भाग 192
जब वे गाड़ी की ओर बढ़े, तो सूरज का अंग पजामे के भीतर अपनी पूरी उग्रता के साथ खड़ा था। सूरज उसी प्रचंड तनाव और अपने पजामे में बन रहे उस 'तम्बू' के साथ ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। सामने पहाड़ों का रास्ता था और बगल में विकास, पर सूरज का पूरा ध्यान पीछे बैठी उस 'सूट वाली सुंदरी' पर था जिसकी देह का रस अभी भी उसकी यादों में ताज़ा था। नैनीताल का सफर अब केवल रास्तों का नहीं, बल्कि बेकाबू वासना का होने वाला था।
सोनी तृप्त थी और उसकी मुनिया भी पर. विद्याता ने सोनी विकास और सूरज के बीच संबंधों की नई परिभाषा लिखने की ठान ली थी…
अब आगे..
बीती रात जो संतान सप्तमी की तीसरी रात थी सोनी के गर्भ में एक बार फिर सूरज और विकास दोनों के वीर्य की आहुति हो चुकी थी..
संतान सप्तमी का यह कामुक उत्सव सिर्फ सोनी सूरज और विकास के बीच ही नहीं चल रहा था उधर बनारस में भी वासना अपने पैर पसार रही थी..
सूरज, सोनी और विकास अब नैनीताल की यात्रा पर निकल चुके थे, पर पीछे छोड़ गए थे वह मखमली कमरा, जिसे सुगना और उस घर की बेटियों ने दो रातों को बड़ी हसरतों से सजाया था।
सुगना ने सोनी के निकलने के बाद जब मालती को कमरा लॉक करने और चाबी को नियत स्थान पर रखने का निर्देश दिया, तो मालती के दिमाग में एक 'शरारत' ने जन्म ले लिया। उसने वह चाबी अपनी दरवाजा लाक करने के बाद जींस की तंग जेब में खिसका ली। वह सजे-धजे साटन के बिस्तर का मोह वह छोड़ नहीं पा रही थी। वह जानती थी कि आज रात हवेली में बड़े-बुजुर्ग गहरी नींद में होंगे, वह राजू के साथ अपनी प्यास बुझा पाएगी..
रात के भोजन के पश्चात सब अपने अपने कमरों में जा चुके थे।
मालती ने दबे पाँव छत की ओर रुख किया, जहाँ राजू पहले से ही अँधेरे में उसका इंतज़ार कर रहा था।
मालती (फुसफुसाते हुए): "राजू, आज किस्मत ने हमें वो मौका दिया है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सोनी मौसी का कमरा... वो साटन की चादर... वो मोगरे की महक... आज सब हमारा है।"
राजू (हैरानी से): "बाकिर मालती, जदि सुगना चाची के पता चल जाई त? बहुत रिस्क बा हो।"
मालती: "कोई रिस्क नहीं है। माँ सो चुकी है। बस चुपचाप मेरे पीछे आ जा..
इधर, सुगना अपने कमरे में लेटी करवटें बदल रही थी। उसके कमरे का पुराना पंखा आज 'चूँ-चूँ' की कर्कश आवाज़ कर रहा था, जो उस शांत रात में किसी डरावनी धुन जैसा लग रहा था। सुगना की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उसे अचानक उस सजे-धजे कमरे की याद आई जो अब खाली पड़ा था।
सुगना को ध्यान आया कि सोनी का कमरा आज खाली है क्यों ना आज की रात उसी कमरे में आराम किया जाए कल सुबह जरूर इस पंखे को बनवा लूंगी।
सुगना उठ खड़ी हुई और उस अलमारी की ओर बढ़ी जहाँ चाबियाँ रखी जाती थीं। पर वहाँ चाबी को न देखकर वह ठिठक गई। चाबी गायब थी।
सुगना ने मन ही मन मालती को कोसा। उसे लगा कि उसकी 'आधुनिक' बेटी हमेशा की तरह काम अधूरा छोड़कर कहीं और मशगूल हो गई होगी। पर सुगना हार मानने वालों में से नहीं थी। उसके पास अलमारी में एक 'मास्टर की' भी थी जो हवेली के हर कमरे को खोल सकती थी।
उधर, मालती और राजू दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे। मालती की जींस की सरसराहट और राजू की तेज़ धड़कनें उस रात के सन्नाटे को चीर रही थीं।
मालती (मन ही मन): "बस एक बार उस साटन के बिस्तर पर राजू के साथ पहुँच जाऊं, फिर ये जींस की बंदिशें और ये डर... सब खत्म हो जाएगा।"
सुगना ने सोनी के कमरे का ताला खोला और भीतर दाखिल हो गई। कमरे की हवा में मोगरे और जैस्मीन का नशा अभी भी बरकरार था। उसने अंदर से आधुनिक शैली का 'नॉब लॉक' घुमाकर उसे फँसा दिया। यह ऐसा लॉक था जिसे अंदर से बस एक बटन दबाकर बंद किया जा सकता था, पर बाहर से इसे चाबी के जरिए खोला जा सकता था।
कमरे की मद्धम लाल और वार्म-व्हाइट रोशनी में साटन की वह मैरून चादर किसी गहरी झील की तरह चमक रही थी। सुगना ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और नित्य क्रिया के लिए अटैच बाथरूम की ओर बढ़ गई। उसने बाथरूम का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया, बस थोड़ा सा सटा दिया।
अभी सुगना हाथ-मुँह धो ही रही थी कि उसे कमरे के मुख्य दरवाजे के हैंडल के घूमने की मद्धम आवाज़ आई। 'क्लिक'—चाबी घूमने की वह परिचित ध्वनि सुगना के कानों में बिजली की तरह कौंधी। वह ठिठक गई। उसने सोचा, "इस वक्त कौन हो सकता है? क्या मालती चाबी लेकर वापस आई है?"
तभी मालती की आवाज आई अरे बाप रे लाइट जलती छूट गई थी यदि मां को मालूम चला तो पक्का डांट पड़ती।
सुगना कोई यकीन हो गया कि यह मालती ही थी।
उसने सावधानी से बाथरूम का दरवाजा थोड़ा और खोला और झरोखे जैसी दरार से कमरे के भीतर झांकने लगी।
मद्धम रोशनी में सुगना की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह मालती थी, जो अपनी उसी चुस्त जींस और शर्ट में थी, और उसके साथ राजू था। मालती ने बड़े आत्मविश्वास के साथ पीछे से दरवाजा बंद किया।
राजू (फुसफुसाते हुए): "मालती, जदि यहाँ धरा गइली जा त ज्यान से जाइब। चाची के मालूम चलल त अनर्थ हो जाई।"
मालती (मस्ती में): "अरे तू डर मत, माँ तो अपने कमरे में आराम से सो चुकी होगी। उसे क्या पता कि हम यहाँ 'संतान सप्तमी' का असली उत्सव मनाने आए हैं।"
तू कंडोम तो लाया है ना?
संतान सप्तमी का उत्सव और कंडोम दोनों की बात सुनकर सूचना की रूह कांप गयी। भोजपुरी भाषा में आ रही वह आवाज जानी पहचानी थी सुगना उस अंजान को पहचानने की कोशिश कर रही थी।
तभी मालती ने राजू का हाथ पकड़कर उसे सीधे उस साटन के बिस्तर की ओर खींचा। सुगना ने देखा कि मालती के चेहरे पर डर का नामोनिशान नहीं था, बल्कि वही वासना और अधिकार था जो जो एक कामपिपासु युवती में होता है।
सुगना राजू का यह परिवर्तित रूप देख रही थी जहां मालती खड़ी हिंदी में बात कर रही थी वही राजू अपनी ग्रामीण भाषा भोजपुरी में बात कर रहा था सुगना के लिए यह युगल अनूठा था
बाथरूम की ओट में छिपी सुगना मालती और राजू के बीच बढ़ती नजदीकियां देख रही थी। वह देख रही थी कि उसकी अपनी बेटी, जिसे वह अब तक सिर्फ 'आधुनिक' और 'जिद्दी' समझती थी, वह घर की मर्यादा को तार-तार कर रही थी।
उसने देखा कि राजू ने मालती को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया है और उसके हाथ मालती की कमर की उस चुस्त जींस के किनारों को टटोल रहे हैं। मालती ने गर्दन पीछे झुका दी और मोगरे की उन लड़ियों के बीच वह दृश्य बिल्कुल वैसा ही होने जा रहा था, जिसकी कल्पना मालती ने बिस्तर सजाते वक्त की थी।
सुगना पत्थर की मूरत बनी यह सब देख रही थी। एक तरफ उसकी बेटी की बेबाक जवानी थी और दूसरी तरफ उसकी अपनी परवरिश। हवेली के उस सजे-धजे कमरे में अब एक ऐसा खेल शुरू होने वाला था, जिसका गवाह स्वयं विधाता के अलावा सिर्फ 'छिपी हुई' सुगना थी।
हवेली के उस सजे-धजे कमरे में मोगरे की महक अब मालती और राजू की तेज़ होती साँसों के साथ मिलकर और भी भारी हो गई थी। सुगना, जो बाथरूम के दरवाजे की झरोखे जैसी दरार से यह सब देख रही थी, उसका शरीर पसीने से भीग चुका था। उसकी आँखों के सामने उसकी जवान बेटी मालती, जिसकी 5 फुट 7 इंच की सुडौल और छरहरी काया उस चुस्त जींस में किसी नागिन की तरह बलखा रही थी, आज अपनी मर्यादा की सारी सीमाएं लांघने को तैयार थी।
राजू ने पीछे से मालती के पेट पर हाथ रखा और उसकी शर्ट के बटनों को टटोलने लगा। मालती ने अपनी गर्दन पीछे झुकाकर राजू के कंधे पर टिका दी।
मालती (मस्ती भरी आवाज़ में): "राजू... आज देख रही हूँ तेरी उंगलियाँ कांप रही हैं। उस दिन छत पर तो बहुत शेर बन रहा था, आज इस साटन के बिस्तर को देखकर डर गया क्या?"
राजू (मालती के कान के पास भोजपुरी में फुसफुसाते हुए): "डर ई सेज के नईखे मालती, डर त तोहार ई चढ़ल जवानी के बा। ऊपर से ई कमरा... अइसन लागत बा कि हमनी कवनो सरग (स्वर्ग) में आ गइल बानी जा।"
राजू ने धीरे से मालती की शर्ट का पहला बटन खोला। सुगना ने देखा कि शर्ट के भीतर मालती ने कोई अंतःवस्त्र नहीं पहना था, बस उसकी गोरी पीठ और उभरते हुए वक्षों की गोलाई मद्धम रोशनी में चमक उठी। राजू की हथेलियाँ अब मालती के पेट से ऊपर की ओर सरकने लगीं।
मालती: "उम्म... राजू, धीरे नहीं। आज मुझे उस हर एक मोगरे की कली का अहसास चाहिए जो मैंने और सुगना माँ ने यहाँ सजाई है। "
राजू ने अब मालती की शर्ट को उसके कंधों से नीचे सरका दिया। मालती का मादक और गदराया हुआ बदन अब कमर तक नग्न हो चुका था। सुगना की धड़कनें पत्थर की चोट जैसी सुनाई दे रही थीं। उसने देखा कि उसकी बेटी का शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था—लम्बी गर्दन, सुडौल कंधे और पूर्णता लिए हुए वक्ष।
राजू अब मालती के सामने आया और उसकी आँखों में देखते हुए उसकी चुस्त जींस के बटन पर हाथ रखा। जींस इतनी टाइट थी कि मालती के पेट की त्वचा और नाभि का गड्ढा साफ उभर रहा था।
राजू (भोजपुरी में): "मालती, ई तोहार जींस कइसन एकदम चपकल (तंग) बा हो... एके उतारे में त आधी रात निकल जाई!"
मालती (शरारत से मुस्कुराते हुए): "तो मेहनत कर न... तुझे क्या लगा था, मालती इतनी आसानी से हाथ आ जाएगी? खींच इसे नीचे।"
राजू ने घुटनों के बल बैठकर मालती की जींस की ज़िप नीचे सरकाई। 'सर्रर्र' की वह आवाज़ सुगना के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरी। राजू ने मालती की कमर को पकड़कर उस तंग जींस को नीचे खींचना शुरू किया। मालती ने एक हाथ राजू के सर पर रखा और अपनी लंबी, गोरी और सुडौल टाँगों को एक-एक करके उस जींस की कैद से आज़ाद किया।
अब मालती उस मोगरे से सजे बिस्तर के बीच केवल अपनी छोटी सी पैंटी में खड़ी थी। उसकी लंबी नग्न जाँघें उस मरून चादर के बैकग्राउंड में और भी कामुक लग रही थीं। राजू ने अपनी शर्ट उतार फेंकी; उसका गठीला बदन और उभरते हुए सीने की मांसपेशियां बता रही थीं कि वह भी इस खेल के लिए पूरी तरह तैयार है।
मालती: "आह... राजू, देख हमने कितनी मेहनत से ये बिस्तर बिछाया था। मां को क्या पता था कि उनकी बेटी आज यहाँ 'संतान सप्तमी' की असली पूजा करेगी।"
राजू अब मालती के ऊपर झुक गया और उसके गुलाबी होंठों को अपने कब्ज़े में ले लिया। सुगना बाथरूम के भीतर अपनी साड़ी का पल्लू दाँतों तले दबाए खड़ी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह बाहर निकलकर इस 'पाप' को रोके, या अपनी ही बेटी के इस प्रचंड यौवन के प्रदर्शन को देखती रहे, जो उसे एक अनजानी उत्तेजना और गहरे अपराधबोध के बीच ले जा रहा था। कमरे में अब मोगरे की महक के साथ-साथ दो जवान शरीरों की गर्मी और भी बढ़ गई थी।
हवेली के उस मखमली सन्नाटे में, सोनी का वह सजा-धजा कमरा अब वासना के एक नए अध्याय का गवाह बन रहा था। सुगना, जो बाथरूम की दरार से यह सब देख रही थी, उसका शरीर पसीने से भीग चुका था। उसकी अपनी बेटी, मालती, आज उसके सामने एक ऐसी स्थिति में थी जिसकी उसने कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।
हवेली के उस सजे-धजे कमरे में मोगरे की भारी खुशबू अब मालती और राजू की तेज़ होती साँसों के साथ मिलकर और भी मादक हो गई थी। बाथरूम की दरार से झांकती सुगना का शरीर पसीने से भीग चुका था। वह देख रही थी कि मालती, जो उसके पति रतन और उसकी मुंबई वाली पूर्व पत्नी बबीता की संतान थी, आज अपनी रगों में दौड़ रहे उसी 'बार डांसर' माँ के खून का प्रदर्शन कर रही थी। बबीता की वह शोखी और जिस्मानी जादू मालती के 5 फुट 7 इंच के तराशे हुए बदन में जैसे फिर से जी उठा था।
सुगना ने अपनी युवावस्था में स्वयं को एक कमसिन और लजीली 'कचनार' की तरह जिया था, जहाँ संभोग एक समर्पण था। पर यहाँ, मालती के रूप में वह एक ऐसी आधुनिक काम-पिपासा देख रही थी जो न केवल बिंदास थी, बल्कि आक्रामक भी थी।
राजू अब पूरी तरह नग्न हो चुका था मालती ने अपनी टाँगें मोड़कर राजू को अपनी ओर आने का इशारा किया।
मालती (अपनी आँखों में एक अजीब सी ललक लिए): "राजू... क्या देख रहा है? जैसे तूने इसे आज से पहले देखा ही नहीं? आज अपनी और मेरी प्यास जी भर कर बुझा ले।"
राजू ने मालती की नाभि के पास अपना चेहरा झुकाया और उसे अपनी जीभ से सहलाने लगा। मालती के मुँह से एक मदहोश सिसकारी निकली और उसने बिस्तर पर बिछी मोगरे की लड़ियों को अपनी मुट्ठियों में भींच लिया।
मालती: "आह... हाँ, वहीं... राजू, तेरी ये तड़प मुझे पागल कर रही है। आज इस साटन को हमारे पसीने से भिगो दे।"
सुगना ने देखा कि मालती ने खुद आगे बढ़कर राजू के सिर को अपने वक्षों की ओर खींचा। वह अपने बदन के आवेग को छुपाने की कोशिश भी नहीं कर रही थी। उसकी कामुक अदाएं इतनी स्वाभाविक और परिपक्व थीं कि सुगना को अपनी ही परवरिश पर शक होने लगा। मालती का हर अंग जैसे संगीत की लय पर थिरक रहा था।
सुगना ने आज कई वर्षों बाद उसे आदमी सत्य को देख रही थी जिसने इस जीवन का सृजन किया है मालती और राजू को इस तरह एक दूसरे में खोया देखकर एक पल के लिए वही अब भूल गई की बिस्तर पर संभोग के लिए आठ और वायु थी उसकी अपनी बेटी है और वह जो देख रही है शायद उसे रोकना चाहिए पर सुखना की सुषुप्त वासना अब जाग चुकी थी…
अपनी वासना के अधीन सुगना उस दृश्य को रोकने की बजाय उसे अपनी आंखें फाड़ कर देख रही थी।
राजू अब मालती के दोनों घुटनों के बीच आ गया था। उसने मालती की लंबी जाँघों को अपने कंधों पर टिकाया, जिससे मालती की 'मुनिया' का वह गुलाबी और कोमल द्वार पूरी तरह उजागर हो गया। सुगना ने देखा कि मालती ने लज्जा का त्याग कर अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठाया ताकि राजू को उसकी गहराई का अंदाज़ा मिल सके।
राजू (हाँफते हुए भोजपुरी में): "मालती... तू त सचहूँ कातिल बाड़ू हो। हमके यकीन नईखे होत कि हम सोनी चाची खातिर सजावल ई सेज पर तोके अइसन रगड़े (चोदे) जा तानी।"
मालती (तेज़ सांसों के बीच): "तो बातें कम कर और अपना 'काम' शुरू कर। मुझे वो एहसास चाहिए जो इस रात को हमेशा के लिए मेरे जिस्म पर दर्ज कर दे। आ जा राजू... मुझे अपनी जवानी से भर दे!"
सुगना का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मालती का वह बिंदासपन और आवेग देखकर वह सुन्न पड़ गई थी। उसने देखा कि राजू ने एक झटके में मालती के भीतर प्रवेश किया, और मालती की वह चीख, जो दर्द और परम सुख का मिश्रण थी, कमरे की दीवारों से टकराकर सुगना के कानों में गूँज उठी। हवेली के उस पवित्र कमरे में अब एक वर्जित खेल अपनी पूरी तीव्रता के साथ जारी था।
सुगना को याद आने लगे अपनी युवावस्था के वे दिन, जब वह इसी तरह छिपकर सोनू और लाली के मिलन को देखा करती थी। उस समय भी वह इसी तरह के द्वंद्व में फंसी रहती थी, पर आज का दृश्य कुछ अलग ही कचोट पैदा कर रहा था। सुगना जानती थी कि मालती उसकी अपनी कोख से नहीं जन्मी थी—वह बार डांसर बबीता और रतन की संतान थी—पर उसका लालन-पालन सुगना ने ही किया था। मालती का अपने मुँहबोले भाई राजू के साथ इस तरह काम-क्रीड़ा में लिप्त होना, समाज की नज़रों में अनर्थ था, पर वासना के इस खेल में समाज और रिश्तों की दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह जाती हैं।
कमरे में राजू और मालती के संभोग की संगीत गूंज रही थी सुगना इस दृश्य को अपनी आंखों से देख रही थी उसे अपनी युवावस्था के दिन याद आ रहे थे जब वह सोनू और लाली को संभोग करते इसी प्रकार देखा करती थी न जाने क्यों उसे यह बुरा नहीं लग रहा था मालती उसकी अपनी पुत्री नहीं थी यह वह भली भांति जानती थी परंतु उसे मालती से ऐसी उम्मीद भी नहीं थी । पर वासना की आग सबको खा जाती है ना रिश्ते नाते सुगना यह बात जानती थी और अपने आंखों के सामने मालती को अपने मुंह बोले भाई राजू से चुदते हुए देख रही थी
हवेली के उस कमरे में मोगरे की भीनी खुशबू अब जिस्मों की भारी महक में तब्दील हो चुकी थी। हवा में कोई वाद्य यंत्र नहीं बज रहा था, फिर भी साटन की चादर पर जिस्मों के टकराने की 'सपाट-सपाट' ध्वनि और मालती की बेकाबू सिसकियाँ एक आदिम संगीत की रचना कर रही थीं। बाथरूम की दरार से सुगना यह सब देख रही थी, और अजीब बात यह थी कि उसके भीतर कोई क्रोध नहीं, बल्कि यादों का एक पुराना झोंका उमड़ रहा था।
सुगना की नज़रें अब मालती की उन फैली हुई जांघों और राजू के उस निरंतर चलते प्रहारों पर जम गई थीं। उसे अहसास हुआ कि वासना की यह आग किसी संस्कार या मर्यादा को नहीं जानती। मालती, जिसे वह कल तक एक बच्ची समझती थी, आज एक पूर्ण कामुक स्त्री बनकर अपने मुँहबोले भाई के पौरुष को अपनी गहराई में समा रही थी।
सुगना सोच रही थी… "रिश्ते? नाते? सब धरे के धरे रह जाते हैं जब खून की गर्मी उबलती है। मालती ने आज वही किया जो उसके खून में था। और मैं... मैं यहाँ खड़ी बस इस आग की लपटों को देख रही हूँ।"
मालती ने एक लंबी और तीखी कराह भरी, उसके पैर राजू की पीठ पर कसते चले गए। सुगना समझ गई कि मालती अब स्खलन की उस दहलीज पर है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं। कमरे में गूँजता वह 'संगीत' अब अपनी चरम सीमा पर था, जहाँ सुगना, मालती और राजू... तीनों ही अलग-अलग तरीकों से उस वर्जित आनंद के भँवर में डूबे हुए थे।
राजू निढल होकर मालती के ऊपर गिर चुका था संभोग के समाप्ति होने के पश्चात सुगना को यह अंदेशा हो गया कि यह प्रेमी युगल बाथरूम में आने की कोशिश करेगा सुगना ने धीरे से बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और चुपचाप खड़ी हो गई जैसा कि उसे अंदेशा था राजू ने बाथरूम का दरवाजा खोलने की कोशिश की और नाकाम रहा उसने बार-बार प्रयास किया और मालती से पूछा यह दरवाजा क्यों नहीं खुल रहा है मालती भी पास आई और उसने भी प्रयास किया पर दरवाजा अंदर से बंद था मालती ने कहा
अरे छोड़ ना राजू अपने कमरे में जाकर कर लेना जहां ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं है
दोनों ने जल्दी जल्दी से अपने-अपने कपड़े पहने कुछ देर बाद बेडरूम का दरवाजा लॉक होने की आवाज है और कमरे में एक शांति छा गई…
कमरे में अब सन्नाटा था, लेकिन हवा में अभी भी मालती और राजू के जिस्मों की गर्मी और मोगरे की मसली हुई खुशबू तैर रही थी। सुगना ने कांपते हाथों से बाथरूम का दरवाजा खोला। उसके पैर अभी भी लड़खड़ा रहे थे और दिल की धड़कनें बेकाबू थीं।
वह धीरे-धीरे उस साटन के बिस्तर की ओर बढ़ी। उसी मरून चादर पर, जिस पर अब से कुछ देर पहले उसकी अपनी बेटी वासना का आदम खेल खेल रही थी, सुगना सिरहाने पर तकिया रखकर लेट गई। वह चादर अभी भी गरम थी और उस पर मालती के जिस्म की गंध बसी थी। सुगना के दिमाग में रह-रहकर वही दृश्य घूम रहे थे—मालती की नग्न सुडौल जाँघें, उसका वह बिंदासपन और राजू का वह जोश। उन दृश्यों ने सुगना की उस प्यास को जागृत कर दिया था जिसे उसने कई वर्षों से लोक-लाज और मर्यादा की बेड़ियों में जकड़ कर रखा था।
सुगना की उंगलियां अब खुद-ब-खुद उसके पेट से नीचे सरकने लगीं। पेटीकोट के नीचे हाथ ले जाते ही उसे अपनी जादुई 'बुर' का अहसास हुआ। वहां पहले से ही इतनी फिसलन और कामुक रस की नमी थी कि वह किसी भी स्पर्श को गहराई तक समाहित करने के लिए आतुर थी। जैसे ही सुगना ने अपने पोरों से अपनी बुर के उस संवेदनशील भागनासे को छुआ, उसके पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया।
वह अनुभव उतना ही तीव्र और नशीला था, जैसे 12 वर्षों तक लकड़ी के बड़े-बड़े बैरल में सहेज कर रखी गई पुरानी शराब जब पहली बार बाहर आती है, तो उसका नशा सर चढ़कर बोलता है। आज सुगना की वासना जो 12 वर्षों से सुषुप्त थी आज जागृत हो रही थी।
सुगना की जाँघें तेज कंपन के साथ कांप रही थीं। उसने अपनी उंगलियों की गति बढ़ाई और अपनी बुर के उस द्वार को सहलाने लगी।
उसकी बुर से निकलता हुआ वह गर्म लावा उसकी उंगलियों को भिगो रहा था। अचानक सुगना का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया। उसने अपनी दोनों जाँघों को एक-दूसरे से पूरी मजबूती के साथ भींच लिया। उस तेज खिंचाव और रगड़ के बीच सुगना स्खलित होने लगी। वह चरम सुख, जो उसने कई वर्षों से महसूस नहीं किया था, आज अपनी ही बेटी के संभोग को देख कर प्राप्त हुआ था।
सुगना की आँखें कसकर बंद थीं और उसके गले से एक भारी आह निकली। स्खलन के उस क्षण में वह सुध-बुध खो बैठी थी, पर जैसे ही शरीर का वह तूफान शांत हुआ, एक गहरा आत्म-ग्लानि और अपराधबोध उसके मन पर छा गया।
सुगना (मन ही मन सिसकते हुए): "हे भगवान! ये मैंने क्या किया? अपनी ही पुत्री के संभोग का आनंद लेकर उत्तेजित होना और फिर उस 'नयन सुख' से खुद को स्खलित करना... क्या यह उचित है? विधाता, इस पाप के लिए मुझे माफ करना।"
वह उसी बिस्तर पर पसीने से तर-बतर पड़ी रही। उसकी जाँघें अभी भी रह-रहकर कांप रही थीं। लखनऊ की वह रात जहाँ सोनी और सूरज के मिलन की गवाह बनी थी, वहीं इस हवेली का यह बंद कमरा सुगना के भीतर दफन उस 'सोयी हुई कामुकता' के जागने का गवाह बन गया था।