नौवाँ अध्याय: परीक्षा
भाग - 3
अब तक आपने पढ़ा:
भौजी ने एक-एक कर रुई के टुकड़ों से मेरी पीठ पर लगे खून को साफ़ करने लगी और नीचे खून लगी रुई का ढेर लगने लगा| अब सच में मुझे ये ढेर देख के डर लगने लगा था, पता नहीं मेरे शरीर में खून बचा भी है की नहीं?
अब आगे:
भौजी के आँसूँ बहते जा रहे थे, इधर मेरी पीठ पर से कई जगह पर चमड़ी उधड़ गई थी जिस कारन मेरे पूरे जिस्म में दर्द का संचार हो रहा था| अपने दर्द की परवाह किये बिना मुझे भौजी के आँसूँ चुभ रहे थे;
मैं: भौजी... प्लीज चुप हो जाओ...आह!!!...मैं आपको रोते हुए नहीं देख सकता....अंह!!!
मैंने करहाते हुए कहा|
भौजी: तुम क्यों बीच में आये? देखो तुमने अपनी क्या हालत बना ली?
भौजी रोटी हुई बोलीं|
मैं: तो मैं खड़ा हुआ भैया को आपको पीटते हुए देखता रहता? अंम्म्म!!!
भौजी ने रुई से मेरे कटी हुई पीठ को छुआ तो मैं दर्द से बिलबिला उठा!
मैं: मैंने आपको.......गलत समझा भौजी....आह्ह!!! उसकी कुछ तो सजा मिलनी ही थी| स्स्स्स!!!
ये सुन कर भौजी ने अपने आँसूँ पोछे और बोलीं;
भौजी: तुम सही थे मानु, मैंने ही तुम्हारी बातों को गलत समझा| तुम सही कह रहे थे, अपनी अलग दुनिया बसाना इतना आसान नहीं होता| मुझे माफ़ कर दो मानु... !!!
ये कहते हुए भौजी मेरे मुँह के सामने बैठ गईं और मेरे आँसूँ पोछे| भौजी का चेहरा देखा तो उनके चेहरे पर मुझे तड़प साफ़ दिख रही थी, उधर नेहा का मासूम सा चेहरा दर्द झलका रहा था|
मैं: चलो देर आये-दुरुस्त आये....अह्ह्ह्ह!!!
आज मैंने जो देखा और किया उससे मुझे भौजी का पहलु समझ आ गया था| भले ही उनकी जिद्द गलत थी पर उस जिद्द के पीछे छुपा मकसद सही था| भौजी चाहतीं थी की मैं उन्हें भगा ले जाऊँ क्योंकि उनका जल्लाद पति उनपर अत्याचार करता था| मैं अपना मन बना चूका था की मैं उन्हें इस नर्क से निकाल कर रहूँगा, फिर चाहे इसके लिए मुझे मजदूरी क्यों न करनी पड़े!
"भौजी..." मैं आगे कुछ कह पाता उससे पहले ही अजय भय आ गए|
अजय भैया: भाभी भैया मानु भय को काहे मारत रहे?
भौजी: सराब पी कर तुन थे और हमका मारे वाले थे की तोहार मानु भैया बीच में आईगए|
भौजी ने अजय भैया को सारा किस्सा सुना दिया और ये सुन कर अजय भैया सुन्न थे पर मुझे दर लग रहा था की पिताजी को जब ये पता चला तो क्या होगा? इसलिए मैंने इस बात को दाबाना चाहा;
मैं: भैया आपको और भौजी को मुझसे एक वादा करना होगा|
मैंने जैसे-तैसे दर्द की टीस को सहते हुए कहा|
अजय भैया: क्या भैया बोलो?
मैं: ये बात हम तीनों के आलावा और किसी को पता नहीं होनी चाहिए, ख़ास तोर पर माँ और पिताजी को, वरना आफत आ जयगी!! अह्ह्ह !!! अन्न्ह्ह !!!
इतना कहते हुए मैं दर्द से करहा पड़ा| मेरी बात सुनते ही अजय भैया चौंक गए;
अजय भैया: ई का कहत हो?
मैं: भैया अगर पिताजी को मेरी पीठ पर बने ये निशान दिख गए तो पिताजी घर सर पे उठा लेंगे....(उम्ममम!!!).... घर में लड़ाई झगड़ा हो जायेगा इस बात पर....
मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी बात पूरी की|
भौजी: मानु तुम इन घावों को कब तक छुपाओगे? वैसे भी गलती तुम्हारे भैया की है... तुम तो बस...
मैं जानता था की भौजी क्या कहेंगी और वो सुन कर कहीं अजा भैया को हम दोनों के रिश्ते पर कोई शक न हो इसलिए मेंने उनकी बात एकदम से काट दी;
मैं: नहीं भौजी...(अंहहहहहह्)!!!
अजय भैया: नाहीं मानु भय, हम तोहार बात न मानब, पाहिले हमरे संगे डकटर के चलो और फिर हम अम्मा और बाप्पा (बड़की अम्मा और बड़के दादा) से बात करित है| ऊ ही फैसला करीहें की आगे का करे का है!
मैं समझ गया था की आज बवाल तो होना तय है और मुझे ये बवाल कम से कम 2-3 दिन के लिए टालना था| पर अभी अजय भैया की बात पूरी नहीं हुई थी;
अजय भैया: हम जाइके साइकिल मांग लाईत है, हमार साइकल तो चन्दर चन्दर भैया ले गए!
ये सुन कर मैं हैरान हुआ की जो इंसान नशे में इतना धुत है वो भला साइकिल कैसे चलाएगा?
मैं: कहाँ?
अजय भैया: हियाँ पासे में एक लड़कवा राहत है, ऊ भैया को दोस्त है|
अजय भैया निकलने लगे तो मैंने उन्हें रोक दिया;
मैं: भैया आप बस मुझे एक पैन (PAIN) किलर ला दो, उससे ठीक होजायेगा|
ये सुनते ही भौजी जोर देने लगीं की मैं चला जाऊँ पर मुझ में अब हिम्मत नहीं थी की मैं उठ कर बैठूं!
मैं: भौजी मुझे में हिम्मत नहीं है की मैं उठ कर बैठूं| दर्द ठीक हो जाएगा तो मैं कल चला जाऊँगा| मैंने अजय भैया से दुबारा कहा तो वो बोले;
अजय भैया: अभी लाईत है|
अजय भैया PAIN किलर लेने गए और भौजी अंदर से मलहम ले आईं, जो पीठ थोड़ी देर पहले सुन्न थी अब जैसे उसमें वापस खून दौड़ने लगा था| जिस कारन मेरा दर्द दुगना हो गया था, जैसे ही भौजी ने मेरी पीठ पर मलहम लगाया, मैं तड़प कर चीख उठा;
"आआाआअअअअअह!!!" मेरी चीख सुन भौजी डर गईं र उनके चेहरे पर फिर आँसूँ बहने लगे| मैं भौजी का चेहरा नहीं देख पाया था पर मेरा दिल उनका दुःख महसूस कर पा रहा था| भौजी ने धीरे-धीरे मलहम लगाना चूरू किया पर अब उनके छूने भर से दर्द हो रहा था| तभी अजय भैया PAIN किलर लाये, मैंने झट से गोली ली और वापस पट के बल लेट गया, उसके बाद मुझे होश नहीं था की क्या हुआ| जब मेरी आँख खुली तो भौजी मेरे सिरहाने बैठी थीं| PAIN किलर का असर खत्म हो चूका था और रह-रह के दर्द हो रहा था| इधर भौजी मुझे पँखा कर रही थी, ठंडी हवा जब मेरी पीठ को छूती तो दर्द कुछ कम होता| समय का ठीक से तो पता नहीं, पर रात हो चुकी थी, मैं बड़ा सम्भल कर उठ ने लगा ताकि दर्द ज्यादा न हो| मेरे उठते ही भौजी अपने आँसूँ पोंछती हुई उठी और मुझे सहारा देने लगी;
भौजी: अब कैसा लगा रहा है? दर्द कुछ कम हुआ?
भौजी ने सिसकते हुए कहा|
मैं: नहीं....जब तक गोली का असर था तब तक तो कुछ पता नहीं था.....(ऊह्ह्म्म!!!)....क्या टाइम हुआ है?
भौजी: 9 बजे होंगे|
मैं: ये कौन सी गोली दी थी भैया ने, जो मैं इतनी देर सोता रहा? (ओह्ह्ह्ह!!!)
भौजी: एक हरे पत्ते की गोली है!
मैं: हम्म्म
भौजी: मैं तुम्हे दोपहर खाने के लिए उठाने आई थी, पर तुम उठे ही नहीं! चाचा-चाची का भी फ़ोन आया था, उन्होंने कहा की वे कल सुबह आएंगे|
माँ-पिताजी के फ़ोन आने की बात सुन कर मैं थोड़ा चिंतित हो गया|
मैं: आपने उन्हें इस सब के बारे में तो नहीं बताया? (ओह्ह्ह!!)
भौजी: नहीं....मैंने अजय को मना कर दिया था, नहीं तो वे चिंतित होते और आधी रात को ही यहाँ पहुँच जाते!
मैं: ठीक है....(अंह्ह्ह!!!)
भौजी: अब चलो पहले चलो हाथ मुँह धो लो और भोजन कर लो, फिर मैं आयुर्वेदिक तेल से मालिश कर देती हूँ, शायद उससे आराम मिले|
भौजी का सहारा ले कर मैं खड़ा हुआ और फिर उनकी मदद से मैंने हाथ-मुँह धोये| फिर भौजी नेखुद अपने हाथ से मुझे खाना खिलाया और मैंने उन्हें खाना खिलाया| उसके बाद भौजी ने वो आयुर्वेदिक तेल लगाने लगीं;
मैं: अम्मा और बड़के दादा...(आअह!!!) सो गए क्या?
भौजी: हम्म्म....सब सो गए...सिर्फ हमदोनों जगे हैं|
मैं: तो आप सब (आह्हःणम्म!!!) ने उनसे कुछ कहा?
भौजी: हाँ...अजय ने उन्हें सारी बात बताई और ये सुन कर उन्हें बहुत गुस्सा आया और वो शर्मिंदा भी हुए!
मैं: मैं समझ सकता हूँ| (उम्म्म!!!) पर आपने कभी बताया नहीं की भैया इससे पहले भी आपको तंग कर चुके हैं? आपसे बदसलूकी कर चुके हैं!(अनन्नह!!!)
भौजी: मैं जानती थी की तुम्हें जान के दुःख होगा, इसलिए नहीं बताया| उनके दिमाग में तो बस "एक" ही चीज चलती रहती है, फर चाहे कोई जिए या मरे| मुझसे लड़ाई-झगड़ा कर के वो अपने दोस्त के घर चले जाते हैं और फिर वहीं से मामा जी के घर!
भौजी ने निराश होते हुए कहा| भौजी की बात सुन कर मेरा दिल बहुत दुःखा, फिर अचानक एक जिज्ञासा हुई की क्यों न आज भौजी से सब बात पूछूँ;
मैं: भौजी...अगर आप बुरा ना मनो तो मैं एक बात पूछूँ? (म्म्म्म!!!)
मैंने झिझकते हुए कहा|
भौजी: हाँ पूछो?
भौजी ने तेल की शीशी रख दी थी और वो मरतर्फ मुँह कर के बैठ गईं;
मैं: आपने बताया था की चन्दर भैया ने आपकी छोटी बहन के साथ....
मैंने जान-बुझ के बात पूरी नहीं की, क्योंकि मेरा वो बात पूरा करना ठीक नहीं था!
भौजी: हाँ...ये तबकी बात है जब मेरा रिश्ता तुम्हारे भैया के साथ तय हुआ था| तब वे हमारे घर दो दिन के लिए रुके थे, उसी दौरान वो अनर्थ हुआ|
भौजी की ये बात सुनने के बाद मुझे लगा की उनके जख्म हरे हो गए हैं, इसलिए मैंने बात वहीं खत्म कर दी;
मैं: मुझे माफ़ करना भौजी मुझे आपसे वो सब नहीं पूछना चाहिए था|
भौजी: कोई बात नहीं मानु, तुम्हें ये बातें जानने का हक़ है| खेर छोडो इन बातों को, ये बताओ अब दर्द कुछ कम हुआ?
मैं: हम्म्म...थोड़ा बहुत... पर अब भी पीठ जल रही है| ऐसा लग रहा है की जैसे किसी ने पीठ में अंगारे उड़ेल दिए| काश यहाँ बर्फ मिल जाती! (अम्म्म्म!!!)
मैंने भौजी से वही पैन किलर माँगी पर भौजी के पास वो दवाई नहीं थी, वो अजय भैया को जगाने जाना चाहती थीं| पर मैंने उन्हें रोक दिया; "रहने दो, अजय भैया जाग गए तो मुझे बाहर सोना पड़ेगा! कम से कम आज रात आपके पास सो तो सकता हूँ!" मैंने थोड़ा हँसते हुए कहा जिससे माहौल थोड़ा हल्का हुआ| "क्या फायदा? तुम तो अलग चारपाई पर हो?" भौजी ने भी मेरे मज़ाक को थोड़ा आगे बढ़ाया जिस कारन हम दोनों हँस पडे! पर पीठ में दर्द था, डॉक्टर ने भौजी को एक PCM लिखी थी, तो मैंने भौजी से एक PCM ले ली और उम्मीद करने लगा की इससे मेरा दर्द कम होगा| दवाई लेके मैं जैसे-तैसे करवट लेके लेट गया, पर चैन कँहा था, ऊपर से करवट बदलने के लिए भी मुझे काफी मशक्त करनी पड़ रही थी| रात को गर्मी ज्यादा थी इसलिए मैं, भौजी और नेहा तीनों आँगन में ही सो रहे थे| रात के करीब साढ़े बारह बजे होंगे, नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी और बार-बार करवट बदलने से चारपाई चूर-चूर कर रही थी| भौजी को एहसास हो गया था की पीठ में हो रही जलन मुझे सोने नहीं देगी| जैसे ही मैं दुबारा बायीँ करवट लेके लेट गया, तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी मैंने कभी कामना भी नहीं की थी| भौजी मेरे बिस्तर पर आईं और पीछे से मुझसे चिपक कर लेट गईं| मेरी पीठ पर एकदम से ठंडा एहसास हुआ| दरअसल भौजी ने ऊपर कुछ भी नहीं पहना हुआ था और उनके नंगे स्तन मेरी पीठ में धंसे हुए थे इस कारन मेरी पीठ को ठंडी रहत मिली थी! ठन्डे एहसास से मेरा दर्द तो कम हुआ पर मुझे भौजी का ये करना अजीब लगा;
मैं: भौजी ये आप क्या कर रहे हो?
मैंने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा|
भौजी: क्यों? तुम अगर मुझे गर्माहट देने के लिए मुझसे चिपक के सो सकते हो तो क्या मैं तुम्हें अपने नंगे बदन से ठंडक भी नहीं दे सकती?
भौजी की बात सुन मैं कुछ नहीं बोला बस उनका हाथ जो मेरी छाती पर था उसे कस के दबा दिया| कुछ मिनट ऐसे ही लेटे रहने के कारन मेरे अंदर वासना भड़कने लगी थी| मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे और ये आग भौजी भी महसूस कर रही थी| मेरा अंतर मन मेरी इस वासना की आग को गलत ठहरा रहा था, इस समय मेरा भौजी के संग सम्भोग करना ऐसा होता जैसे उनकी रक्षा करने के एवज में मैं उनसे उनके तन का सुख भोगना चाहता हूँ, इसलिए मैं उठ के बैठ गया तथा भौजी की ओर पीठ कर के खड़ा हो गया| मेरे मन में उठ रहे विचारों के कारन मैं भौजी से नजरें नहीं मिला पा रहा था और खुद को कुछ भी बोलने से रोक ने लगा| पर भौजी को एरा ये बर्ताव खटकने लगा और वो एकदम से मेरे पीछे आके खड़ी हो गईं, फिर अगले ही पल उन्होंने मुझे पीछे से जकड लिया| उनके नंगे स्तन मेरी पीठ में आ लगे, इस जकड़न ने मेरी वासना की आग में घी का काम किया;
भौजी: क्या हुआ मानु? तुम इस तरह यहाँ क्यों आ आगये?
भौजी ने थोड़ी चिंता जताते हुए कहा|
मैं: बस अपने आपको रोकने की नाकाम कोशिश कर रहा था|
भौजी: रोकने की? किस लिए? और क्यों? क्या तुम्हें मेरा साथ अच्छा नहीं लगता?
भौजी ने एकदम से अपने सवालों की बौछार कर दी;
मैं: ऐसा नहीं है...मैं वो.....
कहना तो मैं सच चाहता पर थोड़ा क़तरा रहा था, लेकिन भौजी ने मेरी बात काट दी;
भौजी: समझी...तुम मेरी कही बात को लेके अब भी नाराज हो?
भौजी की बात सुन मैं चुप रहा और हिम्मत इक्कट्ठा करने लगा ताकि मैं भौजी को अपनी वासना की आग के बारे में बता सकूँ! कुछ पल चुप रहा, पर फिर मुझे लगा की अगर मैंने कुछ नहीं किया तो भौजी का दिल टूट जायेगा और मैं ऐसा कतई नहीं चाहता था| मैं बिना कुछ कहे एकदम से पलटा और भौजी के चेहरे को थाम उनके होंठों से अपने होठों को मिला दिया|
अचानक ही मुझ पर वासना बेकाबू हो गई, मैं सब दर्द भूल गया और बेतहाशा भौजी के होंटों को चूसता रहा! भौजी ने खुद पर हुए इस अचानक आक्रमण का ज़रा भी विरोध नहीं किया, बल्कि धीरे-धीरे वो भी मेरा साथ देने लगीं| उन्होंने अपना मुख हल्का सा खोला और मैंने बिना मौका गंवाए उनके मुख में अपनी जीभ प्रवेश करा दी! जब उन्होंने अपनी जीभ से जवाबी हमला किया तो मैंने उनकी जीभ को अपने दातों तले दबा दिया और रसपान करने लगा| मैं काबू से बाहर हो गया था, मेरे हाथ अब फिसलते हुए भौजी के कंधो तक आगये थे| मैंने चुंबन तोडा और झुक के भौजी के दायें स्तन को अपने होठों की गिरफ्त में ले लिए| अपने अंदर भड़की वासना के कारन मैंने बिना सोचे समझे भौजी के स्तन को काट लिया! दर्द इतना तीव्र था की एक पल के लिए तो भौजी कसमसा के रह गयीं, पर उन्होंने मुझे अपने से दूर नहीं किया बल्कि मेरे सर को अपने स्तन पे दबा दिया| मैं उनके स्तन को किसी शिशु की भाँती पीने लगा और अब मेरा हाथ उनके बाएँ स्तन को मींजने लगा था| उनका बायाँ चुचुक मेरी उँगलियों के बीच था और मैं उसे भी रह-रह के निचोड़ने लगा था| जब मैं ऐसा करता तो भौजी की सिसकारी छूट जाती; "स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ...अम्म्म्म...हन्ंणणन्!!!!"
मैं भौजी की सिस्कारियों से उत्तेजित हो रहा था और उनके दायें चुचुक को दाँतों से दबाने लगा| मैं नहीं जानता था की मैं अनजाने में भौजी को पीड़ा दे रहा हूँ| जब मेरा मन उनके दायें स्तन से भर गया तब मैंने उनके बाएँ स्तन को अपने मुख की गिरफ्त में ले लिया| अब मैं उस स्तन का भी स्तनपान करने लगा और दायें स्तन को अपने हाथों से मींजता रहा| कभी चूसता...कभी काटता...कभी उनके चुचुक को ऊँगली में दबा कर निचोड़ देता| जब मेरा मन भर गया तब मैंने भौजी के स्तनों की हालत देखी| दोनों स्तन लाल हो चुके थे और भौजी के मुख पर आँसूँ की कुछ बूँदें छलक आईं थी, पर भौजी ने एक शब्द भी नहीं कहा था! वो चाहतीं तो मुझे रोक सकती थीं, या बता सकती थीं की मानु मुझे दर्द हो रहा है, पर उन्होंने मुझसे इसकी ज़रा भी शिकायत नहीं की| मैं कुछ क्षण तक आँखें फाड़े उन्हें देखता रहा...निहारता रहा....और सोचने लगा की क्या सच में वो मुझे इतना प्यार करती हैं?
मैं: भौजी आपको दर्द हो रहा था न?
मैंने थोड़ा मायूस होते हुए कहा|
भौजी: नहीं तो!
भौजी ने मुस्कुराते हुए कहा|
मैं: मुझे माफ़ कर दो, वासना के आवेग में मैं कुछ ज्यादा.....
भौजी ने एकदम से मेरी बात काट दी;
भौजी: आज के बाद अगर फिर कभी तुमने हमारे प्यार को वासना कहा ना तो फिर देख लेना!
भौजी ने मुझे थोड़ा डाँटते हुए कहा, उनकी डाँट सुन कर शर्म से मेरा सर झुक गया|
भौजी: इतने दिनों से मेरी बेवकूफी की कारन हम दोनों तड़प रहे थे और अभी जो हो रहा है ये उस बर्बाद किये हुए समय का ख़ामियाजा है!
भौजी ने प्यार से कहा और फिर मेरी ठुड्डी ऊपर उठाई| मेरी आँख उनसे मिली और उनकी आँखों में मुझे वही इज्जत और प्यार दिखा जो पहले दिखता था|
भौजी: पर तुमने ऐसा क्यों पूछा?
मैं: क्योंकि आप झूठ बोल रहे हो! आपके स्तन पर बने ये लाल निशान कुछ और ही कहानी बता रहे हैं|
मैंने भौजी के स्तनों की तरफ ऊँगली करते हुए पुछा|
भौजी: ये तो तुम्हारे प्यार की निशानी है, जब तुम नहीं होगे तब ये मुझे तुम्हारे साथ बिताये हर लम्हे की याद दिलाएंगे|
भौजी ने मुस्कुराते हुए कहा, नजाने क्यों पर मैं उनके दर्द को भाँप गया था, मैं आगे कुछ कहता उससे पहले ही भौजी निचे घुटनों के बल बैठीं और मेरी पेंट खोल दी| मेरा लिंग बाहर निकाला और उसे पहले तो चूमा, फिर अपनी जीभ के बीच वाले भाग से एक बार चाटा; "स्स्स्स...अंह्ह्ह!!!!" मेरी सिसकारी छूटी|
अब उन्होंने अपना मुख पूरा खोला, जीभ बाहर निकली और जितना हो सकता था मेरे लिंग को अपने मुख में भर लिया| मेरा लिंग उनकी जीभ और तालु के बीच में रगड़ा जा रहा था, मुझे इतना मज़ा आ रहा था की मैं अपने पंजों के बल खड़ा हो गया| मेरे रोंगटे खड़ा हो चुके थे!! भाभी ने धीरे-धीरे मेरे लिंग को मुख में भरे अपनी गर्दन को आगे पीछे करना शुरू किया| ऐसा लगा जैसे भौजी आज मेरा सारा रस पी जाएँगी!!! मैं अब किसी भी समय छूटने वाला था इसलिए मैंने भौजी को बीच में ही रोक दिया| मैंने भौजी को कंधे से पकड़ कर खड़ा किया तथा बिना उनकी साडी उतारे उनकी बायीँ टाँग मैंने अपने हाथ में उठा ली| इधर भौजी ने अपने हाथ से मेरे लिंग को सही दिशा दिखाई, जैसे ही मुझे दिशा का ज्ञात हुआ मैंने एक जोरदार धक्का मारा! धक्के की तीव्रता इतनी तेज थी की हमारा संतुलन बिगड़ा तथा मैं और भौजी दिवार से जा टिके| अब भौजी की नंगी पीठ दिवार से लगी थी और सामने से उनके स्तन मेरी छाती में धंसे हुए थे| जैसे ही भौजी की पीठ दिवार से लगी, भौजी बड़ी जोर से छटपटाई! मैं भी हैरान था की आखिर ऐसा कौन सा तगड़ा जोर लगा दिया मैंने की भौजी छटपटा गईं?! भौजी के चेहरे पर दर्द की लकीरें साफ़ दिख रहीं थीं, उनकी आँखें बंद थीं और दर्द की लहार उनके शरीर में दौड़ रही थी!
मैं: आप ठीक तो हो ना?
मैंने घबराते हुए पुछा तो भौजी अपने आप को संभालते हुए बोलीं;
भौजी: हाँ!
पर मैं उनके जवाब से संतुष्ट नहीं था;
मैं: तो आप एकदम से छटपटाने क्यों लगे?
भौजी: वो बस ऐसे ही.. तुम मत रुको!!!
भौजी की बात से मुझे लगा की शायद मैं कुछ ज्यादा ही जोश में अपना लिंग उनकी योनि में प्रवेश करा दिया! मैंने मन ही मन खुद को लताड़ा और अपनी गति धीरे-धीरे रखी| मेरे हर झटके से भौजी के स्तन हिल जाते और भौजी की करहाने की आवाज आने लगती;
"स्स्स्स....अंंंंंं ...ममम... मानु......अह्ह्ह्हह्ह!!!"
भौजी के दोनों हाथों की उँगलियाँ मेरे सर के बालों में रास्ता बना रहीं थीं जिससे मुझे और जोश आ रहा था| कामाग्नि अब प्रगाढ़ रूप धारण कर रही थी और भौजी और मैं लग-भग चरम सीमा तक पहुँच गए थे| आनंद और उन्माद के कारन भौजी की आँखें बंद थीं और वो बस सिसकारियाँ लिए जा रही थी; "आआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,स्स्सस्स्स्स....स्स्सस्स्स्स....स्स्स्सस्शह्ह्हम्म्म...स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स!!!"
मैं एक दम से रुक गया और अपना लिंग बाहर खींच लिया, एक पल को तो भौजी हैरान हुईं पर जब मैंने उन्हें आगे की तरफ झुकने को खा तो वो समझ गईं| मैंने भौजी को पलटा और नीचे झुकाया जिससे वो घोड़ी के सामान झुक गयीं, मैंने अपना लिंग पीछे से उनकी योनि में डाल दिया और फिर से धक्के लगाना शुरू कर दिया| भौजी चर्म सीमा पर पहुँच गई और स्खलित हो गईं, उनका रस बहता हुआ बाहर आया और मेरे लिंग को पूरी तरह भिगो दिया| घर्षण काम हो चूका था और मैं अब भी झटके दिए जा रहा था| आगे झुके होने के कारन भौजी की पीठ चाँद की रौशनी में चमक रही थी और मेरा मन किया की मैं उसे एक बार चुम लूँ| मैंने भौजी की पीठ से बाल हटाया और जो दृश्य मैंने देखा उससे मैं सन्न रह गया| भौजी की पीठ पर बेल्ट की मार के दो निशान बने थे! ये देखते ही मेरी आँखों में खून उतर आया और मैं छिटक के भौजी से दूर हो गया| अब मुझे आभास हुआ की जब मैंने पहली बार झटका मारा था तो भौजी क्यों छटपटाई थीं| उनकी जख्मी नंगी पीठ दिवार से रगड़ गई थी जिससे उन्हें बहुत दर्द हुआ होगा| इधर भौजी को जब अपनी योनि मेरे लिंग महसूस नहीं हुआ तो वो पीछे मूड के मुझे देखने लगीं| मेरी आँखों में गुस्सा देख वो समझ गईं की मैंने उनके जख्म देख लिए हैं पर फिर भी उन्होंने अनजान बने रहने का नाटक किया;
भौजी: क्या हुआ मानु?
भौजी का ये सवाल सुन आकर मुझे बहुत गुस्सा आया;
मैं: आपकी पीठ पर वो निशान, आज सुबह के हैं ना?
मैंने गुस्से से पुछा| मेरा गुस्सा देख वो समझ गईं की अब वो मुझसे अपने जख्म नहीं छुपा सकतीं इसलिए उन्होंने सच बोला;
भौजी: हाँ...तुम्हारे आने से पहले उन्होंने मुझे...
आगे भौजी कुछ बोल पातीं मैं गुस्से में बोल पड़ा;
मैं: और आपने मुझे ये बात बताना जर्रुरी नहीं समझा?
मेरा गुस्सा देख उन्हें डर लगा पर फिर भी उन्होंने बड़ी हिम्मत से कहा;
भौजी: नहीं मानु...ये घाव तो बहुत थोड़े हैं| तुमने तो मुझ पर अपने आप को कुर्बान कर दिया था!
मैंने आगे कुछ नहीं कहा और गुस्से में उनके कमरे में घुसा| सबसे पहले मेरी नजर नेहा पर पड़ी जो करवट ले कर सो रही थी| फिर मैंने मलहम की शीशी उठाई और बाहर आ गया;
भौजी: ये क्या कर रहे हो?
भौजी ने हैरान होते हुए पुछा|
मैं: आपकी पीठ पर दवाई लगा रहा हूँ|
मैंने भौजी को थोड़ा घूर के देखते हुए कहा|
भौजी: पर तुम तो मुझे प्यार कर रहे थे और तुम तो अभी स्खलित......
भौजी का मतलब मैं समझ गया था पर इस वक़्त उनकी सेहत मेरे लिए ज्यादा जर्रूरी थी, इसलिए मैंने उनकी बात काट दी;
मैं: वो सब बाद में, पहले आपकी पीठ में दवाई लगाना जरुरी है| मेरी बेवकूफी की वजह से आपका जखम और उभर गया है!
मैंने भौजी को खींच के उनकी चारपाई पर पेट के बल लिटाया और उनका घाव साफ़ कर के उस पर मलहम लगाया| भौजी ने बड़ी कोशिश की कि मैं पहले सम्भोग पूरा करूँ पर मेरा मन उनकी ये दशा देख के फ़ट गया था! इतना दुःख तो मुझे तब भी नहीं हुआ था जब मैंने उन्हें बुखार से तपते हुए देखा था| उसका कारन ये था की मैं अनजाने में जख्मी भौजी के साथ सम्भोग कर रहा था|
दिवार से उनकी पीठ रगड़ने के कारन भौजी को बहुत दर्द हो रहा था और मैं बेवकूफ उन्हें और दर्द दिए जा रहा था! मलहम लगाने के बाद मैं उन्हें पँखा करने लगा ताकि ठंडी हवा से उनके घाव को कुछ आराम मिले| अब मन ही मन मेरे अंदर गुस्सा भी उबलने लगा था और जो फैसला मैंने कुछ देर पहले लिया था, अब समय था उसे भौजी को बताने का;
मैं: मैंने एक फैसला किया है|
भौजी: क्या? स्स्स्स्स
भौजी ने दर्द से सीसियाते हुए कहा|
मैं: कल मैं, आप और नेहा घर से भाग जायेंगे|
ये सुनते ही भौजी उठ बैठीं और मेरा हाथ पकड़ते हुए बोलीं;
भौजी: नहीं मानु....तुम अभी गुस्से में हो, हम कल सुबह बात करते हैं!
भौजी को लग रहा था की मैं गुस्से में बोल रहा हूँ जो की सही था पर गुस्सा मेरे सर पर सवार था!
मैं: नहीं! कल दोपहर होने से पहले जब सभी घरवाले खेत में काम करने निकल जायेंगे तब हम तीनों यहाँ से भागेंगे|
मैंने बहस करते हुए कहा|
भौजी: मानु, तुम्हें मेरी कसम .. ऐसी बात मत करो!
भौजी की ये बात सुन मैं गुस्से से तिलमिला गया और मैंने झल्लाते हुए कहा;
मैं: तो आपको यहाँ मरने के लिए छोड़ दूँ?
बस इतना कहते हुए मैं उठा और अपनी चारपाई पर जाके पेट के बल लेट गया| अब चूँकि भौजी ने मुझे अपनी कसम दी थी इसलिए मैं अभी तो चुप हो गया पर दिमाग में भौजी को भगाने का प्लान बन चूका था|
सुबह हुई और मैं फटा-फ़ट उठा, पीठ के घाव अब भी वैसे ही थे, क्योंकि दर्द कुछ कम था| मैं उठ कर भौजी के घर से बाहर आया तो बड़के दादा और बड़की अम्मा कुएँ के पास चाय पी रहे थे| मुझे देखते ही उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया;
बड़के दादा: आओ मुन्ना... बैठो| अब कैसी तबियत है तोहार? दर्द कम हुआ? नहीं तो चलो डॉक्टर के ले चली|
मैं: नहीं दादा, अब दर्द कम है|
बड़की अम्मा: लो चाय पियो|
मैं: नहीं अम्मा अभी मुँह नहीं धोया, पूजा भी नहीं की|
बड़के दादा: मुन्ना, हमें कल साँझ को अजय बताइस की का हुआ! जो कुछ हुआ उसके लिए हम दोनों प्राणी बहुत शर्मिंदा हैं|
मैं: नहीं दादा, ऐसा मत कहिये| मैं उस समय भौजी को दवाई देने जा रहा था जब मुझे चीखने-चिल्लाने की आवाज आई| मैं दौड़ा-दौड़ा वहाँ पहुँचा, आगे जो हुआ वो आपको पता ही है|
बड़के दादा: तुम ई बात छुपाये खातिर काहे कहत रहे? गलती चन्दर की है, सजा तो उसे मिलेबे करि! चाहे ऊ सजा तोहार बाप दे या हम दै| हम तोहार पिताजी को सब सच बताइदेब!
मैं: जैसा आपको ठीक लगे| मैं तो बस यही चाहता था की इस बात पर ज्यादा बवाल न हो.....वैसे अम्मा आपने भौजी का हाल तो पूछा ही नहीं?
बड़की अम्मा: काहे? ऊ को का हुआ? चोट तो तोहका लाग रही!
मैं: दरअसल अम्मा, मेरे पहुँचने से पहले भैया ने भौजी पर हाथ उठा दिया था| उनकी पीठ पर भी बेल्ट के जख्म बने होंगे!
मैं बड़की अम्मा को सब नहीं बता सकता था इसलिए मैंने बात गोलमोल की!
बड़की अम्मा: हाय राम... बहुरिया तु काहे हमका नहीं बताई?
भौजी: नहीं अम्मा....ज्यादा दर्द नहीं है!
भौजी ने बात छुपानी चाही, पर मैं बोल पड़ा;
मैं: तो आप रात में चीखे क्यों थे? अम्मा भौजी करवट लेके लेटी थी, जैसे ही ये सीढ़ी लेटी एकदम से चीख पड़ीं और उठ के बैठ गईं|
बड़की अम्मा: चल बहुरिया भीतर हम तोहका मलहम लगा देइ|
अम्मा और भौजी पुराने घर में घुसे और मैं बड़े घर की ओर चल दिया| अब समय था की मैं अपने बनाये प्लान को अंजाम दूँ! मैंने जल्दी-जल्दी अपने दो-चार कपडे पैक किये, अगला काम था पैसे का जुगाड़ करना| मेरे पास पर्स में करीब दो सौ रूपए थे, उस समय ATM कार्ड तो था नहीं, परन्तु पिताजी के पास MULTI CITY चेक की किताब थी और मुझे पिताजी के दस्तखत करने की नक़ल बड़े अच्छे से आती थी| मैंने किताब से एक चेक फाड़ा और उसमें एक लाख रुपये की राशि भर दी| जल्दी से नहा धो के तैयार हुआ, पूजा की और भगवान से दुआ माँगी की मुझे मानसिक शक्ति देना की मैं अपनी नई जिम्मेदारी निभा सकूँ|
जारी रहेगा भाग 4 में....
Bhot hi bdiya update tha bhai ji itne dino ke break ke baad,, padke mja aa gya,,,,,, ab dekhte h ki bhouji manu ko rauk legi ya fir manu apne plan anusaar neha aur bhauji ke saath bhag jayega