बचपन में जब संस्कृत पढ़ा करते थे, तब की ये बड़ी फेमस लाइन हुआ करती थी, जिसे हम अपने मास्टर जी से अनुवाद करने कहते थे....
तुलसीदास के “लू–चिस्तिका” में “घूर–घूर–चुस्तिका”... है कोई साधु महात्मा जो तुलसीदास के “लू–चिस्तिका” के “घूर–घूर–चुस्तिका” के छूटी–चिस्तिका”....
अब इस पर मास्टर साहब खिसिया जाते थे। हमलोग ठहरे सरकारी स्कूल के छात्र। उतने ही जिद्दी। रोज पूछ लिया करते थे। एक दिन पूरे क्लास को ही बाहर खड़ा करवा दिया और प्रिंसिपल से शिकायत... “हम लोग अभद्र भाषा का प्रयोग करते है।”....
हम सब भी जेंटलमैन टाइप लौंडे, प्रिंसिपल से भी वही सवाल पूछे। उनका हंस– हंस कर बुरा हाल। फिर उन्होंने खुद मास्टर साहब से पूछा, “पूरे वाक्य में कौन सा शब्द अभद्र है?”... मास्टर साहब मुंह बा दिये। खैर मास्टर साहब ने शिकायत की थी, तो कुछ न कुछ एक्शन लिया ही जाना था। उन्होंने सबको छोड़ा और इसके जनक को पकड़ा। दुर्भाग्यवश वो मैं ही था (मैं केवल उस स्कूल में फैलाया था, जबकि इस वाक्य का मूल क्रिएटर मेरा एक अनुज है)... फिर क्या था... उन्होंने भी आप सब की तरह इसका मतलब पूछा। और एक बार नही सातवी कक्षा की ये बात थी और दुश्वी तक जब भी मुलाकात हुई तब पूछे.... और अपना जवाब एक ही.... “सर ये ऐसे ही था”.... और हर बार जवाब सुनने के बाद वही परिणाम... एक थप्पड़ कड़क और पूरा एक कॉपी को घर से भर कर लेकर आइए ये सजा। वो अलग बात थी की 5000प्लस छात्र–छात्राओं की भिड़ में, विभिन्न मामलों में हमारी अक्सर मुलाकात होते रहती थी।