इसमें मेरी साडी फँस गई तो?
मैं: जान ये escalators specially design किये जाते हैं जिससे इसमें कुछ नहीं फँस सकता!
मैंने भौजी को हौसला देते हुए कहा|
नेहा: हाँ मम्मी चलो न, खूब मजा आएगा|
नेहा चहकते हुए बोली, लेकिन भौजी थोड़ी डरी हुई थीं| मैंने भौजी का हाथ कस कर पकड़ा और आँखों के इशारे से उन्हें मुझ पर विश्वास रखने को कहा| मैंने भौजी का हाथ पकड़ा तो नेहा ने भी बड़ी बहन बनते हुए आयुष का हाथ पकड़ा और उसे समझाते हुए बोली;
नेहा: देख आयुष तुझे न ऐसे पैर रखना है, कूदना नहीं है वरना गिर जाएगा| फिर जब हम ऊपर पहुँचेंगे न तब ऐसे पाँव बढ़ा कर आगे बढ़ना है! ठीक है?
नेहा ने आयुष को escalators पर चढ़ने तथा उतरने का तरीका समझा दिया था| अब मेरी बारी थी भौजी को समझाने की;
मैं: जान अपना दायाँ कदम आगे बढ़ाओ और ये सोचो की आप मेरे साथ नई जिंदगी शुरू करने जा रहे हो!
मेरी बात सुन भौजी के चेहरे पर मुस्कान आ गई और उन्होंने ठीक वैसे ही किया| हम दोनों escalators पर चढ़ चुके थे, मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो नेहा आयुष का हाथ पकडे हुए escalator पर चढ़ चुकी थी| दोनों बच्चों ने अपनी गर्दन इधर-उधर घूमना शुरू कर दिया था और आस-पास की हर चीज को देखना शुरू कर दिया था| इधर भौजी बस escalator की सीढ़ी को ही घूरे जा रही थीं|
मैं: जान अब हम ऊपर पहुँचने वाले हैं, आप ये सोचो की हमारी शादी हो चुकी है और आप मेरे घर में पहलीबार ‘प्रवेश’ करने वाली हो!
मेरी बात सुन भौजी की आँखें इस कल्पना से चमकने लगी और उन्होंने मेरा हाथ कस कर जकड़ लिया| हम ऊपर पहुँचे और दोनों सम्भल कर escalator से उतरे, भौजी का सारा डर छूमंतर हो चूका था! उधर बच्चे भी हमारे पीछे-पीछे ऊपर पहुँचा गए और escalator से उतरते ही मेरी टाँगों से लिपट गए!
हम चारों theatre पहुँचे, मैं टिकट लेने लगा और उधर नेहा ने गाँव मेरे साथ देखि film के बारे में आयुष को सब बताना शुरू कर दिया| अपनी दीदी की बात सुन आयुष का उत्साह दुगना हो गया था, मगर जो film हमें देखनी थी वो housefull थी! जब टिकट नहीं मिली तो बच्चों का मुँह बन गया;
मैं: Awwww! बेटा film कल देख लेंगे, मैं कल की टिकट पहले book कर लूँगा और आज के लिए....
मैं कुछ सोचने लगा और तभी मुझे कल रात की बात याद आई;
मैं: हम game खलने के लिए controllers ले लेते हैं!
Game controller लेने की बात से दोनों बच्चे खुश हो गए! मैं दोनों बच्चों का हाथ पकड़ कर lift की ओर चल पड़ा, लेकिन बच्चों को escalators में जाना था क्योंकि उन्हें उसमें बहुत मजा आया था!
मैं: बेटा अभी हम lift से चलते हैं, उसमें भी बहुत मजा आता है|
नेहा ने lift की सैर की थी इसलिए उसने आयुष को अपने lift वाले अनुभव के बारे में बताना शुरू कर दिया| नेहा की बात सुन कर भौजी बोल पड़ीं;
भौजी: जब lift थी तो आप मुझे escalator से क्यों लाये? अगर मैं गिर जाती तो?
भौजी अपना झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं|
मैं: आपको गिरने थोड़े ही देता! फिर इसी बहाने आपका हाथ पकड़ने का मौका भी तो मिल गया!
मैंने भौजी को छेड़ते हुए कहा| मेरी बात सुन कर भौजी शर्मा गईं और मुस्कुराने लगीं|
हम lift में घुसे और जब वो नीचे आने लगी तो, आयुष तथा भौजी मुझसे कस कर लिपट गए! एक बस नेहा थी जो निडर खड़ी थी तथा आयुष और अपनी मम्मी को देख कर उनके डरने का मजाक उड़ा रही थी!
भौजी: बहुत हँसी आ रही है तुझे!
भौजी नेहा को प्यार से डाँटते हुए बोली| खैर मैंने बच्चों को game controllers खरीदवाए और food court की ओर चल पड़ा| अब भौजी ने यहाँ बहुत सी लड़कियों और औरतों को jeans पहने देखा था तो उनका मन अब jeans पहनने का कर रहा था|
भौजी: बच्चों को तो game controller खरीदवा दिए, अब मुझे भी एक jeans खरीदवा दो!
भौजी बड़े प्यार से माँग करते हुए बोलीं| भौजी को jeans पहने हुए कल्पना कर मेरी आँखें चमकने लगी थीं मगर मैं उन्हें ये surprise देना चाहता था इसलिए मैंने थोड़ी बातें बनाईं और भौजी से उनकी कमर का नाप तथा top का साइज पूछ लिया| भौजी को लगा की मैं उन्हें jeans और top ख़रीदवाऊँगा मगर मैंने बात पलटते हुए कहा;
मैं: यार आप jeans में अच्छे नहीं लगोगे, हम ऐसा करते हैं की आपके लिए साडी ले लेते हैं|
भौजी इतनी भोली थीं की वो मेरी बात में आ गईं और साडी लेने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गईं|
भौजी: ठीक है लेकिन पसंद आप करोगे!
भौजी ने शर्त रखते हुए कहा, अब वो क्या जाने की मेरी पसंद इस मामले में कितनी अच्छी है?!
मैं: ठीक है!
मैंने मुस्कुराते हुए कहा| हम चारों एक अच्छी सी दूकान में घुसे और वहाँ मैंने अपनी पसंद की भौजी को Chiffon की साडी खरीदवाई! मेरी पसंद देख कर भौजी बहुत खुश थीं लेकिन वो साडी थी बहुत महँगी और मैं अपना debit card लाना भूल गया था! जेब में जितने पैसे थे उनसे वो साडी तो आ गई लेकिन cash खत्म हो गया था, भौजी नहीं जानतीं थीं की मेरे पास फिलहाल पैसे नहीं हैं वरना वो साडी लेने से मना कर देतीं| साडी खरीदने के बाद भौजी ने जिद्द पकड़ी की वो मेरे लिए एक शर्ट खरीदेंगी, मैंने कल लेने का बहाना मारा और हम चारों food court की ओर चल पड़े| गाँव में सीखे अपने सबक के चलते मैं हमेशा अपने पर्स में 500/- रुपये अलग से रखता था, ताकि कभी जर्रूरत पड़े तो काम आ जाएँ| आज वही पैसे मेरे काम आने वाले थे, food court में आ कर मैंने बच्चों से पुछा की वो क्या खाएँगे? उधर भौजी ने बाहर लगा हुआ menu पढ़ लिया था इसलिए उन्होंने होशियारी करते हुए कहा;
भौजी: बच्चों आपने corn नहीं खाये न? यहाँ बहुत अच्छे corn मिलते हैं!
भौजी इतने आत्मविश्वास से बोलीं जैसे की वो यहाँ रोज आतीं हों! मैं हैरान होते हुए उन्हें देखने लगा क्योंकि मैं उनकी होशियारी भाँप नहीं पाया था| वहीं बच्चे अपनी मम्मी की बात में आ गाये और corn खाने की माँग करने लगे! मैंने 4 medium corn लिए, दो मसाला कम रखवाया और दो में मसाला तेज रखवाया| जब मैं पैसे देने लगा तब मुझे भौजी की होशियारी समझ आई और मैं मंद-मंद मुस्कुराने लगा| Menu में लिखी सारे खाने की चीज 150/- रुपये से ऊपर थी, पैसे ज्यादा खर्च न हो इसलिए भौजी ने सबसे सस्ती चीज यानी corn खाने के लिए बच्चों को उकसाया था|
Corn खाते- खाते हम गाडी में बैठे, इस बार आयुष आगे बैठा और ख़ुशी से सीट पर बैठे-बैठे नाच रहा था| मैंने गाडी में गाना लगाया और गाडी का rear view mirror भौजी की ओर मोड़ते हुए गाने लगा;
मैं: हाँ तू है हाँ तू है,
मेरी बातों में तू है,
मेरी ख्वाबों में तू,
याददों में तू,
इरादो में तू है!
गाना सुन भौजी इतने प्यार से मुस्कुराईं की मन किया की अभी गाडी रोक कर उन्हें अपनी बाहों में भर लूँ! खैर गाना सुनते हुए हम चारों घर पहुँचे, भौजी तो आते ही माँ के साथ बातों में लग गईं और उन्हें अपनी साडी दिखाने लगीं| भौजी की देखा-देखि दोनों बच्चों ने माँ को घेर लिया और वो भी mall के बारे में माँ को सब बताने लगे|
जारी रहेगा भाग - 11 में...

Daily updateमित्रों,
आप सभी से एक सलाह लेना चाहूँगा, दरअसल मैं सोच रहा था की क्यों न मैं आप सभी को काला इश्क़ की तरह regular update दूँ? लेकिन regular update का साइज करीबन 2000+ words होगा! अभी जो मैं आपको 2-3 बाद 5000+ words की moderate update देता हूँ उसमें आपको काफी इंतजार करना पड़ता है, regular update होंगीं तो आपका इंतजार कम होगा और साथ ही कहानी जल्दी खत्म होगी! आप सभी अपनी राय अवश्य दें ताकि मैं regular update लिखने की तरफ तवज्जो देना शुरू कर सकूँ!
शुभरात्रि!![]()
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Fantastic superb update..bhaiतेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन
भाग - 10
अब तक आपने पढ़ा:
मैं: कितने पैसे?
मैंने गंभीर होते हुए पुछा|
अनिल: जी....पाँच...पाँच हजार... मुझे PG के पैसे भरने थे...उसके लिए|
अनिल ने सँकुचाते हुए कहा|
मैं: अच्छा...वो...आपकी दीदी ने कुछ पैसे दिए हैं आपको भेजने को! तो मैं NEFT कर दूँ, थोड़ी देर में पहुँच जायेंगे|
मैंने जान बूझ कर झूठ बोला क्योंकि मैं जानता था की अनिल कभी मुझसे पैसे नहीं लेगा|
अनिल मेरे पैसे भेजने की बात को सुन कर खुश हो गया और ख़ुशी से चहकते हुए बोला;
अनिल: जी!
अनिल ने मुझे अपनी सारी bank detail sms की और मैंने उसी वक़्त उसे NEFT कर दिया तथा अपने घर लौट आया|
अब आगे:
मैंने अनिल को पैसे भेजने की बात भौजी से छुपाई थी क्योंकि मैं नहीं चाहता था की उनके मन में मेरे प्यार के अलावा कोई और जज़्बात पैदा हों, वो बस मुझे प्यार करें न की मेरा एहसानमंद बन कर दबने लगें! करीब दो घंटों बाद मुझे अनिल का फोन आया की उसे पैसे मिल गए हैं और उसने मुझे पैसे भेजने के लिए thank you भी कहा| उसे अभी तक नहीं पता था की ये पैसे उसकी दीदी ने नहीं बल्कि मैंने भेजे हैं| उधर बच्चों के स्कूल से आने का समय हो रहा था तो मैं उन्हें लेने चल दिया, जैसे ही बच्चों ने school van में से मुझे देखा दोनों ख़ुशी से चहकने लगे| ड्राइवर साहब ने मुझे दोनों बच्चों के school bag दिए, इधर दोनों बच्चे मेरे से कस कर लिपट गए|
माँ का गुस्सा अभी तक कम नहीं हुआ था इसलिए सुबह से मैं जानकार उनके सामने नहीं आ रहा था, बच्चों को घर ला कर मैं माँ से नजरें चुराते हुए अपने कमरे में घुस गया| भौजी जान गईं थीं की मैं माँ से छुप रहा हूँ इसलिए उन्होंने मेरा और बच्चों का खाना एक थाली में परोस कर मेरे कमरे में ही भिजवा दिया| पिताजी और चन्दर दोपहर को साइट पर रुके थे और उनका खाना वहीं होना था, इसलिए भौजी तथा माँ बाहर बैठक में टी.वी देखते हुए खाना खा रहे थे|
मैंने दोनों बच्चों को खाना खिलाया, खाना खाते समय दोनों ने बारी-बारी अपनी आज की दिनचर्या बताई| नेहा की दिनचर्या बड़ी सामन्य होती थी, वो सारा टाइम अपना पिछले काम निपटाने में लगी रहती, दूसरी तरफ आयुष की दिनचर्या बस मस्ती से भरी होती थी| कभी arts class में clay के साथ clay modelling तो कभी games period में खेलना! एक बस lunchtime था जो दोनों भाई-बहन खाना खाते हुए बिताते थे, उस समय भी आयुष नेहा को अपनी class में की गई मस्तियों के बारे में बताने लगता था|
खैर खाना खा कर हम तीनों बाप-बेटा-बेटी लिपट कर सो गए, बच्चों के संग इतनी प्यारी नींद आई की मैं सीधा शाम को 5 बजे उठा, मुँह-हाथ धो कर मैं अपना फ़ोन देख रहा था जब भौजी चुपचाप चाय का गिलास लिए मेरे सामने खड़ी हो गईं! मेरी नजरें फ़ोन में घुसी थीं और उधर भौजी टकटकी बाँधे मुझे देख रहीं थीं| जब मैंने नजरें उठा कर भौजी को देखा तो मैं हैरान हो गया, भौजी की आँखों में आँसूँ थे और वो किसी तरह अपना रोना रोके हुए खड़ीं थीं| मैं फ़ौरन उठा और उनका हाथ पकड़ कर अपने पास बिठाया| चाय का गिलास टेबल पर रखा और उनके आँसूँ पोछते हुए उनसे बोला;
मैं: Hey क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा आपसे?
मैंने घबराते हुए पुछा| मेरा सवाल सुन भौजी बिना कुछ कहे मुझसे लिपट गईं और रोने लगीं|
मैं: क्या हुआ? कुछ बताओ तो सही?
मैंने भौजी के सर पर हाथ फेरते हुए पुछा तो भौजी सुबकते हुए बोलीं;
भौजी: अनिल का फोन आया था....
इतना कह भौजी साँस लेने को रुकीं, मुझे लगा की जर्रूर उसके साथ कोई अनहोनी हुई है, यही सोच कर मैं चिंतित हो गया और बीच में बोल पड़ा;
मैं: वो ठीक तो है न?
मेरा सवाल सुन भौजी ने हाँ में सर हिलाया और फिर से सुबकते हुए बोलीं;
भौजी: आपने....उसे पैसे....भेजे थे न?
मैं भौजी से जूठ नहीं बोल सकता था, इसलिए मैंने बड़े संक्षेप में जवाब दिया;
मैं: हाँ!
इतना सुन भौजी ने अपनी बाँहों को मेरी पीठ के इर्द-गिर्द कस लिया|
भौजी: Thank...you!
भौजी मेरे सीने से लगे हुए सुबकती हुई बोलीं|
मैं: किस लिए thank you? अब अगर आप मुझे अपनी समस्याओं के बारे में बताओगे नहीं तो मुझे खुद ही पता करना पड़ेगा न?
मैने भौजी के सर पर हाथ फेरते हुए कहा|
भौजी: नहीं ऐसा नहीं है! अनिल मुंबई में MBA कर रहा है, अब आपको तो पता ही होगा की इसमें कितना खर्च होता है?! मेरे पिताजी उम्र के चलते कोई काम-धँधा कर नहीं पाते, जमीन का छोटा सा टुकड़ा है जिसे उन्होंने किराए पर दे रखा है, उस छोटे से टुकड़े से ही थोड़ी-बहुत आमदनी होती है| जो कुछ जमा-पूँजी थी उससे अनिल का दाखिला मुंबई में हो गया, मगर आगे का खर्चा सँभालना मुश्किल हो रहा था, इसलिए पिताजी जमीन को गिरवी रख कर बैंक से लोन लेने के लिए apply किया है, loan approve होने में देर लग रही है! अनिल के exams नजदीक हैं और साथ ही उसकी hostel की फीस भी भरनी थी तो मैंने उसे अपनी पायल और दो चूड़ियाँ दे दी थीं!
भौजी ने मुझे सारी बात बताई तो उनका मन हल्का हो गया| भौजी का रोना अब थम चूका था, मगर वो फिर भी मुझे अपनी बाहों में भरे हुए थीं|
मैं: जान बस अब और मत गले लगो मेरे, माँ घर में ही हैं अगर आ गईं तो?
मन भौजी से जुदा नहीं होना चाहता था मगर माँ का डर भी था!
भौजी: जानू माँ घर पर हैं ही नहीं, वरना मैं ऐसे थोड़े ही आपसे लिपटी रहती!
भौजी मेरे सीने को चूमते हुए बोलीं| माँ का डर नहीं था तो मैंने भी भौजी को कस कर अपनी बाहों में भर लिया, लेकिन हमारा ये प्यारभरा संगम आगे बढ़ता उससे पहले ही अनिल का फ़ोन आ गया;
मैं: हेल्लो!
अनिल: Thank you जीजू!
अनिल खुश होते हुए बोला|
मैं: अरे यार thank you वाली formality बाहर वालों के साथ होती है, अपनों के साथ नहीं! आगे से कभी भी कोई जर्रूरत हो तो मुझे फोन किया कर, अपनी दीदी को नहीं!
मैंने बड़े हक़ से अनिल को कहा जैसे की मैं उसका असल का जीजा हूँ|
अनिल: पर जीजू, दीदी ने तो आपको कुछ बताया नहीं था फिर आपको कैसे पता चला की मुझे पैसों की जर्रूरत है?
अनिल ने जिज्ञासु बनते हुए सवाल पुछा|
मैं: आज मैंने तुम्हारी दीदी को बिना पायल के देख तो उनसे पायल के बारे में पूछा, तब उन्होंने मुझे बताया की तुम्हारी exam fees भरने के लिए उन्होंने अपनी पायल और कुछ चूड़ियाँ तुम्हें दी हैं| मैं समझ गया की चाँदी के पायल के मिलते ही कितने हैं?! चूड़ियों के फिर भी शायद कुछ मिले होंगे, इसलिए मैंने तुम्हारा नंबर निकाला और तुमसे बात की| खैर तुम इन बातों को सोचना छोड़ो और अपनी पढ़ाई में मन लगाओ|
मैंने ये पूरी बात भौजी की ओर देखते हुए कही| मेरी बात सुन कर भौजी मुस्कुराने लगी थीं|
अनिल: जी जीजू!
अनिल बड़े अदब से बोला|
मैं: Bye and take care!
मैंने बात खत्म करते हुए कहा|
अनिल: Bye जीजू!
अनिल ने bye कह कर फ़ोन रखा| भौजी जो अभी तक ख़ामोशी से मेरी और अनिल की बातें सुन रहीं थीं वो कुछ बोलने को हुई थीं की मैंने उन्हें प्यार से धमका दिया;
मैं: और आप, अगर आपने दुबारा मुझसे कोई बात छुपाई न तो देख लेना, ढूँढने से भी नहीं मिलूँगा!
मेरी प्यारभरी धमकी से भौजी डर गईं और एकदम से न में सर हिलाते हुए बोलीं;
भौजी: आज के बाद आपको सब बताऊँगी!
इतना कह वो फिर से मेरे सीने से लग गईं| भौजी थोड़ा सी भावुक हो गईं थीं तो मैंने उन्हें पुचकारते हुए चुप कराया| भौजी जो मेरे लिए चाय बना कर लाईं थीं वो हम ने आधी-आधी पी| भौजी smartphone चलाना नहीं जानतीं थीं तो मैं उन्हें अपने फ़ोन में मौजूद सारे features उन्हें समझाने लगा| जैसे ही मैंने उन्हें कैमरा on कर के दिखाया और हमारी फोटो खींच कर दिखाई तो भौजी का चहेरा ख़ुशी से खिल गया;
भौजी: जानू please इस picture को कागज़ में print कर के मुझे दे दो, मैं इसे हमेशा अपने सीने से लगाए रखूँगी!
मैं: जान अब तो हमेशा आपके सामने रहता हूँ, तो picture का क्या करोगे?
मेरी बात सुन भौजी शर्मा गईं और अपनी नजरें झुका लीं| हम आगे बात करते उससे पहले ही बच्चे उठ गए, नेहा उठ कर मेरी पीठ पर चढ़ गई और आयुष मेरी गोद में बैठ गया| मैंने दोनों बच्चों को लाड-प्यार करना शुरू किया और उनके साथ खेलने में व्यस्त हो गया, भौजी भी उठीं और रात का खाना बनाने में लग गईं| थोड़े खेल-कूद के बाद बारी थी पढ़ाई की, नेहा तो अपने notes copy करने में लग गई और मैंने आयुष को पढ़ाना शुरू कर दिया|
कुछ देर बाद माँ घर आ गईं और मेरे बारे में भौजी से पूछने लगीं, मैं बच्चों को ले कर आने के बाद से अपने कमरे में छुपा हुआ था| भौजी ने मेरी हिमायत करते हुए माँ को समझाना शुरू कर दिया था, जिसका असर इतनी जल्दी होने वाला नहीं था! पिताजी और चन्दर रात को देर से आने वाले थे, खाना तैयार था तो मैंने दोनों बच्चों को अपने कमरे में ही खाना खिला दिया और कहानी सुनाते हुए सुला दिया| मैंने खाना नहीं खाया था, वो इसलिए क्योंकि अगर मैं पिताजी के आने से पहले खा लेता तो चार गालियाँ और पड़तीं! रात साढ़े नौ बजे पिताजी घर आये और तब माँ मुझे खाने के लिए बोलने आईं;
माँ: खाना खा ले!
माँ ने उखड़े हुए स्वर में कहा| मैं सर झुका कर कमरे से बाहर आया, सब लोग डाइनिंग टेबल पर खाने के लिए बैठ गए थे और अब बारी थी फिर से पिताजी के ताने सुनने की;
पिताजी: तो क्या किया सारा दिन?
पिताजी ने सख्त आवाज में पुछा|
मैं कुछ जवाब देता उससे पहले ही माँ बोल पड़ीं;
माँ: सारा दिन पलंग तोड़ रहा था और क्या?
पिताजी: हम्म्म्म!
पिताजी की ये आवाज मुझे नजाने क्यों शेर की गुर्राहट जैसी लगी, मुझे लगा जर्रूर पिताजी अब डाँटेंगे;
पिताजी: कल साइट पर आजइओ!!
पिताजी ने कड़क आवाज में कहा और खाना खाने लगे|
मैं: जी!
मैंने सर झुकाये हुए कहा| मैं हैरान था की बस इतनी ही डाँट पड़नी थी? लेकिन फिर तभी चन्दर ने चुटकी ली;
चन्दर भैया: मानु भैया, चाचा अभयें अच्छे मूड म हैं एहि से बच गयो!
चन्दर ने आग लगाते हुए कहा| मुझे गुस्सा तो बहुत आया की यहाँ आग ठंडी पड़ रही है और ये साला उसमें घांसलेट डाल रहा है| पिताजी के डर के मारे मैं कुछ नहीं बोल सकता था इसलिए सर झुका कर चुपचाप खाना खाने लगा, मगर चन्दर की बात का जवाब पिताजी ने खुद दिया;
पिताजी: ऐसा नाहीं है बेटा! क़िलास तो हम अभयें लगाई देई, मगर मानु आज तक कउनो गलत काम नाहीं किहिस है! आज जिंदगी म पहली और आखरी बार गलती करिस है और ऊ के लिए मानु शर्मिंदाओ है, अब अगर हम ई का कूट-पीट देई तो ई सुधरी न, बल्कि और बिगड़ जाई! फिर है भी गरम खून, कल को कछु उलट-सीध कर देई तो हम का करब? हमरे लिए एहि बड़ा है की सुबह हमसे वादा कर दिहिस है की अब ई (मैं) सराब का हाथ न लगाई!
पिताजी की बात सुन चन्दर का मुँह बंद हो गया|
मैं: I promise पिताजी, आज के बाद कभी शराब को हाथ नहीं लगाउँगा|
मैंने लगे हाथ एक और बार अपनी बात दोहरा दी, जिसे सुन पिताजी के चेहरे पर आखिरकर मुस्कान आ गई तथा उन्होंने प्यार से मेरे सर पर हाथ फेर दिया|
खाना खा कर पिताजी अपने कमरे में सोने चले गए, इधर चन्दर ने भौजी से घर की चाभी ली और वो भी सोने चला गया| अब चूँकि मैं दिनभर पलंग तोड़ चूका था तो मुझे नींद आ नहीं रही थी, मैं आज टी.वी. देखने के लिए माँ और भौजी के साथ बैठ गया| शुक्रवार का दिन था और रात दस बजे CID आता था, माँ उसकी बहुत बड़ी fan है तथा ये आदत भौजी को भी लग चुकी थी| मुझे ये program बिलकुल पसंद नहीं था, अब अगर मैं channel बदलने की गुस्ताखी करता तो माँ से डाँट पड़ती इसलिए मैं चुपचाप बैठा देखने लगा| CID खत्म हुआ तो माँ सोने चली गई और मुझे कह गई;
माँ: अगर देर तक टी.वी देखना हो तो अपनी भौजी को घर अकेले मत जाने दिओ उसे घर छोड़ कर आइयो!
माँ की आवाज में गुस्सा नहीं था. मतलब पिताजी के साथ-साथ उनका गुस्सा भी शांत हो रहा था|
मैं: जी!
मैंने बड़े प्यार से कहा|
अब बैठक में बस मैं और भौजी बचे थे, टी.वी. पर Crime Patrol चल रहा था| मैं भौजी से दूर दूसरी कुर्सी पर बैठा था और भौजी सोफे पर बैठीं थीं| भौजी ने इशारे से मुझे अपने पास बैठने के लिए बुलाया, मैंने एक बार चेक कर लिया की माँ-पिताजी के कमरे का दरवाजा बंद हुआ की नहीं और फिर मैं जाके भौजी के पास बैठ गया|
भौजी: एक बात पूछूँ, आप बुरा तो नहीं मानोगे?
भौजी ने हिचकते हुए कहा|
मैं: हाँ जी पूछो?
मैंने बड़े प्यार से कहा|
भौजी: आपने अनिल को वो पैसे कहाँ से भेजे थे? मेरा मतलब आपके पास वो पैसे कहाँ से आये?
भौजी ने थोड़ा घबराते हुए पुछा| दरअसल भौजी को चिंता हो रही थी की कहीं मैंने ये पैसे पिताजी के चोरी तो नहीं दिए?
मैं: मेरे अकाउंट से|
मैंने बड़ी सरलता से जवाब दिया क्योंकि मैं अभी तक भौजी की बात का मतलब समझ नहीं पाया था|
भौजी: और आपके पास पैसे कहाँ से आये?
भौजी ने थोड़ी हिम्मत और करते हुए सवाल पुछा|
मैं: Graduation के दौरान और Graduation पूरी होने के बाद मैंने कुछ डेढ़-दो साल जॉब की थी| अब घर तो पिताजी के पैसों से चल जाया करता था, तो मैं अपनी salary से घर के लिए appliances खरीदा करता था| कभी washing machine तो कभी desktop computer, उसी salary की savings से मैंने अनिल को पैसे भेजे थे|
मैंने बड़े इत्मीनान से भौजी को जवाब दिया| मेरी बात सुन कर भौजी एकदम से खामोश हो गईं और गर्दन झुका कर बैठ गईं| मैं जान गया की उन्हें मेरे पैसे खर्च होने पर दुःख हो रहा है;
मैं: Hey? क्या हुआ? बुरा लग रहा है?
मैंने बात शुरू करते हुए कहा पर भौजी ने कोई जवाब नहीं दिया|
मैं: अच्छा ये बताओ की अगर अनिल आपका भाई है तो क्या मेरा कुछ नहीं? भई आपने ही तो उसे मेरा साला बनाया था न?
मैंने भौजी को गाँव में उनकी कही बात याद दिलाई|
मैं: अब दुनिया में ऐसा कौन सा जीजा है जिसे साले की मदद करने में दुःख होता हो? I mean जेठा लाल को छोड़ के!
मेरी जेठा लाल वाली बात सुन भौजी मुस्कुरा दीं, चलो तारक मेहता का उल्टा चश्मा के जरिये ही सही वो हँसी तो!
मैं: चलो रात बहुत हो रही है, मैं आपको घर छोड़ देता हूँ|
मैंने मुस्कुरा कर उठते हुए कहा| हम दोनों घर से निकले, रात का सन्नाटा था तो भौजी ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया| हम दोनों बिना बात किये भौजी के घर पहुँचे, भौजी ने अपनी चाभी से घर का ताला खोला और अंदर घुसीं मैंने उन्हें मुस्कुरा कर; "good night" कहा|
भौजी: ऐसे कैसे good night?!
भौजी खुसफुसा कर बोलीं और अपने दाहिने गाल पर kiss करने का इशारा किया| मैंने न में सर हिलाया क्योंकि इस वक़्त चन्दर घर पर मौजूद था|
मैं: कल!
मैंने मुस्कुराते हुए कहा| भौजी जान गईं की मेरा उन्हें kiss न करने का कारन क्या है और उन्होंने इसका बुरा नहीं लगाया| उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे; "good night" कहा और दरवाजा बंद कर दिया|
जब मैं घर लौटा तो देखा की आयुष जाग रहा है और अपने हवाई जहाज वाले खिलोने से अकेला खेल रहा है|
मैं: आयुष बेटा, नींद नहीं आ रही?
मैंने अपने कमरे का दरवाजा चिपकाते हुए पुछा|
आयुष: नहीं पापा!
आयुष खुश होते हुए बोला|
मैं: बेटा कल स्कूल जाना है, जल्दी सोओगे नहीं तो सुबह जल्दी कैसे उठोगे?
मैंने पलंग पर बैठते हुए कहा|
आयुष: पापा जी मुझे गेम खेलनी है|
आयुष ने ख़ुशी से अपना सर हाँ में हिलाते हुए कहा| उसका यूँसर हिलाना देख कर मुझे थोड़ी हैरानी हुई और मेरा दिल एकदम से पिघल गया;
मैं: ठीक है बेटा मगर शोर नहीं करना वरना आपकी दीदी जाग जाएगी|
मेरी बात सुन आयुष फिर से मुस्कुरा कर अपना सर हाँ में हिलाने लगा|
नटखट बालक तो मैं हुँ ही, बेटे का साथ मिला तो मैं भी बच्चा बन गया| कमरे की लाइट बंद कर मैंने desktop पर गेम लगा दी, मैं कुर्सी पर बैठा और आयुष को अपनी गोद में बिठा लिया| दोनों बाप-बेटा बारी-बारी से NFS खेलने लगे, जब गाडी पलट जाती या किसी दूसरी गाडी से ठुक जाती तो आयुष ख़ुशी से अपने दोनों हाथ उठा कर खुश हो जाता! कुछ देर बाद keyboard के buttons की टप-टप सुन कर नेहा भी उठ गई और मेरी बगल वाली कुर्सी पर आ कर बैठ गई|
नेहा: पापा जी मैं भी खेलूँगी!
नेहा बोली मगर आयुष अपनी बारी छोड़ने को तैयार नहीं था|
आयुष: दीदी आप सो जाओ, गेम खेलने का idea मेरा था!
आयुष की बात सुन नेहा जोर जबरदस्ती करने लगी;
नेहा: हट जा, मैं खेलूँगी!
नेहा ने बड़ी बहन का हक़ जताते हुए कहा और keyboard अपनी तरफ खींच लिया|
आयुष: नहीं मैं खेलूँगा!
आयुष ने keyboard खींचना चाहा मगर नेहा ने वो कस कर पकड़ रखा था| अब बड़ी बहन के आगे आयुष का जोर कहाँ चलता तो उसने मुझसे अपनी बहन की शिकायत कर दी;
आयुष: देखो न पापा, दीदी मुझे खेलने नहीं देती!!
आयुष मुँह फुलाते हुए बोला| अब मुझे मामला सुलझाना था;
मैं: बेटा आप दोनों आज रात बारी-बारी से खेलो, कल मैं आप दोनों के लिए दो game controllers ला दूँगा फिर आप दोनों एक साथ खेल पाओगे!
बच्चे मान गए और बारी-बारी से गाडी चलाने लगे, इस तरह गेम खेलते-खेलते बारह बज गए| कंप्यूटर बंद कर के हम तीनों लिपट कर सोये, अब देर से सोये थे तो बच्चों को सुबह उठने में देरी हो गई| मैं जल्दी उठ गया था मगर बच्चों को उठाने का मन नहीं किया, इसलिए उनके सर पर हाथ फेरता रहा| सवा 6 बजे भौजी गुस्से में बड़बड़ाती हुई कमरे में बच्चों को उठाने आईं;
भौजी: कितनी बार कहा की जल्दी सोया करो, ताकि सुबह जल्दी उठो, लेकिन तुम दोनों दिन पर दिन बदमाश होते जा रहे हो!
मैं: Relax यार! गलती मेरी है, रात को हम तीनों कंप्यूटर पर गेम खेल रहे थे! बारह बजे तो सोये हैं इसलिए थोड़ा सा सो लेने दो!
मैंने गलती अपने सर लेते हुए कहा|
भौजी: हम्म्म्म तो सजा आपको मिलेगी!
भौजी अपना झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं|
मैं: बताइये मालिक क्या सजा मुक़र्रर की है आपने|
मैंने किसी गुलाम की तरह सर झुका कर कहा|
भौजी: आप ने लेट सुलाया है तो आप ही इन्हें तैयार करोगे|
भौजी मुस्कुरा कर बोलीं|
मैं: वो तो मैं रोज करता हूँ|
मैंने मुस्कुरा कर कहा| बच्चों को सुबह स्कूल के लिए तैयार करने का काम ज्यादातर मैं ही किया करता था तो मेरे लिए कोई सजा नहीं थी, मगर भौजी की बात अभी पूरी कहाँ हुई थी!
भौजी: और आज मेरे साथ shopping चलोगे!
भौजी ने पत्नी की तरह इठला कर कहा|
मैं: Done लेकिन शाम को, सुबह पिताजी के साथ site पर जाना है|
मैंने सर झुका कर उनका हुक्म मानते हुए कहा|
भौजी: Done!
भौजी खुश होते हुए बोलीं!
अब बारी थी बच्चों को उठाने की, मैंने बस एक बार प्यार से दोनों बच्चों को पुकारा तो दोनों एकदम से उठ बैठे और मेरे गले लग गए|
भौजी: अरे वाह! मैं इतनी देर से गुस्से में उबल रही थी तब तो नहीं उठे और पापा की एक आवाज में उठ गए?
भौजी अपनी कमर पर दोनों हाथ रखते हुए बोलीं|
मैं: वो क्या है न, मेरे बच्चे मुझसे इतना प्यार करते हैं की मेरी हर बात मानते हैं|
मैंने दोनों बच्चों के सर चूमते हुए कहा| दोनों बच्चों ने अपनी मम्मी को जीभ चिढ़ाई और मुझसे लिपट कर खिलखिलाकर हँसने लगे| भौजी ने मुस्कुरा कर बाप-बेटा-बेटी को देखा और बच्चों का नाश्ता बनाने चली गईं| बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर मैं उन्हें उनकी school van में बिठा आया| वापस आ कर मैं नहा-धो कर तैयार हुआ और नाश्ता कर के पिताजी के साथ निकलने वाला था की भौजी ने सबसे नजर बचाते हुए घूँघट हटाया तथा मुझे अपनी नशीली आँखों से इशारा कर कमरे में आने को कहा| मैंने पिताजी से पर्स भूलने का बहाना किया और पर्स लेने के लिए अपने कमरे में आ गया| मेरे पीछे-पीछे भौजी भी सबसे नजरें बचातीं हुई आ गईं|
भौजी: आप कुछ भूल नहीं रहे?
भौजी ने घूँघट हटाते हुए कहा| मैंने फ़ौरन अपना पर्स, रुम्माल और फोन चेक किया और बोला;
मैं: नहीं तो|
भौजी: अच्छा? कल रात से आपकी एक kiss due है?
भौजी शिकायत करते हुए बोलीं|
मैं: ओह याद आया! लेकिन अभी नहीं, शाम को! ठीक है?
मैंने भौजी को प्यार से समझाते हुए कहा| Kissi करने का मन तो मेरा भी था मगर घर में सब मौजूद थे और भौजी को गाल पर kiss जमती नहीं थी तथा दूसरी वाली kiss के लिए अभी सही समय नहीं था|
भौजी: ठीक है!
भौजी ने कुछ सोचते हुए कहा| मुझे लगा की भौजी मान गईं, लेकिन भौजी बिना kiss लिए कहाँ मानने वालीं थीं?! वो एकदम से उचकीं और अचानक से मेरे होठों को चूम कर बाहर भाग गईं!
मैं: बदमाश! अगर करना ही था तो ढँग से करते!
मैं पीछे से बोला मगर तब तक भौजी बाहर भाग चुकी थीं|
पिताजी ने मुझे नॉएडा वाली साइट का काम संभालने को कहा था, तथा चन्दर को ले कर वो गुडगाँव चले गए| आज मैं बहुत जोश में था, इतना जोश में की लेबर भी पूछ रही थी की; "क्या बात है भैया, आज बड़े मूड में हो?" अब मैं उन्हें क्या कहता की मैं मूड में इसलिए हूँ क्योंकि आज दिन की शुरुआत बड़ी मीठी हुई है! मैं अपने जोश में इतना मग्न था की दोपहर में खाना भी नहीं खाया, 4 बजे मैंने पिताजी को फोन कर के झूठ कह दिया की; "माँ ने बुलाया है, मैं घर जा रहा हूँ|" पिताजी ने कोई सवाल-जवाब नहीं किया, मैं ख़ुशी से नाचता हुआ दिषु के ऑफिस पहुँचा| मेरे चेहरे पर ख़ुशी देख कर दिषु थोड़ा हैरान था, उसे लगा था की कल पिताजी की डाँट से मेरा मुँह उतरा होगा|
दिषु: अबे साले तू तो हवा में उड़ रहा है? लगता है अंकल जी ने बेल्ट से सूता नहीं तुझे?!
दिषु हँसते हुए बोला|
मैं: वो सब बाद में, फिलहाल मुझे तेरी Nano की चाभी चाहिए! आज उनको (भौजी को) और बच्चों को घुमाने ले जा रहा हूँ!
मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा|
दिषु: ओये-होये! शर्म तो देखो लड़के की!
दिषु ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा| उसने अपनी गाडी की चाभी मुझे निकाल कर दी और बोला;
दिषु: भाई अपना ध्यान रखिओ!
उसने ये बात थोड़ा गंभीर होते हुए कही| मैं उसकी बात का मतलब समझ गया था, दरअसल वो मुझे आगाह कर रहा था की मैं फिर से कहीं प्यार में न बह जाऊँ और एक बार फिर अपना दिल तुड़वा लूँ! अब मैं उस वक़्त भौजी के प्यार में इस कदर डूब चूका था की मैंने दिषु की बात को तवज्जो नहीं दी! मैंने बस दिषु का दिल रखने के लिए हाँ में सर हिलाया और गाडी भगाता हुआ घर पहुँचा| मैंने घर के बाहर से ही भौजी को फ़ोन किया और उन्हें तथा बच्चों को बाहर आने को कहा| भौजी और बच्चे बन ठन कर तैयार होकर गली से बाहर आये, मैंने गाडी से बाहर निकल अपना हाथ हिला कर तीनों को अपने पास बुलाया| मुझे गाडी के साथ देख दोनों बच्चे ख़ुशी से उछल पड़े और दौड़ते हुए मेरी तरफ आये|
आयुष: पापा जी ये हमारी गाडी है?
आयुष ने खुश होते हुए पुछा|
मैं: नहीं बेटा ये आपके दिषु चाचा की गाडी है, मैंने उनसे गाडी थोड़ी देर के लिए ली है|
अब आयुष दिषु के बारे में कुछ नहीं जानता था, मेरे दिषु को उसका चाचा बताने से वो थोड़ा हैरान था|
नेहा: दिषु चाचा पापा के bestfriend हैं, तो हमारे चाचा जी हुए न?
नेहा ने आयुष को समझाते हुए कहा| आयुष नेहा की बात सुन हाँ में सर हिलाने लगा और उत्साह से भरते हुए बोला;
आयुष: मैं आगे बैठूँगा!
लेकिन नेहा एकदम से बड़ी बहन का हक़ जताते हुए बोली;
नेहा: नहीं! छोटे बच्चे आगे नहीं बैठते!
नेहा की बात सुन कर आयुष का दिल टूट गया और उसका मुँह बन गया| अब मैं चाहता था की भौजी आगे बैठें मगर उनके आगे बैठने से दोनों बच्चों का दिल टूट जाता इसलिए मुझे कूटनीति अपनानी थी ताकि दोनों बच्चे नाराज न हों!
मैं: आयुष बेटा ऐसा करते हैं की आपकी दीदी आपसे बड़ीं हैं न तो अभी उनको आगे बैठने दो और आप पीछे अपनी मम्मी के साथ बैठो ताकि उनको पीछे डर न लगे| आज पहलीबार मम्मी गाडी में बैठ रहीं हैं न इसलिए आप उनका अच्छे से ख्याल रखना|
मेरी बात सुन कर भौजी मेरी होशियारी समझ गईं, लेकिन फिर भी उन्हें मेरी टाँग खींचनी थी इसलिए वो अपनी चाल चलते हुए बोलीं;
भौजी: मैं नहीं डरती गाडी में बैठने से! मैं कोई छोटी बच्ची थोड़े ही हूँ?!
मैं भौजी की होशियारी जान गया था इसलिए मैंने उन्हें आँख दिखा कर थोड़ा डराया और फिर आयुष को समझाने में लग गया;
मैं: मम्मी को बहुत डर लगता है, वो बस आपसे कहने में डरतीं हैं| आप अभी पीछे बैठ जाओ वापसी में आप आगे बैठ जाना और आपकी दीदी मम्मी के साथ बैठ जाएँगी|
आयुष अच्छा बच्चा था इसलिए वो मेरी बात मान गया, लेकिन भौजी को चुटकी लेने का फिर मौका मिल गया;
भौजी: और मैं? मैं कब आगे बैठूँगी?!
भौजी ने प्यारभरा गुस्सा दिखाते हुए कहा|
मैं: जान आप अगलीबार बैठ जाना!
मैंने प्यार से कहा| भौजी कुछ कहें उससे पहले ही नेहा ने फट से आगे का दरवाजा खोला और आगे बैठ गई, भौजी उसे हैरानी से देखती रहीं की नेहा को गाडी का दरवाजा खोलना कैसे आता है? फिर मैंने पीछे का दरवाजा खोला और भौजी को बैठने को कहा, पर भौजी बैठतीं उससे पहले आयुष घुस गया और पहले बैठ कर ऐसे खुश हुआ मानो उसने कोई खेल जीत लिया हो! उसे यूँ हँसता हुआ देख हम तीनों भी हँसने लगे! भौजी बैठीं और मैंने दरवाजा बंद किया, फिर मैं भी आगे बैठ गया तथा पहले नेहा की seat belt लगाई और फिर अपनी| नेहा की seat belt देख आयुष पीछे seat belt ढूँढने लगा;
मैं: बेटा पीछे seat belt लगाना जर्रूरी नहीं होता, आप बस अपनी मम्मी का हाथ पकड़ कर बैठो कहीं वो डर से रोने न लगे!
मैंने भौजी को छेड़ते हुए कहा|
भौजी: अच्छा जी?!
भौजी ने गाल फुलाते हुए कहा| गाडी चल पड़ी और नेहा ने आगे बैठे हुए अपनी मम्मी को गाडी के बारे में बताना शुरू कर दिया| AC, Radio, खिड़की ऊपर-नीचे करना और गाडी अंदर से lock-unlock करना, ये सब नेहा ने मेरे साथ cab में सीखा था| रास्ते में पड़ने वाली दुकानें, लोग और घरों को देख कर दोनों बच्चे अपनी मम्मी का ध्यान उस ओर खींचते रहते जिससे भौजी का मन लगा हुआ था|
हम Saket Select City Mall पहुँचे, गाडी parking में लगा कर हम तीनों mall की तरफ चल दिए| Entry होते समय security checking होनी थी, अब नेहा ने चौधरी बनते हुए अपनी मम्मी का हाथ पकड़ा और जहाँ महिलाओं की checking होती है वहाँ चली गई| मैंने आयुष का हाथ पकड़ा और security checking करवाने लगा| जब मेरी security checking हो रही थी तो आयुष ये सब बड़े गौर से देख रहा था| जब आयुष की बारी आई तो उसने भी मेरी तरह अपने दोनों हाथ उठा लिए, security guard ने जब ये देखा तो वो झुक गए और आयुष की checking बस दिखावे के तौर पर की, checking के बाद आयुष ने मुस्कुरा कर उनको bye कहा और मेरे पास दौड़ आया, एक छोटे से बच्चे के bye कहने भर से एक इंसान के चेहरे पर जो ख़ुशी आती है वही ख़ुशी security guard के चेहरे पर आ गई थी| उधर नेहा और भौजी अपनी security checking करवा कर बाहर आ गए, भौजी को आज अपनी बेटी पर बहुत गर्व हो रहा था क्योंकि नेहा ने उन्हें security check के बारे में सब समझा दिया था|
खैर mall के अंदर आ कर भौजी, नेहा और आयुष वहाँ की चकाचौंध में खो गए! इतने सारे लोग और सब tiptop कपडे पहने, इतनी खूबसूरत दुकानें जिन्हें देख कर ही उनके महँगे होने का अंदाजा लगाया जा सकता था, Mall में बजता music, escalators पर ऊपर-नीचे जाते लोग! ये दृश्य देख कर तीनों खामोश हो गए थे, बच्चों ने और भौजी ने कभी इस सब की कल्पना नहीं की थी इसलिए उनका चकित होना लाज़मी था|
मैं: बच्चों इस जगह को Mall कहते है| यहाँ बहुत सारी दुकानें होती हैं, कपड़ों की, खाने-पीने की और यहाँ पर फिल्म भी दिखाई जाती है!
फिल्म देखने के नाम से दोनों बच्चे खुश हो गए और कूदने लगे| भौजी ने उन्हें आँख दिखा कर डराया और कूदने से मना करने लगीं|
मैं: यार बच्चे हैं, थोड़ी मस्ती कर लेने दो!
मैंने बच्चों की हिमायत करते हुए कहा|
भौजी: ये तो बहुत महँगी जगह है!
भौजी घबराते हुए बोलीं!
मैं: मेरे परिवार से महँगा कुछ नहीं!
मैंने बिना डरे उनका हाथ पकड़ा और बच्चों के साथ theatre की ओर चल पड़ा| Theatre first floor पर था, मैं भौजी को ले कर escalators की ओर मुड़ गया| Escalators देख कर भौजी डर गईं;
भौजी: इसमें मेरी साडी फँस गई तो?
मैं: जान ये escalators specially design किये जाते हैं जिससे इसमें कुछ नहीं फँस सकता!
मैंने भौजी को हौसला देते हुए कहा|
नेहा: हाँ मम्मी चलो न, खूब मजा आएगा|
नेहा चहकते हुए बोली, लेकिन भौजी थोड़ी डरी हुई थीं| मैंने भौजी का हाथ कस कर पकड़ा और आँखों के इशारे से उन्हें मुझ पर विश्वास रखने को कहा| मैंने भौजी का हाथ पकड़ा तो नेहा ने भी बड़ी बहन बनते हुए आयुष का हाथ पकड़ा और उसे समझाते हुए बोली;
नेहा: देख आयुष तुझे न ऐसे पैर रखना है, कूदना नहीं है वरना गिर जाएगा| फिर जब हम ऊपर पहुँचेंगे न तब ऐसे पाँव बढ़ा कर आगे बढ़ना है! ठीक है?
नेहा ने आयुष को escalators पर चढ़ने तथा उतरने का तरीका समझा दिया था| अब मेरी बारी थी भौजी को समझाने की;
मैं: जान अपना दायाँ कदम आगे बढ़ाओ और ये सोचो की आप मेरे साथ नई जिंदगी शुरू करने जा रहे हो!
मेरी बात सुन भौजी के चेहरे पर मुस्कान आ गई और उन्होंने ठीक वैसे ही किया| हम दोनों escalators पर चढ़ चुके थे, मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो नेहा आयुष का हाथ पकडे हुए escalator पर चढ़ चुकी थी| दोनों बच्चों ने अपनी गर्दन इधर-उधर घूमना शुरू कर दिया था और आस-पास की हर चीज को देखना शुरू कर दिया था| इधर भौजी बस escalator की सीढ़ी को ही घूरे जा रही थीं|
मैं: जान अब हम ऊपर पहुँचने वाले हैं, आप ये सोचो की हमारी शादी हो चुकी है और आप मेरे घर में पहलीबार ‘प्रवेश’ करने वाली हो!
मेरी बात सुन भौजी की आँखें इस कल्पना से चमकने लगी और उन्होंने मेरा हाथ कस कर जकड़ लिया| हम ऊपर पहुँचे और दोनों सम्भल कर escalator से उतरे, भौजी का सारा डर छूमंतर हो चूका था! उधर बच्चे भी हमारे पीछे-पीछे ऊपर पहुँचा गए और escalator से उतरते ही मेरी टाँगों से लिपट गए!
हम चारों theatre पहुँचे, मैं टिकट लेने लगा और उधर नेहा ने गाँव मेरे साथ देखि film के बारे में आयुष को सब बताना शुरू कर दिया| अपनी दीदी की बात सुन आयुष का उत्साह दुगना हो गया था, मगर जो film हमें देखनी थी वो housefull थी! जब टिकट नहीं मिली तो बच्चों का मुँह बन गया;
मैं: Awwww! बेटा film कल देख लेंगे, मैं कल की टिकट पहले book कर लूँगा और आज के लिए....
मैं कुछ सोचने लगा और तभी मुझे कल रात की बात याद आई;
मैं: हम game खलने के लिए controllers ले लेते हैं!
Game controller लेने की बात से दोनों बच्चे खुश हो गए! मैं दोनों बच्चों का हाथ पकड़ कर lift की ओर चल पड़ा, लेकिन बच्चों को escalators में जाना था क्योंकि उन्हें उसमें बहुत मजा आया था!
मैं: बेटा अभी हम lift से चलते हैं, उसमें भी बहुत मजा आता है|
नेहा ने lift की सैर की थी इसलिए उसने आयुष को अपने lift वाले अनुभव के बारे में बताना शुरू कर दिया| नेहा की बात सुन कर भौजी बोल पड़ीं;
भौजी: जब lift थी तो आप मुझे escalator से क्यों लाये? अगर मैं गिर जाती तो?
भौजी अपना झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं|
मैं: आपको गिरने थोड़े ही देता! फिर इसी बहाने आपका हाथ पकड़ने का मौका भी तो मिल गया!
मैंने भौजी को छेड़ते हुए कहा| मेरी बात सुन कर भौजी शर्मा गईं और मुस्कुराने लगीं|
हम lift में घुसे और जब वो नीचे आने लगी तो, आयुष तथा भौजी मुझसे कस कर लिपट गए! एक बस नेहा थी जो निडर खड़ी थी तथा आयुष और अपनी मम्मी को देख कर उनके डरने का मजाक उड़ा रही थी!
भौजी: बहुत हँसी आ रही है तुझे!
भौजी नेहा को प्यार से डाँटते हुए बोली| खैर मैंने बच्चों को game controllers खरीदवाए और food court की ओर चल पड़ा| अब भौजी ने यहाँ बहुत सी लड़कियों और औरतों को jeans पहने देखा था तो उनका मन अब jeans पहनने का कर रहा था|
भौजी: बच्चों को तो game controller खरीदवा दिए, अब मुझे भी एक jeans खरीदवा दो!
भौजी बड़े प्यार से माँग करते हुए बोलीं| भौजी को jeans पहने हुए कल्पना कर मेरी आँखें चमकने लगी थीं मगर मैं उन्हें ये surprise देना चाहता था इसलिए मैंने थोड़ी बातें बनाईं और भौजी से उनकी कमर का नाप तथा top का साइज पूछ लिया| भौजी को लगा की मैं उन्हें jeans और top ख़रीदवाऊँगा मगर मैंने बात पलटते हुए कहा;
मैं: यार आप jeans में अच्छे नहीं लगोगे, हम ऐसा करते हैं की आपके लिए साडी ले लेते हैं|
भौजी इतनी भोली थीं की वो मेरी बात में आ गईं और साडी लेने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गईं|
भौजी: ठीक है लेकिन पसंद आप करोगे!
भौजी ने शर्त रखते हुए कहा, अब वो क्या जाने की मेरी पसंद इस मामले में कितनी अच्छी है?!
मैं: ठीक है!
मैंने मुस्कुराते हुए कहा| हम चारों एक अच्छी सी दूकान में घुसे और वहाँ मैंने अपनी पसंद की भौजी को Chiffon की साडी खरीदवाई! मेरी पसंद देख कर भौजी बहुत खुश थीं लेकिन वो साडी थी बहुत महँगी और मैं अपना debit card लाना भूल गया था! जेब में जितने पैसे थे उनसे वो साडी तो आ गई लेकिन cash खत्म हो गया था, भौजी नहीं जानतीं थीं की मेरे पास फिलहाल पैसे नहीं हैं वरना वो साडी लेने से मना कर देतीं| साडी खरीदने के बाद भौजी ने जिद्द पकड़ी की वो मेरे लिए एक शर्ट खरीदेंगी, मैंने कल लेने का बहाना मारा और हम चारों food court की ओर चल पड़े| गाँव में सीखे अपने सबक के चलते मैं हमेशा अपने पर्स में 500/- रुपये अलग से रखता था, ताकि कभी जर्रूरत पड़े तो काम आ जाएँ| आज वही पैसे मेरे काम आने वाले थे, food court में आ कर मैंने बच्चों से पुछा की वो क्या खाएँगे? उधर भौजी ने बाहर लगा हुआ menu पढ़ लिया था इसलिए उन्होंने होशियारी करते हुए कहा;
भौजी: बच्चों आपने corn नहीं खाये न? यहाँ बहुत अच्छे corn मिलते हैं!
भौजी इतने आत्मविश्वास से बोलीं जैसे की वो यहाँ रोज आतीं हों! मैं हैरान होते हुए उन्हें देखने लगा क्योंकि मैं उनकी होशियारी भाँप नहीं पाया था| वहीं बच्चे अपनी मम्मी की बात में आ गाये और corn खाने की माँग करने लगे! मैंने 4 medium corn लिए, दो मसाला कम रखवाया और दो में मसाला तेज रखवाया| जब मैं पैसे देने लगा तब मुझे भौजी की होशियारी समझ आई और मैं मंद-मंद मुस्कुराने लगा| Menu में लिखी सारे खाने की चीज 150/- रुपये से ऊपर थी, पैसे ज्यादा खर्च न हो इसलिए भौजी ने सबसे सस्ती चीज यानी corn खाने के लिए बच्चों को उकसाया था|
Corn खाते- खाते हम गाडी में बैठे, इस बार आयुष आगे बैठा और ख़ुशी से सीट पर बैठे-बैठे नाच रहा था| मैंने गाडी में गाना लगाया और गाडी का rear view mirror भौजी की ओर मोड़ते हुए गाने लगा;
मैं: हाँ तू है हाँ तू है,
मेरी बातों में तू है,
मेरी ख्वाबों में तू,
याददों में तू,
इरादो में तू है!
गाना सुन भौजी इतने प्यार से मुस्कुराईं की मन किया की अभी गाडी रोक कर उन्हें अपनी बाहों में भर लूँ! खैर गाना सुनते हुए हम चारों घर पहुँचे, भौजी तो आते ही माँ के साथ बातों में लग गईं और उन्हें अपनी साडी दिखाने लगीं| भौजी की देखा-देखि दोनों बच्चों ने माँ को घेर लिया और वो भी mall के बारे में माँ को सब बताने लगे|
जारी रहेगा भाग - 11 में...
Nice sirji nice.तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन
भाग - 10
अब तक आपने पढ़ा:
मैं: कितने पैसे?
मैंने गंभीर होते हुए पुछा|
अनिल: जी....पाँच...पाँच हजार... मुझे PG के पैसे भरने थे...उसके लिए|
अनिल ने सँकुचाते हुए कहा|
मैं: अच्छा...वो...आपकी दीदी ने कुछ पैसे दिए हैं आपको भेजने को! तो मैं NEFT कर दूँ, थोड़ी देर में पहुँच जायेंगे|
मैंने जान बूझ कर झूठ बोला क्योंकि मैं जानता था की अनिल कभी मुझसे पैसे नहीं लेगा|
अनिल मेरे पैसे भेजने की बात को सुन कर खुश हो गया और ख़ुशी से चहकते हुए बोला;
अनिल: जी!
अनिल ने मुझे अपनी सारी bank detail sms की और मैंने उसी वक़्त उसे NEFT कर दिया तथा अपने घर लौट आया|
अब आगे:
मैंने अनिल को पैसे भेजने की बात भौजी से छुपाई थी क्योंकि मैं नहीं चाहता था की उनके मन में मेरे प्यार के अलावा कोई और जज़्बात पैदा हों, वो बस मुझे प्यार करें न की मेरा एहसानमंद बन कर दबने लगें! करीब दो घंटों बाद मुझे अनिल का फोन आया की उसे पैसे मिल गए हैं और उसने मुझे पैसे भेजने के लिए thank you भी कहा| उसे अभी तक नहीं पता था की ये पैसे उसकी दीदी ने नहीं बल्कि मैंने भेजे हैं| उधर बच्चों के स्कूल से आने का समय हो रहा था तो मैं उन्हें लेने चल दिया, जैसे ही बच्चों ने school van में से मुझे देखा दोनों ख़ुशी से चहकने लगे| ड्राइवर साहब ने मुझे दोनों बच्चों के school bag दिए, इधर दोनों बच्चे मेरे से कस कर लिपट गए|
माँ का गुस्सा अभी तक कम नहीं हुआ था इसलिए सुबह से मैं जानकार उनके सामने नहीं आ रहा था, बच्चों को घर ला कर मैं माँ से नजरें चुराते हुए अपने कमरे में घुस गया| भौजी जान गईं थीं की मैं माँ से छुप रहा हूँ इसलिए उन्होंने मेरा और बच्चों का खाना एक थाली में परोस कर मेरे कमरे में ही भिजवा दिया| पिताजी और चन्दर दोपहर को साइट पर रुके थे और उनका खाना वहीं होना था, इसलिए भौजी तथा माँ बाहर बैठक में टी.वी देखते हुए खाना खा रहे थे|
मैंने दोनों बच्चों को खाना खिलाया, खाना खाते समय दोनों ने बारी-बारी अपनी आज की दिनचर्या बताई| नेहा की दिनचर्या बड़ी सामन्य होती थी, वो सारा टाइम अपना पिछले काम निपटाने में लगी रहती, दूसरी तरफ आयुष की दिनचर्या बस मस्ती से भरी होती थी| कभी arts class में clay के साथ clay modelling तो कभी games period में खेलना! एक बस lunchtime था जो दोनों भाई-बहन खाना खाते हुए बिताते थे, उस समय भी आयुष नेहा को अपनी class में की गई मस्तियों के बारे में बताने लगता था|
खैर खाना खा कर हम तीनों बाप-बेटा-बेटी लिपट कर सो गए, बच्चों के संग इतनी प्यारी नींद आई की मैं सीधा शाम को 5 बजे उठा, मुँह-हाथ धो कर मैं अपना फ़ोन देख रहा था जब भौजी चुपचाप चाय का गिलास लिए मेरे सामने खड़ी हो गईं! मेरी नजरें फ़ोन में घुसी थीं और उधर भौजी टकटकी बाँधे मुझे देख रहीं थीं| जब मैंने नजरें उठा कर भौजी को देखा तो मैं हैरान हो गया, भौजी की आँखों में आँसूँ थे और वो किसी तरह अपना रोना रोके हुए खड़ीं थीं| मैं फ़ौरन उठा और उनका हाथ पकड़ कर अपने पास बिठाया| चाय का गिलास टेबल पर रखा और उनके आँसूँ पोछते हुए उनसे बोला;
मैं: Hey क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा आपसे?
मैंने घबराते हुए पुछा| मेरा सवाल सुन भौजी बिना कुछ कहे मुझसे लिपट गईं और रोने लगीं|
मैं: क्या हुआ? कुछ बताओ तो सही?
मैंने भौजी के सर पर हाथ फेरते हुए पुछा तो भौजी सुबकते हुए बोलीं;
भौजी: अनिल का फोन आया था....
इतना कह भौजी साँस लेने को रुकीं, मुझे लगा की जर्रूर उसके साथ कोई अनहोनी हुई है, यही सोच कर मैं चिंतित हो गया और बीच में बोल पड़ा;
मैं: वो ठीक तो है न?
मेरा सवाल सुन भौजी ने हाँ में सर हिलाया और फिर से सुबकते हुए बोलीं;
भौजी: आपने....उसे पैसे....भेजे थे न?
मैं भौजी से जूठ नहीं बोल सकता था, इसलिए मैंने बड़े संक्षेप में जवाब दिया;
मैं: हाँ!
इतना सुन भौजी ने अपनी बाँहों को मेरी पीठ के इर्द-गिर्द कस लिया|
भौजी: Thank...you!
भौजी मेरे सीने से लगे हुए सुबकती हुई बोलीं|
मैं: किस लिए thank you? अब अगर आप मुझे अपनी समस्याओं के बारे में बताओगे नहीं तो मुझे खुद ही पता करना पड़ेगा न?
मैने भौजी के सर पर हाथ फेरते हुए कहा|
भौजी: नहीं ऐसा नहीं है! अनिल मुंबई में MBA कर रहा है, अब आपको तो पता ही होगा की इसमें कितना खर्च होता है?! मेरे पिताजी उम्र के चलते कोई काम-धँधा कर नहीं पाते, जमीन का छोटा सा टुकड़ा है जिसे उन्होंने किराए पर दे रखा है, उस छोटे से टुकड़े से ही थोड़ी-बहुत आमदनी होती है| जो कुछ जमा-पूँजी थी उससे अनिल का दाखिला मुंबई में हो गया, मगर आगे का खर्चा सँभालना मुश्किल हो रहा था, इसलिए पिताजी जमीन को गिरवी रख कर बैंक से लोन लेने के लिए apply किया है, loan approve होने में देर लग रही है! अनिल के exams नजदीक हैं और साथ ही उसकी hostel की फीस भी भरनी थी तो मैंने उसे अपनी पायल और दो चूड़ियाँ दे दी थीं!
भौजी ने मुझे सारी बात बताई तो उनका मन हल्का हो गया| भौजी का रोना अब थम चूका था, मगर वो फिर भी मुझे अपनी बाहों में भरे हुए थीं|
मैं: जान बस अब और मत गले लगो मेरे, माँ घर में ही हैं अगर आ गईं तो?
मन भौजी से जुदा नहीं होना चाहता था मगर माँ का डर भी था!
भौजी: जानू माँ घर पर हैं ही नहीं, वरना मैं ऐसे थोड़े ही आपसे लिपटी रहती!
भौजी मेरे सीने को चूमते हुए बोलीं| माँ का डर नहीं था तो मैंने भी भौजी को कस कर अपनी बाहों में भर लिया, लेकिन हमारा ये प्यारभरा संगम आगे बढ़ता उससे पहले ही अनिल का फ़ोन आ गया;
मैं: हेल्लो!
अनिल: Thank you जीजू!
अनिल खुश होते हुए बोला|
मैं: अरे यार thank you वाली formality बाहर वालों के साथ होती है, अपनों के साथ नहीं! आगे से कभी भी कोई जर्रूरत हो तो मुझे फोन किया कर, अपनी दीदी को नहीं!
मैंने बड़े हक़ से अनिल को कहा जैसे की मैं उसका असल का जीजा हूँ|
अनिल: पर जीजू, दीदी ने तो आपको कुछ बताया नहीं था फिर आपको कैसे पता चला की मुझे पैसों की जर्रूरत है?
अनिल ने जिज्ञासु बनते हुए सवाल पुछा|
मैं: आज मैंने तुम्हारी दीदी को बिना पायल के देख तो उनसे पायल के बारे में पूछा, तब उन्होंने मुझे बताया की तुम्हारी exam fees भरने के लिए उन्होंने अपनी पायल और कुछ चूड़ियाँ तुम्हें दी हैं| मैं समझ गया की चाँदी के पायल के मिलते ही कितने हैं?! चूड़ियों के फिर भी शायद कुछ मिले होंगे, इसलिए मैंने तुम्हारा नंबर निकाला और तुमसे बात की| खैर तुम इन बातों को सोचना छोड़ो और अपनी पढ़ाई में मन लगाओ|
मैंने ये पूरी बात भौजी की ओर देखते हुए कही| मेरी बात सुन कर भौजी मुस्कुराने लगी थीं|
अनिल: जी जीजू!
अनिल बड़े अदब से बोला|
मैं: Bye and take care!
मैंने बात खत्म करते हुए कहा|
अनिल: Bye जीजू!
अनिल ने bye कह कर फ़ोन रखा| भौजी जो अभी तक ख़ामोशी से मेरी और अनिल की बातें सुन रहीं थीं वो कुछ बोलने को हुई थीं की मैंने उन्हें प्यार से धमका दिया;
मैं: और आप, अगर आपने दुबारा मुझसे कोई बात छुपाई न तो देख लेना, ढूँढने से भी नहीं मिलूँगा!
मेरी प्यारभरी धमकी से भौजी डर गईं और एकदम से न में सर हिलाते हुए बोलीं;
भौजी: आज के बाद आपको सब बताऊँगी!
इतना कह वो फिर से मेरे सीने से लग गईं| भौजी थोड़ा सी भावुक हो गईं थीं तो मैंने उन्हें पुचकारते हुए चुप कराया| भौजी जो मेरे लिए चाय बना कर लाईं थीं वो हम ने आधी-आधी पी| भौजी smartphone चलाना नहीं जानतीं थीं तो मैं उन्हें अपने फ़ोन में मौजूद सारे features उन्हें समझाने लगा| जैसे ही मैंने उन्हें कैमरा on कर के दिखाया और हमारी फोटो खींच कर दिखाई तो भौजी का चहेरा ख़ुशी से खिल गया;
भौजी: जानू please इस picture को कागज़ में print कर के मुझे दे दो, मैं इसे हमेशा अपने सीने से लगाए रखूँगी!
मैं: जान अब तो हमेशा आपके सामने रहता हूँ, तो picture का क्या करोगे?
मेरी बात सुन भौजी शर्मा गईं और अपनी नजरें झुका लीं| हम आगे बात करते उससे पहले ही बच्चे उठ गए, नेहा उठ कर मेरी पीठ पर चढ़ गई और आयुष मेरी गोद में बैठ गया| मैंने दोनों बच्चों को लाड-प्यार करना शुरू किया और उनके साथ खेलने में व्यस्त हो गया, भौजी भी उठीं और रात का खाना बनाने में लग गईं| थोड़े खेल-कूद के बाद बारी थी पढ़ाई की, नेहा तो अपने notes copy करने में लग गई और मैंने आयुष को पढ़ाना शुरू कर दिया|
कुछ देर बाद माँ घर आ गईं और मेरे बारे में भौजी से पूछने लगीं, मैं बच्चों को ले कर आने के बाद से अपने कमरे में छुपा हुआ था| भौजी ने मेरी हिमायत करते हुए माँ को समझाना शुरू कर दिया था, जिसका असर इतनी जल्दी होने वाला नहीं था! पिताजी और चन्दर रात को देर से आने वाले थे, खाना तैयार था तो मैंने दोनों बच्चों को अपने कमरे में ही खाना खिला दिया और कहानी सुनाते हुए सुला दिया| मैंने खाना नहीं खाया था, वो इसलिए क्योंकि अगर मैं पिताजी के आने से पहले खा लेता तो चार गालियाँ और पड़तीं! रात साढ़े नौ बजे पिताजी घर आये और तब माँ मुझे खाने के लिए बोलने आईं;
माँ: खाना खा ले!
माँ ने उखड़े हुए स्वर में कहा| मैं सर झुका कर कमरे से बाहर आया, सब लोग डाइनिंग टेबल पर खाने के लिए बैठ गए थे और अब बारी थी फिर से पिताजी के ताने सुनने की;
पिताजी: तो क्या किया सारा दिन?
पिताजी ने सख्त आवाज में पुछा|
मैं कुछ जवाब देता उससे पहले ही माँ बोल पड़ीं;
माँ: सारा दिन पलंग तोड़ रहा था और क्या?
पिताजी: हम्म्म्म!
पिताजी की ये आवाज मुझे नजाने क्यों शेर की गुर्राहट जैसी लगी, मुझे लगा जर्रूर पिताजी अब डाँटेंगे;
पिताजी: कल साइट पर आजइओ!!
पिताजी ने कड़क आवाज में कहा और खाना खाने लगे|
मैं: जी!
मैंने सर झुकाये हुए कहा| मैं हैरान था की बस इतनी ही डाँट पड़नी थी? लेकिन फिर तभी चन्दर ने चुटकी ली;
चन्दर भैया: मानु भैया, चाचा अभयें अच्छे मूड म हैं एहि से बच गयो!
चन्दर ने आग लगाते हुए कहा| मुझे गुस्सा तो बहुत आया की यहाँ आग ठंडी पड़ रही है और ये साला उसमें घांसलेट डाल रहा है| पिताजी के डर के मारे मैं कुछ नहीं बोल सकता था इसलिए सर झुका कर चुपचाप खाना खाने लगा, मगर चन्दर की बात का जवाब पिताजी ने खुद दिया;
पिताजी: ऐसा नाहीं है बेटा! क़िलास तो हम अभयें लगाई देई, मगर मानु आज तक कउनो गलत काम नाहीं किहिस है! आज जिंदगी म पहली और आखरी बार गलती करिस है और ऊ के लिए मानु शर्मिंदाओ है, अब अगर हम ई का कूट-पीट देई तो ई सुधरी न, बल्कि और बिगड़ जाई! फिर है भी गरम खून, कल को कछु उलट-सीध कर देई तो हम का करब? हमरे लिए एहि बड़ा है की सुबह हमसे वादा कर दिहिस है की अब ई (मैं) सराब का हाथ न लगाई!
पिताजी की बात सुन चन्दर का मुँह बंद हो गया|
मैं: I promise पिताजी, आज के बाद कभी शराब को हाथ नहीं लगाउँगा|
मैंने लगे हाथ एक और बार अपनी बात दोहरा दी, जिसे सुन पिताजी के चेहरे पर आखिरकर मुस्कान आ गई तथा उन्होंने प्यार से मेरे सर पर हाथ फेर दिया|
खाना खा कर पिताजी अपने कमरे में सोने चले गए, इधर चन्दर ने भौजी से घर की चाभी ली और वो भी सोने चला गया| अब चूँकि मैं दिनभर पलंग तोड़ चूका था तो मुझे नींद आ नहीं रही थी, मैं आज टी.वी. देखने के लिए माँ और भौजी के साथ बैठ गया| शुक्रवार का दिन था और रात दस बजे CID आता था, माँ उसकी बहुत बड़ी fan है तथा ये आदत भौजी को भी लग चुकी थी| मुझे ये program बिलकुल पसंद नहीं था, अब अगर मैं channel बदलने की गुस्ताखी करता तो माँ से डाँट पड़ती इसलिए मैं चुपचाप बैठा देखने लगा| CID खत्म हुआ तो माँ सोने चली गई और मुझे कह गई;
माँ: अगर देर तक टी.वी देखना हो तो अपनी भौजी को घर अकेले मत जाने दिओ उसे घर छोड़ कर आइयो!
माँ की आवाज में गुस्सा नहीं था. मतलब पिताजी के साथ-साथ उनका गुस्सा भी शांत हो रहा था|
मैं: जी!
मैंने बड़े प्यार से कहा|
अब बैठक में बस मैं और भौजी बचे थे, टी.वी. पर Crime Patrol चल रहा था| मैं भौजी से दूर दूसरी कुर्सी पर बैठा था और भौजी सोफे पर बैठीं थीं| भौजी ने इशारे से मुझे अपने पास बैठने के लिए बुलाया, मैंने एक बार चेक कर लिया की माँ-पिताजी के कमरे का दरवाजा बंद हुआ की नहीं और फिर मैं जाके भौजी के पास बैठ गया|
भौजी: एक बात पूछूँ, आप बुरा तो नहीं मानोगे?
भौजी ने हिचकते हुए कहा|
मैं: हाँ जी पूछो?
मैंने बड़े प्यार से कहा|
भौजी: आपने अनिल को वो पैसे कहाँ से भेजे थे? मेरा मतलब आपके पास वो पैसे कहाँ से आये?
भौजी ने थोड़ा घबराते हुए पुछा| दरअसल भौजी को चिंता हो रही थी की कहीं मैंने ये पैसे पिताजी के चोरी तो नहीं दिए?
मैं: मेरे अकाउंट से|
मैंने बड़ी सरलता से जवाब दिया क्योंकि मैं अभी तक भौजी की बात का मतलब समझ नहीं पाया था|
भौजी: और आपके पास पैसे कहाँ से आये?
भौजी ने थोड़ी हिम्मत और करते हुए सवाल पुछा|
मैं: Graduation के दौरान और Graduation पूरी होने के बाद मैंने कुछ डेढ़-दो साल जॉब की थी| अब घर तो पिताजी के पैसों से चल जाया करता था, तो मैं अपनी salary से घर के लिए appliances खरीदा करता था| कभी washing machine तो कभी desktop computer, उसी salary की savings से मैंने अनिल को पैसे भेजे थे|
मैंने बड़े इत्मीनान से भौजी को जवाब दिया| मेरी बात सुन कर भौजी एकदम से खामोश हो गईं और गर्दन झुका कर बैठ गईं| मैं जान गया की उन्हें मेरे पैसे खर्च होने पर दुःख हो रहा है;
मैं: Hey? क्या हुआ? बुरा लग रहा है?
मैंने बात शुरू करते हुए कहा पर भौजी ने कोई जवाब नहीं दिया|
मैं: अच्छा ये बताओ की अगर अनिल आपका भाई है तो क्या मेरा कुछ नहीं? भई आपने ही तो उसे मेरा साला बनाया था न?
मैंने भौजी को गाँव में उनकी कही बात याद दिलाई|
मैं: अब दुनिया में ऐसा कौन सा जीजा है जिसे साले की मदद करने में दुःख होता हो? I mean जेठा लाल को छोड़ के!
मेरी जेठा लाल वाली बात सुन भौजी मुस्कुरा दीं, चलो तारक मेहता का उल्टा चश्मा के जरिये ही सही वो हँसी तो!
मैं: चलो रात बहुत हो रही है, मैं आपको घर छोड़ देता हूँ|
मैंने मुस्कुरा कर उठते हुए कहा| हम दोनों घर से निकले, रात का सन्नाटा था तो भौजी ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया| हम दोनों बिना बात किये भौजी के घर पहुँचे, भौजी ने अपनी चाभी से घर का ताला खोला और अंदर घुसीं मैंने उन्हें मुस्कुरा कर; "good night" कहा|
भौजी: ऐसे कैसे good night?!
भौजी खुसफुसा कर बोलीं और अपने दाहिने गाल पर kiss करने का इशारा किया| मैंने न में सर हिलाया क्योंकि इस वक़्त चन्दर घर पर मौजूद था|
मैं: कल!
मैंने मुस्कुराते हुए कहा| भौजी जान गईं की मेरा उन्हें kiss न करने का कारन क्या है और उन्होंने इसका बुरा नहीं लगाया| उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे; "good night" कहा और दरवाजा बंद कर दिया|
जब मैं घर लौटा तो देखा की आयुष जाग रहा है और अपने हवाई जहाज वाले खिलोने से अकेला खेल रहा है|
मैं: आयुष बेटा, नींद नहीं आ रही?
मैंने अपने कमरे का दरवाजा चिपकाते हुए पुछा|
आयुष: नहीं पापा!
आयुष खुश होते हुए बोला|
मैं: बेटा कल स्कूल जाना है, जल्दी सोओगे नहीं तो सुबह जल्दी कैसे उठोगे?
मैंने पलंग पर बैठते हुए कहा|
आयुष: पापा जी मुझे गेम खेलनी है|
आयुष ने ख़ुशी से अपना सर हाँ में हिलाते हुए कहा| उसका यूँसर हिलाना देख कर मुझे थोड़ी हैरानी हुई और मेरा दिल एकदम से पिघल गया;
मैं: ठीक है बेटा मगर शोर नहीं करना वरना आपकी दीदी जाग जाएगी|
मेरी बात सुन आयुष फिर से मुस्कुरा कर अपना सर हाँ में हिलाने लगा|
नटखट बालक तो मैं हुँ ही, बेटे का साथ मिला तो मैं भी बच्चा बन गया| कमरे की लाइट बंद कर मैंने desktop पर गेम लगा दी, मैं कुर्सी पर बैठा और आयुष को अपनी गोद में बिठा लिया| दोनों बाप-बेटा बारी-बारी से NFS खेलने लगे, जब गाडी पलट जाती या किसी दूसरी गाडी से ठुक जाती तो आयुष ख़ुशी से अपने दोनों हाथ उठा कर खुश हो जाता! कुछ देर बाद keyboard के buttons की टप-टप सुन कर नेहा भी उठ गई और मेरी बगल वाली कुर्सी पर आ कर बैठ गई|
नेहा: पापा जी मैं भी खेलूँगी!
नेहा बोली मगर आयुष अपनी बारी छोड़ने को तैयार नहीं था|
आयुष: दीदी आप सो जाओ, गेम खेलने का idea मेरा था!
आयुष की बात सुन नेहा जोर जबरदस्ती करने लगी;
नेहा: हट जा, मैं खेलूँगी!
नेहा ने बड़ी बहन का हक़ जताते हुए कहा और keyboard अपनी तरफ खींच लिया|
आयुष: नहीं मैं खेलूँगा!
आयुष ने keyboard खींचना चाहा मगर नेहा ने वो कस कर पकड़ रखा था| अब बड़ी बहन के आगे आयुष का जोर कहाँ चलता तो उसने मुझसे अपनी बहन की शिकायत कर दी;
आयुष: देखो न पापा, दीदी मुझे खेलने नहीं देती!!
आयुष मुँह फुलाते हुए बोला| अब मुझे मामला सुलझाना था;
मैं: बेटा आप दोनों आज रात बारी-बारी से खेलो, कल मैं आप दोनों के लिए दो game controllers ला दूँगा फिर आप दोनों एक साथ खेल पाओगे!
बच्चे मान गए और बारी-बारी से गाडी चलाने लगे, इस तरह गेम खेलते-खेलते बारह बज गए| कंप्यूटर बंद कर के हम तीनों लिपट कर सोये, अब देर से सोये थे तो बच्चों को सुबह उठने में देरी हो गई| मैं जल्दी उठ गया था मगर बच्चों को उठाने का मन नहीं किया, इसलिए उनके सर पर हाथ फेरता रहा| सवा 6 बजे भौजी गुस्से में बड़बड़ाती हुई कमरे में बच्चों को उठाने आईं;
भौजी: कितनी बार कहा की जल्दी सोया करो, ताकि सुबह जल्दी उठो, लेकिन तुम दोनों दिन पर दिन बदमाश होते जा रहे हो!
मैं: Relax यार! गलती मेरी है, रात को हम तीनों कंप्यूटर पर गेम खेल रहे थे! बारह बजे तो सोये हैं इसलिए थोड़ा सा सो लेने दो!
मैंने गलती अपने सर लेते हुए कहा|
भौजी: हम्म्म्म तो सजा आपको मिलेगी!
भौजी अपना झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं|
मैं: बताइये मालिक क्या सजा मुक़र्रर की है आपने|
मैंने किसी गुलाम की तरह सर झुका कर कहा|
भौजी: आप ने लेट सुलाया है तो आप ही इन्हें तैयार करोगे|
भौजी मुस्कुरा कर बोलीं|
मैं: वो तो मैं रोज करता हूँ|
मैंने मुस्कुरा कर कहा| बच्चों को सुबह स्कूल के लिए तैयार करने का काम ज्यादातर मैं ही किया करता था तो मेरे लिए कोई सजा नहीं थी, मगर भौजी की बात अभी पूरी कहाँ हुई थी!
भौजी: और आज मेरे साथ shopping चलोगे!
भौजी ने पत्नी की तरह इठला कर कहा|
मैं: Done लेकिन शाम को, सुबह पिताजी के साथ site पर जाना है|
मैंने सर झुका कर उनका हुक्म मानते हुए कहा|
भौजी: Done!
भौजी खुश होते हुए बोलीं!
अब बारी थी बच्चों को उठाने की, मैंने बस एक बार प्यार से दोनों बच्चों को पुकारा तो दोनों एकदम से उठ बैठे और मेरे गले लग गए|
भौजी: अरे वाह! मैं इतनी देर से गुस्से में उबल रही थी तब तो नहीं उठे और पापा की एक आवाज में उठ गए?
भौजी अपनी कमर पर दोनों हाथ रखते हुए बोलीं|
मैं: वो क्या है न, मेरे बच्चे मुझसे इतना प्यार करते हैं की मेरी हर बात मानते हैं|
मैंने दोनों बच्चों के सर चूमते हुए कहा| दोनों बच्चों ने अपनी मम्मी को जीभ चिढ़ाई और मुझसे लिपट कर खिलखिलाकर हँसने लगे| भौजी ने मुस्कुरा कर बाप-बेटा-बेटी को देखा और बच्चों का नाश्ता बनाने चली गईं| बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर मैं उन्हें उनकी school van में बिठा आया| वापस आ कर मैं नहा-धो कर तैयार हुआ और नाश्ता कर के पिताजी के साथ निकलने वाला था की भौजी ने सबसे नजर बचाते हुए घूँघट हटाया तथा मुझे अपनी नशीली आँखों से इशारा कर कमरे में आने को कहा| मैंने पिताजी से पर्स भूलने का बहाना किया और पर्स लेने के लिए अपने कमरे में आ गया| मेरे पीछे-पीछे भौजी भी सबसे नजरें बचातीं हुई आ गईं|
भौजी: आप कुछ भूल नहीं रहे?
भौजी ने घूँघट हटाते हुए कहा| मैंने फ़ौरन अपना पर्स, रुम्माल और फोन चेक किया और बोला;
मैं: नहीं तो|
भौजी: अच्छा? कल रात से आपकी एक kiss due है?
भौजी शिकायत करते हुए बोलीं|
मैं: ओह याद आया! लेकिन अभी नहीं, शाम को! ठीक है?
मैंने भौजी को प्यार से समझाते हुए कहा| Kissi करने का मन तो मेरा भी था मगर घर में सब मौजूद थे और भौजी को गाल पर kiss जमती नहीं थी तथा दूसरी वाली kiss के लिए अभी सही समय नहीं था|
भौजी: ठीक है!
भौजी ने कुछ सोचते हुए कहा| मुझे लगा की भौजी मान गईं, लेकिन भौजी बिना kiss लिए कहाँ मानने वालीं थीं?! वो एकदम से उचकीं और अचानक से मेरे होठों को चूम कर बाहर भाग गईं!
मैं: बदमाश! अगर करना ही था तो ढँग से करते!
मैं पीछे से बोला मगर तब तक भौजी बाहर भाग चुकी थीं|
पिताजी ने मुझे नॉएडा वाली साइट का काम संभालने को कहा था, तथा चन्दर को ले कर वो गुडगाँव चले गए| आज मैं बहुत जोश में था, इतना जोश में की लेबर भी पूछ रही थी की; "क्या बात है भैया, आज बड़े मूड में हो?" अब मैं उन्हें क्या कहता की मैं मूड में इसलिए हूँ क्योंकि आज दिन की शुरुआत बड़ी मीठी हुई है! मैं अपने जोश में इतना मग्न था की दोपहर में खाना भी नहीं खाया, 4 बजे मैंने पिताजी को फोन कर के झूठ कह दिया की; "माँ ने बुलाया है, मैं घर जा रहा हूँ|" पिताजी ने कोई सवाल-जवाब नहीं किया, मैं ख़ुशी से नाचता हुआ दिषु के ऑफिस पहुँचा| मेरे चेहरे पर ख़ुशी देख कर दिषु थोड़ा हैरान था, उसे लगा था की कल पिताजी की डाँट से मेरा मुँह उतरा होगा|
दिषु: अबे साले तू तो हवा में उड़ रहा है? लगता है अंकल जी ने बेल्ट से सूता नहीं तुझे?!
दिषु हँसते हुए बोला|
मैं: वो सब बाद में, फिलहाल मुझे तेरी Nano की चाभी चाहिए! आज उनको (भौजी को) और बच्चों को घुमाने ले जा रहा हूँ!
मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा|
दिषु: ओये-होये! शर्म तो देखो लड़के की!
दिषु ने मेरी टाँग खींचते हुए कहा| उसने अपनी गाडी की चाभी मुझे निकाल कर दी और बोला;
दिषु: भाई अपना ध्यान रखिओ!
उसने ये बात थोड़ा गंभीर होते हुए कही| मैं उसकी बात का मतलब समझ गया था, दरअसल वो मुझे आगाह कर रहा था की मैं फिर से कहीं प्यार में न बह जाऊँ और एक बार फिर अपना दिल तुड़वा लूँ! अब मैं उस वक़्त भौजी के प्यार में इस कदर डूब चूका था की मैंने दिषु की बात को तवज्जो नहीं दी! मैंने बस दिषु का दिल रखने के लिए हाँ में सर हिलाया और गाडी भगाता हुआ घर पहुँचा| मैंने घर के बाहर से ही भौजी को फ़ोन किया और उन्हें तथा बच्चों को बाहर आने को कहा| भौजी और बच्चे बन ठन कर तैयार होकर गली से बाहर आये, मैंने गाडी से बाहर निकल अपना हाथ हिला कर तीनों को अपने पास बुलाया| मुझे गाडी के साथ देख दोनों बच्चे ख़ुशी से उछल पड़े और दौड़ते हुए मेरी तरफ आये|
आयुष: पापा जी ये हमारी गाडी है?
आयुष ने खुश होते हुए पुछा|
मैं: नहीं बेटा ये आपके दिषु चाचा की गाडी है, मैंने उनसे गाडी थोड़ी देर के लिए ली है|
अब आयुष दिषु के बारे में कुछ नहीं जानता था, मेरे दिषु को उसका चाचा बताने से वो थोड़ा हैरान था|
नेहा: दिषु चाचा पापा के bestfriend हैं, तो हमारे चाचा जी हुए न?
नेहा ने आयुष को समझाते हुए कहा| आयुष नेहा की बात सुन हाँ में सर हिलाने लगा और उत्साह से भरते हुए बोला;
आयुष: मैं आगे बैठूँगा!
लेकिन नेहा एकदम से बड़ी बहन का हक़ जताते हुए बोली;
नेहा: नहीं! छोटे बच्चे आगे नहीं बैठते!
नेहा की बात सुन कर आयुष का दिल टूट गया और उसका मुँह बन गया| अब मैं चाहता था की भौजी आगे बैठें मगर उनके आगे बैठने से दोनों बच्चों का दिल टूट जाता इसलिए मुझे कूटनीति अपनानी थी ताकि दोनों बच्चे नाराज न हों!
मैं: आयुष बेटा ऐसा करते हैं की आपकी दीदी आपसे बड़ीं हैं न तो अभी उनको आगे बैठने दो और आप पीछे अपनी मम्मी के साथ बैठो ताकि उनको पीछे डर न लगे| आज पहलीबार मम्मी गाडी में बैठ रहीं हैं न इसलिए आप उनका अच्छे से ख्याल रखना|
मेरी बात सुन कर भौजी मेरी होशियारी समझ गईं, लेकिन फिर भी उन्हें मेरी टाँग खींचनी थी इसलिए वो अपनी चाल चलते हुए बोलीं;
भौजी: मैं नहीं डरती गाडी में बैठने से! मैं कोई छोटी बच्ची थोड़े ही हूँ?!
मैं भौजी की होशियारी जान गया था इसलिए मैंने उन्हें आँख दिखा कर थोड़ा डराया और फिर आयुष को समझाने में लग गया;
मैं: मम्मी को बहुत डर लगता है, वो बस आपसे कहने में डरतीं हैं| आप अभी पीछे बैठ जाओ वापसी में आप आगे बैठ जाना और आपकी दीदी मम्मी के साथ बैठ जाएँगी|
आयुष अच्छा बच्चा था इसलिए वो मेरी बात मान गया, लेकिन भौजी को चुटकी लेने का फिर मौका मिल गया;
भौजी: और मैं? मैं कब आगे बैठूँगी?!
भौजी ने प्यारभरा गुस्सा दिखाते हुए कहा|
मैं: जान आप अगलीबार बैठ जाना!
मैंने प्यार से कहा| भौजी कुछ कहें उससे पहले ही नेहा ने फट से आगे का दरवाजा खोला और आगे बैठ गई, भौजी उसे हैरानी से देखती रहीं की नेहा को गाडी का दरवाजा खोलना कैसे आता है? फिर मैंने पीछे का दरवाजा खोला और भौजी को बैठने को कहा, पर भौजी बैठतीं उससे पहले आयुष घुस गया और पहले बैठ कर ऐसे खुश हुआ मानो उसने कोई खेल जीत लिया हो! उसे यूँ हँसता हुआ देख हम तीनों भी हँसने लगे! भौजी बैठीं और मैंने दरवाजा बंद किया, फिर मैं भी आगे बैठ गया तथा पहले नेहा की seat belt लगाई और फिर अपनी| नेहा की seat belt देख आयुष पीछे seat belt ढूँढने लगा;
मैं: बेटा पीछे seat belt लगाना जर्रूरी नहीं होता, आप बस अपनी मम्मी का हाथ पकड़ कर बैठो कहीं वो डर से रोने न लगे!
मैंने भौजी को छेड़ते हुए कहा|
भौजी: अच्छा जी?!
भौजी ने गाल फुलाते हुए कहा| गाडी चल पड़ी और नेहा ने आगे बैठे हुए अपनी मम्मी को गाडी के बारे में बताना शुरू कर दिया| AC, Radio, खिड़की ऊपर-नीचे करना और गाडी अंदर से lock-unlock करना, ये सब नेहा ने मेरे साथ cab में सीखा था| रास्ते में पड़ने वाली दुकानें, लोग और घरों को देख कर दोनों बच्चे अपनी मम्मी का ध्यान उस ओर खींचते रहते जिससे भौजी का मन लगा हुआ था|
हम Saket Select City Mall पहुँचे, गाडी parking में लगा कर हम तीनों mall की तरफ चल दिए| Entry होते समय security checking होनी थी, अब नेहा ने चौधरी बनते हुए अपनी मम्मी का हाथ पकड़ा और जहाँ महिलाओं की checking होती है वहाँ चली गई| मैंने आयुष का हाथ पकड़ा और security checking करवाने लगा| जब मेरी security checking हो रही थी तो आयुष ये सब बड़े गौर से देख रहा था| जब आयुष की बारी आई तो उसने भी मेरी तरह अपने दोनों हाथ उठा लिए, security guard ने जब ये देखा तो वो झुक गए और आयुष की checking बस दिखावे के तौर पर की, checking के बाद आयुष ने मुस्कुरा कर उनको bye कहा और मेरे पास दौड़ आया, एक छोटे से बच्चे के bye कहने भर से एक इंसान के चेहरे पर जो ख़ुशी आती है वही ख़ुशी security guard के चेहरे पर आ गई थी| उधर नेहा और भौजी अपनी security checking करवा कर बाहर आ गए, भौजी को आज अपनी बेटी पर बहुत गर्व हो रहा था क्योंकि नेहा ने उन्हें security check के बारे में सब समझा दिया था|
खैर mall के अंदर आ कर भौजी, नेहा और आयुष वहाँ की चकाचौंध में खो गए! इतने सारे लोग और सब tiptop कपडे पहने, इतनी खूबसूरत दुकानें जिन्हें देख कर ही उनके महँगे होने का अंदाजा लगाया जा सकता था, Mall में बजता music, escalators पर ऊपर-नीचे जाते लोग! ये दृश्य देख कर तीनों खामोश हो गए थे, बच्चों ने और भौजी ने कभी इस सब की कल्पना नहीं की थी इसलिए उनका चकित होना लाज़मी था|
मैं: बच्चों इस जगह को Mall कहते है| यहाँ बहुत सारी दुकानें होती हैं, कपड़ों की, खाने-पीने की और यहाँ पर फिल्म भी दिखाई जाती है!
फिल्म देखने के नाम से दोनों बच्चे खुश हो गए और कूदने लगे| भौजी ने उन्हें आँख दिखा कर डराया और कूदने से मना करने लगीं|
मैं: यार बच्चे हैं, थोड़ी मस्ती कर लेने दो!
मैंने बच्चों की हिमायत करते हुए कहा|
भौजी: ये तो बहुत महँगी जगह है!
भौजी घबराते हुए बोलीं!
मैं: मेरे परिवार से महँगा कुछ नहीं!
मैंने बिना डरे उनका हाथ पकड़ा और बच्चों के साथ theatre की ओर चल पड़ा| Theatre first floor पर था, मैं भौजी को ले कर escalators की ओर मुड़ गया| Escalators देख कर भौजी डर गईं;
भौजी: इसमें मेरी साडी फँस गई तो?
मैं: जान ये escalators specially design किये जाते हैं जिससे इसमें कुछ नहीं फँस सकता!
मैंने भौजी को हौसला देते हुए कहा|
नेहा: हाँ मम्मी चलो न, खूब मजा आएगा|
नेहा चहकते हुए बोली, लेकिन भौजी थोड़ी डरी हुई थीं| मैंने भौजी का हाथ कस कर पकड़ा और आँखों के इशारे से उन्हें मुझ पर विश्वास रखने को कहा| मैंने भौजी का हाथ पकड़ा तो नेहा ने भी बड़ी बहन बनते हुए आयुष का हाथ पकड़ा और उसे समझाते हुए बोली;
नेहा: देख आयुष तुझे न ऐसे पैर रखना है, कूदना नहीं है वरना गिर जाएगा| फिर जब हम ऊपर पहुँचेंगे न तब ऐसे पाँव बढ़ा कर आगे बढ़ना है! ठीक है?
नेहा ने आयुष को escalators पर चढ़ने तथा उतरने का तरीका समझा दिया था| अब मेरी बारी थी भौजी को समझाने की;
मैं: जान अपना दायाँ कदम आगे बढ़ाओ और ये सोचो की आप मेरे साथ नई जिंदगी शुरू करने जा रहे हो!
मेरी बात सुन भौजी के चेहरे पर मुस्कान आ गई और उन्होंने ठीक वैसे ही किया| हम दोनों escalators पर चढ़ चुके थे, मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो नेहा आयुष का हाथ पकडे हुए escalator पर चढ़ चुकी थी| दोनों बच्चों ने अपनी गर्दन इधर-उधर घूमना शुरू कर दिया था और आस-पास की हर चीज को देखना शुरू कर दिया था| इधर भौजी बस escalator की सीढ़ी को ही घूरे जा रही थीं|
मैं: जान अब हम ऊपर पहुँचने वाले हैं, आप ये सोचो की हमारी शादी हो चुकी है और आप मेरे घर में पहलीबार ‘प्रवेश’ करने वाली हो!
मेरी बात सुन भौजी की आँखें इस कल्पना से चमकने लगी और उन्होंने मेरा हाथ कस कर जकड़ लिया| हम ऊपर पहुँचे और दोनों सम्भल कर escalator से उतरे, भौजी का सारा डर छूमंतर हो चूका था! उधर बच्चे भी हमारे पीछे-पीछे ऊपर पहुँचा गए और escalator से उतरते ही मेरी टाँगों से लिपट गए!
हम चारों theatre पहुँचे, मैं टिकट लेने लगा और उधर नेहा ने गाँव मेरे साथ देखि film के बारे में आयुष को सब बताना शुरू कर दिया| अपनी दीदी की बात सुन आयुष का उत्साह दुगना हो गया था, मगर जो film हमें देखनी थी वो housefull थी! जब टिकट नहीं मिली तो बच्चों का मुँह बन गया;
मैं: Awwww! बेटा film कल देख लेंगे, मैं कल की टिकट पहले book कर लूँगा और आज के लिए....
मैं कुछ सोचने लगा और तभी मुझे कल रात की बात याद आई;
मैं: हम game खलने के लिए controllers ले लेते हैं!
Game controller लेने की बात से दोनों बच्चे खुश हो गए! मैं दोनों बच्चों का हाथ पकड़ कर lift की ओर चल पड़ा, लेकिन बच्चों को escalators में जाना था क्योंकि उन्हें उसमें बहुत मजा आया था!
मैं: बेटा अभी हम lift से चलते हैं, उसमें भी बहुत मजा आता है|
नेहा ने lift की सैर की थी इसलिए उसने आयुष को अपने lift वाले अनुभव के बारे में बताना शुरू कर दिया| नेहा की बात सुन कर भौजी बोल पड़ीं;
भौजी: जब lift थी तो आप मुझे escalator से क्यों लाये? अगर मैं गिर जाती तो?
भौजी अपना झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं|
मैं: आपको गिरने थोड़े ही देता! फिर इसी बहाने आपका हाथ पकड़ने का मौका भी तो मिल गया!
मैंने भौजी को छेड़ते हुए कहा| मेरी बात सुन कर भौजी शर्मा गईं और मुस्कुराने लगीं|
हम lift में घुसे और जब वो नीचे आने लगी तो, आयुष तथा भौजी मुझसे कस कर लिपट गए! एक बस नेहा थी जो निडर खड़ी थी तथा आयुष और अपनी मम्मी को देख कर उनके डरने का मजाक उड़ा रही थी!
भौजी: बहुत हँसी आ रही है तुझे!
भौजी नेहा को प्यार से डाँटते हुए बोली| खैर मैंने बच्चों को game controllers खरीदवाए और food court की ओर चल पड़ा| अब भौजी ने यहाँ बहुत सी लड़कियों और औरतों को jeans पहने देखा था तो उनका मन अब jeans पहनने का कर रहा था|
भौजी: बच्चों को तो game controller खरीदवा दिए, अब मुझे भी एक jeans खरीदवा दो!
भौजी बड़े प्यार से माँग करते हुए बोलीं| भौजी को jeans पहने हुए कल्पना कर मेरी आँखें चमकने लगी थीं मगर मैं उन्हें ये surprise देना चाहता था इसलिए मैंने थोड़ी बातें बनाईं और भौजी से उनकी कमर का नाप तथा top का साइज पूछ लिया| भौजी को लगा की मैं उन्हें jeans और top ख़रीदवाऊँगा मगर मैंने बात पलटते हुए कहा;
मैं: यार आप jeans में अच्छे नहीं लगोगे, हम ऐसा करते हैं की आपके लिए साडी ले लेते हैं|
भौजी इतनी भोली थीं की वो मेरी बात में आ गईं और साडी लेने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गईं|
भौजी: ठीक है लेकिन पसंद आप करोगे!
भौजी ने शर्त रखते हुए कहा, अब वो क्या जाने की मेरी पसंद इस मामले में कितनी अच्छी है?!
मैं: ठीक है!
मैंने मुस्कुराते हुए कहा| हम चारों एक अच्छी सी दूकान में घुसे और वहाँ मैंने अपनी पसंद की भौजी को Chiffon की साडी खरीदवाई! मेरी पसंद देख कर भौजी बहुत खुश थीं लेकिन वो साडी थी बहुत महँगी और मैं अपना debit card लाना भूल गया था! जेब में जितने पैसे थे उनसे वो साडी तो आ गई लेकिन cash खत्म हो गया था, भौजी नहीं जानतीं थीं की मेरे पास फिलहाल पैसे नहीं हैं वरना वो साडी लेने से मना कर देतीं| साडी खरीदने के बाद भौजी ने जिद्द पकड़ी की वो मेरे लिए एक शर्ट खरीदेंगी, मैंने कल लेने का बहाना मारा और हम चारों food court की ओर चल पड़े| गाँव में सीखे अपने सबक के चलते मैं हमेशा अपने पर्स में 500/- रुपये अलग से रखता था, ताकि कभी जर्रूरत पड़े तो काम आ जाएँ| आज वही पैसे मेरे काम आने वाले थे, food court में आ कर मैंने बच्चों से पुछा की वो क्या खाएँगे? उधर भौजी ने बाहर लगा हुआ menu पढ़ लिया था इसलिए उन्होंने होशियारी करते हुए कहा;
भौजी: बच्चों आपने corn नहीं खाये न? यहाँ बहुत अच्छे corn मिलते हैं!
भौजी इतने आत्मविश्वास से बोलीं जैसे की वो यहाँ रोज आतीं हों! मैं हैरान होते हुए उन्हें देखने लगा क्योंकि मैं उनकी होशियारी भाँप नहीं पाया था| वहीं बच्चे अपनी मम्मी की बात में आ गाये और corn खाने की माँग करने लगे! मैंने 4 medium corn लिए, दो मसाला कम रखवाया और दो में मसाला तेज रखवाया| जब मैं पैसे देने लगा तब मुझे भौजी की होशियारी समझ आई और मैं मंद-मंद मुस्कुराने लगा| Menu में लिखी सारे खाने की चीज 150/- रुपये से ऊपर थी, पैसे ज्यादा खर्च न हो इसलिए भौजी ने सबसे सस्ती चीज यानी corn खाने के लिए बच्चों को उकसाया था|
Corn खाते- खाते हम गाडी में बैठे, इस बार आयुष आगे बैठा और ख़ुशी से सीट पर बैठे-बैठे नाच रहा था| मैंने गाडी में गाना लगाया और गाडी का rear view mirror भौजी की ओर मोड़ते हुए गाने लगा;
मैं: हाँ तू है हाँ तू है,
मेरी बातों में तू है,
मेरी ख्वाबों में तू,
याददों में तू,
इरादो में तू है!
गाना सुन भौजी इतने प्यार से मुस्कुराईं की मन किया की अभी गाडी रोक कर उन्हें अपनी बाहों में भर लूँ! खैर गाना सुनते हुए हम चारों घर पहुँचे, भौजी तो आते ही माँ के साथ बातों में लग गईं और उन्हें अपनी साडी दिखाने लगीं| भौजी की देखा-देखि दोनों बच्चों ने माँ को घेर लिया और वो भी mall के बारे में माँ को सब बताने लगे|
जारी रहेगा भाग - 11 में...